बच्चों के मन मेँ हम अवसाद और अक्रियाशीलता के बीज बोते हैं – 2 अप्रैल 2014

कल मैंने आपसे कहा था कि क्यों बच्चों को इस तरह एक कठोर समय-सारिणी के साथ बांध देना कि उन्हें कोई अवकाश का समय ही न मिल पाए, एक अच्छा विचार नहीं है। ऐसा करके उन्हें अपने आपको व्यस्त रखने की काबिलियत से महरूम कर देने के अलावा हम उनमें आज की कुछ बहुत बड़ी समस्याओं, अवसाद, अक्रियाशीलता और दूसरी मनोवैज्ञानिक बीमारियों के बीज बो देते हैं। ये समस्याएँ, जो पहले उम्र के चौथे दशक मेँ नज़र आती थीं, आजकल स्कूल मेँ पढ़ने वाले दुनिया भर के युवाओं मेँ भी अक्सर दिखाई दे जाती हैं।

चलिए, जिन गतिविधियों मेँ अभिभावक अपने बच्चों को व्यस्त रखना चाहते हैं, उनकी ओर लौटते हैं। ऐसी बहुत सी गतिविधियां हैं: कुछ ज़्यादा शैक्षिक होती हैं तो कुछ कम। कुछ कथित रूप से बच्चों की प्रज्ञा को उद्दीप्त करती हैं तो कुछ संगीत कौशल बढ़ाती हैं और कुछ उनसे शारीरिक व्यायाम करवाती हैं। डेट्स जैसे कुछ खेल होते हैं जो उन्हें सामाजिक व्यवहार-कुशलता सिखाते हैं। सभी गतिविधियों का अपना कोई न कोई उद्देश्य होता है।

जी हाँ, इसके पीछे विचार यह है कि बच्चा कुछ सीखे। इसमें एक अपेक्षा की जा रही है: बच्चे इन गतिविधियों मेँ अच्छा प्रदर्शन करें! अगर वे लोगों की अपेक्षाओं पर खरे उतरते हैं तो उनकी प्रशंसा होगी। सामाजिक कार्यक्रमों मेँ भी पर्यवेक्षकों की पैनी निगाहें हर वक़्त आसपास हो रही बच्चों की गतिविधियों पर नज़र रखती हैं कि वह कितना प्रभावशाली है। यह अपेक्षा बच्चों पर बोझ बन जाती है।

अब ‘फुरसत की गतिविधियों’ को छोड़कर हम बात करें कि स्कूल मेँ क्या होता है: हमारे छोटे-छोटे बच्चों को कितना बोझ वहन करना होता है इसकी आप कल्पना नहीं कर सकते! उन्हें बहुत सी चीज़ें सीखनी होती हैं और उन्हें लगातार आगाह किया जाता है कि अगर वे नहीं सीख पाए तो उसके क्या परिणाम होंगे। उनके नाज़ुक दिलों मेँ भविष्य का डर बैठा दिया जाता है।

शिक्षक, अभिभावक, स्कूल और यहाँ तक कि सहपाठी भी आपस मेँ एक-दूसरे को बार-बार याद दिलाते रहते हैं कि जीवन मज़ाक नहीं है। यह सीख एक बड़े उद्देश्य से दी जाती है: कि वे स्कूल की पढ़ाई के बाद भी बेरोजगार न रह जाएँ और उन्हें बिना पैसे-लत्ते के सड़क पर वक़्त न गुज़ारना पड़े। क्योंकि पैसा ही सब कुछ है। और पैसा कमाने के लिए आपके पास अच्छा रोजगार होना चाहिए, उसके लिए आपको अच्छे अंक लेकर परीक्षाएँ पास करनी होंगी, उसके लिए आपको अधिक से अधिक पढ़ना होगा! बहुत मौजमस्ती ठीक नहीं है, पढ़ाई हंसी-मज़ाक नहीं है! एक भी गलती हुई तो सज़ा मिलकर रहेगी। अपने आसपास के लोगों से स्पर्धा करो! क्या वे आपसे बेहतर हैं? और मेहनत करो! क्या वे आपसे पिछड़ गए हैं? सतर्क रहो कि वे आपकी बराबरी न कर पाएँ!

कुछ स्कूलों मेँ और कुछ बच्चों के लिए यह कुछ अधिक स्पष्ट होता है और कुछ दूसरों के लिए यह दबाव सूक्ष्म और अदृश्य होता है। लेकिन हर स्थिति मेँ आप उसके मनोवैज्ञानिक परिणामों की कल्पना कर सकते हैं। इस दबाव की निकासी आसान नहीं है, इतना वक़्त नहीं है कि उसके विसर्जन का प्रयास भी किया जा सके। और किसी को इस हकीकत का एहसास तक नहीं है कि हर व्यक्ति भिन्न होता है और सभी संभ्रांत नहीं हो सकते। यह भी कि हम सभी डॉक्टर या इंजीनियर नहीं हो सकते।

इसीलिए बच्चों मेँ शिक्षा सम्बन्धी विकार, मानसिक तनाव और अक्रियाशीलता पैदा हो जाते हैं। क्योंकि वे कभी भी उतने योग्य नहीं हो सकते, जितनी की उनसे अपेक्षा की जा रही है। क्योंकि वे चाहे जितना प्रयास करें, उन्हें अपना भविष्य अंधकारमय लगता है!

हमें इस स्थिति को बदलना है।

अपने बच्चों को स्वतंत्र माहौल में ज्ञान प्राप्त करने का अवसर प्रदान करें, उन्हें हंसने-खेलने और मौज-मस्ती करने का मौका दें। उनके साथ सकारात्मक व्यवहार करें और उन्हें भी वह शिक्षा दें, जो उनके भीतर सकारात्मक सोच विकसित करे!

आप खास हैं क्योंकि आप, आप हैं- इसलिए नहीं कि आप क्या करते हैं!-14 अगस्त 2013

उन अल्पसंख्यकों के लिए, जिन पर समाज द्वारा दबाव डाला जाता है, अपने कल के ब्लॉग के बाद आज मैं उन बहुसंख्यकों के बारे में कुछ शब्द कहूँगा, जो अल्पसंख्यकों जैसा बिल्कुल अनुभव नहीं करते बल्कि सोचते हैं कि वे वैसा ही महसूस करते हैं, जैसा समाज के दूसरे लोग महसूस करते हैं, वे जो वास्तव में ‘बहुसंख्यक समाज’ का ही हिस्सा हैं। क्यों? क्योंकि ‘बहुसंख्यक-ताड़ना’ जारी है, खासकर आध्यात्मिक क्षेत्र में, लेकिन कई लोग ऐसे भी हैं जो ईमानदारी के साथ वही चाहते हैं, जो वे कर रहे होते हैं और इस आचरण का उन्हें अधिकार भी प्राप्त है-भले ही इसका अर्थ यह निकाला जाए कि वे ‘बहुसंख्यक’ हैं, यानी उनका आचरण समाज के आम, सामान्य लोगों जैसा ही है। अगर आप उनमें से एक हैं तो आपको इस बात के लिए आत्मग्लानि नहीं होनी चाहिए!

आपको यह मज़ाक लगेगा कि मैं सोचता हूँ कि यह कहना ज़रूरी है लेकिन मुझे समझाने दीजिए कि क्यों मेरा विश्वास है कि बहुत से लोग ऐसे हैं, जो ऐसी धारणा रखते हैं। बहुत साल से लोग इस बारे में ‘जागृत’ हो रहे हैं और समझ रहे हैं कि वे समाज की परम्पराओं के अनुसार नहीं चलना चाहते और वही करना चाहते हैं जो उनका दिल कहता है। ऐसे कई आंदोलन भी चले हैं, जिन्हें आप ‘आध्यात्मिक आंदोलन’ कह सकते हैं, अगर आप एक शब्द में इसका आशय जानना चाहते हैं। वे सभी इस बात पर ज़ोर देते हैं कि वही कार्य करें जो आपको प्रसन्न करता है और मैं इस विचार की मूल भावना का पूरी तरह समर्थन करता हूँ। उनके अलग-अलग आग्रह (रास्ते) हो सकते हैं मगर ज़्यादातर लोग अपने अनुयायियों से यही एक बात कहते हैं कि आप विशिष्ट हैं!

जब कि मैं इस विचार की मूल भावना से सहमत हूँ कि हम सभी खास हैं, इस संदेश का एक और निहितार्थ है जिससे मैं पूरी तरह सहमत नहीं हूँ: वह यह कि आप खास हैं क्योंकि आप कुछ अलग कर रहे हैं। आप खास हैं क्योंकि आपके आसपास के वे सब लोग, वे ‘बहुसंख्यक’, वह ‘विशाल जनसमूह’ उतने जागृत (सचेतन) नहीं हैं, जितना कि आप हैं। आप खास हैं क्योंकि वे उन्हीं पुरानी बातों से चिपके हुए हैं, समाज की मान्यताओं के अनुसार काम कर रहे हैं, जिन्हें अब आप पसंद नहीं करते। आप खास हैं क्योंकि आप वह सब पसंद नहीं करते, जो वे पसंद करते हैं। आपको ऐसे लोग भी मिलेंगे, जो लगभग वही बातें पसंद करते हैं, जो आप पसंद करते हैं लेकिन अंत में आप अकेले ही अपने ज्ञान (जागृति) के रास्ते पर चलेंगे क्योंकि आप इतने खास हैं।

खैर, मैं इस विचार का समर्थन नहीं करता कि वे सारे लोग ‘चुनिन्दा लोग’ हैं। मैं नहीं समझता कि यह कोई ठीक विचार है कि लोगों को बताया जाए कि आपको दूसरों से इतना अलग होना चाहिए कि आप उनके जैसे न लगें, उनके साथ आपकी संगति बिल्कुल न बैठे। हाँ, मैं स्वयं लोगों से यह कहता हूँ कि यह ज़रूरी नहीं है कि आपकी संगति उनके साथ बैठे ही, लेकिन यह उस बात से बिल्कुल भिन्न बात है कि आप उनसे कहें कि उन्हें संगति बिठानी ही नहीं चाहिए। वे खास नहीं माने जाएंगे अगर वे सामान्य लोगों के साथ सहज महसूस करते हैं। कि उन्हें अपने सामान्य परिवेश में अजनबी महसूस करना चाहिए, या उसमें उन्हें बुरा लगना चाहिए। कि उन्हें नए दोस्त या अल्पसंख्यक लोगों के समूह को खोजना चाहिए और उसमें शामिल हो जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में, उन्हें भेड़िये की तरह समाज के बाहर भटकते रहना चाहिए।

जब आप अपने शरीर, खान-पान, मस्तिष्क और अपने तनाव या विश्रांति की तीव्रता और कुल मिलाकर अपनी कार्यपद्धति और व्यवहार के बारे में ज़्यादा सोचने लगते हैं या उसके बारे में अधिक चेतन होते हैं, आप महसूस कर सकते हैं कि आप कुछ अलग हैं। आप महसूस करेंगे कि आप कुछ गतिविधियों को पसंद नहीं करते हैं, जैसे शाम को किसी शराबखाने में धुत्त पड़े रहना या कहीं सामिष भोजन करना क्योंकि अब आपने शराब पीना छोड़ दिया है या शाकाहार अपना लिया है। हो सकता है कि अब आप कई ऐसे मामलों पर कोई राय देना पसंद नहीं करते, जिन पर पहले आप खुलकर बातचीत किया करते थे। लेकिन भले ही आप फिल्म देखना पसंद करते हैं, डिस्को में जाकर नृत्य करना पसंद करते हैं, या दोस्तों के साथ फुटबाल मैच देखना पसंद करते हैं तो आप अब भी खास और अनूठे हैं! आप अब भी एक अलग अस्तित्व के मालिक हैं और कोई भी आप जैसा नहीं है!

इसका संदेश यह है: जैसे आप हैं उसी रूप में आप अनूठे हैं। इसलिए कि आप, आप हैं, इसलिए नहीं कि आप ऐसा या वैसा करते हैं या नहीं करते। भले ही आप बहुसंख्यक समाज का हिस्सा हों, हैं आप विशिष्ट ही!

यह आपका जीवन है – ध्यान रहे, समाज आप पर कोई दबाव न बना पाए- 13 अगस्त 2013

लोगों द्वारा बनाई जाने वाली जीवन की योजनाओं के बारे में कल जब मैंने लिखा था तो मेरे मन में एक और बात भी थी, जिसे मैं इन शब्दों में आपके सामने रखना चाहता हूँ: यह कार्ययोजना अक्सर सबके लिए ठीक नहीं होती-भले ही समाज आप पर इस बात पर विश्वास करने का दबाव डाले!

यह ब्लॉग उन महिलाओं के बारे में नहीं है, जो उस आयु में प्रवेश कर चुकी हैं जब वे माँ नहीं बन सकतीं और जो इस बात पर दुखी होती हैं कि अब उन्हें माँ बनने का अनुभव नहीं हो पाएगा। मैं उनका दर्द समझ सकता हूँ, मैं ऐसी बहुत सी महिलाओं से मिला हूँ और उनमें से कई मेरी व्यक्तिगत मित्र भी हैं। नहीं, यह ब्लॉग उन लोगों के बारे में है जो अपने ‘जीवन के लक्ष्य’ प्राप्त करते वक़्त बाहरी दबावों को तरजीह देते हैं, जबकि वे स्वयं अन्तर्मन से ‘जीवन के उन लक्ष्यों’ को उतना महत्वपूर्ण नहीं मानते!

यह ब्लॉग वृहत जनसमुदाय के लिए नहीं है और इसमें मैं बहुसंख्यक लोगों से मुखातिब भी नहीं हूँ बल्कि मैं कुछ थोड़े से लोगों से, अल्पसंख्यकों से, यह बात कह रहा हूँ। लेकिन, जो लोग इन थोड़े से लोगों में शामिल नहीं भी हैं, वे भी एक अलग नज़रिये को जान-समझ सकेंगे और हो सकता है कि ऐसे लोगों के प्रसंग में अपने रुख में परिवर्तन कर सकेंगे जिससे अंततः उन्हें भी आसानी होगी।

सामान्यीकरण करने की आज़ादी दें तो मैं कहना चाहता हूँ कि समाज यह समझता है कि जीवन में हर व्यक्ति को कुछ बातें हर हालत में करनी ही चाहिए या उन सामाजिक लक्ष्यों को हासिल करना ही चाहिए, जिससे लगे कि आपका जन्म सफल हुआ, या आप देश के एक महत्वपूर्ण और कर्तव्यपरायण नागरिक हैं या सिर्फ इसलिए कि समाज की अपेक्षाओं पर आप खरे उतरे। को आपसे अपेक्षा थी उसमें आप सफल हुए। पढ़ाई पूरी करें या कोई प्रशिक्षण प्राप्त करें, नौकरी करें, विवाह करें, बच्चे पैदा करें, अपना मकान बनवा लें। आप यह नोटिस करेंगे कि ये वही लक्ष्य हैं, जिन्हें पूरा करने के लिए लोग स्वयं अपने आप पर दबाव बनाते हैं। कुछ लोगों के लिए यही दबाव समाज बनाता है।

कुछ बातें बहुत से लोगों की नज़रों में बिल्कुल उचित नहीं होतीं। अलग-अलग देशों के लिए यह अनुचित लगने वाली बात अलग-अलग होती है। पश्चिमी महिलाओं के लिए यह पढ़ाई पूरी होने से पहले या कोई प्रशिक्षण लेने से पहले बच्चे पैदा करना या कोई प्रशिक्षण न लेने का निर्णय लेकर घरेलू महिला का जीवन गुजारना या, और इस पर आश्चर्य है, विवाह न करने का और बच्चे पैदा न करने का निर्णय लेते हुए सारा जीवन अपने पेशे और तरक्की के लिए न्योछावर कर देना हो सकता है। वहीं, भारतीय महिलाओं के लिए विवाह न करना, बच्चे पैदा करने से पहले कोई नौकरी कर लेना और नौकरी में तरक्की के पीछे भागने को अपना लक्ष्य बनाना या बच्चे पैदा न करने का निर्णय लेना ऐसी अनुचित बातें हो सकती हैं। जीवन के कई दूसरे क्षेत्रों के संदर्भ में भी इसके कई उदाहरण दिये जा सकते हैं-मुझे लगता है कि जो इस स्थिति से गुज़र रहे हैं, वे समझ रहे होंगे कि मैं क्या कहना चाहता हूँ।

अगर आप अपने लिए कोई ऐसा लक्ष्य निर्धारित करना चाहते हैं या कोई ऐसा काम करना चाहते हैं जो उस देश का आम रवैया या परंपरा नहीं है तो आपको अपने परिवेश से बहुत सी नकारात्मक प्रतिक्रियाएँ सुनने को मिल सकती हैं। इतना ही नहीं, इस अपारंपरिक लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए बार-बार आपको अपनी सोच और अपने निर्णय पर ही शक पैदा होता रहेगा। लेकिन अगर आपको लगता है कि आप सामान्य परम्पराओं के अनुसार नहीं चल सकते और आपको अपना अलग रास्ता मिल गया है और आप उस रास्ते पर चलते हुए प्रसन्न हैं-हालांकि यह इतना आसान नहीं होगा-अपने निर्णय पर अटल रहिए! ‘बहुमत’ को आपका तिरस्कार करने की इजाज़त मत दीजिए।

वही करें जो आप ठीक समझते हैं। जी हाँ, हो सकता है कि लोगों के तीखे ताने और आलोचनाएँ सुनने और सहने के लिए आपको कुछ अधिक साहस का परिचय देना पड़े। यह कभी-कभी आपको बहुत बेचैन भी कर सकता है लेकिन अपने इरादे और अपनी इच्छा के विपरीत आचरण करना आपके लिए उससे ज़्यादा बेचैन करने वाला हो सकता है।

आपका निर्णय कितना भी मूर्खतापूर्ण और अप्रिय क्यों न दिखाई दे, अपने दिल का कहा मानें। यही एकमात्र सही तरीका है जो आपको सुख और शांति प्रदान कर सकता है!

पूर्णकालिक स्कूल – क्या हम अपने बच्चों को रोबोट बना देना चाहते हैं? – 8 जुलाई 2013

जब हम जर्मनी में थे, मैंने कई लोगों से सुना कि वहां अब पूर्णकालिक स्कूल खुल गए हैं जो प्राथमिक कक्षाओं से ही शुरू हो जाएंगे। निश्चय ही ऐसे कदम उठाने वाला जर्मनी पहला देश नहीं है। अमरीका और फ्रांस जैसे कई दूसरे देशों में कई सालों से पूर्णकालिक विद्यालय हैं। जर्मनी के विभिन्न इलाकों में रहने वाले अपने मित्रों से बात करते हुए मेरे भीतर कई तरह के विचार आए, जिन्हें मैं क्रम से, आज और आगे आने वाले दिनों में आपके सामने रखूँगा। सबसे पहले तो मैं यही कहूँगा कि, "यह एक खौफनाक बात है!"

वास्तव में जब मैं सुनता हूँ कि एक सात साल का बच्चा सबेरे 8 बजे स्कूल जाता है और वहां देर शाम तक यानी पांच या छः बजे तक रहता है तो मुझे लगता है कि यह बच्चों के साथ किया जाने वाला भयंकरतम अत्याचार है। अपने बचपन को याद करता हूँ तो पाता हूँ कि हम लोग घंटों घरों की छतों पर खेला करते थे, नदी किनारे हुड़दंग मचाते थे या यूं ही सड़कों पर मटरगश्ती किया करते थे। आजकल के ये बच्चे इनमें से किसी भी बात का मज़ा नहीं ले सकते!

नए-नए खेल रचने में और नयी तरह से समय का उपयोग करने में वे हमारी पीढ़ी जैसी मौलिकता और रचनाशीलता विकसित करने में असमर्थ रहते हैं क्योंकि उनका पूरा वक़्त पूरी तरह व्यवस्थित और बंधा हुआ होता है। मैं जानता हूँ की पूर्णकालिक स्कूल का यह अर्थ नहीं होता कि सारा दिन वे अपनी कुर्सियों से चिपके रहते हैं। यह भी कि शिक्षक इस तरह से प्रशिक्षित होते हैं कि वे बच्चों के साथ रहते हैं; उनके साथ खेलते हैं, गीत-संगीत भी होता है और उन्हें पूरी तरह से मौज-मस्ती के साथ समय बिताने का मौका मिलता है। लेकिन फिर भी, यह एक तरह का ढांचाबद्ध (संरचनाबद्ध) और आयोजित कार्य होता है और सब एक ढर्रे पर चलता रहता है। उन्हें कहा जाता है कि आप अपनी रचनात्मकता का उपयोग करें लेकिन इसके बावजूद वह एक खास दिशा में निर्देशित काम होता है, उन्हें अपने मन से कुछ भी करने की स्वतन्त्रता नहीं होती।

इस तरह बच्चे बहुत जल्दी यह सीख जाते हैं कि कैसे वे इस व्यवस्था का हिस्सा बन जाएँ। कैसे सुचारु रूप से चल रहे मशीनी समाज का एक छोटा सा पुर्जा बन जाएँ और अपना काम व्यवस्था की अपेक्षाओं के अनुरूप करते रहें। सारा सप्ताह नियोजित होता है और सप्ताहांत में ही यह अवसर मिल पाता है जब वे अपने परिवार के साथ घर के वातावरण के साथ एकरूप हो सकें और आपस में संवाद कर सकें। पहले शिक्षा अभिभावकों की ज़िम्मेदारी भी हुआ करती था लेकिन अब बच्चे अपने शिक्षकों के साथ इतना समय गुजारते हैं कि यह पूरी तरह उन्हीं का काम हो जाता है। स्वाभाविक ही, कोई भी शिक्षक इतनी अधिक ज़िम्मेदारी अपने सिर लेने में आनाकानी करते हैं और बच्चों का नुकसान होता है!

मैं यह भी जानता हूँ कि कुछ दूसरे देशों में यह तरीका कई वर्षों से अपनाया जा रहा है। इन देशों के लोग बताते हैं कि यह तरीका अच्छी तरह से काम कर रहा है, बच्चे खुश हैं और वे काफी मौज-मस्ती करते हुए अपनी पढ़ाई पूरी करते हैं। लेकिन मैंने यह भी देखा है कि उन देशों में बच्चों को स्कूल में बहुत ज़्यादा दबाव सहन करना पड़ता है। यह हो सकता है कि आधे बच्चे इस व्यवस्था से तालमेल बना पाते होंगे, परिस्थितियों के अनुसार अपने आप को ढाल पाते होंगे। लेकिन मैं कई अभिभावकों से मिला हूँ जो अपने बच्चों के लिए बहुत चिंतित रहते हैं। स्कूल से आने के बाद वे इतनी बुरी तरह से थके हुए होते हैं कि न तो खेलना चाहते हैं न कोई दूसरा काम करना चाहते हैं। सिर्फ टीवी के सामने बैठ जाते हैं। उनमें ऊर्जा नहीं बचती और डॉक्टर के पास जाना एक रोज़मर्रा का काम बन जाता है और इसके लिए भी समय निकाल पाना मुश्किल होता है। इतने तनावों और दबावों से उनकी प्रसन्नता काफ़ूर हो जाती है वे अवसादग्रस्त और चिंताग्रस्त बने रहते है। वे ADHD से ग्रसित हो जाते हैं, जो मतिभ्रम से संबन्धित बीमारी है और जो पहले ही बच्चों में बहुतायत से पायी जाती है।

मेरी नज़र में बच्चे इस उम्र में वैसे भी बहुत दबाव में रहते हैं, उन पर और ज़्यादा दबाव डालना बिल्कुल उचित नहीं है। इस व्यवस्था में कक्षाएँ इतनी बड़ी हो जाती हैं कि हर बच्चे पर व्यक्तिगत ध्यान देना किसी भी शिक्षक के लिए संभव नहीं है। अभिभावकों के सामने भी इन बातों के लिए समय नहीं होता। बचपन, जिसे मौज मस्ती, खेल कूद, दौड़-भाग और दुनिया के आश्चर्यों की खोज के आनंद में व्यतीत होना चाहिए, विकास के कुछ मानदंडों को हासिल करने के चक्कर में, आयोजित, बंधे-बँधाये और बेहद उबाऊ सालों में बदल जाता है। फिर, वे जो इन लक्ष्यों को हासिल करने में कठिनाई महसूस करते हैं, पाते हैं कि वे अपने घनिष्ठ मित्रों के साथ ही एक अजीब सी कटु प्रतिस्पर्धा में उलझ गए हैं।

अब इस आपाधापी में प्रेम के लिए क्या स्थान हो सकता है?

कल और उसके बाद कुछ दिन, मैं इसी विषय पर कुछ और विस्तार के साथ अपने विचार प्रस्तुत करूंगा।