विपरीत ध्रुव एक दूसरे को आकृष्ट करते हैं! फिर अपनी ही जाति या उपजाति में विवाह पर इतना आग्रह क्यों? 22 अक्टूबर 2013

कल मैंने आपको पूर्णतः अलग पृष्ठभूमि और संस्कृति से आए और यहाँ तक कि अलग भाषा बोलने वाले व्यक्ति के साथ संबंध स्थापित करने पर होने वाले लाभों के बारे में बताया था। हमारे सारे तर्क इस बात की तरफ इंगित करते थे कि वे भिन्नताएँ संबंधों को ज़्यादा मजबूत और स्थायी बना सकते हैं। मज़ेदार बात यह है कि यहाँ, भारत में बच्चों की शादियाँ करते समय लोग इसके ठीक विपरीत रवैया अपनाते हैं: वे अपने युवाओं के विवाह न सिर्फ अपनी जाति में बल्कि अपनी ही उपजाति में तय करते हैं। स्वाभाविक ही, वे मानते हैं कि उनके बच्चे के, होने वाले जीवन-साथी का लालन-पालन भी उनके बच्चे की तरह ही हुआ होगा इसलिए वे एक-दूसरे को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे और उनके विवाह के सफल होने की संभावना अधिक रहेगी।

इस विचार के पीछे स्थित मूल इच्छा आसानी के साथ समझ में आती है। जब आप अपनी बेटी का विवाह किसी अजनबी के साथ करते हैं तो चाहते हैं कि वह किसी ऐसे घर में जाए, जिसका परिवेश और माहौल आपके घर जैसा हो, जहां पूरा परिवार उसी तरह सोचता-विचारता हो जैसा कि आप सोचते हैं, जहां आपकी संस्कृति और रीति-रिवाजों का पालन होता हो। इसी तरह जब कोई नई लड़की विवाह के बाद आपके घर रहने आती हैं तो आप चाहते हैं कि, जहां तक संभव हो, पहले से उसे आपके घर के रीति-रिवाजों का ज्ञान हो। तो अगर आप अपने बच्चों की अरेंज्ड मैरेज करना चाहते हैं तो निश्चय ही यह एक संतुलित और तर्कसंगत विचार है।

समस्या यह है कि यह तरीका ही अपने आप में एक बीमार व्यवस्था पर आधारित है, जो लोगों को जाति प्रथा में जकड़ती है और उन्हें उच्च और निम्न वर्ग के बीच विभाजित करती है। लोग सिर्फ इस बात पर ही विश्वास नहीं करते कि एक ही जाति के लोगों के घरों में एक जैसा सांस्कृतिक वातावरण होता है-वे यह भी मानते हैं कि नीची जातियों के लोग गंदे (घृणास्पद) होते हैं, उनके सामने उस जाति के लोगों की कोई औकात नहीं है और उस जाति में विवाह संबंध स्थापित करने पर उनका लड़का या लड़की किसी भी हालत में सुखी नहीं हो सकते। तो, यह सिर्फ अपने बच्चे के लिए किसी समझदार जीवन-साथी के साथ सुखमय जीवन की कामना ही नहीं है बल्कि यह कुछ दूसरे मनुष्यों के प्रति आपकी घृणा का खुला प्रदर्शन भी है।

फिर यह बात भी पूरे दावे के साथ नहीं कही जा सकती कि एक ही जाति या उपजाति के लोगों के बीच बेहतर आपसी समझ होती है या उनके घरों में एक जैसी संस्कृति पाई जाती है और इसलिए हर हाल में दोनों एक-दूसरे के अनुरूप होते ही हैं। इसके विपरीत, हर व्यक्ति का एक अलग व्यक्तित्व होता है और हर परिवार में लोगों के अपने-अपने अलग जीवनानुभावों के अनुसार हर एक में अलग दृष्टिकोण का विकास हो सकता है, जो उस परिवार के माहौल को भी प्रभावित और परिवर्तित करता है और घर के बढ़ते बच्चों के चरित्र और नज़रिये पर भी असर डालता है, जिससे ये बच्चे भी अपना अलग व्यक्तित्व विकसित करते हैं।

जब आप किसी व्यक्ति से यह अपेक्षा करते हैं कि वह आपके जैसा हो तो आप नव विवाहित दंपति से आपस में दो स्वतंत्र व्यक्तियों के रूप में मधुर संबंध स्थापित करने की स्वतन्त्रता छीन लेते हैं, जो दो अलग-अलग संस्कृतियों से आए दंपति को सहज प्राप्त होती है। आप बदलने के लिए तैयार नहीं हैं, किसी नई बात के प्रति सहिष्णु नहीं हैं, इसके बावजूद कि इसका अर्थ आपके लड़के या लड़की को सुखी और दीर्घजीवी संबंध स्थापित करने की दिशा में ज़्यादा सुविधाएं मुहैया कराना हो सकता है!

तो मेरे प्रिय भारतीय मित्रों, भले ही आप यह बात न मानें कि जाति प्रथा एक अमानवीय परंपरा है और जल्द से जल्द इसका खात्मा किया जाना चाहिए, लेकिन कम से कम इस तथ्य को नज़रअंदाज़ न करें कि एक ही जाति या उपजाति का होना इस बात की कोई जमानत (गारंटी) नहीं हैं कि आपकी लड़की या लड़के का वैवाहिक जीवन सुखी और दीर्घजीवी सिद्ध होगा। अगर वे किसी दूसरी जाति में अपने प्रियकर से विवाह करना चाहते हैं तो उन्हें ऐसा करने से रोकने से पहले अच्छी तरह सोच-विचार कर लें। हो सकता है कि उन्होंने किसी ऐसे व्यक्ति को खोज लिया हो, जिसे पहली नज़र में आप पहचान न पा रहे हों मगर जो भविष्य में आपके दिल के भी करीब साबित हो! नए के प्रति खुला रवैया अपनाएं और मुझे विश्वास है कि उस, अलग नज़र आने वाले व्यक्ति में आपको बहुत से नए और आकर्षक गुण नज़र आएँगे!

अजीब बात है, अलग-अलग संस्कृतियों और भाषाओं के बीच सम्प्रेषण अधिक स्पष्ट और आसान है- 21 अक्तूबर 2013

एक बार जब हमारी मित्र सिल्विया हमारे आश्रम आई थी तब रमोना के साथ उसकी कुछ बातचीत हुई थी। रमोना ने जब उसके बारे में मुझे बताया तो मुझे वह बड़ा दिलचस्प लगा। बात उन दम्पतियों के विषय में थी जो अलग-अलग देशों और संस्कृतियों से आते हैं, विशेषकर जो अलग-अलग भाषाएँ बोलते हैं। सिल्विया ने एक अध्ययन की रिपोर्ट पढ़ने के बाद पाया कि ऐसे दंपतियों का वैवाहिक जीवन ज़्यादा स्थायी होता है।

ऐसे दम्पति का एक हिस्सा होने के नाते यह मेरे लिए विशेष दिलचस्प था और हम इस विषय पर आगे भी बातें करते रहे कि क्या वाकई ऐसा है, क्या इसमें कोई तथ्य हो सकता है!

इसके पक्ष में सबसे पहला तर्क यही हो सकता है कि जब कोई व्यक्ति उसके सामान्य परिवेश के लिए अजनबी व्यक्ति के साथ संबंध रखना चाहता है तो वह स्वाभाविक ही ‘असामान्य’ लोगों, चीजों और विचारों के प्रति खुला रवैया रखने वाला होता है। ऐसे लोग जोखिम उठाने वाले होते हैं, नई बातें उन्हें आकर्षित करती हैं और वे भिन्न दिखाई देने वाली चीजों को बिना उन पर सोच-विचार किए अस्वीकार नहीं करते। संबंध स्थापित करने के मामले में यह बात महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि जैसे-जैसे समय बीतेगा, दोनों को ही कुछ न कुछ बदलना होगा। स्वाभाविक ही दोनों के ही व्यक्तित्व में नई-नई बातें उजागर होंगी और संबंध टिकाऊ हों इसका प्रयास दोनों को ही करना होगा और इसके लिए दोनों को ही अपने विचारों और व्यवहार में लचीलापन लाने की आवश्यकता होगी!

दो संस्कृतियों के व्यक्तियों के बीच सम्बन्ध स्थापित होने पर दोनों पार्टनर्स (साथी) इस बात को भली प्रकार से जानते होते हैं कि दूसरे को बचपन में उससे बिलकुल भिन्न प्रकार के अनुभव हुए हैं और वह ऐसे लोगों के साथ रहा है जो बिलकुल अलग तरह से सोचते होंगे और शायद उसे भी काफी हद तक अलग नज़रिये से ही देखते होंगे। ऐसा एक ही देश में और एक ही संस्कृति में भी होता है क्योंकि बिलकुल पड़ोस के दो घरों का रहन-सहन और संस्कृति भी बहुत भिन्न हो सकते हैं! अंतराष्ट्रीय दम्पतियों में सुविधा यह होती है कि वे इस तथ्य को अच्छी तरह से समझते हैं और स्वीकार करते हैं! उन्हें यह गलतफहमी नहीं होती कि दूसरा क्या कह रहा है, वे जान गए हैं! वे यह सोचकर कि उनका साथी उसके जैसा ही महसूस करेगा या सोचेगा, इस विषय में कोई निश्चित धारणा नहीं बना लेते। वे सावधानी के साथ बार-बार अपनी धारणा को पुष्ट करने की कोशिश करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर अपनी बात को स्पष्ट करने की कोशिश करते हैं और दूसरे से भी पूछते रहते हैं।

इसके बाद ही दूसरा पहलू सामने आता है: भाषा का। भिन्न संस्कृतियों से आए दंपति अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए साफ-साफ शब्दों में अपनी बात रखने के लिए प्रवृत्त होते हैं। अगर वे एक दूसरे की भाषा नहीं जानते तो और भी ज़्यादा सतर्क रहते हैं और काफी विस्तार से अपनी बात रखने की कोशिश करते हैं, जिससे किसी प्रकार की गलतफहमी न रहे, क्योंकि वे जानते हैं कि या तो वह भाषा उसके पार्टनर की भाषा नहीं है या खुद उसकी भाषा नहीं है या दोनों की ही नहीं है! एक शब्द का हेरफेर भी बड़ा भ्रामक (बड़ी गलतफहमी का कारण) हो सकता है अगर उसे किसी दूसरे अर्थ में समझ लिया जाए। इसलिए ऐसे दम्पतियों को अक्सर बात के असली मतलब का अनुमान अपने पार्टनर की आँखों में झाँककर लगाना पड़ता है, एक दूसरे की भावनाओं को समझते हुए उस शब्द को समझना पड़ता है, बल्कि कई बार उसके शाब्दिक अर्थ से बिलकुल विपरीत अर्थ को भी।

किसी दूसरे देश या दूसरी संस्कृति और दूसरी भाषा बोलने वाले से संबंध बनाने पर इच्छित परिणाम प्राप्त करने के लिए कई लोग ध्यान या दूसरे किसी बौद्धिक या आध्यात्मिक अभ्यास का सहारा लेते हैं: इस बात को समझने के लिए कि वे दरअसल क्या चाहते हैं, सोचते हैं और अनुभव करते हैं और फिर उसके अनुसार व्यवहार करते हैं और या ठीक उसी के अनुसार अपनी भावनाओं का इज़हार करते हैं। इस तरह आप ज़्यादा चैतन्य और सावधान होते हैं कि जो आप कर रहे हैं या कह रहे हैं वह आपके आसपास के लोगों पर क्या असर डाल रहा है।

जबकि दूसरे देश के किसी पुरुष या महिला के प्रति आपका प्रेम आपको यह सब करने के लिए मजबूर करता है, मैं यह समझता हूँ कि अपने देश के व्यक्ति के साथ संबंध होने पर भी आपको यही करना चाहिए। बल्कि, मैं तो यह कहूँगा कि जीवन के हर क्षेत्र में, अपने हर तरह के सम्बन्धों पर इसे लागू किया जाना आपके लिए अच्छा ही होगा। हमेशा बहुत सोच-समझकर व्यवहार कीजिए, कोई बात कहिए, और आपके अंतरंग संबंध, बल्कि आपकी मित्रताएँ भी दीर्घजीवी हो जाएंगी!

जब सेक्स में जीवनसाथी की रुचि ख़त्म हो जाये – 7 अप्रैल 2013

मेरे द्वारा दिये जाने वाले व्यक्तिगत सत्र के दौरान अकसर लोग अपनी अंतरंग समस्या की चर्चा करते है जिनका जिक्र उन्होंने कभी किसी अन्य के सामने नहीं किया होता है । यह उनके लिये एक सुअवसर होता है कि एक ऐसे वातावरण में स्वयं को खोलने का, जहां वे विश्वास करते है कि उनका एक भी शब्द उनके किसी अन्य परिचित को नहीं पता चलेगा। हमारी चर्चा गोपनीय होती है। उन मामलों में भी जिनमें मैं यहां आने वाले व्यक्ति के साथ मित्रवत हो जाता हूं, बिना उनकी अनुमति के व्यक्तिगत सत्र के दौरान बातचीत के विषय की चर्चा मैं कभी नहीं करता। यह कारण रहा कि वर्ष 2005 में जब एक मित्र ने अपनी बहुत ही निजी समस्या का खुलासा मेरे समक्ष किया तो मुझे बहुत आश्चर्य नहीं हुआ।

वस्तुतः वह अपनी पत्नी के माध्यम से मेरे संपर्क में आये थे। वह क्षेत्र में होनेवाले विभिन्न अध्यात्मिक कार्यक्रमों में शामिल होने के लिये आ रही थी, मेरे बारे में सुना था और अपने पति को विश्वास दिलाया कि उनका साथ में चलना, उनके लिये भी अच्छा होगा। ध्यान के एक सत्र के दौरान मुझे समझने के बाद उन्होंने व्यक्तिगत सत्र के लिये निर्णय लिया वह भी एक दूसरे से अलग – अलग सत्र के लिये। दुबारा मिलने के पहले, हमारे बीच छोटी सी मित्रता स्थापित हो गई थी पति मुझपर पूर्णतः विश्वास करते हुये, पत्नी के साथ अपने संबंध के विषय में मुझसे बातचीत करने लगे थे। संक्षेप में कहा जाये तो वे सेक्सुअली असंतुष्ट थे।

उन्होंने मुझे बताया कि वह अपनी पत्नी से बहुत प्यार करते है और दोनों ने जीवन का एक लंबा सफ़र एक साथ तय किया है, और जिंदगी के उतार चढ़ाव में साथ रहे हैं, अपनी तरफ़ से वे पत्नी को खोना नहीं चाहते हैं। सिवाय एक बात के कि उनकी पत्नी को सेक्स में एक दम रुची नहीं थी, बाकी सब कुछ सही चल रहा था। पत्नी के नजदीक आने के लिये और सेक्स में रुची पैदा करने के लिये उन्होंने विभिन्न तरीका अपनाया, रोमांटिक या आक्रामक सेक्स और पुराने समय को याद दिलाने या पूर्णतः कुछ नये पद्धति, परन्तु पत्नी ने वैसा कुछ भी महसूस नहीं किया। गुजरते समय के साथ सेक्स के प्रति उनकी क्रियाशीलता कम होती चली गई, वैसे अवसर जब पति की पहल का पत्नी ने जवाब दिया हो, कम होते चले गये और अब वे सन्यासी की तरह जी रहे थे, वे ऐसी मानसिक अवस्था में पहुंच चुके थे जहां पति को यह विश्वास हो गया था कि वे जीवन में अब दुबारा सेक्स नहीं कर सकते हैं|

उनकी व्यथा मुझे गहरे तक छू गई विशेषकर उन्होंने जो प्यार अपनी पत्नी के लिये अभिव्यक्त किया था। उन्होंने बताया, मैं उससे बहुत प्यार करता हूं यही कारण है कि अपनी शारीरिक इच्छा की पूर्ति के लिये किसी अन्य औरत के पास नहीं जाना चाहता। मुझे ऐसी औरत मिल सकती है जो मुझे पाकर प्रसन्न होगी या जिन्हें मैं धन से प्राप्त कर सकता हूँ परन्तु अपनी प्यारी पत्नी के साथ मैं यह नहीं कर सकता। सेक्स की इस समस्या के दौरान ऐसे पल भी आये जब मेरी पत्नी ने इसके लिये अनुमति दी: "मुझे बुरा नहीं लगेगा अगर आप किसी और के पास जाते है" परन्तु उन्होंने पत्नी के आफ़र को नहीं स्वीकार किया।

उन्होंने पत्नी की सेक्स से संबंधित किसी भी क्रिया के प्रति असम्मति के बारे में बताया "मैं हमेशा यह सब कुछ नहीं करना चाहता हूं परन्तु वह छोटी सी पहल से भी इंकार करती है।" मैंने उनके इस दर्द को समझा, बेडरूम (शयनकक्ष), जहां उन्हें एक दूसरे के प्रति सबसे ज्यादा अन्तरंग होना चाहिये वहां जाने के बाद वे एक दूसरे के लिये पुरी तरह अनभिज्ञ हो जाते हैं।

स्पष्टतः यह समस्या दोनों के बीच द्वंद/ विरोध का कारण बन गई थी। पति को सेक्स की आवश्यकता थी, सेक्सुअल ऊर्जा बिना प्रवाहित हुये संचित होने लगी, दबाव से छुटकारा पाने के लिये उन्होंने पोर्न फ़िल्में देखना शुरु कर दिया, पत्नी द्वारा पकड़े जाने के बाद क्रोध एवं घृणा का भाव प्रकट किया गया जिसके कारण वे खुद को दोषी महसूस करने लगें। इस विषय को लेकर दोनों के बीच तकरार भी हुई जिसने बिस्तर पर दोनों के बीच के फ़ासले को बढ़ाने का कार्य किया। पत्नी सेक्स के प्रति कठोर लगती थी, उसके भावों से यह प्रकट होता था जैसे सेक्स स्वयं में कुछ इस तरह की चीज है जिसे सिर्फ गंदे लोग करते है या चर्चा करते है।

हालांकि उन्होंने इस बात का पूरी तरह ख्याल रखा कि उनका यह अंतर्कलह दुनिया के सामने प्रकट न हो। सबकी नजरों में वे एक दूसरे से प्यार करने वाले आदर्श पति-पत्नी थे। इसके अतिरिक्त उन दोनों के बीच और कोई विवाद नहीं था। पूरा दिन वे मधुरता के साथ व्यतीत करते थे, किसी को भी उनके संबंधों में व्याप्त तनाव का आभास नहीं हो सकता था यहां तक की खुद उन्हें भी, जबतक कि शाम न घिर आये। उन्होंने दुनिया के लिये और खुद के लिये आदर्श पति-पत्नी होने का आवरण बना रखा था।

पति से सब कुछ सुनने के बात मैंने उन्हें स्पष्ट बता दिया कि मैं उनकी पत्नी से भी बात करना और अगर संभव हुआ तो दोनों को एक साथ सुनना चाहुंगा क्योंकि यह उन दोनों का बहुत ही अन्तरंग मामला था । उन्होंने बहुत ध्यान देते हुये पत्नी से बात की और वह तैयार हो गई। संक्षेप में कहा जाये तो मैंने सेक्सुअल अन्तरंगता को पाप समझने वाला सामान्य भाव उनकी पत्नी के अंदर महसूस किया जो उसके पारंपरिक एवं कैथोलिक वातावरण में पले बढ़े होने के कारण था। कुछेक निजी सत्र एवं पति-पत्नी दोनों के साथ संयुक्त सत्र के बाद हम इन सभी मुद्दों पर खुलकर बात करने में सफ़ल हुये । मैंने बताया सेक्स कितना नैसर्गिक है और उसमें पाप जैसा कुछ भी गलत नहीं है बल्कि यह अपने साथी के साथ अन्तरंग क्षणों का आनंद है।

लंबे समय के दौरान धर्म द्वारा बहुत गहरे पैठा दी गई इस पाप वाली भावना को त्यागना इतना आसान नहीं था लेकिन जब हम कुछ दिन बाद मिले तो दोनों पति-पत्नी ने मुझे बताया कि उनका बेडरूम (शयनकक्ष) अब जीवंत हो गया है और वे अब शारीरिक अन्तरंगता का फ़िर से आनंद ले रहे है। मुझे बहुत प्रसन्नता हुई कि मैं उनकी मदद करने का निमित्त बना।

मुझे पता है बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो इस तरह की समस्या के निदान के लिये कोई सहायता नहीं तलाश कर पाये हैं। यह बहुत ही निजी मामला होता है जिसका समाधान सामान्य सुझाव से नहीं हो सकता और मुझे आशा है कि वैसे लोग योग्य परामर्शदाता तलाश लेंगे जो उन्हें साथ लाने में मदद करेगा क्योंकि शारीरिक अन्तरंगता के बिना एक सफ़ल रिश्ता लंबे समय तक नहीं टिक सकता।