अम्माजी के बगैर एक साल- 10 दिसंबर 2013

आज अम्माजी के देहांत की पहली बरसी है। एक साल हो गया मगर उस रात और उस दिन को हम इस तरह याद करते हैं जैसे कल ही की बात हो। पूरा एक साल बीत गया लेकिन एक दिन भी ऐसा नहीं गुज़रा जब हमने उन्हें याद न किया हो, उनकी कमी महसूस न की हो।

बहुत दिनों तक उनके जाने का दर्द इतना सघन था कि हम उनकी कोई तस्वीर नहीं लगा सके। मुझे कंप्यूटर पर उनके चित्रों को देखना भी गवारा नहीं था, खासकर जब अपरा आसपास होती थी। अपरा बेतरह उनकी कमी महसूस करती थी और हम देखते थे कि जब भी वह उनकी कोई तस्वीर देखती है तो उदास हो जाती थी। उसका छोटा सा दिल यह समझ पाने में असमर्थ था कि क्यों अम्माजी अब उसके साथ नहीं रहतीं। आखिरकार इस दीवाली पर हमने उनका एक बड़ा-सा चित्र बनवाया और बब्बाजी के कमरे में एक दीवार पर टांग दिया।

बब्बाजी बताते हैं कि आजकल वे उस फोटो की तरफ देखते हुए अम्माजी से ‘सुप्रभात’ और ‘शुभरात्रि’ कहते हैं। उनके बिस्तर पर अम्माजी का स्थान खाली पड़ा रहता है और हम लोग अम्माजी से उनके वियोग की कल्पना करते रहते हैं, जिनके साथ उन्होंने प्रेम-प्लावित पचास वर्ष व्यतीत किए थे।

10 दिसंबर 2012 के बाद हम सभी के जीवन पूरी तरह बदल चुके हैं। पूरे आश्रम में तब्दीली आ गई है। रसोई उनका साम्राज्य था, जिसने अपनी साम्राज्ञी को खो दिया है। ज़्यादातर हमारे कर्मचारी वही हैं और उन्हीं के द्वारा प्रशिक्षित हैं लेकिन फिर भी हम यह नोटिस करते रहते हैं कि अब रोज़मर्रा के काम उतनी सहजता और निर्विघ्नता से पूरे नहीं होते। सब कुछ उसी तरह चल रहा है, कुछ भी रुकता नहीं है, मगर अब वे दो हाथ अनुपस्थित हैं। भोजन स्वादिष्ट है मगर उसमें अम्माजी का प्रेम नहीं है।

अब वही आस्वाद मिलना मुश्किल है और इसलिए उनके प्रेम-पगे व्यंजनों को याद करते हुए, उनके खास व्यंजनों को सगर्व ग्रहण करते हुए अनायास आँखों में पानी भर आता है। लेकिन हम अब भी नए से नए व्यंजन बनाने की कोशिश करते रहते हैं, तरह-तरह से मसालों को मिलाकर प्रयोग करते हैं और सोचते हैं कि काश आज हमें ऐसा करते हुए देखने के लिए वह हमारे पास होतीं। कैसे वह हमारे प्रयोगों के दौरान उन्हें और ज़्यादा स्वादिष्ट बनाने के लिए सलाह देतीं। कैसे वह बतातीं कि मसालों का अनुपात क्या हो, या उसमें कोई और मसाला मिलाने पर वह अधिक स्वादिष्ट हो सकता है। कैसे अपरा को वह रोटी बेलना या सब्जियाँ चलाना सिखातीं।

अम्माजी का सब्जियों का बाग उनके साथ ही चला गया। हममें से किसी में भी न तो इतना धीरज है न ही समर्पण कि उनकी तरह आश्रम परिसर में ही सब्जियाँ उगा लें। अब कोई बगीचे की बाड़ पार करके भीतर प्रवेश ही नहीं करना चाहता, उसके मन में सगर्व अपने हाथों में मैथी, पालक, गोभी या बैंगन उठाए अम्माजी की तस्वीर उभर आती है और वह हताश हो उठता है।

उनकी और भी बहुत सी यादें हैं, उनसे संबन्धित बहुत से विचार, भावनाएँ हैं और सभी एक ही बात की तरफ इशारा करते हैं: हम सभी अपनी माँ की, पत्नी, बेटी, सास और दादी की कमी महसूस कर रहे हैं। लेकिन अपरा को बड़ा करने के सुख के साथ हर दिन हमारी दुनिया अम्माजी को याद करते हुए एक-एक कदम आगे सरक रही है।

अम्माजी के देहांत के एक साल बाद अपरा उनके बारे में किस तरह सोचती है? 9 दिसंबर 2013

आज हमारी बच्ची अपरा 23 माह की हो गई। आज हम एक साल पहले के इसी दिन को याद करते हैं, जब अपरा 11 माह की थी और हम सबने मेरी माँ, जिन्हें हम सब अम्माजी कहा करते थे, के साथ आखिरी दिन व्यतीत किया था। उस रात, 10 दिसंबर 2012 के दिन तड़के उन्होंने इस संसार से बिदा ली थी।

अम्माजी जी के जाने के बाद हमने नोटिस किया कि अपरा उनके कमरे में जाकर उनके साथ खेलने की ज़िद करती थी। उस समय वह ठीक तरह से बोल भी नहीं पाती थी लेकिन 'अम्मा' शब्द उसके मुंह से स्पष्ट निकलता था। वह पूछती, अम्माजी कहाँ है?-और हम उसे बताते थे कि वह दूर, बहुत दूर चली गई है।

हम चाहते थे कि वह याद करे और हमने उसे अम्माजी के बारे में बताया। जब हम अपरा के पुराने चित्र देखते हैं तो, स्वाभाविक ही, अम्माजी अक्सर उनमें नज़र आती हैं और उन सभी चित्रों को अपरा ने देखा हुआ है। बब्बाजी के कमरे में अम्माजी और अपरा का एक बहुत बड़ा सा चित्र है और जब भी अपरा उसे देखती है तो पूछती है, "अम्माजी कहाँ है?" और खुद ही उसका जवाब भी देती है: "दूर, बहुत दूर।"

अपरा भोजन में बुकुनू (एक जड़ीबूटियों वाला नमक) पसंद करती है और जब बब्बाजी पूछते हैं कि यह किसने बनाया तो कहती है: 'अम्माजी'।

अम्माजी ने बहुत से ऊनी कपड़े बुनकर रखे हैं, जिनमें एक बड़ा सा पीला शाल भी है। अपरा को हम रोज़ सबेरे यही शाल उढ़ा देते हैं। मैंने उसे बताया है कि यह शाल किसने बनाया है और वह कभी कभी अपने आप से पूछती है, "यह शाल किसने बनाया?" और खुद ही जवाब दे लेती है: 'अम्माजी ने!'

और जब हम उन पुराने चित्रों को देख रहे होते हैं, अपरा कभी-कभी कह उठती है, "अम्माजी अपरा को बहुत प्यार करती थी!"

हाँ, करती थीं। हम चाहते थे कि वह अपनी दादी को और उनके प्रेम को याद रखे। हम उसके बारे में उसे बताते रहते हैं, उसे बीच-बीच में याद दिलाते रहते हैं और हालांकि वह उनकी मृत्यु के समय सिर्फ ग्यारह माह की थी फिर भी वह उनके प्रेम को अब भी याद करती है, प्रेम, जो उसके जीवन का हिस्सा बन चुका है और हमेशा उसके साथ रहेगा।

अम्माजी इस प्रेम के जरिये सदा हमारी बच्ची के साथ रहेंगी।

माँ के बगैर मेरा पहला जन्मदिन – जन्मदिन न मनाने का फैसला- 14 अक्टूबर 2013

आज मेरा 42वां जन्मदिन है। 41 जन्मदिन मना चुकने के बाद मुझे अब यह तथ्य आश्चर्यजनक नहीं लगता कि मेरे जीवन का एक साल और बीत गया। इसके बावजूद अपने पिछले जन्मदिनों से यह जन्मदिन कुछ अलग है।

जन्मदिन क्या है? क्या यह सिर्फ अपना उत्सव मनाने का दिन है? आप इस खुशी में पार्टी करना चाहते हैं कि आज के दिन आप इस धरती पर अवतरित हुए? इस संयोग पर लोग आपको बधाई दें? दरअसल इस दिन को मैं इस तथ्य से बढ़ कर मानता हूँ कि आप पैदा हुए, दरअसल यह वह दिन है, जिस दिन आपकी माँ ने आपको जन्म दिया! दरअसल यह सिर्फ आपका विशिष्ट दिन नहीं है बल्कि आपके साथ आपकी माँ का भी है!

एक पिता के रूप में अब मैं जानता हूँ कि अपनी बेटी के जन्म दिवस का मैं किस बेसब्री के साथ इंतज़ार कर रहा हूँ। वह दिन अभी तीन माह दूर है, जब वह दो साल की हो जाएगी। लेकिन मैं अभी से उस दिन क्या-क्या करना है, इसकी योजना बना रहा हूँ और बेटी के आनंद की कल्पना करते हुए पुलकित होता रहता हूँ। जब भी मैं और अपरा की माँ इस विषय में बात करते हैं, बातों का रुख उस दिन की तरफ मुड़ जाता है, जिस दिन अपरा इस संसार में आई थी। नहीं, सिर्फ वह दिन नहीं बल्कि उसके पहले और बाद के कई-कई दिन।

चालीस साल बाद शायद एक माँ के मन में उतने पुराने जन्मदिन की उतनी उत्कंठा नहीं होती होगी। लेकिन मुझे विश्वास है कि उसके जन्मदिन पर उस प्रभात, दोपहर, शाम या रात की याद आती होगी, जब उस बेटे या बेटी ने, तब एक छोटी-सी जान, इस संसार का उजाला देखा होगा। कैसे उसने उस हल्के-फुल्के बच्चे को वात्सल्य और उमड़ते प्रेम के गहरे एहसास के साथ बाहों में भर लिया होगा।

अपनी माँ के बगैर मेरा यह पहला जन्मदिन है। पिछले साल मेरा जन्मदिन, अपने विवाह की सालगिरह और दीवाली मनाने के बाद अचानक वह हमें छोड़कर चली गई। वह एक अप्रत्याशित सदमा था कि वह इतनी कम उम्र में हम सबको दुख और हैरानी के आलम में छोड़ कर चल दीं। इस घटना ने हमारे जीवन की दिशा ही बदल दी। इसीलिए वह आज भी हमारे हर कामों में शामिल होती हैं और कोई दिन ऐसा नहीं गुज़रता जब हम उनकी याद नहीं करते। भोजन करते समय हम अक्सर कहते हैं कि खाना अब वैसा स्वादिष्ट नहीं होता जैसा माँ बनाती थीं, आखिर उसमें उनके हाथों के वात्सल्य की खुशबू और स्वाद होता था। यह पहला मौका है, जब मैं भारत में, अपने आश्रम में अपना जन्मदिन मना रहा हूँ और माँ मेरे लिए जन्मदिन की मिठाइयाँ और खाना नहीं बना रही हैं। आज मेरा मन ही नहीं है कि अपना जन्मदिन मनाऊँ और हमने यही निर्णय किया है कि किसी मेहमान को इस अवसर पर आमंत्रित नहीं करेंगे।

यह दिन मैं अपनी प्यारी माँ को समर्पित करना चाहता हूँ, मेरी कल्पना में दुनिया की सबसे शानदार माँ! अम्माजी को, जिन्होंने मुझे और मेरे तीन सहोदरों को जन्म दिया और जो मेरे जीवन के चालीस साल, जिनमें न सिर्फ मैंने अपने जीवन को बदला बल्कि उसके जीवन में भी बदलावों का कारण बना, मुझसे बिना शर्त, निस्वार्थ प्रेम करती रहीं। उन्हें अपनी बेटी को अपने से पहले दुनिया से बिदा होते देखने का दुख झेलना पड़ा। जिन्होंने अपनी पुत्री की तरह मेरी पत्नी का घर में स्वागत किया और जिनकी सबसे बड़ी खुशी हमें खाना खिलाना और हमें खुश देखना होती थी। जब मेरी अपनी नवजात बेटी अपरा को उन्होंने अपने हाथों में लिया था तब प्रसन्नता से चमकते उनके चेहरे पर आई मुस्कुराहट मैंने सालों नहीं देखी थी और आज भी उसे भूल नहीं पाता। जी हाँ, मेरा जन्मदिन ही वह दिन है, जब यह महान महिला अम्माजी यानी मेरी माँ बनी थीं।

आश्रम वापसी: घर वापसी सफर का सबसे सुखद हिस्सा होता है! – 26 जून 2013

सुखद हवाई सफर के बाद कल हम सब सकुशल भारत और फिर आश्रम वापस लौट आए। रात का सफर था इसलिए अपरा पूरे वक़्त सोती रही और हम भी कुछ देर आँखें मूँद पाए। हमने उसे बताया था कि मेरा भाई पूर्णेंदु हमें लेने आएगा और हम आश्रम पहुँचकर सबसे मिलेंगे। हम विमान-तल का प्रांगण पार कर रहे थे और वह आश्रम के लोगों के नाम ले-लेकर और बीच-बीच में कुछ जर्मन दोस्तों के नाम जोड़कर तुकबंदियों में कुछ गुनगुनाती जा रही थी। हम विमान-तल से बाहर निकलकर जैसे ही पूर्णेन्दु से मिले वह अनिवर्चनीय खुशी से उछल पड़ी और फिर अचानक झेंप गई। मुसकुराते हुए वह उसकी गोद में चढ़ गई और बहुत खुश हुई मगर लगता था कि खुशी के अतिरेक से वह स्तब्ध रह गई थी। मगर उसकी यह हालत ज़्यादा देर नहीं रही! जल्द ही वह कार के भीतर थी और आसपास के यातायात का जायजा लेते हुए बीच-बीच में उसका बखान करती जाती थी। गायें, घोड़े, पैदल लोग, हॉर्न के कर्कश स्वर और वे सब चीज़ें जो जर्मनी में वह पिछले सवा माह देख नहीं पाई थी। एक और बात हुई, जो जर्मनी में कभी नहीं हुई थी मगर भारत में अक्सर हुआ करती थी-गाड़ी पंक्चर हो गई! इस घटना के चलते हमें आश्रम पहुँचने में कुछ देर हो गई, मगर हम अंततः आश्रम पहुँच गए।

अपरा के साथ घर लौटना बहुत सुखद था। सभी हमें मिस कर रहे थे लेकिन अपरा को सबसे ज़्यादा। वे अपरा के पास आकर उसे प्यार करने लगे, गोद में लेकर खिलाने लगे। शुरू में तो वह आश्चर्यचकित रह गई और फिर अचानक उन्हें पाकर बहुत खुश हो गई। वह एक के बाद एक सबके पास गई जैसे सुनिश्चित कर रही हो कि सारे आश्रमवासी उपस्थित हैं। फिर वह जय सिंह और मोहित के साथ शाम को पूरे समय खेलती रही। वह उन्हें देखकर खुशी से इतना उत्तेजित थी कि बार-बार जय सिंह का चेहरा अपने हाथों में लेकर उसका नाम पुकारती। उसके साथ खेलते हुए वे दोनों भी खुशी से पागल हो रहे थे। आश्रम में हर एक के सामने एक नई समस्या अवश्य पेश आई: वह यह कि अब सबको जर्मन भाषा सीखनी थी। अपरा ने बहुत ज़्यादा जर्मन शब्द सीख लिए थे और जर्मन बोलने की आदत भी उसे पड़ गई थी इसलिए कई बार उसकी बातें उन्हें समझ में नहीं आती थीं। वह अपना कहा दोहराती और जिसकी अंग्रेज़ी या हिन्दी उसे मालूम होती उन्हें अंग्रेज़ी या हिन्दी में दोबारा कहती मगर कई बार लोगों को रमोना के पास जाना पड़ता कि वह क्या कह रही है, या फिर अंदाज़ से काम चलाना पड़ता!

उसके बाद अपरा सो गई और देर तक सोती रही। मैं और रमोना जागते रहे क्योंकि भारतीय टाइम-ज़ोन में लौटने का यही तरीका हमें ठीक लगा। हमारा बच्चा अभी यह सब क्या जाने! उसने अपनी पूरी नींद ली और भारतीय समय के अनुसार सोने का उसका कोई इरादा नज़र नहीं आ रहा था। जर्मनी में उसका सोने का समय 9 बजे था और उसी वक़्त अंततः वह सोई। इस तरह हम लोग साढ़े बारह बजे सो पाए। स्वाभाविक ही हम भी उसी अनुपात में देर तक सोते रहे! यात्रा की थकान और पिछली रात नींद पूरी न होने का असर सुबह दिखाई दिया। जब हम सुबह उठे तो दस बज चुके थे। लेकिन हमें विश्वास था कि दो चार दिन में यह समय की उलझन दूर हो जाएगी।

यह बहुत बढ़िया और सुखद वापसी थी और अपरा के कारण वह और शानदार हो गई। अपरा नहीं होती तो यह निश्चय ही मेरे जीवन की सबसे दुखद वापसी होती क्योंकि मेरी माँ पहली बार हमारा स्वागत करने के लिए आश्रम में विद्यमान नहीं होतीं। निश्चय ही वहाँ भोजन था, गले लगाने के लिए मित्रों और रिश्तेदारों के कंधे थे लेकिन भोजन माँ के हाथ का नहीं था और गले लगाने के लिए उसकी बाहें नहीं थीं। वह आश्रम में नहीं थी और हमने उसे बहुत मिस किया।

लेकिन अब हम अपरा की तरफ देखते हैं और खुश हो लेते हैं। मुझे महसूस होता है कि मेरी माँ अपरा के रूप में जीवित है और पहले ग्यारह माह में उन्होंने उसे जो शिक्षा दी उसी से वह इतनी समझदार बन सकी है।

समय आपके सारे दुख-दर्द हर लेगा, उसे अवसर दीजिए – 4 जनवरी 13

कुछ दिनों के भीतर अम्माजी को गुज़रे हुए एक महीना हो जाएगा। मैंने पहले ही बताया है कि यह पूरा महीना हमारे लिए बहुत तनावपूर्ण रहा है और इस दौरान जब मैं अपने आप को और अपनी संवेदनाओं, भावनाओं को क़रीब से देख रहा था, मैंने एक बार फिर यह महसूस किया कि जीवन में समय की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है और बीत रहा हर पल हमारी भावनाओं पर कितना असर डालता है। मैं मानता हूं कि समय वास्तव में दुख से उबारता है – और आप यह भरोसा कर सकते हैं कि समय अवश्य आपको आपकी भावनाओं से निपटने में सहायता करेगा।

बिल्कुल प्रारंभ में, अम्माजी के गुज़रने के पहले कुछ घंटों में मैं सदमें में था। कोई आंसू नहीं थे। और मैं ऐसा महसूस कर रहा था जैसे अभी वास्तव में वे गई नहीं हैं। मस्तिष्क वहीं था, यह सोचता हुआ कि अम्माजी जा चुकी हैं, बब्बाजी और नानीजी को उनकी पीड़ा में देखता हुआ लेकिन भावनाएं सत्य के उस बिंदु पर तब तक नहीं पहुंची थीं। यह सत्य मुझ तक तब जाकर पहुंचा जब हम यमुना पर थे। जब मैं उस शुरुआती सदमे से निकला तब जाकर आंखों से आंसू बहने लगे और उनके गुज़र जाने का सत्य और उससे जुड़ी भावनाएं मेरे दिल तक पहुंच सकी।

उनकी मृत्यु के बाद कई दिनों तक जब कभी हम उनके बारे में बात करते, हम सब रोने लगते। कोई भी बात जो उनसे किसी भी तरह जुड़ी थी, जिनमें उनकी याद शामिल थी, हमारा गला अवरुद्ध कर देती, हमारी आंखों से आंसू बहने लगते। हमने उनके बारे में बहुत बातें की और मैंने उन बातों को, उन ख़्यालों को यहां आपके साथ इस डायरी में साझा भी किया। उनका ख़्याल हमेशा आता रहा. सब कुछ किसी न किसी तरह उनसे जुड़ा होता और अगर कुछ ऐसा हो जिसका वास्तव में उनसे कोई संबंध न हो तब भी हम कह देते, “उनका इससे कोई लेना-देना नहीं था!” हम उनकी चप्पल देखते, उनका बगीचा देखते, जहां वो हमेशा बैठा करती थीं वो ख़ाली जगह देखते। हम बात करते और रोते।

कुछ दिनों के बाद, हमने सब कुछ कह लिया था। अम्माजी से जुड़ी हर छोटी और बड़ी चीज़ के बारे में हमने बातें कर ली थीं, रो लिया था। फिर एक समय ऐसा आया जब कहने को बहुत कुछ बचा नहीं क्योंकि सारी बातें कही जा चुकी थीं। हालांकि फिर भी उनका ख़्याल आता और मुझे उदास कर देता। सारे ख़्याल मुझे रुलाते नहीं थे लेकिन कभी-कभी रोना भी आ जाता। उन सत्यों को स्वीकार करना धीरे-धीरे आने लगा था जिन्हें आप बदल नहीं सकते।

आज भी हालांकि, सुबह का सबसे पहला ख़्याल अम्माजी से जुड़ा होता है। वह दृश्य जब वे हमें छोड़ गईं, हमारे साथ बिताए उनके आख़िरी पल, सब कुछ मस्तिष्क में बिल्कुल स्पष्ट है और मेरी आंखों के आगे वह दृश्य अक्सर घूमता रहता है। कल मैंने अपरा को जिसे सर्दी लग गई थी, अपनी बांहों में लिया हुआ था, और मुझे याद आ रहा था कि कैसे मैं जब छोटा था, अपनी मां की बाहों में रहना चाहता था। स्मृतियां हैं और हमेशा रहेंगी. लेकिन समय के साथ भावनाओं का उबाल और उनसे उपजा तनाव कम हुआ है लेकिन हम उन्हें याद तो हमेशा ही करेंगे।

खुद को वक़्त दीजिए। यह एक नैसर्गिक प्रक्रिया है, समय आपके दुखों को धीरे-धीरे हर लेता है। समय के इस खेल पर मैं एक बार फिर मोहित हो गया हूं। यह ज़रूरी है कि समय को अपना काम करने दीजिए, न कि सहिये, बर्द्दाश्त कीजिए, रोने का मन करे तो रो लीजिए, खुद को रोकिए मत क्योंकि यह समय उसके लिए सही है। दुबारा हंसने का समय भी आएगा लेकिन अपने दुखों को भी जगह दीजिए ताकि समय आपको उनसे उबार सके।

कर्म-कांडों से नहीं मिलता स्वर्ग: नानीजी – 3 जनवरी 13

पिछले महीने जो कुछ भी हुआ है, उन सब के बीच एक चीज़ जो बेहद पक्की हुई है कि जीवन और मृत्यु के संदर्भ में अपने अधार्मिक दृष्टिकोण को लेकर मेरा परिवार और मैं स्वयं और अधिक मज़बूत हुए हैं। लोगों ने भले ही सीधा नहीं पूछा हो लेकिन मैं जानता हूं कि कुछ पाठकों के मन में यह प्रश्न था: अम्मा जी की मृत्यु पर कोई धार्मिक कर्म-कांड न करने को लेकर मेरे पिताजी और मेरी नानी जी का क्या कहना था, उनकी क्या सोच थी. चूंकि कई बार मैंने लिखा था कि वे हम बच्चों से कहीं ज़्यादा धार्मिक थे।

स्पष्ट है, मेरे माता-पिता और मेरी नानी जी सभी ने अपने जीवन का बहुत बड़ा भाग धर्म के साथ बिताया है। विशेष रूप से यहां वृंदावन में, किसी भी व्यक्ति के लिए धर्म से जुड़ा होना बिल्कुल सामान्य है, लेकिन मेरे पिताजी के लिए यह और अधिक महत्व रखता था क्योंकि वे मेरे दादाजी की तरह ही प्रवचन करते थे यानी उनकी आय का स्रोत ही धर्म को लोगों के नज़दीक लाना था। मेरी दादी के कमरे में आज भी वेदी रखी है और वे प्रतिदिन प्रार्थना करती हैं।

मुझमें और हम भाइयों में इन वर्षों के दौरान हुए बदलावों के साथ-साथ वे भी बहुत बदले हैं। एक धार्मिक गुरू और धर्मोपदेशक से यहां तक पहुंचना मेरे लिए एक लंबी प्रक्रिया थी. मैं हमेशा से बहुत खुला रहा हूं। इसके बावजूद कि मैं इस बात का बहुत ध्यान रखता हूं कि मेरे माता-पिता की धार्मिक भावनाओं को ठेस न पहुंचे, मैं हमेशा उनसे बात कर सकने में और उन्हें यह बता पाने में सक्षम था कि मेरी सोच यहां तक कैसे आ पहुंची. चूंकि सोच में आए इस बदलाव के मेरे कारण न सिर्फ़ मेरे विवेक के स्तर पर बल्कि मन के स्तर पर भी बिल्कुल स्पष्ट, तार्किक और समझने योग्य हैं, वे अक्सर मेरी बात सुनकर सहमति में सिर हिलाते थे, कई बातों से सहमत हुए और मेरे इस तरह सोचने को स्वीकार किया।

इसी कारण से यह मेरे लिए बहुत अधिक आश्चर्यजनक नहीं था कि मेरे पिता किसी कर्म-कांड के इच्छुक नहीं थे, न ही तब जब उनकी बेटी की मृत्यु 2006 में हुई थी और न ही अब जब उनकी पत्नी की मृत्यु 2012 में हुई। उन्होंने कहा कि उनके जीवन से प्रकाश जा चुका है, क्या किसी तरह के आयोजन या कर्म-कांड से वह प्रकाश वापस आ पाएगा? यह उनकी इच्छा थी कि बेहद सामान्य रूप से दाह-संस्कार कर उन्हें विदा किया जाए।

जहां तक नानीजी का प्रश्न है, मैं पूरी तरह से आश्वस्त नहीं था कि इन सभी कर्म-कांडों और धार्मिक प्रथाओं में उनकी कितनी आस्था है। जब उनके संबंधी यहां आए थे तो हमारे बीच उन सभी रीतियों के बारे में बात हुई जो हमने नहीं की, क्योंकि सब इस बारे में पूछ रहे थे। हालांकि एक दिन, ऐसी ही बातचीत के बाद उन्होंने मुझे अपने कमरे में बुलाया. 90 साल की नानीजी जिन्होंने अपना पूरा जीवन एक धार्मिक व्यक्ति के रूप में बिताया, ने मुझसे कहा: ‘बेटा, मेरे बाल धूप में सफ़ेद नहीं हुए हैं। कोई भी दुनिया भर का कर्म-कांड करने से स्वर्ग नहीं चला जाता। उससे कुछ नहीं होता। सबसे ज़्यादा ज़रूरी यह है कि आप अपनी ज़िंदगी में क्या करते हैं। अच्छा कर्म कीजिए और सच्चाई के साथ रहिए।’

धर्म कहता है, बुरे वक़्त पर मरे तो परिवार के पांच लोग और मरेंगे! – 2 जनवरी 13

अम्मा जी की मृत्यु से लेकर अब तक का समय बहुत तनावपूर्ण रहा। ज़ाहिर है अंदर बहुत-सी भावनाएं जमा थीं जिनके बारे में मैंने लिखा भी है। इसके अलावा बाहर से भी लोगों ने भांति-भांति की भावनाएं व्यक्त की। उनमें बहुत-सी बातें ऐसी थी जो सोचने को विवश करें, मैंने उन बातों को नोट कर लिया ताकि जब भी समय मिले मैं अपनी डायरी में उन बातों को विस्तार से रख सकूं। लिखने को बहुत सी चीज़ें हैं क्योंकि मृत्यु जीवन के सबसे बड़े चमत्कारों में से एक है और लोग हमेशा इसके इर्द-गिर्द कहानियां बुनते रहे हैं, धर्म ने उन कहानियों को अपना तड़का लगाकर पेश किया है और इस तरह से रीतियां और प्रथाएं गढ़ी गई हैं। आज मैं एक और ऐसी ही हिन्दू अवधारणा के बारे में लिखना चाहता हूं जो उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जिनके किसी परिजन की मृत्यु हो जाती है: पंचक

पहले यह बताता हूं कि पंचक होता क्या है. हिन्दू कैलेंडर में सब कुछ चांद की अवस्था के अनुसार होता है। अपने पूरे चक्र में चांद सभी राशि चिह्नों से होकर गुज़रता है और अंत में यह कुम्भ और मीन राशि से होकर जाता है। एक राशि चिह्न पर चांद लगभग ढाई दिनों तक ठहरता है, कभी-कभार उससे थोड़ा कम भी। पंचक की अवधि वह होती है जब चांद कुम्भ और मीन राशि पर ठहरा होता है, यानी लगभग पांच दिन लंबी अवधि जो हर महीने होती है।

हिन्दू मान्यताओं के अनुसार, अगर कोई पंचक की अवधि के दौरान यानी उन पांच दिनों में मरता है, तो इसका अर्थ है दुर्भाग्यों का तांता लगने वाला है। दुर्भाग्य की अति तो यह है कि असल में ऐसा होने पर उसी परिवार के पांच और लोग काल के गाल में समा जाएंगे। मौत के काल से बचने का एक ही उपाय है कि परिवार द्वारा एक विशेष तरह का आयोजन किया जाए।

अम्मा जी के दाह-संस्कार पर किसी ने हमसे पूछा कि क्या हमने इस बात की जांच की है कि कहीं अम्मा जी का निधन पंचक की अवधि के दौरान तो नहीं हुई। मैंने कहा कि हम इन सब में विश्वास नहीं करते और हमें यह जांचने की कोई आवश्यकता नहीं है। यहां तक कि अगर हमें पता चलता कि उनका निधन उसी अवधि में हुआ तो भी हमारे लिए इसका कोई अर्थ नहीं रहेगा, न ही हम स्वयं को बचाने के लिए कोई कर्म-कांड शुरू करेंगे।

यह सच है कि हमारे लिए इसका कोई अर्थ नहीं है लेकिन स्पष्ट रूप से यह धार्मिक आस्था वाले कई लोगों के लिए बहुत महत्व रखता है। वे घबरा जाते हैं, डर जाते हैं और इस भय से दबकर एक और कर्म-कांड करने पर विवश हो जाते हैं। बीते दिनों में कई लोगों ने मुझसे कहा कि मैं धर्म को नकारात्मक नज़रिए से देखता हूं। कृपया मुझे बताइए, कि क्या पंचक किसी परिजन की मौत के कारण पहले से ही दुखी परिवार को बिना मतलब ही एक और मुसीबत में नहीं डालता। एक परिवार ने अपना एक सदस्य खो दिया है, वे सब दुखी हैं, शोक-संतप्त हैं और ठीक उसी समय आप उन्हें कहते हैं कि आपके परिवार के पांच और सदस्यों की मृत्यु होगी! यह अपने आप में कितना निष्ठुर और क्रूर है? मेरे लिए, यह केवल एक और साक्ष्य ही है कि धर्म का व्यवसाय लोगों में भय बैठाकर ही चलता है।

छोटे परिवारों में क्या होता है? जहां केवल एक परिवार में केवल तीन सदस्य बचे हों? क्या वे सभी मर जाएंगे? एक पूरा परिवार समूल नष्ट हो जाएगा केवल इस कारण कि उसके एक सदस्य की मृत्यु का समय सही नहीं था? यह प्रथा बेतुकी और निरर्थक है जिसे बड़े आराम से सिद्ध किया जा सकता है कि उन लोगों का कुछ नहीं होता जिन्हें पंचक के तथाकथित सिद्धांत के बारे में कुछ पता ही नहीं है। उनके परिवार में कोई नहीं मरता – या फिर शायद यह केवल हिन्दु परिवारों पर लागू होता है?

इस धार्मिक अंधविश्वास के बारे में जब हमें याद दिलाया गया तो हमारा विश्वास और मज़बूत ही हुआ कि हम इस दाह-संस्कार को किसी कर्म-कांड से नहीं जोड़ने वाले। केवल अपना दुख, अपना शोक प्रकट करेंगे और अम्मा जी को सप्रेम अपने दिल में अपनी स्मृतियों में बनाए रखेंगे।

क्या स्वर्ग की कोरी कल्पना में स्वाहा हो जाती है किसी के गुज़र जाने की पीड़ा? – 1 जनवरी 13

2013 में आपका स्वागत है। मुझे उम्मीद है बीते वर्ष का अंत आपके लिए अच्छा रहा होगा और आपने हर्ष और उल्लास के साथ नये वर्ष का स्वागत किया होग। हमने यहां आश्रम में कोई बड़ा उत्सव नहीं मनाया। जैसा कि मैंने पहले भी क्रिसमस के दौरान कहा था कि उत्सव मनाने के लिए आपका सही मिज़ाज में होना बहुत ज़रूरी है और यह भी कि हम बस ऐसे ही इतना खुश नहीं हो सकते कि नाचने-गाने लगें। इन सब के बावजूद हमने साथ मिलकर अच्छा वक़्त बिताया। अपरा, रमोना और मैं जल्दी सोने चले गए लेकिन पूर्णेंदु, थॉमस, आइरिस और हमारे दूसरे अतिथियों को साथ लेकर बेघरों को कंबल बांटने गए – जब आप पार्टी के मूड में न हों तो उत्सव मनाने का इससे बेहतर विकल्प क्या हो सकता है।

जब लोगों को अम्मा जी के निधन का समाचार मिला तो कई लोगों ने शोक प्रकट किया और कई लोगों ने कुछ इस तरह की पंक्तियां भेजीं: ‘मुझे मालूम नहीं कि क्या लिखूं क्योंकि ऐसी कोई चीज़ नहीं है जिसे कह देने से आपकी पीड़ा समाप्त हो पाएगी!’ कई अन्य लोगों ने संकेत के तौर पर सीधा अपना दुःख ज़ाहिर किया कि वे इस शोक में हमारे साथ हैं। हालांकि कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें लगा कि ऐसे मौक़े पर सलाह देना सबसे उचित है, उनकी सलाह कुछ ऐसी थी: ‘आप एक बुद्धिमान व्यक्ति हैं और आपको शोक-संतप्त होने की जगह दूसरी दुनिया में उनके प्रवेश का उत्सव मनाना चाहिए!’ नये वर्ष की शुरुआत मैं ऐसी सलाह देने वाले सभी लोगों को एक स्पष्ट संदेश देकर करना चाहूंगा ताकि इसे लेकर वर्ष 2013 में कोई भ्रांति न रहे: मैं धार्मिक नहीं हूं और मैं गुरू नहीं हूं, मैं एक साधारण व्यक्ति हूं। जब कोई प्रियजन हमेशा के लिए छोड़ जाते हैं, मैं दुखी होता हूं और मैं अपनी इन संवेदनाओं को स्वर्ग या दूसरी दुनिया की कल्पना और भ्रम में जीकर दबाऊंगा नहीं।

इससे पहले कि मेरे पाठकों में से कोई तबका मुझे इस बात के लिए सुनाना शुरू करे कि मैं अपने धार्मिक मित्रों द्वारा प्रकट किए गए शोक का सम्मान नहीं करता, मैं यह साफ़ करना चाहता हूं कि मुझे उन संदेशों और ई-मेल से कोई समस्या नहीं है जो दिल से महसूस कर लिखे गए हैं, जिनमें प्रेम है, सहानुभूति है। मुझे उन संदेशों से आपत्ति है जिसमें यह बताया जा रहा है कि मुझे कैसा महसूस करना चाहिए और कैसा नहीं। मेरी माँ की मृत्यु हुई है। मैं दुखी हूं और मैं रोता हूं। यह एक सत्य है और मैं इसे स्वीकार करने की क्षमता रखता हूं, आपको इससे कोई समस्या क्यूं है?

वास्तव में, वे सभी लोग जो ऐसी सलाह देते हैं, अपने किसी प्रियजन के गुज़रने पर उतना ही रोते हैं जितना मैं। तब उनकी बुद्धिमत्ता भी चली जाती है और उन्हें भी अपनी भावनाओं, संवेदनाओं को स्वीकार करना पड़ता है क्योंकि ऐसी स्थितियों में अपनी भावनाओं को भूलकर दिमाग़ का इस्तेमाल करना आसान नहीं होता। मेरे विचार में, ऐसा करना असल में ग़लत है. बल्कि आपको रोकर अपनी भावनाओं को बाहर आने देना चाहिए – केवल वही एक स्वस्थ प्रतिक्रिया है!

हां, मैंने आंसू बहाए हैं, मेरा पूरा परिवार रोया है और मैं मानता हूं कि यह ठीक है। हो सकता है रोना फ़ैशन में न हो, लेकिन यह अच्छा है। मुझे उस व्यक्ति से सहानुभूति है जो अपने दुख-दर्द को इस तरह ज़ाहिर कर पाने में असमर्थ है। हो सकता है आप एक ड्रामेबाज़ व्यक्ति न हों, बहुत से लोगों के सामने आपको रोने की आवश्यकता भी नहीं है। अपने परिवार के साथ रोएं, अपने साथी के साथ रोएं या अकेले में रो लें। यह मायने नहीं रखता कि आपकी आस्था किसमें है, पर अपनी भावनाओं को दबाएं नहीं।

मैं मृत्यु के बाद की ज़िंदगी में या स्वर्ग में या मोक्ष में यक़ीन नहीं करता लेकिन अगर आपको यह भरोसा है भी कि आपके प्रियजन मृत्यु के बाद किसी ऐसी जगह पर जाएंगे, तो भी आप दुखी होंगे. कोई और रास्ता नहीं है। आपको यह स्वीकार करना होगा, आपकी बुद्धिमत्ता काम नहीं आएगी। इसे बाहर आने दीजिए, रोइए और अगर आप उत्सव मनाने जैसा महसूस नहीं करते तो मत मनाइए। साथ बैठिए, बात कीजिए, जितना हो सके ज़िंदगी का आनंद लीजिए। जितना बेहतर बनाया जा सके, बनाइए। वक़्त गुज़रने के साथ-साथ चीज़ें आसान हो जाएंगी। जो आपको छोड़ गए हैं वो आपके दिल में, आपकी यादों में रहेंगे। लेकिन जब भी आंसू बाहर आना चाहे, उन्हें बहने दीजिए।