पश्चिम में वृद्धों का कठिन जीवन – 25 सितम्बर 2014

कल मैंने ज़िक्र किया था कि पश्चिम में लोग अपने माता-पिता और दादा-दादियों को वृद्धों के लिए निर्मित घरों में भेजने को मजबूर होते हैं। मैंने 'मजबूर होते हैं' समझ-बूझकर कहा क्योंकि उन्हें अपने सामने उपस्थित कठिन परिस्थितियों से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं नज़र नहीं आता।

बहुत से लोग, विशेष रूप से भारत में, इस विचार का विरोध करते हैं। संयुक्त परिवार में पले-बढ़े होने के कारण इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि अपने माता-पिता को देखभाल के लिए घर से दूर, किसी अनजान जगह और अनजान लोगों के हाथों सौंप दिए जाने का विचार ही उनके लिए दिल दहलाने वाला होता है। घृणा से मुँह बिदकाते हुए वे कहते हैं कि आखिर कोई न कोई तरीका तो होगा, कोई न कोई रास्ता तो निकालना ही पड़ता है-इस तरह अपने बूढ़े माँ-बाप को घर से तो नहीं निकाला जाता! लेकिन जब सारी तसवीर सामने आती है तब वे शायद समझ पाते हैं कि क्यों कुछ लोगों को कोई रास्ता नज़र नहीं आता।

अपने जर्मन मित्रों के साथ मेरा यही अनुभव है। जैसा कि कल मैंने विस्तार से बताया था, पश्चिम में लोग बूढ़े हो जाने के बाद भी परिवार के साथ नहीं रहते। शुरू से वे अपने घर या फ्लैट में रहते हैं और वहीं वे समय के साथ बूढ़े होते चले जाते हैं। आप पचहत्तर-पचहत्तर साल की या उससे भी अधिक बूढी औरतों को देख सकते हैं, जिनके पति गुज़र चुके होते हैं और जिनके पास वही छोटा सा फ्लैट रह जाता है, जहाँ वे मज़े में अपनी बची हुई उम्र गुज़ार देती हैं। वे खुद अकेले बाज़ार जाती हैं, कुछ व्यायाम आदि करके स्वस्थ रहने की कोशिश करती हैं, सामाजिकता निभाती हैं और आश्चर्यजनक रूप से चुस्त-दुरुस्त रहती हैं।

फिर एक दिन दुर्घटना होती है, वे गिर पड़ते हैं और उन्हें अस्पताल जाना पड़ता है। या फिर धीरे-धीरे वे विस्मरण के शिकार होते जाते हैं, छोटी-छोटी बाते भूल जाते हैं, भोजन ज़्यादा देर स्टोव पर रखा रह जाता है, जल जाता है, मोमबत्तियाँ जलती छोड़ देते हैं और डोर-बेल नहीं सुन पाते। बातें जो उनके बच्चों को परेशान करती हैं। जब सरकारी अधिकारियों को उनके घर का और उनके गिरते स्वास्थ्य का पता चलता है तो वे बच्चों पर और खुद उन बूढ़ों पर ज़ोर डालते हैं कि उन्हें सहायता की ज़रूरत है, जिसका इंतज़ाम उन्हें ही करना है।

स्वास्थ्य के एक हद से अधिक खराब होने पर क्या किया जाना है, इसके वहाँ नियम-कानून हैं, जिनका पालन किया जाना आवश्यक है। भोजन की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की जाना आवश्यक है, आपातकालीन सहायता उपलब्ध होना, बाथरूम में आवश्यक हत्थों का लगाया जाना सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है, जिससे पाखाने के बाद उठना आसान हो सके। यह सब तभी संभव है जब वह व्यक्ति खुद चलने-फिरने में सक्षम हो और उसके पास इतनी रकम हो कि अपने फ्लॅट में इन सब सुविधाओं का इंतज़ाम करवा सके। जब स्वास्थ्य इतना खराब हो चुका हो कि कभी भी वे गिर-पड़ सकते हैं या हर वक़्त उन्हें निगरानी की ज़रूरत है, चाहे उन्हें बाथरूम ले जाने के लिए हो चाहे समय पर दवाएँ देने के लिए हो, तो फिर यह मुश्किल होता है।

अगर कोई बुजुर्ग अपने बेटे या बेटी के घर में भी रह रहा हो तब भी यह संभव है कि हर वयस्क पैसा कमाने के लिए काम पर जाता हो। इसका अर्थ यह हुआ कि कम से कम आधा दिन घर में उसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं होगा! भारत में, न सिर्फ संयुक्त परिवार होते हैं बल्कि एक विस्तारित परिवार भी होता है, जिसमें चाचा-चाचियाँ, चचेरे-ममेरे भाई-बहन और न जाने कितने लोग उपलब्ध होते हैं! महिलाएँ अक्सर काम पर नहीं जातीं क्योंकि अक्सर उनका कोई न कोई छोटा बच्चा होता है और उसकी देखभाल के लिए उसे घर पर रहना ही होता है। इस तरह हर वक़्त कोई न कोई घर पर होता ही है। पश्चिम में ऐसा नहीं होता! हर परिवार इतना सक्षम नहीं होता कि सिर्फ एक सदस्य की कमाई से घर का खर्च चल सके-वहाँ दोनों अभिभावकों को नौकरी करना ज़रूरी होता है।

जर्मनी में 24 घंटे घर पर सहायता के लिए लोग उपलब्ध होते हैं लेकिन फिर उस नर्स या केयरटेकर के लिए एक अलग कमरे की ज़रूरत होगी, जिसका अर्थ होगा, अतिरिक्त खर्च! इसके अलावा मानवीय श्रम वहाँ बहुत महंगा भी है और इसके बहुत से नियम और कायदे हैं, जिनका पालन करना हर हाल में ज़रूरी होता है। सामाजिक सुरक्षा नियम, हालाँकि यह अच्छी बात है कि यहाँ अस्तित्व में हैं, हर तरह के खर्च वहन नहीं करते। सरकार कर चुकाने वालों के पैसों से यह सहायता प्रदान करती है लेकिन बच्चों से भी कहती है कि वे भी कुछ हिस्सा अदा करें। नतीजतन यह पाया गया है कि एक स्थान पर बहुत से लोगों की देखभाल कम खर्चीली सिद्ध होती है, बनिस्बत इसके कि शहर के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले हर एक वृद्ध की देखभाल की अलग-अलग व्यवस्था की जाए!

मैं जो कहना चाह रहा हूँ वह यह है कि किसी अंतिम निर्णय पर आने से पहले विचार करें। ऐसा करना भिन्न सांस्कृतिक परम्पराओं के चलते आपके यहाँ संभव है। मैं अभी भी यही कहता हूँ कि संयुक्त परिवार बेहतर हैं, वे आपसी स्नेह से परिपूर्ण हैं, रहने के अधिक अच्छे स्थान हैं। मुझे लगता है कि मैं पूरी कोशिश करूँगा कि मेरे किसी भी प्रियकर को वृद्धों के लिए स्थापित वृद्धाश्रमों में न रहना पड़े। लेकिन जो ऐसा नहीं कर पा रहे हैं, उन्हें मैं अपनी नज़र से नहीं आँकना चाहता। उनके आसपास की व्यवस्था ने उन्हें और उनके माता-पिता को ऐसे कदम उठाने के लिए तैयार कर रखा है। मैं सिर्फ यह आशा कर सकता हूँ कि एक न एक दिन समाज में परिवर्तन आएगा और उन्हें अधिक से अधिक प्यार मिल पाएगा, ज़्यादा से ज़्यादा समय वे परिवार के स्नेहिल वातावरण में रह पाएंगे!

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