2016 में रंगों के त्यौहार, होली की मस्ती में हमारे साथ शामिल हों – 22 अक्टूबर 2015

अगर आपको हमारा न्यूज़-लेटर लगातार मिल रहा है तो आपको उसके साथ हमारा एक निमंत्रण-पत्र भी प्राप्त हुआ होगा: 2016 की होली पर हमारे द्वारा आयोजित ‘होली रिट्रीट 2016’ का निमंत्रण! जबकि पिछले वर्षों में उत्सव की विशेष छूट के साथ हम सभी लोगों को सामान्य रूप से आमंत्रित करते थे, इस बार हमने संपूर्ण ब्यौरेवार कार्यक्रम तैयार करके लोगों को भारत के, हमारे आश्रम के और निश्चय ही, होलिकोत्सव की मौज-मस्ती और उससे जुड़े समारोहों के प्रत्यक्ष अनुभव का अवसर प्रदान करने की योजना बनाई है!

जो लोग नहीं जानते, उन्हें बता दूँ कि होली भारत के दो सबसे बड़े वार्षिक त्योहारों में से एक है! वास्तव में यह रंगों का विशाल समारोह है और जबकि, सारा भारत इसे वसंत ऋतु में सिर्फ एक दिन मनाता है, यहाँ, वृंदावन में सारा शहर पूरे एक सप्ताह तक रंगों में सराबोर रहता है!

साल का यह सबसे अनोखा समय होता है जब आप ऐसा अनुभव करते हैं जैसे आपका बचपन पुनः लौट आया हो! आप एक-दूसरे को छका सकते हैं, मूर्ख बना सकते हैं, अपने कपड़ों की चिंता किए बगैर एक-दूसरे पर रंग डाल सकते हैं, उनके चेहरों पर रंग मल सकते हैं!

हमारे होली रिट्रीट कार्यक्रम के ज़रिए आप भारतीय संस्कृति का आंतरिक आनंद प्राप्त कर सकेंगे-जिसकी शुरुआत होगी आश्रम में आयोजित स्वागत समारोह से और उसके पश्चात एक गाइड के साथ वृंदावन शहर के विस्तृत भ्रमण का इंतज़ाम भी होगा, जिससे आप उस धार्मिक और ऐतिहासिक शहर को आतंरिक रूप से जान-पहचान सकें, जहाँ आप अगले एक या दो सप्ताह रहने वाले हैं। उसके बाद आप देखेंगे कि वृंदावन के मुख्य मंदिर में होली का त्यौहार कैसे मनाया जाता है, कैसे हम खुद प्राकृतिक ताज़े रंग तैयार करते हैं और उसके बाद होली के अंतिम दिन, आश्रम में आप स्वयं होली समारोह में हिस्सा ले सकेंगे। हमारे आश्रम के निजी समारोह में आप पूर्णतः सुरक्षित वातावरण में होली की मौज-मस्ती, हुड़दंग और उसकी दीवानगी में सराबोर हो सकेंगे!

होली का त्यौहार संपन्न हो जाने के बाद आपकी छुट्टियाँ कुछ शांतिपूर्वक बीतेंगी किंतु खातिर जमा रखें, ज़रा भी कम रोमांचक नहीं होंगी! अब आप हमारे स्कूल का दौरा करेंगे और स्कूल के बच्चों से मिलेंगे, यशेंदु के साथ प्रश्नोत्तर चर्चा में भाग लेंगे, जहाँ आप अपने मनचाहे सवाल पूछ पाएँगे और निश्चय ही, ताजमहल देखने हेतु आगरा भी जाएँगे! भारतीय मसालों के प्रदर्शन होंगे, जिसमें आप जान सकेंगे कि कौन से मसाले आश्रम के भोजन में ऐसा लाजवाब स्वाद भर देते हैं और आयुर्वेदिक पाक-कार्यशाला में आप इन व्यंजनों को खुद अपने घर में बनाना सीख सकेंगे। समारोह-कार्यक्रम का अंतिम पड़ाव, होगा शाम को यमुना नदी के किनारे आयोजित होने वाले अग्नि अनुष्ठान के साथ और उसके पहले थोड़ी-बहुत खरीदारी होगी और शहर का एक और चक्कर लगाया जाएगा। उसके बाद एक बिदाई पार्टी होगी और फिर आप अपने दिल में यहाँ की सुखद यादों को लेकर अपने-अपने गंतव्य-स्थानों की ओर प्रस्थान करेंगे।

इस बीच हर दिन योग-सत्र आयोजित किए जाएँगे और आपको आश्रम में आराम करने का, आयुर्वेदिक मालिश और इलाज करवाने का, बच्चों के साथ मिलने-जुलने और खेलने का, वृंदावन के बाज़ारों की रंगीनियों में खरीदारी करने का और आसपास के वातावरण का जायज़ा लेने का भरपूर वक़्त भी मिलेगा!

इस होली रिट्रीट में हम चाहते हैं कि होली समारोह की मौज मस्ती के साथ आपको भारत की आश्चर्यजनक संस्कृति में यह एहसास भी हो कि आपका ध्यान रखा जा रहा है-और हम अभी से आपके साथ रंगों में तरबतर होने का इंतज़ार कर रहे हैं!

यहाँ आप होली रिट्रीट-2016 के सभी विवरण प्राप्त कर सकते हैं!

और यहाँ आप पिछले होली समारोह के चित्र देख सकते हैं।

आश्रम में होली – उन्मादी मगर हर तरह से सुरक्षित मौज-मस्ती – 8 मार्च 2015

होली-समारोह का समापन हो गया है! हमने रंगों के इस त्योहार पर एक बार फिर एक खास, शानदार और अविश्वासनीय रूप से बेहद रंगीन समारोह का आयोजन किया था!

मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ कि इस पूरे समय अपरा पर होली का बुखार चढ़ा हुआ था। वह रोज़ होली खेलती और सबसे कहती कि मुझे रंग चाहिए और हमारे कर्मचारियों को भी अपने साथ मिला लेती और उनके साथ बाज़ार जाकर खुद रंग खरीद लाती! उस पर जैसे होली के उन्माद का विस्फोट हुआ था!

होली के अंतिम दिन यानी 6 मार्च को हमारे यहाँ सबसे बड़ा समारोह आयोजित किया गया था, जिसमें न सिर्फ गुलाल से बल्कि रंगीन पानी से होली खेली गई और कई रंगों के रंगीन पानी की पिचकारियों से आपस में रंगों की बौछार की गई! यशेंदु और आश्रम के कर्मचारियों ने पिछली रात फूलों को उबालकर रंगीन पानी तैयार किया था और इसलिए पानी भी पर्याप्त गरम था। लेकिन अपरा का निर्णय था कि वह सूखे रंगों से ही होली खेलेगी और वह ज़रा अलग हटकर, गीला होने से बचते हुए होली खेलती रही!

लेकिन हमारे मेहमान बेहिचक हमारे साथ रंग खेलने बाहर निकल आए! हमारी तरह उन्होंने भी होली खेलने का भरपूर मज़ा लिया और पिछले साल की तरह उनके शरीर, सारे अंग-प्रत्यंगों सहित, रंगों में पूरी तरह सराबोर होते रहे। मुख्य समारोह के समापन तक हम सब थककर चूर हो चुके थे-फिर भी कल हर व्यक्ति बाहर निकल आया था और अलसाया सा त्यौहार के माहौल का और स्वाभाविक ही, स्वादिष्ट मिठाइयों और नमकीन नाश्तों का लुत्फ़ उठा रहा था!

कल एक जर्मन महिला आश्रम आई थी और अगले महीनों के विश्रांति सत्रों के बारे में पूछ रही थी। होली के दर्मियान वह वृन्दावन में ही थी-लेकिन होली का सबसे मुख्य दिन यानी छह मार्च उसने होटल के कमरे में बंद रहकर गुज़ारा क्योंकि उसके एक दिन पहले यानी पाँच मार्च को उसके साथ एक अप्रिय घटना हो गई। दरअसल, उस दिन वह होटल से बाहर निकली थी और बाहर भीड़ ने न सिर्फ उसे अच्छी तरह रंग दिया बल्कि मौके का फायदा उठाकर उसके शरीर के साथ छेड़खानी की और उसके साथ कई तरह से अभद्र व्यवहार भी किया। ऐसी भीड़भाड़ में, जब लोग होली के हुड़दंग में उन्मत्त हो चुके हों, ऐसी बातें होती ही रहती हैं-और महिलाएँ, कमरे में बंद रहने के अतिरिक्त, इस मामले में विशेष कुछ नहीं कर सकती। यह बड़े दुर्भाग्य और शर्म की बात है!

इसी कारण ट्रेवल एजेंसियों और ऑनलाइन ट्रेवल फोरम्स ने महिलाओं को आगाह करना शुरू कर दिया है कि मुख्य होली के दिन वे बाहर न निकलें अंदर ही रहें या फिर अपने जान-पहचान वाले समूह के साथ, गेस्ट हॉउस में ठहरे परिवारों के साथ या अन्य आपसी लोगों के साथ ही होली खेलें, सड़क पर निकलकर बाहर नहीं।

हमें ख़ुशी और सन्तोष है कि हमारे आश्रम में हम विदेश से आने वाले मेहमानों को सुरक्षित वातावरण में होली के संपूर्ण हुड़दंग का मज़ा लेने का मौका प्रदान करते हैं और वह भी यहाँ, वृन्दावन जैसी होली के लिए मशहूर जगह में। जी हाँ, हम सब पागलों की तरह होली खेलते हैं, सब एक-दूसरे की ओर दौड़ते-भागते फिरते हैं, बच्चे बनकर एक-दूसरे को रंग-गुलाल लगाने की जुगत भिड़ाते रहते हैं-मगर हम कितना भी बहक जाएँ, हम जानते हैं कि किस तरह हर हाल में सामने वाले का सम्मान अक्षुण रखा जाना चाहिए। हमारे साथ हमारे कर्मचारी, हमारे मित्र गण, हमारे मेहमान, हमारे बच्चे और हमारे परिवार होते हैं। यह काफी बड़ी भीड़ होती है लेकिन किसी की गरदन पर भी रंग मलना है तो हम सब इतना भर जानते हैं कि हर हाल में सिर्फ और सिर्फ होली का आनंद लेना है, इसके इतर कुछ भी नहीं!

और इस समारोह में हिस्सा लेने वाले सभी लोगों के लिए वह सिर्फ मौज-मस्ती और आमोद-प्रमोद ही बना रहता है! और अब, होली-समारोह की समाप्ति के बाद हमारे मन में उस सुखद समय की यादें हैं कि कैसे हम एक बार फिर बच्चे बन गए थे और रंगों की परवाह किए बगैर होली खेलते रहे! साल का यह सबसे बढ़िया समय होता है-और हम इस समय को दुनिया भर के अपने मित्रों के साथ गुज़ारकर और इस अनुभव में सबको सहभागी बनाते हुए, उसे सबके साथ साझा करते हुए बहुत खुश होते हैं!

अगले साल भी इसी तरह की शानदार होली खेलने का इंतज़ार हम अभी से करने लगे हैं!

इस वर्ष के होली समारोह के चित्र यहाँ देख सकते हैं

हर साल उत्तरोत्तर अधिक मौज-मस्ती – अपरा का होली समारोह – 5 मार्च 2015

मैं पहले ही आपको बता चुका हूँ कि वृन्दावन में होली की शुरुआत हो चुकी है। और अपरा इस समारोह के केंद्र में है! उसे बड़ा मज़ा आ रहा है-और हमें उससे भी ज़्यादा!

महीनों से नहीं तो भी कई हफ्तों से वह होली समारोह का इंतज़ार कर रही थी। पिछले कुछ हफ्तों से उसका जोशोखरोश बढ़ता ही जा रहा है। वह लोकप्रिय होली-गीतों के वीडियो देख रही है, उन पर नाच रही है और हमें अक्सर बताती रहती है कि कैसे वह होली के दिन हम सबको रंगों से सराबोर कर देगी।

और आखिर होली का दिन आ ही गया! जब मैं अपरा को होली खेलता देखता हूँ तो मैं भी अपने बचपन की स्मृतियों में डूब जाता हूँ। जब मैंने अपने भाइयों से पूछा तो पता चला, वे भी ऐसा ही महसूस करते हैं। पिछले हफ्ते एक दिन सबेरे उठते ही अपरा ने पूछा, "आज होली है?" और जब हमने बताया कि तीन दिन बाद है तो उसने प्रश्न दाग दिया: "क्या तीन दिन बाद, आज नहीं है?" होली के पहले दिन शाम को अचानक उसके मन में क्या आया कि वह परेशान सी मेरे पास आई और दुखी स्वर में पूछा: "अब होली खतम हो गई क्या?"

मुझे भी अपने बचपन की याद आती है जब सबेरे उठते ही हम सड़क पर निकल पड़ते थे और होली खेलने लगते थे! हमारा घर मुख्य मंदिर के पास ही था, जहाँ हर वक़्त भीड़-भाड़ रहा करती थी, हर तरफ रंग-गुलाल होता था और हर वक़्त कोई न कोई होता था, जिस पर हम रंग डाल सकते थे या उस पर गुलाल फेंक सकते थे। हम सारा दिन बाहर सड़क पर होली खेलते हुए गुज़ार देते थे और सिर्फ खाना खाने घर वापस आते थे।

रात को, जब हम सोते थे तो अपनी पिचकारी हाथों में लिए ही सो जाते थे। रात भर के लिए भी उससे अलग होना हमें गवारा नहीं होता था!

वृन्दावन में होली कई दिन मनाई जाती है और होली के पहले ही दिन से ही अपरा रंगों से खेल रही थी! सड़क के नज़दीक जाकर पहले वह गुलाल से होली खेलती रही। दूसरे दिन हमारे आश्रम में कई तरह के रंगों के युद्ध का खेल खेला जा रहा था-और न सिर्फ अपरा और दूसरे लड़के बल्कि रमोना, यशेंदु और मैं भी रंगों में सराबोर हो गए थे। उसके अगले दिन हमने सोचा उसकी पिचकारी पहली बार रंगीन गरम पानी से भर दी जाए-और उससे मौज-मस्ती में और इजाफा हो गया! कल उसका चाचा पूर्णेन्दु वापस आया और हमारे साथ होली के खेल में शामिल हो गया। इसके अलावा बहुत से मेहमान तो थे ही। मैं तो आज की रंगीन धींगा-मस्ती और आमोद-प्रमोद का इंतज़ार कर रहा हूँ और उसके बाद कल तो इस हुड़दंग और मौज-मस्ती का चरमोत्कर्ष होना ही है!

मुझे यह भी याद आया कि जब होली -समारोह का समापन हो जाता था तो हम किस कदर दुखी हो जाते थे-लेकिन, फिलहाल, दुखी तब होंगे जब वह समय आएगा! अभी तो अपनी सलोनी बच्ची को लेकर अपने आपको रंगों में झोंक देने का समय है, होली की शुरुआत है! अब वह इतनी बड़ी हो गई है कि खुद अपने दोस्त ढूँढ़कर उनके साथ होली खेलती है! इस होली में वह त्यौहार को बेहतर समझने लगी है और हर साल यह आनंद बढ़ते ही चले जाना है!

योग-विद्यार्थियों के साथ 2007 की होली – 4 जनवरी 2015

सन 2007 के अपने आस्ट्रेलिया दौरे के बाद ऐन होली के समय मैं वृन्दावन लौट आया। होली रंगों का त्योहार है और इस बार वह कुछ ज़्यादा ही विशाल और रंगीन होने जा रहा था: कोलोन विश्वविद्यालय के सहयोग से हमारे द्वारा आयोजित IYTT यानी द इंटरनेशनल योग शिक्षक प्रशिक्षण के विद्यार्थी हमारे यहाँ आ रहे थे!

वे और कुछ दूसरे मित्र आए और हमारे यहाँ, आश्रम में कुल 20 लोग हो गए थे। स्वाभाविक ही विद्यार्थियों को योग कक्षाओं में और संबन्धित व्याख्यानों में भी उपस्थित रहना होता था इसलिए हम सब बहुत व्यस्त रहते थे। उनमें से कई पहली बार भारत आए थे इसलिए उनके आने के दूसरे दिन ही एक मज़ेदार घटना घटित हुई, जिसका ज़िक्र मैं आज करने जा रहा हूँ:

एक युवा महिला, शायद 25 साल की, सीढ़ियाँ उतरकर भागती हुई आई। वह बहुत उत्तेजित दिखाई दे रही थी। उसने हमें देखा और गहरी साँस लेते हुए तेज़ी के साथ हमें बताने लगी: "वहाँ, मेरे कमरे में एक छोटा सा मगरमच्छ घुस गया है!" क्या? मगरमच्छ? हम अपने कानों पर विश्वास नहीं कर सके और अपनी आँखों से कमरे में घुस आए उस सरीसृप को देखने तेज़ गति से सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आए। वह वास्तव में एक सरीसृप ही था और काफी छोटा था। लेकिन वह मगरमच्छ जैसा डरावना या खतरनाक कतई नहीं था! वह महज एक छिपकली थी!

हम हँसे बगैर नहीं रह सके और फिर हमने उसे बताया कि यहाँ छिपकलियों का आना-जाना बहुत आम बात है-और वे मच्छर खाती हैं इसलिए वे हमारे लिए उपयोगी ही हैं!

कक्षाओं के दिन बीत गए-लेकिन होली समारोह वाले दिन कोई काम या व्याख्यान आदि नहीं हुए, सिर्फ मौज-मस्ती होती रही!

आप कल्पना कर सकते हैं कि वह समारोह कितना बड़ा रहा होगा। आश्रम के बगीचे में 20 लोगों की दौड़-भाग और धींगा-मस्ती, एक-दूसरे पर रंगों की बौछार और रंग-गुलाल फेंकना-उछालना!

उस बड़े और मदहोश समारोह के पश्चात हमने एक खेल शुरू किया: बगीचे की घास पर सभी एक के बाद एक लेट गए और पहला व्यक्ति दूसरे सभी लोगों पर लुढ़कने लगा और फिर उसके बाद वाला और फिर उसके बाद वाला। और जब वे इस तरह लुढ़कते, हम उन पर और रंग डालते और उन्हें रंगों से शराबोर कर देते! रंगों से पूरी तरह लिथड़कर वे सभी बड़ी देर तक उत्फुल्लता के साथ हँसते और उल्लसित होकर होहल्ला मचाते रहे!

जैसे रंग यहाँ मिलते हैं, होली खेलने के बाद उन्हें उतारना बड़ा मुश्किल होता है! हम हर साल होली का मज़ा लेते हैं लेकिन नहाने के बाद भी कई दिनों तक शरीर से हरा, नीला और गुलाबी रंग हटता नहीं है। और एक पुरुष और एक महिला, जो पहले ब्लोण्ड थे, अब उनके बालों के रंग अचानक गुलाबी हो गए थे!

और महिला ने तो बालों को गुलाबी ही रहने दिया मगर पुरुष ने बाल कटवा लिए। महिला का कहना था कि गुलाबी रंग उसे पसंद है और वह किसी काम में व्यवधान भी उपस्थित नहीं करता! शायद यह लिंग भेद के नतीजा हो-पुरुष गुलाबी रंग को शायद महिलाओं का रंग मानते हों! 🙂

आजकल अपरा को सारा दिन नाचना पसंद है! 18 मार्च 2014

काफी समय हो गया जब मैंने आखिरी बार अपनी प्यारी बच्ची की दिनचर्या के बारे में आपको जानकारी दी थी. वैसे वह अब बच्ची नहीं रह गई है-मानसिक और शारीरिक रूप से वह इतनी तेज़ी के साथ विकसित हो रही है कि हम भी सोच में पड़ जाते हैं कि क्या यह वही गठरी है, जिसे दो साल पहले हम सब हाथों में उठाए फिरते थे.

इन दिनों नृत्य में अपरा की रुचि इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि लगभग सारा दिन वह नाचती ही रहती है. उसके पास एक छोटा सा म्यूज़िक सिस्टम है, जिसे वह एक हाथ में लेकर दूसरे हाथ से भारतीय नृत्य मुद्राएँ बनाकर, घेरे में चक्कर लगाकर, कूल्हे मटकाकर और साथ ही मुंह से गाने के बोल निकालकर इधर-उधर नाचती-गाती रहती है. वह तीन-चार गाने एक साथ बार-बार घंटों सुन सकती है और हमें सिर्फ इतना करना होता है कि उसके म्यूज़िक सिस्टम की बैटरी बीच-बीच में चार्ज करते रहें।

सभी बच्चे नैसर्गिक रूप से नृत्य करके खुश होते हैं और संगीत भी उन्हें पसंद होता है मगर मुझे लगता है अपरा के भीतर दिखाई दे रहा यह अतिरिक्त नृत्य-संगीत प्रेम पिछले कुछ हफ़्तों में घटी सुखद घटनाओं के चलते पैदा हुआ है: एक तो हमारे संगीतज्ञ मित्र, थॉमस रोज़ गिटार निकालकर बच्चों को एक से एक बढ़कर गाने सुनाते थे और दूसरे, हमारी एक और मित्र, एक फेसबुक मित्र, जिन्होंने एक रात बहुत शानदार उपशास्त्रीय नृत्य प्रस्तुत किया था. उस चित्ताकर्षक नृत्य को देखने के बाद कई दिनों तक अपरा बार-बार वही गाने बजाने के लिए कहती और उन गानों पर किए जाने वाले नृत्यों को बड़ी ही लगन से ऑनलाइन देखती रहती थी. अब वह उन नृत्य-मुद्राओं को बड़ी मोहकता के साथ प्रस्तुत करने लगी है.

जी हाँ, और कुछ दिन पहले उसने कूदना भी सीख लिया है! बहुत दिनों से वह दोनों पैर एक साथ ज़मीन से उठाकर कूदने कि कोशिश कर रही थी और जब अचानक एक दिन उसने देखा कि पल भर के लिए उसके दोनों पैर एक साथ हवा में तैर रहे हैं तो वह ख़ुशी से झूम उठी: यह उसके लिए बहुत अप्रत्याशित था!

यह सब हमें जानने को मिला, होली समारोह की तैयारियों के दौरान! बच्चों को ही होली की तैयारियों में सबसे अधिक मज़ा आया! जहाँ भी रंग दिखाई देते, बच्चे अपने हाथ सान आते, जहाँ पानी दिखाई देता पानी से खेलने लग जाते और मिनटों में सारे कपड़े गीले कर आते!

लेकिन असली पार्टी वाले दिन सबसे पहले अपरा ने गीली मुलतानी मिट्टी में खेलना शुरू किया। यह मिटटी हमने तैयार की थी, जिसे हम अपने शरीरों पर मलते हैं, जिससे शरीर पर बाद में खेले जाने वाले रंगों का असर न हो. लेकिन कुछ देर बाद उसे मिट्टी गन्दी, कीचड़ जैसी लगने लगी और उसने नहाने की फरमाइश कर डाली और तब नहला-धुलाकर उसकी सारी मिट्टी उतारी गई.

नहा-धोकर वह सुरक्षित दूरी पर एक तरफ बैठ गई और हम लोगों को देखने लगी कि कैसे सब एक दूसरे पर रंग फेंक रहे हैं. सूखी और साफ़ ज़मीन पर वह आनंदविभोर होकर नाचने लगी और जब हम सब होली के हुड़दंग से थककर फुरसत होकर बैठ गए और दूसरी बार मिट्टी तथा बेसन और दही के मिश्रण से बदन साफ़ कर रहे थे, वह रंग में भीगे हुए बगीचे की तरफ निकल गई. वहाँ जाकर वह बैठ गई और रमोना की बाँहों और चेहरे पर मिट्टी मलकर रंगों की सफाई में उसकी मदद करने लगी. फिर अचानक उठी और दही से भरे हांडे में हाथ डालकर हम लोगों पर दही फेंकने लगी. यह उसका अपना होली मनाने का तरीका था!

अब वह अभी से अगली पार्टी की प्रत्याशा में उत्तेजित हो रही है: कल रामोना का जन्मदिन है. स्वाभाविक ही हमने उसे इस बारे में बताया है और इसलिए आजकल वह सिर्फ उस पार्टी के बारे में ही बतियाती रहती है: हम लोग केक काटेंगे, उसको खाएंगे, वह नए कपड़े पहनेगी-उसका सबसे बढ़िया ड्रेस, जो उसे उसके जन्मदिन के रोज़ उपहारस्वरूप मिला था-और हाँ, वह अपने पसंदीदा गानों पर नाचेगी भी!

यह सब कितना शानदार है. काश, हम सब ज़्यादा से ज़्यादा उसके जैसे तरह होते और बच्चों की तरह जीवन जी सकते!

होली मुबारक – 17 मार्च 2014

होली मुबारक!

आज पागल हो जाने का दिन है! आज होली के त्योहार का मुख्य दिन है और यहाँ हर कोई होली के उन्माद में डूब जाना चाहता है। यह भारत के दो मुख्य वार्षिक उत्सवों में से एक है। इस दिन बड़े-छोटे सभी और विशेषकर बच्चे वृन्दावन आना चाहते हैं, जहां आज सप्ताह भर की शरारतपूर्ण हंसी-ठिठौलियों, रंगों और उन्मत्त मौज-मस्ती का समापन होगा!

दुनिया में कई त्योहार ऐसे हैं, जिनकी तुलना होली के साथ की जा सकती है। दूसरे देशों में आयोजित होने वाले कार्निवालों की तरह होली भी मूलतः वसंत के आगमन की खुशी में और उसके स्वागत में मनाई जाती है। यहाँ यह फसल-कटाई का समारोह भी है। भारत में हर चीज़ को किसी न किसी तरह धर्म से जोड़ दिया जाता है लेकिन यह त्योहार मनाने की प्रथा धर्म के अस्तित्व से पहले से रही है और इसका संबंध धर्म से ज़्यादा प्रकृति से है।

होली का त्योहार आपके सामने इस बात की संभावना पेश करता है कि बहुत सी वे बातें, जिन्हें आप सामान्य रूप से नहीं करते, इस दौरान कर सकते हैं। आपको आजादी है कि आप आज के दिन सामाजिक व्यवहार के दैनिक नियमों का उल्लंघन कर सकते हैं। आप गंदगी या कीचड़ में लिथड़ सकते है, रंगों में सराबोर हो सकते हैं, पूरी तरह गीले हो सकते हैं, खुले आम नाच-गा सकते हैं, दूसरों पर रंग बरसा सकते हैं, उन पर पानी उंडेल सकते हैं और पूरी तरह पागलपन ओढ़ सकते हैं।

उनके लिए, जो इस त्योहार का मज़ा लेने यहाँ आते हैं, यह अनुभव उन्मुक्त करने वाला होता है। जैसे आप एक बार फिर, एक दिन के लिए ही सही, बच्चे बन गए हों, हर तरह की परेशानियों, चिंताओं से मुक्त कि लोग क्या कहेंगे, क्या करना वाजिब है और किन चीजों से आपके कपड़े या घर गंदा हो जाएगा!

जी हाँ, होली में आपका घर गंदा होता ही है। यह सामान्य बात है और इस पर कोई एतराज़ नहीं करता कि हर तरफ रंग क्यों फैला हुआ है। यह ऐसी बात है, जिसकी बाकी साल भर कल्पना भी नहीं की जा सकती। जिन देशों को मैं जानता हूँ, वहाँ भी इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

हमने हमेशा की तरह अपने स्कूल के बच्चों को होली मनाने के लिए आश्रम में निमंत्रित किया है। अभी-अभी हम रंग खेलकर आए हैं-गुलाल, रंगीन पानी, फूल, मौज-मस्ती, धमाचौकड़ी! एक बार फिर यह सब बेहद शानदार रहा और इस उल्लासपूर्ण समारोह के चित्र आप यहाँ देख सकते हैं।

मैं आप सभी लोगों को होली की शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ! होली है!!!

होली सिर्फ मौज-मस्ती ही बनी रहे – पश्चिमी पर्यटकों पर कोई विकृत प्रभाव न छोड़े- 16 मार्च 2014

जब मैं 2006 में होली मनाने घर वापस आया तब यहाँ सिर्फ मैं और मेरा परिवार ही नहीं थे, जो होली मनाने की तैयारी कर रहे थे। हमारे यहाँ कई पश्चिमी मेहमान आए हुए थे, जो मौज-मस्ती से भरे इस महत्वपूर्ण त्योहार का इंतज़ार कर रहे थे और मित्रों के साथ रंगों के पागलपन में सराबोर होने के लिए बेताब हो रहे थे। उन्होंने बहुत मौज-मस्ती की मगर दुर्भाग्य से उस दिन एक ऐसी घटना भी हो गई, जो किसी तरह भी इस निर्बाध आनंद और खुशी के मौके के अनुरूप नहीं थी।

सीधे शब्दों में कहें तो यह आपके और आपके रवैये पर निर्भर है कि आप होली का मज़ा ले सकते हैं या नहीं। आप अव्यवस्था, कोलाहल और अफरा-तफरी को कितना पसंद करते हैं। अपने चारों ओर निर्मित होते हड़बोंग को आप कितना सहन कर सकते हैं? कितना आप अपने आप पर हंस सकते हैं?

होली के दिन हर तरफ लोग एक दूसरे पर रंग-गुलाल फेंकते नज़र आते हैं और वृन्दावन में तो हफ्ते भर पहले से ही ऐसी हालत हो जाती है कि आप कहीं भी निकल जाइए, बिना रंगे वापस नहीं लौट सकते। लोग एक दूसरे को मूर्ख बनाने की तरकीबें खोजते रहते हैं और उल्लास और नटखटपन की उत्तेजना में एक से एक बढ़कर अनर्गल, अजीबोगरीब और बेतुकी हरकतें करते रहते हैं। इस प्रक्रिया में आप खुद भी गीले हो सकते हैं, रंगे जा सकते हैं, फूलों में सराबोर हो सकते हैं और अगर किसी जाल में फंस गए तो पूरी तरह चुगद भी नज़र आ सकते हैं। आसपास का सारा माहौल ही रंगों में तरबतर होता है और आपको वह गंदा और प्रदूषित भी लग सकता है।

कुछ लोग इसका भरपूर आनंद उठाते हैं मगर औरों को यह हुड़दंग का अतिरेक लगता है। कुछ लोग इस उल्लास में डूब जाते हैं और कह उठते हैं कि यह उनके जीवन का सर्वोत्तम अनुभव है। कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो खुद दूर बैठे दूसरों को होली खेलते, रंगों में सराबोर होते देखते रहना पसंद करते हैं। लेकिन कुछ लोग ऐसी जगहों पर मौजूद रहना भी गवारा नहीं करते, जहां यह सब चल रहा होता है-उनके लिए यह लगभग असहनीय होता है।

सामान्य भारतीय होली के समय इसी मूड में होते हैं। लेकिन मैं यह भी मानता हूँ कि कई बार वे उन सीमाओं को लांघ जाते हैं, जिन्हें त्योहार के पागलपन के बावजूद अक्षत बनाए रखना आवश्यक है। सन 2006 में ऐसी ही एक घटना हुई थी।

हमारे मेहमानों का एक समूह, जिसमें तीन पश्चिमी महिलाएं थीं, होली के दौरान बाज़ार गईं। वे मंदिर देखना चाहती थीं और साथ ही शहर के अंदरूनी इलाकों की होली का अनुभव प्राप्त करना चाहती थीं। वैसे भी भारतीयों को पश्चिमी लोग बहुत सम्मोहक और दिलचस्प नज़र आते हैं। होली के दौरान कुछ मर्द सोचते हैं कि उन्हें कुछ भी करने की आज़ादी है और इन्हीं अनुभवों को लेकर हमारी ये महिलाएं वापस आश्रम लौटीं: अचंभित और दुखी। वे महिलाएं कुछ लोगों के घृणित आचरण का निशाना बनी थीं और भीड़ में कुछ लोगों ने अनुचित ढंग से कई बार उन्हें छूने की कोशिश की थी।

यही वह स्थिति है, जब आनंद का अंत हो जाता है और यह दुखद है कि ऐसा अक्सर होता रहता है।

भारत में महिलाओं की इज्ज़त का सवाल फिर सामने आ जाता है। यहाँ आने वाले पश्चिमी लोगों के मन में भारत की छवि और धूमिल हो जाती है। वे वापस जाएंगे और पुनः भारत के संदर्भ में इन अशोभनीय बातों का ज़िक्र करेंगे-कुछ अच्छी बातों के साथ करेंगे मगर ये बातें उनके मन में कटु स्मृतियों की तरह हमेशा के लिए घर कर जाएंगी।

इसलिए हम सिर्फ आश्रम के सुरक्षित वातावरण में, आश्रम में रहने वाले परिवारों और उनके बच्चों के साथ ही होली खेलते हैं, जिससे हमारे मित्र वास्तविक, उल्लासमय होली का आनंद उठा सकें!

2006 में होली पर घर-वापसी – 9 मार्च 2014

जब 2006 में मेरे आस्ट्रेलिया-दौरे के समापन का वक़्त आया, मैं भारत लौटकर होली का रंगारंग त्योहार मनाने के लिए बेताब हो रहा था!

पिछली बार मैं जब आस्ट्रेलिया में था तो भारतीय समुदाय के साथ ही रहा करता था लेकिन इस बार मैं अधिकतर आस्ट्रेलियन्स के साथ रह रहा था। वे सब योग शिक्षक, विश्रांति शिविर चलाने वाले, वैकल्पिक साधना करने वाले, योग-प्रेमी और अलग तरह का जीवन जीने वाले, अध्यात्म या भारत में रुचि रखने वाले लोग थे।

भारतीय समुदाय के साथ अब भी मेरे कुछ संबंध मौजूद थे और वे लोग भी मेरे साथ संपर्क रखे हुए थे और चाहते थे कि एक बार मुझे आमंत्रित कर सकें। मुझे भी इसका अंदेशा था मगर आखिर मुझे लगा कि मैं वहाँ और अधिक रुकना नहीं चाहता और न ही उनके साथ कोई कार्यक्रम करना चाहता हूँ। हालांकि वे अब भारत में नहीं रहते थे फिर भी अभी तक गुरुवादी धारणाओं से प्रभावित और परिचालित थे, जिन्हें मैं पीछे छोड़ चुका था। एक दृष्टिकोण से वे सब, पश्चिमी सभ्यता के बीच इतना समय गुजारने के कारण और कई तो वहीं पैदा होने के कारण कुछ अधिक खुला दिमाग रखते थे लेकिन दूसरे दृष्टिकोण से देखने पर वे भारतीयों से भी ज़्यादा दक़ियानूसी नज़र आते थे। वे अपनी पुरानी परम्पराओं को जीवित रखना चाहते थे और इन परम्पराओं में कई ऐसी थीं, जिनका मैं तब तक बहिष्कार कर चुका था। बहुत ज़्यादा धार्मिक, इस पर बहुत ज़्यादा विश्वास कि कुछ लोग दूसरों से उच्च या बड़ी हैसियत वाले हो सकते हैं।

नहीं, मैं पश्चिमी लोगों के साथ ज़्यादा प्रसन्न रहता था क्योंकि उनसे मेरी मुलाक़ात समान स्तर पर हुआ करती थी। मैं उन्हें मित्र बना सकता था और उनके साथ कुछ साझा कर सकता था, अपना कुछ ज्ञान या अनुभव, जिनसे उन्हें लाभ पहुंचता था। तो मुझे आमंत्रित करने वाला अगला कोई भी फोन आता मैं हर हाल में इंकार ही करने वाला था-और फिर यह सलाह सामने आई: आप अपना दौरा कुछ दिन के लिए बढ़ा लीजिए और होली हमारे साथ यहीं मना लीजिए!

जब मैंने यह सुना तो तुरंत उनसे साफ शब्दों में ‘नहीं’ कह दिया: होली पर मैं हमेशा घर पर रहता हूँ! आगे-पीछे सोचने की कोई ज़रूरत ही नहीं थी!

होली हमारा पारिवारिक पर्व है। क्या आप साल का कोई ऐसा समय बता सकते हैं जब आप विशेष रूप से सारे परिवार के साथ इकट्ठा होते हैं, उनके साथ शानदार वक़्त गुज़ारते हैं, हँसते-गाते, धूम मचाते और आनंद मनाते! मेरे लिए होली ऐसा ही उत्सव है और उसके लिए मैं परदेस में रहूँ, यह मुझे मंजूर नहीं!

मैंने वह प्रस्ताव आसानी के साथ ठुकरा दिया। और मैंने अपने परिवार को फोन किया। मैं अपनी यात्राओं में उनके साथ फोन पर अधिक बात नहीं करता था। मैं ईमेल के जरिये उनके संपर्क में बना रहता था और अक्सर हमें पता होता था कि हम सभी अपनी-अपनी जगह कुशल-पूर्वक हैं। लेकिन बहुत दिनों बाद, वह भी होलिकोत्सव पर, घर में, परिवार के साथ होने की उत्कंठा के चलते मैंने उन्हें फोन किया।

कुछ समय बाद ही मैं भारत जाने वाले विमान पर सवार था और होली पर पागल कर देने वाली रंगीनियों की कल्पनाओं में डूब गया। होली की मौज-मस्ती मेरा इंतज़ार कर रही थी और मुझे उनके बीच होना ही था!

आप हर किसी की खुशियों की जिम्मेदारी नहीं ले सकते – 29 मार्च 2013

मैंने पिछले हफ्ते बताया था कि हमारे आश्रम में इन दिनों बहुत से लोग आए हुए हैं। सारे कमरे भरे हुए थे और हमने बहुत खुशगवार वक़्त गुज़ारा, खासकर होली के कुछ दिन। ज़्यादा लोग, ज़्यादा मज़ा! लेकिन इसके साथ ही काम भी बहुत बढ़ गया था। ज़ाहिर है, ज़्यादा लोगों को ज़्यादा भोजन की और ज़्यादा पानी की ज़रूरत होगी। उनके अगले कार्यक्रमों के बारे में, यहाँ तक कि होली के त्योहार के बारे में भी, ज़्यादा लोगों को, ज़्यादा बार जानकारियाँ हमें देनी होंगी। कोई शक नहीं कि हमारे आश्रम में ऐसी व्यवस्था है कि एक साथ ज़्यादा से ज़्यादा लोगों का खयाल रखा जा सकता है इसलिए हम लोग निश्चिंत थे कि हर कोई यहाँ बहुत अच्छा वक़्त गुजरेगा। लेकिन क्या पहले हम ऐसी गारंटी दे सकते थे? क्या हम यह ज़िम्मेदारी ले सकते थे कि आश्रम में हर व्यक्ति खुश रहे? नहीं, बिल्कुल नहीं! यह न सिर्फ हमारे बारे में सच है बल्कि दुनिया के हर व्यक्ति के लिए भी सच है। आप हर किसी की खुशी की ज़िम्मेदारी नहीं ले सकते। क्यों? मुझे समझाने दीजिये।

हमारे आश्रम के उदाहरण को ही आगे ले जाएँ तो ज़ाहिर है, हम चाहते हैं कि यहाँ निवास करने वाला हर व्यक्ति, जब तक हमारे साथ है, खुश रहे। जब लोग आश्रम में अपने प्रवास से प्रसन्न होते हैं तो हमें भी खुशी होती है और इसलिए हमें उनके लिए उत्सवों, पार्टियों और दूसरे कई प्रकार के आयोजन करना अच्छा लगता है, जिससे वे अधिक से अधिक आनंद प्राप्त कर सकें। इससे वे भारतीय संस्कृति को भी बेहतर तरीके से जान पाते हैं।

यही कारण है कि आश्रम में होली के इतने बड़े आयोजन की तैयारी काफी पहले से ही शुरू कर दी जाती है और हम नए और पुराने मित्रों के साथ भविष्य में होने वाली मौज-मस्ती की कल्पना करने लगते हैं। जब नए, अनजान मेहमान हमारे यहाँ पहली बार आते हैं तो हमें पता नहीं होता कि वे गुलाल और रंगों से सराबोर होकर खुश होंगे या नहीं। पहले से यह यह जान पाना असंभव ही है! अगर वे वाकई पूरा मज़ा लेना चाहते हैं तो वे पार्टी में शामिल होते हैं और एक भी समारोह मिस नहीं करते। हमारे साथ बाहर निकलकर वे खुशी और मस्ती में पागल हो उठते हैं और एक दूसरे पर रंग, गुलाल, पानी और फूलों की बौछार करते हुए होली के रंग में रंग जाते हैं।

अगर उन्हें होली का यह अति पागलपन अधिक पसंद नहीं है तो भी कोई बात नहीं। वे थोड़ा सा परे हट जाएँ और सारे हुड़दंग के बीच फँसने से बचें जिससे वे रंगों से भी और हुल्लड़ से भी काफी हद तक बचे रह सकते हैं। अगर वे चाहें तो वे आश्रम में स्थित ‘रंगों की पाबंदी’ वाले इलाके में जाकर दूर से देखते हुए होली की सारी मस्ती का मज़ा ले सकते हैं।

कहने का अर्थ यह है कि हम एक सीमा तक ही ज़िम्मेदारी उठा सकते हैं। हम रंग, पानी और स्थान का इंतज़ाम कर सकते हैं। गानों के रेकॉर्ड चला सकते हैं और हम खुद आनंद को द्विगुणित करने के लिए हँसते, खिलखिलाते, नाचते-गाते, धूम मचाते उसमें शामिल हो सकते हैं। हम ऐसा करते ही हैं! यहाँ तक कि सुनहरे बालों वाली महिलाओं से हमने इस साल वादा किया था कि उनके बालों को नुकसान न पहुंचे इसके लिए हमने उपाय किए हैं और उन्हें तेल और मिट्टी का लेप और मोटे कपड़े की टोपियाँ उपलब्ध कराए गए जिससे वे चेहरे और बालों की सुरक्षा करते हुए होली खेल सकें।

किसी एक बिन्दु पर आकर उत्सव में शरीक व्यक्तियों को स्वयं अपने लिए ज़िम्मेदार होना ही पड़ता है और वही करना होता है जो उन्हें खुशी पहुंचाए क्योंकि कोई भी दूसरा यह ठीक ठीक नहीं जान सकता कि आपको क्या पसंद है। अगर आप अपने आसपास के सभी लोगों को प्रसन्न करने की कोशिश करेंगे तो आप इसमे कभी सफल नहीं हो सकते। आप अच्छा से अच्छा करेंगे लेकिन कोई न कोई ऐसा होगा जो खुश नहीं होगा। और फिर यही सोचते हुए आप स्वयं अपनी खुशी को जोखिम में डालेंगे।

यह सच है कि आप सबको खुश रखना चाहते हैं। लेकिन दूसरों की खुशी को अपनी खुशी से ज़्यादा महत्वपूर्ण न मानें अन्यथा आप स्वयं खुश नहीं होंगे और फिर दूसरों को भी खुश नहीं कर पाएंगे!

तो हम प्रसन्न हैं कि हमने होली का आनंद उठाया और वास्तव में आश्रम में उपस्थित सभी ने इस उत्सव में शिरकत करके होली का मज़ा प्राप्त किया! हर व्यक्ति जानता था कि उसकी खुशी का ज़िम्मेदार वह स्वयं है और जब तक उसे मज़ा आ रहा है तभी तक वह उसमें सहभागी है। इस तरह हम सब कह सकते हैं कि हमने बेहद सुखद समय साथ-साथ व्यतीत किया।

जन्मदिन मनाना, होली मनाना और साथ होना – 27 मार्च 2013

आप जानते ही हैं कि इस वक़्त आश्रम शानदार मेहमानों और मित्रों से आबाद है। बहुत से प्रिय व्यक्तियों से मिलने का यह सबसे अच्छा वक़्त है क्योंकि यह उत्सव का मौसम है। हम पागल बना देने वाला होली का त्योहार मना रहे हैं जोकि पिछले सात दिनों से जारी है और सुबह के चरमोत्कर्ष के साथ आज उसका आखिरी दिन है। हमने वाकई होली का पूरा पूरा मज़ा लिया है! हमने इसे कैसे मनाया? बताता हूँ!

23 मार्च को बड़ी संख्या में लोगों ने कस्बे के चारों ओर पैदल चलते हुए परिक्रमा की। क्योंकि आश्रम उसी सड़क पर है हमारे मेहमान और मित्र यह देखकर प्रसन्नता से उछलने लगे कि लोगों ने अभी से एक दूसरे पर रंग और गुलाल फेंकते हुए हुड़दंग मचाना शुरू कर दिया है। जब वे मुख्य द्वार पर खड़े थे वहाँ से निकलने वाले लोग उन्हें भी इसमें सम्मिलित करते जा रहे थे और सबसे पहले उनके गालों पर गुलाबी और हरा रंग पोता गया। दोपहर को यशेंदु उन सबको लेकर कस्बे की शोभायात्रा दिखाने और प्रधान मंदिर में ले गया जहां होली के पागलपन में सराबोर होने के उद्देश्य से कस्बे के अधिकतर लोग पहुंचते हैं! उन्होंने लोगों को गाते-बजाते और नाचते और सड़क पर हुड़दंग मचाते देखा। लोग एक दूसरे पर सूखे रंगों की बौछार कर रहे थे। ब्रज में यह उनकी पहली होली थी और स्वाभाविक ही उन्हें भी होली की मस्ती का उनका हिस्सा प्राप्त हुआ।

समूह की चार महिलाओं, आइरिस, मेलोनी, सिल्विया और रमोना के जन्मदिन मार्च माह में ही पड़ते हैं। हमने उन सबके जन्मदिन एक ही दिन, यानी कल शाम को मनाने का निश्चय किया। सभी को पार्टी का पता था और हमने उन्हें आगाह किया कि वे अपने अच्छे कपड़े पहनकर न आएँ! आखिर होली है भई!

इस तरह हम सब रात के खाने पर एकत्र हुए और उसके बाद उन सब महिलाओं के लिए एक विशालकाय केक काटा गया जिसका एक-एक टुकड़ा सबमें बांटा गया, क्योंकि हमारे आश्रम में अनगिनत लोग उपस्थित थे, मेहमान, मित्र और आश्रम के कर्मचारी। उसके बाद हमारी वास्तविक होली पार्टी शुरू हुई! पहले आल्हाद्कारी और खुशगवार गाना-बजाना शुरू हुआ फिर सब ढोल की थाप पर झूमने-नाचने लगे। फिर अचानक, जैसे आसमान से टपके हों, थैलियों में ढेर सारा रंग लिए यशेंदु अवतरित हुए। पहले उन्होंने लोगों पर रंग फेंकना शुरू किया और फिर कुछ रंग बच्चों ने उनसे छुड़ाकर लोगों पर रंगों की बौछार सी शुरू कर दी। उसके बाद तो सबके पास रंग आ गया और सभी एक दूसरे पर रंग फेंकने लगे, झूमने नाचने लगे और होली खेलने में मस्त हो गए। रंग में फूल भी मिलाए गए थे और हमने शानदार फूलों के रंगों की पार्टी की।

दूसरे दिन सबेरे हम रात की पार्टी की मस्ती से उबर भी नहीं पाए थे कि रंगों की मस्ती का हुड़दंग फिर शुरू हो गया! नाश्ते से पहले ही हम सब दोबारा होली खेलने की योजना बनाने लगे। अब हमने अपने शरीर पर तेल चुपड़ लिया, खासकर उन्होंने जिनके लंबे बाल थे, दाढ़ियाँ थीं और महिलाएं जिन्हें अगले हफ्ते अपने काम पर वापस जाना था, अपने बालों की सुरक्षा के लिए उन्हें मिट्टी के लेप और मोटे कपड़े से ढँक लिया।

नाश्ते के बाद हम सब बगीचे की तरफ दौड़ पड़े जहां पहले ही पाठशाला के बच्चे हमारे साथ होली खेलने के लिए जमा थे! और इस बार हम सूखे रंगों तक ही सीमित नहीं रहे! रात में यशेंदु और बच्चों ने मिलकर फूलों को घंटों उबालकर प्राकृतिक रंग बनाया था। तो हमारे पास कुछ पीला प्राकृतिक रंग उपलब्ध था और थोड़ा सा लाल और हरा। इस तरह हमारे पास बहुत सारा रंगीन पानी था। हमने सबको पिचकारियाँ दीं और सबने एक दूसरे पर रंगों की बौछार शुरू कर दी और फिर बहुत देर तक आपस में गर्मजोशी के साथ गले मिलते रहे।

क्या कोई ऐसा पैमाना है जिससे पता चले कि कोई होली पार्टी सफल रही? बगीचे में रंगों की मात्रा? मित्रों और परिवार के सदस्यों के हाथों, पैरों और चेहरों पर लगा रंग? बहुत बड़ी तादात में मिठाइयां जो कल यहाँ मौजूद थीं और अब गायब हैं?

शायद इन सभी का कुछ-कुछ हिस्सा और उपस्थित प्रसन्नचित्त लोगों के चेहरों पर पसरी एक चौंडी मुस्कान! सभी ने यहाँ शानदार समय गुज़ारा और सभी यहाँ की खास होली की सुखद स्मृतियाँ साथ लेकर जाएंगे!

यहाँ आप होली की फोटो देख सकते हैं