संयुक्त परिवार के बाईस लोग और पाँच कमरे – हमारे स्कूल के बच्चे – 11 सितंबर 2015

आज मैं आपका परिचय वृंदावन के एक गरीब इलाके में रहने वाली नन्ही सी लड़की, हेमलता से करवाना चाहता हूँ, जो एक बड़े से संयुक्त परिवार में परवरिश पा रही है।

हेमलता छह साल की है और 22 सदस्यों वाले एक संयुक्त परिवार की सदस्य है। उसका पिता पाँच भाइयों में सबसे छोटा है और हेमलता की दादी सहित वे सब भाई अपनी पत्नियों और बच्चों के साथ एक बड़े से मकान में रहते हैं। अब अगर आप दो या तीन मंज़िले मकान की कल्पना करें, जहाँ हर बच्चे के पास अपना अलग कमरा है तो अपनी कल्पना को तुरंत विराम दे दें। चार या पाँच सदस्यों के हर परिवार के पास सिर्फ एक कमरा है, जो एक या दो खाटें बिछाने के लिए और शायद एकाध रैक वगैरह रखने के लिए भी मुश्किल से पर्याप्त है। दादी अधिकतर बाहर, ओसारे में सोती है और जब ठंड या लू बर्दाश्त से बाहर हो जाती है तो अपने सबसे बड़े बेटे के कमरे में चली जाती है।

परिवार के पास मकान के पीछे थोड़ी सी खाली ज़मीन भी है मगर वे मकान का और विस्तार नहीं करते। कारण? उनके पास इतने पैसे ही नहीं हैं। पाँचों भाई साधारण मजदूर हैं और उनकी पत्नियाँ घरेलू औरतें। वे रोज़ कमाकर लाते हैं और रोज़ अपना राशन-पानी खरीदते हैं, उसी से कपडे-लत्तों का इंतज़ाम किया जाता है और किसी तरह दूसरे खर्चों की पूर्ति होती है। इतनी कमाई में बचत की कोई गुंजाइश नहीं होती- विशेष रूप से बच्चों के कारण, जिन्हें अक्सर नए कपड़ों की ज़रूरत होती है और फिर डॉक्टर और दवा-दारू के खर्च तो लगे ही रहते हैं।

जैसे हेमलता के पिता को ही हेमलता के इलाज पर हर माह नियमित रूप से कुछ न कुछ अतिरिक्त रकम खर्च करनी पड़ती है। जन्म से ही उसे साँस की बीमारी है और बच्चों के डॉक्टर का कहना है कि उसे अस्थमा है। वह हर वक़्त खाँसती रहती है और हमें बताया गया कि ठंड में तकलीफ और बढ़ जाती है। वह दवाइयाँ लेती है और हमें पता चला है कि दवाओं से उसे लाभ भी पहुँच रहा है।

जब हम उनके घर पहुँचे तो हेमलता का छोटा भाई दादी की गोद में लेटा दूध पी रहा था। दादी मुस्कुराते हुए हमारा स्वागत करती है और यह घर कब खरीदा, यह बताती है। घर बनने के बाद परिवार के सभी सदस्य एक-एक करके यहाँ आते गए। यह परंपरागत संयुक्त परिवार का टिपिकल उदाहरण है और जबकि ये लोग गरीब हैं और पैसे कमाने के लिए उन्हें कड़ा संघर्ष करना पड़ता है, हमें साफ़ नज़र आता है कि उन सबको परस्पर एक-दूसरे का भावनात्मक संबल हासिल है।

हेमलता को शिक्षण का मुफ़्त साधन उपलब्ध कराके अब हम उनकी कुछ मदद कर पा रहे हैं।

किसी एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके आप हमारे इस काम में अपना हाथ बँटा सकते हैं।

दिन भर के कामकाज और मेहनत के बाद क्या आप सेक्स के लिए बेहद थक जाते हैं? 10 अगस्त 2015

कुछ समय पहले मुझसे किसी ने अपनी एक व्यक्तिगत समस्या पर सलाह मांगी: दिन भर कामकाज में व्यस्त रहता था। जब घर लौटता था तो अपने काम के तनाव और श्रम के कारण मानसिक और शारीरिक रूप से अत्यंत शिथिल पड़ जाता था। या तो उसके पास समय नहीं होता था या समय होता था तो इतनी शक्ति नहीं होती थी कि पत्नी के साथ सम्भोग कर सके! इसके चलते स्वाभाविक ही पत्नी असंतुष्ट रह जाती थी और दुखी रहने लगी थी। उसे क्या करना चाहिए?

सर्वप्रथम तो यह कि यह बड़ी अच्छी बात है कि आप किसी दूसरे से सलाह मांगने की ओर उद्यत हुए हैं क्योंकि समय आ गया है कि आप इस विषय में गंभीर हो जाएँ! जब आपके संबंध उस स्तर तक पहुँच जाते हैं, जहाँ शिकायतों का स्वर तीक्ष्ण होने लगता है और दोनों एक-दूसरे से अप्रसन्न रहते हैं तब आपके लिए अपनी जीवन-चर्या पर गंभीरता पूर्वक विचार करना ज़रूरी हो जाता है! अच्छा हो अगर आप उसमें कुछ बड़े परिवर्तन भी कर सकें!

दूसरे, मैं आशा करता हूँ कि सहवास-सुख की कमी सिर्फ आपकी पत्नी नहीं, बल्कि आप भी महसूस कर रहे होंगे!

जब एक बार आप विवाह कर लेते हैं तो आपके साथ हाड़ मांस का एक और प्राणी भी साथ रहने लगता है, जिसकी आपसे कुछ जायज़ अपेक्षाएँ होती हैं। यहाँ मैं आर्थिक अपेक्षाओं की बात नहीं कर रहा हूँ! और स्पष्ट कहूँ तो मैं सिर्फ भौतिक अपेक्षाओं की बात भी नहीं कर रहा हूँ! असल में यह समस्या सेक्स से संबंधित है ही नहीं। वह भावनाओं और प्रेम से संबंधित है। परस्पर प्रेम के साझेदार के रूप में आपकी पत्नी का आपके हृदय और आपके समय पर कुछ अधिकार तो है ही!

आप खुद निर्णय करें: आपके लिए क्या महत्वपूर्ण है? क्या आप अपने काम के लिए जी रहे हैं या सिर्फ आजीविका के लिए काम कर रहे हैं? आपको अपना काम ज़्यादा प्रिय है या पत्नी के साथ समय बिताना?

मुझे गलत न समझें- अपने काम में भी आपको मज़ा आना चाहिए। लेकिन ज़्यादा आनंद आपको अपने परिवार या साथी के साथ समय बिताने में आना चाहिए। अगर इस तरह आप अपना दिल पत्नी के सामने नहीं खोल सकते तो आपको जीवन जीने का कोई और तरीका अख्तियार करना चाहिए था!

बहुत से लोग कहेंगे: 'मैं यह सब, इतनी कड़ी मेहनत उन्हीं के लिए कर रहा हूँ, अपने परिवार के लिए, उनके भविष्य के लिए और बच्चों के लिए!' विशेष रूप से, जब आपके बच्चे भी हैं तो आपको यह समझना चाहिए कि आप ऐसे आनंद में अपना समय नहीं गुज़ार सकते। मेरा दावा है कि अगर आप कुछ कम काम करते हैं, थोड़ा कम पैसा कमाते हैं लेकिन कुछ अधिक समय परिवार और पत्नी के साथ गुज़ारते हैं तो आपका जीवन वास्तव में बेहतर हो जाएगा!

अगर आप इसी तरह चलते रहे, अपना रवैया नहीं बदला तो आप और आपका साथी एक-दूसरे से और दूर होते चले जाएँगे। अब आपको तय करना होगा कि आप साथ रहने में और एक-दूसरे से प्रेम करने में ज़्यादा रुचि रखते हैं या अपने काम में ही रमे रहना चाहते हैं। अगर आप अपने काम को चुनते हैं और पत्नी भी किसी दूसरी बात में मन लगा लेती है, कोई ऐसी रुचि पैदा कर लेती है, जहाँ वह अपना समय बिताना चाहती है तो फिर आपके पास शिकायत का कोई कारण नहीं होना चाहिए!

अपनी पत्नी से यह अपेक्षा न करें कि वह ताजिंदगी घर की सफाई करती रहेगी, बच्चों की देखभाल करती रहेगी और आपका इंतज़ार करती रहेगी कि जब आपको समय मिलेगा तो आप आएँगे और उसके साथ समय बिताएँगे। या उसके साथ बिस्तर साझा करेंगे- हालांकि इस मामले में सेक्स सिर्फ एक निशानी है कि आप लोग आपस में कितना करीब हैं। वह सिर्फ परस्पर प्रेम का भौतिक इज़हार है! और फिलहाल आपका काम उसे धीरे-धीरे खत्म कर रहा है!

आपके लिए आवश्यक है कि दैनिक जीवन में आप अपने प्रेमीजनों के लिए समय निकालें और फिर सप्ताहांत को वास्तविक सप्ताहांत बनाएँ- परिवार के साथ कहीं छुट्टियों पर निकल जाएँ या दो दिन का समय उनके साथ कुछ अलग तरह से बिताने की कोशिश करें। सिर्फ समय न गुजारें- ज़िंदगी का लुत्फ उठाएँ!

भारत में विवाहित पश्चिमी महिलाओं: क्या आप ‘रजोधर्म के भारतीय नियमों’ का पालन करती हैं? 30 जून 2015

कल मैंने बताया था कि भारतीय पुरुष से विवाहित एक पश्चिमी महिला जब भारत में पुरुष के संयुक्त परिवार के साथ रहने लगती है तो उसे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। संभवतः उनमें से एक समस्या यह होगी कि अपनी सास की बातों और आदेशों का वह किस सीमा तक पालन करे या उसे अपने व्यक्तिगत मामलों में किस हद तक दखलंदाज़ी करने के इजाज़त दे। आज मैं एक दूसरी समस्या के बारे में लिखना चाहता हूँ: किस हद तक आप, पश्चिम से आई एक महिला होने के नाते, अपने संयुक्त परिवार की धार्मिक, दक़ियानूसी और अंधविश्वास से परिपूर्ण गतिविधियों को स्वीकार करे। क्या आप उनमें हिस्सा लेंगी?

फिर, हमेशा की तरह, इस क्षेत्र में भी जो समस्याएँ पेश आएँगी, वे सबकी अलग-अलग व्यक्तिगत परिस्थितियों पर निर्भर होंगी। आपका लालन-पालन कहाँ हुआ, आपके आसपास का माहौल कितना धार्मिक था, आपकी आस्थाएँ क्या हैं और किस हद तक आप किसी और को प्रसन्न करने के लिए दूसरे धर्म की परंपराओं का पालन करने के लिए तैयार हैं? इसके साथ ही यह आपके जीवन साथी और उसकी आस्था और उसके परिवार पर निर्भर करता है। साथ ही यह देखना होगा कि परंपराओं और रीति-रिवाजों का परिवार पर असर कितना तीव्र है।

एक बात निश्चित है और आपको सदा याद रखनी चाहिए: आपको ऐसी कोई बात नहीं करनी चाहिए जिसे आप करना नहीं चाहतीं। कोई भी आप पर ऐसे किसी धार्मिक कार्य को करने के लिए दबाव नहीं डाल सकता जो आपके अंदर गहराई से जड़ें जमाकर बैठी बातों के विपरीत है। इस बात को अच्छी तरह जान लें और अगर आपका जीवन साथी आपको उस ओर ठेलने की कोशिश कर रहा है, जिधर आप नहीं जाना चाहतीं तो इस पर विचार-मंथन करने का समय आ गया है कि आपके बीच वास्तव में प्यार है भी या नहीं और क्या इस संबंध के लिए इतना संघर्ष करना उचित है।

लेकिन इसके बावजूद मेरा विश्वास है कि निश्चित ही ऐसी स्थितियों से निपटने के और भी तरीके हो सकते हैं क्योंकि आपका आपसी प्रेम ही आपको एक-दूसरे से जोड़े हुए है और एक को दूसरे का सम्मान करने के काबिल बनाता है।

दैनिक जीवन में उठने वाले प्रश्न इस प्रकार हो सकते हैं: खाना तैयार है, आपने खाना बनाने में मदद की है और आपकी सास आपके हाथ में खाने की थाली देती है, पूजा घर की ओर इशारा करते हुए कहती है- या अगर आप उनकी भाषा नहीं समझते तो स्वयं कर के दिखाती है कि कैसे सर्वप्रथम ईश्वर को भोग चढ़ना होगा तब आप खुद खा पाएँगी। क्या आप न सिर्फ इस नियम का पालन करेंगी बल्कि स्वयं भोग भी चढ़ाएँगी?

फिर कुछ प्रश्न माह में सिर्फ एक बार उपस्थित होंगे: भारत में मासिक धर्म के समय महिलाओं का रसोई में प्रवेश वर्जित होता है। आज भी बहुत सी महिलाएँ इन दिनों में परिवार के साथ भोजन करने नहीं बैठतीं। उन्हें दैनिक जीवन के बहुत से और भी काम करने की मनाही होती है, जैसे कपड़े या बरतन धोना। कुछ परिवारों में इन कुछ दिनों में महिलाएँ अलग कमरे में सोती हैं! उन्हें इस अवधि में अपवित्र समझा जाता है। आपके पति का परिवार इन परंपराओं को लेकर कितना सख्त है? मेरी नज़र में तो यह पूरी तरह मूर्खता पूर्ण है और किसी महिला को ऐसी बात के लिए, जो स्पष्ट ही जैविक रचना से संबंधित है और कुदरती प्रक्रिया है, अपमानित करना ठीक नहीं है! अगर आप भी ऐसा ही महसूस करती हैं तो मैं सलाह दूंगा कि अपने पति को समझाएँ कि यह एक नैसर्गिक चक्र है, जिसके कारण एक दिन बेटे और बेटियाँ पैदा होती हैं- इसमें गंदगी या अपवित्रता जैसी कोई बात नहीं है! अंत में यह आपका चुनाव होगा कि आप किस सीमा तक इन अंधविश्वासों को स्वीकार या अस्वीकार करती हैं- लेकिन अपने आपसे यह प्रश्न पूछकर पहले से अपनी तैयारी करना हर हाल में बेहतर सिद्ध होगा।

तो शायद त्योहारों पर उनके पारिवारिक समारोहों में शामिल होने में आपको कोई एतराज़ नहीं होगा और जब कि आप निश्चय ही बहुत सी छोटी-मोटी बातों के साथ समझौता कर लेंगी, कुछ और पहलू आपको परेशान करते रहेंगे। मैं सिर्फ आपसे यह निवेदन करना चाहता हूँ कि किसी भी समस्या को अपने मन में न रखें। आपको खुलकर बात करनी होगी और आपके पति को भी यह सब सुनने की सलाहियत होनी चाहिए और उसका हल ढूँढ़ने में आपकी मदद करनी चाहिए। मुझे विश्वास है कि वह इसका कोई न कोई हल निकालने में सफल हो पाएगा, जो आप दोनों के लिए सुविधाजनक हो- भले ही आपके आसपास के लोगों का इस विषय में कोई भी मत क्यों न हो!

भारतीय मर्द से शादी करना चाहती हैं? क्या संयुक्त परिवार के अनुभवों से गुज़रने के लिए भी तैयार हैं? 29 जून 2015

आज मैं पुनः उसी विषय पर लौटना चाहता हूँ, जिसका संबंध पश्चिमी महिला और भारतीय पुरुष के अंतर्राष्ट्रीय जोड़ों से है। ये विचार उनके लिए हैं, जो अभी एक साथ जीवन गुजरने का निर्णय लेने की प्रक्रिया में हैं, अपने प्रेम को एक मौका देना चाहते हैं, भले ही वे दो बहुत भिन्न संस्कृतियों से आते हों। यह कतई आसान नहीं होता, लेकिन अगर आपके पास सोचने और व्यवहार का एक परिपक्व और समझदार तरीका है तो आप खुद को और अपने जीवन साथी को खुश रख सकते हैं। लेकिन उससे पहले आपको होमवर्क करना होगा, कुछ तैयारियाँ करनी होंगी और सामने वाले की संस्कृति और परम्पराओं को जानना-समझना होगा। भविष्य के बारे में गम्भीरतापूर्वक सोचना होगा, अपने होने वाले जीवन साथी से बातचीत करनी होगी। आज से मैं उन बातों पर लिखना शुरू कर रहा हूँ, जिन पर आपको गम्भीरतापूर्वक सोचना-विचारना होगा- उस स्थिति में, जब आप दोनों पति के संयुक्त परिवार के साथ भारत में रहने का निर्णय लेते हैं!

एक पश्चिमी महिला होने के नाते आपका सपना रहा होगा कि आप भारत आकर वहीं बस जाएँ। भारत के बारे में आपने इतना कुछ सुन रखा था और अब आपको एक भारतीय पुरुष भी मिल गया है, जिसके बारे में आप महसूस करती हैं कि वह आपका हमसफर बन सकता है और अब अपने उस चिरस्वप्न को साकार करना चाहती हैं। अब मैं सिर्फ कुछ तथ्यों से आपको अवगत कराना चाहता हूँ, जो वास्तविकता में आपके सपनों की तुलना में बहुत भिन्न प्रतीत होंगे और आपके होने वाले जीवन साथी के जीवन में पहले से मौजूद महिला से सम्बंधित तथ्य उन तथ्यों में सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण होगा: आपकी सास!

मैं नकारात्मक नहीं होना चाहता, न मैं किसी को डराना चाहता हूँ और न ही किसी को इस राह पर कदम न रखने की सलाह देना चाहता हूँ। मैं सिर्फ आपको यह बताना चाहता हूँ कि भारत में चीजें किस तरह काम करती हैं। परिवार में किसका कितना महत्व होगा, इस मामले में किसी भी परंपरागत भारतीय परिवार में पुरुषों की उम्र के हिसाब से एक अनुक्रम होता है। इसका अर्थ हुआ कि महिलाओं के सन्दर्भ में आपकी सास घर की मुखिया होगी, फिर सबसे बड़े भाई की पत्नी, उसके बाद दूसरे नंबर वाले भाई की पत्नी, और इसी तरह यह क्रम चलता रहता है। घर और रसोई के परिचालन में और बच्चों की परवरिश और उनकी लिखाई-पढ़ाई के मामले में इसी अनुक्रम से अधिकार और कर्तव्यों का निर्वहन होता है।

अपनी जीवनचर्या में किसी दूसरी महिला का कितना रोबदाब या हस्तक्षेप आप बर्दाश्त कर सकती हैं? विशेष रूप से अगर वह दूसरी महिला आपकी सास हो?

इस बात की पूरी संभावना है कि जिस परिवार में आप विवाह रचाने जा रही हैं, वह पूरी तरह से एक पारंपरिक, दकियानूस परिवार न हो क्योंकि अगर होता तो वे आपको यानी एक विदेशी, गैर हिन्दू महिला को, जिसकी जात-पात का पता न हो, कतई स्वीकार ही नहीं करते। लेकिन, पुरानी सामाजिक परंपराओं को वे कितना महत्व देते हैं, यह पूरी तरह उस परिवार विशेष पर निर्भर करता है।

यह आपको स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि आपका पति चाहेगा कि आप उसकी माँ का आदर करें-और मैं यह मानता हूँ कि आप भी सामान्यतया ऐसा ही करना चाहेंगी। लेकिन वह आपसे किस सीमा तक अपनी माँ और अपने दूसरे रिश्तेदारों की मर्ज़ी से चलने और उनके आदेशों का पालन करने की अपेक्षा रखता है? परिवार के अनुक्रम में आपकी स्थिति क्या होगी और आपको किस हद तक उसमें शामिल किया जाता है बल्कि किया भी जाता है या नहीं? आप सारे परिवार के लिए खाना पकाने की प्रक्रिया का हिस्सा होंगी या आप अपने लिए परिवार से अलग एक अन्य रसोई का इंतज़ाम करने का मन बना रही हैं, जैसा कि आजकल बहुत से लोग करने लगे हैं?

अगर आपकी सास घर में भी आपसे सिर्फ साड़ी पहनने के लिए कहती हैं और दूसरे कपड़े पहनने पर नाक-भौं सिकोड़ती हैं, क्योंकि बहू के लिए साड़ी ही एकमात्र उपयुक्त वस्त्र होता है, तो क्या आप उनकी बात मानेंगी? इसके बावजूद कि इससे आपके पति के साथ तालमेल डगमगा सकता है और चाचियों और बड़े भाइयों जैसे परिवार के दूसरे सदस्यों के साथ तालमेल और सामंजस्य बिगड़ता है, आप साड़ी के अलावा अपनी मर्ज़ी के दूसरे वस्त्र भी पहनती हैं तो क्या आपका पति इसे स्वीकार करेगा?

संयुक्त परिवार में रहने का अनुभव प्राप्त करने से पहले अगर उसकी कुछ मूलभूत बातों को समझ-बूझ लें तो आपके लिए बेहतर होगा। बहुत सी दूसरी चीजों की जानकारी और आजमाइश तो रास्ते में करते चलना ही है। लेकिन एक बात हर स्थिति में आपके सामने स्पष्ट होनी चाहिए: आप उसी हद तक सामंजस्य बिठाएँगी जहाँ तक आपको कोई असुविधा महसूस नहीं हो रही है। जब आपकी तय सीमा से आगे बात बढ़ती है तो उसके बारे में शांतिपूर्वक अपने पति को तुरंत बताएँ। इस बात का ध्यान रखें कि जो कुछ भी आपके आसपास चल रहा है, उनकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को पूरी तरह समझ पाना आपके लिए संभव नहीं भी हो सकता- लेकिन अपने साथी से साफ-साफ़ कहिए कि क्यों कुछ बातें आपको उचित नहीं लगतीं।

कुछ अंधविश्वास-प्रेरित गतिविधियों के सन्दर्भ में यह बात विशेष रूप से लागू होती है- लेकिन वह एक अलग विषय है, जिस पर मैं कल चर्चा करूँगा।

भारतीय पुरुष पश्चिमी महिला के मध्य का निर्णय: काम करे या घर संभाले? 23 जून 2015

मेरे विचार में प्रेम में पड़ना हमेशा बड़ी अच्छी बात होती है और जब दोनों ही उसके प्रति गंभीर हैं, तब तो फिर पूछना ही क्या! मेरा जीवन साथी भी एक बहुत ही भिन्न संस्कृति और परिवेश से संबद्ध है लेकिन मुझे यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है कि इस मामले में हमारी स्थिति काफी बेहतर थी: मैं उससे मिलने से भी कई साल पहले से उसकी संस्कृति में रहा था और उस परिवेश से भली प्रकार परिचित था! मैं खुले मन का व्यक्ति रहा हूँ और इसलिए पहले से जानता था कि पश्चिमी महिलाएँ किस तरह भारतीय भारतीयों से अलग तरह से सोचती हैं। यहाँ मैं अपने उस ज्ञान को और हम दोनों को आपस में हुए कई सालों के अनुभवों को सबके साथ साझा करना चाहता हूँ, जिससे भारतीय पुरुष और पश्चिमी महिलाओं के संभावित जोड़े उनसे लाभान्वित हो सकें!

मैं चाहता हूँ कि आप कुछ ठोस उदाहरणों की सहायता से उन क्षेत्रों का परिचय प्राप्त करें, जहाँ आप सम्भवतः अलग ढंग से सोचते होंगे। सबसे प्रथम है, पुरुष और महिला के बीच संबंध और भारत और पश्चिमी संस्कृतियों में पुरुषों और महिलाओं के मध्य अंतर।

महिलाओं: भारतीय संस्कृति में पति भरण-पोषण के साधन जुटाता है और महिला घर और बच्चों की देखभाल करती है। पूरी संभावना होगी कि आपका साथी भी अपने घर में यही देखता हुआ बड़ा हुआ होगा। आजकल, विशेष रूप से बड़े शहरों में, ज़्यादा से ज़्यादा महिलाएँ अच्छी शिक्षा प्राप्त कर रही हैं, बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों में पढ़ रही हैं, नौकरी कर रही हैं और अपने मनपसंद क्षेत्रों में काम कर रही हैं। दिल्ली या मुंबई जैसे महानगरों में घूमते हुए आप बहुत सी महिलाओं को कार्यालयीन कपड़ों में चुस्त-दुरुस्त अपने कार्यालयों की ओर या कार्यालयों से घर लौटते हुए देख सकती हैं।

शहरों में भारत की बहुत थोड़ी आबादी ही रहती है और वहाँ भी बहुत सी युवतियाँ आज भी घर और बच्चों की देखभाल करने वाली गृहणियाँ और माँएँ बनने का निर्णय लेती हैं! वे ऐसा करती हैं क्योंकि वे सोचती हैं कि ऐसा करने पर ही उनका जीवन परिपूर्ण होगा और शायद इसलिए भी कि समाज उनसे यही अपेक्षा रखता है।

क्या आप इस दृश्य में फिट बैठती हैं? अगर आप भारत में बसने का निर्णय लेती हैं तो क्या आप अपने पति के साथ उसके संयुक्त परिवार में रहने की और घरेलू काम और बच्चों की देखभाल करते हुए जीवन बिताने की कल्पना भी कर सकती हैं? क्या यह आपको पूरी तरह संतुष्ट करने के लिए पर्याप्त है या आपको कुछ ज़्यादा की अपेक्षा है? आप इस विषय पर जो भी महसूस करती हैं, आपको उसे ज़ाहिर करना होगा! इसमें सही या गलत कुछ भी नहीं है, विशेष रूप से इसलिए कि आप एक संस्कृति से दूसरी, बिल्कुल भिन्न संस्कृति में कदम रख रही हैं, अपने जाने-पहचाने समाज को छोड़कर दूसरे, एकदम अजनबी समाज को अपनाने जा रही हैं तो सबसे पहले आपको जानना चाहिए कि आप क्या चाहती हैं और सामने वाला क्या चाहता है।

महानुभावों: ज़्यादातर पश्चिमी देशों में अभिभावक लड़कियों को पढ़ाना-लिखाना लड़कों के बराबर ही आवश्यक मानते हैं और चाहते हैं कि वे भी अपना कोई काम या नौकरी करके अपने पैरों पर खड़ी हों। नतीजतन महिलाएँ पुरुषों की तरह ही अच्छी-ख़ासी नौकरियाँ करती हैं और अपना खुद का पैसा कमाती हैं। वहाँ भी शादी काफी बड़ा समारोह समारोह होता है लेकिन उससे महिलाओं की सिर्फ निजी ज़िंदगी प्रभावित होती है- अपना काम करने की उनकी स्थिति में इससे कोई व्यवधान उपस्थित नहीं होता!

जब उनके बच्चे होते हैं तो माँएँ अपने काम से कुछ सालों का अवकाश ले लेती हैं लेकिन जब बच्चे डे केयर में जाने लायक हो जाते हैं तो वे अक्सर अपना काम फिर शुरू कर देती हैं। बहुत से पश्चिमी मुल्कों में यह आर्थिक दृष्टिकोण से आवश्यक भी होता है, जिससे परिवार बेहतर जीवन स्तर बनाए रख सके। वैसे भी महिलाएँ घर के बाहर की ज़िंदगी खुलकर जीना चाहती हैं। याद रखें, वहाँ संयुक्त परिवार जैसी कोई सामाजिक परंपरा नहीं है बल्कि अलग-अलग परिवारों वाले घर होते हैं, जहाँ अक्सर दिन में घर पर कोई नहीं होता क्योंकि पति-पत्नी काम पर चले जाते हैं और बच्चे डे केयर में दिन गुज़ारते हैं! यहाँ तक कि वे आपसे यह अपेक्षा भी कर सकती हैं कि आप अच्छे गृहस्थ पति की तरह 🙂 छुट्टी लेकर घर बैठें, बच्चों को संभालें, घर देखें, जब कि वे अपने काम पर जा सकें!

इस बारे में आपका रवैया क्या होगा? क्या आप इन बातों को बर्दाश्त कर पाएंगे? पत्नी का घर से बाहर निकलकर नौकरी करना या अपना कोई व्यवसाय करना और आपके बराबर या आपसे अधिक पैसे कमाकर लाना आपके लिए कोई समस्या तो नहीं बन जाएगा? क्या आप कभी-कभी अपने काम से छुट्टी लेकर बच्चों के साथ घर बैठ पाएँगे, जिससे पत्नी अपने काम पर जा सके?

अपने होने वाले जीवन साथी के साथ, भारत में या उसके देश में रहने के विकल्प के साथ कुछ परिदृश्यों पर चर्चा कीजिए। एक-दूसरे को अधिक से अधिक जानने की कोशिश कीजिए! जब आप एक-दूसरे के साथ पर्याप्त समय गुजारेंगे तो कुछ और सामान्य मतभेद उजागर होंगे- लेकिन उनके विषय में विस्तृत चर्चा कल करेंगे!

जब लड़ाई-झगड़े संयुक्त परिवार तोड़ देते हैं तथा जीवन और भी दुश्वार हो जाता है – हमारे स्कूल के बच्चे – 1 मई 2015

आज मैं आपका परिचय एक लड़के से करवाना चाहता हूँ, जो हमारे आश्रम के पीछे वाली गली में, कुछ घर छोड़कर रहता है। उसका नाम मोहित है और वास्तव में वह हमारे स्कूल में पढ़ रही एक लड़की, अनुराधा का चचेरा भाई है, जिसका परिचय मैंने पिछले साल करवाया था

मोहित 8 साल का है और परिवार के चार बच्चों में सबसे छोटा है। उसकी सबसे बड़ी बहन 14 साल की है, उसके बाद एक भाई, 12 साल का और दूसरी बहन 10 साल की है। वे सब अपने माता-पिता और अपनी दादी के साथ एक ही घर में रहते हैं। मकान दादी की मिल्कियत है।

मोहित का पिता संगतराश या राजगीर है, यानी पत्थर का काम करता है। उसे रोज़ ही नया काम ढूँढ़ना होता है और तब जाकर वह प्रतिदिन 5 डॉलर यानी लगभग 300 रुपए कमा पाता है। लेकिन उसकी पत्नी बताती है कि माह में मुश्किल से 10 दिन ही उसे काम मिल पाता है अर्थात उनके पास अपने चार बच्चों को खिलाने-पिलाने, उनके कपड़े-लत्तों और पढ़ाई-लिखाई के लिए बहुत कम पैसे होते हैं!

जब आप एक सँकरे दरवाजे से उनके घर में प्रवेश करते हैं तो बाईं ओर आपको एक छोटा सा छप्पर दिखाई देता है, जिसमें एक गाय बंधी है। कुछ कदम आगे बढ़ने पर फिर बाईं ओर ही आपको एक संडास दिखाई देता है, और उसके बाद छत पर एक तरह का आँगन और सामने नीचे ले जाती हुई खड़ी सीढ़ियाँ हैं, जिनसे कुछ नीचे उतरने पर आप एक समतल फर्श तक पहुँचते हैं, जहाँ कई कमरे बने हुए हैं। आप समझ सकते हैं कि जब इस घर का निर्माण हुआ होगा, तब सामने वाली सड़क घर से काफी नीचे रही होगी। सड़क बनती रही और घर की सतह से काफी ऊपर आ गई और अब उन्हें इस घर में किसी तरह गुज़ारा करना पड़ रहा है।

अंदर प्रवेश करते हुए आप नोटिस करेंगे कि दाहिनी ओर वाली दीवार पहले वहाँ नहीं रही होगी। वह घर के कुछ हिस्से को दो भागों में बाँट रही है-और नीचे देखने पर हम तुरंत समझ जाते हैं कि मामला क्या है: एक संयुक्त परिवार साथ नहीं रह सका और अब बीचोंबीच दीवार खड़ी करके उसने एक घर को दो घरों में विभक्त कर दिया है। यह घर मोहित की दादी का है, जो मोहित के घर की तरफ स्थित दो कमरों में से एक कमरे में रहती है। उनके पास रसोई भी है मगर उसमें अधिक जगह नहीं है। यह पूछने पर कि झगड़े का कारण क्या था, जिसके चलते बीचोंबीच दीवार खड़ी करनी पड़ी, हमें कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिल पाता। ‘वे हर वक़्त हमसे लड़ते रहते थे…’

स्वाभाविक ही इस तरह के झगड़े परिवार के लिए और भी मुश्किले पैदा करते हैं, यहाँ तक कि घर का खर्च चलाना कठिन होता है। मुश्किल घड़ी में उन्हें दूसरे कमाने वाले का आर्थिक सहयोग हासिल नहीं हो पाता-और आवश्यकता पड़ने पर नैतिक और भावनात्मक समर्थन भी नहीं!

यह बड़े दुख की बात है कि संयुक्त परिवार टूट रहे हैं और इतनी बुरी तरह से, कि एक गरीब परिवार, जिसके पास पहले ही इतनी कम जगह है, बीच में दीवार खड़ी करके दो छोटे-छोटे दड़बों जैसे घर बनाकर अलग-अलग रहने लगते हैं! उनकी माली हालत ऐसी नहीं है कि कहीं और जाकर रह सकें!

हमारे स्कूल के बच्चे ऐसे ही घरों से आते हैं! मोहित हमारे स्कूल में पिछले दो साल से पढ़ रहा है। इसी साल उसने अपर के जी पास किया है और इसी जुलाई से पहली कक्षा में पढ़ना शुरू करेगा।

आप उस जैसे बच्चों की मदद कर सकते हैं। एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके!

भारत में परंपरागत आयोजित विवाह – सस्ती नौकरानी ढूँढ़ने का एक तरीका? 3 फरवरी 2015

आप जानते हैं कि भारत में परिवार द्वारा आयोजित विवाह एक सामान्य बात है। इन विवाहों के बारे में आपको एक से एक बढ़कर कहानियाँ सुनने को मिल सकती हैं और पश्चिमी देशों के लोग अक्सर आश्चर्य प्रकट करते हैं कि किसी पूर्णतः अपरिचित व्यक्ति के साथ आप विवाह कैसे कर सकते हैं। लेकिन कभी-कभी आपको थोड़ा व्यावहारिक रवैया अपनाना पड़ता है। जैसे आप इस बात को समझें कि आने वाली पत्नी या बहू लड़के के परिवार में किस तरह एक सहायक या नौकरानी की भूमिका निबाह सकती है! अगर आपको घरेलू कामकाज के लिए दो जोड़ी हाथों की दरकार है तो क्या इस प्रकार का विवाह उपयुक्त विचार नहीं है?

सुनने में यह आपको बहुत अच्छा नहीं लग रहा होगा और मुझे भी नहीं लगता लेकिन अगर आप गंभीरता से सोचें तो आपको पता चलेगा की वास्तव में कई बार ऐसा होता है। मैं आपको एक भारतीय युवक का किस्सा बताता हूँ, जिससे अभी हाल ही में मेरी मुलाक़ात हुई थी।

यह व्यक्ति लगभग 30 साल का व्यक्ति है और अपने परिवार का इकलौता बेटा है। उसकी तीन बहनें हैं जिनमें से दो बड़ी बहनों के विवाह हो चुके हैं। वह खुद और उसकी छोटी बहन अविवाहित हैं। उसकी माँ का देहांत पाँच साल पहले हो चुका था और उसके घर में अब उसके पिता और छोटी बहन भर रहते हैं। उसकी बड़ी बहनें अपने पतियों के साथ रहती हैं और यह युवक अपने परिवार से लगभग 600 किलोमीटर दूर किसी शहर में नौकरी करता है।

हाल ही में उसके पिता का स्वास्थ्य खराब रहने लगा। इस कारण छोटी बहन के लिए घर के कामों का बोझ बहुत असहनीय हो गया और वैसे भी विवाह करने की बारी अब इसी व्यक्ति की थी। तो उन्होंने विवाह की प्रक्रिया तेज़ कर दी और उपयुक्त लड़की की तलाश में ज़्यादा से ज़्यादा परिवारों में बात चलाना शुरू किया और अंततः पिता को बेटे के लिए वह ‘उपयुक्त’ लड़की मिल ही गई।

अब शादी की अंतिम तैयारियाँ शुरू हो चुकी हैं, दोनों परिवार खुश हैं और शादी की तैयारी में लगे हुए भविष्य की ओर देख रहे हैं। लड़की को अपने होने वाले पति की नौकरी के बारे में पता है। परिवार की सारी स्थिति उसे पता है।

वह जानती है कि वह अपने पति के साथ उसके काम वाली जगह नहीं रह सकेगी बल्कि उसे उसके पिता यानी अपने होने वाले ससुर के पास रहना होगा। कुछ सालों में छोटी बहन का विवाह भी हो जाएगा। उसे यह भी पता है कि कुछ ही समय बाद एक बूढ़े व्यक्ति की देखभाल की ज़िम्मेदारी उस पर होगी। उस युवक ने मुझे साफ शब्दों में निःसंकोच सब कुछ बताया: मेरे पिता और घर के कामकाज की ज़िम्मेदारी किसी न किसी को तो लेनी ही थी। वह भी जानता है कि अभी-अभी विवाह करके लाई गई अपनी पत्नी को वह ज़्यादा समय नहीं दे पाएगा। लेकिन विवाह भी आखिर वह इस काम के लिए नहीं कर रहा है कि पूरे समय पत्नी के साथ रहे!

अब बताइए कि यह क्या है? है न एक सस्ती नौकरानी प्राप्त करने का तरीका? या शायद उस लड़की के लिए भी एक अच्छा सौदा, क्योंकि उसकी सास या कोई बड़ी, उम्रदराज ननंद घर पर नहीं होगी? घर पर एकछत्र राज! कोई सत्ता की लड़ाई नहीं, मुफ्त श्रम और ससुर की सेवा के एवज में घर के कामों में सम्पूर्ण स्वतन्त्रता!

कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं इसे कुछ ज़्यादा ही गंभीरता से ले रहा हूँ?

आपरेशन के बाद मोनिका के पिता या परिवार का कोई सदस्य न तो अस्पताल आये और न ही फोन किया! 29 दिसंबर 2014

पिछले 48 घंटों से आश्रम में होने के बाद भी मैं और रमोना हर वक़्त मोनिका के बारे में ही सोचते रहे हैं। सिर्फ यह नहीं कि अब, शल्यक्रिया के बाद उसका क्या हालचाल है-जैसी परिस्थितियाँ थी उसके अनुसार इसका उत्तर यही है कि हाल बहुत अच्छा है-बल्कि उसके परिवार के बारे में, आसपास के माहौल के बारे में, शनिवार को उसे अस्पताल में छोड़ आने के बाद वहाँ हुए अपने अनुभवों के बारे में और छोटी-छोटी बातों और घटनाओं के बारे में, जिनके बारे में हम इस बीच चर्चा करते रहे हैं। इन सभी बातों पर अपना आँखों देखा हाल और अपने विचार आपके सामने रखने का लोभ मैं संवरण नहीं कर पा रहा हूँ।

शनिवार को मोनिका से मिलकर ही हम वृन्दावन वापस लौटे थे। वह जाग रही थी और प्रसन्न थी। वह फलों का रस पी पा रही थी और उसने कहा कि जो पनियल सूप उसे दिया गया था वह स्वादिष्ट नहीं था। मैंने शल्यक्रिया करने वाले डॉक्टरों से बात की तो उन्होंने बताया कि सब कुछ ठीक-ठाक है और मोनिका को अभी कुछ दिन और अस्पताल में रहना होगा, जिससे वे उसके ज़ख़्मों की ठीक तरह से निगरानी कर सकें।

उसके बाद वे हर दूसरे दिन उसकी पट्टियाँ बदलेंगे। क्योंकि हर दूसरे दिन पट्टियाँ बदलवाने के लिए तीन घंटा अस्पताल आने में और वापस घर जाने में मोनिका को थकान हो जाएगी, हम मोनिका और उसकी माँ के लिए अस्पताल के आसपास दो हफ्तों या एक माह के लिए किराए के किसी कमरे का इंतज़ाम करने की कोशिश कर रहे हैं। वहाँ से, जब भी आवश्यकता होगी, वह आसानी के साथ अस्पताल आ-जा सकेगी और इस तरह जल्दी स्वस्थ भी हो सकेगी!

अब यहाँ का हाल सुनिए। जलती हुई लपटों पर अपने दोनों हाथ थामे हम कभी-कभी मोनिका के ज़ख़्मों और उस शारीरिक और मानसिक पीड़ा के बारे में सोचते हैं, जिन्हें वह पिछले दिनों भोगती रही है! शल्यक्रिया से पहले, जब वह थोड़ा बेचैन दिखाई दे रही थी, हमने उसे दिलासा देते हुए कहा था कि परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं है, जितना तुमने पिछले दिनों सहा है, उससे बुरा तुम्हारे साथ कुछ भी नहीं हो सकता!

मोनिका की माँ अपनी बेटी की देखभाल करने, उसके साथ बातचीत करने, उसका हाथ हाथों में लेकर प्यार करने और उसके साथ हँसी-मज़ाक करने के लिए उसके साथ ही रह रही है, जिससे उसे अकेलापन महसूस न हो और उसका हौसला भी बना रहे। और मोनिका का हालचाल लेने के उद्देश्य से हम भी लगातार उसकी माँ के संपर्क में बने रहते हैं। अस्पताल की नर्सें, जैसा कि मैं पहले कह चुका हूँ, बहुत ही दोस्ताना और मददगार हैं और हमें विश्वास है कि वे मोनिका की उचित प्रकार से देखभाल करती रहेंगी!

और यह अच्छी बात ही हुई-क्योंकि उसकी माँ और हम लोगों के अलावा मोनिका से न सिर्फ मिलने कोई नहीं आया बल्कि हालचाल लेने के लिए फोन तक किसी ने नहीं किया! न तो उसका पिता उसे देखने आया, न ही परिवार का कोई दूसरा सदस्य! अभी तक पिता को यह भी नहीं पता कि मोनिका की शल्यक्रिया हुई या नहीं, हुई तो कैसी रही या अब उसकी बेटी का क्या हाल है! उसे अपनी बेटी से कोई लेना-देना ही नहीं है! घर से एक फोन तक नहीं आया। यह सोच पाना बड़ा कठिन है मगर हम जब-तब अपने मित्रों, शुभचिंतकों और मददगारों की शुभकामनाएँ मोनिका तक पहुँचाते रहते हैं और उसे बताते हैं कि दुनिया में बहुत से लोग हैं, जो उसके लिए चिंतित हैं, उसकी मदद को आतुर हैं और चाहते हैं कि वह जल्द से जल्द स्वस्थ हो जाए!

ऐसा नहीं था कि हम उसे अस्पताल में सिर्फ भर्ती भर कराके अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते। हम किसी को उसके साथ भेज भी सकते थे और तब हमें सब कुछ खुद नहीं करना पड़ता। लेकिन हम सब कुछ खुद करना चाहते थे। हम उनके साथ वहाँ खुद रहना थे और हमारे लिए भी यह अच्छा अनुभव रहा और अब भी है। जब आप किसी व्यक्ति की मोनिका जैसी त्रासद परिस्थिति में उसके साथ रहते हैं और उसकी मदद में तहे दिल से लगे रहते हैं तो आप सशरीर, दिलोदिमाग के साथ अपने आपको उस काम में झोंक देते हैं!

अब पूर्णेन्दु, रमोना, अपरा और मैं थोड़े समय के लिए अमृतसर जा रहे हैं। ज़ख्मी अवस्था में मोनिका के स्कूल आने से पहले ही हमारा वहाँ जाने का कार्यक्रम तय था और होटल और टिकिट बुक हो चुके थे। कुछ दिन हम वहाँ आराम करेंगे और लोगों से मिलेंगे-जुलेंगे, कुछ घूमना-फिरना होगा-मगर मोनिका हमारे दिमाग में हर वक़्त बनी रहेगी और निश्चय ही हम उसके और उसके डॉक्टरों के संपर्क में रहेंगे। वापसी में, 2 जनवरी के दिन हम उससे मिलने अस्पताल जाएँगे और जैसा कि डॉक्टरों ने कहा है, वही समय उसके अस्पताल से छुट्टी पाने का होगा, इसलिए उस दिन हम उसे उसके कमरे में खुद लेकर आएँगे। इस विषय में मैं आपको बताता ही रहूँगा!

प्रियजन के विछोह को शब्दों में वर्णन करना संभव नहीं! 5 अक्टूबर 2014

पिछले रविवार को मैंने आपको बताया था कि 18 सितंबर 2006 के दिन मेरी बहन की मृत्यु कैसे हुई। उसकी मृत्यु के बाद के दिन एक धुंधलके की तरह गुज़र गए। मुझे याद नहीं है कि उस समय ठीक-ठीक क्या हुआ था लेकिन उस समय हम पर छाए हुए गहरे शोक की याद आज भी ताज़ा है।

उसकी मृत्यु के बाद हम लोग घर पर क्या कर रहे थे? वास्तव में हमारे पास करने के लिए कुछ भी नहीं था। सिर्फ हम लोग एक-दूसरे को कसकर थामे हुए थे, अपने विषाद में एक-दूसरे का ढाढ़स बंधा रहे थे। नानी जी ने अपनी नातिन को खोया था। बब्बाजी और अम्माजी ने अपनी एकमात्र बेटी खो दी थी और हम तीन भाइयों ने अपनी बहन को खोया था।

शुरू में, काफी समय तक मैं बुरी तरह सदमे में रहा। मैं रोया नहीं था। मैंने अपनी रोती माँ को अपनी बाँहों में भरा हुआ था, मैं इतना शोकाकुल था कि आज तक वैसा दुखी कभी नहीं हुआ मगर मैं रो नहीं पा रहा था। हम परा के बारे में बातें करते रहे और सोचते रहे कि उसके बिना हमारा भविष्य कैसा होगा। वह बेहद मटमैला, विषादग्रस्त और एकाकी दिखाई दे रहा था। सब रोए-मगर मैं रो ही नहीं पा रहा था।

मुझे लगता है कि सदमे ने मेरे मस्तिष्क को बुरी तरह झँझोड़ दिया है। मुझे अधिक नींद की ज़रूरत कभी नहीं पड़ी लेकिन उन दिनों मैं बुरी तरह सोता था। ऐसी ही किसी रात के बाद सबेरे अपने कमरे से लगभग उनींदा सा मैं बाहर आया तो मेरे मन में एक हास्यास्पद विचार कौंधा, जो पल भर के लिए मुझे हर बात का समाधान नज़र आ रहा था। जब मुझे यशेंदु दिखाई पड़ा तो मैंने उससे कहा कि तुरंत कंप्यूटर चालू करे: हम गूगल पर उसे ढूँढ़ते हैं! हाँ, वह कहीं नहीं गई है, हम उसे पा लेंगे! मैं उस कड़ुवी सच्चाई को हजम नहीं कर पा रहा था, यथार्थ का सामना करना मेरे लिए असंभव हो रहा था।

परा की मृत्यु के बाद कुछ दिनों तक बहुत से लोग घर आते रहे। यहाँ तक कि दुनिया के कोने-कोने से बहुत से दोस्तों ने अपनी संवेदना व्यक्त करते हुए ईमेल भेजे, मोबाइल संदेश भेजे या फोन किया। हर ईमेल के बाद, उनके हर शब्द के बाद, जिसमें वे उसके साथ बिताए समय का ज़िक्र करते या सिर्फ मानसिक संवेदना प्रेषित करते, मैं महसूस करता कि सिर्फ मैंने और मेरे परिवार ने ही उसे नहीं खोया है बल्कि और भी बहुत सारे लोगों ने उसे खो दिया है। वह अभी बहुत छोटी थी, दुनिया में उसे बहुत कुछ देखना बाकी था और उसके साथ दुनिया में न जाने कितने लोगों के दिलों को स्पंदित होना था!

यहाँ तक कि एक करीबी मित्र, जिसके यहाँ परा को जर्मनी पहुँचने के बाद रुकना था, फ्लाइट पकड़कर आश्रम आ गई। सिर्फ हमारे साथ रहने के लिए, परा के लिए हमारे शोक में शामिल होने के लिए, वह इतनी दूर चली आई।

लेकिन आखिर वह समय भी आया जब मैं अपने दुख को निसृत कर पाया, उसे आंसुओं में बहा सकता था। और जब मैंने रोना शुरू किया तो तब तक रोता रहा जब तक सारे आँसू समाप्त नहीं हो गए। यह एक तरह की मुक्ति थी, एक भुलावा, जैसे मैंने अपने दुख को आंसुओं के जरिये बहा दिया हो-लेकिन शोक में ज़रा सी भी कमी नहीं आई। जो खाली स्थान वह छोड़कर गई है, उसे कभी भी किसी दूसरी चीज़ से भरा नहीं जा सकता।

पश्चिम में वृद्धों का कठिन जीवन – 25 सितम्बर 2014

कल मैंने ज़िक्र किया था कि पश्चिम में लोग अपने माता-पिता और दादा-दादियों को वृद्धों के लिए निर्मित घरों में भेजने को मजबूर होते हैं। मैंने 'मजबूर होते हैं' समझ-बूझकर कहा क्योंकि उन्हें अपने सामने उपस्थित कठिन परिस्थितियों से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं नज़र नहीं आता।

बहुत से लोग, विशेष रूप से भारत में, इस विचार का विरोध करते हैं। संयुक्त परिवार में पले-बढ़े होने के कारण इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि अपने माता-पिता को देखभाल के लिए घर से दूर, किसी अनजान जगह और अनजान लोगों के हाथों सौंप दिए जाने का विचार ही उनके लिए दिल दहलाने वाला होता है। घृणा से मुँह बिदकाते हुए वे कहते हैं कि आखिर कोई न कोई तरीका तो होगा, कोई न कोई रास्ता तो निकालना ही पड़ता है-इस तरह अपने बूढ़े माँ-बाप को घर से तो नहीं निकाला जाता! लेकिन जब सारी तसवीर सामने आती है तब वे शायद समझ पाते हैं कि क्यों कुछ लोगों को कोई रास्ता नज़र नहीं आता।

अपने जर्मन मित्रों के साथ मेरा यही अनुभव है। जैसा कि कल मैंने विस्तार से बताया था, पश्चिम में लोग बूढ़े हो जाने के बाद भी परिवार के साथ नहीं रहते। शुरू से वे अपने घर या फ्लैट में रहते हैं और वहीं वे समय के साथ बूढ़े होते चले जाते हैं। आप पचहत्तर-पचहत्तर साल की या उससे भी अधिक बूढी औरतों को देख सकते हैं, जिनके पति गुज़र चुके होते हैं और जिनके पास वही छोटा सा फ्लैट रह जाता है, जहाँ वे मज़े में अपनी बची हुई उम्र गुज़ार देती हैं। वे खुद अकेले बाज़ार जाती हैं, कुछ व्यायाम आदि करके स्वस्थ रहने की कोशिश करती हैं, सामाजिकता निभाती हैं और आश्चर्यजनक रूप से चुस्त-दुरुस्त रहती हैं।

फिर एक दिन दुर्घटना होती है, वे गिर पड़ते हैं और उन्हें अस्पताल जाना पड़ता है। या फिर धीरे-धीरे वे विस्मरण के शिकार होते जाते हैं, छोटी-छोटी बाते भूल जाते हैं, भोजन ज़्यादा देर स्टोव पर रखा रह जाता है, जल जाता है, मोमबत्तियाँ जलती छोड़ देते हैं और डोर-बेल नहीं सुन पाते। बातें जो उनके बच्चों को परेशान करती हैं। जब सरकारी अधिकारियों को उनके घर का और उनके गिरते स्वास्थ्य का पता चलता है तो वे बच्चों पर और खुद उन बूढ़ों पर ज़ोर डालते हैं कि उन्हें सहायता की ज़रूरत है, जिसका इंतज़ाम उन्हें ही करना है।

स्वास्थ्य के एक हद से अधिक खराब होने पर क्या किया जाना है, इसके वहाँ नियम-कानून हैं, जिनका पालन किया जाना आवश्यक है। भोजन की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की जाना आवश्यक है, आपातकालीन सहायता उपलब्ध होना, बाथरूम में आवश्यक हत्थों का लगाया जाना सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है, जिससे पाखाने के बाद उठना आसान हो सके। यह सब तभी संभव है जब वह व्यक्ति खुद चलने-फिरने में सक्षम हो और उसके पास इतनी रकम हो कि अपने फ्लॅट में इन सब सुविधाओं का इंतज़ाम करवा सके। जब स्वास्थ्य इतना खराब हो चुका हो कि कभी भी वे गिर-पड़ सकते हैं या हर वक़्त उन्हें निगरानी की ज़रूरत है, चाहे उन्हें बाथरूम ले जाने के लिए हो चाहे समय पर दवाएँ देने के लिए हो, तो फिर यह मुश्किल होता है।

अगर कोई बुजुर्ग अपने बेटे या बेटी के घर में भी रह रहा हो तब भी यह संभव है कि हर वयस्क पैसा कमाने के लिए काम पर जाता हो। इसका अर्थ यह हुआ कि कम से कम आधा दिन घर में उसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं होगा! भारत में, न सिर्फ संयुक्त परिवार होते हैं बल्कि एक विस्तारित परिवार भी होता है, जिसमें चाचा-चाचियाँ, चचेरे-ममेरे भाई-बहन और न जाने कितने लोग उपलब्ध होते हैं! महिलाएँ अक्सर काम पर नहीं जातीं क्योंकि अक्सर उनका कोई न कोई छोटा बच्चा होता है और उसकी देखभाल के लिए उसे घर पर रहना ही होता है। इस तरह हर वक़्त कोई न कोई घर पर होता ही है। पश्चिम में ऐसा नहीं होता! हर परिवार इतना सक्षम नहीं होता कि सिर्फ एक सदस्य की कमाई से घर का खर्च चल सके-वहाँ दोनों अभिभावकों को नौकरी करना ज़रूरी होता है।

जर्मनी में 24 घंटे घर पर सहायता के लिए लोग उपलब्ध होते हैं लेकिन फिर उस नर्स या केयरटेकर के लिए एक अलग कमरे की ज़रूरत होगी, जिसका अर्थ होगा, अतिरिक्त खर्च! इसके अलावा मानवीय श्रम वहाँ बहुत महंगा भी है और इसके बहुत से नियम और कायदे हैं, जिनका पालन करना हर हाल में ज़रूरी होता है। सामाजिक सुरक्षा नियम, हालाँकि यह अच्छी बात है कि यहाँ अस्तित्व में हैं, हर तरह के खर्च वहन नहीं करते। सरकार कर चुकाने वालों के पैसों से यह सहायता प्रदान करती है लेकिन बच्चों से भी कहती है कि वे भी कुछ हिस्सा अदा करें। नतीजतन यह पाया गया है कि एक स्थान पर बहुत से लोगों की देखभाल कम खर्चीली सिद्ध होती है, बनिस्बत इसके कि शहर के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले हर एक वृद्ध की देखभाल की अलग-अलग व्यवस्था की जाए!

मैं जो कहना चाह रहा हूँ वह यह है कि किसी अंतिम निर्णय पर आने से पहले विचार करें। ऐसा करना भिन्न सांस्कृतिक परम्पराओं के चलते आपके यहाँ संभव है। मैं अभी भी यही कहता हूँ कि संयुक्त परिवार बेहतर हैं, वे आपसी स्नेह से परिपूर्ण हैं, रहने के अधिक अच्छे स्थान हैं। मुझे लगता है कि मैं पूरी कोशिश करूँगा कि मेरे किसी भी प्रियकर को वृद्धों के लिए स्थापित वृद्धाश्रमों में न रहना पड़े। लेकिन जो ऐसा नहीं कर पा रहे हैं, उन्हें मैं अपनी नज़र से नहीं आँकना चाहता। उनके आसपास की व्यवस्था ने उन्हें और उनके माता-पिता को ऐसे कदम उठाने के लिए तैयार कर रखा है। मैं सिर्फ यह आशा कर सकता हूँ कि एक न एक दिन समाज में परिवर्तन आएगा और उन्हें अधिक से अधिक प्यार मिल पाएगा, ज़्यादा से ज़्यादा समय वे परिवार के स्नेहिल वातावरण में रह पाएंगे!