अपने शरीर से प्रेम का अर्थ यह नहीं है कि खा-खाकर मोटे हो जाएँ और यह भी नहीं कि भूखे मर जाएँ! 20 अगस्त 2015

दुनिया में, जहाँ आप क्या महसूस करते हैं के स्थान पर जो आपको क्या दिखाई दे रहा है, वही सब कुछ है, आपका रूपरंग, आपका शरीर, आपका बनाव-शृंगार अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। इसलिए आजकल शरीर को चुस्त-दुरुस्त रखने के प्रति लोग पागल हो गए हैं और बाज़ार में बहुत बड़ा फ़िटनेस-बूम आया हुआ है। बहुत से लोग अजीबोगरीब खानपान अपना रहे हैं और कड़ा व्यायाम करते हैं, जिससे उनका शरीर सुंदर और चुस्त दिखाई दे। लेकिन आध्यात्मिक रंगमंच पर लोग अपने शिष्यों को इसका विपरीत उपदेश दे रहे हैं: खुद से और अपने शरीर से प्यार करें। आज मैं इन दो विपरीत विचारसरणियों पर पर संक्षेप में लिखना चाहता हूँ, यह बताते हुए कि मैं क्या उचित समझता हूँ।

हम अपनी चर्चा इस बिंदु से शुरू करेंगे कि दरअसल आप अपने शरीर की वर्त्तमान हालत से प्रसन्न नहीं हैं मुख्यतः इसलिए कि वह सुंदरता के आज के उन मानदंडों पर खरा नहीं उतरता जिन्हें जन मीडिया द्वारा लगातार प्रचारित किया जा रहा है। आप इस स्थिति को बदलना चाहते हैं और आपके पास इसके दो संभव तरीके हैं:

पहला यह कि आप अपने शरीर का रंगरूप वैसा बनाने की कोशिश करें जैसा आप दूसरों का देखते हैं और प्रशंसा से भर उठते हैं। उसके लिए आपको अपना खानपान बदलना होगा और शारीरिक व्यायामों पर ज़ोर-शोर के साथ जुट जाना होगा।

अगर आप यह रास्ता चुनते हैं तो मैं आपको स्वस्थ रहने पर फोकस करने की सलाह दूँगा, जैसा कि मैं पहले भी कई बार दे चुका हूँ। इसका अर्थ यह है कि आप अपने खानपान में कमी बिल्कुल न करें कि आपके शरीर को नुकसान पहुँचे! इसी तरह न तो कोई दवा खाएँ न ही कथित रूप से वज़न घटाने वाले तरह-तरह के पेय इत्यादि लें। उनमें अक्सर कोई न कोई रसायन होता है, जिनके इतने बुरे दुष्परिणाम (साइड इफेक्ट्स) होते हैं कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते। व्यायमों की बात करें तो कृपा करके किसी विशेषज्ञ की सलाह लें कि आपके शरीर के लिए कौन से व्यायाम उचित हैं और उन्हें किस तरह करना है, जिससे आपके शरीर को कोई नुकसान न पहुँचे।

और मैं आपको दो बिंदुओं पर आगाह करना चाहता हूँ: पहली बात तो यह कि सार्वजनिक पोस्टरों में प्रदर्शित बिकनी-बालाओं जैसी शरीर-यष्टि (फिगर) प्राप्त करना आपके लिए असंभव होगा क्योंकि उन आकर्षक पोस्टर-छवियों में फोटोशॉप बहुत बड़ी भूमिका अदा करते हैं! दूसरे, इस तरह आपको आत्मसंतुष्टि और ख़ुशी मिल जाएगी, इसकी संभावना बहुत क्षीण है। अपना शरीर आईने में देख-देखकर आपको वास्तविक ख़ुशी कभी नहीं मिल पाएगी और आप बार-बार अपने आहार और व्यायाम-क्रियाओं में बदलाव करती रहेंगी कि आप टीवी में दिखाई जाने वाली कमनीय महिलाओं जैसी लगने लगें लेकिन यह आपके लिए असंभव होगा क्योंकि आपकी शरीर रचना ही भिन्न होगी या इसलिए कि वह आदर्श देहयष्टि पाना यथार्थ से कोसों दूर है!

अब हम दूसरी संभावना पर विचार करें: जैसा भी आपका शरीर है, उसे स्वीकार करने का और उससे प्रेम करने का प्रयास करें। आप सोचेंगे कि शायद मैं इस विकल्प का समर्थन करूँगा, लेकिन नहीं। कम से कम पूर्ण समर्थन नहीं!

हाँ, आपको अपने शरीर से प्रेम करना चाहिए यानी जैसा आपका शरीर है, उसे उसी तरह स्वीकार करना चाहिए। लेकिन साथ ही उसे स्वस्थ भी रखना चाहिए! अगर आपका वज़न ज़्यादा है, आप मोटे हो रहे हैं और आप उसे स्वीकार करते चले जा रहे हैं तो आप इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए हिलना-डुलना भी छोड़ देंगे और अपनी ज़बान के गुलाम बनकर आवश्यकता से अधिक खाना-पीना शुरू कर देंगे! आप बहुत सी अज्ञात बीमारियों को भी स्वीकार करना शुरू कर देंगे जबकि आपका वज़न आसमान छू रहा होगा। आप घुटनों के दर्द को और पीठ के दर्द को भी स्वीकार कर लेंगे क्योंकि आपने अपने मोटापे को स्वीकार कर लिया है। तब आप चीजों को, चाहे वे जैसी भी हों स्वीकार करते चले जाएँगे और इस तरह उनके साथ होने वाले परिवर्तनों की ओर से आँखें मूँद लेंगे।

तो नहीं, मैं इस विचारसरणी का भी समर्थन नहीं करता। मुझे लगता है कि हमें सिर्फ स्वस्थ बने रहने और भीतर से सुकून और संतुष्ट महसूस करने पर ध्यान देना चाहिए। आखिर आप यह तो नहीं कह सकते कि दस मिनट चलते हुए, जब आपका घुटना दुखने लगता है तब आप खुश होते हैं, आपको सुकून मिलता है। मुझे इस बात पर सहमत करने की कोशिश भी न करें कि दिन भर सेब खाते रहने के बाद आपको अब भी सेब खाने की तीव्र इच्छा हो रही है।

इन आम खूबसूरत बालाओं का आदर्श बनावटी, विकृत और झूठा है क्योंकि हम सब अलग हैं और एक-दूसरे के फ्रेम में फिट नहीं हो सकते। अगर आप एक या दो इंच बड़ी कमर वाले पैंट में अच्छा महसूस कर रहे हैं तो एक निश्चित वज़न पाने के लिए अपने आप को भूखा रखने की ज़रूरत नहीं है। लेकिन जहाँ आप अपने शरीर से प्रेम करें और वर्तमान शरीर को स्वीकार करें वहीं कृपा करके उसे स्वस्थ रखने का प्रयास करें। अच्छा, स्वास्थ्यकर भोजन करें, बेकार का चटपटेदार खाना (जंक फूड) न खाएँ। चुस्त-दुरुस्त रहें, सक्रियता का आनंद लें!

इसे संतुलित रखिए, अपने लिए!

अंधविश्वासियों की किस्में – 4: भारत के लोकप्रिय क्रिकेटर और अन्य खिलाड़ी – 14 मार्च 13

अपने भारतीय पाठकों के लिए मैं अंधविश्वासियों की एक और किस्म की चर्चा कर रहा हूं। ये हमारे खिलाड़ी हैं जो लाखों भारतीय युवाओं के आदर्श हैं और मेरा मानना है कि इसी वजह से इन्हें किसी प्रकार के अंधविश्वास में यकीन नहीं करना चाहिए।

अंधविश्वासी क्रिकेट खिलाड़ी

अंधविश्वासी व्यवसायी के बारे में लिखते हुए मैंने कहा था कि उसे अपने कौशल और मेहनत पर पूरा भरोसा नहीं होता, इसलिए वह अपनी सफलता का पूरा श्रेय किसी अदृश्य शक्ति को देता है। यही बात भारत के क्रिकेट व अन्य खेलों के खिलाड़ियों पर भी लागू होती है। बहुत से खिलाड़ी बड़े अंधविश्वासी होते हैं। उनके पास धन – दौलत है, बहुत सारे रिकॉर्ड्स इनके नाम हैं लेकिन इसके बावजूद वे मानते हैं कि यह उनकी प्रतिभा, मेहनत और अभ्यास का फल नहीं है कि उन्हें कामयाबी मिली है।

भारत की राष्ट्रीय क्रिकेट टीम के कुछ खिलाड़ी अपनी जन्मतिथि के नंबर वाली जर्सी पहनकर खेलते हैं और यह विश्वास करते हैं की यह उनके लिए भाग्यशाली होगा। मिसाल के तौर पर कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की का नम्बर 7 छपा होता है क्योंकि उनकी जन्मतिथि है 7 जुलाई। इसी तरह युवराज सिंह जिनकी जन्मतिथि 12 दिसम्बर है, उनकी जर्सी का नम्बर 12 होता है।

बहुत से खिलाड़ी अपनी पतलून की बाईं जेब में रूमाल रखते हैं, कईयों के रुमाल का रंग लाल होता है जबकि कई पीले रुमाल में विश्वास रखते हैं। उनका विश्वास है कि यदि वे ग़लत रंग का रुमाल रखेंगें या रुमाल को ग़लत जेब में रखेंगें तो जीत हासिल नहीं होगी। युवराज सिंह और विराट कोहली रुमालों में तो यकीन नहीं रखते लेकिन कलाई पर काले रंग का बैंड बुरी नज़र से उनकी रक्षा करता है।

भारत के सफलतम क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर हमेशा पहले बाएं पैर पर पैड बांधते हैं और उसके बाद दाएं पर। वह इस बात का खास ध्यान रखते हैं ताकि उनके खेल पर बुरा प्रभाव न पड़े। इस बात में कोई अचरज नहीं है कि जादूगर स्वर्गीय सत्य सांईबाबा उनके गुरु थे। ये वही पाखंडी सांई बाबा थे जो हवा में सोना पैदा करके अपने भक्तों का बेवकूफ बनाते थे। अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि बड़े बड़े रिकॉर्ड बनाने वाले सचिन ऐसे ढोंगी बाबा के भक्त थे।

मैंने पढ़ा है कि ये महान खिलाड़ी टीम की बस में भी अपनी सौभाग्यप्रदाता सीटों पर ही बैठते हैं क्योंकि उनका विश्वास है कि अग़र 'अपनी' सीट पर नहीं बैठेंगें तो उस दिन उनका प्रदर्शन अच्छा नहीं रहेगा और इसीलिए बस मे बैठने की व्यवस्था में कभी कोई बदलाव नहीं होता। एक और क्रिकेटर है श्रीसंत। चाहे कुछ भी हो जाए वह सबसे आखिर में बस से उतरते हैं। शायद उनका विश्वास है कि ऐसा करने से वह सबसे आखिर में आउट होंगें।

एक बहुत ही प्रचलित अंधविश्वास है 'सौभाग्यसूचक आइटम' का। यदि आप कोई खास कैप, रुमाल, दस्ताना, जूता या अन्य कोई आइटम पहनकर बहुत अच्छा खेलें हैं या जीत हासिल की है तो अगली बार खेलने जाते वक़्त आप उस आइटम को साथ ले जाना नहीं भूलते हैं। हद तो तब हो गई जब भारत के अधिकारिक क्रिकेट संगठन BCCI ने सितम्बर 2012 में राष्ट्रीय टीम के खिलाड़ियों को नई डिजाइन की हुई जर्सियां न पहनने की सलाह दी क्योंकि आम जनता के सामने वे जर्सियां पहले ही प्रदर्शित हो चुकी थीं। उनसे कहा गया कि वे सब अपनी वही जर्सियां पहनें जिन्हें पहनकर उन्होंने पिछले साल विश्व कप जीता था।

खेलों में, विशेषकर क्रिकेट में अंधविश्वास का बोलबाला है। यह सब कोरी बक़वास है और एक मनोवैज्ञानिक भ्रमजाल है जो खिलाड़ियों ने अपने लिए रच रखा है। वे अपनी क्षमताओं में विश्वास रखने की अपेक्षा स्वयं को रुमाल जैसी चीजों का दास बनाना ज्यादा पसंद करते हैं। वे अपनी प्रतिभा के बल पर नहीं बल्कि बस में मिली मनचाही सीट के बल पर जीत हासिल करते हैं। उन्होंने सही मौके पर गेंद को लपक लिया इसकए लिए वे अपनी पैनी नज़र और ट्रेनिंग को इसका श्रेय देने के बजाए भाग्यशाली दस्ताने का शुक्रिया अदा करते हैं।

क्या खिलाड़ी हमें यह संदेश देना चाहते हैं कि गुरु, धर्मशास्त्र और अन्य अंधविश्वासी लोग सही है और वैज्ञानिक तथा नास्तिक ग़लत। ये खिलाड़ी हमारे युवाओं के प्रेरणास्रोत हैं। उन्हें चाहिए कि वे आचरण के ऊंचे मानदंड स्थापित करें और ऐसी बेहूदा बातों में यकीन करना बंद करें।