अगर राधे माँ जैसी कोई महिला मिनीस्कर्ट पहने या नृत्य करे तो उसमें कोई बुराई है क्या? 9अगस्त 2015

मैं पिछले दो दिन भी बहुत व्यस्त रहा। कल और परसों टीवी पर मैंने दो परिचर्चाओं में भाग लिया। दोनों में ही प्रश्न एक गर्मागर्म विषय पर पूछे गए, जो पिछले कुछ दिनों से भारतीय समाचारों में छाया हुआ है: राधे माँ, एक महिला गुरु, जिसकी ईश्वर के रूप में पूजा होती है। एक महिला गुरु, जिसके कुछ निजी फ़ोटो और वीडियो सार्वजनिक हो गए।

सन 2012 में ही अपने पाठकों से मैं इस महिला का परिचय करवा चुका हूँ कि कैसे यह महिला धार्मिक बनाव-श्रृंगार करके अपने अनुयायियों की गोद में बैठकर 'लैप डांस करती है

इस महिला के विरुद्ध, जिसका असली नाम सुखविंदर कौर है, हाल ही में एक अन्य महिला ने, जिसके घर में वह रहती थी, पुलिस के पास शिकयत दर्ज़ कराई थी। आरोप यह था कि वह उस महिला के साथ हिंसक व्यवहार करती है और परिवार के दूसरे सदस्यों पर दबाव डाल रही है कि वे उसके माता-पिता से अधिक दहेज़ की मांग करें।

ये समाचार भी उतनी गंभीरता के साथ नहीं दिखाए जा रहे थे लेकिन तभी उसके कुछ व्यक्तिगत फ़ोटो और वीडियो मीडिया के हाथ लग गए, जिसमें राधे माँ मिनीस्कर्ट पहनकर फ़ोटो खिंचवा रही है और बॉलीवुड फिल्मों के गानों की धुन पर नाच रही है। जिस दिन से ये फ़ोटो और वीडियो सार्वजनिक हुए, उन्हें बार-बार टीवी समाचारों में दिखाया जाने लगा!

कुछ लोग उसके समर्थन में उतर आए हैं तो कुछ विरोध में। कुपित हिन्दू पूछ रहे हैं कि आधुनिक जीवन किस तरह धर्म और भारतीय संस्कृति का मखौल उड़ा रहा है और उसे अपवित्र कर रहा है; वे महिला पर आरोप लगा रहे हैं कि वह लोगों की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचा रही है। दूसरे धर्मगुरु और अवतार कह रहे हैं कि वह परमानंद को प्राप्त हो चुकी है, भक्ति-भाव में तन्मय हो चुकी है, इसलिए नाच-गा रही है क्योंकि ऐसी हालत में भजन-कीर्तन और बॉलीवुड के गानों में कोई अंतर नहीं रह जाता।

ऐसी दो टीवी चर्चाओं में मैंने भी भाग लिया, जहाँ कुछ लोग उसका विरोध तो कुछ लोग समर्थन कर रहे थे। मैंने दरअसल पूछा भी कि नृत्य करने में क्या दिक्कत है। वह राधे माँ कहलाती है- यह समस्या है! भारत में कई ऐसे अवतार हैं जो नृत्य करके लोगों को अपनी ओर खींचते हैं। राधा और कृष्ण भी नृत्य किया करते थे और उन पर कोई उंगली नहीं उठाता! मीडिया पहले से जानता था कि वह अपने अनुयायियों के साथ लैप-डांस करती है लेकिन जब तक उनके पास इस महिला के मिनीस्कर्ट पहने हुए फोटो हाथ नहीं लगे थे, उसे किसी समस्या की तरह प्रस्तुत नहीं किया गया!

जिस व्यक्ति को आप ईश्वर के स्थान पर रखते पूजते हैं, इस तरह उसके आदेशों का पालन करते हैं, जैसे खुद आप, आपका जीवन और आपका भविष्य उससे छिपा हुआ नहीं है, उससे अपेक्षा करते हैं कि वह सार्वजनिक जीवन में एक खास तरह का व्यवहार करे, समाज में उसकी छवि साधु-संतों की तरह हो, भले ही वह महज दिखावा ही कर रहा हो। आपने उसे उच्चासन पर तो बिठा दिया लेकिन फिर आप चाहते हैं कि वह दैवी श्रृंगार करके वहाँ बैठे, एक सामान्य मनुष्य के रूप में नहीं!

यह कौन बताता है कि कोई व्यक्ति पुरुष या स्त्री अवतार होने के काबिल है? क्या कोई ऐसी संस्था है, जहाँ ये लोग कोई परीक्षा पास करके आते हैं? क्या वहाँ बताया जाता है कि उन्हें मिनीस्कर्ट नहीं पहनना है? और क्या कोई उन्हें यह भी बताता है कि अपनी झूठी दैवी शक्ति के भ्रमजाल में फँसाकर भोलेभाले लोगों को धोखा नहीं देना चाहिए? इन लोगों की ज़िम्मेदारी कौन लेगा? क्या वे लोग लेंगे, जो उनके पास जाते हैं?

इसके विपरीत, राजनेता और दूसरे प्रसिद्ध लोग इन नकली और जालसाज गुरुओं के पास दौड़े चले आते हैं, उनके चरणों में लोटते हैं, उन पर पैसों की बारिश करते हैं और दुनिया के सामने ज़ाहिर करते हैं कि वे उन गुरुओं को मानते हैं, उनके कामों का अनुमोदन करते हैं। कोई भी व्यक्ति, जो थोड़ा-बहुत अभिनय जानता है, साधु जैसे धार्मिक कपड़े पहनकर भगत, साधु या गुरु बन सकता है! वे टीवी पर प्रचार करते हैं, विज्ञापनों पर काफी पैसा खर्च करते हैं, लोगों को आकर्षित करते हैं और अंततः उनकी जेबों से काफी पैसा निकलवाकर अपनी झोली भरते हैं!

लेकिन वे उनका आर्थिक शोषण करके ही संतुष्ट नहीं होते! वृंदावन के लिए यह कोई नई बात नहीं है: आए दिन पुलिस इन गुरुओं और अवतारों का पर्दाफाश करती रहती है, जो अपने भक्तों के पूर्ण समर्पण का लाभ उठाकर उनका दैहिक शोषण करते हैं, उन्हें अपने साथ सोने के लिए मजबूर करते हैं! कुछ लोगों के लिए यह न सिर्फ अपनी आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति का जरिया होता है बल्कि उससे उनकी शारीरिक पिपासा भी शांत हो जाती है! लेकिन कुछ दूसरों के लिए ऐसे काम गर्हित होते हैं, उन्हें महसूस होता है कि उनके डर या संकोच का लाभ उठाकर कि जिसे वे ईश्वर मान रहे हैं, वह नाराज़ या दुखी न हो, उन्हें ये काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है!

अपने टीवी इंटरव्यू में मैंने कहा कि आसाराम जैसे गुरु, जो अभी भी एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार के आरोप में जेल में हैं, और राधे माँ जैसे लोग धर्म की पैदावार हैं। जब तक संगठित धर्म मौजूद हैं, ऐसे लोगों का अस्तित्व भी बना रहेगा, वे बार-बार तरह-तरह के अवतार लेकर हमारे सामने उपस्थित होते रहेंगे। वास्तव में इसकी जड़ धर्म ही है!

स्वतंत्र और भ्रष्टाचार-मुक्त मीडिया का स्वप्न – ‘इंडिया संवाद’ – 23 मार्च 2015

आजकल मेरे जीवन में कुछ नया और अनोखा घटित हो रहा है और उसमें मैं व्यक्तिगत रूप से संलग्न हो चुका हूँ: मैंने कुछ लोगों के एक समूह से जुड़ने का, उसका हिस्सा बनने का फैसला किया है, जो एक नया, भ्रष्टाचार-मुक्त समाचार चैनल शुरू करने की परिकल्पना के साथ काम करने में जुटा हुआ है। यह समाचार चैनल सामान्य लोगों के लिए, सामान्य लोगों द्वारा संचालित किया जाएगा।

मीडिया को प्रजातंत्र का चौथा खम्भा कहा जाता है। मीडिया समाज में, लोगों के जीवनों में, वास्तव में जीवन के हर पहलू में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है! मीडिया लोगों का अभिमत तैयार करता है, उनकी समझ विकसित करता है, उनके दिमागों को प्रभावित करता है और फिर उसी आधार पर वे अपने निर्णय लेते हैं। किसी विषय में ये निर्णय सकारात्मक भी हो सकते हैं और नकारात्मक भी! और स्वाभाविक ही जब वे लोग, वे कंपनियाँ या वे संगठन जो मीडिया केंद्र चलाते हैं, स्वार्थी हो जाएँ और अपने प्रभावों का इस्तेमाल समाज की भलाई के लिए नहीं बल्कि अपने निजी लाभ के लिए करते हैं तो परिणाम बहुत बुरे होते हैं!

यह मैंने अमरीका में होता हुआ सुना है और हम सब यहाँ भारत में साफ-साफ होता हुआ देख ही रहे हैं: सिर्फ गिने-चुने कुछ लोग हैं जो मीडिया को नियंत्रित करते हैं और अपने स्वार्थ के लिए उसका बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं। उनका मकसद लोगों को समाचार देना या उनकी जानकारी में वृद्धि करना नहीं होता बल्कि वे पहले अपना लाभ देखते हैं और फिर उसके अनुसार ही निर्णय लेते हैं कि किसी खास समाचार या जानकारी को जनता तक पहुँचाना है या नहीं।

भारत के पिछले आम चुनाओं में यह बिल्कुल स्पष्ट दिखाई दिया था: देश के सबसे बड़े कार्पोरेट घराने भाजपा के समर्थन में उतर आए थे। वास्तव में इन कार्पोरेट घरानों ने भाजपा के लिए खूब पैसा खर्च उँड़ेला था जिसे वे प्रेस और मीडिया घरानों के ज़रिए बार-बार अपने विज्ञापन प्रसारित करवाने में और भाजपा और मोदी की खबरें प्रसारित करवाने में करते थे। इन कार्पोरेट घरानों ने पैसे के बल पर अर्जित अपने दूसरे प्रभावों का इस्तेमाल भी मीडिया को भाजपा के पक्ष में मोड़ने के उद्देश्य से किया था। और अंततः देश में टीवी विज्ञापनों वाली सरकार बन गई।

चुनावों के बाद मीडिया के इस व्यवहार की कड़ी आलोचना भी हुई-विशेष रूप से सोशल मीडिया में, जहाँ हर कोई अपनी बात रखने के लिए स्वतंत्र और सक्षम होता है। दरअसल ऐसा लग रहा था जैसे देश में कोई नैतिकता बची नहीं रह गई है, सब कुछ सिर्फ पैसे का खेल है। और स्पष्ट हो चुका है कि क्या चल रहा है:’नेटवर्क 18’ खरीदकर मुकेश अंबानी देश के सबसे बड़े मीडिया नेटवर्कों में से एक का मालिक बन चुका है और अब वह एक और चैनल खरीदने जा रहा है, सन टीवी! अब वह कुछ समाचारों को प्रसारित करने हेतु पैसा देगा और कुछ के लिए नहीं। सरकार के पास कार्पोरेट घरानों को लाभ पहुँचाने के कई तरीके होते हैं और मोदी के समर्थन में जो पैसा अंबानी ने निवेश किया था, उसे अब वह कई तरीकों से सरकार से वसूल करेगा।

ऐसा लगता है जैसे पैसा ही दुनिया को चला रहा है। जो पैसा खर्च कर सकते हैं वे मीडिया का इस्तेमाल अपने लाभ के लिए कर सकते हैं और जनता क्या देखे तथा क्या न देखे, इस बात का निर्णय कर सकते हैं। गरीबों के लिए यहाँ कुछ भी नहीं है। उनकी तकलीफ़ें, उनकी समस्याएँ, उनकी आहें, उनकी आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं है।

बड़े-बड़े प्रसिद्ध मीडिया घरानों में उच्च पदों पर आसीन कई पत्रकार देख रहे थे कि क्या चल रहा है। पैसा ही हर बात का फैसला कर रहा था: जो समाचार उनके सामने रखा हुआ है, उसका प्रसारण किया जाना है या नहीं, इसका फैसला भी। यह उनकी पत्रकारीय नैतिकता को ठेस पहुंचाने वाली बात थी, पत्रकार के रूप में यह उनके लिए बेहद अपमानजनक था। उनकी निगाह में यह अनैतिक था, यह सब करने वे पत्रिकारिता के क्षेत्र में नहीं आए थे। वे उद्विग्न थे और उनमें से कुछ ने अच्छे-खासे वेतन वाली अपनी नौकरियाँ छोड़ दीं और एक नया ध्येय, एक नया और अलग स्वप्न लिए वहाँ से बाहर निकल आए:

वे अब एक ऐसा मीडिया चैनल शुरू करने का विचार कर रहे हैं जो इन सब समस्याओं से मुक्त हो। क्या हम कोई ऐसा मीडिया केंद्र विकसित कर सकते हैं जो किसी विशेष राजनैतिक पार्टी या कार्पोरेट घराने की मिल्कियत न हो और न ही उनसे प्रभावित हो बल्कि जनता उसकी मालिक और कर्ता-धर्ता हो? वास्तविक पत्रिकारिता के लिए समर्पित, तटस्थ और जिसे खरीदा न जा सके, ऐसा ईमानदार, पत्रकारिता के उच्च आदर्शों के लिए समर्पित, तटस्थ मीडिया केंद्र?

इस विचार के बारे में मुझे ऑनलाइन पता चला और जब मैंने इस योजना का समर्थन करने की इच्छा व्यक्त की तो उन्होंने मुझसे संपर्क किया। मुझे लगता है कि यह आवश्यक है-विशेष रूप से मीडिया के साथ मेरे कई निराशाजनक अनुभवों के बाद। वह एक और कहानी है जिस पर मैं बाद में कभी चर्चा करूँगा। बहरहाल, मैं उनके प्रयासों में शामिल हुआ और हम आपस में कई बार मिले भी।

तो चैनल की स्थापना और उसे सुचारू रूप से चलाने के लिए अब एक सार्वजनिक ट्रस्ट कायम हो चुका है। हमारा मुख्य आदर्श यह है कि वह भ्रष्टाचार विरोधी और भ्रष्टाचार से मुक्त चैनल हो। हमारी दूसरी मीटिंग में मैंने कहा कि सामान्य जनता, जिनका यह चैनल होगा, न सिर्फ समाचारों के उपभोक्ता हों बल्कि स्वयं संवाददाता भी हों! वे सब लोग, जो सामान्य परिस्थितियों में अपना जीवन गुज़ार रहे हों और जिनके पास भले ही पत्रकारिता में कोई डिप्लोमा न हो। अपने आसपास व्याप्त भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने का उनमें हौसला होना चाहिए।

इस ट्रस्ट और इस मिशन का नाम होगा, ‘इंडिया संवाद’ और आज, भगत सिंह के शहीदी दिवस, 23 मार्च, 2015 के दिन हमने ‘www.indiasamvad.co.in’ नाम से अपनी वेबसाइट लांच कर दी है। अभी इसकी यह पहली झलक भर है और समय के साथ इसे और विकसित किया जाएगा तथा हिन्दी में भी शुरू किया जाएगा। शुरू से ही सामान्य लोगों के लिए इसमें यह सुविधा उपलब्ध की गई है कि वे अपने समाचार साइट पर साझा कर सकें और हम ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को इससे जोड़ने के लिए कटिबद्ध हैं-इस वेबसाइट पर, फेसबुक पेज पर और फेसबुक ग्रुप बनाकर। स्वाभाविक ही हम लगातार तब तक इस प्रयास में लगे रहेंगे जब तक कि एक नए समाचार चैनल की स्थापना नहीं कर लेते- जनता द्वारा, जनता के लिए!

और क्योंकि समाचारों को प्रसारित करना या न करना पैसे पर निर्भर नहीं होगा इसलिए हमारे पास इतनी क्षमता और इतना हौसला होगा कि हर तरह के सच्चे, ईमानदार और जनता से जुड़े हुए समाचार हम प्रसारित कर सकें और दिखा सकें कि वास्तव में देश में क्या चल रहा है और देश में जो कुछ भी हो रहा है उसकी वास्तविकता उजागर कर सकें!

मैं इस विचार को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचाना चाहता हूँ और उनका समर्थन और सहयोग प्राप्त करना चाहता हूँ। कृपया इस ग्रुप से जुड़िये, उनकी साइट पर जाकर पढ़िए, अपने समाचार साझा कीजिए और जो भी मदद आप करना चाहें, कर सकें, करें। मेरा विश्वास है कि यह देश के लिए बहुत अच्छा होगा कि जनता को असली समाचार, व्यापक बहुमत के समाचार जानने का मौका मिले, न कि मुट्ठी भर सत्ताधारी, धनाढ्य और संपन्न लोगों के समाचार।

हो सकता है कि आपकी मित्रताएँ, जैसी हैं, वैसी ही ठीक हों!- 25 सितंबर 2013

मित्रों के बारे में लिखते हुए, जैसा कि मैंने पिछले दो दिनों में लिखा, कई तरह की भिन्न-भिन्न परिस्थितियाँ, प्रश्न और भावनाएँ मेरे मस्तिष्क में आती है, जिन्हें या तो मेरे मित्रों ने मुझसे साझा किया था या उन्होंने, जो मेरे पास सलाह मशविरा करने व्यक्तिगत सत्र में उपस्थित होते थे। ऐसे कई लोग थे, जो मुझसे कहते थे, ‘मेरे कई मित्र हैं लेकिन मेरा कोई ऐसा मित्र नहीं है, जिसके लिए मैं कह सकूँ कि वह मेरा बचपन का मित्र है!’ या यह कि, ‘मैं नहीं जानता, मेरे मित्र हैं, लेकिन हम साथ में खरीदी करने बाज़ार नहीं जाते न ही साथ में काफी पीने जाते हैं!’ ऐसे ही वाक्य। लोगों की यह भावना है कि उनकी दोस्ती शायद पक्की नहीं है। मेरी प्रतिक्रिया अक्सर एक प्रश्न के रूप में होती है: क्या यह आपकी अपनी भावना है या वह बाहर से आप पर लाद दी गई है?

सब यह बात समझ नहीं पाते क्योंकि लोग अक्सर इस बात पर बिना किसी गहरे सोच-विचार के जीते रहते हैं कि जो हम कर रहे हैं तो ऐसा क्यों कर रहे हैं और यह भी कि हम जो सोच रहे हैं तो ऐसा क्यों सोच रहे हैं। वास्तविकता यह है कि हमारे बहुत से कार्य, विचार और भावनाएँ सुनी-सुनाई या दूसरों के साथ तुलना करते वक्त महसूस की गई बातों या मीडिया में सुनी या देखी गई बातों द्वारा प्रभावित होते हैं। स्वाभाविक ही, आप सब यह जानते हैं कि अपने परिवेश के साथ अपनी तुलना नहीं करनी चाहिए, आप जानते हैं कि दूसरों का कहा मानना नहीं चाहिए और यह भी आप जानते हैं कि मीडिया आम तौर पर चाहता है कि आप उसके द्वारा प्रचारित सामाग्री खरीदें। फिर भी, आपके भीतर जबर्दस्ती ठूँसी जा रही बातों और उसके प्रभाव से बचे रहना मुश्किल होता है।

इस तरह के बहुत से संदेश टीवी, सिनेमा, विज्ञापन, पत्र-पत्रिकाओं और किताबों में होते हैं, जिनमें यह कहा जाता है कि ‘इसे ऐसा होना चाहिए’। मित्रों की बात करें तो अधिकतर हीरोज़ के बहुत से मित्र होते हैं और वे दुनिया देखे हुए लोग होते हैं, वे, सिवा बुरे लोगों के लिए, जिनका काम ही उनसे नफरत करना होता है, लोकप्रिय होते हैं। अगर वे ऐसे नहीं होंगे तो उनके कुछ, चुने हुए बहुत करीबी मित्र होंगे, जिन पर उन्हें विश्वास होगा और जिनके साथ वे सारी बातें-उनके ऑफिस की बातों से लेकर अपनी यौन समस्याओं तक-साझा कर सकते होंगे। सब कुछ! औरतें हर रोज़ बाहर निकलती हैं, साथ में ख़रीदारी करती हैं, कॉफी पीती हैं, अक्सर डिनर या लंच साथ करती हैं, साथ स्पा लेती हैं, घूमती-फिरती हैं। तो आपकी मित्रता भी ऐसी ही लगनी चाहिए।

लेकिन बात इतनी ही नहीं है, अगर आप अपने आसपास देखें तो आपको यही देखने को मिलेगा। कई लोग मीडिया के संदेश देखने के और उस छवि के कि ‘कैसा होना चाहिए’, इतने आदी हो जाते हैं कि वे उसी तरह व्यवहार करने लगते हैं जैसे कि वे स्वयं वैसे ही हों और शायद यह भ्रम भी पाल लेते हैं कि उनका जीवन भी उन काल्पनिक कथा चरित्रों के जीवनों जैसा ही है। जब आप उनसे बात करते हैं तो आप लगभग उसी लहजे में वही बातें सुनते हैं, जो आप टीवी पर देखते हैं। मगर यह वास्तविकता नहीं होती।

इसका नतीजा यह होता है कि आप सोचते हैं कि आपकी दोस्ती वैसी नहीं है। आपकी मित्रता कुछ भिन्न दिखाई देती है। आप बार-बार मिलते नहीं हैं, आप फोन पर रोज़ बात नहीं करते। आपका कोई ऐसा मित्र नहीं है, जिससे आप अपने यौन संबंधों की चर्चा कर सकें-और शायद आप ऐसे मित्र चाहते भी नहीं क्योंकि आप ऐसे अंतरंग सम्बन्धों को, सिवा अपने साथी और भागीदार के, किसी और के साथ साझा नहीं कर सकते! वास्तव में शायद आप सोचते हैं कि कभी-कभी मुलाक़ात हो जाना काफी है! शायद आप संतुष्ट हैं कि आप लड़कियों या लड़कों की साप्ताहिक शामों में शरीक नहीं होते! शायद यह वह नहीं है जो आप चाहते हैं!

मैं एक बात आपसे कहना चाहता हूँ: आप आप हैं और अगर आप अपने मित्रों के साथ ठीक महसूस करते हैं तो यह ठीक ही है। जो आपके पास है उस पर अपना ध्यान केन्द्रित कीजिये और अपनी दिली इच्छा और आपके मस्तिष्क में बाहरी दबावों के चलते निर्मित कृत्रिम इच्छाओं के बीच अंतर को समझने की आदत डालिए। अगर आप एक या दो घनिष्ठ मित्रों के साथ अच्छा महसूस करते हैं तो आपको दरजन भर मित्रों की ज़रूरत नहीं है। अगर आप बचपन में ऐसा कोई मित्र नहीं बना पाए, जिसके साथ आपका मजबूत और स्थायी संपर्क नहीं बन पाया तो उसकी चिंता छोड़ दीजिए। आप उनके बारे में भी सोचना छोड़ दीजिए, जिनके साथ रहकर आपको अच्छा नहीं लगता।

जो आप हैं, वही बने रहिए। पता लगाएं कि आप वास्तव में क्या चाहते हैं और उसका भी, जिसे आप सिर्फ सोचते हैं कि चाहते हैं। और फिर, खुश रहिए।