धर्म में विरोधाभास – पिछले जन्मों के कर्म आपके पास हैं या नहीं? – 4 फरवरी 2013

पिछले सप्ताह मैंने हिन्दू धर्म में पाई जाने वाली विवादास्पद दार्शनिक मान्यताओं के बारे में लिखा था। मैंने कर्म के दर्शन के बारे में लिखते हुए यह प्रश्न उठाया था कि लोग स्वर्ग जाने के लिए गंगा नदी में कुम्भ स्नान करते हैं या मुक्ति पाने के लिए! आज मैं कर्म के दर्शन में पाई जाने वाली एक और विवादास्पद मान्यता के बारे में लिखता हूँ जो आपको हैरान कर देगी।

मैं पहले ही समझा चुका हूँ कि हिन्दू धर्म में स्वर्ग और नर्क ऐसे स्थान हैं जहां आप या तो अपने कर्मों के ऋण की सज़ा पाते हैं या फिर अपने कर्मों की जमा-राशियों के अनुपात में पुरस्कृत होते हैं। अगर आपने अपने बुरे कर्मों का प्रायश्चित्त कर लिया है और पर्याप्त समय नर्क में बिताया है या आपके पास अतिरिक्त अच्छे कामों का खज़ाना था और अब आपने उसे स्वर्ग में पर्याप्त समय बिताकर खर्च कर दिया है तो आपको पुनः जन्म लेना होगा और आपके कर्मों की जमा-राशि होगी शून्य, जैसा एक नए जमा खाते में होता है।

लेकिन मुझे विश्वास है कि आपने ऐसी कहानियाँ भी सुनी होंगी जिसमें पिछले जीवन से सबक लेने की बात कही जाती होगी, पिछले जन्मों के कर्मों के सुधार के लिए कहा जाता होगा और इस जीवन की घटनाओं को पिछले जन्म के कर्मों के फल के रूप में भुगतने की बात की जाती होगी। यह भी एक विचार है जिसका जन्म भारत में हुआ है, हिन्दू धर्म के अंतर्गत।

एक विचार यह है कि आप इस जन्म में बुरे कर्म करते हैं तो अगले जन्म में बुरे कर्मों के फल के रूप में निचली योनि में आपका जन्म होगा, जैसे कुत्ते की योनि में। अगर आपने बहुत से अच्छे कर्म किए हैं तो आप पुरस्कार स्वरूप अगले जन्म में बेहतर जीवन प्राप्त करेंगे। धनी व्यक्तियों के लिए, जो बहुत भाग्यशाली माने जाते हैं, यह समझा जाता है कि उन्होंने पिछले जन्म में अच्छे कर्म किए होंगे जबकि जो गरीब परिवारों में जन्मे हैं या जो गंभीर स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं, खासकर जन्म से, उनके लिए समझा जाता है कि उनकी ऐसी दयनीय हालत पिछले जन्म में किए गए बुरे कर्मों का नतीजा है। निचली जातियों के लोगों के लिए आम तौर पर यह माना जाता है कि पिछले जन्म में उन्होंने अच्छे कर्म नहीं किए थे जबकि उच्च जाति के लोगों के बारे में यह माना जाता है कि उनके पास पिछले जन्म के अच्छे कर्मों का खज़ाना है।

अब इस दर्शन में, सिद्धांत में या इस सोच में दो जन्मों के बीच कोई स्वर्ग या नर्क नहीं है। जो कुछ भी होता है यहीं इसी धरती पर होता है, जीवित अवस्था में होता है। आप अपने कर्मों की गठरी अपने साथ ढोकर अगले जन्म में ले जाते हैं। जब आप ऐसे बिन्दु पर पहुँच जाते हैं जहां आप कोई अच्छे या बुरे कर्म नहीं करते, आप मुक्त हो जाते हैं। तो इस तरह आप देखते हैं कि ये दो सिद्धांत या विचार किस तरह एक-दूसरे के साथ संगति नहीं बना पाते! आप या तो यह विश्वास करें कि आप बिना किसी कर्म के, यानी शून्य कर्मराशि के साथ इस धरती पर जन्म लेते हैं या फिर पिछले जन्म के सम्पूर्ण कर्मों के साथ जन्म लेते हैं। दोनों बातें एक साथ ठीक नहीं हो सकतीं, लेकिन हिन्दू धर्म इतना लचीला है कि वह अपने मानने वालों को अपनी पसंद की किसी भी बात को सच मानने की आज़ादी देता है।

अगर आप समझते हैं कि साधु, जो सभी दुनियावी या भौतिक चीजों से अनासक्त होते हैं, बहुत धर्मपरायण होते हैं जो दूसरों की भलाई के लिए ऐसा कर रहे हैं तो आप बिल्कुल गलत समझ रहे हैं। वे दूसरों की कोई भलाई नहीं करना चाहते, वे कोई अच्छा काम नहीं करना चाहते कि उनके अच्छे कर्म जमा हों। वे सिर्फ मुक्त होना चाहते हैं, इसलिए न तो अच्छे कर्म करते हैं न ही बुरे।

इस सिद्धांत के विपरीत एक और प्रवृत्ति का जन्म हुआ, बहुत से लोगों द्वारा अपनाई गई एक जीवन पद्धति, विशेषकर यहाँ, वृंदावन में: ये लोग प्रेम और समर्पण में जीना चाहते हैं। वे अच्छे कर्म करना चाहते हैं जिससे ज़्यादा से ज़्यादा अच्छे कर्म वे जमा कर सकें और बार-बार जन्म ले सकें। वे मुक्ति नहीं चाहते, वे इस धरती पर बार-बार लौटना चाहते हैं जिससे वे ज़्यादा से ज़्यादा समय प्रेम और समर्पण की अवस्था में रह सकें।

क्या आप नहीं देख रहे हैं कि यह सब इस पर निर्भर करता है कि आप किस तरह शब्दों का हेर-फेर कर पाते हैं? क्या आप यह नहीं देख रहे हैं कि आप अपनी पसंद के अनुसार, अपनी सुविधा के अनुसार चुनाव कर सकते हैं। एक बार आप इसे समझ लें तो आप तुरंत समझ जाएंगे कि धर्म छल-कपट के सिवा कुछ नहीं है!

मेरे पिछले जीवन की कथा – राजा, फिरौन और दवा-दारू करने वाला – 3 फरवरी 2013

मैंने आपको बताया था कि गूढ और रहस्यमय बातों और पश्चिमी गुरुवाद के बारे में मैं 2005 के अपने दौरे के दरमियान जान पाया। इसी वर्ष मैं पुनर्जन्म के विचार के प्रति लोगों के मोह, जो अब भी वहाँ व्याप्त है, को देखकर बहुत विचलित हुआ था।

उस वक़्त मैं स्वयं भी पुनर्जन्म पर विश्वास करता था। उसी विश्वास के बीच मैं बड़ा हुआ था। यह उस धर्म का हिस्सा था जिसका मैं प्रचार करता था, धर्मोपदेशक था। गुरु की भूमिका छोडने का अर्थ यह नहीं था कि मैंने अपने सारे विश्वासों को तिलांजलि दे दी थी। ऐसे में मैं तब तक यह विश्वास करता था कि जीवों का मृत्यु के बाद पुनर्जन्म होता है। भारत में तो इस बात पर भरोसा करना एक बहुत सामान्य सी बात है लेकिन उसे लोग बहुत महत्व भी नहीं देते। वे न तो अपने पिछले जन्म के बारे में बहुत सोचते हैं न ही उसके काल्पनिक विचारों में खोए रहते हैं। वे यह स्वीकार करते हैं कि हो सकता है कि हमारे बहुत से जन्म हुए हों और आगे भी होने वाले हों मगर हम उनके बारे में ठीक-ठीक कुछ भी जान नहीं सकते कि उन जन्मों में क्या हुआ था।

लेकिन जब इस दर्शन ने पश्चिम में प्रवेश किया और उसने रहस्यवादी तबकों में स्थान बनाया तो बहुत से अतींद्रियदर्शी पैदा हो गए जिन्होंने इस विचार को खुशी-खुशी अपना लिया। फिर वे यह दावा करने लगे कि वे भूत और भविष्य देख सकते हैं और सोचा कि क्यों न इस बात को भी एक नए 'प्रॉडक्ट' की तरह पेश किया जाए। अपने पिछले जन्म को देखें! पिछले जन्म को सुधारें! पिछले जन्म को देखकर आज की अपनी समस्याओं से निपटने का उपाय करें! भारत में इस तरह का 'बिजनेस' करते हुए मैंने किसी को नहीं देखा लेकिन पश्चिम में बहुत से ऐसे धंधेबाज मिल जाएंगे। पिछले जीवन का विश्लेषण करके 'कस्टमर्स' को आकृष्ट करने वाली एक ऐसी ही 'बिजनेस-वूमन' को जब मैंने करीब से देखा तो वह एक सुखद अनुभव बिल्कुल नहीं था।

एक जगह मैं व्यक्तिगत सत्र और कार्यशाला ले रहा था और बहुत व्यस्त था क्योंकि बहुत से लोग मुझसे मिलने आ रहे थे। जैसा कि नियम था, आयोजनकर्ता लोगों से मिलते, स्वागत करते और अगर मैं किसी दूसरे व्यक्ति के साथ व्यस्त होता तो उन्हें बाहर बैठने के लिए कहते और स्वाभाविक ही उनके बीच कुछ बातें भी होतीं। मुझे जल्दी ही पता चल गया कि यह महिला उनसे न सिर्फ बात करती थी और उनकी समस्याओं के बारे में पूछती थी बल्कि उन्हें उनकी समस्याओं का कारण भी बताती: उनका पिछला जन्म। वह काल्पनिक किस्सों से उन्हें बहलाती और उनके पिछले जीवन के किस्सों को दिव्यदृष्टि से जान लेने का दावा करती।

मज़ेदार बात यह थी कि इन सभी कहानियों में एक पात्र मैं भी होता था। वह उन्हें ऐसी कहानियाँ सुनाती जिसमें वे प्राचीन रोम में रहा करते थे और मैं वहाँ एक धनी और दबदबेवाला व्यक्ति था जिसने उनकी दयनीय हालत पर तरस खाकर मदद की थी। वह मिस्र के फ़िरौन, इंग्लैंड के राजा-रानी और पुरोहितों और दावा-दारू करने वालों के बारे में काल्पनिक किस्से उन्हें सुनाती थी। अगर वह अपनी बातों को लेकर इतना गंभीर न होती तो उसकी इन काल्पनिक कहानियों को, जिनमें हम सब किसी न किसी तरह एक-दूसरे से जुड़े होते थे, सुनना मनोरंजक हो सकता था लेकिन मामला यह था कि लोग यह शक करने लगे कि कहीं मैं भी तो इन सब बातों पर यकीन नहीं करता!

इससे बड़ी बात यह कि वह महिला उन दूसरे आयोजकों से ईर्ष्या करती थी जिनसे मेरा करीबी संबंध था। अपनी कथाओं में वह उन आयोजकों के प्रसंग में शांति, प्रेम और भाईचारे की बात नहीं करती थी बल्कि मेरे एक आयोजक के बारे में तो उसकी कहानी काफी हिंसक भी हो गई थी। उस कहानी में हम सब अमरीका के मूल निवासियों के रूप में सामने आते थे और पिछले जन्म में एक आयोजक ने मेरी हत्या तक कर दी थी। और अब उस कर्म के समाधान के लिए उस महिला को मेरी सहायता करना आवश्यक था। मेरे लिए अपने कानों पर भरोसा करना असंभव था!

फिर उसने ऐसा ही एक काल्पनिक किस्सा मेरे एक नजदीकी मित्र को सुनाया जो उसकी इसी ईर्ष्या से उद्भूत था। मेरी उस मित्र की एक छोटी बच्ची थी जो अभी घुटनों के बल चलना सीख रही थी और उसे चलते हुए देखना बड़ा मज़ेदार होता था, वह एक पैर कुछ ज़्यादा आगे बढ़ा देती और दूसरा अपने आप ही खिंचा चला आता। यह चलना सीखने की एक स्वाभाविक प्रक्रिया थी और सभी बच्चे अपने पूरे शरीर का उपयोग करते हुए इसी तरह चलना सीखते हैं। लेकिन इस अतींद्रियदर्शी महिला ने उससे कहा कि आपकी बच्ची पिछले जन्म में विकलांग थी! कौन सी माँ होगी जो ऐसी बात सुनना पसंद करेगी? ऐसी कटु बात कहना अपने आप में बहुत ही नासमझी का काम था और मेरी मित्र स्वाभाविक ही उसकी बात सुनकर बहुत नाराज़ हुई।

इस आयोजक के साथ मेरे रिश्ते अधिक दिन नहीं चल पाए और बाद में लोगों ने अपने और मेरे पिछले जन्मों के बहुत से किस्से बताए जो उस महिला ने उन्हें सुनाए थे। अनगिनत कल्पनाएँ और फंतासियाँ इन कहानियों में होती हैं जिनसे ये लोग दूसरों को डराते और बेवकूफ बनाते हैं, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसे लोग भी बहुतायत से पाए जाते हैं जो उन पर भरोसा कर लेते हैं।