धर्म के कपटपूर्ण संसार में दो तरह के लोग रहते हैं – 11 जून 2015

कल मैंने आपको बताया था कि कुछ लोग आधिकारिक आँकड़ों पर भी भरोसा नहीं करते और कहते हैं कि वे महज झूठे आँकड़े हैं। कल के उदाहरण को आगे बढ़ाते हुए वे ज़ोर देकर कहते हैं कि विवाह में बलात्कार जैसी कोई चीज़ संभव होती ही नहीं है भले ही संयुक्त राष्ट्र के अध्ययन बताते हों कि इनका प्रतिशत भारत में बहुत ज़्यादा है! आज मैं इस भ्रमजाल में रह रहे धार्मिक और दक़ियानूसी लोगों के विषय में और अधिक विस्तार से लिखना चाहता हूँ।

सहज-विश्वासुओं अथवा आस्तिकों के लिए धर्म एक भ्रमपूर्ण संसार रचता है। इस संसार में इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि अनगिनत लोग आपको बताएँ कि बहुत से पति अपनी पत्नियों के साथ बलात्कार करते हैं- उनके लिए विवाह में बलात्कार का अस्तित्व ही नहीं होता। आप विश्वास ही नहीं करेंगे क्योंकि आपके संसार में लोग संयुक्त परिवार में रहते हैं, हर एक की अपनी जगह होती है, महिलाएँ अपने पतियों और पिताओं या ससुरों की आज्ञा का पालन करती हैं और बदले में वे महिलाओं की सुरक्षा और देखभाल करते हैं। अब आप आँख बंद कर लेते हैं और दिखावा करते हैं कि ये आधिकारिक आँकड़े गलत हैं क्योंकि वे आपके भ्रमजाल से मेल नहीं खाते।

बहुत से लोग जानते हैं कि यह गलत है। कि उनका यह संसार भ्रमपूर्ण और झूठा है और यह भी कि बाहर से आने वाली जानकारियाँ, संयुक्त राष्ट्र के आँकड़े, जिन्हें वे मानने से इंकार कर रहे हैं, सही और पुख्ता हैं। यहाँ तक कि उनमें से बहुत से लोग उसके बारे में स्वयं प्रचार करके या प्रवचनों और विभिन्न धार्मिक कर्मकांडों का आयोजन करके इस भ्रम को और आगे फैलाने में अपना योगदान भी देते हैं।

लेकिन इन लोगों के अलावा भी लोग होते हैं, जो वास्तव में और पूरी ईमानदारी के साथ इस भ्रम पर विश्वास करते हैं। अन्य लोगों द्वारा बताई जा रही सच्ची बातों पर वे सीधे आँख मूँद लेते हैं। वाद-विवाद की स्थिति में वे कान बंद कर लेते हैं और आपकी बात मानने से सीधे इंकार कर देते हैं। ऐसी चर्चाओं से वे अपने आपको बाहर कर लेते हैं और फिर आपके प्रश्नों और तर्कों का उत्तर ही नहीं देते क्योंकि वे जानते हैं कि सिर्फ कुछ शब्दों की मदद से आप उनके झूठे पाखंडी संसार की दीवारें गिरा सकते हैं!

तो इस तरह धर्म के इस कपटपूर्ण संसार में दो तरह के लोग रह रहे होते हैं: पाखंडी, जो जानते हैं कि यह गलत है और दूसरे, जड़मूर्ख, जो अंधी भेड़ों की तरह इतना डरे हुए होते हैं कि सच से आँख मिलाने की उनकी हिम्मत ही नहीं होती। प्रथम वे, जो वास्तविकता जानते हैं कि यह गलत है और फिर भी उसी गलत राह पर चलते हैं और हर वक़्त दूसरों के सामने उस झूठ को सच की तरह पेश करते हैं। दूसरे वे, जो यथार्थ की ओर से आँखें मूँदे रहते हैं और बिना कोई प्रश्न पूछे, कि सच क्या है, इस पूरे तामझाम का अर्थ क्या है, किसी पुरोहित या गुरु के मार्गदर्शन में उसी अंधेरे रास्ते पर चलते चले जाते हैं।

अब इन दोनों में से आप क्या होना चाहते हैं?

लेकिन अपनी आँखें खोलने और देख-सुनकर ईमानदारी के साथ सच को स्वीकार करने का विकल्प भी आपके पास मौजूद है। अपने भ्रमजाल से बाहर निकलें। बाहर की ओर एक कदम आगे बढ़ाते ही इस संसार को अपने चारों ओर टूटकर बिखरता देखेंगे-एक बार सक्रिय होकर दिमाग से सोचने और अपने आपसे प्रश्न पूछने की भर ज़रूरत है!

मेरा दावा है कि अंत में आप स्वतंत्र और हल्का महसूस करेंगे, स्वयं सोचने-विचारने की शक्ति आपमें पैदा हो जाएगी।

क्या वास्तव में आप काल्पनिक संसार को वास्तविक संसार से अधिक वरीयता देते हैं? 18 सितम्बर 2014

कल मैंने कुछ कारण बताए थे कि क्यों आपको टीवी नहीं देखना चाहिए। मेरी नजर में टीवी देखना समय बिताने का इतना बुरा तरीका है कि जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। टीवी देखने के विरोध में कुछ और कारणों को सूचिबद्ध करते हुए आज मैं इस विषय का समापन करूँगा:

4) वह विज्ञापनों के हमले का ऐसा ज़रिया है, जिसके प्रभाव से आप मुक़ाबला नहीं रह सकते!

किसी भी टीवी सीरियल या टीवी पर दिखाई जाने वाली फिल्म के बीच ब्रेक लेते हुए लगातार अनेकों विज्ञापन प्रदर्शित किए जाते हैं। आप आधा घंटा भी लगातार किसी मनोरंजन का या समाचार या किसी जानकारी का या उसे समझने का लाभ नहीं उठा पाते। उन विज्ञापनों में से कुछ तो आप तक पहुँचते ही हैं और जितनी खूबसूरती, चतुराई और मक्कारी के साथ उन्हें तैयार किया गया है उसी अनुपात में वे आपके मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ते हैं और अपने लक्ष्य में सफल हो जाते हैं! आपको उन वस्तुओं के विज्ञापन इतनी बार देखने पड़ते हैं कि न सिर्फ आप उन्हें अच्छी तरह जानने लगते हैं बल्कि उन पर भरोसा भी करने लगते हैं। सिर्फ बार-बार उन्हें देखते रहने के कारण। इसी तरह ये विज्ञापन आपके अवचेतन में यह एहसास पैदा कर देते हैं कि उन चीजों का आपके पास होना बहुत ज़रूरी हैं भले ही आपके लिए वे कितनी भी अनुपयोगी क्यों न हों। कोई इलेक्ट्रोनिक सामान, खाने-पीने की वस्तुएँ या बीमा पॉलिसियाँ, कुछ भी!

सच यह है कि ये विज्ञापन बेहद असरदार होते हैं। यह अपनी बात मनवाने का, दिमाग को लुंज-पुंज करके उसमें अपनी बात स्थापित करने का बहुत ही नर्मो नाज़ुक और सूक्ष्म मगर बेहद पुरअसर तरीका है, जिसके सामने आप निरुपाय हो जाते हैं! अगर आप नहीं चाहते कि आपके साथ ऐसा हो तो टीवी बंद कर दीजिए!

5) टीवी देखकर आप काल्पनिक दुनिया में खो जाते हैं और फिर जीवन के यथार्थ आपको आवसाद से भर देते हैं!

यह मुद्दा आखिरी मगर कम महत्वपूर्ण नहीं है। इस पर मैं अधिक जोर भी नहीं दे पाऊँगा क्योंकि यह ऎसी बात है जिसे आप अक्सर समझ ही नहीं पाते, विशेषकर यदि आप बहुत ज़्यादा टीवी देखते हैं: वे टीवी सीरियल और फ़िल्में आपको इस तरह बाँध लेती हैं कि आप उसी में डूब जाते हैं, दूसरी बातों पर सोच ही नहीं पाते। वे महज किस्से-कहानियाँ होती हैं मगर इतनी अच्छी तरह पेश की जाती हैं, उनका निर्देशन इतना यथार्थवादी होता है कि नतीजतन आप इस तरह उनके मुख्य चरित्रों के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेते हैं कि उनकी भावनाएँ आपके साथ एकरूप हो जाती हैं! आप उनके साथ दुखी होते हैं, उनका सुख आपका सुख बन जाता है! सवाल यह है कि इसमें समस्या क्या है?

धीरे-धीरे वास्तविक दुनिया से आपका संपर्क कम होता जाता है। आप सोच रहे होंगे कि यह कुछ अतिवादी सोच है मगर ऐसा नहीं है! यह प्रक्रिया जो आपको काल्पनिक दुनिया में खींच ले जाती है, बहुत धीमी गति से काम करती है। इसकी शुरुआत इससे होती है कि आप कल्पना करने लग जाते हैं कि यह एक वास्तविक दुनिया है। आप रुपहले पर्दे की उस दुनिया की तुलना अपने जीवन से करते हैं तो पाते हैं कि आपकी वास्तविक दुनिया उस दुनिया से कभी भी बेहतर नहीं हो सकती!

पहली बात तो यह कि वास्तविक दुनिया कभी भी टीवी और फिल्मों की दुनिया की तरह रोमांचक, रुपहली और उत्तेजक घटनाओं से परिपूर्ण नहीं हो सकती! उसमें पूरे जीवन की कहानी दो घंटों में पेश कर दी जाती है और आपको महसूस होता है कुछ छूट रहा है! टीवी सीरियल्स में हर हफ्ते कोई न कोई मरता है, शादी करता है, किसी न किसी के साथ धोखा होता है, कोई दुर्घटना हो जाती है और बचा लिया जाता है या उसके प्रेमी के साथ उसका मिलन हो जाता है! अगर यह जीवन के बहुत करीब होगा या उससे मिलता-जुलता होगा तो वह बड़ा उबाऊ हो जाएगा और उसे देखना कोई पसंद नहीं करेगा-आखिर आप अपने जैसे किसी साधारण व्यक्ति को क्यों देखना चाहेंगे? आपने गौर किया होगा कि 'बिग ब्रदर' जैसे रियलिटी शो भी ऐसे लोगों को ही चुनते हैं जो अपने जीवन में सामान्य, साधारण लोगों से कुछ अलग होते हैं, जिससे उसे ज़्यादा से ज़्यादा 'असाधारण' और रोचक बनाया जा सके!

टीवी देखने की आदत का आखिर नतीजा क्या होता है? नतीजा यह होता है कि अपने जीवन से जिन लोगों की अयथार्थवादी और गैर मामूली उम्मीदें होती हैं वे निराश हो जाते हैं।

टीवी के पर्दे से दूर रहिए, अपने बच्चों को प्रकृति के नजदीक ले जाइए, वास्तविक दुनिया का आनंद लीजिए!

आध्यात्मिक जिज्ञासुओं के लिए फंदा: अस्तित्वहीन की खोज का अंतहीन सिलसिला – 30 जुलाई 2014

कल मैंने इस बात की ओर इशारा किया था कि गुरु और धर्म लोगों को आध्यात्मिक साधक या जिज्ञासु बनाने के ज़िम्मेदार हैं। मेरा विश्वास है कि ऐसा जानबूझकर किया जाता है- जिससे वे ज़्यादा से ज़्यादा शक्तिशाली हो सकें!

मैं आपको बता चुका हूँ कि इसे किस तरह अंजाम दिया जाता है: मान लीजिए कोई वास्तव में अपने जीवन से असंतुष्ट है। उसका परिवार, उसका काम-धंधा, उसकी आर्थिक स्थिति या उसका व्यक्तिगत अथवा यौन जीवन, कुछ न कुछ होता है जो ठीक नहीं चल रहा होता। उसे एहसास होता है कि कोई चीज़ है जो उसके पास नहीं है मगर क्या, वह समझ नहीं पाता। बेचैन होकर वह उसकी खोज में, उसे किसी भी तरह प्राप्त करने की कोशिश में लग जाता है। और जो उसे मिलता है वह होता है इस खोज में उसकी सहायता का जबरदस्त आश्वासन-आध्यात्मिक गुरुओं की ओर से, साधु-संतों और स्वामियों की ओर से और सीधे-सीधे धर्मों (धर्मग्रंथों) की ओर से!

अब यह व्यक्ति अपने आपको ‘आध्यात्मिक साधक या जिज्ञासु या अन्वेषक कहता है और समझता है कि निश्चय ही उसने कुछ न कुछ खो दिया है। उसे यह विश्वास दिलाया जाता है कि उसे उनका अनुसरण करना चाहिए जो कथित रूप से, यह जानते हैं कि उसने क्या खोया है। जो उसे रास्ता दिखा सकता है। लेकिन वह नहीं समझता कि उसकी तलाश कभी ख़त्म नहीं होने वाली है!

साधु-संत, गुरु और धर्म (धर्मग्रन्थ), ये सब यही सिखाते हैं कि कोई न कोई ऐसी रहस्यमय चीज़ मौजूद है जिसे आप नहीं समझ सकते, जज़्ब नहीं कर सकते और यह भी कि उसे आप सिर्फ उन्हीं के ज़रिए जान सकते हैं, प्राप्त कर सकते हैं। आपके पास अब यही काम रह जाता है कि उसे खोजें लेकिन आप उस पहेली को कभी भी हल नहीं कर सकते, उस भूलभुलैया से किसी भी हालत में बाहर नहीं निकल सकते।

सिर्फ आपके चलते, जो अपने आपको आध्यात्मिक साधक मानता है, उनका धंधा-पानी चल सकता है। वे तभी सफल ही सकते हैं जब आप जैसे अधिक से अधिक लोगों को अपने साथ जोड़ सकें। उन्हें इस विश्वास का भुलावा देकर कि वे आपको कुछ दे सकते हैं, कि वे आपको सुख-शांति की ओर ले जाने वाला सही रास्ता दिखा सकते हैं। वास्तव में वे चाहते ही नहीं हैं कि आप उस चीज़ को पा सकें, जिसकी खोज में आप लगे हुए हैं। इसलिए आप एक तरह की माया, मृगतृष्णा के पीछे भागते रह जाते हैं। एक प्रायोजित अयथार्थ, असार, बनावटी चीज़ के पीछे। परमानंद के मायाजाल के पीछे, जिसका वास्तविक आनंद से कोई संबंध नहीं है।

आपका दुख और अवसाद ईश्वर के खो जाने से नहीं है। आप उनके द्वारा प्रस्तावित और प्रदान की गई काल्पनिक चीजों से कभी भी संतुष्ट नहीं हो सकते। क्योंकि आप अपने भौतिक जीवन की किसी बात से नाखुश हैं। आप प्रेम खो बैठे हैं, या सम्मान या प्रशंसा, रुपया-पैसा या सफलता, किसी दोस्त या भावनात्मक सहारे को खो बैठे हैं।

इसका संबंध किसी न किसी सांसारिक कमी से है-और इसमें मैं प्रेम को भी शामिल करता हूँ-जिसने आपको इस खोज की ओर प्रवृत्त किया है। और एक बार फिर मैं यह बात दोहराता हूँ: खोजना बंद करें और आपको मिलेगा। ऐसे किसी व्यक्ति के चंगुल में न फँसें, जिसका धंधा ही आध्यात्मिक जिज्ञासुओं को उनकी समस्याओं के मायावी और काल्पनिक समाधान की ओर उद्यत करना है!

महज भ्रम बनाए रखने के लिए दुखद सम्बन्ध को न ढोएँ – 16 जून 2014

मैंने पिछले हफ्ते लिखा था कि छोटी-छोटी समस्याओं को लेकर अपने साथी के साथ संबंध विच्छेद नहीं किया जाना चाहिए बल्कि कोशिश करनी चाहिए कि किसी तरह संबंध बने रहें: कुछ चीजों को स्वीकार करके और प्रेम में निराश होने की जगह प्रेम पैदा करके। लेकिन कुछ लोग इस कोशिश को कुछ ज़्यादा ही खींच देते हैं। अपने सम्बन्धों में प्रसन्न नहीं रहते बल्कि यह स्वीकार कर लेते हैं कि उनके भाग्य में प्रेम लिखा ही नहीं है और जीवन में उन्हें कभी प्रसन्नता प्राप्त नहीं होगी। मेरे विचार में यह भी एक गलत बात है।

मैंने ज़िक्र किया था कि बार-बार साथी बदलने की घटनाएँ पश्चिम में अधिक होती हैं, जहां लोग डेटिंग पर जाते हैं और आशा करते हैं कि वे अपने लिए कोई न कोई ‘मिस्टर या मिसेज़ राइट’ ढूंढ़ने में कामयाब हो जाएंगे। आजकल यह तथ्य भारत में भी अक्सर देखने में आने लगा है, जहां वैसे तो आयोजित विवाहों के बाद दंपति सोचते हैं कि चाहे कुछ भी हो जाए, अब उनके सामने सारा जीवन एक-दूसरे के साथ गुजारने के सिवा कोई चारा नहीं है। लेकिन यह बात मैंने पश्चिम में भी देखी है, विशेषकर पुरानी पीढ़ी के लोगों में, जो आज भी पुराने मूल्यों और पुरानी परम्पराओं से जकड़े हुए हैं और सोचते हैं कि कामचलाऊ सम्बन्धों की मौजूदगी का भ्रम बनाए रखना खुश रहने से ज़्यादा महत्वपूर्ण है!

इस भ्रम, इस नाटक-नौटंकी में मुझे कई बार बड़ा पाखंड नज़र आ जाता है। इसके लिए आप कितनी बड़ी कीमत चुकाते हैं: आप अपनी खुशी, स्वतन्त्रता सब इन परम्पराओं और समाज तथा आपके आसपास मौजूद लोगों की इच्छा की बलिवेदी पर न्योछावर कर देते हैं। आप स्वीकार कर लेते हैं कि आप नाखुश हैं, फिर उसका दोष अपने साथी पर मढ़ते हैं और जब भी घर पर होते हैं, आपस में लड़कर आनंद प्राप्त करते हैं। जब बाहर होते हैं तब आपकी मुस्कुराहटें और हंसी बनावटी होती है।

विशेष रूप से भारत जैसे देश की संस्कृतियों में, जहां तलाक स्वीकार्य नहीं है, लोग यह कदम उठाते हुए डरते हैं। रमोना और मैं अक्सर आपस में मज़ाक किया करते हैं, “अब तो हमारे एक बच्चा भी हो गया है, और अब तो हम एक-दूसरे को छोड़ ही नहीं सकते!” लेकिन यह एक कड़ुवी सच्चाई है, खासकर बच्चा हो जाने के बाद चाहे वे आपस में कितना भी लड़े-झगड़ें, कितना भी दुखी हों, पति-पत्नी साथ रहना ही ठीक समझते हैं।

जैसा कि मैंने पिछले हफ्ते कहा था, यह आपके बच्चों के लिए किसी भी तरह से अच्छा नहीं है! वे इससे क्या सीखेंगे? दूसरों के सामने झूठी मुस्कुराहटें जब कि आप परिवार के साथ होने पर एक-दूसरे पर चीखते-चिल्लाते रहते हैं, लड़ते-झगड़ते हैं! बच्चे इससे यह सीखते हैं कि उन्हें सच्चा व्यक्ति नहीं होना चाहिए, यह सीखेंगे कि वैवाहिक जीवन में सारा जीवन दुख ही उठाने पड़ते हैं।

और आप अपने करीबी लोगों को मूर्ख नहीं बना सकते! वे जानते है कि आप दुखी हैं। आपके बच्चे आपकी लड़ाइयाँ देखते हैं, आपके अभिभावक आपका एक-दूसरे पर चीखना-चिल्लाना सुनते हैं या उनके बारे में सुनते हैं, आपके सहोदर देखते हैं कि आपमें परिवर्तन हो रहा है, आप अब उतने खुले मन से बात नहीं करते। वे सभी दुखी होते हैं लेकिन आपकी मदद कौन कर सकता है? कोई नहीं कर सकता क्योंकि आप खुद दुखी रहने पर आमादा हैं!

चलिए, आगे बढ़िए और अपने बेकार के संबंध से छुटकारा पाइए, अपनी वास्तविक प्रसन्नता को पाने की कोशिश कीजिए और अंततः उसे प्राप्त करके रहिए! तब आपके बच्चों तक सही संदेश जाएगा: अगर आप एक सच्चा और सुखी जीवन जीना चाहते हैं तो उसके लिए प्रयास करना पड़ता है, अपने जीवन में परिवर्तन लाना पड़ता है! खुद के साथ सच्चे बनकर जियें। यह न देखें कि इस विषय में समाज क्या कहता है! खुश रहने के लिए कुछ न कुछ करते रहें!

कभी ईश्वर का अनुभव नहीं किया? कोई बात नहीं, ऐसे आप अकेले नहीं हैं! – 6 जून 2013

हम लोग अभी ल्युनेबर्ग में माइकल, अन्द्रेया और राफाइल के साथ उनके घर पर ठहरे हैं। मैं यहाँ इतनी बार आया हूँ, इतना खुशगवार समय यहाँ बिताया है कि पुनः यहाँ आकर मन गदगद हो गया। हमेशा की तरह इस बार भी माइकल और मैं उसके मरीजों का काम देख रहे हैं। उनमें से एक मरीज के साथ कल बड़ी मज़ेदार बातचीत हुई।

मैं कौन हूँ आदि परिचय की औपचारिकताओं के बाद माइकल के मरीज ने मुझसे पूछा: "क्या आप ईश्वर पर विश्वास करते हैं?" मैंने कहा, "नहीं, अब नहीं करता।" स्वाभाविक ही अगला प्रश्न था, "क्यों नहीं?" और मेरा सीधा-सादा जवाब था: "क्योंकि मुझे उसकी अनुभूति नहीं होती।"

यह सच है, मुझे ईश्वर का कोई अनुभव नहीं हुआ है और दूसरों का अनुभव मेरे किसी काम का नहीं है। अगर मैं कहीं यह पढ़ लूँ कि ईसा मसीह ने ईश्वर से बात की या मोहम्मद पैगंबर ने ईश्वर का अनुभव किया या सूरदास या तुलसीदास को ईश्वर की अनुभूति हुई तो सिर्फ पढ़कर मैं ईश्वर पर विश्वास क्यों और कैसे करने लगूँ। यहाँ तक कि मेरा दोस्त भी कहे कि उसने ईश्वर का कई बार अनुभव किया है तो भी मैं यह नहीं कह सकता कि मैं ईश्वर पर विश्वास करता हूँ- जब तक कि मैं खुद उसका अनुभव नहीं कर लेता! अगर आप डर रहे हैं तो यह ज़रूरी नहीं कि मैं भी डर जाऊँ। अगर आप भोजन करते हैं तो मेरा पेट नहीं भरता। इसी तरह सिर्फ इसलिए कि आप ईश्वर पर विश्वास करते हैं मैं भी ईश्वर पर विश्वास करूँ यह मुझे मंजूर नहीं!

यहाँ हम इस बात पर बहस नहीं कर रहे हैं कि ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं बल्कि इस बात पर कर रहे हैं कि ईश्वर का अनुभव हुआ या नहीं हुआ। अगर उसका अस्तित्व हो भी, तो मैंने तो उसका अनुभव नहीं किया और जब तक मुझे उसका अनुभव नहीं होता, मैं यह दावा करता रहूँगा कि जो आपने अनुभव किया और विश्वास किया कि वह ईश्वर ही था, महज आपका भ्रम है।

जी हाँ, मुझे लगता है कि धर्म ने ऐसा माहौल बना दिया है कि जब भी लोग किसी बात को समझ नहीं पाते, ईश्वर के अनुभव की बात करते हैं। धर्म ईश्वर की एक छवि निर्मित करता है, एक चित्र; और लोगों को बताता है कि किन परिस्थितियों में वे उसका अनुभव कर सकते हैं। वे पहले ही बता देते हैं कि यहाँ-यहाँ और ऐसे आपको ईश्वर का अनुभव होगा और इसलिए इस बात पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि लोग अक्सर ईश्वर का अनुभव करते हैं। जब आप इन सुझावों के घेरे से बाहर निकलेंगे तब आपको भी वही अहसास हो सकेगा जो मुझे होता है: अर्थात, आपने जो अनुभव किया वह ईश्वर नहीं था भले ही धर्म कह रहा है कि आपने ईश्वर का ही अनुभव किया है।

बहुत से लोग कहते हैं कि जब आपका कोई करीबी मृत्यु को प्राप्त होता है तब आप ईश्वर का अनुभव कर सकते हैं। जब छह माह पहले मेरी माँ का देहांत हुआ, मैं उसके पास ही था। मैंने यह अनुभव किया कि कैसे उसके प्राण उसके शरीर से बाहर निकल रहे थे, कैसे उसके अवयव भारी पड़ते जा रहे थे और कैसे उसका श्वास रुक गया। मैं वहीं था मगर मैंने ऐसा कुछ अनुभव नहीं किया कि ईश्वर उसकी आत्मा को उठाकर ले जा रहे हों, मैंने किसी फरिश्ते को नीचे उतरते नहीं देखा और न ही मैंने किसी छोटे प्रकाश पुंज को किसी विशाल प्रकाशपुंज में विलीन होते देखा। मैं पूरी रात उसके साथ था और उसके दाह संस्कार होने तक उसके साथ बना रहा मगर मुझे कोई ईश्वरीय अनुभूति नहीं हुई।

हो सकता है मेरे आसपास के कुछ लोगों ने अनुभव किया हो। हमारे कर्मचारियों में से कुछ धार्मिक लोगों ने या सबेरे से शोक प्रदर्शित करने आए लोगों में से किसी ने ऐसा कुछ ईश्वरीय अनुभव किया हो। अगर कोई ईश्वर का अनुभव करता है तो भी वह सिर्फ उसका अपना निजी अनुभव ही हो सकता है।

पर मेरी नज़र में वह उसका भ्रम भी हो सकता है, उसके दिमाग की उपज। उसके मस्तिष्क में दूसरों के अनुभवों की बहुत सी जानकारियाँ भरी होंगी कि ऐसे समय में कैसा अनुभव होता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वह जो अनुभव कर रहा है वह यथार्थ है। कोई नशेड़ी भी ऐसा ही अनुभव कर सकता है। वह फरिश्तों को देखता है, लोगों के और दूसरी चीजों के प्रभामंडल देखता है, यहाँ तक कि वह भी ईश्वर से संवाद कर सकता है। उसके बारे में आप कहेंगे कि वह नशे में है और उसके अनुभव वास्तविक नहीं हैं। आपके बारे में मैं यही कह सकता हूँ-आपकी भावप्रवणता ने, भावुकता ने आपको नशे की हालत में पहुंचा दिया है और आपका अनुभव वास्तविक नहीं है।

यही कारण है कि मैं ईश्वर पर विश्वास नहीं करता। मैं प्रेम में विश्वास करता हूँ क्योंकि मैंने अनुभव किया है कि कैसे प्रेम बड़े से बड़े, महत्वपूर्ण काम सम्पन्न कर सकता है। मैं महसूस करता हूँ कि प्रेम से ही सभी काम आगे बढ़ते हैं। शायद, जो आपके लिए ईश्वर है वही मेरे लिए प्रेम है। मैं उसका अनुभव करता हूँ और कहता हूँ कि वह मेरे लिए यथार्थ है- और जो कुछ भी आप अनुभव करते हैं वह आपके लिए यथार्थ है!