आपरेशन के बाद मोनिका के पिता या परिवार का कोई सदस्य न तो अस्पताल आये और न ही फोन किया! 29 दिसंबर 2014

परोपकार

पिछले 48 घंटों से आश्रम में होने के बाद भी मैं और रमोना हर वक़्त मोनिका के बारे में ही सोचते रहे हैं। सिर्फ यह नहीं कि अब, शल्यक्रिया के बाद उसका क्या हालचाल है-जैसी परिस्थितियाँ थी उसके अनुसार इसका उत्तर यही है कि हाल बहुत अच्छा है-बल्कि उसके परिवार के बारे में, आसपास के माहौल के बारे में, शनिवार को उसे अस्पताल में छोड़ आने के बाद वहाँ हुए अपने अनुभवों के बारे में और छोटी-छोटी बातों और घटनाओं के बारे में, जिनके बारे में हम इस बीच चर्चा करते रहे हैं। इन सभी बातों पर अपना आँखों देखा हाल और अपने विचार आपके सामने रखने का लोभ मैं संवरण नहीं कर पा रहा हूँ।

शनिवार को मोनिका से मिलकर ही हम वृन्दावन वापस लौटे थे। वह जाग रही थी और प्रसन्न थी। वह फलों का रस पी पा रही थी और उसने कहा कि जो पनियल सूप उसे दिया गया था वह स्वादिष्ट नहीं था। मैंने शल्यक्रिया करने वाले डॉक्टरों से बात की तो उन्होंने बताया कि सब कुछ ठीक-ठाक है और मोनिका को अभी कुछ दिन और अस्पताल में रहना होगा, जिससे वे उसके ज़ख़्मों की ठीक तरह से निगरानी कर सकें।

उसके बाद वे हर दूसरे दिन उसकी पट्टियाँ बदलेंगे। क्योंकि हर दूसरे दिन पट्टियाँ बदलवाने के लिए तीन घंटा अस्पताल आने में और वापस घर जाने में मोनिका को थकान हो जाएगी, हम मोनिका और उसकी माँ के लिए अस्पताल के आसपास दो हफ्तों या एक माह के लिए किराए के किसी कमरे का इंतज़ाम करने की कोशिश कर रहे हैं। वहाँ से, जब भी आवश्यकता होगी, वह आसानी के साथ अस्पताल आ-जा सकेगी और इस तरह जल्दी स्वस्थ भी हो सकेगी!

अब यहाँ का हाल सुनिए। जलती हुई लपटों पर अपने दोनों हाथ थामे हम कभी-कभी मोनिका के ज़ख़्मों और उस शारीरिक और मानसिक पीड़ा के बारे में सोचते हैं, जिन्हें वह पिछले दिनों भोगती रही है! शल्यक्रिया से पहले, जब वह थोड़ा बेचैन दिखाई दे रही थी, हमने उसे दिलासा देते हुए कहा था कि परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं है, जितना तुमने पिछले दिनों सहा है, उससे बुरा तुम्हारे साथ कुछ भी नहीं हो सकता!

मोनिका की माँ अपनी बेटी की देखभाल करने, उसके साथ बातचीत करने, उसका हाथ हाथों में लेकर प्यार करने और उसके साथ हँसी-मज़ाक करने के लिए उसके साथ ही रह रही है, जिससे उसे अकेलापन महसूस न हो और उसका हौसला भी बना रहे। और मोनिका का हालचाल लेने के उद्देश्य से हम भी लगातार उसकी माँ के संपर्क में बने रहते हैं। अस्पताल की नर्सें, जैसा कि मैं पहले कह चुका हूँ, बहुत ही दोस्ताना और मददगार हैं और हमें विश्वास है कि वे मोनिका की उचित प्रकार से देखभाल करती रहेंगी!

और यह अच्छी बात ही हुई-क्योंकि उसकी माँ और हम लोगों के अलावा मोनिका से न सिर्फ मिलने कोई नहीं आया बल्कि हालचाल लेने के लिए फोन तक किसी ने नहीं किया! न तो उसका पिता उसे देखने आया, न ही परिवार का कोई दूसरा सदस्य! अभी तक पिता को यह भी नहीं पता कि मोनिका की शल्यक्रिया हुई या नहीं, हुई तो कैसी रही या अब उसकी बेटी का क्या हाल है! उसे अपनी बेटी से कोई लेना-देना ही नहीं है! घर से एक फोन तक नहीं आया। यह सोच पाना बड़ा कठिन है मगर हम जब-तब अपने मित्रों, शुभचिंतकों और मददगारों की शुभकामनाएँ मोनिका तक पहुँचाते रहते हैं और उसे बताते हैं कि दुनिया में बहुत से लोग हैं, जो उसके लिए चिंतित हैं, उसकी मदद को आतुर हैं और चाहते हैं कि वह जल्द से जल्द स्वस्थ हो जाए!

ऐसा नहीं था कि हम उसे अस्पताल में सिर्फ भर्ती भर कराके अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते। हम किसी को उसके साथ भेज भी सकते थे और तब हमें सब कुछ खुद नहीं करना पड़ता। लेकिन हम सब कुछ खुद करना चाहते थे। हम उनके साथ वहाँ खुद रहना थे और हमारे लिए भी यह अच्छा अनुभव रहा और अब भी है। जब आप किसी व्यक्ति की मोनिका जैसी त्रासद परिस्थिति में उसके साथ रहते हैं और उसकी मदद में तहे दिल से लगे रहते हैं तो आप सशरीर, दिलोदिमाग के साथ अपने आपको उस काम में झोंक देते हैं!

अब पूर्णेन्दु, रमोना, अपरा और मैं थोड़े समय के लिए अमृतसर जा रहे हैं। ज़ख्मी अवस्था में मोनिका के स्कूल आने से पहले ही हमारा वहाँ जाने का कार्यक्रम तय था और होटल और टिकिट बुक हो चुके थे। कुछ दिन हम वहाँ आराम करेंगे और लोगों से मिलेंगे-जुलेंगे, कुछ घूमना-फिरना होगा-मगर मोनिका हमारे दिमाग में हर वक़्त बनी रहेगी और निश्चय ही हम उसके और उसके डॉक्टरों के संपर्क में रहेंगे। वापसी में, 2 जनवरी के दिन हम उससे मिलने अस्पताल जाएँगे और जैसा कि डॉक्टरों ने कहा है, वही समय उसके अस्पताल से छुट्टी पाने का होगा, इसलिए उस दिन हम उसे उसके कमरे में खुद लेकर आएँगे। इस विषय में मैं आपको बताता ही रहूँगा!

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