भारतीय मर्द से शादी करना चाहती हैं? क्या संयुक्त परिवार के अनुभवों से गुज़रने के लिए भी तैयार हैं? 29 जून 2015

आज मैं पुनः उसी विषय पर लौटना चाहता हूँ, जिसका संबंध पश्चिमी महिला और भारतीय पुरुष के अंतर्राष्ट्रीय जोड़ों से है। ये विचार उनके लिए हैं, जो अभी एक साथ जीवन गुजरने का निर्णय लेने की प्रक्रिया में हैं, अपने प्रेम को एक मौका देना चाहते हैं, भले ही वे दो बहुत भिन्न संस्कृतियों से आते हों। यह कतई आसान नहीं होता, लेकिन अगर आपके पास सोचने और व्यवहार का एक परिपक्व और समझदार तरीका है तो आप खुद को और अपने जीवन साथी को खुश रख सकते हैं। लेकिन उससे पहले आपको होमवर्क करना होगा, कुछ तैयारियाँ करनी होंगी और सामने वाले की संस्कृति और परम्पराओं को जानना-समझना होगा। भविष्य के बारे में गम्भीरतापूर्वक सोचना होगा, अपने होने वाले जीवन साथी से बातचीत करनी होगी। आज से मैं उन बातों पर लिखना शुरू कर रहा हूँ, जिन पर आपको गम्भीरतापूर्वक सोचना-विचारना होगा- उस स्थिति में, जब आप दोनों पति के संयुक्त परिवार के साथ भारत में रहने का निर्णय लेते हैं!

एक पश्चिमी महिला होने के नाते आपका सपना रहा होगा कि आप भारत आकर वहीं बस जाएँ। भारत के बारे में आपने इतना कुछ सुन रखा था और अब आपको एक भारतीय पुरुष भी मिल गया है, जिसके बारे में आप महसूस करती हैं कि वह आपका हमसफर बन सकता है और अब अपने उस चिरस्वप्न को साकार करना चाहती हैं। अब मैं सिर्फ कुछ तथ्यों से आपको अवगत कराना चाहता हूँ, जो वास्तविकता में आपके सपनों की तुलना में बहुत भिन्न प्रतीत होंगे और आपके होने वाले जीवन साथी के जीवन में पहले से मौजूद महिला से सम्बंधित तथ्य उन तथ्यों में सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण होगा: आपकी सास!

मैं नकारात्मक नहीं होना चाहता, न मैं किसी को डराना चाहता हूँ और न ही किसी को इस राह पर कदम न रखने की सलाह देना चाहता हूँ। मैं सिर्फ आपको यह बताना चाहता हूँ कि भारत में चीजें किस तरह काम करती हैं। परिवार में किसका कितना महत्व होगा, इस मामले में किसी भी परंपरागत भारतीय परिवार में पुरुषों की उम्र के हिसाब से एक अनुक्रम होता है। इसका अर्थ हुआ कि महिलाओं के सन्दर्भ में आपकी सास घर की मुखिया होगी, फिर सबसे बड़े भाई की पत्नी, उसके बाद दूसरे नंबर वाले भाई की पत्नी, और इसी तरह यह क्रम चलता रहता है। घर और रसोई के परिचालन में और बच्चों की परवरिश और उनकी लिखाई-पढ़ाई के मामले में इसी अनुक्रम से अधिकार और कर्तव्यों का निर्वहन होता है।

अपनी जीवनचर्या में किसी दूसरी महिला का कितना रोबदाब या हस्तक्षेप आप बर्दाश्त कर सकती हैं? विशेष रूप से अगर वह दूसरी महिला आपकी सास हो?

इस बात की पूरी संभावना है कि जिस परिवार में आप विवाह रचाने जा रही हैं, वह पूरी तरह से एक पारंपरिक, दकियानूस परिवार न हो क्योंकि अगर होता तो वे आपको यानी एक विदेशी, गैर हिन्दू महिला को, जिसकी जात-पात का पता न हो, कतई स्वीकार ही नहीं करते। लेकिन, पुरानी सामाजिक परंपराओं को वे कितना महत्व देते हैं, यह पूरी तरह उस परिवार विशेष पर निर्भर करता है।

यह आपको स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि आपका पति चाहेगा कि आप उसकी माँ का आदर करें-और मैं यह मानता हूँ कि आप भी सामान्यतया ऐसा ही करना चाहेंगी। लेकिन वह आपसे किस सीमा तक अपनी माँ और अपने दूसरे रिश्तेदारों की मर्ज़ी से चलने और उनके आदेशों का पालन करने की अपेक्षा रखता है? परिवार के अनुक्रम में आपकी स्थिति क्या होगी और आपको किस हद तक उसमें शामिल किया जाता है बल्कि किया भी जाता है या नहीं? आप सारे परिवार के लिए खाना पकाने की प्रक्रिया का हिस्सा होंगी या आप अपने लिए परिवार से अलग एक अन्य रसोई का इंतज़ाम करने का मन बना रही हैं, जैसा कि आजकल बहुत से लोग करने लगे हैं?

अगर आपकी सास घर में भी आपसे सिर्फ साड़ी पहनने के लिए कहती हैं और दूसरे कपड़े पहनने पर नाक-भौं सिकोड़ती हैं, क्योंकि बहू के लिए साड़ी ही एकमात्र उपयुक्त वस्त्र होता है, तो क्या आप उनकी बात मानेंगी? इसके बावजूद कि इससे आपके पति के साथ तालमेल डगमगा सकता है और चाचियों और बड़े भाइयों जैसे परिवार के दूसरे सदस्यों के साथ तालमेल और सामंजस्य बिगड़ता है, आप साड़ी के अलावा अपनी मर्ज़ी के दूसरे वस्त्र भी पहनती हैं तो क्या आपका पति इसे स्वीकार करेगा?

संयुक्त परिवार में रहने का अनुभव प्राप्त करने से पहले अगर उसकी कुछ मूलभूत बातों को समझ-बूझ लें तो आपके लिए बेहतर होगा। बहुत सी दूसरी चीजों की जानकारी और आजमाइश तो रास्ते में करते चलना ही है। लेकिन एक बात हर स्थिति में आपके सामने स्पष्ट होनी चाहिए: आप उसी हद तक सामंजस्य बिठाएँगी जहाँ तक आपको कोई असुविधा महसूस नहीं हो रही है। जब आपकी तय सीमा से आगे बात बढ़ती है तो उसके बारे में शांतिपूर्वक अपने पति को तुरंत बताएँ। इस बात का ध्यान रखें कि जो कुछ भी आपके आसपास चल रहा है, उनकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को पूरी तरह समझ पाना आपके लिए संभव नहीं भी हो सकता- लेकिन अपने साथी से साफ-साफ़ कहिए कि क्यों कुछ बातें आपको उचित नहीं लगतीं।

कुछ अंधविश्वास-प्रेरित गतिविधियों के सन्दर्भ में यह बात विशेष रूप से लागू होती है- लेकिन वह एक अलग विषय है, जिस पर मैं कल चर्चा करूँगा।

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