जब मुझे अहसास हुआ कि मेजबान की अनुमति लिए बगैर अपने मित्रों को आमंत्रित करना ठीक नहीं -19 जनवरी 2014

2006 की शुरुआत में मैं आस्ट्रेलिया में एक महिला और उसके परिवार के साथ रह रहा था। उसने मुझे आमंत्रित किया था और उस इलाके में वही मेरे कार्यक्रम आयोजित किया करती थी। मैं उस शहर के आसपास के इलाकों में प्रवचन किया करता था और कार्यशालाएँ चलाता था। इसके अलावा व्यक्तिगत सलाह-सत्र उसके घर पर ही हुआ करते थे। उसके यहाँ रहते हुए मुझे एक महत्वपूर्ण सीख मिली: अगर अपने किसी मित्र को घर बुलाना हो तो पहले अपने मेजबान से अवश्य पूछ लें!

हमेशा की तरह यहाँ भी मैं शाम का खाना खुद पकाता था और मेजबान का सारा परिवार मेरे साथ वही भोजन करता था। उन्हें मेरे द्वारा पकाया भारतीय खाना बहुत भाता था, जो कि हमेशा रात का खाना ही होता था, क्योंकि दिन भर में मैं लगातार कई व्यक्तिगत सत्र लेता रहता था और अपने काम में व्यस्त ही रहा करता था।

ऐसे ही एक सत्र के दौरान एक महिला मेरे, मेरे परिवार के, मेरे काम के और मेरे चैरिटी कार्यों के विषय में विस्तार से जानने की इच्छुक हो गई। क्योंकि एक सत्र में हर एक के लिए एक नियत समय निर्धारित होता है इसलिए उस समय मैं उससे लंबी बात करने में असमर्थ था लेकिन उसकी रुचि को देखकर मैंने उससे कहा, "आज शाम का भोजन मेरे साथ घर पर कीजिए, वहीं बातें होंगी।" मेरे इस प्रस्ताव पर वह बड़ी खुश हुई-क्योंकि मेरे साथ वह बढ़िया भारतीय खाने का स्वाद ले सकती थी, अच्छी चर्चा कर सकती थी और शायद एक नया दिलचस्प मित्र भी उसे मिल सकता था। उसने मेरा निमंत्रण स्वीकार किया और चल दी।

जब मेरे बचे हुए सत्र समाप्त हो गए, मैं अपनी मेजबान और आयोजक के पास आया और उसे बताया कि मैंने एक महिला को खाने पर बुलाया है और यह भी कि उसने आने की सम्मति भी दे दी है। उसकी प्रतिक्रिया ने मुझे विचलित कर दिया।

"आपने किसी को खाने पर बुला लिया, मेरे घर में, बिना मुझसे पूछे? और अगर मैं आज किसी से मिलना न चाहूँ तो? या मेरा कोई और प्लान हो तो?"

उसकी बात सुनकर मुझे तुरंत अपनी गलती का एहसास हुआ। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि यह कोई समस्या भी खड़ी कर सकता है। जर्मनी में भी मैं ऐसा कर चुका था लेकिन अक्सर मैं वहाँ स्वतंत्र रूप से रहा करता था और शायद वहाँ मैंने किसी दूसरे के घर पर अपने किस मित्र को निमंत्रित नहीं किया था। वहाँ भी मैं अपना खाना खुद बनाता था मगर यहाँ खाने के अतिरिक्त, घर भी उसका था, टेबल उसकी थी और परिवार भी उसका था। यहाँ शायद मैं कुछ ज़्यादा ही अबोध साबित हो रहा था।

अगले ही पल अफसोस प्रकट करते हुए मैंने उससे माफी मांगी और कहा कि मैं अभी फोन करके उस महिला से, किसी दूसरे प्लान का बहाना बनाकर, न आने के लिए कह देता हूँ। तब उसे लगा कि उसका मेरे प्रति व्यवहार कुछ ज़्यादा ही कटु हो गया था मगर इसके बावजूद हमने उस महिला के साथ रात्रि-भोज को स्थगित ही कर दिया।

कुछ समय बाद जब हम इस प्रकरण पर अलग-अलग विचार कर चुके तब हमारी पुनः बात हुई और उसने मुझसे पूछा, "क्या आपकी नज़र में यह उचित है कि आप किसी दूसरे के यहाँ मेहमान के रूप में रह रहे हों और वहाँ आप अपने किसी ऐसे मित्र को आमंत्रित कर लें, जिसे आपका मेजबान जानता तक न हो?"

मैंने उसे समझाया कि मैं उसकी बात अच्छी तरह समझ रहा हूँ लेकिन मैं ईमानदारी के साथ कह रहा हूँ कि उसे बुलाते वक़्त मेरे मन में इस बात का खयाल ही नहीं आया था! भारत में मेहमान-नवाज़ी का तरीका कुछ दूसरा है। अगर मेरे घर में कोई मेहमान रह रहा है और अगर मुझे कहीं से न्योता मिलता है तो मैं वहाँ अपने मेहमान को निस्संकोच ले जा सकता हूँ। उसी तरह अगर आप मेरे यहाँ रह रहे हों तो आप भी अपने किसी मित्र को बिना किसी परेशानी के हमारे यहाँ खाना खाने के लिए बुला सकते हैं, पहले से आप मुझे इसकी जानकारी दें या न दें, कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन अब मैं इस सांस्कृतिक भिन्नता को अच्छी तरह समझ चुका हूँ।

बस इतना ही। सांस्कृतिक भिन्नता। और भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण सीख!

निमंत्रण की औपचारिकता- और अगर वह औपचारिकता न प्रतीत हो तो!-31 जुलाई 2013

भारतीय आदतों के बारे में लिखते हुए मुझे उनकी एक और आदत का ध्यान आ रहा है: लोगों को अपने घर बुलाने की आदत।

जब भी आप अपने किसी जानकार से मिलते हैं, किसी विवाह या किसी और समारोह में, या यूं ही सड़क पर आपकी मुलाक़ात होने पर आपके बीच होने वाले वार्तालाप का एक खास स्वरूप होता है। शुरुआत होती है अभिवादन के साथ, आप एक दूसरे से पूछते है, आप कैसे हैं और इस पर एक दूसरे को संक्षिप्त में अपनी परेशानियों या खुशियों के बारे में बताते हैं। फिर आप अपने मित्रों और काम के बारे में एक-दो बातें करते हैं या फिर उस समारोह के बारे में जहां आप शामिल होने आए हैं। फिर आपके पास कहने के लिए कुछ नहीं रह जाता और आप एक दूसरे से विदा लेना चाहते हैं और तभी आप सामने वाले को निमंत्रित करते हैं, कभी घर आइये! और इससे बेहतर जवाब आपको नहीं मिल सकता: बिल्कुल, बिल्कुल। मैं ज़रूर आऊँगा। घर आकर मिलता हूँ जल्दी ही!

मज़ेदार बात यह कि दोनों ही यह जानते हैं कि न तो निमंत्रित व्यक्ति आने वाला है, न ही निमंत्रण देने वाले ने उसे वास्तव में बुलाया ही है। निमंत्रित करने वाला, बुलाते समय से ही यह जानता था कि वास्तव में उसका अर्थ सामने वाले को बुलाना नहीं है और निमंत्रित व्यक्ति भी शुरू से यह जानता है कि न तो सामने वाले ने बुलाया है न ही वह जाने वाला है, मगर दोनों ही इस आमंत्रण का अर्थ जानते हैं और उसके जवाब का भी।

लेकिन यह भी संभव है कि कोई व्यक्ति इस बारे में अधिक न जानता हो। तब क्या हो सकता है उसका किस्सा मैं आगे बयान कर रहा हूँ। मैं एक व्यक्ति को जानता हूँ जो वही काम कर रहा था जो मैं भी बहुत साल पहले किया करता था- यानी वह भी एक गुरु था। उसका एक परिचित था, उसी के शहर का बाशिंदा और जो स्थायी रूप से अमरीका में बस गया था। एक बार यह मित्र भारत आया और उससे मिला। बिदा लेते समय उसने भी यही वाक्य दोहराया: आप अमरीका आइये! आप हमारे यहाँ आएँ तो मुझे बड़ा अच्छा लगेगा!

फिर जब कुछ माह बाद उस गुरु को लगा कि अमरीका जाना चाहिए तो वह सीधे अमरीकी दूतावास पहुँच गया और लंबी कतार में खड़ा हो गया। कई घंटों के इंतज़ार के बाद उसका नंबर आया और उससे कहा गया कि अमरीका जाने के लिए वहाँ के किसी व्यक्ति के औपचारिक आमंत्रण पत्र की आवश्यकता होगी, जो न सिर्फ उसे आमंत्रित करे बल्कि उसकी आर्थिक स्थिति और कई दूसरी बातों की जमानत भी दे।

उस गुरु को लगा कि इसमें कोई समस्या नहीं आनी चाहिए, उसका एक मित्र अमरीका में रहता है और उसने उसे बुलाया भी था। तो उसने उस भारतीय को अमरीका में फोन किया और बताया कि वह अब अमरीका आना चाहता है और अमरीकन वीसा ऑफिस आपकी तरफ से मेरे लिए औपचारिक निमंत्रण पत्र चाहता है, जिसे आप तुरंत भिजवा दें! वह अमरीकी मित्र आश्चर्य में पड़ गया और अंततः उसे साफ-साफ कहना पड़ा: मैंने आपको यूंही अमरीका आने के लिए कह दिया था! मेरा मतलब आपको निमंत्रित करने का नहीं था। यह तो महज औपचारिकता थी!!

जब मैं ऐसी औपचारिकताओं की कहानियाँ सुनता हूँ तो मुझे हंसी आए बगैर नहीं रहती! आप देख सकते हैं कि इन औपचारिकताओं का मूल कहाँ हैं: मेहमानों का घर आना भारतीय लोग पसंद करते हैं और खुद किसी के मेहमान बनना भी! अतिथि-सत्कार उनके रक्त में होता है इसलिए वे उन्हें भी खाना खाने या चाय पीने के लिए घर बुला लेते हैं जिन्हें वे ठीक तरह से जानते तक नहीं। कुछ प्रकरणों में यह महज औपचारिकता होती है लेकिन कई मामलों में यह औपचारिकता गहरे पारिवारिक सम्बन्धों की भूमिका भी बन जाती है।

कैसे संस्कृतियों का भेद गरीबी की परिभाषा बदल देता है – 14 जून 2013

पिछले दिनों मैंने यूनिसेफ के अनुसार पश्चिमी बच्चों की न्यूनतम जरूरतों और उनके साथ भारतीय बच्चों की जरूरतों की तुलना की थी। कुछ बिन्दु रह गए थे जिनका विवेचन नीचे प्रस्तुत है।

12. दो जोड़ी उनके पैरों के नाप के जूते (हर मौसम में पहनने योग्य जूतों सहित)

यह बहुत महत्वपूर्ण बात है और मुझे लगता है कि अभिभावकों पर इसका इतना बोझ होता है कि इसे कम आँकने की भूल नहीं की जानी चाहिए। बच्चों के पैर जल्दी-जल्दी बढ़ते हैं और उन्हें नियमित रूप से बीच-बीच में नए जूतों की आवश्यकता पड़ती रहती है जिससे वे ठीक तरह से चल सकें, दौड़ सकें और कूद-फांद कर सकें। सौभाग्य से भारत के इस भाग में, जहां हम रहते हैं, मौसम ऐसा होता है कि आप बिना जूतों के ही सारा साल दौड़-भाग कर सकते हैं। लेकिन सड़कों के बन जाने और आबादी के बढ़ जाने के कारण अब न तो यह इतना आसान रह गया है न ही स्वास्थ्य के लिए ही ठीक है। हम अपने स्कूल के बच्चों को काले स्कूल के जूते और स्कूल यूनिफ़ोर्म मुहैया कराते हैं और हम देखते हैं कि बच्चे उन्हीं जूतों को सारा दिन पहने रहते हैं क्योंकि उनके पास दूसरे जूते नहीं होते। गर्मी के मौसम में अवश्य वे उन्हें निकालकर रखना पसंद करते हैं। फिर रबर की हल्की और सस्ती चप्पलें होती हैं जिसका आकार इतना लचीला और मुलायम होता है कि आप बच्चों को बड़े या छोटे साइज़ की चप्पलों में घूमते देख सकते हैं। मैं तो जूतों की संख्या को एक ही रखना उचित समझता हूँ मगर भारत में अगर किसी के पास एक भी जूता नहीं है तो उसे गरीब की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।

13. कभी कभार अपने घर में दोस्तों को न्योता देने, उनके साथ खेलने और भोजन करने की सुविधा

यह एक और बिन्दु है जिसके संदर्भ में, मेरे विचार में, अधिकांश भारतीय बच्चे अमीर देशों के उन बच्चों से ज़्यादा अमीर साबित होते है जिनके बारे में यह अध्ययन किया गया है। भारत में गरीब से गरीब बच्चा भी अपने दोस्तों को घर आमंत्रित करता है। हमारे स्कूल के बच्चे जब मर्ज़ी होती है, एक-दूसरे के घर आते-जाते हैं और वहाँ नाश्ता करते हैं, खाना भी खाते हैं। यह अतिथि-सत्कार की भारतीय परंपरा के कारण भी हो सकता है जिसके अनुसार, जो भी थोड़ा-बहुत आपके पास है, दूसरों के साथ खुशी-खुशी साझा करना अच्छा माना जाता है। दूसरा कारण यह हो सकता है कि पश्चिमी गरीब अभिभावक अपनी गरीबी पर भारतीय गरीबों से ज़्यादा शर्मिंदा होते हों। भारत में गरीबों की संख्या इतनी ज़्यादा है कि भारतीय गरीबों में गरीबी की उतनी कुंठा नहीं पाई जाती।

14. विशेष अवसरों पर जैसे जन्मदिन, नेम डे और अन्य धार्मिक त्योहारों पर खुशी मनाने की सुविधा

मैं ऐसे कई लोगों से मिल चुका हूँ जो यह जानकार दंग रह गए कि हमारे स्कूल के अधिकांश बच्चे यह भी नहीं जानते कि उनका जन्मदिन किस दिन पड़ता है। यह उनके अभिभावक भी नहीं जानते क्योंकि जन्मदिन को इतना महत्वपूर्ण नहीं माना जाता। इसके पीछे हमारी अपनी सांस्कृतिक परंपरा का हाथ हो सकता है या फिर यह हो सकता है कि ऐसे अवसरों पर वे कोई विशेष आयोजन कर पाने में अपने आपको असमर्थ पाते हैं।

लेकिन धार्मिक आयोजन बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। कितना भी गरीब हो, त्योहार, जैसे दीवाली आदि, ज़रूर मनाएगा। एक दिया ही जलाए, लक्ष्मीजी से अगले वर्ष कुछ बेहतर आर्थिक लाभ की प्रत्याशा करते हुए छोटी-मोटी पूजा ही कर पाए मगर दिवाली अवश्य मनाएगा।

उनके ऐसा करने को मैं अच्छा या बुरा नहीं कह रहा हूँ क्योंकि बहुत छोटे और साधारण आयोजन से लेकर विशाल और बहुत सारे, उपहार और पार्टियों से युक्त बहुत ख़र्चीले आयोजन तक इन त्योहारों पर किए जाते हैं। क्या इन आयोजनों में सिर्फ त्योहार की मौज-मस्ती ही होती है क्योंकि सारा वातावरण ही त्योहारमय नज़र आता है? या फिर सारा परिवार और दूसरे नाते-रिश्तेदार इकट्ठा हो जाते हैं, इसलिए यह महत्वपूर्ण है? क्या यह बिना पैसे के, बिना इतने दिखावे और तड़क-भड़क के नहीं किया जा सकता?

एक जिद्दी भारतीय मानसिकता पश्चिम में कितनी मुश्किल पैदा कर सकती है – 21 अप्रैल 2013

जैसा कि मैं आपको पहले बता चुका हूँ, 2005 में मैं एक बाँसुरी वादक के साथ यात्रा कर रहा था, जिसने मेरे कार्यक्रमों को एक सांगीतिक स्पर्श दे दिया था, जो हमेशा सहभागियों को बहुत पसंद आता था। एक जीवंत संगीतकार को साथ रखना बहुत अच्छा विचार था क्योंकि मेरे कई कार्यक्रम होते थे और उसका बाँसुरी वादन कई बार बहुत सुंदर माहौल निर्मित कर देता था। उसके साथ कुछ वक्त बिताने के बाद मुझे पता चला कि इस व्यक्ति का चरित्र और मानसिकता ऐसी नहीं थी कि उसके साथ इस तरह की यात्राएं और इस तरह का काम किया जाए। यशेंदु ने जब अपने मेजबान के बारे में उससे बात की तो यह स्पष्ट हो गया।

अब हम तीन लोग थे और मेरे हर आयोजक के पास इतना स्थान नहीं होता था कि वह हम तीनों को एक साथ ठहरा सके इसलिए जब भी संभव होता, हम अलग-अलग रह लेते थे। इसके अलावा सदा और भी कई मित्र होते ही थे जो खुशी-खुशी एक या दो मेहमानों को अपने यहाँ एकाध हफ्ते के लिए ठहरा लेते थे। एक कस्बे में मेरे एक पुराने मित्र थे जिनके यहाँ मैं हमेशा रुका करता था। इस नए मित्र दंपति ने यशेंदु और उस बाँसुरी वादक को अपने यहाँ रुकने का न्योता दिया। इसी दंपति ने बाँसुरी वादक का वीजा निकलवाने में बड़ी मदद की थी।

जब मैं किसी के यहाँ रुकता हूँ तब आम तौर पर खाना मैं ही बनाता हूँ जिससे मुझे अपने मेजबानों के उपकार का कुछ अंश चुकाने का संतोष प्राप्त हो जाता है और मैं उन्हें एक से एक बढ़कर भारतीय खानों से अवगत भी कराता रहता हूँ। यशेंदु भी यही करते हैं और यह एक तरह का नियम सा है कि जो खाना नहीं बनाते वे खाने के बाद बर्तन साफ करते हैं। हमारे पूरे प्रवास के दौरान और यहाँ भी हमारे बाँसुरी वादक साथी कभी भी मदद करने में कोई रुचि नहीं लेते थे- न खाना बनाते थे और न बर्तन साफ करते थे। खैर, भारत में तो कई लोग बर्तन साफ करने के काम को नीचा काम मानते ही हैं। जब हमने कहा कि यहाँ यह एक सामान्य बात है कि मेहमान को भी मेजबान की किसी न किसी तरह मदद करनी चाहिए और अगर आप खाना बनाने में कोई मदद नहीं कर सकते तो बर्तन साफ करने में ही कभी-कभी हाथ बंटा दिया कीजिये, तो उन्होंने तुनककर कहा, ‘मैं एक ऊंची जाति का व्यक्ति हूँ मैं किसी के झूठे बर्तन साफ नहीं कर सकता!’ यशेंदु ने नम्रता के साथ उन्हें समझाया कि ‘भाई ये भारत नहीं है, यहाँ यह गलत सोच नहीं चलेगा! आप जर्मनी में हैं, यहाँ हर कोई बराबर है!’ उन्होंने कुछ देर सोचा और सिर्फ अपने झूठे बर्तन साफ करना शुरू कर दिया, लेकिन बस इतना ही।

खैर, यह एक छोटी सी बात थी जिस पर हम थोड़ा विचलित हो गए थे मगर उनकी इस मानसिकता के कारण वास्तविक समस्या तब पेश आई जब वे जर्मनी छोडकर वापस लौटने लगे। उन्होंने यशेंदु को अपनी ट्रेन का समय बताया और कहा, ‘तो उन्हें बता दीजिएगा कि मेरी ट्रेन 10 बजे है, वे मुझे ट्रेन पर छोड़ दें और उसके बाद…।’ यशेंदु ने बीच में टोकते हुए कहा, ‘नहीं, रुकिए! वे आपको छोडने नहीं जा पाएंगे क्योंकि वह उनके ऑफिस का वक़्त होता है। आप टॅक्सी कर लीजियेगा।’ यह सुनना था कि हमारे बाँसुरी वादक बिफर उठे। बोले, ‘ये क्या बात हुई? वे मुझे छोडने भी नहीं आएंगे? ये कैसे मेजबान हैं? वाकई ये अपने मेहमानों के साथ बड़ा बुरा व्यवहार करते हैं! आपको उनके घर में बर्तन साफ करना पड़ते हैं और वे आपको खुद अपना बोरिया बिस्तर समेटकर ट्रेन पकड़ने की भाग-दौड़ करनी पड़ती है। एक बार वे मेरे यहाँ आएँ, मैं बताता हूँ कि मेहमान नवाज़ी किसे कहते हैं!’ वे और भी बहुत कुछ कहना चाहते थे मगर यशेंदु ने फिर उन्हें रोक दिया, इस बार कुछ झल्लाते हुए और उनकी अहसान फरामोशी पर थोड़ा हैरान होकर गुस्से के साथ बोले, ‘थोड़ा ज़मीन पर आइये, महाराज! ये लोग आपके लिए इतना कुछ कर रहे हैं और आप संतुष्ट नहीं हैं! आपको उन्होंने बुलाया तब आप जर्मनी आ सके हैं! उन्होंने आपको रहने के लिए घर दे दिया, आपको खाना खिलाते हैं, वे आपके मित्र हैं और आपके सारे कार्यक्रमों में भी वे आए।’

स्वाभाविक ही उनकी बातें कुछ और आगे तक चलीं जिन्हें यहाँ लिखना समय का अपव्यय होगा। लेकिन आप समझ ही गए होंगे कि हमारे संगीतज्ञ महोदय किस तरह की मानसिकता का इज़हार कर रहे थे! यह अविश्वसनीय था और जब मेरे भाई ने मुझे इस विषय में बताया तो मैं समझ गया कि मेरे लिए अब इस व्यक्ति को अपने साथ ले जाना संभव नहीं होगा! दुर्भाग्य से मेरी किस्मत में ऐसे और भी कई भारतीयों का साथ लिखा था जिनके अकृतज्ञ रवैये के कारण मेरी यात्राएं कई बार शर्मिंदगी से भर गई हैं। मुझे लगता है कि यह बचपन में उनको मिले संस्कारों का असर है जिसने उनके मन में भर दिया है कि जीवन में वे बहुत कुछ मुफ्त पाने के हकदार हैं और लोग उन्हें लाभ पहुंचाकर कोई अहसान नहीं करते।

मुझे खुशी है कि हमारे मेजबान मित्र इस घटना को कभी भी जान नहीं पाए और वे हमेशा समझते रहेंगे कि मैं एक अच्छे मित्र की तरह उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रदर्शित करता रहूँगा।

भारत के बाहर भारतीय आतिथ्य सत्कार – 22 जनवरी 2009

आज शाम को हमें एक भारतीय ने अपने छोटे से रेस्तरां में खाने पर आमंत्रित किया। पिछली बार जब मैं लकजेमबर्ग में था, वह और उसकी पत्नी मेरे पास उपचार के लिए आए थे। वह लंदन में पैदा हुआ था और पला-बढ़ा था और उसकी मुलाकात अपनी पत्नी से, जो पुर्तगाली थी, यहाँ लकजेमबर्ग में हुई थी। दस साल से वे लकजेमबर्ग में ही रह रहे थे। उन्होंने मेरा खाना मेरे नियमबद्ध आहार को ध्यान में रखते हुए बड़े प्रेम से बनाया था। रोजर और मैडी को भी बुलाया गया था इसलिए हम सब साथ में उनके यहाँ पहुंचे। हमारा मेजबान हम सबको मेहमान के रूप में पाकर बड़ा खुश था।

उसके यहाँ शानदार भोजन का मज़ा ले लेने के बाद मैंने उन्हें एक संस्मरण सुनाया जो मेरे साथ पेरिस में घटित हुआ था। मैं अपने एक मित्र के साथ सड़क पर चला जा रहा था और हम दोनों बहुत भूखे थे। हम लोग किसी अच्छे रेस्तरां की तलाश कर रहे थे और संयोग से हमें एक भारतीय रेस्तरां मिल गया। मैं बड़ा खुश हुआ और हम भीतर आ गए। रेस्तरां के मालिक ने मुझे देखा और बहुत सम्मान के साथ हमारा अभिवादन किया। मैंने सीधे पूछा कि क्या अपनी खास ज़रूरत के अनुसार मुझे बिना प्याज़, मिर्ची और लहसुन वाला खाना मिल सकता है? उसने कहा, ‘बिल्कुल! कृपया बैठ जाएँ और बताएं कि आपको क्या चाहिए। हम आपके लिए तुरंत, ताज़ा बनाकर ले आते हैं।’

वह अपने परिवार के साथ रेस्तरां की दूसरी मंज़िल पर रहता था। वह ऊपर गया और अपनी पत्नी से मेरा खास खाना बनाने के लिए कहा और कुछ देर में ही बहुत बढ़िया भोजन तैयार हो गया। डिनर के बाद मेरे मित्र ने बिल मँगवाया। लेकिन रेस्तरां का मालिक छाती पर अपने हाथ जोड़कर हमारे सामने खड़ा हो गया और बोला, ‘मैं इस भोजन का पैसा नहीं ले सकता। स्वामी जी मेरे यहाँ पधारे यह मेरे लिए सम्मान की बात है। यह मेरा धंधा है मगर मैं आपसे सिर्फ आशीर्वाद चाहता हूँ, रुपया नहीं।’ जब उसे मेरे आश्रम का और उसमें चल रहे बच्चों के चैरिटी कार्यक्रमों का पता चला तो उसने मुझे कुछ बच्चों के लिए दान भी दिया।

आज रात मैंने उन्हें यह कहानी सुनाई और बताया कि यह एक भारतीय प्रथा है। एक मेहमान को भगवान की तरह देखा जाता है और उसका उसी तरह सम्मान किया जाता है और एक आध्यात्मिक गुरु का घर आना और उसे घर में भोजन कराना तो और भी ज़्यादा सम्मान और सौभाग्य की बात मानी जाती है। उसे खिलाकर वे आशीर्वाद और दुआओं की अपेक्षा करते हैं, व्यापार की नहीं। इस तरह का अनुभव मुझे सिर्फ पेरिस में ही नहीं, जर्मनी, इंग्लैंड और आस्ट्रेलिया में भी हो चुका है।