जब लड़ाई-झगड़े संयुक्त परिवार तोड़ देते हैं तथा जीवन और भी दुश्वार हो जाता है – हमारे स्कूल के बच्चे – 1 मई 2015

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

आज मैं आपका परिचय एक लड़के से करवाना चाहता हूँ, जो हमारे आश्रम के पीछे वाली गली में, कुछ घर छोड़कर रहता है। उसका नाम मोहित है और वास्तव में वह हमारे स्कूल में पढ़ रही एक लड़की, अनुराधा का चचेरा भाई है, जिसका परिचय मैंने पिछले साल करवाया था

मोहित 8 साल का है और परिवार के चार बच्चों में सबसे छोटा है। उसकी सबसे बड़ी बहन 14 साल की है, उसके बाद एक भाई, 12 साल का और दूसरी बहन 10 साल की है। वे सब अपने माता-पिता और अपनी दादी के साथ एक ही घर में रहते हैं। मकान दादी की मिल्कियत है।

मोहित का पिता संगतराश या राजगीर है, यानी पत्थर का काम करता है। उसे रोज़ ही नया काम ढूँढ़ना होता है और तब जाकर वह प्रतिदिन 5 डॉलर यानी लगभग 300 रुपए कमा पाता है। लेकिन उसकी पत्नी बताती है कि माह में मुश्किल से 10 दिन ही उसे काम मिल पाता है अर्थात उनके पास अपने चार बच्चों को खिलाने-पिलाने, उनके कपड़े-लत्तों और पढ़ाई-लिखाई के लिए बहुत कम पैसे होते हैं!

जब आप एक सँकरे दरवाजे से उनके घर में प्रवेश करते हैं तो बाईं ओर आपको एक छोटा सा छप्पर दिखाई देता है, जिसमें एक गाय बंधी है। कुछ कदम आगे बढ़ने पर फिर बाईं ओर ही आपको एक संडास दिखाई देता है, और उसके बाद छत पर एक तरह का आँगन और सामने नीचे ले जाती हुई खड़ी सीढ़ियाँ हैं, जिनसे कुछ नीचे उतरने पर आप एक समतल फर्श तक पहुँचते हैं, जहाँ कई कमरे बने हुए हैं। आप समझ सकते हैं कि जब इस घर का निर्माण हुआ होगा, तब सामने वाली सड़क घर से काफी नीचे रही होगी। सड़क बनती रही और घर की सतह से काफी ऊपर आ गई और अब उन्हें इस घर में किसी तरह गुज़ारा करना पड़ रहा है।

अंदर प्रवेश करते हुए आप नोटिस करेंगे कि दाहिनी ओर वाली दीवार पहले वहाँ नहीं रही होगी। वह घर के कुछ हिस्से को दो भागों में बाँट रही है-और नीचे देखने पर हम तुरंत समझ जाते हैं कि मामला क्या है: एक संयुक्त परिवार साथ नहीं रह सका और अब बीचोंबीच दीवार खड़ी करके उसने एक घर को दो घरों में विभक्त कर दिया है। यह घर मोहित की दादी का है, जो मोहित के घर की तरफ स्थित दो कमरों में से एक कमरे में रहती है। उनके पास रसोई भी है मगर उसमें अधिक जगह नहीं है। यह पूछने पर कि झगड़े का कारण क्या था, जिसके चलते बीचोंबीच दीवार खड़ी करनी पड़ी, हमें कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिल पाता। ‘वे हर वक़्त हमसे लड़ते रहते थे…’

स्वाभाविक ही इस तरह के झगड़े परिवार के लिए और भी मुश्किले पैदा करते हैं, यहाँ तक कि घर का खर्च चलाना कठिन होता है। मुश्किल घड़ी में उन्हें दूसरे कमाने वाले का आर्थिक सहयोग हासिल नहीं हो पाता-और आवश्यकता पड़ने पर नैतिक और भावनात्मक समर्थन भी नहीं!

यह बड़े दुख की बात है कि संयुक्त परिवार टूट रहे हैं और इतनी बुरी तरह से, कि एक गरीब परिवार, जिसके पास पहले ही इतनी कम जगह है, बीच में दीवार खड़ी करके दो छोटे-छोटे दड़बों जैसे घर बनाकर अलग-अलग रहने लगते हैं! उनकी माली हालत ऐसी नहीं है कि कहीं और जाकर रह सकें!

हमारे स्कूल के बच्चे ऐसे ही घरों से आते हैं! मोहित हमारे स्कूल में पिछले दो साल से पढ़ रहा है। इसी साल उसने अपर के जी पास किया है और इसी जुलाई से पहली कक्षा में पढ़ना शुरू करेगा।

आप उस जैसे बच्चों की मदद कर सकते हैं। एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके!