आइए, मिलजुलकर उन किसानों की मदद करें, जिनकी फसल पूरी तरह बरबाद हो गई है! 12 अप्रैल 2015

पिछले रविवार को मैंने हमारे इलाके में हुई भयंकर ओलावृष्टि के बारे में आपको बताया था। जहाँ हमारा नुकसान सिर्फ इतना ही हुआ कि आयुर्वेदिक रेस्तराँ, अम्माजी’ज के विज्ञापन-बोर्ड में एक बड़ा सा छेद हो गया और कार में कुछ डेंट्स लगे वहीं हमारे इलाके के बहुत से लोगों का बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ है, और आज भी हो रहा है! जलवायु-परिवर्तन और उसके दुष्परिणामों ने भयंकर तबाही मचाई है और बहुत से लोग जान से हाथ धो बैठे हैं! और हम उनकी मदद करना चाहते हैं!

पिछले कई हफ्तों से हमारे यहाँ बड़ा असामान्य मौसम रहा। सामान्यतया, इस समय गरम और सूखा मौसम होना चाहिए लेकिन इस बार कुछ दिन तो गर्मी पड़ती है, सूरज निकलता है और फिर दो या तीन दिन तक लगातार बारिश होती है, तेज़ हवाएँ चलने लगती हैं। यह ब्लॉग लिखते समय भी आसमान में काले बादल छाए हैं और लगता है बारिश भी होगी। इसके अलावा हमेशा इस समय तक फसल कटकर खलिहानों में आ जाती है, गेहूँ गोदामों में आने लगता है, जब कि इस बार बारिश के कारण फसलों को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुँचा है, आंधी-पानी के कारण गेहूँ खेतों में बिछ गया है, बहुत सा सड़ गया है, नष्ट हो गया है!

इसलिए रोजाना ऐसी खबरें आ रही हैं कि खेतों को देखकर सदमे से किसानों को दिल के दौरे पड़ रहे हैं, कई किसानों ने आत्महत्या कर ली है। अपनी फसलों के साथ खुद किसान भी तबाही झेल रहे हैं और अपनी जान तक लेने में नहीं हिचकिचाते! हमारा अखबार बताता है कि आज ही पिछले 24 घंटों में हमारे उत्तर प्रदेश में 44 किसान जान से हाथ धो बैठे हैं, जिनमें से 14 हमारे ही इलाके के किसान हैं। इनमें से कुछ किसानों की मृत्यु दिल का दौरा पड़ने से हुई है लेकिन बहुत से किसानों ने अपनी बरबादी से तंग आकर आत्महत्या कर ली है। अब तक कुल मिलाकर 2500 करोड़ रुपए यानी लगभग 400 मिलियन डॉलर कीमत की फसल नष्ट हो गई है।

अगर आप किसी ऐसे देश में रह रहे हैं, जहाँ प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के पर्याप्त सुरक्षा इंतज़ाम होते हैं, तो आपको आश्चर्य हो सकता है कि सिर्फ किसी साल अतिवृष्टि हो जाने के कारण कोई आत्महत्या भी कर सकता है! जी हाँ, कर सकता है और क्यों कर सकता है, मैं आपको समझाता हूँ: भारत में अनेक ऐसे किसान हैं, जिनके पास अपनी कोई ज़मीन नहीं होती। वे बहुत सारा कर्ज़ लेकर किसी बड़े किसान के खेत किराए पर लेते हैं और कर्ज़ लेकर ही खाद-बीज खरीदते हैं। उनका सारा पैसा और मेहनत इसी खेती में झोंक दी जाती है-और अब सारी फसल चौपट हो गई है। वे मेढ़ पर खड़े-खड़े उस चौपट खेती को निहार रहे होते हैं जबकि उनके पास हाथ में एक पैसा नहीं होता, खाने के लाले पड़े होते हैं। ऊपर से लंबा चौड़ा कर्ज़ अलग से खड़ा हो चुका होता है, जिस पर ऊँची दर से ब्याज की अदायगी भी करनी है!

यहाँ, भारत में खराब मौसम और बरबाद फसल के एवज में बीमा जैसी कोई चीज़ नहीं होती। ऐसी स्थिति में वे सदमे की हालत में पहुँच जाते हैं और बहुत से तो दिल का दौरा पड़ने से मारे जाते हैं। और दूसरे इतने विषादग्रस्त हो जाते हैं कि उन्हें मृत्यु के सिवा इस जंजाल से बाहर निकलने का दूसरा कोई विकल्प नहीं सूझता।

ऐसे में सरकार उनकी मदद के लिए आर्थिक सहायता लेकर आती है लेकिन जिन किसानों को इस मदद पर भरोसा होता है, वे भी जल्द ही निराश हो जाते हैं क्योंकि जो मुआवजा उनको दिया जाता है वह बहुत कम होता है और बहुतों को तो वह भी नहीं मिल पाता। वास्तविकता यह है कि ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक है, जिन्हें मदद की दरकार है और सरकार इस मद में पर्याप्त रकम आवंटित ही नहीं करती। इसके अलावा सरकारी मशीनरी में लालफ़ीताशाही और भ्रष्टाचार भी बहुत है।

हमारे स्कूल के कई बच्चे भी ऐसे ही किसानों के बच्चे हैं। कल हमारे पास उनमें से कुछ लोग आए थे और अपनी व्यथा-कथा कह रहे थे। यह बहुत ही दर्दनाक है!

सरकार के अलावा कुछ निजी संगठन भी आगे आए हैं और अपनी क्षमता के अनुसार भरसक किसानों की मदद करने की कोशिश कर रहे हैं। जब हम किसानों की ऐसी परिस्थिति देखते हैं तो हम भी महसूस करते हैं कि हमें भी उनकी हरसंभव सहायता करनी चाहिए!

पैसे के कारण लोग मृत्यु का वरण कर रहे हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए और हम भरसक हर जगह, हर तरह की मदद करना चाहते हैं! स्वाभाविक ही हम अकेले ज़्यादा कुछ नहीं कर सकते और इसलिए हम आपसे मदद की गुजारिश करते हैं! अगर आपको हमारे इलाके के किसानों से सहानुभूति है, अगर आप उनकी मदद करना चाहते हैं, जिनकी फसल बरबाद हो गई है तो उनकी मदद जैसे भी बन पड़े, जरुर करें!

शुक्रिया!

वृन्दावन में ओलावृष्टि – 5 अप्रैल 2015

आश्रम में पिछले कुछ दिनों से थॉमस और आइरिस के साथ बड़ा शानदार समय गुज़र रहा है-थोड़ा आराम, थोड़ा काम लेकिन कुल मिलाकर बेहद सुकून वाले शांत और सुखद दिनों का हम भरपूर आनंद उठा रहे हैं। शांत कह रहा हूँ लेकिन कल ही एक बड़ी घटना घटित हो गई, बल्कि कहा जाए कि बड़ा हादसा हो गया: हमारे शहर और हमारे इलाके में भयंकर ओलावृष्टि हुई!

साल के इस समय के लिहाज से यह अत्यंत अनपेक्षित मौसम कहा जाएगा। पिछले कुछ सप्ताह से लगातार रुक-रुककर बारिश होती रही थी इसीलिए जब शुक्रवार के दिन अचानक सूरज और नीला साफ़ आकाश अचानक लुप्त हो गया और उसकी जगह गहरे काले बादलों ने ले ली तो हमें आश्चर्य नहीं हुआ। दूर कहीं बिजली कड़कने लगी और तेज़ हवाएँ चलने लगी, जिन्होंने बड़े-बड़े पेड़ों को झंझोड़कर रख दिया और सड़कों पर पत्तियों और पेड़ों की टहनियों का अम्बार लग गया। तूफ़ान की आमद थी, हम समझ गए थे। लेकिन अचानक अजीबोगरीब आवाज़ों से शहर दहशत में आ गया!

पहले तो लगा, सिर्फ बिजली गरज रही है लेकिन वह गड़गड़ाहट रुक नहीं रही थी और नगाड़े अभी भी दूर बज रहे थे। फिर यह क्या था-हम सोच में थे, भरमाए से एक-दूसरे की ओर ताक रहे थे? फिर शुरुआत छोटे-छोटे ओलों से हुई और हम जान गए कि मामला क्या है: आवाज़ ओलों की थी, लेकिन भारी-भरकम ओले भी करीब ही थे!

यह समझ में आते ही हमारा ड्राईवर कार की ओर दौड़ा-वह इस वक़्त तक भी बाहर ही, आश्रम के सामने खुले में रखी थी। वह कार के अंदर कूदा और गीले, चिकने फर्श पर, जितना तेज़ भगा सकता था, भगाकर रेस्तरां के छज्जे के नीचे ले जाने लगा।

वह आधी दूर ही पहुँचा था कि ओलावृष्टि इतनी तेज़ हो गई कि सेकंडों में बड़े-बड़े ओले ज़मीन पर बरसने लगे और रास्ते में, बगीचे में और हम लोगों के सामने, आँगन में हर तरफ ठोस बर्फ की चादर बिछ गई!

अद्भुत नज़ारा था! प्रकृति के प्रकोप का ऐसा दृश्य हमने कभी नहीं देखा था! अविश्वसनीय और थोड़ा डरावना भी!

ऐसा लग रहा था कि यह कुछ देर चलेगा लेकिन सब कुछ कुछ मिनटों में समाप्त हो गया। जब वह ओलावृष्टि थमी, हल्की बारिश शुरू हो गई और कुछ देर बार वह भी बंद हो गई। फिर तो बच्चे और बच्चों जैसे हमारे कर्मचारी बाहर निकलकर ओले बीनने लगे, एक दूसरे पर उनकी बौछार शुरू कर दी, जैसे बर्फ का कोई खेल हो रहा हो और कुछ तो ओलों को बाल्टियों में इकट्ठा करने लगे। स्वाभाविक ही हम इस दृश्य को कैमेरे और मोबाइल फोनों में कैद करने का लोभ संवरण नहीं कर सके और ओलों की तस्वीरें भी ली गईं: कुछ ओले तो टेनिस की गेंद के बराबर भी थे!

हम लोगों के लिए यह विस्मयकारी था लेकिन आप कल्पना कर सकते हैं कि इस इलाके में इस ओलावृष्टि ने कितना नुकसान पहुँचाया होगा! खेतों में, जहाँ पिछली बारिश के चलते गेहूँ की फसल लगभग नष्ट ही हो गई थी, इस आघात के बाद हर तरफ तबाही का नज़ारा है। सबेरे और शाम आश्रम के गेट पर खड़े हुए हमने सैकड़ों टूटी-फूटी कारों को निकलते देखा, जिनमें किसी की विंडशील्ड्स टूटी है तो किसी की खिड़कियाँ और कुछ कारों में कई जगह खरोंच लग गई है और ढाँचा क्षतिग्रस्त हो गया है। इस मामले में है भाग्यशाली रहे कि हमारी कार में मुश्किल से चार या पाँच डेंट्स लगे हैं!

सबसे बुरी बात यह है कि इस ओलावृष्टि में 14 लोगों की जानें भी गई हैं! कुछ मामलों में सीधे ओलों की मार से और कुछ दूसरे मामलों में तूफान के कारण उड़कर आने वाली किसी सख्त चीज़ के आघात से।

मौसम में बदलाव साफ नज़र आ रहा है। पहले ऐसा बदलाव कभी नहीं देखा गया-और हम इस बदलाव के नतीजे भुगतने के लिए मजबूर हैं!

यमुना आरती – अन्धविश्वास, भोजन की बरबादी, प्रदूषण और मस्ती भरा माहौल – 3 दिसम्बर 2014

हम लोग इस समय खुशियाँ मना रहे हैं-दरअसल मेरे सबसे पहले जर्मन मित्र, माइकल और आंद्रिया यहाँ आए हुए हैं तो उनके साथ आश्रम में हम सब खूब मज़े कर रहे हैं! स्वाभाविक ही वे थोड़ा-बहुत बाहर भी घूमना चाहते हैं इसलिए रमोना उन्हें उन्हें लेकर केशी घाट गई थी और उन्हें यमुना आरती दिखाकर अभी-अभी लौटी है। निश्चित ही मेरी पत्नी के लिए यह कोई नई बात नहीं थी और उसे आरती के दौरान कुछ अधार्मिक अनुभव प्राप्त हुए।

हमारे मित्र, जो स्वयं भी धार्मिक नहीं हैं, रमोना और पूर्णेन्दु के साथ बैठे सारे अनुष्ठान को गौर से देखते रहे। सबसे पहले अनुष्ठान कराने वाले पुरोहित ने नदी में बहुत सारा दूध बहा दिया। उसके बाद उन्होंने देखा कि बहुत सारी मिठाइयाँ यमुना नदी में बहाई जा रही हैं और अंत में हज़ारों की संख्या में गुलाब की पंखुड़ियाँ भी बहाई गईं। नदी में बहती पंखुड़ियों को देखते हुए अचानक उन्हें खयाल आया कि इन पंखुड़ियों का क्या हुआ होगा: वास्तव में महज 100 मीटर आगे कुछ बच्चे इन्हीं पंखुड़ियों को नदी में से निकालकर इकठ्ठा कर रहे थे। फटे-पुराने गंदे कपड़ों में, नंगे पैर और शरीर पर धूल और गंदगी लिपटी हुई। और यही बच्चे कुछ देर पहले दोनों में कुछ गुलाब की पंखुड़ियाँ और एक रुई की बाती रखकर उन्हें हमारी टोली को बेचने की कोशिश कर रहे थे कि वे भी दिया जलाकर दोनों को यमुना में प्रवाहित करें।

उनके लिए यह किसी रहस्य के खुलने जैसा था: एक तरफ लोग सैकड़ों लीटर पौष्टिक दूध नदी के गन्दे पानी में विसर्जित कर रहे हैं और दूसरी तरफ गरीब बच्चे हैं, जो किसी तरह कुछ रुपए कमाकर घर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे उनका परिवार चावल, आटा, दाल और हाँ-दूध-खरीद सके। इतने परिश्रम के बाद भी दूध के साथ नदी में फेंकी जाने वाली मिठाइयों का आनंद वे नहीं ले पाएंगे क्योंकि वे बहुत महंगी हैं और उन्हें खरीद पाना उनके बूते के बाहर की बात है।

इसके अलावा अगर आप नदी को देखें तो सोच में पड़ जाएँगे कि क्या इसे वास्तव में नदी कहा भी जा सकता है! कम बारिश के कारण और दिल्ली शहर में नदी पर बड़े-बड़े बांध बन जाने के बाद आजकल उसमें बहुत कम पानी होता है। नदी के पाट का बड़ा हिस्सा साफ़ दिखाई देता है और जहाँ पहले नावें पर्यटकों को घुमाने ले जाती थीं वहाँ ऊँट इधर-उधर घूमते-फिरते हैं। इस अनुष्ठान के लिए भी उन्हें एक नहर खोदकर पानी को घाट की सीढ़ियों तक लेकर आना पड़ता है। अब इस छोटे से गंदे पानी के गढ़े में ही वे लोग फूल, दूध और मिठाइयाँ फेंकते हैं और पहले से अत्यधिक प्रदूषित पानी को और ज़्यादा प्रदूषित करते हैं।

ज़्यादा से ज़्यादा वह गटर के पानी और दिल्ली से आ रहे रासायनिक कचरे का मिश्रण भर रह गई है। उसमें कोई जीवन नहीं रह गया है। मछली नहीं, कछुए नहीं और न ही कोई दूसरे जीव जंतु, बचपन में जिनके साथ हम पानी में खेला करते थे! वे यहाँ बचे नहीं रह सकते थे-पानी में जान ही नहीं है।

इन सबके बावजूद और इसके बावजूद भी कि दो-दो भोपुओं पर पुरोहितों के कर्कश स्वर गुंजायमान थे और एक दूसरे से होड़ कर रहे थे, रमोना और हमारे मित्रों ने नदी किनारे घूमने का और वहाँ चल रहे अनुष्ठानों का भरपूर आनंद उठाया। कैसे? मेरी पत्नी ने इसे स्पष्ट करने की पूरी कोशिश की: उसे कोई धार्मिक आकर्षण या धर्म के प्रति कोई आदर या लगाव नहीं है। ऐसा कोई एहसास नहीं है कि वहाँ हो आने पर किसी देवी या देवता की कृपा उसे प्राप्त होगी। लेकिन डूबते सूरज की सुनहरी रौशनी में ऐतिहासिक इमारतों के सामने, घाट की शिलाओं पर बैठना, लोगों का गाना-बजाना सुनना और लोगों को एक साथ इतनी बड़ी संख्या में वहाँ से गुज़रते देखना अपने आप में बहुत सुखद एहसास करा रहा था। यह सब एक अनोखा माहौल पैदा करता है, जिसका हिस्सा बनना ही आपको भावविभोर कर देता है।

इसमें कोई दैवी या आध्यात्मिक बात नहीं है। वहाँ कोई भगवान आपको प्रसन्न नहीं कर रहा है। आप खुद प्रसन्न हैं। आप इतने सारे लोगों के बीच खुद को पाकर खुश हैं क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसे लोगों के साथ, उनके साथ बैठकर, आपस में घुल-मिलकर अच्छा लगता है। आप नैसर्गिक सौंदर्य देखकर प्रसन्न होते हैं, हालाँकि वह इससे भी अधिक प्रभावशाली हो सकता था। और आप संगीत का आनंद लेते हैं, दूसरों का गाना-बजाना सुनकर प्रसन्न होते हैं।

क्या यह सब, यह सुखद और आनंददायक माहौल, हम बिना किसी अन्धविश्वास का सहारा लिए, खाने-पीने का सामान बरबाद किए बगैर, नदी को गंदा किए बगैर और बिना प्रदूषण फैलाए पैदा नहीं कर सकते?

वैश्वीकरण के खतरे – जब सारी अच्छी चीज़ें निर्यात कर दी जाती हैं! 10 जुलाई 2014

कल मैंने आपको बताया था कि कैनेरी द्वीप पर हमारे लिए अच्छे टमाटर प्राप्त करना मुश्किल हो गया था-बल्कि कहें, असंभव हो गया था क्योंकि वहाँ पैदा होने वाले सबसे बेहतरीन टमाटर अक्सर दूसरे देशों को निर्यात कर दिए जाते हैं। लेकिन यह समस्या सिर्फ इन द्वीप-समूहों या सिर्फ स्पेन की नहीं है! यह एक विश्वव्यापी समस्या है, एक अलाभकारी व्यवस्था, एक बहुत बड़ा खतरा, जिसने वैश्वीकरण के चलते दुनिया भर को अपनी जकड़ में ले लिया है।

ठीक इसी समस्या का सामना हम भारत में भी कर रहे हैं! दुनिया में आम का सबसे अधिक उत्पादन भारत में होता है। फिर भी देशवासियों की हमेशा यह शिकायत रहती है कि उन्हें अपने ही देश में पैदा होने वाले सबसे बेहतरीन आम देखने तक को नहीं मिलते! पेड़ों पर से उतारकर उन्हें सीधे विदेशी बाज़ारों में बिकने के लिए रवाना कर दिया जाता है।

चावल पर भी यही बात लागू होती है! विदेश में रहते हुए हर व्यक्ति भारतीय चावलों की गुणवत्ता जानते हैं और जब आप यहाँ खरीदे गए चावल घर पर पकाते हैं तो सारी रसोई गमक उठती है- लेकिन भारत में यह चावल मुश्किल से मिल पाता है!

भारत में चाय और कॉफ़ी भी बहुत पैदा होती है! आसाम और दार्जिलिंग की चाय दुनिया भर में मशहूर है लेकिन कल ही किसी ने मेरे ब्लॉग पर टिप्पणी करते हुए बताया कि भारत की सबसे उत्कृष्ट चाय तो सीधे निर्यात कर दी जाती है! उसी व्यक्ति ने आश्चर्य व्यक्त किया कि आखिर भारत में हर कोई इंस्टेंट कॉफ़ी क्यों पीता है-सारी असली, शुद्ध कॉफी कहाँ गायब हो जाती है?

यह सब पैसे का खेल है। पश्चिमी देश कुछ सामानों की ज़्यादा कीमत अदा करते हैं लिहाजा उन चीजों को निर्यात कर दिया जाता है भले ही उन्हें पैदा करने वाले ही उन सामानों से महरूम हो जाएँ। यह सामान उन्हें कम मात्रा में ही उपलब्ध हो पाता है और जो होता है, वह भी कम गुणवत्ता वाला, घटिया होता है। इसमें लाभांश तो बहुत अधिक है मगर देशवासियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है और इसके अलावा इस व्यवस्था में उन सभी बातों की उपेक्षा की जाती है जिसे आप संवेदनशीलता, मानवता और सहज-बुद्धि कहते हैं!

सिर्फ आप अफ्रीका की हालत पर नज़र दौड़ा लीजिए! विशाल बहुराष्ट्रीय कंपनी, नेस्ले ने अफ्रीका के तमाम पानी के स्रोत खरीद लिए हैं और वहाँ के गाँवों को और स्थानीय लोगों को उनके खेतों के लिए पानी मिलना मुश्किल हो रहा है! उनके पानी का निजीकरण कर दिया गया है और अब ये कम्पनियाँ उसे बोतलों में भरती हैं और दुनिया भर के बाजारों में बेचकर अनाप-शनाप मुनाफा कमाती हैं। या फिर उन्हीं देशों में महँगे दामों में बेचकर मुनाफा कमाती हैं-उन्हीं लोगों को बेचकर, जिन्हें पहले पानी मुफ्त उपलब्ध था! और इस बात का तो सवाल ही नहीं उठता कि वे उन लोगों को, जो उन्हीं की फैक्ट्रियों में काम करते हैं, पर्याप्त मजदूरी अदा करते होंगे कि वे उनका बोतलबंद पानी पीने के बाद अपने परिवार का भरण-पोषण भी ठीक तरह से कर सकें! इसलिए अब स्थानीय लोगों को हैण्ड-पम्प से पानी भरने बहुत दूर जाना पड़ता है और उसे किफ़ायत के साथ इस्तेमाल करना पड़ता है कि दिन भर के लिए पर्याप्त पानी घर में हर वक़्त उपलब्ध रहे।

पानी। चावल। फल। बहुत साधारण, रोज़मर्रा की चीजें! वैश्वीकरण के चलते हर कोई चाहता है कि अच्छी से अच्छी चीजें उसे हर वक़्त, उसके घर पर उपलब्ध हों। क्या हम पल भर ठहरकर यह विचार नहीं कर सकते कि भले ही यह सब हमारे लिए बड़ा सुविधाजनक हो मगर इसका हमारी धरती पर विनाशकारी असर होता है? कि लोग भूखे मर रहे हैं और उनके पास पीने का पानी नहीं है क्योंकि दूसरे कुछ लोगों को सिर्फ अपनी सुविधा और आराम की चिंता है या सिर्फ इस बात की कि ज़्यादा से ज़्यादा लाभांश कैसे कमाया जाए, अमीर कैसे हुआ जाए!

आप कहेंगे कि यह तो दुनिया भर की विशाल और ताकतवर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मामला है, हम क्या कर सकते हैं? लेकिन नहीं, आप बहुत कुछ कर सकते हैं!

पीछे मुड़कर देखिए और विचार कीजिए कि आपका भोजन कहाँ से प्राप्त होता है! जब भी संभव हो, स्थानीय सब्जियाँ और फल खरीदें; जैविक (आर्गेनिक) खेती या जैविक पैदावार का लेबल देखकर ही चीजें खरीदें; हमेशा न्यायपूर्ण लेन-देन (व्यापार) सुनिश्चित करें भले ही आपको कुछ महँगा खरीदना पड़े। अपने आप पर और अपने उपभोग पर नज़र रखें।

अगर हम इतना भर कर सकें तो हम सब मिल-जुलकर इस संसार को अच्छी रहने लायक जगह बना सकते हैं!

खूबसूरत ग्रान कनारिया द्वीप पर आनंद मनाते हुए – 25 जून 2014

ग्रान कनारिया के हमारे दौरे का यह अंतिम सप्ताह है और मैं सोचता हूँ, यहाँ की अपनी गतिविधियों की एक झलक आपके सम्मुख प्रस्तुत करने का यह उचित समय है। आपको भी तो पता चले कि यहाँ क्या चल रहा है, हम लोग क्या कर रहे हैं, कैसे इस सुंदर द्वीप की खुली वादियों में मौज-मस्ती कर रहे हैं!

क्योंकि अपने कुछ कार्यक्रम प्रस्तुत करने हम यहाँ आए हैं इसलिए शुरू में ही तरह-तरह की कार्यशालाएँ और कई व्यक्तिगत सत्र आयोजित कर चुके हैं। लेकिन हमारी प्यारी मित्र बेट्टी के साथ हमें न सिर्फ काम करने का बल्कि ग्रान कनारिया में घूमने-फिरने और वहाँ रहने वाले लोगों को नजदीक से जानने-समझने का मौका भी मिला कि वे कैसे जीवन बिताते हैं, उनका यह द्वीप कैसा नज़र आता है, यहाँ क्या-क्या देखने लायक हैं!

इसे महाद्वीपों का लघु रूप (miniature continent) कहा जाता है और हमने पाया कि यह बात पूरी तरह सच है। हम मज़ाक-मज़ाक में कहते रहते हैं कि यह भारत की तरह है, जहाँ साल के किसी भी समय किसी भी मौसम का आनंद लिया जा सकता है-फर्क सिर्फ इतना है कि ऊपर से नीचे तक इस द्वीप को कार द्वारा ज़्यादा से ज़्यादा तीन घंटे में पार किया जा सकता है! ग्रान कनारिया और कैनेरी द्वीप स्पेन के अधिपत्य में है मगर वास्तव में दोनों ही मुख्य भूमि से बहुत दूर हैं और अफ्रीका से ज़्यादा नजदीक पड़ते हैं। मोरक्को यहाँ से सिर्फ 95 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और आप आराम से जहाज़ से वहाँ पहुँच सकते हैं!

हम लोग यहाँ की राजधानी, लास पामास डी ग्रान कनारिया में रह रहे हैं। हमारा फ्लैट समुद्र किनारे बीच पर ही है-और इसलिए हम लगभग रोज़ ही बीच पर घूमने निकल जाते हैं! यह शहर द्वीप के दक्षिणी भाग में है मगर हमारे कुछ कार्यक्रम उत्तरी भाग में भी आयोजित थे और एक दिन हम उस तरफ घूमने-फिरने और पर्यटन के इरादे से भी चले गए थे। मैं अचंभित रह गया था: हम लोग विशाल सैंड ड्यून्स (रेट के टीलों) पर खड़े थे और जैसे सामने विशाल रेगिस्तान था और पीछे समुद्र! यह अद्भुत जगह मास पालोमास कहलाती है।

रेत के टीलों के बाद हम पर्यटन के लिए ग्रान कनारिया के सबसे मशहूर समुद्री बीच पर घूमने गए और एक बार फिर वहाँ की नर्म रेत और समुद्र का आनंद लिया। तो इस तरह निश्चय ही हम पर्यटकों के रूप में भी इस जगह पूरा-पूरा मज़ा ले रहे हैं-और यह सब उस जगह, जहाँ जर्मन पर्यटक इतनी अधिक संख्या में आते हैं कि यहाँ के सभी सूचना-पट्ट स्पेनिश और अंग्रेजी के अतिरिक्त जर्मन भाषा में भी लिखे गए हैं और रेस्तराँ में वेटर जर्मन भाषा भी बात करते हैं। यहाँ तक कि यहाँ जर्मन टीवी कार्यक्रमों की जानकारी युक्त पत्रिकाएँ भी प्राप्त हो सकती हैं।

एक दिन बेट्टी हमें पहाड़ियों पर ले गई-बहुत ऊंचे नहीं- और हमें इलाके के अंदरूनी हिस्सों में स्थित गाँवों, चित्ताकर्षक प्राकृतिक दृश्यों और वहाँ की सुन्दर इमारतों का दर्शन कराया। वहाँ हमें पर्यटक दिखाई नहीं दिए, केवल स्थानीय लोग अपने दैनिक कार्यों में लगे हुए। दरअसल यह द्वीप इतना छोटा है कि सिर्फ गाँवों में ही नहीं, पूरे द्वीप में अधिकांश लोग एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते हैं! बेट्टी के साथ हम जहाँ भी गए उसके जान-पहचान का कोई न कोई मिल ही जाता-यहाँ तक कि ग्रान कनारिया से टेनेरिफ आते और वापस जाते हुए जहाज़ पर भी!

टेनेरिफ द्वीप कैनेरी द्वीप समूह का ही एक द्वीप है, जहाँ हम तीन दिन पहले गए थे। वहाँ हमारी तीन डांस-पार्टियाँ संपन्न हुईं-और थोड़ा पर्यटन भी। टेनेरिफ द्वीप पर आप और स्पष्टता से देख सकते हैं कि कैनेरी द्वीप-समूह ज्वालामुखी से उत्त्पन्न द्वीप-समूह है। सारे द्वीप पर कई ऊँची-नीची पहाड़ियाँ हैं और समुद्र किनारे आप देख सकते हैं कि यहाँ के पत्थर कभी पिघला लावा रहे होंगे और बाद में ठन्डे होकर पत्थरों और चट्टानों में तब्दील हो गए। वहाँ चट्टानों और नीले समुद्र के बीच रमोना, यशेंदु और बेट्टी ने तैराकी का खूब मज़ा लिया! बाद में, मैंने और अपरा ने भी स्वीमिंग पूल का एक चक्कर लगाकर कसर पूरी की!

और इस वक़्त मैं ज़ायकेदार, ताज़े संतरे के रस से भरे गिलास को उठाकर आप सभी शानदार मित्रों के लिए कामना कर रहा हूँ कि आपका समय भी इसी तरह खुशगवार हो- दुनिया में एक से एक जगहें हैं, जहाँ मित्रों और परिवार के साथ सुखद समय व्यतीत किया जा सकता है!

नग्नता की अधिकता आपके शिश्नोत्थान को कम करती है! 6 फरवरी 2014

मैंने कल कहा था कि बुर्के में ढँकी-छिपी महिलाओं के साथ भी बलात्कार होता है। कोई नहीं कह सकता कि वे अंगप्रदर्शक कपड़े पहनती हैं। जबकि यह सिद्ध करता है कि कपड़े बलात्कार का कारण नहीं हैं, वहीं यह उस तथ्य को भी उजागर कर देता है, जिसे मैं बार-बार दोहराता रहा हूँ: शरीर का वह अंग, जिसे आप हमेशा छिपाकर रखते हैं, आसपास के लोगों के लिए सेक्सी बन जाता है क्योंकि उसे वे अक्सर देख नहीं पाते। शायद यही बात थी जिसने एक व्यक्ति को यह कहने पर उद्यत कर दिया कि यौन उत्पीड़न पर काबू पाने के लिए भारत में नग्न कॉलोनियों की स्थापना कर देनी चाहिए!

भले ही इस राष्ट्रीय समस्या को सुलझाने के लिए यह कोई गंभीर सुझाव नहीं है, खासकर भारत जैसी यौन-कुंठित संस्कृति में। लेकिन उनकी यह बात एक सत्य की ओर इंगित अवश्य करती है और आज मैं इसी बात का विस्तार के साथ विश्लेषण करना चाहता हूँ।

किसी प्रासंगिक उदाहरण की खोज में मुझे विभिन्न पश्चिमी देशों के नग्न समुद्री बीचों की अपनी यात्राओं की याद आ गई, जहां नंग-धड़ंग पुरुष और महिलाएं घंटों धूपस्नान लेते रहते हैं। कुछ लोगों को यह हास्यप्रद लग रहा होगा कि अपनी यात्राओं में मैं ऐसे नग्न समुद्री बीचों पर भी जाया करता था, लेकिन मैं नहीं समझता कि यह कोई आश्चर्य की बात है। मैं सदा से ऐसे लोगों के साथ रहा हूँ, जो प्राकृतिक ढंग से जीने के हामी रहे हैं तथा अपने नंगे शरीर से अधिक प्राकृतिक और क्या होगा? और अब उस प्रश्न का मुख्य हिस्सा कि आप यह क्यों समझते हैं कि ऐसे बीचों पर जाना, जहां हर कोई नंगा है, एक अजीबोगरीब बात है? क्योंकि आप सोचते हैं कि वहाँ सभी पुरुष अपने उत्थित लिंगों के साथ आसपास लेटी नंगी औरतों की तरफ नज़रें गड़ाए घूर रहे होंगे!

अगर आप कभी ऎसी जगहों में गए हैं तो जानते होंगे कि इस बात में कोई सचाई नहीं है। मैं कई बार भीड़ भरे नग्न समुद्री बीचों पर गया हूँ, जहां पुरुष, महिलाएं, किशोर और बच्चे निस्संकोच घूमते दिखाई देते हैं। मैंने आज तक एक भी पुरुष नहीं देखा, जिसका शिश्न उन्नत दिखाई दे रहा हो।

क्यों? क्योंकि नग्नता एक बहुत स्वाभाविक बात है और जब सभी नग्न हैं तो फिर उसमें कोई विशेषता नहीं रह जाती, सारी कामुकता समाप्त हो जाती है कि शिश्नोत्थान हो जाए। इसीलिए ऐसे माहौल में किसी को यौन रूप से प्रताड़ित करने के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता।

समाज ने इन जननांगो के साथ शर्म को इस तरह से संयुक्त कर दिया है कि कई देशों के लोग नग्न बीचों, आरामगाहों और कॉलोनियों के बारे में सुनकर दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं। उनके मुंह खुले के खुले रह जाते हैं, जब वे सुनते हैं कि दुनिया में ऐसी जगहें भी हैं जहां लोग शरीर पर बिना कुछ ओढ़े, आदमजाद नंगे घूमते-फिरते दिखाई देते हैं। जितना ही आप अपने शरीर को ढँकते हैं, जितना आप उसे छिपाते हैं उतना ही सेक्सी वह बन जाता है। कल को अगर आप अपने पैरों के नाखूनों को छिपाने लगें तो वह भी ज़्यादातर लोगों को उतना ही सेक्सी लगने लगेगा, जितना उन्हें ये जननांग आज लग रहे हैं।

जब आप किसी चीज़ को ढँक देते हैं तो लोग देख नहीं पाते कि उसमें कुछ भी विशेष नहीं है, उसमें कोई असाधारणता नहीं है, कि करोड़ों-अरबों पुरुषों और महिलाओं के पास वही है जो उनके पास है, वही शारीरिक अंग हैं, वही उत्तेजनाएँ, भावनाएँ और शारीरिक आवश्यकताएँ हैं। छिपाने पर उनकी यह उत्सुकता शांत नहीं होती।

अब यह मत समझिए कि अपनी बात को सही साबित करने के लिए मैं अपने आश्रम में नग्न लोगों का समाज स्थापित करने जा रहा हूँ। लेकिन संभव है भविष्य में किसी समय उस टिप्पणीकार की सलाह पर सरकारें खुद नग्न कालोनियों की स्थापना करें, जिससे यौन अपराधों पर रोक लगाई जा सके। जब तक यह नहीं होता तब तक भारतीयों को अपने भीतर बहुत से बदलाव लाने की जुगत करनी होगी!

बदलाव चाहते हैं तो पहले स्वयं को बदलिए – 7 नवम्बर 08

किसी भी रिश्ते में स्वीकारभाव का होना बहुत जरूरी है। यदि हम दूसरों को जस का तस स्वीकार नहीं कर सकते तो हम किसी के साथ भी एक सफल रिश्ता नहीं बना सकते। अगर हम हर वक़्त किसी को बदलने की ज़द्दोज़हद में लगे रहते हैं और चाहते हैं कि वह हमारे मनमुताबिक बदल जाए, तो यह निश्चित है कि इस कोशिश में हमें ही सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचेगा। आखिर हम दूसरे को बदलना क्यों चाहते हैं? हम खुद को क्यों नहीं बदल सकते? और अग़र यदि आप स्वयं को ही नहीं बदल सकते तो दूसरे में बदलाव की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? यदि आप वास्तव में परिवर्तन चाहते हैं तो सबसे पहले अपने भीतर झांककर देखें और यह जानने की कोशिश करें जो आप साथी से चाहते हैं क्या वह सब आप स्वयं कर पाए हैं। यदि नहीं, तो सबसे पहले स्वयं को बदलें। असल में होता यह है कि लोग दूसरों को बदलना चाहते हैं और शायद इसके ज़रिए समाज को और यहां तक कि सारी व्यवस्था को बदलने का मंसूबा रखते हैं। परंतु भरसक कोशिश करने के बावजूद वे इसमें सफल नहीं हो पाते। वे सफल हो भी नहीं सकते क्योंकि दूसरों को जो शिक्षा वे देते हैं उसका स्वयं पालन नहीं करते। लेकिन यदि प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को बदलने की कोशिश करे तो चीज़ें अवश्य बदल सकती हैं।

रिश्ता सफल होता है समर्पण से, अहम या उम्मीदों से नहीं। उम्मीदों को पीछे छोड़ना होगा और साथी को स्वीकार करना होगा, उसका आदर करना होगा। मैं एक बार फिर कहना चाहूंगा कि यदि प्रेमसंबंध में आप स्वीकारभाव, आदर और प्यार चाहते हैं तो निश्चय ही पहले स्वयं को स्वीकार, आदर और प्यार करना होगा।

आज अक्षय नवमी है। इस दिन लोग यहाँ आंवला के वॄक्ष की पूजा करते हैं। कई आयुर्वेदिक औषधियों में आंवले का प्रयोग किया जाता है। इसमें भरपूर मात्रा में विटामिन सी पाया जाता है। यह पाचन के लिए अच्छा होता है और आपको युवा बनाए रखता है। एंटी – एजिंग लोशनों में इसका इस्तेमाल किया जाता है। आयुर्वेद कहता है आंवला ‘अमृत‘ है। कभी भी और किसी भी रूप में इसका सेवन करना फायदेमंद होता है। यह सदैव आपके लिए गुणकारी है। मैं इस तरह की परंपराओं को पसंद करता हूं जो हमें प्रकृति के नज़दीक ले जाती हैं।