सेक्स, सेक्स और सेक्स – पश्चिम के विषय में भारत का विकृत नजरिया – 2 सितंबर 2015

पिछले दो दिन मैंने आपको समाचारों में देखी गई कुछ बातें बताईं: यूरोप आने वाले शरणार्थियों की समस्या और कैसे यूरोप के लोग उनका स्वागत कर रहे हैं और उनकी हरसंभव मदद भी कर रहे हैं। लेकिन इनमें से ज़्यादातर जानकारियाँ मुझे भारतीय मीडिया से प्राप्त नहीं हुई हैं बल्कि जर्मन और अंतर्राष्ट्रीय ऑनलाइन समाचारों के ज़रिए प्राप्त हुई हैं। यहाँ, भारत में हमें पश्चिम के समाचार मिलते तो हैं किन्तु उनके ऊपर वहाँ की चटपटी खबरें और कहानियाँ ज़्यादा होती हैं। मुझे लगता है पश्चिम और वहाँ के निवासियों को एक ख़ास, भ्रामक नज़रिए से देखने के भारतीय रवैए के पीछे इन्हीं चटपटी कहानियों का बहुत बड़ा हाथ होता है!

मैं इसे और स्पष्ट करता हूँ। मैंने कई बार आपसे कहा है कि पश्चिम के बारे में बहुत से भारतीयों का रवैया बड़ा हास्यास्पद होता है। उनका विश्वास होता है कि पश्चिम में ज़िन्दगी गुज़ारने का मतलब 'मुक्त यौन संस्कृति' में जीना है। यह परिभाषा अपने आप में हास्यास्पद है और जब दो अलग अलग व्यक्ति इन शब्दों का इस्तेमाल करते हैं तो दोनों के ही मन में इसके पूर्णतः अलग अलग अर्थ होते हैं!

हमारे अखबारों में अंतर्राष्ट्रीय समाचार वाले पृष्ठ पर सिर्फ राजनैतिक खबरें होती हैं: ओबामा के निर्णय, संयुक्त राष्ट्र और उसके कामकाज, ग्रीस को यूरोपियन यूनियन में बनाए रखने के लिए यूरोपीय देशों की जद्दोजहद, आदि, आदि। लेकिन सिर्फ इतना ही नहीं होता, हमें पश्चिमी जीवन शैली और फैशन के बारे में भी खूब पढ़ने को मिलता है!

अब यह मत कहने लगिएगा कि हॉलीवुड के बारे में भी बहुत कुछ होता होगा- हमारे पास बॉलीवुड है, इसलिए हमें ज़्यादा सितारों की, फिल्मों और गायकों की ज़रूरत नहीं पड़ती! फिर भी, कुछ चुनिंदा कहानियाँ तो होती ही हैं, जो निश्चित ही खासी बिकाऊ होती हैं: कुछ भी, सेक्स की चाशनी में पगा हुआ!

उदाहरण के लिए, जब एक ऑस्ट्रेलियन महिला जानवरों को प्रताड़ित करने के जुर्म में ब्रिटेन में गिरफ्तार हुई थी! सिर्फ क्रूरता के आरोप में नहीं! असल में पुलिस ने उसके घर पर छापा मारा और नशीली दवाएँ ढूँढ़ती रही और उसका मोबाइल फोन जब्त कर लिया- मगर किसी नशीले पदार्थ का कोई सुराग उन्हें नहीं मिला बल्कि एक वीडियो मिला, जिसमें वह अपने कुत्ते के साथ संभोगरत दिखाई गई थी मगर यहाँ के समाचार पत्रों में नशीले पदार्थ की नहीं बल्कि एक वीडियो मिलने की खबर की नमक-मिर्च लगाकर विस्तृत चर्चा की गई थी कि वीडियो में वह महिला अपने कुत्ते के साथ संभोगरत दिखाई गई है!

निश्चित ही, उस दिन ब्रिटेन से आने वाला सबसे मुख्य समाचार यही रहा होगा!

और किसी दूसरे दिन शायद यह देश भर की स्नातक परीक्षाओं के नतीजे आने के बाद लगभग 5500 युवा लड़के-लड़कियाँ स्कॉटलैंड के बीच पर खुशियाँ मना रहे थे। अलग-अलग कुछ समूहों में वे शराब पी रहे थे और अचानक दो समूहों के बीच मार-पीट होने लगी। जब पुलिस आई तो उन्होंने सिर्फ मार-पीट करने वाले शराबियों को ही गिरफ्तार नहीं किया बल्कि सड़क के किनारे संभोगरत दर्जनों युवा लड़के-लड़कियों को भी गिरफ्तार कर ले गए। और यहाँ के अखबारों का शीर्षक बना "बीच पर सेक्स"!

शायद आप समझ रहे होंगे कि इन बातों का रुख किधर होता है! उनमें इसके आगे कोई जानकारी नहीं होती और बाकी हमारी स्वैर कल्पनाओं पर छोड़ दिया जाता है! ऐसे समाचार हम अक्सर पढ़ते रहते हैं- इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि एक सामान्य भारतीय को पश्चिम के बारे में ऐसे मिथ्या विचार ही प्राप्त होते हैं! अगर आपको वहाँ जाकर कुछ समय बिताने का मौका नहीं मिला है या अगर आप वहाँ के अंग्रेजी टीवी नहीं देखते और अगर आपका पश्चिमी लोगों से कोई मिलना-जुलना नहीं है तो पूरी संभावना है कि आपके मन में पश्चिम के बारे में ऐसे विचार अक्स हो जाएँ: कि वहाँ सेक्स के अलावा विशेष कुछ नहीं होता और वहाँ हर जगह सेक्स ही सेक्स है!

कैसे सतत मार्गदर्शन बच्चों के विकास में बाधा पहुँचाता है – 11 अगस्त 2015

अपरा खेल रही थी और मैं और रमोना हमेशा की तरह बच्चों के लालन-पालन संबंधी विषयों पर चर्चा करने लगे कि कैसे आज जो आप बच्चों के साथ कर रहे हैं, उसका भविष्य में उन पर कितना गहरा असर पड़ता है। इस बार हमारी चर्चा इस ओर मुड़ गई कि बच्चों को यह निर्देश देने में कि वे क्या करें या न करें और उन्हें उनकी मर्ज़ी से कुछ भी करने की स्वतंत्रता देने के बीच क्या अंतर है।

मेरा विश्वास है कि दोनों के मध्य तालमेल बनाए रखने की ज़रूरत है लेकिन हम दोनों के दो भिन्न देशों और उनकी संस्कृतियों के बीच तुलना करते हुए हमने पाया कि दोनों ही परिस्थितियों में कई लोग अति कर देते हैं।

अगर आप भारतीय परिवारों में जाएँ तो कई बार आपको पता चलेगा कि घर में वयस्क सदस्य मौजूद हैं लेकिन वे बच्चों के साथ कोई चर्चा नहीं करते, उनके साथ विशेष मेलजोल नहीं रखते। माँ घर के कामकाज निपटा रही होती है, दूसरे सदस्य चर्चा कर रहे होते हैं और बच्चे अपनी मनमर्ज़ी से खेलकूद में लगे होते हैं या इधर-उधर मटरगश्ती कर रहे होते हैं। वे अपने खेल खुद चुनते हैं, उनके खिलौने उनके अपने हैं और कुल मिलाकर बिना किसी निर्देश के वे अपना पूरा समय बिताते हैं- वही तयशुदा खेल या अपवादस्वरूप कोई वयस्क उनके साथ खेलने वाला।

कभी-कभी, और खासकर अनपढ़ परिवारों में, इसके बड़े खतरनाक परिणाम निकलकर आते हैं! बच्चे अपने परिवेश की जाँच-परख करते हैं- परिवेश, जो आवश्यक नहीं कि बच्चों के लिए पूर्ण सुरक्षित हो- और गंभीर शारीरिक चोटें खा बैठते हैं। अगर कोई वयस्क उस समय उनके साथ होता या दूर से ही सही, सिर्फ उनकी ओर ध्यान दे रहा होता तो दुर्घटना टल सकती थी। संयुक्त परिवारों में भी, जहाँ काफी वयस्क और बुज़ुर्ग मौजूद होते हैं और जिनमें से कोई एक बच्चों का ध्यान रख सकता है, ऐसी दुर्घटनाएँ होती रहती हैं।

इसके विपरीत, पश्चिम में मैंने देखा है कि बच्चे हर वक़्त किसी न किसी की नज़र में होते हैं और अधिकतर किसी न किसी वयस्क के साथ मिलकर सक्रिय रूप से कुछ न कुछ कर रहे होते हैं। इससे किसी संभावित दुर्घटना की रोकथाम हो जाती है और वयस्क को भी बच्चे के अंदर छिपी प्रतिभा को जानने और उसे आगे विकसित करने का मौका मिल जाता है।

बहुत छोटी उम्र से ही वहाँ खेलने का बंधा-बंधाया समय होता है। वयस्क उनके खिलौने तैयार करके उन्हें देते हैं कि उन्हीं से खेलें और वे उनसे खेलते हैं और अभिभावक लगातार उन्हें बताते रहते हैं कि कैसे खेलना है या कैसे उनका इस्तेमाल करना है। फिर बच्चे किंडरगार्टेन और स्कूल में पढ़ने जाने लगते हैं, जहाँ सब कुछ बंधा-बंधाया ही होता है। स्कूल से लौटने के पश्चात वाद्ययंत्र सीखने की कक्षाएँ या खेल-कूद का नियत समय होता है और निश्चित ही होमवर्क तो करना ही करना होता है। हर बात के स्पष्ट निर्देश होते हैं कि कब, कैसे और किस क्रम में उन्हें किया जाना है। यहाँ तक कि दोस्तों के साथ खेलने के नियत दिनों में भी मैंने देखा है कि अभिभावक बच्चों को क्या खेलना चाहिए, यह बताना आवश्यक समझते हैं।

बहुत ज़्यादा मार्गदर्शन के साथ मैं जो समस्या देखता हूँ वह यह है कि उससे बच्चे दूसरों के कहे अनुसार काम करने के इतने आदी हो जाते हैं कि वे यह भी नहीं जान पाते कि वास्तव में वे खुद क्या करना चाहते हैं! खास कर परंपरागत शिक्षा विधियों और सख्त लालन-पालन के तरीकों के चलते उन्हें खुद कुछ करके देखने और खोज-बीन करते हुए आगे बढ़ने की कोई प्रेरणा या प्रोत्साहन नहीं मिल पाता! वे गिरते नहीं हैं या गिर नहीं सकते और इसलिए जानते ही नहीं हैं कि गिरने पर चोट लगती है। उन्हें खुद निर्णय लेने का मौका ही नहीं मिल पाता। और फिर वे यह भी समझ नहीं पाते कि वास्तव में वे क्या करना चाहते हैं!

ऐसी हालत में हम बड़ी तादात में ऐसे युवाओं को देखते हैं, जो वास्तव में यह भी नहीं जानते कि अपने समय का क्या सदुपयोग किया जाए। वे स्कूल से पढ़कर निकले हुए युवा बच्चे होते हैं, जो अब भी मार्गदर्शन के लिए अभिभावकों का मुँह जोहते हैं कि वे बताएँ कि नौकरी के लिए कहाँ आवेदन किया जाना ठीक होगा या किसी शिक्षक का, जो यह बताए कि अपने जीवन का आगे क्या किया जाना चाहिए। उन्हें बताई गई बातों का ही वे अनुसरण करते हैं क्योंकि वे उसी में आसानी महसूस करते हैं।

मुझे लगता है कि हमें बच्चों को स्वतन्त्रता पूर्वक अपनी मर्ज़ी से विकसित होने की आज़ादी देनी चाहिए। उनका मार्गदर्शन बहुत सहजता के साथ किया जाना चाहिए कि वे सीखें अवश्य लेकिन उनके लिए इतना मौका भी छोड़ना चाहिए कि वे समझ सकें कि वे क्या सीखना चाहते हैं! हमें उनकी सुरक्षा का खयाल अवश्य रखना चाहिए मगर इस तरह कि बिना किसी व्यवधान के वे खुद अपने अनुभव प्राप्त कर सकें।

लोगों के जीवन पर धर्म और ईश्वर का प्रभाव – भारत और पश्चिमी देशों के बीच तुलना – 3 अगस्त 2015

पिछले सप्ताह मैं नास्तिकता के विषय पर काफी विस्तार से लिखता रहा हूँ और निश्चित ही अभी भी इस विषय पर मेरे मन में अनेकानेक विचार, अवधारणाएँ और कल्पनाएँ हैं, जिन्हें मैं आपके साथ साझा करना चाहता हूँ। लेकिन इस समय मुझे अपने पश्चिमी पाठकों का भी विचार करना चाहिए। मैं जानता हूँ कि वहाँ बहुत से लोगों के लिए इस बात का वास्तव में कोई महत्व नहीं है कि ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं। और दरअसल यही बात मैं अपने भारतीय मित्रों के साथ साझा करना चाहता हूँ और यह करते हुए पश्चिमी मित्रों को भी सहज ही यह पता चल जाएगा कि क्यों भारत में यह विषय इतना विस्फोटक है!

वास्तव में इसका संबंध संस्कृतियों के बीच मौजूद अंतर से है: पश्चिम में मेरे बहुत से मित्र हैं, जिनके बारे में ठीक तरह से मैं भी नहीं जानता कि वे ईश्वर पर आस्था रखते हैं या नहीं। भारत में यह तुरंत पता चल जाता है। पश्चिम में मेरे बहुत से मित्र हैं, जो किसी न किसी धर्म का, ज़्यादातर ईसाईयत का, अनुसरण करने वाले हो सकते हैं- लेकिन इसके बावजूद, अधिकांश विषयों पर हमारे विचार एक समान ही हैं! यह एक ऐसी बात है, जो भारत में सहज संभव नहीं है।

यह एक तथ्य है कि पश्चिम में बहुत बड़ी संख्या में लोगों के लिए धर्म और ईश्वर का विशेष महत्व नहीं है। वे एक विशिष्ट धार्मिक घेरे के भीतर रहकर बड़े होते हैं, बप्तिस्मा करवाते हैं, यौवन के ईसाई पुष्टिकरण कर्मकांड आयोजित करते हैं और फिर चर्च में जाकर शादी भी करते हैं। संभव है, वे क्रिसमस और ईस्टर के दिन चर्च भी जाते हों। लेकिन उसके बाद उनके सामान्य जीवन में धर्म की कोई दखलंदाज़ी नही होती, अक्सर वे धर्म और ईश्वर के विषय में बात करना भी पसंद नहीं करते। दैनिक जीवन में वे ईश्वर का विचार तक मन में नहीं लाते, भले ही उनके प्रति उनका बुनियादी रवैया कुछ भी हो।

इसलिए जब दो ऐसे लोग आपस में मिलते हैं तो उनके बीच उनकी आस्थाओं का व्यवधान नहीं होता। वे इसकी कतई परवाह नहीं करते कि सामने वाला ईश्वर पर विश्वास रखता है या नहीं क्योंकि वे नहीं समझते कि इसका ज़रा सा भी महत्व है। परिवार में अगर उनका लड़का कहे कि वह भविष्य में चर्च नहीं जाना चाहता या अपना विवाह चर्च में नहीं बल्कि कोर्ट में पंजीकृत करवाना चाहता है तो माता-पिता आसानी से उसकी बात मान लेते हैं। इसी तरह कोई लड़की क्रिसमस के दिन चर्च चली जाएगी, भले ही वहाँ के पादरी की कही बातों पर उसका एक रत्ती भरोसा न हो।

भारत में मामला बहुत अलग है। यहाँ आस्थाओं के प्रश्न परिवारों को जुदा कर देते हैं! दैनिक जीवन में आस्था बहुत बड़ी भूमिका अदा करती है और जितना अधिक आपके आसपास के लोग धार्मिक और परम्परावादी होंगे उतना ही आपका बचपन धार्मिक त्योहारों, समारोहों, रस्म-रिवाजों और कर्मकांडों के बीच गुज़रेगा। कुछ नियत दिन या सप्ताह होंगे जब उपवास रखना होगा, कुछ अवसरों पर मन्दिर जाना ज़रूरी होगा तो कुछ दिन आप मन्दिर नहीं जाएँगे। दूसरों की धार्मिक भावनाएँ न दुःखें या देवता अप्रसन्न न हो जाएँ इसलिए कुछ अवसरों पर धारण किए जाने वस्त्रों के बारे में आपको कुछ नियम याद रखने होंगे और यह भी कि किन भावभंगिमाओं या मुद्राओं और शब्दों का उपयोग करना है और किनका नहीं करना है। यहाँ इस बात पर लोगों की बहुत गहरी आस्था होती है कि आपका अच्छा-बुरा इन सब बातों पर निर्भर होता है!

इसलिए जब बेटा घोषणा करता है कि वह ईश्वर पर विश्वास नहीं रखता तो अभिभावक चिंताग्रस्त हो जाते हैं, गुस्सा होते हैं, उन्हें समझ नहीं आता कि अब क्या किया जाए। यार-दोस्त समझ नहीं पाते और सामान्य दैनिक कार्यकलापों पर विराम सा लग जाता है क्योंकि कोई भी अंतहीन वाद-विवाद, तनातनी और झगड़े नहीं चाहता! उनकी पुरानी जीवन-चर्या समाप्त हो जाती है, अपने परिवेश से कटकर वे पूरी तरह अलग, कोई नई सामाजिक मंडली खोजने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

इसीलिए यहाँ यह चर्चा बहुत महत्वपूर्ण है। यह आपके दैनिक जीवन के बारे में है, सिर्फ सालाना दो छुट्टियों के बारे में ही नहीं। आपके रवैये और नज़रिए की जड़ कहाँ है, इस बारे में है। और इसलिए मुझे हमेशा लगता रहा है कि मैं इस विषय में पहल करूँ, बातचीत करूँ- क्योंकि आम तौर पर लोग इस विषय में चर्चा करते हुए घबराते हैं!

मैं खुद एक धार्मिक और आस्तिक से नास्तिक हुआ हूँ। मुझे महसूस हुआ है कि उसके बाद मेरे बहुत से भारतीय मित्र मुझसे दूर हो गए, यहाँ तक कि दोस्ती तोड़ ली। लेकिन मेरे पश्चिमी मित्रों के साथ मुझे यह अनुभव नहीं झेलना पड़ा- ज़्यादातर लोगों के साथ मुझे लगता रहा कि इससे उन्हें कोई मतलब ही नहीं है! इसे इस तरह समझिए कि आस्था से ज़्यादा उनके लिए व्यक्ति का महत्व था!

मैं पहले कह चुका हूँ कि ज़्यादा से ज़्यादा नास्तिक होंगे तो दुनिया बेहतर जगह हो जाएगी। इसका संबंध इस बात से नहीं है कि आप ईश्वर को मानते हैं या नहीं। और इसीलिए यह बात दुनिया के लिए इतनी आवश्यक है! लेकिन उस विषय में आगे चर्चा कल!

पश्चिम में बसने जा रहे भारतीयों के लिए कुछ और टिप्स – 9 जुलाई 2015

पश्चिमी महिलाओं और भारतीय पुरुषों के बीच होने वाले संबंधों पर पिछले तीन हफ्ते लिखने के बाद मुझे लगता है, इस श्रृंखला में यह मेरा अंतिम ब्लॉग होगा। जब मैंने इस पर लिखना शुरू किया था तब मुझे पता नहीं था के मेरे पास इतना कुछ लिखने को है हालांकि मन के किसी कोने में पहले से यह एहसास भी था कि इस विषय में लोगों की इतनी दिलचस्पी अवश्य होगी कि वे इस बारे में पढ़ना चाहेंगे। मैं बहुत से लोगों को जानता हूँ जो इन ब्लॉगों में वर्णित स्थितियों से दो-चार हो चुके हैं और स्वाभाविक ही ये ब्लॉग लिखते हुए मैंने अपने निजी अनुभवों का उपयोग भी किया है। आज मैं बचे हुए कुछ विचारों को, जो अब तक वर्णित स्थितियों में कहीं फिट नहीं होते, लिखकर इस श्रृंखला को विराम दूँगा।

समस्या बन सकने वाला एक विषय है, शाकाहार! अगर आप शाकाहारी हैं तो कुछ देशों में रेस्तराँ में जाना मुश्किल पैदा कर सकता है। पिछले कुछ सालों में शाकाहारियों के लिए स्थितियाँ बहुत बेहतर हुई हैं लेकिन अगर किसी जगह बैरा आपसे कहे कि शाकाहार के नाम पर सिर्फ टमाटर सूप या हरा सलाद ही उपलब्ध है तो हैरान न हों क्योंकि यह इस बात पर निर्भर है कि आप किस देश में हैं और उस देश के छोटे-मोटे कस्बे में हैं या किसी बड़े शहर में! सिर्फ सब्ज़ी-चावल की माँग करने पर बैरा बुरा मान सकता है और संभव है आपकी ओर अविश्वास से देखे और कहे, चावल में से मांस के टुकड़े निकाल देता हूँ, खा लीजिए!

और, हालांकि कई जगहों पर भारतीय रेस्तराँ हैं लेकिन उनमें एक भी ऐसा नहीं मिलेगा जो आपको वास्तव में शुद्ध भारतीय खाना खिला सके, घर का आस्वाद दिला सके! ज़रूरी नहीं कि यह उनका दोष हो- आखिर है तो वह भी रेस्तराँ ही, आपकी माँ की रसोई नहीं। वहाँ आयातित सामग्रियाँ मिलाई जाती हैं, जो स्वाभाविक ही, वैसी ताज़ी नहीं हो सकतीं जैसी भारत में आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं। या फिर स्थानीय रूप से उत्पादित होती हैं, जिनका स्वाद स्वाभाविक ही बहुत अलग होगा। सबसे बड़ी बात, ये रेस्तराँ इतने ज़्यादा महंगे होते हैं कि वहाँ आप नियमित रूप से खाना नहीं खा सकते। तो मेरी आपको यही सलाह होगी कि माँ से खाना बनाना सीखकर यहाँ आइए और भारत से थोड़े-बहुत मसाले लेकर अपने नए देश में बसिए- बस आपका काम चल जाएगा!

लेकिन आपको स्थानीय भोजन चखने का मौका भी खूब मिलेगा और शायद उसका स्वाद भी आपकी ज़बान पर चढ़ जाए। कुछ देशों में, आपको आश्चर्य होगा कि लोग कितनी ज़्यादा ब्रेड खाते हैं- उदाहरण के लिए, रोज़ नाश्ते में ब्रेड के अलावा कुछ नहीं! मैंने देखा है कि जर्मन लोगों के यहाँ नाश्ते में तरह-तरह की ब्रेडें देखकर भारतीय लोग किस तरह स्तब्ध रह जाते हैं- ब्रेड और जैम, ब्रेड और चीज़, ब्रेड और ब्रेड-स्प्रेड! लेकिन जब आप जर्मन ब्रेडें खाकर देखेंगे तब आपको समझ में आएगा कि सबका स्वाद काफी अलग होता है और सभी एक से बढ़कर एक स्वादिष्ट होती हैं। और तब हाथ से रोटी बनाना छोड़कर आप शायद खुद भी अपने भोजन में उन्हें शामिल करने का विचार करें!

मुझे आशा है कि मैं आपके सामने कुछ सकारात्मक विचार और टिप्स रख सका। अंतर-सांस्कृतिक संबंधों में बंधे सभी व्यक्तियों को मैं अपनी शुभकामनाएँ अर्पित करना चाहता हूँ-चाहे आपने कोई भी निर्णय लिया हो, किसी भी देश में बसने का इरादा किया हो या चाहे आप किसी भी समस्या से दो-चार हो रहे हों!

और हाँ, पश्चिम में बसने जा रहे भारतीय साथियों के लिए एक अंतिम बात और: अगर आप कार चला रहे हों और कोई पुलिस वाला आपको रोकता है तो उसे रिश्वत देने की कोशिश कभी न करें… इसके नतीजे में आपको जीवन की सबसे बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है!

जब भारतीय पश्चिमी मुल्कों में खरीदारी करना सीखते हैं – 8 जुलाई 2015

परसों मैंने बताया था कि एक भारतीय पुरुष को, जो अपनी पत्नी या गर्लफ्रेंड के साथ पश्चिमी देश में रह रहा है, जल्द से जल्द पश्चिमी व्यक्तिवाद का आदी हो जाना चाहिए। कल मैंने बताया कि पश्चिम में कैसे उन्हें अपने काम खुद करने की आदत भी डालनी होगी और एक प्रकार से आज़ाद होना होगा। आज़ादी की इसी कल्पना को और विस्तार देते हुए आज मैं एक और पहलू पर विस्तृत चर्चा करना चाहता हूँ: खरीदारी का अनुभव!

हर वह व्यक्ति जो भारत और पश्चिम, दोनों जगह रह चुका है, तुरंत समझ जाएगा कि मैं क्या कहना चाहता हूँ। जबकि बड़ी-बड़ी दुकानों और बड़ी-बड़ी कंपनियों के नामचीन ब्रांडों के शोरूमों वाले माल भारत के हर भाग में बड़े पैमाने पर धावा बोल चुके हैं मगर वे सिर्फ बड़े शहरों तक ही महदूद हैं और देश के अधिकांश ग्रामीण और कस्बाई इलाके माल संस्कृति से अभी अछूते ही हैं। भारत में सब्ज़ियाँ हाटों में बिकती हैं और दूसरी ज़रुरत की चीजें तुलनात्मक रूप से छोटी दुकानों से खरीदी जाती हैं, जहाँ ज़्यादातर एक ही तरह की कुछ चीजें ही प्राप्त की जा सकती हैं। आप उन्हीं दुकानों का रुख करते हैं, जहाँ आपकी इच्छित वस्तु बेची जाती है।

और अब आप पश्चिम में हैं और आपको पता चलता है कि आपके शहर में कोई दैनिक हाट नहीं लगता! हफ्ते में एक या दो बार आप हाट और उसमें बिकने आई ताज़ा सब्जियों को देख पाते हैं। बाकी दिन? ज़्यादातर लोग उन्हें सुपरमार्केट से खरीदते हैं! सुपरमार्केट, जहाँ हर चीज़, उसके आकार-प्रकार की सीमा में, एक ही छत के नीचे मिल जाती है! किराने का सामान या साफ-सफाई का सामान ही नहीं बल्कि कपड़े, बरतन, और यहाँ तक कि कई बार वाशिंग मशीन और मोटर साइकल तक!

इसलिए अब आप एक ऐसी जगह खड़े हैं जो दुनिया भर के साज़ो सामान से अटी पड़ी एक बहुत विशाल जगह है और आपको सूझ नहीं पड़ता कि कहाँ से शुरू किया जाए। आप सूखे चने ढूँढ़ रहे हैं। डिब्बाबंद चने नहीं बल्कि वे चने, जिन्हें घर जाकर आप खुद खूब नरम होने तक पकाएँगे। प्रश्न है, वे कहाँ मिलेंगे? क्या आपको याद आया, मैंने किस शब्द का प्रयोग किया था: आज़ादी! वही शब्द फिर सामने है: काफी हद तक स्वयं आपको कुछ करना होगा। मैंने आपको बताया था कि पश्चिमी देशों में श्रम बहुत महंगा है और यहाँ यही बात पुनः एक बार प्रकट है। भारत के विपरीत, जहाँ किसी भी सामान्य दुकान में एक ग्राहक पर तीन-तीन सेल्समैन होते हैं, यहाँ आप पचास ग्राहकों पर एक कर्मचारी की कल्पना कर सकते हैं! तो इस तरह आपके सामने यह सारा सरंजाम खड़ा किया गया है कि आपको वहाँ चने खरीदना है तो खुद ढूँढ़कर ले जाएँ-तो जाइए, आज़ादी के साथ घूमिए और चने कहाँ हैं, खोज निकालिए!

निर्देश-पटलों को पढ़िए, गलियारों में घूमिए और सूखे अनाजों, दालों और चावल के पैकेट्स वाले खंड की तलाश कीजिए। आँखें खुली रखिए, लेबलों को पढ़िए, कीमतों की जाँच कीजिए, दूसरी कंपनियों के उत्पादों से तुलना कीजिए और फिर उनमें से अपने पसंद की इच्छित वस्तु चुनिए। सामान को शॉपिंग कार्ट पर रखिए और स्वयं उसे धकियाते हुए कैश काउंटर तक ले जाइए, पैकेट खोलकर बेल्ट पर रखिए, पैसे चुकाइए- सब कुछ खुद, अपने हाथों से! कोई मोलभाव नहीं, कुछ नहीं, सिर्फ पूर्वघोषित डिस्काउंट! इसके अलावा, अधिकतर देशों में स्कैनिंग के बाद सामान भी आपको खुद पैक करना पड़ता है। और अगर आप कार से आए हैं तो कार तक सामान भी आपको ही ढोकर ले जाना होगा!

आज़ादी!

लगभग कुछ भी आप खरीदें, आपको यही सब करना है। दुकानों पर उनके यहाँ बिकने वाली वस्तुओं के बड़े-बड़े सूचना पट्ट लगे होते हैं, जिनमें से आप मनचाही वस्तु चुन सकते हैं, चाहे वे कपड़े या जूतों जैसी कोई चीज़ ही क्यों न हों। निश्चय ही कर्मचारी होते हैं, जिनसे आप, अगर आपको अपने नाप की चीज़ न मिल रही हो तो किसी दूसरे नाप का कपड़ा या जूता मांग सकते हैं लेकिन कभी-कभी आपको कर्मचारी ढूँढ़ने में भी काफी वक़्त लग सकता है!

जी हाँ, मैंने आपको यह तो बताया ही नहीं कि फर्नीचर, रसोई और बाथरूम के बड़े और टेढ़े-मेढ़े, उल्टे-सीधे सामानों के साथ भी आपको यही स्वतंत्रता प्राप्त है! वाकई आप ये सभी वस्तुएँ विशाल फर्नीचर की दुकानों में खरीद सकते हैं, जैसे एक है IKEA, और उन्हें ढोकर घर ला सकते हैं और खुद ही मज़े में बैठकर और जोड़-जाड़कर उन्हें घर की शोभा बना सकते हैं! क्यों, है न मज़ा! अधिक से अधिक काम खुद अपने दो हाथों से करने की स्वतंत्रता का सुख! अब उस आनंद का अनुमान लगाइए जब आपको खुद ही आरी, हथौड़ा और स्क्रू ड्राईवर लेकर उन्हें जोड़ना होगा और आपको याद आएगा कि भारत में आपने इन्हें हाथ तक नहीं लगाया क्योंकि बढ़ई आकर सब कुछ सस्ते में कर देता था!

तो जब भी आप इन दुकानों के गलियारों में विदेशी भाषाओं में लिखे अक्षरों को बाँचने और सोचने में गुम होने लगें कि इनका क्या अर्थ है या जब आपको अपने 'D' नाप के छेद के लिए 'C' नाप का स्क्रू न मिल रहा हो तो अपनी नई नवेली पत्नी को या अपने साथी को तुरंत मदद के लिए पुकारिए क्योंकि वही एकमात्र विश्वसनीय मददगार आपको वहाँ तत्पर मिलेगा!

एक छोटी सी टिप और! जब आपको लगे कि यह आपकी कूवत से कुछ ज़्यादा हो रहा है तो घबराइए नहीं, पश्चिम में भी भारत की तरह छोटी दुकानें भी होती हैं। ये दुकानें आम तौर पर शहर के बीचोंबीच या बस्तियों में होती हैं और कुछ महंगी होती हैं। लेकिन वहाँ आपको बेहतर सेवा उपलब्ध हो जाती है और वस्तुओं की गुणवत्ता भी बेहतर होती है! ऑर्गेनिक खाद्य पदार्थों पर कुछ ज़्यादा पैसे खर्चिए, मज़े में दुकानदार से बातचीत कीजिए क्योंकि उसे अक्सर अपने सामान की बेहतर जानकारी होती है और जान लीजिए कि निश्चित ही इन दुकानों से सामान खरीदकर स्वास्थ्य के लिहाज़ से आप बेहतर दुकान का चुनाव कर रहे होंगे! अगर आप आर्थिक रूप इतना सक्षम हैं तो आपको यही करना चाहिए-यह विशाल कॉर्पोरेशनों के मुकाबले एक तरह से स्थानीय छोटे दुकानदारों का समर्थन और सहयोग होगा!

आइए, अकस्मात् मिली इस स्वतंत्रता का भरपूर आस्वाद लें!

पश्चिम में बसना – मतलब वास्तविक रूप से स्वतंत्र होना – 7 जुलाई 2015

कल मैंने अपने उन देशवासियों को, जो अपनी पश्चिमी पत्नियों या गर्लफ्रेंड के साथ पश्चिमी देशों में बसना चाहते हैं, बताया था कि पश्चिमी व्यक्तिवाद और उससे जुड़ी नीरवता का आदी होने में समय लगता है। मैंने यह भी बताया था कि वहाँ अभिभावकों का अपने बच्चों को स्वतन्त्रता का पाठ पढ़ाना सहज-स्वाभाविक बात है। यह सिर्फ एक परंपरा ही नहीं है- अगर आप पश्चिम में रहना चाहते हैं तो आपको वास्तव में स्वतंत्र होना होगा।

यदि मैं ‘स्वतंत्र’ शब्द का इस्तेमाल बिना किसी संदर्भ के करूँ और उसका तात्पर्य स्पष्ट न करूँ तो वह बड़ा भ्रामक सिद्ध होगा। दरअसल मेरा मतलब सिर्फ आर्थिक स्वतन्त्रता से नहीं है- क्योंकि आर्थिक मदद के लिए आपके पीछे कोई हो भी सकता है और नहीं भी। जी नहीं, यह वास्तव में उन सभी बातों के लिए है, जिन्हें भारत में एक संयुक्त परिवार में रहते हुए आपको करने की आवश्यकता अक्सर नहीं पड़ती क्योंकि वहाँ उन कामों को करने के लिए बहुत सी महिलाएँ उपलब्ध होती हैं।

जी हाँ, पूरी संभावना है कि पश्चिम में अपने प्रारम्भिक महीनों में ही आप बहुत सी नयी चीज़ें सीख लेंगे! क्या आपको खाना बनाना आता है? नहीं? मेरे विचार से आपकी महिला मित्र पूरे समय रसोई में रहना पसंद न करे। वह आपके साथ एक समझौता करने पर राज़ी हो सकती है-आप बर्तन माँज लें! आपने वह भी कभी नहीं किया? खाना बनाने के मुक़ाबले बरतन माँजना कहीं आसान है! क्या आप अपने कपड़े धो सकते हैं? चलिए, बहुत अच्छा! अब आप वॉशिंग मशीन का इस्तेमाल करना सीखें, शायद ड्रायर और प्रेस का इस्तेमाल भी और किस फ़ैब्रिक-सॉफ्टनर का इस्तेमाल करना है, और अपनी पसंदीदा शर्ट से जिद्दी दाग कैसे निकालने हैं, यह भी! वैक्यूम-क्लीनर का इस्तेमाल शायद आपने कभी न किया हो और शायद आप खुद टॉयलेट साफ करने के भी आदी न हों?

विशेष रूप से सबसे आखिरी कार्य बहुत से भारतीयों के लिए सबसे दुष्कर होगा- पर यह काम भी करना तो है ही! जब आप अपनी पश्चिमी पत्नी या महिला मित्र के साथ अकेले रहने लगेंगे तो संभवतः ये सभी काम वह अकेले करे, इस बात पर वह कभी सहमत नहीं होगी- विशेष रूप से तब, जब घर का खर्च आप दोनों की सम्मिलित आमदनी से चल रहा हो! इसका मतलब यह है कि घर में निकलने वाले दैनिक कार्यों को भी आप दोनों को आपस में मिल-बाँटकर निपटाना होगा!

अब यदि आप यह सोच रहे हैं, ‘कोई दिक्कत नहीं, मैं पैसे देकर किसी से ये काम करवा लूँगा!’, तो मैं यह याद दिलाना चाहता हूँ कि अब आप भारत में नहीं रहते। भारत में कई लोग मिल जाएँगे, जो थोड़े पैसों में आपका कोई भी काम कर सकते हैं– क्योंकि बेरोजगारी के चलते वहाँ श्रमिकों की संख्या बहुत अधिक है और जीवन निर्वाह का खर्च बहुत अधिक नहीं है। पश्चिम में श्रमिक आसानी से नहीं मिलते, इसलिए जो मिलते हैं, बहुत महंगे होते हैं! सफाई का काम करने वाली महिला भी यहीं, इसी महंगे देश में रहना चाहती है- और आपको अपने वेतन में से पैसे निकालकर उन पर खर्च करने पड़ेंगे, जब कि उन्हीं पैसों से आपको सब्ज़ी-भाजी, कपड़े और दूसरी बहुत सी चीज़ें खरीदनी हैं, जिन्हें आप भारतीय मूल्यों की तुलना में शायद ज़रूरत से ज़्यादा महंगा पाएँगे!

मेरा दावा है कि अगर आपके पास ज़रूरत से ज़्यादा पैसा नहीं है तो आप खुद ही खाना पकाना और सफाई करना सीख लेंगे। और निश्चिंत रहें- यह उतना कठिन नहीं है, जितना आप सोच रहे हैं! 🙂

ऐसे और भी कई विषय हैं, जो आपके लिए नए और अलग होंगे और आगामी दिनों में मैं उनके बारे में और विस्तार से लिखूँगा।

भारतीय पुरुषों, अगर आप अपनी पश्चिमी साथी के साथ विदेश में बसने का मन बना रहे हैं तो कृपया इसे अवश्य पढ़ें – 6 जुलाई 2015

भारतीय पति या साथी के साथ भारत में बसने आई पश्चिमी महिलाओं के सामने आने वाली समस्याओं और चुनौतियों के बारे में लिखने के बाद आज और शायद अगले कुछ दिनों तक मैं बाज़ी पलटकर उन भारतीय पुरुषों के बारे में लिखूँगा, जो अपनी पश्चिमी पत्नियों या साथी के साथ पश्चिम में बसना चाहते हैं। अपने संबंधों में सामंजस्य पैदा करने के अलावा भी बहुत कुछ बाकी रह जाता है! और एक बहुत बड़ी बात होती है संयुक्त परिवार में सारा जीवन बिताने के बाद अचानक आप अपने आपको ऐसे समाज में पाते हैं, जहाँ वैयक्तिकता का बोलबाला है। पश्चिम में मैं जहाँ भी गया हूँ मैंने इसे सामान्य रूप से हर जगह मौजूद पाया है।

पहली बात- आप यह मानकर चलिए कि आप अपने साथी के माता-पिता या किसी दूसरे परिवार वाले के साथ रहने नहीं जा रहे हैं। अगर आपने इसके बारे में पहले सुन नहीं रखा है तो आपको यह बड़ा अजीब सा लग सकता है लेकिन 18 या 20 साल की उम्र में घर से बाहर निकल पड़ना पश्चिम में सामान्य सी बात है। इसलिए नहीं कि उनके घर में कोई समस्या है या उनकी आपस में पटती नहीं है- बल्कि यही वहाँ का रिवाज है। और जबकि भारत में भी युवक दूसरे शहरों में पढ़ने जाते हैं लेकिन वे सामान्यतया घर वापस लौट आते हैं, जिससे जहाँ तक हो सके, अपने माता-पिता और संयुक्त परिवार के साथ रह सकें।

पश्चिम में बिल्कुल शुरू से ही बच्चों को अपना काम भरसक खुद करने का प्रशिक्षण दिया जाता है। यह एक तरह का व्यक्तिवाद है, 'मेरा' 'तुम्हारा' वाली सोच, जो कभी-कभी आपको बड़ा अजीब और औपचारिक लग सकती है। अधिकतर भारतीयों को यह एकाकी लगता है।

एक ऐसे व्यक्ति के रूप में, जो अपने भाई-बहनों, चाचा-चाचियों और दादा-दादी के साथ रहकर बड़ा हुआ है, अचानक एक खाली फ्लैट में पहुँचना बड़ा आश्चर्यजनक अनुभव हो सकता है। न बच्चों की खिलखिलाहटें, न परिवार के सदस्यों की शोरभरी बातचीत, न रसोई में बर्तनों का खड़कना! पूरे घर में ज़्यादा से ज़्यादा आपके एकमात्र साथी का स्वर- वह कितना हो सकता है? खैर, भारत में हर जगह मौजूद शोर की तुलना में पश्चिमी दुनिया के अधिकतर भागों में बेहद कम शोर होता है- लेकिन अपने घर में आप इस कमी को सबसे अधिक महसूस करते हैं। इस तथ्य का, कि घर में बस आप दो प्राणी ही हैं, आपको बहुत जल्दी आदी होना पड़ेगा या फिर तुरत-फुरत एक बच्चे के बारे में निर्णय लेना होगा!

इसके अलावा आपको यह भी समझना होगा कि इसका अर्थ है, पारिवारिक लोग भी आपस में उतने निकट नहीं होते जितने भारत में होते हैं। सामान्यतया वे भारतीयों जैसे जबरदस्त रूप से भावुक नहीं होते! भारत में परंपरागत रूप से पत्नी के घर में दामाद का स्वागत किसी राजकुमार की तरह किया जाता है। अगर आप अपने ससुर के यहाँ ऐसे किसी स्वागत की अपेक्षा कर रहे हैं तो, माफ़ कीजिए, वहाँ आपको बुरी तरह निराश होना पड़ेगा- सिर्फ इसलिए कि वे उतने भावुक नहीं होते कि भारत की तरह अपने रिश्तेदारों की आमद को किसी बड़े त्यौहार की तरह समारोह पूर्वक मनाएँ!

निश्चय ही, परिवार के सदस्यों के बीच आपसी प्रेम भी होता है और अलग-अलग परिवारों में आपसी निकटता की मात्रा ज़्यादा या कम हो सकती है। कहा जाना चाहिए कि यह संबंधित लोगों के अलग-अलग स्वभावों पर निर्भर करता है।

लेकिन अगर आप अकेलापन महसूस करने लगें तो हमेशा इस बात का स्मरण करें कि आप यहाँ, इस अजनबी मुल्क में क्यों आए हैं- उसके साथ जीवन बिताने के लिए, जिससे आप सबसे अधिक प्यार करते हैं! इसलिए उठिए और अच्छे विचार मन में लाइए और साथी के साथ अपने संबंधों पर मन को एकाग्र कीजिए! या इस बात का आनंद लीजिए कि अब आप एक भिन्न देश और भिन्न सांस्कृतिक वातावरण में जीवन बिता रहे हैं! इस पहलू पर मैं अधिक विस्तार से कल लिखूँगा।

भारतीय पुरुषों: जब आपकी पश्चिमी पत्नी अपने मर्द दोस्त का आलिंगन करती है तो क्या आप विचलित हो जाते हैं? 25 जून 2015

कल मैंने पश्चिमी महिलाओं के साथ संबंधों में मुब्तिला भारतीय पुरुषों को संबोधित करते हुए लिखा था कि पूरी संभावना है कि उनकी जीवन साथी भारतीय पत्नियों की तुलना में बहुत अधिक आज़ाद और खुदमुख्तार हो। अगर आप ऐसे संबंध में बंधे हैं तो ध्यान रखें कि आप भय के कारण अपनी पश्चिमी पत्नी पर ऐसी कोई पाबंदी न लगाएँ, या आपका परंपरागत सांस्कृतिक नज़रिया हो, जो कहता है कि 'महिलाओं को यह नहीं करना चाहिए या वह नहीं करना चाहिए'। यही बात एक और स्थिति पर भी लागू होती है, जिसके चलते दोनों के बीच अच्छा-खासा बखेड़ा खड़ा हो सकता है: पुरुषों के साथ उसकी मित्रता।

अब एक सीधा सवाल: ऐसी स्थिति में क्या आप पत्नी के मित्रों के प्रति ईर्ष्या महसूस करेंगे? अगर हाँ, तो आप इससे तुरंत मुक्त होने की कोशिश शुरू कर दीजिए!

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप उसके देश में रहते हैं या भारत में, संभवतः आपकी पत्नी के बड़ी संख्या में पुरुष मित्र होंगे और तब से होंगे जब वह आपके खयालों में भी नहीं थी। वह उनसे बात करेगी, मिलेगी-जुलेगी, उनके साथ समय बिताएगी और शायद उसकी दोस्ती उनसे इतनी नजदीकी हो कि आपको असुविधा महसूस होने लगेगी। जब वह पुरुषों से मिलेगी, विशेष रूप से विदेश में, तो उनके साथ भी वैसे ही बर्ताव करेगी जैसे कि अपनी महिला मित्रों के साथ- और मैं जानता हूँ, शुरू में आपको यह भी अजीब सा लगेगा!

यह ताज़्ज़ुब की कोई बात नहीं है! आप उस देश के रहने वाले हैं, जहाँ पुरुष और महिलाएँ आपस में हाथ तक नहीं मिलाते! ऐसी संस्कृति, जहाँ आज भी बहुत से स्कूल या तो सिर्फ लड़कियों के स्कूल हैं या सिर्फ लड़कों के! यहाँ सामान्यतया पुरुष महिलाओं से बात तक नहीं कर सकते तो महिला मित्र बनाने के बारे में वे सोच भी कैसे सकते हैं? माता-पिता अपनी लड़कियों को आगाह करते हैं कि वे अपना खाली समय भाई के सिवा किसी और लड़के के साथ न बिताएँ अन्यथा उनकी बदनामी होगी और उसके लिए उपयुक्त वर खोजने में उन्हें दिक्कत पेश आएगी क्योंकि लड़कों के माता-पिताओं को उसके कुँवारेपन पर शक होगा!

मैं जानता हूँ कि भारत में भी कॉलेज के विद्यार्थियों में चीजें तेज़ी से बदल रही हैं लेकिन उनका प्रतिशत इतने बड़े देश की इतनी बड़ी आबादी का बहुत छोटा सा हिस्सा है और ज़्यादातर लोग भारत में आज भी पुरुष और महिला के बीच मामूली स्पर्श को भी यौन हरकत की तरह देखते हैं!

और ठीक यही बात आपको अपने मस्तिष्क से निकाल बाहर करनी है: पश्चिम में आपस में मिलने पर पुरुष और महिला का गले मिलना यौन क्रिया नहीं माना जाता! वे एक-दूसरे को गालों पर चूम भी सकते हैं, तब वे महज 'हैलो' कह रहे होते हैं, इससे ज़्यादा कुछ नहीं! तो अगर आपकी पश्चिमी पत्नी का कोई पुराना मित्र भारत आता है और आपकी पत्नी उससे देर तक गले मिलकर अपनी ख़ुशी का इज़हार करती है तो उद्वेलित न हों। अगर आपकी पत्नी काम के सिलसिले में बाहर जाती है और आप जानते हैं कि वह दिन भर पुरुषों के साथ एक ही डेस्क पर बैठती है और पुरुष सहकर्मियों से युक्त टीम में, उनके साथ काम करती है, जो लगातार मिलने-जुलने के कारण अब मित्र भी बन चुके होंगे, तो उस पर अविश्वास न करें!

आपको उस पर विश्वास करना सीखना होगा। अगर आप पश्चिम में कहीं भी रहते हैं तो आपकी पत्नी बिकनी पहनकर बीच पर घूमेगी और सामान्य रूप से स्कर्ट और टॉप पहनेगी, भारत में जिसे ‘अशोभनीय’ समझा जाता है लेकिन पश्चिम में बिल्कुल साधारण। दिन में और शाम को वह अपने दोस्तों के साथ मौज मस्ती करेगी-दोस्त महिलाएँ और पुरुष दोनों हो सकते हैं- और यह देखने के लिए कि उनके बीच क्या चल रहा है, आप हर वक़्त उनके साथ नहीं रह सकते। आपको अपनी ईर्ष्या का त्याग करना होगा क्योंकि आप उसे अपने मित्रों को त्यागने के लिए नहीं कह सकते- निश्चय ही यह आपके संबंधों के अंत की शुरुआत होगी!

ऐसे कई और विषय और संभाव्य मुश्किलें सामने आ सकती हैं, जिन्हें आप निर्विघ्न पार कर सकते हैं बशर्ते उन पर पहले से गंभीर विचार-विमर्श कर लें। अगले हफ्ते मैं उन पर विस्तार से चर्चा करने का मन बना रहा हूँ!

भारतीय पुरुष को कभी-कभी अपनी पश्चिमी जीवन साथी की स्वतंत्रता क्यों भयभीत करती है – 24 जून 2015

कल मैंने लिखा था कि पश्चिमी महिलाओं और भारतीय पुरुषों के मध्य होने वाले वैवाहिक संबंधों में दोनों को ही विवाह पश्चात् महिला की स्थिति पर गंभीर विचार करने की ज़रूरत होती है– क्या वह घर में रहेगी या नौकरी या अपना कोई काम करेगी? ऐसे या इसी तरह के और भी कई प्रश्न इस बात पर निर्भर करते हैं कि आप दुनिया के किस कोने में स्थाई रूप से बसना चाहते हैं लेकिन सामान्य रूप से ही भारतीय महिला और पश्चिमी महिला के बीच और भारतीय पुरुष और पश्चिमी पुरुष के बीच काफी अंतर होता है और जब आप एक साथ रहने लगेंगे तब निश्चित ही वे आपके सामने उजागर होंगे, फिर चाहे आप कहीं भी, किसी भी देश में रहें। मुझे लगता है कि पश्चिमी महिलाओं की आज़ादी पर अपने विचार व्यक्त करूँ और बताऊँ कि क्यों बहुत से भारतीय पुरुष उससे आश्चर्यचकित रह जाएँगे!

पश्चिमी महिलाओं के साथ संबद्ध मेरे मित्रों: आश्चर्य आपका इंतज़ार कर रहा है! पश्चिम में चीजें जिस तरह काम करती हैं, सिर्फ उसी कारण आपकी पश्चिमी महिला बहुत से ऐसे हुनर अपने साथ लेकर आएगी, जिनके बारे में आप शायद जानते भी न होंगे! क्योंकि वहाँ भारत के मुकाबले लड़कियों का लालन-पालन काफी हद तक लड़कों जैसा ही होता है, लड़कियाँ भी वह सब कर पाती हैं जो लड़के करते हैं। वहाँ का समाज महिलाओं पर उस तरह पाबंदी नहीं लगाता जिस तरह भारतीय समाज लगाता है। लगभग हर जगह, जहाँ पुरुष आ-जा सकते हैं, महिलाओं का आना-जाना भी सुरक्षित होता है, वह भी किसी भी समय और अकेले। और क्योंकि अधिकतर पश्चिमी देशों में श्रमिकों की कमी हैं और मजदूरी की दर बहुत ज़्यादा, अधिकतर लोग बहुत से काम, किसी मजदूर को बड़ी रकम देकर कराने की जगह, खुद करते हैं। इसलिए लोग बहुत से काम अपने हाथों से करना सीख लेते हैं।

नतीजा यह होता है कि आपको इस तथ्य के साथ तालमेल बिठाना पड़ता है और फिर उसकी आदत डालनी पड़ती है कि पश्चिमी महिला यानी आपकी होने वाली जीवन साथी एक सामान्य भारतीय महिला की तुलना में बहुत अधिक स्वतंत्र और खुदमुख्तार होती है। उसे सूटकेस उठाने में, घर की पुताई करने में और झाड़ पर चढ़ने में कोई दिक्कत नहीं होगी। वह बिजली का बिल जमा कर आएगी, कार चला लेगी और दुनिया भर में अकेली घूम-फिर आएगी।

उस पर पाबंदियाँ लगाने की बजाए उसका आदर करें और उसके हुनर की, उसके काम की प्रशंसा करें! उससे सीखें कि किस तरह लिंग आधारित भूमिकाएँ परस्पर बदली जा सकती हैं और लिंग भेद की बेड़ियाँ शिथिल की जा सकती हैं। कुछ नया करने की कोशिश करें, कुछ ऐसा, जिसे अब तक आप 'जनाना काम' समझते आए थे! और तब आप महसूस करेंगे कि इससे आपको कितना लाभ होता है क्योंकि तब आप ज़िम्मेदारियों को बाँट लेते हैं और उन्हें अकेले-अकेले ढोने की ज़हमत से बच जाते हैं!

और आप, मेरी महिला मित्रों: आपको संयम रखना होगा और समझना होगा कि जब आप कोई साहसिक काम अंजाम देती हैं और आपका साथी उससे असुविधा महसूस करता है तब इसके पीछे क्या कारण होता है, उन कारणों की जड़ कहाँ होती है। एक छोटा सा काम- सीढ़ी पर चढ़कर बल्ब बदलना- भारतीय पुरुष इतना सा काम भी महिलाओं को करता देखने के आदी नहीं होते! भारतीय महिलाएँ पालन-पोषण करने वाली बच्चों की माँ और पति की देखभाल करने वाली कोमलांगी पत्नी बनकर रहने को ही प्राथमिकता देती हैं, जो पति के बगैर एक कदम आगे नहीं रख सकती!

अपने पुरुष साथी को दिखाइए कि कैसे आप अपने हाथों और पैरों का इस्तेमाल करना जानती हैं। जहाँ आपको ज़रूरत महसूस होती हो, अपनी स्वतंत्रता न छोड़ने पर अड़े रहिए लेकिन कभी-कभार अपना सूटकेस उसे उठा लेने दीजिए! इस बात का मज़ा लीजिए कि आपका भारतीय पति इस मामले में किसी पश्चिमी पति के मुकाबले ज़्यादा मददगार है और आपके लिए अधिक सुविधाजनक साबित हो रहा है! मुझे विश्वास है कि कभी-कभी मामूली अदाओं से पुरुषोचित कार्य करने वाले बलवान पुरुष होने के उसके एहसास को आप तुष्ट कर पाएँगी। कभी-कभी भारतीय पुरुषों को इसकी ज़रूरत महसूस होती है!

अंत में, अगर आप भारत में रह रही हैं तो कुछ मामलों में, जैसे यदि वह शहर के कुछ ख़ास इलाकों में जाने से मना करता है तो उसकी बात मानें। लेकिन कुछ समय बाद, अगर आपको लगता है कि यह कुछ ज़्यादा हो रहा है, आपको पाबंदी या वर्जना जैसा लग महसूस हो रहा है और उससे आपको दिक्कत हो रही है तो बात कीजिए-ऐसा न हो कि सुरक्षा के बहाने आप पर आवश्यकता से अधिक पाबंदियाँ आयद करके वह अपना वर्चस्व प्रदर्शित करने की कोशिश कर रहा हो!

ये बातें सिर्फ चर्चा करने के लिए नहीं हैं बल्कि उन पर अमल करने के लिए भी हैं और अमल तभी हो सकता है जब आप साथ रहें। लेकिन कम से कम आपको इन बातों की जानकारी हो गई और सामने आ सकने वाली दिक्कतों का आपको अनुमान हो गया। आगे उन पर चर्चा करने के काफी अवसर प्राप्त होंगे!

अभी भी बहुत से विषय हैं जिन पर चर्चा की जानी चाहिए- और अगले कुछ दिन मैं उन बातों पर विस्तार से लिखूँगा!

भारतीय पुरुष पश्चिमी महिला के मध्य का निर्णय: काम करे या घर संभाले? 23 जून 2015

मेरे विचार में प्रेम में पड़ना हमेशा बड़ी अच्छी बात होती है और जब दोनों ही उसके प्रति गंभीर हैं, तब तो फिर पूछना ही क्या! मेरा जीवन साथी भी एक बहुत ही भिन्न संस्कृति और परिवेश से संबद्ध है लेकिन मुझे यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है कि इस मामले में हमारी स्थिति काफी बेहतर थी: मैं उससे मिलने से भी कई साल पहले से उसकी संस्कृति में रहा था और उस परिवेश से भली प्रकार परिचित था! मैं खुले मन का व्यक्ति रहा हूँ और इसलिए पहले से जानता था कि पश्चिमी महिलाएँ किस तरह भारतीय भारतीयों से अलग तरह से सोचती हैं। यहाँ मैं अपने उस ज्ञान को और हम दोनों को आपस में हुए कई सालों के अनुभवों को सबके साथ साझा करना चाहता हूँ, जिससे भारतीय पुरुष और पश्चिमी महिलाओं के संभावित जोड़े उनसे लाभान्वित हो सकें!

मैं चाहता हूँ कि आप कुछ ठोस उदाहरणों की सहायता से उन क्षेत्रों का परिचय प्राप्त करें, जहाँ आप सम्भवतः अलग ढंग से सोचते होंगे। सबसे प्रथम है, पुरुष और महिला के बीच संबंध और भारत और पश्चिमी संस्कृतियों में पुरुषों और महिलाओं के मध्य अंतर।

महिलाओं: भारतीय संस्कृति में पति भरण-पोषण के साधन जुटाता है और महिला घर और बच्चों की देखभाल करती है। पूरी संभावना होगी कि आपका साथी भी अपने घर में यही देखता हुआ बड़ा हुआ होगा। आजकल, विशेष रूप से बड़े शहरों में, ज़्यादा से ज़्यादा महिलाएँ अच्छी शिक्षा प्राप्त कर रही हैं, बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों में पढ़ रही हैं, नौकरी कर रही हैं और अपने मनपसंद क्षेत्रों में काम कर रही हैं। दिल्ली या मुंबई जैसे महानगरों में घूमते हुए आप बहुत सी महिलाओं को कार्यालयीन कपड़ों में चुस्त-दुरुस्त अपने कार्यालयों की ओर या कार्यालयों से घर लौटते हुए देख सकती हैं।

शहरों में भारत की बहुत थोड़ी आबादी ही रहती है और वहाँ भी बहुत सी युवतियाँ आज भी घर और बच्चों की देखभाल करने वाली गृहणियाँ और माँएँ बनने का निर्णय लेती हैं! वे ऐसा करती हैं क्योंकि वे सोचती हैं कि ऐसा करने पर ही उनका जीवन परिपूर्ण होगा और शायद इसलिए भी कि समाज उनसे यही अपेक्षा रखता है।

क्या आप इस दृश्य में फिट बैठती हैं? अगर आप भारत में बसने का निर्णय लेती हैं तो क्या आप अपने पति के साथ उसके संयुक्त परिवार में रहने की और घरेलू काम और बच्चों की देखभाल करते हुए जीवन बिताने की कल्पना भी कर सकती हैं? क्या यह आपको पूरी तरह संतुष्ट करने के लिए पर्याप्त है या आपको कुछ ज़्यादा की अपेक्षा है? आप इस विषय पर जो भी महसूस करती हैं, आपको उसे ज़ाहिर करना होगा! इसमें सही या गलत कुछ भी नहीं है, विशेष रूप से इसलिए कि आप एक संस्कृति से दूसरी, बिल्कुल भिन्न संस्कृति में कदम रख रही हैं, अपने जाने-पहचाने समाज को छोड़कर दूसरे, एकदम अजनबी समाज को अपनाने जा रही हैं तो सबसे पहले आपको जानना चाहिए कि आप क्या चाहती हैं और सामने वाला क्या चाहता है।

महानुभावों: ज़्यादातर पश्चिमी देशों में अभिभावक लड़कियों को पढ़ाना-लिखाना लड़कों के बराबर ही आवश्यक मानते हैं और चाहते हैं कि वे भी अपना कोई काम या नौकरी करके अपने पैरों पर खड़ी हों। नतीजतन महिलाएँ पुरुषों की तरह ही अच्छी-ख़ासी नौकरियाँ करती हैं और अपना खुद का पैसा कमाती हैं। वहाँ भी शादी काफी बड़ा समारोह समारोह होता है लेकिन उससे महिलाओं की सिर्फ निजी ज़िंदगी प्रभावित होती है- अपना काम करने की उनकी स्थिति में इससे कोई व्यवधान उपस्थित नहीं होता!

जब उनके बच्चे होते हैं तो माँएँ अपने काम से कुछ सालों का अवकाश ले लेती हैं लेकिन जब बच्चे डे केयर में जाने लायक हो जाते हैं तो वे अक्सर अपना काम फिर शुरू कर देती हैं। बहुत से पश्चिमी मुल्कों में यह आर्थिक दृष्टिकोण से आवश्यक भी होता है, जिससे परिवार बेहतर जीवन स्तर बनाए रख सके। वैसे भी महिलाएँ घर के बाहर की ज़िंदगी खुलकर जीना चाहती हैं। याद रखें, वहाँ संयुक्त परिवार जैसी कोई सामाजिक परंपरा नहीं है बल्कि अलग-अलग परिवारों वाले घर होते हैं, जहाँ अक्सर दिन में घर पर कोई नहीं होता क्योंकि पति-पत्नी काम पर चले जाते हैं और बच्चे डे केयर में दिन गुज़ारते हैं! यहाँ तक कि वे आपसे यह अपेक्षा भी कर सकती हैं कि आप अच्छे गृहस्थ पति की तरह 🙂 छुट्टी लेकर घर बैठें, बच्चों को संभालें, घर देखें, जब कि वे अपने काम पर जा सकें!

इस बारे में आपका रवैया क्या होगा? क्या आप इन बातों को बर्दाश्त कर पाएंगे? पत्नी का घर से बाहर निकलकर नौकरी करना या अपना कोई व्यवसाय करना और आपके बराबर या आपसे अधिक पैसे कमाकर लाना आपके लिए कोई समस्या तो नहीं बन जाएगा? क्या आप कभी-कभी अपने काम से छुट्टी लेकर बच्चों के साथ घर बैठ पाएँगे, जिससे पत्नी अपने काम पर जा सके?

अपने होने वाले जीवन साथी के साथ, भारत में या उसके देश में रहने के विकल्प के साथ कुछ परिदृश्यों पर चर्चा कीजिए। एक-दूसरे को अधिक से अधिक जानने की कोशिश कीजिए! जब आप एक-दूसरे के साथ पर्याप्त समय गुजारेंगे तो कुछ और सामान्य मतभेद उजागर होंगे- लेकिन उनके विषय में विस्तृत चर्चा कल करेंगे!