भारत में विवाहित पश्चिमी महिलाओं: क्या आप ‘रजोधर्म के भारतीय नियमों’ का पालन करती हैं? 30 जून 2015

कल मैंने बताया था कि भारतीय पुरुष से विवाहित एक पश्चिमी महिला जब भारत में पुरुष के संयुक्त परिवार के साथ रहने लगती है तो उसे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। संभवतः उनमें से एक समस्या यह होगी कि अपनी सास की बातों और आदेशों का वह किस सीमा तक पालन करे या उसे अपने व्यक्तिगत मामलों में किस हद तक दखलंदाज़ी करने के इजाज़त दे। आज मैं एक दूसरी समस्या के बारे में लिखना चाहता हूँ: किस हद तक आप, पश्चिम से आई एक महिला होने के नाते, अपने संयुक्त परिवार की धार्मिक, दक़ियानूसी और अंधविश्वास से परिपूर्ण गतिविधियों को स्वीकार करे। क्या आप उनमें हिस्सा लेंगी?

फिर, हमेशा की तरह, इस क्षेत्र में भी जो समस्याएँ पेश आएँगी, वे सबकी अलग-अलग व्यक्तिगत परिस्थितियों पर निर्भर होंगी। आपका लालन-पालन कहाँ हुआ, आपके आसपास का माहौल कितना धार्मिक था, आपकी आस्थाएँ क्या हैं और किस हद तक आप किसी और को प्रसन्न करने के लिए दूसरे धर्म की परंपराओं का पालन करने के लिए तैयार हैं? इसके साथ ही यह आपके जीवन साथी और उसकी आस्था और उसके परिवार पर निर्भर करता है। साथ ही यह देखना होगा कि परंपराओं और रीति-रिवाजों का परिवार पर असर कितना तीव्र है।

एक बात निश्चित है और आपको सदा याद रखनी चाहिए: आपको ऐसी कोई बात नहीं करनी चाहिए जिसे आप करना नहीं चाहतीं। कोई भी आप पर ऐसे किसी धार्मिक कार्य को करने के लिए दबाव नहीं डाल सकता जो आपके अंदर गहराई से जड़ें जमाकर बैठी बातों के विपरीत है। इस बात को अच्छी तरह जान लें और अगर आपका जीवन साथी आपको उस ओर ठेलने की कोशिश कर रहा है, जिधर आप नहीं जाना चाहतीं तो इस पर विचार-मंथन करने का समय आ गया है कि आपके बीच वास्तव में प्यार है भी या नहीं और क्या इस संबंध के लिए इतना संघर्ष करना उचित है।

लेकिन इसके बावजूद मेरा विश्वास है कि निश्चित ही ऐसी स्थितियों से निपटने के और भी तरीके हो सकते हैं क्योंकि आपका आपसी प्रेम ही आपको एक-दूसरे से जोड़े हुए है और एक को दूसरे का सम्मान करने के काबिल बनाता है।

दैनिक जीवन में उठने वाले प्रश्न इस प्रकार हो सकते हैं: खाना तैयार है, आपने खाना बनाने में मदद की है और आपकी सास आपके हाथ में खाने की थाली देती है, पूजा घर की ओर इशारा करते हुए कहती है- या अगर आप उनकी भाषा नहीं समझते तो स्वयं कर के दिखाती है कि कैसे सर्वप्रथम ईश्वर को भोग चढ़ना होगा तब आप खुद खा पाएँगी। क्या आप न सिर्फ इस नियम का पालन करेंगी बल्कि स्वयं भोग भी चढ़ाएँगी?

फिर कुछ प्रश्न माह में सिर्फ एक बार उपस्थित होंगे: भारत में मासिक धर्म के समय महिलाओं का रसोई में प्रवेश वर्जित होता है। आज भी बहुत सी महिलाएँ इन दिनों में परिवार के साथ भोजन करने नहीं बैठतीं। उन्हें दैनिक जीवन के बहुत से और भी काम करने की मनाही होती है, जैसे कपड़े या बरतन धोना। कुछ परिवारों में इन कुछ दिनों में महिलाएँ अलग कमरे में सोती हैं! उन्हें इस अवधि में अपवित्र समझा जाता है। आपके पति का परिवार इन परंपराओं को लेकर कितना सख्त है? मेरी नज़र में तो यह पूरी तरह मूर्खता पूर्ण है और किसी महिला को ऐसी बात के लिए, जो स्पष्ट ही जैविक रचना से संबंधित है और कुदरती प्रक्रिया है, अपमानित करना ठीक नहीं है! अगर आप भी ऐसा ही महसूस करती हैं तो मैं सलाह दूंगा कि अपने पति को समझाएँ कि यह एक नैसर्गिक चक्र है, जिसके कारण एक दिन बेटे और बेटियाँ पैदा होती हैं- इसमें गंदगी या अपवित्रता जैसी कोई बात नहीं है! अंत में यह आपका चुनाव होगा कि आप किस सीमा तक इन अंधविश्वासों को स्वीकार या अस्वीकार करती हैं- लेकिन अपने आपसे यह प्रश्न पूछकर पहले से अपनी तैयारी करना हर हाल में बेहतर सिद्ध होगा।

तो शायद त्योहारों पर उनके पारिवारिक समारोहों में शामिल होने में आपको कोई एतराज़ नहीं होगा और जब कि आप निश्चय ही बहुत सी छोटी-मोटी बातों के साथ समझौता कर लेंगी, कुछ और पहलू आपको परेशान करते रहेंगे। मैं सिर्फ आपसे यह निवेदन करना चाहता हूँ कि किसी भी समस्या को अपने मन में न रखें। आपको खुलकर बात करनी होगी और आपके पति को भी यह सब सुनने की सलाहियत होनी चाहिए और उसका हल ढूँढ़ने में आपकी मदद करनी चाहिए। मुझे विश्वास है कि वह इसका कोई न कोई हल निकालने में सफल हो पाएगा, जो आप दोनों के लिए सुविधाजनक हो- भले ही आपके आसपास के लोगों का इस विषय में कोई भी मत क्यों न हो!

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