प्रियजन के विछोह को शब्दों में वर्णन करना संभव नहीं! 5 अक्टूबर 2014

मेरा जीवन

पिछले रविवार को मैंने आपको बताया था कि 18 सितंबर 2006 के दिन मेरी बहन की मृत्यु कैसे हुई। उसकी मृत्यु के बाद के दिन एक धुंधलके की तरह गुज़र गए। मुझे याद नहीं है कि उस समय ठीक-ठीक क्या हुआ था लेकिन उस समय हम पर छाए हुए गहरे शोक की याद आज भी ताज़ा है।

उसकी मृत्यु के बाद हम लोग घर पर क्या कर रहे थे? वास्तव में हमारे पास करने के लिए कुछ भी नहीं था। सिर्फ हम लोग एक-दूसरे को कसकर थामे हुए थे, अपने विषाद में एक-दूसरे का ढाढ़स बंधा रहे थे। नानी जी ने अपनी नातिन को खोया था। बब्बाजी और अम्माजी ने अपनी एकमात्र बेटी खो दी थी और हम तीन भाइयों ने अपनी बहन को खोया था।

शुरू में, काफी समय तक मैं बुरी तरह सदमे में रहा। मैं रोया नहीं था। मैंने अपनी रोती माँ को अपनी बाँहों में भरा हुआ था, मैं इतना शोकाकुल था कि आज तक वैसा दुखी कभी नहीं हुआ मगर मैं रो नहीं पा रहा था। हम परा के बारे में बातें करते रहे और सोचते रहे कि उसके बिना हमारा भविष्य कैसा होगा। वह बेहद मटमैला, विषादग्रस्त और एकाकी दिखाई दे रहा था। सब रोए-मगर मैं रो ही नहीं पा रहा था।

मुझे लगता है कि सदमे ने मेरे मस्तिष्क को बुरी तरह झँझोड़ दिया है। मुझे अधिक नींद की ज़रूरत कभी नहीं पड़ी लेकिन उन दिनों मैं बुरी तरह सोता था। ऐसी ही किसी रात के बाद सबेरे अपने कमरे से लगभग उनींदा सा मैं बाहर आया तो मेरे मन में एक हास्यास्पद विचार कौंधा, जो पल भर के लिए मुझे हर बात का समाधान नज़र आ रहा था। जब मुझे यशेंदु दिखाई पड़ा तो मैंने उससे कहा कि तुरंत कंप्यूटर चालू करे: हम गूगल पर उसे ढूँढ़ते हैं! हाँ, वह कहीं नहीं गई है, हम उसे पा लेंगे! मैं उस कड़ुवी सच्चाई को हजम नहीं कर पा रहा था, यथार्थ का सामना करना मेरे लिए असंभव हो रहा था।

परा की मृत्यु के बाद कुछ दिनों तक बहुत से लोग घर आते रहे। यहाँ तक कि दुनिया के कोने-कोने से बहुत से दोस्तों ने अपनी संवेदना व्यक्त करते हुए ईमेल भेजे, मोबाइल संदेश भेजे या फोन किया। हर ईमेल के बाद, उनके हर शब्द के बाद, जिसमें वे उसके साथ बिताए समय का ज़िक्र करते या सिर्फ मानसिक संवेदना प्रेषित करते, मैं महसूस करता कि सिर्फ मैंने और मेरे परिवार ने ही उसे नहीं खोया है बल्कि और भी बहुत सारे लोगों ने उसे खो दिया है। वह अभी बहुत छोटी थी, दुनिया में उसे बहुत कुछ देखना बाकी था और उसके साथ दुनिया में न जाने कितने लोगों के दिलों को स्पंदित होना था!

यहाँ तक कि एक करीबी मित्र, जिसके यहाँ परा को जर्मनी पहुँचने के बाद रुकना था, फ्लाइट पकड़कर आश्रम आ गई। सिर्फ हमारे साथ रहने के लिए, परा के लिए हमारे शोक में शामिल होने के लिए, वह इतनी दूर चली आई।

लेकिन आखिर वह समय भी आया जब मैं अपने दुख को निसृत कर पाया, उसे आंसुओं में बहा सकता था। और जब मैंने रोना शुरू किया तो तब तक रोता रहा जब तक सारे आँसू समाप्त नहीं हो गए। यह एक तरह की मुक्ति थी, एक भुलावा, जैसे मैंने अपने दुख को आंसुओं के जरिये बहा दिया हो-लेकिन शोक में ज़रा सी भी कमी नहीं आई। जो खाली स्थान वह छोड़कर गई है, उसे कभी भी किसी दूसरी चीज़ से भरा नहीं जा सकता।

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