आपके जीवन में आदर्शों की भूमिका – और वयस्क हो जाने के बाद क्यों उनकी ज़रूरत नहीं है – 5 फरवरी 2015

आज मैं आदर्शों के बारे में लिखना चाहता हूँ। उन व्यक्तियों के बारे में, जिन्हें हम अपने लिए एक उदाहरण के रूप में देखते हैं, कोई ऐसा, जिसके चरित्र की कुछ विशेषताएँ हमें प्रभावित करती हैं और हम सोचते हैं कि ये विशेषताएँ ऐसी हैं, जिनकी नकल की जानी चाहिए या हमें उनके जैसा बनने की कोशिश करनी चाहिए। मैं आपको वह पूरी प्रक्रिया विस्तार से बताता हूँ जिससे पता चलेगा कि क्यों और कैसे उम्र बीतने के साथ इस धारणा में परिवर्तन होना चाहिए।

जब आप बच्चे होते हैं, आपके माता-पिता या आपका लालन-पालन करने वाला कोई भी वयस्क सहज ही आपके लिए अनुकरणीय बन जाते हैं। यह एक ऐसी बात है जिसे आप बदल नहीं सकते और न ही उसे किसी तरह से प्रभावित कर सकते हैं। जन्मते ही सबसे पहले उन्हें देखना और जीवन की मूलभूत क्रियाएँ सीखने ले लिए उनका अनुकरण करना आपकी नियति होती है।

धीरे-धीरे आपके आसपास मौजूद परिवार के दूसरे सदस्य आपके अतिरिक्त आदर्श या extended ideals बनते जाते हैं। बड़े भाई या बहनें, चाचा-चाची, अकसर घर आने वाले मेहमान आदि। आप अपने संसार को विस्तार देने की प्रक्रिया में होते हैं और उसके साथ अपने आदर्शों को भी विस्तार देते चलते हैं। आप स्कूल जाना शुरू करते हैं और आपके शिक्षक आपके आदर्श बन जाते हैं। यार-दोस्त, पड़ोसी और यहाँ तक कि वे लोग भी जिन्हें आप व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते, जैसे गायक, अभिनेता या अभिनेत्रियाँ आदि भी इस सूची में स्थान पाने लगते हैं।

जब आप छोटे थे, ये सभी लोग कुल मिलाकर आम तौर पर आपके लिए महान थे। वे जैसे भी हों, आप उन्हें दोषरहित और उत्तम मानते हैं। एक सामान्य मनुष्य की तरह उनमें भी कोई खामी हो सकती है या वे भी कोई गलती कर सकते हैं, इसे आप देख नहीं पाते, उस समय यह आप सोच भी नहीं सकते। जैसे-जैसे आप बड़े होते हैं और परिदृश्य आपके सामने खुलता जाता है, धीरे-धीरे यह सब आपको सीखना पड़ता है। अचानक आपको पता चलता है कि वे किसी खास क्षेत्र में तो बहुत निपुण हैं लेकिन किसी दूसरे क्षेत्र में अनाड़ी हैं और उस क्षेत्र में आपके लिए उनकी नकल करना ठीक नहीं होगा।

न सिर्फ आपको सम्पूर्ण परिदृश्य की जानकारी होती जाती है बल्कि आप स्वयं भी परिपक्व होते जाते हैं और आपको स्वयं यह निर्णय करना होता है कि आप अपने अंदर कौन सी चारित्रिक विशेषताएँ चाहते हैं, जिन्हें पाने की आपको पूरी कोशिश करनी चाहिए और किन विशेषताओं की आपको नकल करनी है और किनकी नहीं। और किसी न किसी बिन्दु पर आकर आपको यह सोचना चाहिए कि आपको किसी दूसरे जैसा होने की ज़रूरत नहीं है। नकल करने के लिए आपको किसी आदर्श की आवश्यकता नहीं है क्योंकि कोई भी दो व्यक्ति एक जैसे नहीं हो सकते और इसलिए आप भी निराले और अद्वितीय हैं।

प्रेरणा के लिए आप हमेशा ही दूसरों की ओर देख सकते हैं। किसी की सफलता या उसकी विशेषता की सराहना करें और देखें कि उसके पास कुछ ऐसा है जिसे आप भी अपने जीवन का हिस्सा बना सकते हैं। किसी भी हालत में हमें यह बचपना नहीं करना चाहिए कि हम उसे एक सम्पूर्ण रूप से दोषरहित आदर्श मानने लगें-इससे हम उनकी गलतियों पर तरह-तरह के बहाने बनाकर और झूठ का सहारा लेते हुए अनावश्यक पर्दा डालने की कोशिश करने लगते हैं।

कोई भी दोषरहित नहीं है लेकिन हम सब अद्वितीय हैं-इसलिए जैसे भी हों, अपने जैसे बने रहें, ज़्यादा से ज़्यादा अपने आपको बेहतर बनाने की कोशिश करते हुए!

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