जब महिलाएँ अपने पति के विवाहेतर संबंधों को स्वीकार कर लेती है – 7 दिसंबर 2015

जब मैं जर्मनी में था, कुछ मित्र अपने मित्रों की कहानियाँ सुना रहे थे। उनमें से एक कहानी ने मुझे वैसी ही स्थितियों का सामना करने को मजबूर बहुत सी भारतीय महिलाओं के विषय में सोचने को विवश कर दिया। मैंने सोचा, आखिर दोनों में कोई ज़्यादा अंतर नहीं है: वैवाहिक संबंधों में कुछ महिलाएँ अपने पतियों के विवाहेतर संबंधों को बड़ी सहजता के साथ स्वीकार कर लेती हैं-सुविधाजनक होने के कारण या फिर डर के मारे!

एक दोस्त ने मुझे बताया, एक महिला, जिसे वह बीस साल से भी ज़्यादा समय से जानता है, अपने पति के साथ काफी समय से अत्यंत असामान्य परिस्थितियों में रह रही है: उसका पति हफ्ते में लगभग एक बार उससे मिलने घर आता है। बाकी समय वह अपनी गर्लफ्रेंड के साथ रहता है। जब वह घर आता है तो सब कुछ ऐसा होता है जैसे वे दोनों सामान्य विवाहित पति-पत्नी हों: वह अपने गंदे कपड़े लेकर आता है और वह उन्हें धोती है, उस रोज़ वह एक अतिरिक्त व्यक्ति के लिए खाना बनाती है और इस तरह वह एक सामान्य काम पर से घर लौटा हुआ पति होता है!

लेकिन वे एक साथ नहीं सोते-और कहानी के इसी बिंदु पर मुझे पूछना ही पड़ा: क्या पहले शुरू हुआ, अलग-अलग बिस्तरों पर सोना या गर्लफ्रेंड के साथ रहना? अलग-अलग बिस्तरों सोना पहले शुरू हुआ था! एक बार महिला ने अपने पति से कहा था कि वह भविष्य में उसके साथ यौन संबंध नहीं रखना चाहती। वह उसके साथ सोना नहीं चाहती थी और उसने पति के सामने यह विकल्प भी रखा कि यदि वह चाहे तो कहीं और जाकर अपनी यौन ज़रूरतें पूरी कर सकता है।

बहुत से कारण थे कि वे अलग नहीं हुए और मुख्य रूप से सिर्फ इसलिए कि यह बहुत आसान और सुविधाजनक था: वे अपने टैक्स और बैंक खाते एक रखे हुए थे, जिस तरह वह हमेशा से रहती आई थी, अब भी रह सकती थी और पति को उसकी स्वतंत्रता भी उपलब्ध हो गई। उनके संबंध अच्छे हैं, यानी बाकी सब कुछ ठीक है।

मेरे मन में तुरंत उन परिवारों का खयाल आया, जिनसे मिलने रमोना अक्सर उनके घर जाती रहती है-हमारे स्कूली बच्चों के घर, जहाँ अक्सर महिलाएँ ढोंग करती हैं, जैसे वे एक सामान्य, सुखी दाम्पत्य संबंध में बंधी हुई हैं जबकि वास्तव में उनके पति ज़ोर-शोर से विवाहेतर संबधों में मुब्तिला होते हैं। एक नज़र में ही यह स्पष्ट हो जाता है कि पति और पत्नी के बीच बेगानापन व्याप्त है और उनके बीच आन्तरिक संबंधो का लोप हो चुका है-लेकिन वे विवाह का भ्रम बनाए रखती हैं। दंपति के रूप में साथ जीवन बिताने का ढोंग, क्योंकि संबंध विच्छेद की तुलना में यह आसान और सुविधाजनक है और एक ऐसे समाज में जहाँ एकाकी महिला पर लोगों का कहर टूट पड़ता हो, निश्चित ही तलाकशुदा कहलाने से बहुत बेहतर!

मुझे समानताएँ नज़र आती हैं। मुझे लगता है, कुल मिलाकर दोनों स्थानों पर स्थिति एक जैसी है। इसी तरह चलाना अधिक सुविधाजनक है। साथ ही मैं यह फैसला नहीं दे रहा हूँ कि यह ठीक है या गलत है या कि यह एक देश के संदर्भ में सही और दूसरे की परिस्थितियों में गलत है! मैं सिर्फ यह कह रहा हूँ कि मैंने दोनों में ये समानताएँ पाईं और उन्हें आपके सामने रख रहा हूँ।

क्या करें जब चीज़ें आपके आदर्शों के अनुरूप न हों – 24 नवंबर 2015

कुछ समय पहले मैंने लिखा था कि आप कभी-कभी आदर्शवाद को खींच-तानकर यथार्थ से बहुत दूर ले जाते हैं और फिर दैनिक जीवन में दुखी होते रहते हैं। मेरा मानना है कि जीवन में अपने लिए कुछ आदर्शों का होना अच्छी बात है और सामान्य रूप से क्या सही है और क्या गलत, इस बात की स्पष्ट समझ हर एक के लिए उपयोगी और लाभदायक ही है। लेकिन यह स्वीकार करना भी आवश्यक है कि दुनिया आदर्श नहीं है-और बदलाव लाने की दिशा में हम सिर्फ अपने स्तर पर ही कुछ अच्छा कर सकते हैं।

और ऐसा करने की बहुत सी संभावनाएँ मौजूद हैं! सिर्फ आप अपनी नौकरी का उदाहरण लें: हो सकता है, आप वहाँ का माहौल बदल न पा रहे हों लेकिन, उदाहरण के लिए, आप कोई दूसरी नौकरी पाने का प्रयास कर सकते हैं जो आपके आदर्शों के अनुरूप हो या कम से कम उसके विरुद्ध न हो! एक शाकाहारी के रूप में आप किसी कसाई के यहाँ काम नहीं करेंगे। कार्यालय में भी नहीं क्योंकि वह आपके आदर्शों के विपरीत है। लेकिन कोई ऐसा रोजगार खोजना, जो आपके हर आदर्श के अनुसार चलता हो, असंभव है!

मैं आपके सामने एक उदाहरण रखता हूँ। मान लीजिए आप किसी ऐसी कंपनी में काम करते हैं जो आपके आदर्शों की समर्थक है और वह जगह आपकी नौकरी के लिए सबसे उचित जगह है। मान लीजिए कि वह एक दुकान है जो जैविक खाद्यों और मेलों में बेचे जाने वाली सामग्रियों का व्यापार करती है। वह पूरी तरह आपके आदर्शों के अनुरूप है-सिर्फ दुकान के एक हिस्से को छोड़कर: दुकान के एक कोने में आध्यात्मिक या अतींद्रियवादी सामान भी बेचने के लिए रखा हुआ है-टेरो कार्ड्स, क्रिस्टल बॉल्स और आधुनिक डायनों, अतींद्रियवादियों और जादुई इलाज करने वालों के लिए तरह-तरह का सामान! आप इससे सहमत नहीं हैं, आपका विश्वास है कि यह लोगों में अंधविश्वास फैलाने वाली वस्तुएँ हैं-लेकिन आपको उस सामान को भी बेचना है!

यह आदर्श स्थिति नहीं है-मगर आप अकेले एक आदर्श दुनिया निर्मित नहीं कर सकते! इस दुनिया में हर तरह की चीजों का अस्तित्व है और अगर आप अति-आदर्शवादी हैं तो दुनिया में होने वाली बहुत सी बातों से आपको परेशानी होती रहेगी! इसलिए जो बातें आदर्श नहीं हैं, उनसे चिपके रहने से बेहतर है कि जितना संभव हो अपने आदर्शों के करीब पहुँचने की कोशिश करना-और शेष बातों को जैसी भी वे हैं, स्वीकार करना!

इस तरह जितना आप सोच रहे हैं, उससे आगे आप जा सकते हैं। कोशिश करके देखें। जैसे, मान लीजिए आपको पता चलता है कि जिस बैंक में आपका खाता है, वह आपके पैसे का उपयोग अस्त्र-शस्त्रों के व्यापार में लगा रही है, जिनका उपयोग युद्धों में किया जाता है और जिसके आप समर्थक नहीं हैं-या उन परियोजनाओं में जिसे आप उचित नहीं समझते और आपके आदर्शों के विरुद्ध हैं। अगर यह बात आपको परेशान करती है तो थोड़ी खोज करके कोई ऐसा बैंक ढूँढ़िए, जो पर्यावरण या दीर्घकालिक संवहनीय परियोजनाओं में आपका पैसा लगा रहे हैं- और निश्चित ही, ऐसी बैंकें भी अस्तित्व में हैं!

कुछ ऐसी चीज़ें भी हो सकती हैं, जो आपके लिए पूरी तरह वर्जित हैं और जिन्हें आप फिलहाल बदल नहीं सकते। ऐसे मामलों में उन्हें, जैसी हैं, उसी हालत में स्वीकार करना होगा-कि इस दुनिया में हर चीज़ आदर्श नहीं है, कि कुछ मामलों में बदलाव का काम हम भविष्य में कुछ समय बाद शुरू करेंगे, जैसे लोगों के पूर्वग्रह जाते-जाते ही जाते हैं। ऐसी बातों के लिए परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। उनके प्रति निस्पृह न हों-मैं यह सलाह नहीं दे रहा हूँ। आप पूरी शक्ति के साथ किसी गलत बात के विरुद्ध अपने विचार पर कायम रहें और इंतज़ार करें कि जब संभव होगा तब उन्हें बदलने की कोशिश की जाएगी। लेकिन उन बातों पर उद्विग्न होकर अपनी ऊर्जा और समय बरबाद न करें, जिन्हें आप इस समय कतई बदल नहीं सकते क्योंकि उन पर आपके प्रचंड क्रोध का कोई असर नहीं होने वाला है!

उन्हें बेहतर बनाने की संभावना सदा बनी रहती है, भले ही उसका अस्तित्व लंबे समय तक बना रहे-आप स्वयं एक बेहतर उदाहरण बनकर यह काम कर सकते हैं। आपके पास आपकी ईमानदारी है और आप उसे संभालकर रखें, उसकी हिफाजत करें। आपको बेईमान होने की ज़रूरत नहीं है। अगर स्थितियाँ आपको उस तरफ धकेल रही हैं तो उन्हें बदलने का प्रयास कीजिए। अन्यथा अच्छी, सुंदर बातों का नज़ारा कीजिए और खुश रहिए।

क्या करें जब असुरक्षा की भावना से पीड़ित लोग आपको नीचा दिखाने की कोशिश करें? 18 नवंबर 2015

आज मैं एक ऐसे रवैए के बारे में लिखना चाहता हूँ, जिसे एक प्रकार की नकारात्मकता कहा जा सकता है। कुछ लोग होते हैं जो दूसरों को नीचा दिखाकर बहुत खुश होते हैं। वैसे वे नकारात्मक नहीं होते-लेकिन वे आपको नकारात्मक स्थितियों में लाकर बहुत खुश होते हैं, ऐसी स्थिति जिसमें अपने आपको पाकर आप कतई खुश नहीं होते!

मुझे पक्का विश्वास है कि आप भी ऐसे लोगों से अवश्य मिले होंगे! आप कुछ भी कहेंगे या आप कुछ भी कर लें वे आपकी आलोचना करने का कोई न कोई बहाना ढूँढ़ ही लेंगे, आपका व्यवहार कैसा रहा या आपके सोचने का तरीका किस तरह गलत था। जानबूझकर वे आपको उत्तेजित और नाराज़ करने के लिए कोई न कोई ऐसी बात कहेंगे कि आपको लगेगा, आप उस चर्चा के लायक नहीं हैं या चल रहे वार्तालाप में आपका स्वागत नहीं किया जा रहा है या आप पूरी तरह गलत हैं।

मुझे लगता है, यह एक मनोवैज्ञानिक समस्या है और काफी हद तक अहंकार से जुड़ी है। ऐसे व्यक्ति पढ़े-लिखे हो सकते हैं और उनके पास बहुत सी डिग्रियाँ भी हो सकती हैं लेकिन वे खुद अपने बारे में अच्छे विचार नहीं रखते। वे भावनात्मक रूप से सुरक्षित महसूस नहीं करते और दूसरों से अपने आपको बेहतर दिखाकर अपने अहं को संतुष्ट करने की कोशिश करते हैं।

और इस तरह वे दूसरों को नीचा दिखाकर आनंद प्राप्त करते हैं। वे सोचते हैं कि जिस तरह वे किसी काम को अंजाम देते हैं, वही सबसे अच्छा तरीका है। और कोई भी, जो अलग तरह से व्यवहार करता है, वह वास्तव में मूर्ख है और इसलिए उनसे कमतर है-जिससे वे अपने बारे में बेहतर महसूस कर सकें। इसके लिए वे दूसरों को दुखी करने में भी संकोच नहीं करते। यह समझ या संज्ञान कि वे अपने आप से, आसपास की दुनिया और इस जीवन से ही बेहद नाखुश हैं, इन परिस्थितियों में ही उनके व्यवहार का मूल कारण होता है।

जैसे ही पता चले कि ये लोग ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं, आप उनके संबंध में अपनी सीमाएँ तय कर लीजिए। अगर उनके साथ आप भी परेशान नहीं होना चाहते और नहीं चाहते कि कोई आपको खराब मनःस्थिति में घसीट ले जाए-जिसे वास्तव में वे ही आपके लिए निर्मित करना चाहते हैं तो आपके लिए इस कोशिश को विफल करना आवश्यक है। सबसे अच्छी बात यह होगी कि जितनी जल्दी हो, आप उनसे पीछा छुड़ा लें। उनके साथ आपका सामान्य वार्तालाप संभव नहीं है। आप उन्हें नहीं सुधार सकते क्योंकि वैसे भी वे समझते हैं कि हर चीज़ वे सबसे बेहतर जानते हैं! जब तक आप परेशान और दुखी नहीं हो जाते, वे रुक नहीं सकते।

इसलिए याद रखिए कि वास्तव में वे खुद ही भावनात्मक रूप से असुरक्षित महसूस कर रहे हैं और अपने अहं और आत्मसम्मान को लेकर परेशान हैं। उन्हें आपकी भावनाओं को छूने न दें या अपनी भावनाओं को उनसे बचाकर रखें। उनकी बातों को गंभीरता से न लें और सबसे अच्छी बात, उनके साथ अपनी चर्चा को संक्षिप्त और हल्का-फुल्का बनाए रखें। इस तरह आप अपनी प्रसन्नचित्तता और भावनाओं को उन लोगों द्वारा क्षतिग्रस्त किए जाने से बचा सकेंगे जो सिर्फ दूसरों का मूड खराब करके ही खुश रह सकते हैं!

अहं के चलते आपसी संबंधों में आने वाली समस्याओं से कैसे निपटें – 29 अक्टूबर 2015

एक सप्ताह से मैं जीवन में आने वाली विभिन्न समस्याओं के बारे में लिखते हुए यह बताने की कोशिश कर रहा हूँ कि उनसे कैसे निपटा जाए। आर्थिक समस्याओं से शुरू करते हुए मैंने आपसी संबंधों में पैदा होने वाली समस्याओं पर चर्चा की थी और कल जानलेवा बीमारियों और जीवन में भूचाल पैदा करने वाले अपघातों या उनसे होने वाली अपंगताओं के बारे में लिखा था। जबकि ये समस्याएँ निश्चित ही बड़ी गंभीर समस्याएँ हैं, जिनमें दूसरों की मदद की ज़रूरत पड़ सकती है, एक और समस्या अक्सर मेरी नज़र से गुज़रती है और जिनसे निपटना ज़्यादातर लोगों के लिए ख़ासा मुश्किल होता है: संबंधों में अहं के चलते पैदा होने वाली परेशानियाँ।

ऐसा लगता है कि इस विषय का ज़िक्र आते ही लोग आहें भरने लगे हैं, जो मुझे लगभग सुनाई दे रही हैं। लगभग सभी वे लोग, जो किसी स्थाई संबंध में मुब्तिला हैं, समझ गए हैं कि मैं किस बात का ज़िक्र कर रहा हूँ। यह समस्या सबसे जटिल है और सबसे महत्वपूर्ण भी क्योंकि आपसी संबंध का अर्थ ही है साथ रहना, दोनों का मिलकर एक हो जाना! जबकि अहं बहुत निजी इयत्ता है, खुद को दूसरों के ऊपर रखना- साथ रहने वाले दो व्यक्तियों के बीच एक ऐसी मनःस्थिति, जो समस्याएँ पैदा कर सकती है!

बहुत से उदाहरणों में आप देख सकते हैं कि कहीं आपके साथ भी यह समस्या तो नहीं है। पहला उदाहरण है: आपके साथी ने कोई छोटी सी गलती की और आपने उसे ठीक करके उसे बता दिया कि उससे आपको तकलीफ पहुँची है लेकिन आपका साथी इस बात का बतंगड़ बना देता है या बना देती है। उसका अहं यह मानने के लिए तैयार ही नहीं है कि उसने कोई गलती की है और आपके बीच लंबा वाद-विवाद शुरू हो जाता है, जबकि बात ज़रा सी है, बल्कि विवाद की कोई बात ही नहीं है-सिर्फ अहं के चलते यह समस्या पैदा हुई है। या, आप स्वयं नोटिस करते हैं कि अपनी गलती मानना आपके लिए भी कितना मुश्किल है जबकि आप जानते हैं कि इस मामले में आप किसी न किसी तरह दोषी तो हैं ही। आपका अहं आपको अपनी गलती स्वीकार करने और पश्चाताप करने या माफ़ी मांगने से रोकता है।

लेकिन यह सिर्फ अफ़सोस ज़ाहिर करने की बात नहीं है! उदाहरण के लिए, अगर आपके मन में अपने कमरे को नए सिरे से सजाने का कोई विचार है या आप साथ मिलकर छुट्टियाँ मनाने का कोई कार्यक्रम बना रहे हैं और इस संबंध में आपका विचार आपके साथी से बिल्कुल मेल नहीं खा पा रहा है तो आप तभी कोई रास्ता निकाल सकते हैं जब आपमें से कोई एक अपने अहं को तिलांजलि देकर सामने वाले की बात मान ले! हालांकि अच्छा हो अगर कोई बीच का रास्ता निकल सके-कोई पर्यटन-स्थल, जो आप दोनों को पसंद हो या घर की कोई सजावट, जो दोनों के मन को भा सके!

आप समझ चुके होंगे कि बात किस ओर इशारा कर रही है: किसी साझेदारी में आपको कोई न कोई साझा पथ खोजना ही पड़ता है। मेरा विश्वास है कि प्यार में किसी न किसी एक को अपने अहं का परित्याग करना चाहिए! अपने आपको सही बताने का और अपनी बात पर अड़े रहने का कोई अर्थ नहीं है और सामने वाले अपने साथी की खुशी में खुश होने का भी अपना अलग आनंद है-भले ही इसके लिए अपने मन को कुछ अलग तरह से तैयार करना पड़े! सफल संबंधों में आप यही चीज़ पाएँगे: दो लोग, जो आपस में चर्चा करते हैं, एक दूसरे की वरीयताओं को जानते-समझते हैं और तदनुसार अपना रास्ता चुनते हैं, जिसमें स्वतंत्रता और आनंद दोनों प्राप्त होते हैं।

मैं एक बार और कहना चाहता हूँ कि यह आसान नहीं है-लेकिन अगर आप प्रेम में मुब्तिला हैं तो मुझे लगता है कि आप इसका उचित बंदोबस्त कर सकते हैं!

इस संज्ञान का मुकाबला कैसे करे कि आप ज़्यादा दिन ज़िंदा नहीं रहने वाले हैं? 28 अक्टूबर 2015

आर्थिक और आपसी संबंधों से जुड़ी समस्याओं पर लिखने के पश्चात् आज मैं एक ऐसी बिल्कुल अलग प्रकार की मुसीबत के विषय में लिखना चाहता हूँ जो आपकी दुनिया को झँझोड़कर रख देती है: जब आपको पता चलता है कि खुद आप या आपका कोई बहुत करीबी व्यक्ति किसी घातक बीमारी से या किसी स्वास्थ्य संबंधी समस्या से ग्रसित है। निश्चय ही मैं सर्दी-खाँसी जैसी सामान्य व्याधिओं की चर्चा नहीं कर रहा हूँ-जी नहीं, मेरा मतलब कैंसर जैसी बीमारियों या जानलेवा अपघातों से है, जहाँ घायल व्यक्ति अपनी हड्डियाँ तुड़वा बैठा है या पक्षाघात-ग्रस्त हो गया है। ऐसी स्थितियों का मुक़ाबला कैसे करें?

स्वाभाविक ही, मैं कोई चिकित्सकीय सलाह देने नहीं जा रहा हूँ। उसके लिए आपको बहुत सारे काबिल डॉक्टर मिल जाएँगे, जो आपकी या आपके प्रियकरों की हर संभव चिकित्सा कर सकेंगे। मैं सिर्फ समस्या के भावनात्मक और मानसिक पहलुओं पर दृष्टि डालूँगा।

बीमारी और मौत दो ऐसी परिस्थितियाँ हैं जहाँ आपके पास सिर्फ एक ही विकल्प होता है: उन्हें स्वीकार करना।

और यह बात कहने में जितनी आसान है उस पर अमल करना उतना ही कठिन है और मैं जानता हूँ कि जो भी इस परिस्थिति से गुज़र रहा होता है, जानता है कि वास्तव में यह कितना कठिन है। अगर आप जानते हैं कि एक या दो साल से अधिक आपका जीना संभव नहीं है। जब आपको पता चलता है कि अब आपको अपने पैरों का एहसास नहीं होगा क्योंकि आप लकवाग्रस्त हो चुके हैं। जब आपको पता चलता है कि आपकी पत्नी के हाथ कट जाने के बाद आपकी ज़िंदगी पूरी तरह बदल जाने वाली है।

मुद्दे की बात यह है कि ऐसे मामलों में आपके पास इसके सिवा कोई चारा नहीं होता कि आप परिस्थिति को स्वीकार कर लें। इस सच्चाई को स्वीकार करें और यह सुनिश्चित करें कि इस कठिन परिस्थिति में भी आप अच्छे से अच्छा क्या कर सकते हैं।

अगर आप या आपका कोई प्रियकर जानता है कि आपमें से किसी एक के पास बहुत कम जीवन बचा है तो पूरी कोशिश करें कि ये कुछ दिन, सप्ताह या महीने अधिक से अधिक सुखद हों। उनके लिए, जो अभी काफी समय तक करीब रहने वाले हैं, बहुत सारी उल्लासपूर्ण स्मृतियों को सँजोने की कोशिश करें। उन बातों को अंजाम दें, जिन्हें आप करना चाहते थे और हमेशा बाद में करने के लिए टाल देते रहे थे। संसार की खूबसूरती का उन लोगों के साथ आनंद लें, जिन्हें आप प्रेम करते हैं। यदि आपमें थोड़ी-बहुत लिखने की प्रतिभा है तो मैं सलाह दूँगा कि आपके मन में होने वाली हलचलों को लिखकर रख लें, जिससे इन्हीं परिस्थितियों से गुज़रने वाले दूसरे लोग आपके अनुभवों से शक्ति प्राप्त कर सकें!

यदि आप इन परिस्थितियों से बचकर निकल आते हैं तो उनके हर लमहे की कदर करें, उन्हें शिद्दत के साथ याद रखें, भले ही उन परिस्थितियों ने आपका नुकसान किया हो या आपके जीवन में उनके कारण स्पष्ट परिवर्तन आ गया हो! क्योंकि कितनी भी बुरी परिस्थिति से आप गुजरे हों, कोई न कोई होता है जो आपसे भी बुरी परिस्थिति से गुज़र चुका होता है। आपने उस प्रेरणादायक वक्ता का वीडियो देखा होगा, जिसकी बाहें और पैर नहीं हैं! जीने के आनंद के बारे में बात करते हुए उसे देखना अपने आपमें असाधारण और विस्मित करने वाला अनुभव है! न देखा हो तो उस वीडियो को अवश्य देखें।

जिन परिस्थितियों के साथ आपको आगे भी गुज़ारा करना है, उनको सहजता के साथ स्वीकार करते हुए, तदनुसार अपना भविष्य का संसार रचें। एक बार, जब आप उन्हें स्वीकार करने लगेंगे, आप नोटिस करेंगे कि आपकी परवाह करने वाले बहुत से करीबी लोग आपकी सहायता के लिए आगे आते जा रहे हैं और आपकी हर संभव मदद के लिए प्रस्तुत हैं। न सिर्फ अपनी विकट परिस्थितियों को स्वीकार करें बल्कि उस मदद को भी स्वीकार करें, जिनकी आपको सख्त ज़रूरत है।

निश्चित ही यह कठिन है लेकिन एक बार आप उन्हें स्वीकार करने लगें तो वे आसान होती जाएँगी और उनमें आपको जीवन की कई सकारात्मक बातें भी नज़र आने लगेंगी।

संबंधों में आने वाली कठिनाइयों के समय मानसिक संतुलन न खोना – 27 अक्टूबर 2015

हमारी सभी समस्याएँ पैसे से संबंधित नहीं होती। कल के ब्लॉग में मैंने मुख्य रूप से सिर्फ उन समस्याओं पर अपने विचार व्यक्त किए थे जो व्यापार और वित्त से जुड़ी होती हैं लेकिन निश्चित ही कुछ दूसरी समस्याएँ भी होती हैं जो कभी-कभी आर्थिक समस्याओं से भी अधिक मुश्किल नज़र आती हैं: दोस्तों, रिश्तेदारों और सबसे बढ़कर, अपने जीवन साथी जैसे दूसरे लोगों के साथ संबंधों में पैदा होने वाली समस्याएँ या खटास! इन समस्याओं से कैसे निजात पाएँ?

पहली बात तो यह कि वही पुराना सिद्धांत यहाँ भी लागू होता है: कोई कदम उठाने से पहले समस्या पर शांत-चित्त होकर विचार करें। स्वाभाविक ही, किसी प्रियकर के साथ कोई कलह, कोई असहमति वाली बात या कोई वाद-विवाद, मतभेद या झड़प आपको बुरी तरह विचलित कर सकते हैं। आप बुरी तरह क्रोधित हो सकते हैं या आपको ऐसा लग सकता है कि आपका संसार टूटकर बिखर गया है, आपकी आँखों से आँसू निकल सकते हैं और विषाद से आप थर-थर काँपने लग सकते हैं। आप सोच सकते हैं कि आपकी बात सही थी या आप खुद अपनी करनी पर पछता रहे हो सकते हैं लेकिन फिर भी इससे आगे विचार करने से पहले या अगली कार्यवाही करने से पहले आपको अपनी भावनाओं पर काबू करते हुए अपना मानसिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए।

इसका अर्थ यह नहीं है कि आप सामने वाले के प्रति कोई कोई सहानुभूति न रखें या यही भूल जाएँ कि उसने आपके साथ कोई बुरा व्यवहार किया है! बल्कि इसका अर्थ यह है कि आप अपनी भावनाओं को समझने की कोशिश कर रहे हैं और जानते हैं कि उसका उद्गम क्या है। इसका विश्लेषण करें: आपके मन में इस तरह की भावनाएँ पैदा होने का मूल कारण क्या है? क्या सामने वाले की कोई बात इसका कारण है? या आपके किसी व्यवहार के चलते ऐसा हुआ है? आपको ऐसा क्यों महसूस हो रहा है? क्या वाकई ऐसा व्यवहार आपकी ओर से या सामने वाले की ओर से हुआ है या यह महज आपकी कल्पना है, जो आपको परेशान कर रही है?

मैं खुद भी बहुत भावुक व्यति हूँ लेकिन जबकि कुछ लोगों के लिए यह दिमागी प्रक्रिया बहुत जटिल और कष्टदायी लग सकती है, मेरा मानना है कि समस्या की जड़ तक पहुँचने के लिए कभी-कभी ऐसी पहेलियों से जूझना ही पड़ता है। अगर मैं इतना भावुक हूँ कि मुझे यह भी पता नहीं चल पाता कि मेरी भावनाएँ ऐसी क्यों है तो यह मेरे व्यवहार में भी व्यक्त हो सकता है।

अपने गुस्से पर काबू में न रख पाने के कारण लोग बड़े भयानक और हास्यास्पद अपराध कर बैठते हैं। बाद में अक्सर ऐसा होता है कि उन्हें समझ में भी नहीं आता कि ऐसा उन्होंने क्यों किया! वे क्रोधित थे-लेकिन गुस्सा उतरने पर वे अच्छी तरह जान रहे होते हैं कि उनका व्यवहार कतई तर्कसंगत और न्यायोचित नहीं था। कि किसी दुख या पीड़ा के चलते उन्हें क्रोध आया था, यह सही है लेकिन सामने वाला बेचारा यह भी नहीं जानता होगा कि उनकी पीड़ा का जिम्मेदार वह है।

इसलिए, अगर आपको पता चल जाए कि आप वैसा क्यों महसूस कर रहे हैं तो आप उस समस्या का समाधान निकाल सकते हैं।

अगर आपसे कोई गलती हुई है और अब आपको पछतावा हो रहा है तो मेरे खयाल से तुरंत माफी मांग लेनी चाहिए। लेकिन सामने वाले से आप यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि हर हाल में वह आपकी माफी स्वीकार कर ही ले लेकिन आपके लिए यह कदम उठाना और खुद अपने आपको यह तसल्ली देना कि आपसे गलती हुई थी और आपने माफी मांगली, उचित ही होगा। क्योंकि भले ही सामने वाले ने माफ नहीं किया लेकिन आपने कोशिश तो की। और इतना करने के बाद आप अपने मन में शांति का अनुभव करेंगे और प्रकरण को वहीं विराम देकर आगे बढ़ सकेंगे।

यदि सामने वाले ने आपके साथ कोई दुर्व्यवहार किया है, तब आपके पास मौका होता है कि आपको इस विषय में क्या करना चाहते हैं। आप उसके सामने अपनी भावनाएँ रख सकते हैं या यह तय कर सकते हैं कि आप इस विषय में आगे क्या करेंगे। ऐसी स्थिति में आपके पास क्रोध के आवेश में व्यक्त क्षणिक व्यवहार के अलावा अपने मन की वास्तविक भावनाओं के अनुरूप व्यवहार करने का मौका होता है।

अंत में यही कि कुछ भी हो, संदेश एक ही है: कोई भी समस्या सामने हो, आपका संसार टूटकर बिखरने वाला नहीं है। शांत बने रहें और इस बारे में विचार करें कि आप इस विषय में क्या कर सकते हैं!

समस्याओं के प्रति आपका रवैया-आप उनसे घबराते हैं या उनका डटकर मुकाबला करते हैं? 26 अक्टूबर 2015

आपका देश, आपकी संस्कृति और आपके आसपास का का समाज आपको प्रभावित करते हैं। मुझे लगता है, हम सभी इस बात पर सहमत होंगे। पिछले हफ्ते मैंने बताया था कि कैसे हमारी परवरिश और परिवेश के अनुसार हम सभी का ग्रहणबोध अलग-अलग होता है। क्योंकि यहाँ, आश्रम में विभिन्न देशों के बहुत से लोग आते रहते हैं, हम चीजों और परिस्थितियों को ग्रहण करने के उनके विभिन्न नज़रियों को अक्सर नोटिस करते हैं। और समस्याओं का सामना होने पर उनके व्यवहार में दिखाई देने वाले मूलभूत अंतर को भी। विशेष रूप से यह पहलू मुझे बड़ा रोचक लगता है और मुझे इसका सबसे प्रमुख और निर्णयात्मक असर डालने वाला कारण यह नज़र आता है: आप किसी धनी मुल्क में, संपन्न परिवेश में रहकर बड़े हुए हैं या आर्थिक कठिनाइयों से जूझते हुए देश में!

जब आपके सामने कोई बड़ी समस्या पेश आती है तब आप क्या करते हैं? इसकी कई संभावनाएँ हो सकती हैं-आप घबराकर थर-थर काँपने लगें कि अब क्या होगा और हो सकता है, आप बुरी तरह अवसादग्रस्त हो जाएँ। यह भी हो सकता है कि आप हिम्मत बांधकर, शांत मन से समस्या के बीच से गुज़रते हुए कोई न कोई रास्ता निकाल लें और कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करें। कुछ लोग समस्याओं को छिपाने की और उनसे बचकर निकलने की कोशिश और उनकी उपेक्षा करते हैं, उनकी ओर से आँखें मूँद लेते हैं, जैसे समस्या मौजूद ही न हो- लेकिन इससे परिस्थितियाँ कतई ठीक नहीं होतीं।

तो आपकी प्रतिक्रिया के पीछे मुख्य रूप से दो ही भावनाएँ होती हैं: या तो आप डर जाते हैं या नहीं डरते।

और जबकि मैंने बहुत से विभिन्न लोगों में दोनो तरह की प्रवृत्तियाँ देखी हैं, मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि उन देशों में जहाँ आर्थिक सुरक्षा की स्थिति बेहतर है, जो अधिक विकसित हो चुके हैं और प्रथम विश्व का हिस्सा हैं, वहाँ के लोगों में भयभीत होने की प्रवृत्ति उतनी ही अधिक पाई जाती है।

इसका कारण, हालाँकि बड़ा विचित्र लगता है, परन्तु पर्याप्त समझ में आने वाला है! इन देशों में ज़्यादातर लोग सुख-संपन्नता में जीवन बिताते हैं। उनके लिए कभी भी, जब इच्छा हो या ज़रूरत हो, बाज़ार जाकर सामान खरीद लाना बहुत सहज होता है। संभव है, वे रोज़ माल जाकर नई-नई महंगी चीज़ें न खरीद पाते हों लेकिन सामान्य रूप से किसी के सामने यह परिस्थिति नहीं आती कि वाकई कोई सख्त जरूरत हो और न खरीद सकें और उनके आसपास भी ऐसे लोग बिल्कुल नज़र नहीं आते। यह एक वास्तविकता है कि वहाँ बहुत से लोगों ने कभी कोई नुकसान भी नहीं झेला होता।

और इसीलिए उन लोगों के मन में हर बात में यह प्रश्न उपस्थित हो जाता है कि ऐसा होने पर न जाने कौन सी मुसीबत आए या ऐसा करूँगा तो पता नहीं उसका क्या नतीजा हो! उनके दिमाग में एक के बाद एक डरावने दृश्य आते रहते हैं और हर वक़्त वे यही सोचते रहते हैं कि भविष्य में क्या होगा और इसलिए उन्हें हमेशा ज़रा सी हलचल पर भी भूचाल का अंदेशा होने लगता है।

उन मुल्कों में जहाँ गरीबी व्याप्त है, लोग हर पल अपने आसपास संघर्ष देखते हैं और इसलिए उन्हें सामान्य परेशानियों और कठिनाइयों का डर नहीं सताता। इसका अर्थ यह नहीं कि वे उन्हें पसंद करते हैं लेकिन वे उन्हें अधिक तर्कसंगत तरीके से देखते-समझते हैं और ज़्यादातर मामलों में उन्हें जीवन-मृत्यु का प्रश्न नहीं बना लेते- अर्थात वे सोचते हैं कि, ऐसा हो भी जाए तो भूखों मरने की नौबत तो नहीं आने वाली है! संघर्ष उन्हें सहज रूप से स्वीकार्य होता है और यह संघर्ष उन्हें समस्याओं से पार लगाता है। यह एक ऐसा वैचारिक (भावनात्मक) सुरक्षा-कवच है जो उन्हें सुकून प्रदान करता है।

वास्तविकता समझें: ज़्यादातर समस्याएँ ऐसी नहीं होतीं कि उनसे आपके जीवन में विराम की स्थिति पैदा हो या आपकी दुनिया टूटकर बिखर जाए या आप मौत के मुँह में पहुँच जाएँ। तो भले ही आपकी पृष्ठभूमि आपसे कहती रहे कि इन समस्याओं के सामने आप लाचार हैं, आप इस प्रवृत्ति पर काबू पाएँ और तब आप देखेंगे कि समस्या थी ही नहीं या तब आपको पता चलेगा कि आप उनके बीच से गुजरकर सुरक्षित निकल आए हैं!

आपका प्रत्यक्ष ज्ञान (ग्रहण-बोध) आपकी दुनिया को बदल देता है – 21 अक्टूबर 2015

मैंने हाल ही में लिखा था कि अपने आसपास की दुनिया को सकारात्मक रूप से देखना चाहिए लेकिन क्योंकि यह एक बहुत महत्वपूर्ण विषय है-विशेष रूप से, जब आप इस बात का विचार करते हैं कि बड़ी संख्या में लोग अवसाद और मानसिक तथा शारीरिक थकान से ग्रसित दिखाई देते हैं-मैं आज इसी विषय पर एक बार फिर कुछ विस्तार से लिखना चाहता हूँ। अपने आसपास की विसंगतियों के बीच अच्छाइयाँ तलाश करने के हुनर के बारे में!

यथार्थ को हम सब अलग-अलग नज़रिए से देखते हैं। किसी भी मनोवैज्ञानिक अध्ययन का यह मूल तत्व है: आपका कोई भी अनुभव दूसरे को भी वैसा ही अनुभव के बावजूद ठीक वैसा ही नहीं होता क्योंकि आपकी और उसकी पृष्ठभूमि अलग-अलग होती है। यहाँ तक कि जुड़वाँ बच्चों का ग्रहण-बोध भी भिन्न होता है क्योंकि वे अलग-अलग अनुभवों से गुज़रे होते हैं।

इस मामले में आपके लालन-पालन का तरीका एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। आपके अभिभावकों ने आपको किस तरह बड़ा किया, किन मूल्यों को वे ज़्यादा महत्व देते हैं और उन्होंने दुनिया को देखने का कौन सा नजरिया आपको दिया, इत्यादि? इन प्रश्नों के उत्तर, मुख्य रूप से, आपको यह बता देते हैं कि आप किस तरह दुनिया को देखते हैं।

आप पर दूसरा बड़ा प्रभाव होता है, आपकी संस्कृति का। जिस देश में आप रहते हैं, आपके आसपास के लोग जिन मूल्यों और जिन आदर्शों को साधारणतया मानते हैं। ये बातें आपके अभिभावकों द्वारा सिखाई गई बातों से अधिक व्यापक होती हैं और ये बातें आपके नज़रिए को एक ख़ास दिशा में मोड़ देती हैं और आपके यथार्थ को परिवर्तित करती हैं। रमोना और मैं इसे अक्सर देखते हैं और और कई मामलों में इसे घटित होता हुआ पाते हैं! ज़्यादा विस्तार में न जाते हुए अब खबरों को हम अपने-अपने भिन्न नज़रियों के अनुसार ग्रहण करते हैं क्योंकि हम लोग मूलतः इस धरती के भिन्न और सुदूर इलाकों के रहने वाले अलग अलग व्यक्ति हैं! निश्चय ही हर व्यक्ति अपने आप में अलग और विशिष्ट होता है लेकिन संस्कृति आप पर ऐसा गहरा प्रभाव डालती है, जिससे आप आसानी के साथ मुक्त नहीं हो सकते!

अंत में, एक क्षणिक स्थिति में, उस वक़्त जिस खास पल में आप व्यवहार कर रहे हैं, वह भी आपके आसपास होने वाली घटनाओं के बारे में आपके ग्रहण-बोध को प्रभावित करता है। मैं कुछ उदाहरण आपके सामने रखता हूँ: गर्भवती होने की इच्छा रखने वाली या स्वयं कोई गर्भवती महिला अचानक अपने आसपास मौजूद गर्भवती महिलाओं को दूसरों से ज़्यादा नोटिस करने लगती है। वे पहले भी उसके आसपास मौजूद थीं-लेकिन अब वह उन्हें नोटिस करती है क्योंकि वह स्वयं उसी स्थिति से गुज़र रही है और उसका मन उसी बात पर लगा हुआ है!

मान लीजिए अगर आप अपने काम में व्यस्त हैं और अधिकतर काम के बारे में ही सोचते रहते हैं और आपके पास इस बात की फुर्सत नहीं है कि अपने शहर की सुंदरता को देख सकें, उसका आनंद ले सकें या इस बात का आपको पता नही हो पाता कि आपके आसपास के लोग क्या कर रहे हैं। यह सब पहले भी मौजूद था लेकिन जब आपका काम पूरा हो जाता है और आपको उन्हें देखने का अवसर मिलता है तो आपको लगता है, जैसे आप उन्हें पहली बार देख रहे हैं!

जब आप पहले-पहल प्रेम में पड़ते हैं तो सारी दुनिया आपको खूबसूरत, शानदार, आश्चर्यजनक और अत्यंत सुखद नज़र आती है! आपको लगता है, आपके आसपास का हर शख्स सुंदर और भला है और दुनिया में प्रेम के सिवा कुछ भी नहीं है।

लेकिन जब आप मुश्किल में होते हैं तो आपको अपने चारों ओर बुरी चीजें ही दिखाई देती हैं। क्योंकि आप बुरे विचारों से घिरे हुए हैं, आपको कोई चीज़ सुंदर नज़र ही नहीं आती!

मैं इनकी ओर इशारा क्यों कर रहा हूँ? मेरे ख़याल से यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि आपके पास एक और संभावना भी मौजूद है! कि आप दूसरे नज़रिए से भी चीजों को देख सकते हैं! आपको अपने सोचने की दिशा में परिवर्तन करना होगा और आप देखेंगे कि चीज़े तुरंत, उसी समय से ठीक होना शुरू हो गई हैं!

अपने अंदर गहरे जड़ जमाए बैठे मूल-तत्वों को और उन अनुभूतियों को दरकिनार करना वास्तव में बहुत मुश्किल होता है। हालाँकि यह संभव है! लेकिन आपको इसी से शुरुआत करने की ज़रूरत नहीं है-निश्चित ही चीजों को देखने के तरीके को बदलने के काम को आप अपनी वर्तमान परिस्थितियों के मुताबिक़ क्रमशः, धीरे-धीरे शुरू कर सकते हैं! जब आपके विचार नकारात्मक दिशा में गमन करने लगें तो उन पर लगाम लगाने का प्रयास कीजिए और अपने आपको बताइए कि यह सिर्फ इसलिए है कि इस समय आपका ग्रहण-बोध नकारात्मक है! आप भी अलग तरह से सोच सकते हैं! सोचने का एक अलग तरीका निर्मित करने भर की ज़रूरत है!

मुझे लगता है कि यह महत्वपूर्ण है-क्योंकि यह आपको एक पूर्णतया नई सकारात्मकता से भर देगा, आपको शान्ति और सुकून का अनुभव होगा। दरअसल वह आपको अधिक खुशनुमा जीवन की ओर अग्रसर होने में मदद करेगा!

अपने अत्यल्प साधनों से भी योगदान करें क्योंकि छोटी चीज़ का भी असर होता है – 6 अक्टूबर 2015

कल मैंने आपको हमारी एक मेहमान के बारे में बताया था जो इस कारण खुद को अपराधी महसूस कर रही थी कि अपने खाली समय में वह स्वैच्छिक रूप से सेवा करने की जगह समुद्री बीच पर जाकर विश्रांति प्राप्त करना चाहती थी। ऐसे नरमदिल, संवेदनशील लोगों की, जो वास्तव में दूसरों की मदद करना चाहते हैं, अक्सर एक दूसरी समस्या होती है: उन्हें इस संसार की बुरी हालत देखकर बड़ा दुःख होता है।

जो थोड़ा भी संवेदनशील होगा वह इस एहसास को एक हद तक समझ सकता है: कोई भी अखबार उठाकर देखें, हर तरफ मारा-मारी की खबरें-दुनिया भर में मानव जाति एक-दूसरे का गला काटने पर आमादा, इस धरती को नष्ट करने को आतुर, दूसरे सभी प्राणियों के कष्टों का अंत नहीं! टीवी और रेडियो की खबरें देखकर ऐसा लगता है, जैसे प्रलय बस आने ही वाला है!

सीरिया और मध्य-पूर्व के युद्धों ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि लोग भूखों मर रहे हैं, उनके साथ हर तरह की ज्यादती हो रही है, उनकी सरे आम हत्याएँ की जा रही हैं, लोग अपने देशों से भागने को मजबूर हैं, शरणार्थियों की समस्या भीषण रूप ले चुकी है और उसके कारण दक्षिणपंथी ताक़तें मजबूत हो रही हैं। दुनिया भर में सभी धर्म एक-दूसरे के खिलाफ युद्धरत हैं, मंदिरों-मस्जिदों में या आतंकवादियों के बमों से रोजाना निरपराध लोग मारे जा रहे हैं। आतंकवादी समूह शक्तिशाली हो रहे हैं, कहीं से भी लड़कियों का अपहरण कर लेना या नवयुवकों को बहला-फुसलाकर उनके दिमाग में फितूर पैदा करना आम बात हो गई है। निरपराध लोगों को, जिनमें डॉक्टर, नर्सें और सेवा करने वाले कर्मचारी शामिल हैं, मौत के घाट उतारा जा रहा है। हजारों एकड़ जंगलों को आग के हवाले कर दिया जाता है, किशोर बंदूकें लेकर स्कूल जाते हैं और अंधाधुंध गोलियां चलाना शुरू कर देते हैं, नशीले पदार्थों का व्यवसाय करने वाले गुंडों ने शहरों को खतरनाक बना दिया है। और उस पर बड़े-बड़े व्यावसायिक कार्पोरेशन्स और निश्चित ही सरकारें हैं जो सिर्फ अपने स्वार्थ और आर्थिक लाभ को ध्यान में रखती हैं।

रोज़ सबेरे उठते ही आपको यह सब देखना-सुनना पड़ता है-इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि कुछ लोग जब दुनिया की इस हालत पर विचार करते हैं तो अवसादग्रस्त हो जाते हैं! इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं कि आप सोचते हैं कि दुनिया में क्लेश बढ़ता ही जा रहा है और आपके प्रयास उसके सामने कुछ भी नहीं हैं, उनका कोई असर नहीं होने वाला है।

लेकिन आपका अवसादग्रस्त हो जाना किस तरह इस मामले में सहायक होगा? यदि आप बिस्तर पर लेटकर आँसू बहाएँ तो क्या किसी को कोई लाभ हो सकता है? अगर आप बाहर निकलना बंद कर दें कि दुनिया बहुत बुरी है, तब कुछ होगा? उत्तर है, नहीं होगा! बल्कि अपने मित्रों और रिश्तेदारों को अपने लिए चिंतित करके आप दुनिया का दुःख और बढ़ा देंगे!

उठिए, उन भावनाओं को निकाल बाहर कीजिए और अपनी छोटी सी दुनिया को खुशनुमा बनाइए। अपने से शुरू कीजिए और सबसे पहले सुनिश्चित कीजिए कि आप खुश रहेंगे। फिर दूसरों की मदद कीजिए। जो समस्याएँ आपको सबसे ज़्यादा मथती हैं, उन्हें दूर करने में लोगों की मदद कीजिए। अगर आपको लगता है कि आप बेघर लोगों की या शरणार्थियों की मदद करना चाहते हैं तो आपके शहर में ही कोई न कोई रैनबसेरा या कोई स्वयंसेवी संगठन होगा, जहाँ जाकर आप स्वैच्छिक रूप से उनका हाथ बँटा सकते हैं। अगर आपका मन चीनी फैक्ट्रियों में जारी अमानवीय कार्य-प्रणालियों का विरोध करना चाहता है तो सुनिश्चित करें कि आप उनका सामान न खरीदकर किसी ज़िम्मेदार कंपनी का सामान ही खरीद रहे हैं, जो ऐसी अनुचित और गैरकानूनी गतिविधियों में लिप्त नहीं हैं! जब भी आपको लगे कि आप अपना समय और पैसा इन सत्कार्यों में लगा सकते हैं तो जहाँ ज़रूरत हो, ऐसा अवश्य करें। सोशल मीडिया के ज़रिए, पिटीशन भेजकर और आसपास के लोगों को उसकी जानकारी देकर ऐसे कार्यों के प्रति अपना समर्थन अवश्य व्यक्त करें।

आप सारे युद्धों को रोक नहीं सकते। इस ग्रह की सारी समस्याओं का निपटारा आप अकेले नहीं कर सकते! हाँ, आप अपनी दुनिया में परिवर्तन ला सकते हैं। दुनिया के विशाल परिदृश्य में वह बहुत छोटा सा प्रयास होगा, गहरे अँधेरे में प्रकाश की हल्की सी किरण जैसा! लेकिन आप ऐसी इकलौती किरण नहीं हैं और इसलिए हम सब साथ मिलकर एक विशाल प्रकाश-पुंज बन सकते हैं, सब मिलकर दुनिया के बेहतर भविष्य के लिए काम कर सकते हैं।

अपनी सतह पर कुछ न कुछ अवश्य कीजिए- फर्क अवश्य पड़ेगा!

जीवन का आनंद लेते हुए खुद को अपराधी महसूस न करें! 5 अक्टूबर 2015

कई बार मुझे अपने ब्लॉग के विषय उन लोगों से बातचीत के दौरान प्राप्त होते हैं जो किसी न किसी ऐसी समस्या से दो-चार हो रहे होते हैं जो बहुत से दूसरे लोगों की समस्या भी हो सकती है। ऐसी ही एक समस्या के विषय में आज मैं लिखना चाहता हूँ: एक मेहमान आश्रम आई थी जो यह निर्णय नहीं ले पा रही थी कि आगे कहाँ जाए। उसका कार्यक्रम पहले से तय था, उसके पास और भी विकल्प थे और वह अपने पसंदीदा स्थानों की यात्रा भी करना चाहती थी-लेकिन क्या वह इतना स्वार्थी हो सकती थी कि अपनी मनचाही जगह चली जाए?

इस महिला ने बड़ा मददगार स्वभाव पाया था और वह कुछ संगठनों के साथ सक्रिय रूप से जुड़ी हुई थी। अपने खाली समय में वह स्वैच्छिक रूप से चैरिटी का काम किया करती थी, अपने देश में भी और तीसरी दुनिया, अफ्रीका और भारत में। पैसे कमाने के लिए वह एक बड़ी कंपनी में काम करती थी और बड़ी खुश थी कि इस बार उसे पूरे छह हफ्ते का अवकाश मिला है। इतना लंबा अवकाश उसे पहले कभी नहीं मिला था। वह घूम-फिरकर उन जगहों को देखना चाहती थी जहाँ वह पहले खुद सेवा-कार्य कर चुकी थी।

क्योंकि वह एक सुरक्षित वातावरण में रहकर भारत को जानना-समझना चाहती थी इसलिए सबसे पहले एक सप्ताह उसने हमारे साथ बिताया। अपने अंतिम दो सप्ताहों को छोड़कर बाकी समय का उसने कोई पक्का कार्यक्रम नहीं बनाया था। इन दो सप्ताहों में वह पश्चिम बंगाल के एक चैरिटी संगठन के लिए, जिसकी मदद वह पिछले कई साल से कर रही थी, कुछ स्वैच्छिक सेवा-कार्य करना चाहती थी। वह एक अनाथाश्रम में बच्चों को पढ़ाना चाहती थी। इस बीच वह खाली थी लेकिन जब वह हमारे यहाँ रह रही थी, यह निर्णय करने में कि कहाँ जाए, उसे बड़ी परेशानी हो रही थी।

उसे समुद्र से बड़ा प्रेम था और केरल, गोवा में भारत के बहुत से सुहाने समुद्र किनारों को उसने देख रखा था-वास्तव में उसकी इच्छा वहीं, किसी बीच में जाकर पाम वृक्षों की छाया में लेटकर विश्राम करने की थी। लेकिन उसके सामने पहले अनाथाश्रम जाकर बच्चों को पढ़ाने का विकल्प भी था या किसी दूसरे चैरिटी में शामिल होकर विकलांग बच्चों के किसी स्कूल में पढ़ाने का।

वह इन विकल्पों के बीच पिस रही थी: वास्तव में वह कामों से कुछ दिनों का विराम लेकर समुद्री बीच के खुशनुमा एहसास का आनंद लेना चाहती थी लेकिन इससे उसे अपने स्वार्थी होने का एहसास होता था, बल्कि लगता था, जैसे वह बहुत आत्मकेंद्रित व्यक्ति है जो चैरिटी कार्यों के अपने दोनों विकल्पों को छोड़कर अपना समय और पैसा अपने सुख और आनंद पर खर्च कर रही है!

मैंने उससे कहा कि वही करो, जो तुम्हारा दिल चाहता है। अगर तुम्हारी इच्छा है कि बीच पर जाकर विश्राम किया जाए, तो वही करो। अपराधबोध के इस हास्यास्पद एहसास को खुद पर हावी न होने दो, उसे इस बात की इजाज़त मत दो कि तुम्हें ही निर्देश देने लगे। मुझे गलत मत समझो, मैं खुद चैरिटी का काम करता हूँ और उसमें सबकी मदद का स्वागत है-मगर तुम खुद भी महत्वपूर्ण हो! यह पैसा कमाने के लिए तुमने बहुत श्रम किया है। कंपनी की व्यस्त नौकरी में तुमने बहुत तनाव झेला होगा और इस प्रवास के बाद वापस जाकर फिर तुम्हें अपने आपको उसी में झोंक देना है। इतना करने के बाद तुम्हारा विश्राम करने का पूरा हक़ है।

वैसे भी तुम कुछ समय बाद दो हफ्तों तक बच्चों को पढ़ाने वाली ही हो! इस काम में भी बहुत ऊर्जा खर्च होती है और जब तुम पर्याप्त विश्राम कर लोगी तभी तुम्हें वह ऊर्जा प्राप्त होगी! अगर तुममें ऊर्जा बचेगी ही नहीं तो तुम क्या पढ़ा पाओगी!

इस बात के लिए कभी खुद को अपराधी मत समझो कि आपके पास दूसरों से अधिक है। क्योंकि अधिक है, इसीलिए आप दूसरों को दे पा रहे हो-लेकिन आपको अपनी चिंता भी करनी चाहिए, अपना खयाल रखना चाहिए। दूसरों को खुश करने के लिए खुद को दुखी मत करो! इस तरह काम नहीं चलता!