स्त्रियाँ और पुरुष, दोनों रोज़गार करते हैं मगर घर के कामों की ज़िम्मेदारी सिर्फ स्त्रियों की ही होती है – 10 दिसंबर 2015

कल मैंने दैनिक जीवन में लिंग आधारित भूमिकाओं के बारे में लिखना शुरू किया था और बताया था कि कैसे वे पश्चिमी समाजों में भी आज भी जारी हैं हालांकि उस शिद्दत से नहीं, जिस शिद्दत के साथ भारत में व्याप्त हैं। कल की चर्चा मैंने पुरुषों द्वारा घरेलू काम, जिन्हें पूरी तरह 'जनाना' काम समझा जाता है, न करने संबंधित दबावों पर केन्द्रित की थी लेकिन महिलाओं को भी आज भी लोगों के लिंग आधारित पुरातनपंथी विचारों से लोहा लेना पड़ता है।

निश्चित ही भारत के अधिकांश परिवार महिलाओं से अपेक्षा करते हैं कि वे घर में ही रहें जबकि पश्चिमी समाजों में कई पीढ़ियाँ गुज़र चुकी हैं, जिनमें माएँ बाहर निकलकर काम करती रही हैं- चाहे आधे दिन करें या पूरा दिन! वहाँ महिलाओं से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि विवाहोपरांत घरेलू स्त्रियाँ बनकर रहें। वहाँ कामकाजी महिलाओं के लिए मूलभूत सुविधाएँ बेहतर हुई हैं।

लेकिन वह दोषरहित नहीं है। महिलाएँ लिंग आधारित भूमिकाओं से बरी नहीं हुई हैं और न ही इस दबाव से कि दैनिक जीवन में उन्हें कैसा व्यवहार करना चाहिए। अभी भी कई मामलों में उन्हें बराबरी का दर्जा हासिल नहीं है: प्रबंधन के रोज़गारों में ऊपरी पायदानों पर पहुँचने के लिए उनके पास कम अवसर उपलब्ध हैं और समान पदों के लिए पुरुष सहकर्मियों की तुलना में उनका वेतन कम होता है! इसके अलावा, लोगों के दिमागों में यह असमानता का भाव अधिक व्यापक रूप से मौजूद है, जिसके कारण खुद महिलाएँ अपनी स्वायत्तता और परिवार या समाज में अपनी भूमिका को लेकर संदेहग्रस्त रहती हैं!

इस बात का प्रमाण आपको पारिवारिक ढाँचे में मिलता है। यह एक सामान्य बात हो सकती है कि माँ भी काम पर जा रही है लेकिन साथ ही आप यह भी देखेंगे कि इसके बावजूद घर के ज़्यादातर दैनिक कार्यों को निपटाने का काम भी वही करती है। अपने उद्यम में काम करते हुए वह कितना भी सख्त हो लेकिन घर में उसे यह उचित ही लगता है कि वह खाना बनाती है या वही बच्चों को स्कूल से लेकर भी आती है। उसका पति उसके बराबर ही काम करके घर लौटता है और सोफे पर पसरकर आराम फरमाता है। अक्सर दोनों ही इस व्यवस्था में कुछ भी गलत नहीं पाते लेकिन फिर अत्यधिक काम और तनाव के कारण अचानक किसी दिन वह क्लांत और शिथिल पड़ जाती है और अंततः तनावग्रस्त होकर अवसाद में चली जाती है। उसने सारे कामों का बोझ अपने ऊपर ले लिया था, एक आधुनिक कामकाजी महिला, एक सुघड़ गृहणी और स्नेहमयी माँ-सब कुछ एक साथ!

मैं बहुत सी महिलाओं से मिला हूँ, जिन्होंने ये सारे के सारे काम अपने सर ले रखे हैं। उन्होंने इस विचार को गले लगाया है कि वे भी आज़ादी की हवा में साँस ले सकती हैं, पुरुषों की बराबरी पर हैं और जितना श्रम पुरुष करते हैं, वे भी कर सकती हैं, जितनी देर तक पुरुष काम करते हैं, वे भी कर सकती हैं-लेकिन साथ ही वे अपने आप से अब भी अपेक्षा करती हैं कि वे घर के वे सारे काम भी करती रहें जो उनकी नानियाँ या दादियाँ अपने वक़्त में करती रही हैं और वह भी उसी सुघड़ता के साथ! वे भूल जाती हैं कि उनकी दादियाँ सिर्फ वही करती थीं, उतना ही करती थीं। यह नहीं कि उसका कोई महत्व नहीं है- लेकिन आप सुपरवूमन नहीं हो सकतीं कि हमेशा पूरी दक्षता के साथ बाहर नौकरी भी करें, घर के कामकाज भी निपटाएँ और बच्चों को भी संभालें!

दुर्भाग्य से पुरुष भी अपने रवैये से इस विश्वास को मज़बूती प्रदान करते हैं: पत्नी सारे काम करती रहे, यह कितना सुविधाजनक है! फिर क्यों परेशान हों, क्यों मदद करें? क्यों उठें और खुद बरतन धोना शुरू कर दें? शर्ट अपनी है मगर उस पर प्रेस खुद क्यों करें जब काम करने के लिए पत्नी मौजूद है?

इसलिए कि आप अपनी पत्नी से प्यार करते हैं और चाहते हैं कि आपकी बेटी भी आगे चलकर एक मज़बूत महिला बने। खुद घर के काम करके बेटों के सामने उदाहरण प्रस्तुत करें कि वे भी घर के कामों में मदद कर सकते हैं। अपनी बेटियों को दिखाएँ कि पुरुष और महिलाएँ मिलजुलकर और एक-दूसरे की मदद करते हुए न सिर्फ बाहर के बल्कि घर के काम भी पूरी निपुणता के साथ निपटा सकते हैं! घर के कामों की ज़िम्मेदारी उठाएँ-आखिर पत्नी भी पैसे कमाकर परिवार की आर्थिक मदद कर ही रही है!

हम अभी भी पुरानी लैंगिक भूमिकाओं से चिपके हुए हैं और इससे बाहर निकलने में और वास्तविक समानता प्राप्त करने की दिशा में अभी लंबा रास्ता तय किया जाना बाकी है। जब तक हम एक के बाद दूसरा कदम आगे रख रहे हैं, एक न एक दिन हम अवश्य अपनी मंज़िल पा लेंगे!

जी नहीं, घर की सफाई करना सिर्फ स्त्रियों का काम ही नहीं है! 9 दिसंबर 2015

कल जब मैं उस स्कूली किताब के बारे में लिख रहा था जिसमें बताया गया था कि आपको परिवार के कम से कम एक सदस्य से डरना चाहिए-जो ज़ाहिर है, अधिकतर पिता ही होंगे-तब मुझे लगा कि लैंगिक भूमिकाओं पर मुझे थोड़ा और विचार करना चाहिए। बहुत सोचने पर मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि आधुनिक देशों में भी आज भी सिर्फ इसलिए कि वे पुरुष हैं या महिला, लोग इस उधेड़बुन में रहते हैं कि किन कामों को करने की उनसे अपेक्षा की जाती है।

स्वाभाविक ही, भारत में लिंग के आधार पर कामों का परंपरागत विभाजन पूरी तरह लागू होता है। पुरुष परिवार का अन्नदाता है। बहुत से परिवारों में महिलाएँ काम के लिए तभी घर से निकलती हैं जब बिल्कुल खाने-पीने के लाले पड़ जाते हैं और पैसे कमाने के लिए बाहर निकलना अवश्यंभावी हो जाता है। हमारे स्कूल के गरीब परिवारों में भी कुछ पिता शर्म से डूब मरेंगे अगर उनकी पत्नी को भी बाहर काम करके परिवार की आमदनी में योगदान देना पड़े! अर्थात वे भूखे पेट सो जाना पसंद करेंगे लेकिन अपनी पत्नियों को बाहर काम करने की इजाज़त नहीं देंगे। तब भी जब खुद पत्नी शिद्दत से चाहती है कि बाहर निकलकर खुद भी परिवार के लिए पैसे कमाए!

निश्चित ही भारत में आज भी विवाह के बाद और बच्चे हो जाने के बाद ज़्यादातर महिलाएँ घर में ही रहती हैं भले ही वे विश्वविद्यालय में पढ़कर डिग्रियाँ हासिल कर चुकी हों उनके पास स्नातकोत्तर डिग्रियाँ हैं लेकिन क्योंकि वे स्त्री हैं, उनका काम सिर्फ घर पर रहकर वहाँ की व्यवस्था बनाए रखना और बच्चों की देखभाल करना भर है।

लेकिन पश्चिम में भी मैंने देखा है कि आज भी पुरुष और महिलाओं में अपनी-अपनी परंपरागत भूमिकाओं को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है और वे उन्हें पूरी तरह छोड़ने में हिचकते हैं। आज भी यह पूरी तरह स्वीकार्य है कि पत्नी बच्चे हो जाने के बाद घर में बैठकर घर के काम-काज देखे और बच्चों की परवरिश करे। अगर यह आर्थिक रूप से संभव है और पत्नी को घर पर रहना पसंद है तो मैं भी उसकी सिफ़ारिश करूँगा उसे प्रोत्साहित करूँगा कि वही करे! लेकिन साथ ही अगर पति यही करना चाहे तो वह भी सबको स्वीकार्य होना चाहिए! पत्नी काम पर जाए और घर के खर्चे उठाए जबकि पति घर के कपड़े धोने से लेकर बच्चों की चड्ढियाँ साफ करे!

दुर्भाग्य से जो पुरुष इसकी पहल करते हैं, उनकी हँसी उड़ाई जाती है। इस दिशा में उनके प्रयासों का अनादर किया जाता है-और यह यही दर्शाता है कि आप वास्तव में उन महिलाओं को कितना कमतर आँकते हैं जो पहले ही इन कामों में लगी हुई हैं! अभी भी आप समझते हैं कि घर के काम कम महत्वपूर्ण हैं, कम मुश्किल हैं और उन्हें कोई भी ऐसा व्यक्ति कर सकता है जो अपनी अल्प योग्यता के चलते पैसे कमाने वाले ‘बड़े काम’ नहीं कर सकता! यह हास्यास्पद है! इसका सबसे अच्छा इलाज यह होगा कि ऐसा समझने वाले को खुद ये काम करके देखना चाहिए! चुनौती स्वीकार करें और मुझे दिखाएँ कि आप किस तरह सारे घर की साफ-सफाई करते हैं, बाज़ार जाकर राशन लाते हैं, सारे परिवार के लिए खाना पकाते हैं और सबके मैले कपड़े धोते हैं, जबकि आपके दो छोटे-छोटे बच्चे सारे घर में धमाचौकड़ी मचा रहे हैं!

क्या यह अविश्वसनीय नहीं है कि आज, 21 वीं सदी के 15 साल गुज़र जाने के बाद भी बहुत से लोग यही मानते हैं कि अपने कपड़े साफ करना, अपने लिए खाना पकाना पुरुषों के करने योग्य काम नहीं हैं-अपनी संतान को खाना खिलाने जैसे कामों की बात तो छोड़ ही दीजिए जबकि ये काम एक दिन आपकी संतान भी आपके लिए करेगी?

और जब लोग यह सोचते हैं कि पुरुषों को रोना नहीं चाहिए, तो इसका कारण भी यही होता है। और, क्योंकि स्नेह का प्रदर्शन महिलाओं के खाते में आता है इसलिए पश्चिम में आप महिलाओं को तो आपस में हाथों में हाथ डाले घूमता हुआ देख सकते हैं लेकिन पुरुषों को नहीं। ऐसा क्यों? क्यों स्नेह का प्रदर्शन महिलाओं के लिए आरक्षित है जबकि पुरुषों के लिए अपनी कोमल भावनाओं को दूसरों से साझा करने की जगह शराब को ही समस्या का समाधान मान लिया जाता है!

एक तरफ लोग महिलाओं की क्षमता का सम्मान नहीं करते, उनकी नज़रों में उसकी कोई कीमत नहीं और दूसरी तरफ पुरुषों के कंधों पर बहुत ज़्यादा भार डाल देते हैं! कृपया ऐसा न करें। महिलाओं के पास उनके अपने बोझ लदे हैं- लेकिन उनके संबंध में कल चर्चा करेंगे।

हम इतने नकारात्मक हैं कि हमें हर जगह लिंगभेद और दूसरी बुराइयाँ दिखाई देती हैं – 25 अक्टूबर 2015

आज मैं लैंगिक समानता, नारीवाद और हर चीज़ में कोई न कोई नुस्ख निकालने वाले लोगों के रवैये पर अपने विचार लिखने जा रहा हूँ। इसके अलावा मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि इन सब बातों का हमारे आश्रम की रसोई से क्या ताल्लुक है।

आज आश्रम के कुछ मेहमान हमारी आयुर्वेदिक पाक-कार्यशाला में सम्मिलित हुए। सुबह उन्होंने पनीर बनाना सीखने से शुरुआत की और दोपहर में सारे लोग प्रवेश हाल में इकट्ठे बैठकर पालक की पत्तियाँ चुन रहे थे। खुशनुमा माहौल था और तीन महिला कर्मचारियों के अलावा मेरी नानी और हमारे महिला मेहमान साथ बैठे थे। मुझे लगा, यह बड़ा सुंदर दृश्य है और मैंने एक फोटो ले लिया।

जब मैंने उसे फेसबुक पर पोस्ट किया तो बहुत सारे सकारात्मक टिप्पणियाँ प्राप्त हुईं मगर दो एक जैसी थीं:

"क्या आपके आश्रम में सिर्फ महिलाओं से ही रसोई का काम कराया जाता है?" और "आपकी पिछली पोस्ट्स देखकर मैं आशा कर रही थी कि आपके आश्रम में पुरुष भी खाना बनाने के काम में हिस्सा लेते होंगे!"

निश्चित ही इन दोनों टिप्पणीकारों ने आश्रम संबंधी एक चित्र को, फोटो में कैद एक पल को देखकर यह मान लिया था कि जो महिलाएँ पालक चुन रही हैं, वही सारा भोजन भी तैयार करती होंगी। कि खाना पकाने की सारी ज़िम्मेदारी सिर्फ महिलाओं के सिर पर डाल दी गई है।

मैंने आश्रम की रसोई का एक दूसरा चित्र, जिसमें बहुत से पुरुष कर्मचारी रोटियाँ बेल और सेंक रहे थे, पोस्ट करके बताने का प्रयत्न किया कि पुरुष भी रसोई में काम करते हैं। मैंने चुटकी लेते हुए कहा कि अब यह चित्र यह विवाद न खड़ा कर दे कि रसोई में महिलाओं का प्रवेश क्यों वर्जित है!

निश्चित ही ये टिप्पणीकार हमारे यहाँ कभी नहीं आए और न तो मैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ और न ही उन्हें हमारे आश्रम की कार्यप्रणाली की, हमारे कर्मचारियों और मेरे परिवार की रत्ती भर जानकारी है।

जो भी ये फोटो देख रहे हैं, खातिर जमा रखें कि हर क्षेत्र में पुरुष और महिलाएँ दोनों मिल-जुलकर अपने-अपने हिस्से का काम करते हैं! इस समय हमारी रसोई का मुख्य रसोइया पुरुष है। उसके सहायक पुरुष और महिलाएँ, दोनों हैं। सभी सब्जियाँ काटते हैं, बरतनों में सब्जियाँ चलाते हैं और टेबल पर खाना परोसते हैं! हमें इस बात से कोई परेशानी नहीं होगी अगर कल को कोई महिला रसोई की मुखिया बन जाती है! जब मेरी माँ ज़िंदा थीं, वही रसोई का इंतज़ाम देखती थीं और उनके जाने के बाद मेरे भाइयों और मैंने वह ज़िम्मेदारी वहन कर ली है-इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमारे यहाँ काम करने वाला कोई कर्मचारी महिला है या पुरुष, इतना काफी है कि उसे पता हो कि उसे क्या काम दिया गया है और वह उस काम को अच्छी तरह अंजाम दे!

इसलिए लिंग भेद का प्रश्न मेरे दिमाग से बहुत जल्दी निकल गया क्योंकि मैं जानता हूँ कि हम यहाँ किसी के साथ किसी प्रकार का भेद नहीं करते-लेकिन मेरे मन में उन टिप्पणीकारों की मानसिकता के बारे में कई तरह के खयाल आते-जाते रहे। मैं सोचता हूँ कि जब आप हर बात में किसी नकारात्मकता की तलाश करते हैं तो वह आपके मन को प्रतिबिम्बित करता है। बिना अधिक जानकारी प्राप्त किए आप किसी चीज़ का गलत अर्थ लगा लेते हैं।

कुछ बातों को आप सामान्य रूप से क्यों नहीं ले सकते? क्यों नहीं आप एक रोचक चित्र का आनंद लेकर, उसमें नुस्ख निकालने कि जहमत उठाए बिना उसे जस का तस ग्रहण करते?

महिलाओं की यौन इच्छाओं से पुरुषों की सुरक्षा करना – लैंगिक समानता की दिशा में एक और तर्क – 7 मई 2015

कल वैवाहिक बलात्कारों के संबंध में लिखते हुए मैंने नोटिस किया कि सेक्स पर विचार करते हुए हमेशा महिलाओं की सहमति का सवाल उठता रहा है। मैंने आज तक यह कभी नही पढ़ा कि सेक्स के लिए पुरुषों की सहमति होनी चाहिए या नहीं! मैंने इन चर्चाओं में यह भी कभी नहीं पढ़ा कि महिलाओं को भी सेक्स की आवश्यकता होती है! यह कैसे?

जैसा कि कल मैंने स्पष्ट किया था, हिन्दू धर्म महिलाओं से यह अपेक्षा करता है कि वे हर हाल में अपने पति की आज्ञा का पालन करेंगी। अर्थात, अगर पति सेक्स करना चाहता है तो उसे तुरंत अपने आपको पति के सामने प्रस्तुत कर देना चाहिए। इस्लाम भी, जैसा कि आप कल्पना कर सकते हैं, महिलाओं के प्रति इतना ही असभ्य व्यवहार करता है। असल में, मैंने हाल ही में कहीं पढ़ा कि मुहम्मद ने इस बारे में ब्योरेवार विस्तृत नियम बता रखे हैं कि पत्नी को अपने आपको किस तरह हर वक़्त तैयार रखना चाहिए: चाहे महिला ‘ऊँट पर बैठी’ हुई ही क्यों न हो, उसे पति के साथ संभोग के लिए हर वक़्त तैयार रहना चाहिए!

वाह! पैगंबर की स्वैर कल्पनाएँ बेहद विषद, गजब और सजीव हैं! क्या नहीं?

तो सारी चर्चा महिला की सहमति के इर्द-गिर्द घूम रही है। उसे पति के साथ सेक्स के लिए हर वक़्त तैयार रहना चाहिए। लेकिन क्या हो अगर उसका पति सेक्स के लिए उद्यत ही न हो, खुद होकर कभी उससे कहे ही नहीं-या कभी-कभार, क्वचित ही कहे? तब पत्नी की यौनेच्छा का क्या होगा, सेक्स की उसकी आवश्यकता का क्या हो?

पूरी चर्चा इस बात की है कि सिर्फ पुरुष ही हमेशा सेक्स की मांग करे, चाहे जब, दिन में कभी भी! न सिर्फ दिन में कभी भी, बल्कि इस बात की चिंता किए बगैर कि उसकी पत्नी किस अवस्था में है-सिर्फ मासिक धर्म के समय को छोड़कर, क्योंकि तब वह अपवित्र और अस्पृश्य होती है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि वास्तव में पुरुष की सेक्स करने की इच्छा न हो?

जी हाँ, इसके विपरीत अगर महिला की सेक्स की इच्छा अधिक प्रबल हो? महिलाओं की यौनेच्छा को कम करके न आँकें! जब उनकी इच्छा होती है, बल्कि कहा जाए कि जब उन्हें सेक्स की अत्यंत आवश्यकता होती है तब कई महिलाएँ किसी पुरुष के साथ सोने की इच्छा में बड़ी दूर तक जा सकती हैं, कई खतरे मोल ले सकती हैं! कमजोर सेक्स कई बार असाधारण शक्ति प्राप्त कर लेता है और उसके तरकश में पुरुषों से कहीं ज़्यादा प्रकार के तीर होते हैं, क्योंकि पुरुषों में, जैसा कि हम जानते हैं, रक्तसंचार जब दक्षिण दिशा की ओर प्रवाहित होने लगता है, उनका मस्तिष्क ठीक तरह से काम नहीं करता! और ऐसी स्थिति में मस्तिष्क का बेहतर उपयोग करते हुए यह सीधी-सादी लगने वाली औरत अपना कम अबोध रूप भी दिखा सकती है!

इसलिए मैं पुरुषों की ओर से यह याचना करता हूँ कि बिना सहमति के किए जाने वाले सेक्स के बारे में चर्चा करते समय उनकी सहमति या असहमति पर भी चर्चा की जानी चाहिए! पुरुषों की अकामुकता के साथ हो रहे भेदभाव के विरोध में एक अपील और लैंगिक समानता की मांग!

विश्वास और प्रेम की अनुभूति – 15 फरवरी 2015

जिसे आप जीवन में सबसे अधिक प्यार करते हैं, उसके साथ साझेदारी और सहजीवन के विषय में आपके सामने मैं अपने कुछ विचार रखना चाहता हूँ।

शाम को भोजन पश्चात अपने मेहमानों के साथ कुछ समय गुजारने के बाद हम अक्सर अपने पिताजी के कमरे में उनके साथ भी कुछ समय गुज़ारते हैं। अपरा के सोने के थोड़े समय पहले का यह वक़्त होता है-या यह कहना ठीक होगा कि जब वह उनींदी होने लगती है। हम खेलते हैं, बातें करते हैं और उनके बिस्तर पर बैठे हुए कुछ समय हम सब एक साथ गुज़ारते हैं। कल जब हम साथ बैठे हुए थे, मैंने अपना सिर रमोना के कंधों पर रख दिया और वह भी मेरी तरफ थोड़ा सा खिसक आई और इस तरह मैं अधलेटा सा उसकी बाहों में पड़ा हुआ था। उस समय मुझे जो एहसास हुआ, वही इन विचारों का उद्गम है।

स्वाभाविक ही मुझे एहसास हुआ कि मुझसे प्रेम किया जा रहा है लेकिन बारीकी से देखा जाए तो उसमें एक सूक्ष्म भेद था। प्रेम के साथ मुझे दुलार का, संरक्षण पाने का एहसास भी हुआ था। यह मज़ाक लग सकता है क्योंकि ऐसी कोई बात नहीं है कि मुझे सुरक्षा देने की रमोना को आवश्यकता पड़े या जो इसे मर्दाना गुण नहीं मानते, उनसे मैं कहना चाहता हूँ कि मैं खुद अपनी सुरक्षा करने में पूरी तरह सक्षम हूँ। 🙂 लेकिन वह एहसास मौजूद था और वह एहसास बड़ा ही सुंदर था: विश्वास और प्रेम का एहसास।

लेकिन साथ ही मुझे लगा यह कितना सुंदर है कि मैंने भी उसे अपनी बाहों में भर लिया! ऐसे किसी व्यक्ति को पाने का एहसास, जिसकी आप कदर करते हैं, जिसका आप भरण-पोषण कर सकते हैं- हालांकि स्त्रीवादियों से मैं कहना चाहता हूँ कि मेरी पत्नी इतनी सक्षम है कि वह स्वयं अपना भरण-पोषण कर सकती है! 🙂 यह एहसास भी बड़ा सुंदर है और हालांकि स्वाभाविक ही मैं अपरा के साथ इसे अधिक शिद्दत के साथ महसूस करता हूँ क्योंकि वह बच्ची है और मुझ पर और उसके आसपास के दूसरे वयस्कों पर बहुत हद तक निर्भर है, रमोना के मामले में यह स्वाभाविक ही अलग एहसास है। मुझे गर्व होता है कि इस महिला ने एक व्यक्ति के रूप में मुझे चुना है, जिसकी बाहों में वह सिमटना चाहती है और जब मर्ज़ी या आवश्यकता हो, उसके कंधों पर सिर टिकाना चाहती है।

मैं जानता हूँ कि यह एक प्रकार का आदिम एहसास है, कि इस एहसास के साथ स्वभावगत मूल प्रवृत्तियाँ जुड़ी हुई हैं, जो हमारे दिलों, हमारे शरीरों और मस्तिष्क के ज़रिये अपने आपको व्यक्त करती हैं। लेकिन मुझे लगता है कि यह उन्हें कम महत्वपूर्ण नहीं बनाता। उन्हें महसूस करना मेरे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है और हर बार जब भी मैं उन्हें पूरे होशोहवास के साथ अनुभव करता हूँ, मुझे बड़ा अच्छा लगता है और मैं उन्हें सँजोकर रखना चाहता हूँ।

कल मुझे इस अनुभूति से बहुत आश्चर्य हुआ कि हमने इन दोनों भावनाओं को महसूस किया। आदिम सहज-वृत्तियों के बारे में बात करते हुए आप सोचते हैं कि प्रतिपालक या संरक्षक के रूप में पुरुष हमेशा गर्व महसूस करता है, जब कि स्त्रियाँ हमेशा किसी की सुरक्षा में रहना और अपने बारे में चिंता किया जाना पसंद करती हैं। लेकिन मैं जानता हूँ कि पुरुष और महिलाओं, दोनों में, दोनों बातें मौजूद होती हैं और हमें दोनों बातों का एक साथ एहसास करते हुए जीना पड़ता है!

मैंने पत्नी से बात की और पाया कि उसने भी इन दोनों भावनाओं को महसूस किया था। मुझे लगता है कि यह संज्ञान आजकल के सम्बन्धों में ही परिलक्षित हो सकता है, आधुनिक दुनिया में, क्योंकि आज के जमाने में ही एक पुरुष के लिए यह स्वीकार करना संभव है कि वह भी संरक्षण चाहता है और स्त्री के लिए यह स्वीकार करना कि वह भी अपने प्रियकरों का भरण-पोषण करने में अपनी भूमिका का निर्वाह करना चाहती है।

हमें दोनों पक्षों को स्वीकार करना होगा-और मुझे आशा है कि तब आप उन दोनों का लुत्फ उठा पाएँगे!

पढ़े-लिखे उच्च वर्ग में भी लड़की के जन्म पर निराशा व्यक्त की जाती है! 14 जनवरी 2015

कल मोनिका के बारे में लिखते हुए मैं उसकी पारिवारिक स्थिति पर पुनः विचार करने को मजबूर हो गया। मुझे उसकी माँ के अतीत का खयाल आया, जिसकी दो लड़कियों को दत्तक दे दिया गया क्योंकि वे लड़के नहीं, लडकियाँ थीं। रमोना ने कुछ समय पहले अपनी स्त्री-रोग विशेषज्ञ (गाइनकालजिस्ट) से बात की-और जो उसने बताया उससे एक बार फिर यह साबित हो गया कि बहुत से उच्च वर्ग के लोगों की ज़िंदगी का यह आज भी एक कटु सत्य बना हुआ है!

जिस अस्पताल में रमोना की स्त्री-रोग विशेषज्ञ (गाइनकालजिस्ट) काम करती है, वहीं अपरा का जन्म हुआ था और वहीं इस वक़्त मोनिका का इलाज चल रहा है। जैसा कि मैं पहले ही बता चुका हूँ, वह एक बहुत अच्छा अस्पताल है। अर्थात, यहाँ डॉक्टर जानते हैं कि वे क्या कर रहे हैं, यहाँ के कर्मचारी बहुत दोस्ताना और निपुण हैं और स्वाभाविक ही आप इन सेवाओं की अच्छी-ख़ासी कीमत भी अदा करते हैं। जब कोई डॉक्टर वहाँ भर्ती (बच्चे को जन्म देने वाली) किसी महिला के बारे में बताता है तो स्वाभाविक ही वह किसी अच्छे खाते-पीते, पढ़े-लिखे, उच्च वर्गीय खानदान की सदस्य होती है। वे अच्छी ख़ासी पढ़ी-लिखी होती हैं और अक्सर कोई न कोई काम करती हैं और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया से उनका संपर्क होता है, आधुनिक जीवन और आचार-व्यवहार को वे अच्छी तरह जानती हैं। इसके अलावा वे पुराने दक़ियानूसी मूल्यों की सच्चाई के बारे में भी अच्छी तरह वाकिफ होती हैं।

लेकिन दुर्भाग्य से, जो डॉक्टर ने बताया वह बड़ा निराशाजनक था। उसने बताया कि अक्सर ये महिलाएँ भी बड़ी अंधविश्वासु होती हैं और पुराने, भद्दे, दक़ियानूसी मूल्यों की गुलाम और विचारों से बहुत गँवार होती हैं। उसे अकसर ऐसे अनुरोध प्राप्त होते रहते हैं, जिनमें महिलाएँ विनती करती हैं कि उनका सी-सेक्शन ठीक उनके द्वारा बताए गए ‘मुहूरत’ पर हो, जिसे ग्रहों और नक्षत्रों की अवस्थिति के अनुसार किसी पंडित ने निश्चित किया होता है, जिससे होने वाले बच्चे की बढ़िया से बढ़िया कुंडली तैयार हो सके।

इतना ही नहीं, स्वाभाविक ही ऐसी हालत में, लड़की पैदा करने वाली महिलाओं को सांत्वना देना भी उसका फर्ज़ बन जाता है। बहुत सी उच्च शिक्षा प्राप्त डिग्री धारी महिलाएँ, लड़के की अभिलाषा में लंबी प्रसव-पीड़ा सहन करती हैं और लड़की पैदा होने पर आँसुओं में डूब जाती हैं। ये आँसू पीड़ा-मुक्ति की खुशी के आँसू नहीं होते और न ही थकान के कारण बह रहे होते हैं बल्कि निराशा और अवसाद के कारण पैदा होते हैं। ‘लड़की पैदा हुई है’ वाक्य उनके अंदर किसी तरह की खुशी या उत्साह पैदा नहीं कर पाता!

अब आप ही देखिए कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि महिला पढ़ी-लिखी है या नहीं, पहले उसका कोई लड़का है या नहीं, उसकी धारणा भी यही होती है कि लड़की के मुक़ाबले लड़का अधिक मूल्यवान है। उसकी परवरिश इसी माहौल में हुई है, वह यही सुनते हुए बड़ी हुई है और वह जानती है कि उसका परिवार उससे एक लड़का पैदा करने की अपेक्षा कर रहा होगा।

जब हम बच्चों से उनके परिवार के विषय में कुछ पूछते हैं, जैसे यह कि क्या उनके चाचा या मौसी के बच्चे हैं तो वे इस तरह जवाब देते हैं: ‘उनकी तीन लड़कियाँ हैं, लड़का एक भी नहीं है’। लड़कियाँ अक्सर आपस में कहती रहती हैं कि हमारे घर की हालत बहुत खराब है क्योंकि ‘हम इतनी सारी बहनें हैं’। जब रमोना गर्भवती थी तब कम से कम दस लोगों ने कहा था: ईश्वर करे, लड़का ही हो’!

भारत विकास और प्रगति कर रहा है लेकिन ऐसे भयावह विचारों, रवैयों और मूल्यों से मुक्ति पाने की दिशा में अभी बहुत काम किया जाना बाकी है!

प्रबंधन के क्षेत्र में ज़्यादा से ज़्यादा महिलाएँ होनी चाहिए! 8 मई 2014

कल का ब्लॉग पढ़ने के बाद किसी ने कहा कि मुझे उस महिला मेहमान की प्रतिक्रिया पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। आखिर वह महिला थीं और स्पष्ट ही अपने पुरुष सहकर्मियों के मुकाबले बेहतर काम अंजाम दे रही थीं। ऐसे पदों पर आसीन महिलाओं को अक्सर वह सराहना, मान्यता और सम्मान नहीं मिल पाते, जिसकी वे हकदार होती हैं। यह जानकारी मेरे लिए रोचक तो थी मगर साथ ही कष्टकर भी थी और इसलिए मैं चाहता हूँ कि इस विषय पर कुछ और विचार किया जाए।

सर्वप्रथम यह कि प्रबंधन के मामले में पुरुषों का दबदबा अभी भी कायम है। प्रबंधन में महिलाएं मौजूद अवश्य हैं और बहुत से देशों में ऊंचे पदों पर भी मौजूद हैं मगर उनका प्रतिशत यह ज़ाहिर करता है कि पुरुष ही अधिकतर प्रबंधन के ऊंचे ओहदों तक पहुँचते हैं। आइए इसके कारणों पर, जैसे बाद में महिलाओं की गर्भावस्था और मातृत्व का समय आदि पर चर्चा करें और इसके परिणामों पर ध्यान केन्द्रित करें।

तो माना कि दस लोगों के एक समूह में सिर्फ एक महिला है। परिणामों के आंकड़े बताते हैं कि महिला का प्रदर्शन सभी पुरुषों से बेहतर है जबकि पुरुषो के मन में अभी भी यही विचार बना हुआ है: 'आखिर एक महिला मेरा काम कैसे कर सकती है?' जी हाँ! दुर्भाग्य से यही विचार, महिलाओं को कमतर समझने का यह रवैया अभी भी जड़ जमाए हुए है। लैंगिक-समानता में काफी प्रगति होने के बाद भी समाज सामान्य रूप से यही सोचता है कि कुछ कार्यक्षेत्र सिर्फ पुरुषों के लिए और कुछ दूसरे सिर्फ महिलाओं के लिए उपयुक्त हैं।

अब पुनः प्रबंधन पर लौटें। पुरुष सोचते हैं कि महिलाएँ कभी भी उतनी कठोर और निष्ठुर नहीं हो सकतीं जितने वे होते हैं। यह उनके स्वाभाव में ही नहीं होता। वे अपने कर्मचारियों पर चीखने-चिल्लाने में संकोच करती हैं। अगर यही बात है कि दृढ़ता तभी व्यक्त होगी जब आप अपने मातहतों पर चीखेंगे-चिल्लाएँगे, शोर मचाएंगे और उन्हें अपने से तुच्छ समझेंगे तो मुझे लगता है कि ज़्यादा से ज़्यादा महिलाओं को प्रबंधन के उच्च पदों तुरंत पदोन्नत कर दिया जाना चाहिए। अगर पुरुष स्वभावतः अपना गुस्सा काबू में नहीं रख सकते तो फिर महिलाओं को ऊंचे पदों पर आकर यह ज़ाहिर करना और पुरुषों को सिखाना चाहिए कि किस तरह दूसरों का अपमान किए बगैर और उन्हें अपना साथी समझकर और उन्हें अपने से नीचा समझे बगैर भी सख्त हुआ जा सकता है! कि आप बिना कर्कश हुए भी सख्त हो सकते हैं। कि आप विनम्र और सौम्य बने रहते हुए भी अपनी टीम को सफलता की ओर ले जा सकते हैं।

ऊंचे पदों पर ज़्यादा महिलाओं की नियुक्ति होने पर दूसरी सभी समस्याएँ खुद-ब-खुद समाप्त हो जाएंगी। कोई यह नहीं समझेगा कि ये काम पुरुषों के लिए आरक्षित हैं। अगर कोई महिला किसी पुरुष से बेहतर परिणाम प्राप्त करने में सफल रहती है तो पुरुष को तकलीफ नहीं होनी होगी! और तब किसी पुरुष की यह हिम्मत नहीं होगी कि वह किसी भी महिला को किसी काम को करने का बेहतर तरीका बताए!

मैं जानता हूँ कि पश्चिम में बहुत सी महिलाओं को ऊँचे पदों पर काम करते हुए इस तरह की समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता या पुरुष सहकर्मियों की तुलना में पर्याप्त सम्मान न पाने का बहुत हल्का सा एहसास भर उनके मन में रहता है। लेकिन यह होता है और यह बात, मैं क्या कह रहा हूँ यह वही समझ सकता है, जिसने इन अनुभवों को झेला है, जब कोई सहकर्मी आपको यह बताने की चेष्टा करता है कि आप किसी काम को करने में उतने सक्षम नहीं हैं, जितना कि वह है।

पश्चिमी देशों में, जहाँ महिला सशक्तिकरण के आन्दोलन काफी सफलता प्राप्त कर चुके हैं, स्थिति काफी अच्छी है मगर भारत में माहौल बिल्कुल अलग बल्कि निराशाजनक है। बड़ी कंपनियों के निर्णायक रूप से महत्वपूर्ण पदों पर महिलाओं की संख्या बहुत कम है और वैसे भी कुल मिलाकर नौकरियाँ या अपना खुद का काम-धंधा करने वाली महिलाओं की संख्या ही नगण्य है।

तो आप उनकी परिस्थिति की कल्पना कर पा रहे होंगे- निचले पदों पर, पुरुष कर्मचारियों से कम पैसों में तो महिलाएं काम कर सकती हैं मगर कठिन कामों के लिए उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

दुनिया भर में इस बारे में अब भी बहुत परिवर्तन की आवश्यकता है। पूर्वी देशों में और पश्चिमी देशों में भी। बराबरी का स्वप्न पूरा हो सके इसलिए, सबके सम्मान के लिए और काम के बेहतर माहौल की स्थापना के लिए। ज़्यादा से ज़्यादा लोग सुखी हों, इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए।