चिंता, अवसाद और निष्क्रियता के लिए एक नास्तिक और भूतपूर्व गुरु के द्वारा बताई ध्यान की इस विधि का प्रयोग करें – 15 अक्टूबर 2015

आजकल बहुत से लोगों के साथ अवसाद, थकान और निष्क्रियता तथा चिंताग्रस्त होने की समस्या जुड़ी होती है। दैनिक जीवन में पेश आने वाले तनावों और श्रम के चलते वे शिथिल और थके हुए लगते हैं। मैं ऐसे बहुत से लोगों से मिल चुका हूँ, कई लोगों के साथ समय गुज़ारा है और अपने सलाह-सत्रों में बातचीत की है। मैंने उनके साथ ध्यान किया है और आज मैं उन लोगों के लिए, जो ऐसी परिस्थितियों से दो-चार होते रहते हैं, एक संक्षिप्त सलाह-सूची प्रस्तुत करना चाहता हूँ। सम्भव है, आपको आज का मेरा ब्लॉग थोड़ा सा अजीब लगे और आम तौर पर यहाँ मैं जैसा लिखता हूँ, उसके विपरीत नज़र आए। मैं खुद यह जानता हूँ कि कुछ ही समय पहले मैंने लिखा था कि ध्यान और योग के लिए किसी सहायता की ज़रूरत नहीं है-लेकिन मैं यह भी जानता हूँ कि इससे बहुत से लोगों को काफी लाभ प्राप्त हुआ है! और यह पाठकों को भी लाभ पहुँचाएगा!

अगर आपको लग रहा है कि आसमान फट पड़ा है और अब कुछ नहीं हो सकता तो ये चंद पंक्तियाँ आपके ही लिए हैं: अगर आपको लग रहा है कि आप अकेले हैं, अगर आपको लग रहा है कि जीवन में अब कुछ भी अच्छा नहीं होगा।

सर्वप्रथम तसल्ली रखें। सबसे पहले शरीर को विश्रांति प्रदान करें-उसके पीछे-पीछे मस्तिष्क भी शांत हो जाएगा। अच्छी, आरामदेह कुर्सी पर बैठें या दीवार से पीठ लगाकर ज़मीन पर आराम से बैठ जाएँ और गहरी साँस लें। अगर आपको ठीक लगता हो तो आँखें बंद करें अन्यथा अपने आसपास की किसी छोटी वस्तु पर मन को एकाग्र करें-कोई बटन, फूल या पर्दे पर बनी कोई आकृति आदि पर। अपनी साँस पर मन को एकाग्र करते हुए गिनती गिनें-साँस भीतर लेते हुए तीन और बाहर छोड़ते हुए पाँच तक गिनें। दिल की धड़कन को धीमा होने दें।

अब हम एक के बाद दूसरी मांसपेशी को विश्रांति देंगे, मतलब कि अपना ध्यान वहां ले जाकर उसे तनाव रहित करके उसे शिथिल करेंगे। शुरुआत पैर की उँगलियों से करें। उन मज्जा-तंत्रिकाओं के विषय में सोचें, जो पैर के पंजों के अंतिम सिरे तक पहुँचती हैं। उसके बाद धीरे-धीरे, पूरा समय लेते हुए क्रमशः पैर के पंजे, टखने, फिर पैरों के ऊपरी हिस्से तक आइए। पूरी तरह चैतन्य रहते हुए हर अवयव को महसूस कीजिए। जब भी किसी विशेष स्थिति में आप दर्द महसूस करें तो उसे याद रखिए लेकिन विचारों को आगे बढ़ने दीजिए, वहीं स्थिर मत होइए। ऊपर बढ़ते हुए कूल्हों तक आइए, उसके बाद पेट और पीठ से होते हुए कंधों तक पहुँचिए। यहाँ आकर अपनी मांसपेशियों को आराम देने की प्रक्रिया शुरू कीजिए-पूरी गरदन से होते हुए बाँहों पर आइए और आगे बढ़ते हुए उँगलियों तक जाने दीजिए। यहाँ हर ऊँगली पर हल्के से रुककर सोचिए और महसूस कीजिए कि कैसे तनाव आपका शरीर छोड़कर बाहर निकल रहा है।

एक बार यहाँ पहुँचने के बाद समझिए कि आप काफी दूर आ गए हैं और तब आप नोटिस भी करेंगे कि आप अब काफी शांत और तनावमुक्त महसूस कर रहे हैं। अब मन में पूरी चैतन्यता में सोचते हुए इन बातों को समझने का प्रयास कीजिए:

कुछ भी हो जाए, जीवन इसी तरह चलता रहेगा। मैं साँस ले रहा हूँ, मैं ज़िंदा हूँ।

आप अकेले नहीं हैं। भले ही आपके बहुत से साथियों-रिश्तेदारों ने आपका साथ छोड़ दिया हो, दुनिया में बहुत से ऐसे लोग भी मौजूद हैं जो आपकी मदद कर सकते हैं। और ऐसे लोग भी हैं, जो आपकी परवाह करते हैं!

आपमें शक्ति है। आप यहाँ तक पहुँच गए हैं तो और भी आगे बढ़ेंगे।

अंधियारे में आपको अपने चारों तरफ रोशनी नज़र आ रही है। जब आप खुद को शक्तिशाली महसूस करने लगें तो उठ खड़े हों और उसे पाने की कोशिश करें। क्या अब भी आप अकेलापन महसूस कर रहे हैं? किसी को बुलाइए, जो आपकी मदद कर सके-कोई दोस्त, कोई रिश्तेदार, कोई चिकित्सक या कोई हॉटलाइन भी! अगर किसी की मदद की ज़रूरत महसूस करें तो उसे प्राप्त करने में संकोच न करें!

सबसे मुख्य बात यह कि कभी पीछे मुड़कर न देखें और अपने आपको अपराधी न समझे और न खुद पर शर्म करें। जीवन में ऐसे क्षण या ऐसी कालावधि का आना कोई अनहोनी बात नहीं है। हम उनके साथ विकास करते रह सकते हैं। हम पहले से और अधिक मज़बूत होकर निकलेंगे!

ध्यान – मस्तिष्क को नियंत्रित करने का फर्जी तरीका – 13 अप्रैल 2015

आज मैं एक ऐसे विषय पर लिखने जा रहा हूँ जिस पर चाहे जितनी बार बोलूँ या लिखूँ, वह मुझे हमेशा प्रिय और महत्वपूर्ण लगता है: ध्यान। ध्यान और ध्यान के विभिन्न प्रकार, जिनका विभिन्न गुरु प्रचार करते रहते हैं और सामान्य लोग उस पर अधिकार पाने के लिए कड़ा संघर्ष करते हैं। और यहीं पर मैं अपने मुख्य बिंदु पर आता हूँ: ध्यान को कभी भी संघर्ष नहीं होना चाहिए!

यह सच है, बहुत से लोगों के लिए वह सिर्फ इतना ही है: अपने ही मस्तिष्क के साथ युद्ध! योगाभ्यास के आसन पर बैठने का पहला उद्देश्य तो विश्रांति और शारीरिक तनाव से मुक्ति ही होता है मगर अकसर इस मंसूबे का निष्पादन उस तरह नहीं होता, जिस तरह होना चाहिए। इसका कारण यह है कि वे सोचते हैं-या उन्हें विख्यात योग गुरुओं या ध्यान-मार्गदर्शकों द्वारा बताया जाता है-कि उनका लक्ष्य विचार-शून्यता (सोचना बंद कर देना) होना चाहिए।

लेकिन होता यह है कि वे आसन बिछाकर बैठ जाते हैं और उनका मस्तिष्क दुनिया भर की बातें सोचने लगता है, हर तरफ दौड़ने लगता है और सब कुछ करता है सिर्फ उनके पास रहकर उस क्षण पर एकाग्र नहीं हो पाता। उनके दिमाग में हजारों तरह के खयाल आते हैं, वे मन ही मन दूरस्थ देशों की यात्रा करने लगते हैं और फिर अचानक उन्हें एहसास होता है कि: "अरे, यह क्या? मुझे यहाँ होना चाहिए, इस पल में, इस चटाई पर"! वे अपने मस्तिष्क पर कुपित होते हैं, हताश, हतोत्साहित होते हैं कि वे उसे इस पल पर केन्द्रित नहीं रख सके और फिर दुखी और परेशान हो उठते हैं।

अगली बार जब वे ध्यान लगाने बैठते हैं तो जैसे किसी से युद्ध करने निकले हों। ध्यान लगाने का कुशन या चटाई युद्धभूमि बन जाती है। वे अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित युद्धभूमि में उतरते हैं: अगरबत्तियाँ, शांतिदायक संगीत और शायद साँस लेने और ध्यान लगाने की हिदायतों वाली सीडियाँ! वे युद्ध के लिए सन्नद्ध हैं!

भीषण युद्ध है यह। दुश्मन ताकतवर है, दिमागी लड़ाई में कभी-कभी गलत तरीके भी इस्तेमाल किए जाते हैं मगर अक्सर विजय मस्तिष्क की ही होती है!

इस तरह आप अपने दिमाग को पालतू नहीं बना सकते। क्वचित आपको लगेगा कि आपने उसे साध लिया है लेकिन अगली बार कोशिश करने पर आपको पता चलेगा कि आप ऐसा नहीं कर पाए हैं। लेकिन मैं आपको एक अलग, आसान सा तरीका बताता हूँ: अपने दिमाग को खुला छोड़ दीजिए, मुक्त कर दीजिए!

आपको संघर्ष करने की या युद्ध करने की ज़रुरत नहीं है! आपकी रोज़मर्रा ज़िंदगी में पर्याप्त संघर्ष है और इसीलिए तो आप शरीर और मस्तिष्क की विश्रांति के लिए ध्यान का सहारा लेना चाहते हैं! तो फिर उसे आराम करने दें! आपका लक्ष्य होना चाहिए कि आप वर्त्तमान में रहें-लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि आपको चटाई पर बैठकर पद्मासन लगाना ज़रूरी ही है!

हाँ, आप जो चाहें करते हुए ध्यान कर सकते हैं, सबेरे घूमते हुए, तैरते हुए, पढ़ते हुए, पेंटिंग करते हुए, यहाँ तक कि अपना कोई काम निपटाते हुए। बस, जो भी कर रहे हैं, उसमें अपने आप को पूरे मन से संलग्न कर लें। बहुत से काम एक साथ न करें, कोई एक काम करते हुए सैकड़ों दूसरे कामों के बारे में न सोचें कि यह भी करना है और वह भी करना है, बल्कि अपने पूरे अस्तित्व के साथ जो उस पल कर रहे हैं, उसके साथ संलग्न कर लें। अगर आप पेंटिंग कर रहे हैं तो सिर्फ रंगों के बारे में सोचें, सबेरे घूमने निकले हैं तो हवा में मौजूद खुशबुओं को महसूस कीजिए, गहरी साँस लीजिए, अपने शरीर में लीन रहिए, अगर कोई सामान्य सा काम भी कर रहे हैं तो उस काम में पूरी तरह संलग्न रहें। यही वास्तविक ध्यान है-जब आपको हर क्षण सिर्फ यह पता होता है कि आप क्या कर रहे हैं, चाहे वह कोई भी काम हो!

अगर आप मस्तिष्क के साथ लगातार युद्ध की तैयारी में लगे रहेंगे तो वह कभी भी विश्रांति प्राप्त नहीं कर पाएगा! अपने मस्तिष्क के साथ शांति कायम करें और आप देखेंगे कि आपका मस्तिष्क भी शांत हो रहा है, उसे विश्रांति प्राप्त हो रही है! लड़ें नहीं-उसे खुला छोड़ दें, आज़ाद कर दें!

एक-दूसरे के प्रति दिमाग खुला रखना – मैं और मेरी पत्नी किस तरह एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं – 19 मार्च 2015

दूसरों को अपने दिमाग में प्रवेश की इजाज़त देने के खतरों के बारे में कल मैंने लिखा था। लेकिन दूसरी ओर यह स्वाभाविक ही है कि आप दूसरों को इतना करीब आने दें कि वे आपके दिमाग को और आपके जीवन को प्रभावित कर सकें और यह एक भरपूर ज़िन्दगी के लिए ज़रूरी भी है। हालाँकि इसमें इस बात का खतरा हो सकता है कि कोई गलत व्यक्ति आपको प्रभावित करने लगे लेकिन जीवन के सबसे सुखद और सुन्दर प्रभाव के परस्पर आदान-प्रदान की संभावना भी हर वक़्त बनी रहती है: अपने साथी, जीवन-साथी या मनचाहे व्यक्ति के साथ प्रेम की सम्भावना।

जब आप प्रेम में होते हैं, किसी के साथ स्नेह-संबंध में बंधे होते हैं तो आप अपना सब कुछ अपने साथी के सम्मुख खोलकर रख देते हैं। अगर आप एक स्वस्थ, खरा और प्रगाढ़ संबंध बनाए रखना चाहते हैं तो यह आवश्यक है कि आपका साथी आपको जाने, आपके सोचने-समझने के तौर-तरीकों को समझे, आपकी दुनिया में प्रवेश करके उसे देखे-भाले और उसके हर पहलू को अच्छी तरह जान-समझ ले। आप क्या कल्पनाएँ करते हैं, कौन सी बातें आपको उत्प्रेरित करती है और विभिन्न परिस्थितियों में आप क्यों एक विशेष प्रकार का व्यवहार करते हैं। इसी तरह दोनों के बीच प्रगाढ़ संबंध विकसित हो सकता है।

यह प्रक्रिया समय मांगती है और न सिर्फ आपका साथी आपके सामने खुलता है बल्कि आप भी उसके समक्ष प्रत्यक्ष होते हो। आप उसके दिलोदिमाग की अच्छाइयों और बुराइयों को जानने-समझने लगते हैं और अपने अँधेरे कोनों को उसके सामने प्रदर्शित करने में आपको भी डर नहीं लगता। एक-दूसरे को व्यक्त करने की यह यात्रा आप दोनों साथ चलते हुए पूरी करते हैं और इसलिए जहाँ आप अपने साथी से सहज ही प्रभावित होने लगते हैं वहीं आप भी उसे प्रभावित करते चलते हैं।

आदर्श स्थिति यह होगी कि दोनों एक दूसरे की अच्छी बातों को ग्रहण करें, अपनी कमज़ोरियों को समझें और स्वीकार करें। आप अपने साथी से उन बातों को सीख सकते हैं, जिन्हें आप अच्छा समझते हैं और उन्हें अपने जीवन में उतार सकते हैं! अंततः आप विकास की एक नई राह पर एक साथ निकल पड़ते हैं!

मैं अपने अनुभव के बल पर आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि दरअसल आप अपने जीवन की सबसे सुंदर, रोमांचक और शानदार यात्रा पर निकल पड़े हैं!

इस राह पर रमोना और मैंने साथ रहते हुए आठ साल बिताए हैं और हमें पता नहीं, कितने भिन्न-भिन्न तरीकों से हमने एक-दूसरे को प्रभावित किया होगा! हम बिल्कुल भिन्न संस्कृतियों से आए थे, अलग-अलग भाषाएँ बोलते थे और सर्वप्रथम हमारा वार्तालाप एक ऐसी भाषा में हुआ करता था, जो न तो मेरी मातृभाषा थी न उसकी। फिर एक-दूसरे की भाषा सीखी, दोनों एक-दूसरे को भीतर तक अच्छी तरह से जान चुके हैं और साथ रहते हुए न सिर्फ एक दूसरे को बदल रहे हैं बल्कि बाहर से आने वाले प्रभावों का मुक़ाबला करते हुए एक साथ बदलने या न बदलने का निर्णय करते हैं। हम दोनों ने एक साथ विकास किया है। बहुत अधिक विकास किया है।

यह बताना मुश्किल है कि ठीक किस तरह से रमोना ने मेरे मस्तिष्क को प्रभावित किया है लेकिन किया है और बहुत अधिक प्रभावित किया है, यह सही है। मैं अपने साथी के सामने अपना दिल खोलकर रख सका और वह मेरे सामने। हमारे बीच कोई उलझन नहीं हैं, हमारा कोई पहलू एक-दूसरे से छिपा नहीं है। और इसीलिए हमें अपने संबंध पर गर्व है।

स्वाभाविक ही इन बातों को हम कुछ खास दिनों में कुछ खास तरह से याद करते हैं-जैसे आज, जब रमोना का जन्मदिन है। पहली बार आठ साल पहले मैंने उसे जन्मदिन की शुभकामनाएँ भेजी थीं। पीछे मुड़कर देखने पर पता चलता है कि दोनों ही इस दर्मियान कितना अधिक बदल चुके हैं-दोनों साथ-साथ और दोनों एक-दूसरे को बदलते हुए। और मैं आशा करता हूँ कि आने वाले वर्षों में हम और भी अधिक बदलेंगे, दोनों एक-दूसरे को और एक साथ दोनों!

जन्मदिन मुबारक हो, रमोना!

अपने दिमाग के दरवाजे दूसरों के लिए खुले छोड़ देने के खतरे – 18 मार्च 2015

यथार्थ से कोसों दूर, काल्पनिक दुनिया के निर्माण के चलते पेश आने वाले मानसिक और शारीरिक खतरों के विषय में कल मैंने लिखा था। इसके एक और खतरे की चर्चा मैंने अब तक नहीं की थी, जिसके बारे में कुछ और विस्तार से लिखने की आवश्यकता है: किसी को जब आप अपनी कल्पनाओं, आस्थाओं और इस तरह प्रकारांतर से आपकी दुनिया को भी प्रभावित करने की छूट दे देते हैं-और फिर वह उसका अनुचित लाभ उठाने लगता है!

अगर आपने परसों की यानी दिनांक 16 मार्च की मेरी टिप्पणी को ध्यान से पढ़ा होगा, जिसमें मैंने बताया था कि कैसे आप अपनी काल्पनिक निजी दुनिया निर्मित कर लेते हैं, तो आप समझ सकेंगे कि इससे मेरा क्या अभिप्राय है। साधारणतया हम अपने विचारों और कल्पनाओं के अनुसार व्यवहार करते हैं और जब हम कुछ आस्थाओं पर विश्वास करने का मन बना लेते हैं तो वे आपका यथार्थ बन जाती हैं। अब इस बात की कल्पना कीजिए कि कोई आपके विचारों को अपने पक्ष में प्रभावित कर रहा है! वह आपके उस यथार्थ को, आपकी उस दुनिया को भी प्रभावित और परिवर्तित कर रहा होगा जिसे आप अपने लिए निर्मित कर रहे हैं!

इस तरह आपको प्रभावित करने वाले बहुत से अलग-अलग व्यक्ति हो सकते हैं। इसकी शुरुआत अभिभावकों के साथ होती है और इसी कारण उनकी ज़िम्मेदारी भी बहुत बढ़ जाती है: सबसे कोमल और आसानी से प्रभावित हो सकने वाले दिमागों तक उनकी पहुँच होती है और उन्हें गढ़ने और जीवन के लिए तैयार करने की ज़िम्मेदारी उन पर आयद होती है। वे एक संसार का निर्माण करते हैं। आपका परिवार, फिर शिक्षक, दोस्त और उसके बाद बहुत से दूसरे लोग, जिन पर आप भरोसा करते हैं या जिन्हें आप विशेषज्ञ या अधिकारी समझते हैं, जिनके विचारों को आप पसंद करते हैं। इनमें विभिन्न धार्मिक, आध्यात्मिक और यहाँ तक कि राजनैतिक नेता भी शामिल होते हैं।

एक जिम्मेदार व्यक्ति उन लोगों का खयाल रखता है, जिन्हें वह प्रभावित कर सकता है। स्वाभाविक ही, इस शक्ति का दुरुपयोग भी किया जा सकता है-और शायद आप उन हजारों प्रकरणों के बारे में जानते होंगे जहाँ गुरुओं, धार्मिक नेताओं और विभिन्न संप्रदायों के मुखियाओं ने ठीक यही किया: वे अपने प्रभाव का इस्तेमाल लोगों की भलाई के लिए नहीं बल्कि उन्हें अपनी आज्ञा का शब्दशः पालन करने, उन्हें अपने कहे अनुसार करने हेतु बाध्य करने में किया। उन पर प्रभुत्व स्थापित करके और छल-प्रपंच से इस तरह उनका इस्तेमाल किया कि सिवा उस नेता के किसी और का उससे कोई लाभ नहीं हो सकता था। उनका जबर्दस्ती मत परिवर्तन किया गया, उन्हें असंगत विचारों और कल्पनाओं की घुट्टी पिलाई गई, उनके साथ छल करके उन्हें एक दूसरी दुनिया में ले जाकर स्थापित कर दिया गया जो किसी अन्य व्यक्ति के द्वारा निर्मित, नियंत्रित और संचालित थी।

नतीजा: जितनी बड़ी संख्या में लोग उनके प्रभाव में आते जाते हैं, उतना ही ये गुरु, संप्रदाय और संगठन अमीर होते जाते हैं। ये अनुयायी, अंधी भेड़ों की तरह उसी दुनिया में रहने लगते हैं, उनके आदेशों का पालन करते हैं और यहाँ तक कि खुद अपने सालों के संबंधों को तोड़ लेते हैं, मित्रता छोड़ देते हैं, यहाँ तक कि परिवार का परित्याग कर देते हैं। बहुत से लोग सालों उन धूर्तों के जाल में फँसे रहते हैं। कभी-कभी जीवन भर के लिए।

कुछ लोगों को एक सीमा के बाद अचानक शक होने लगता है। जैसे-जैसे शक बढ़ता जाता है, वे खुद अपने दिमाग से सोचने की ओर अग्रसर होते हैं। यह उन्हें बहुत कठिन और खतरनाक लगता है, एक तरह से वे एक लंबे अर्से बाद खुद अपने पैरों पर खड़े हो रहे होते हैं, धीरे-धीरे खुद चलना सीख रहे होते हैं! निश्चित ही यह परिवर्तन उनकी उस दुनिया को तहस-नहस कर देता है, जिसे उन्होंने खुद गढ़ा होता है और इतने सालों में जिसके वे आदी हो चुके होते हैं। जिस गुरु का वे इतना सम्मान करते थे, जिससे इतना प्यार करते थे, वह अचानक उनका दुश्मन हो जाता है और उसके साथ उनके वे सारे मित्र भी, जो उस गुरु के कारण इतने सालों से उनके मित्र बने हुए थे।

तो, अगर कोई व्यक्ति आपकी रचना-प्रक्रिया को समझ ले या उसमें प्रवेश पा ले तो वह आपके मस्तिष्क को नियंत्रित भी कर सकता है। लेकिन यह तभी संभव है जब आप उसे प्रवेश करने दें! इसलिए अगर किसी को अपने इतना नजदीक आने दे रहे हैं तो बहुत सतर्क रहें-और जब आपको लगे कि वह आपके द्वारा प्रदत्त इस सुविधा का गलत लाभ उठा रहा है या उसका इस्तेमाल ज़िम्मेदारी के साथ नहीं कर रहा है तो उसका प्रवेश वर्जित कर दें!

सतर्क रहें और अपना ध्यान रखें!

यथार्थ से कोसों दूर अपने निजी यथार्थ का निर्माण – 17 मार्च 2015

कल मैंने आपको कल्पना और विश्वास की शक्ति के बारे में बताया था कि कैसे आप उसके प्रभाव में अपना एक निजी विश्व निर्मित कर लेते हैं और कैसे आपके आसपास के दूसरे लोग भी ऐसा ही कर रहे होते हैं। इसकी पूरी संभावना होती है कि आपकी यह फंतासी आपके लिए कोई निजी यथार्थ निर्मित कर दे लेकिन उसके साथ एक बड़ा खतरा भी होता है: उस यथार्थ के साथ आप एक सीमा तक ही चल सकते हैं अन्यथा, उस सीमा का अतिक्रमण करने के पश्चात आपको नुकसान पहुँच सकता है, आप बीमार पड़ सकते हैं, यहाँ तक कि आप चारों ओर से मानसिक द्वंद्व में घिर सकते हैं।

दुर्भाग्य से अध्यात्मवादी और धार्मिक दोनों तरह के लोगों के साथ ऐसा होते मैंने कई बार देखा है। वे अपनी एक निजी दुनिया बना लेते हैं, लेकिन ऐसी कल्पनाओं की सहायता से, जो भौतिकी के नैसर्गिक नियमों का पालन नहीं करते। वे वायवी दुनिया में रहते हैं और अक्सर यह नहीं जानते कि उनकी आस्था यथार्थ नहीं है, वह गलत या झूठ सिद्ध हो चुकी है। वे अपनी दुनिया में खो जाते हैं, यहाँ तक कि ऐसी-ऐसी बातों का दावा करते हैं, जिन्हें दूसरे जानते हैं कि वास्तव में वे बातें गलत या झूठ सिद्ध हो चुकी हैं।

यहीं आकर यह खतरनाक हो जाता है। यह किसी को नुकसान नहीं पहुँचाता कि आप आत्मा, किसी ऊर्जा, किसी ईश्वरीय शक्ति या फरिश्तों पर विश्वास रखते हैं। यह आपके लिए अच्छा हो सकता है, आपका विश्वास या आस्था आपमें आत्मविश्वास भर सकती है या आपके अंदर संकल्पशक्ति का संचार कर सकती है। यहाँ तक कि वह कुछ शारीरिक समस्याओं से भी आपको निजात दिला सकती है। आपको इतना ही ध्यान रखना है कि उसे अधिक दूर तक न ले जाएँ। जी हाँ, ध्यान, किसी शक्ति की सजीव कल्पना और सकारात्मकता या प्रार्थनाएँ आपको शारीरिक पीड़ा या सिरदर्द जैसी तकलीफ़ों को बेहतर तरीके से झेलने और सहन करने की शक्ति प्रदान कर सकती हैं लेकिन जब आपकी हड्डी टूट जाती है तब आपके पास किसी डॉक्टर को दिखाने के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं होता।

मैं जानता हूँ कि आजकल ऐसे लोग भी मिल जाते हैं जो ‘आध्यात्मिक शल्यक्रिया’ करते हैं और दावा करते हैं कि इस शल्यक्रिया से शरीर के किसी अंग को काटे बगैर, चाक़ू चलाए बगैर, यहाँ तक कि त्वचा में किसी तरह का चीरा लगाए बगैर वे शल्यक्रिया करते हैं। ये लोग अपने 'मरीज़' को अपनी चमत्कारिक शक्तियों से ठीक करने का विश्वास दिलाने में कामयाब हो जाते हैं परन्तु वास्तव में वे मुर्गी के रक्त का इस्तेमाल कर रहे होते हैं और ऐसा नाटक करते हैं कि मरीज उसे अपना ही रक्त समझता है। वास्तव में यह खतरनाक है क्योंकि वे इलाज के लिए किसी पढ़े-लिखे, पंजीकृत डॉक्टर के पास नहीं जाते!

बहुत से लोग दूसरों से न सिर्फ धोखा खाते हैं बल्कि उन बहुत सी हवाई बातों पर भरोसा भी करने लगते हैं। इस चमकीली फंतासी के अतिरिक्त वे परियों, जिन्नों, फरिश्तों और ईश्वरीय शक्तियों की दुनिया में खो जाते हैं। उनकी दुनिया हैरी पॉटर या लॉर्ड ऑफ़ द रिंग की फंतासियों, कभी पढ़ी या सुनी गई गुह्य किंवदंतियों और प्रवचनों और स्वाभाविक ही, विभिन्न देशों के धार्मिक मिथकों और आख्यानों का मिला-जुला रूप होती है! अपनी दुनिया में उन्हें चीज़े स्याह-सफ़ेद नज़र आती हैं, कुछ सिर्फ अच्छी या भली शक्तियाँ होती हैं तो कुछ बुरी और शरीर से उन बुरी शक्तियों को निकाल बाहर करना लक्ष्य होता है, जिनके कारण आप बीमार पड़े हुए हैं और जो दुनिया भर में फैली बुराइयों की जड़ है।

कुछ लोगों के लिए यह दिमागी बीमारियों का रास्ता सिद्ध होता है। उनकी वायवीय, दुनिया यथार्थ दुनिया से, जिसकी कुछ मूलभूत वास्तविकताएँ हैं, जिनके कुछ भौतिक नियमों, सिद्धांतों और तथ्यों को हम सब मानते हैं और जिनकी हम उपेक्षा नहीं कर सकते, भटककर बहुत दूर निकल गई है! वे हवा में तैर रहे हैं और जिसे हम सब यथार्थ कहते हैं, उससे उनका रत्ती भर संबंध नहीं रह गया है। वे भ्रमित हैं और उन आवाज़ों को सुनते हैं, जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं है, उन खतरों को महसूस करते हैं जो कहीं हैं ही नहीं। वे उन चीजों से भयग्रस्त हो जाते हैं जो उनकी कल्पना में बसती हैं, उनकी हवाई दुनिया में मौजूद हैं।

यह शारीरिक और मानसिक रूप से उनके लिए नुकसानदेह है कि वे यथार्थ से दूर अपनी काल्पनिक दुनिया में खोए रहें, अपनी आस्थाओं और अपनी मनगढ़ंत सृष्टि में विचरते रहें और वस्तुगत तथ्यों की उपेक्षा करें। यथार्थ जिसमें हम सब शरीक हैं, वह नहीं, जिसे आपने अपनी कल्पना में रचा है! जब भी आप यथार्थ से अलग किसी दूसरी बात पर विश्वास करते हैं, जब आप निर्णय करते हैं कि वस्तुगत जगत से अलग किसी दूसरी कल्पना पर आस्था रखने लगें तब कृपया इस बात का खयाल रखें। अपने दोनों पैर ज़मीन में मजबूती के साथ जमाकर रखें, वास्तविक दुनिया में निवास करें!

आप अपना एक निजी विश्व रचते हैं – प्लासिएबो इफैक्ट और खुशी के लिए! 16 मार्च 2015

आज मैं हमारे जीवन के एक बहुत रोचक तथ्य के विषय में लिखना चाहता हूँ: अपनी कल्पनाओं और अपने खयालों की सहायता से हम किस तरह अपना यथार्थ गढ़ते हैं! अगर आप किसी चीज़ पर विश्वास करते हैं तो उसकी सृष्टि करना भी शुरू कर देते हैं-और इस तरह अपने विचार को वास्तविक जीवन में स्थापित कर देते हैं। इस तरह हम सब अपने-अपने अलग-अलग संसारों में निवास करते हैं।

कुछ दिन पहले हम खाना खाने के बाद मेरे पिताजी के कमरे में बैठे हुए थे और मैं पिता की गतिविधियों को बड़े गौर से देख रहा था: उन्होंने आयुर्वेदिक दवाई की एक गोली निकालकर मुँह में रखी, फिर क्लब सोड़ा की बोतल का ढक्कन खोलकर एक घूँट लिया और उसके साथ गोली गटक ली। मुझे अपनी ओर प्रश्नवाचक मुद्रा में मुँह फाड़े ताकता देखा तो कहा: "क्लब सोड़ा के साथ दवाई जल्दी असर करती है!"

मैं हँस पड़ा और मेरी देखादेखी वे भी हँसे बगैर नहीं रह सके, हालांकि अपनी इस धारणा पर दृढ़ रहते हुए कि वास्तव में कोई भी दवा सादे पानी के मुक़ाबले उस गैस युक्त, सनसनाते, बुलबुले वाले पानी के साथ लेने पर ज़्यादा बेहतर और त्वरित असर करती है।

स्वाभाविक ही, इसका बड़ा अच्छा मनोवैज्ञानिक असर होता है, प्लासिएबो (placebo) इफ़ेक्ट, जिसका निर्माण अपनी कल्पनाओं, विचार-सरणी और अपने मस्तिष्क की सहायता से आप स्वयं करते हैं! स्वाभाविक ही, आपके रोग-लक्षणों के अनुसार आपकी पीड़ा कम हो जाती है, आप अच्छा महसूस करते हैं, आपको महसूस होता है कि शरीर में रक्त की मात्रा बढ़ गई है, वह अधिक सुचारू रूप से काम कर रहा है, रक्त-संचार बेहतर हुआ है या आपकी त्वचा की जलन कम हुई है। क्योंकि जिस पानी के साथ आपने दवा ली थी, उसमें सनसनाहट मौजूद थी!

मुझे इस उदाहरण से एक बात स्पष्ट समझ में आती है कि हम अपनी दुनिया के निर्माता स्वयं होते हैं। अपनी आस्थाओं और विश्वासों को अपने जीवन में लागू कर देते हैं, अपने आचरण में ढाल लेते हैं- अपनी आस्थाओं और विश्वासों को बाध्य कर देते हैं कि वह आपके दैनिक जीवन की वास्तविकता बन जाए-कम से कम खुद अपने लिए।

जहाँ आपके दावों, आपके विचारों और कल्पनाओं के प्रमाण की कोई आवश्यकता नहीं होती, ऐसे गुह्य और रहस्यमय मामलों में यह ठीक काम करता है! इसका कोई जैविक, भौतिक प्रमाण नहीं होता कि जो आप कह रहे हैं वह गलत ही है- इसलिए आप हमेशा उसे ठीक समझ सकते हैं। और अगर उसमें आप अपनी आस्था भी मिला देते हैं तो फिर वह आपके लिए यथार्थ बन जाता है, जिसमें फरिश्ते आपका मार्गदर्शन करते हैं, किसी अनिष्टकारी अज्ञात शक्ति से आपके तार जुड़ जाते हैं या आप मृत व्यक्तियों अथवा प्रेतात्माओं से बात कर सकते हैं और अंत में ईश्वर का अस्तित्व भी आपके लिए एक वास्तविकता बन जाता है।

धर्म के चारों ओर स्थित बातें भी इसी श्रेणी में आती हैं। किसी दैवी या ईश्वरीय शक्ति में आस्था, मनुष्य के लिए तथाकथित ईश्वर के बनाए नियमों के बारे में यह विश्वास कि अगर आप कोई नियम तोड़ते हैं तो पाप करते हैं और अगर आप उन नियमों पर चलते हैं तो सुरक्षित रहते हैं। कि पूजा-अर्चना आपको बचा सकती है, आपको स्वस्थ कर सकती है आपकी पीड़ा हर सकती है, आपकी सहायता कर सकती है। आदि आदि।

कल्पना, आस्था और फिर अंततः यथार्थ। आप किसी भी बात पर विश्वास कर सकते हैं और वह आपके लिए सत्य भी बन सकता है। इसमें बड़ी शक्ति है लेकिन साथ ही, यह खतरनाक भी सिद्ध हो सकता है। इन खतरों के बारे में मैं कल के ब्लॉग में लिखूँगा।

एक सामान्य मगर त्रुटिपूर्ण समझ: ध्यान मस्तिष्क को नियंत्रण में रखना है – 9 मार्च 2015

कुछ दिन पहले आश्रम में आयुर्वेद-योग विश्रांति शिविर हेतु एक महिला आई थी। उसे आशा थी कि न सिर्फ यहाँ उसे शारीरिक समस्याओं से निजात मिलेगी बल्कि उसकी अप्रसन्नता का इलाज भी हो सकेगा, जिसके बारे में वह जानती थी कि वह उसकी मनोवैज्ञानिक समस्या है। लेकिन जब मैंने उससे बात की तो इस समस्या के निदान हेतु मेरी सलाह सुनकर वह आश्चर्य में पड़ गई।

दरअसल उस महिला का विचार था कि यहाँ आकर वह दैनिक योग-कक्षाओं में शामिल होगी, मालिश करवाएगी और सबसे बड़ी बात मस्तिष्क को काबू में रखने के लिए ध्यान सीखेगी और उसका अच्छा अभ्यास कर लेगी। लेकिन, मैंने खास तौर पर इसके ठीक विपरीत बात उससे कही: मैंने कहा, अपने मस्तिष्क को स्वतंत्र विचरण करने दो! इसे मैं कुछ विस्तार से आपके सामने रखना चाहता हूँ।

बहुत से लोग पहले से जानते हैं कि उनकी अप्रसन्नता का कारण कोई बाहरी चीज़ नहीं है। वे इस तथ्य से परिचित होते हैं कि उनका खुद का मन है, जो उन्हें प्रसन्न नहीं रहने देता, उनके पड़ोसी, बॉस, साथी और सहायक या उनका काम या व्यवसाय नहीं। वे इतना पढ़ चुके होते हैं कि जानते हैं कि उन्हें खुद प्रयास करना होगा, खुद को भीतर से बदलना होगा क्योंकि वे दूसरों को वैसे भी बदल नहीं सकते। अधिकतर लोग सोचते हैं कि इसका इलाज ध्यान में उपलब्ध है और वे गलत नहीं समझते।

गलत वे यह समझते हैं कि इसके इलाज लिए उन्हें मस्तिष्क को काबू में रखना सीखना चाहिए।

विचार-नियंत्रण या मस्तिष्क-नियंत्रण: मुझे लगता है कि यह शब्द-युग्म ही दर्शाता है कि मैं क्यों उसे नापसंद करता हूँ। क्या यह अच्छी बात होगी? स्पष्ट ही, नहीं! किसी दूसरे व्यक्ति का मस्तिष्क नियंत्रित करना ही नहीं बल्कि खुद अपना मस्तिष्क नियंत्रित करना भी! यह एक आम गलत धारणा है कि ध्यान का उपयोग मस्तिष्क नियंत्रण में किया जाता है। लेकिन नहीं- ध्यान आपको विश्रांति पहुँचाता है! तो विश्रांति प्राप्त करें क्योंकि आपको किसी नियंत्रण की जरूरत नहीं है, विश्रांति प्राप्त करें क्योंकि आप इस समय इसी पल में अवस्थित हैं और सोचते-समझते हुए, पूरे होशोहवास के साथ हैं। वैसे भी हर वक़्त पूरे नियंत्रण में रहने का सवाल नहीं है, जबकि अधिकतर लोग पूरी शक्ति के साथ ठीक यही करने का प्रयास कर रहे होते हैं और इस पर कुछ ज़्यादा ही शक्ति खर्च कर देते हैं!

ठीक यही मामला उस महिला का भी था, जिससे मेरी बात हुई: वह हर उस परिस्थिति पर विचार करती, जो उसके सामने पेश आई है, उसका विश्लेषण करती और निष्कर्ष निकालने की कोशिश करती और फिर उसके आधार पर भविष्य में पेश आने वाली संभावित परिस्थितियों पर विचार करती। उसके बाद उसके विचार से जो हो सकता है, उसके लिए वह वर्तमान परिस्थितियों को प्रभावित करती और यहाँ तक कि दूसरों के कामों को नियंत्रित करने की कोशिश भी करती। परिणामस्वरूप, लोग उससे नाराज़ हो जाते, वह स्वयं अपने आप से नाखुश रहती और सबसे बड़ी बात, उसका मस्तिष्क हर वक़्त इतना व्यस्त रहता कि उसे मानसिक तनाव की समस्या का सामना करना पड़ता और लगातार अवसाद की स्थिति पैदा हो जाती।

इस परिस्थिति का सामना करने वाली वह अकेली नहीं थी! अगर आप अपने आपको थोड़ा सा भी इस स्थिति में पाते हैं तो मेरा कहना है कि ध्यान आपको लाभ पहुँचा सकता है-लेकिन अपने मस्तिष्क पर नियंत्रण रखकर नहीं। मैं जानता हूँ कि आप सोच रहे होंगे कि आखिर मस्तिष्क ही तो है जो बार-बार हर संभावित दिशा में बहकता रहता है और ऐसी परिस्थिति के निर्माण का कारण बनता है। अगर आप सोचते हैं कि एक बात पर मस्तिष्क को एकाग्र करके आप उसे ऐसा करने से रोक सकेंगे तो यह आपकी भूल है। बल्कि इसका उल्टा होगा-वह और अधिक बहकेगा!

आपके शरीर के बिना आपके मस्तिष्क का कोई अस्तित्व नहीं है। इसलिए कुछ भी हो जाए, वह बार-बार वापस उसी बात पर आएगा। मस्तिष्क जहाँ-जहाँ भटकता है, आपको उधर भटकने की जरूरत नहीं है। स्थिर रहकर जो आप कर रहे हैं, करते रहिए और वह फिर भी वापस आएगा। लेकिन ऐसा करके आप अपने मस्तिष्क को खुला, स्वतंत्र छोड़ देते हैं और उसकी ओर ध्यान नहीं देते। इसके विपरीत आप अपने काम में ध्यान दे रहे होते हैं-चाहे खाना पका रहे हों, नृत्य कर रहे हों, काम कर रहे हों, पढ़-लिख रहे हों या सिर्फ टहल ही क्यों न रहे हों। आप देखेंगे कि ऐसा करने पर आपका मस्तिष्क इधर-उधर न बहकने का आदी होता जाता है!

समय बीतने के साथ आप नियंत्रण में न रहकर प्रसन्न होंगे बल्कि अपनी मर्ज़ी से जो कर रहे हैं, वही करते रहेंगे। यही ध्यान है: किसी पल में आप जो कर रहे हैं, उसे जानते हुए, उसके बोध के साथ उसे करना। और इसका किसी अनिवार्य या जबर्दस्त मस्तिष्क-नियंत्रण से कोई संबंध नहीं है-खुद आपके अपने मस्तिष्क पर नियंत्रण से भी नहीं!

महत्वाकांक्षी होना अच्छा है – लेकिन स्वार्थी न हों – 3 मार्च 2015

आज मैं ‘महत्वाकांक्षा’ पर कुछ लिखना चाहता हूँ। उसकी अच्छाइयों और बुराइयों पर, मैं उसे कैसे देखता हूँ, और उसके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। क्योंकि महत्वाकांक्षा सबमें होती है-किसी में ज़्यादा तो किसी में कम!

सामान्यतया बल्कि, मेरे खयाल से, अधिकतर आप महत्वाकांक्षा को नकारात्मक गुण की तरह सुनते-समझते हैं। मैं अक्सर सुनता हूँ कि फलाँ व्यक्ति ‘अति महत्वाकांक्षी’ है। लेकिन एक अपवाद भी है: जब भी व्यापार की बात होती है तो किसी को ‘महत्वाकांक्षी’ कहना निश्चय ही सकारात्मक अर्थ में लिया जाता है!

नौकरी के आवेदन में महत्वाकांक्षा का ज़िक्र कीजिए, प्रबंधक प्रभावित होगा और सोचेगा कि आप हर काम लगन से करेंगे। किसी महत्वाकांक्षी व्यक्ति को उसकी मेहनत की सफलता से कम्पनी को होने वाली कमाई का कुछ हिस्सा दीजिए, कोई पुरस्कार घोषित कीजिए या पदोन्नति का भरोसा दिलाइए तो वह जी जान से काम में लग जाएगा, बल्कि कम्पनी के लिए ज़्यादा से ज़्यादा कमाई के उद्देश्य से पहले से ज़्यादा मेहनत और लगन से काम करेगा! यह व्यक्ति आदर्श कर्मचारी है-बशर्ते वह खुद बॉस बनने की महत्वाकांक्षा न पाल बैठे!

इन भावनाओं को लेकर मेरे मन में मिले-जुले विचार हैं। एक तरफ मैं महत्वाकांक्षा को बुरी निगाह से देखने को गलत मानता हूँ। उनकी आपको ज़रूरत है। लोगों के लिए वह खाद-पानी की तरह है। महत्वाकांक्षा आपको अपना लक्ष्य प्राप्त करने की दिशा में अधिकाधिक प्रयास करने को प्रेरित करती है-चाहे वह आपकी नौकरी हो, व्यवसाय हो या फिर आपकी निजी ज़िंदगी। किसी भी क्षेत्र में वह आपको अपने कामों पर चिंतन-मनन करने की पृष्ठभूमि प्रदान करती है, वह आपमें उसे उचित रीति से पूरा करने की इच्छा पैदा करती है, जिससे आप अपने उद्देश्यों में सफल हो सकें।

बिना महत्वाकांक्षा के सामान्य परिणाम प्राप्त हो सकते हैं। आप उसे करना है इसलिए करते हैं। वह बहुत बढ़िया हो यह ज़रूरी नहीं है, काम को निपटाना भर है। उसे कुछ खास, कुछ अधिक रचनात्मक होने की ज़रूरत नहीं है, उसे सिर्फ पूरा करना ही काफी है। महत्वाकांक्षा आपके काम में उत्साह, जीवन और भावनाओं के रंग भरती है।

लेकिन दूसरी ओर मैंने ऐसे प्रकरण भी देखे हैं, जहाँ पाया है कि महत्वाकांक्षा ने उन्हें बरबाद कर दिया, विशेष रूप से उनके सामाजिक जीवन को तहस-नहस कर दिया। जब कोई व्यक्ति बहुत महत्वाकांक्षी होता है तो वह अपने काम में इतना डूब जाता है कि दायें-बाएँ उसे कुछ दिखाई नहीं देता। वह यह समझ नहीं पाता कि उसका यह व्यवहार दूसरों पर भी असर डालता है। अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वह अपने सहकर्मियों के साथ अनुचित व्यवहार करने लगता है। वह अपने लाभ के बारे में ही सोचता रहता है, जिससे मित्रों की भावनाओं को चोट पहुँचती है क्योंकि उन्हें होने वाली असुविधाओं और दिक्कतों के बारे में वह सोच ही नहीं पाता।

और फिर, जो आम तौर पर अक्सर देखा गया है, वह यह कि अपनी पत्नी और बच्चों तक के प्रति वह लापरवाह हो जाता है। या अपने पति और बच्चों के प्रति-क्योंकि महत्वाकांक्षा सिर्फ पुरुषों तक ही सीमित नहीं होती! महिलाएँ भी बहुत अधिक, बल्कि असामान्य रूप से महत्वाकांक्षी हो सकती हैं। और जब पुरुष या स्त्री, किसी के साथ भी यह होता है तो महत्वाकांक्षा उन्हें स्वार्थी बना देती है।

निष्कर्ष के रूप में, अंत में मुझे यही कहना है कि हमें कोई न कोई बीच का रास्ता निकालना चाहिए, एक संतुलन-बिन्दु की खोज करनी चाहिए। महत्वाकांक्षाएँ जहाँ खाद-पानी है, वहीं हम अपने आसपास के लोगों को नहीं भूल सकते, उनके प्रति अपनी कोमल भावनाओं को, प्रेम को और सौजन्यता को नहीं छोड़ सकते। हो सके तो अपनी महत्वाकांक्षा का इस तरह उपयोग करें कि उससे दूसरों की सहायता भी संभव हो सके-कम से कम यह ध्यान रखें कि वह दूसरों को नुकसान न पहुँचाए!

जिस लक्ष्य का आप पीछा कर रहे हैं, उसे पूरी एकाग्रता और महत्वाकांक्षा के साथ करें-लेकिन इस बात का खयाल रखें कि आप अपनी सह्रदयता को न खो दें!

सही और गलत की पहचान करने और अपनी धारणाओं पर पुनर्विचार करने में यात्राएँ किस तरह मददगार होती हैं? 6 नवंबर 2014

कल मैंने लिखा था कि जीवनशैली या जीवन के अधिकांश निर्णयों के मामले में सही-गलत का कोई एक बंधा-बंधाया मानदंड नहीं होता। जबकि सामान्यतः मैं यही सलाह देता हूँ कि जो भी आप करें आत्मविश्वास के साथ करें, मैं यह भी कहना चाहूँगा कि सिर्फ अपने विचारों पर इतने जड़ न हो जाएँ कि दूसरों की उचित बातों पर ध्यान ही न दे पाएँ। मन को खुला रखें और अपने आपको इतना लचीला बनाकर रखें कि उचित बातों को ग्रहण कर सकें!

सही और गलत का पहला पाठ आप अपने माता-पिता से सीखते हैं फिर आसपास के माहौल से। लेकिन आसपास दूसरे माता-पिता भी होते हैं, जो वास्तव में उन्हें सही या गलत के बारे में दूसरी बातें सिखाते हैं। और यहाँ आपको अपना दिमाग खुला रखना चाहिए। दूसरी जगह, दूसरे घर-परिवार, दूसरे देश और वहाँ की संस्कृतियाँ-हर जगह सही या गलत के बारे अलग-अलग नज़रिया होता है और अगर आप अपने नज़रिए पर बहुत अधिक जड़ नहीं हैं तो आप उनके नज़रिए को अधिकाधिक जान और समझ सकते हैं! हो सकता है कि तब आप उनके नज़रिए के साथ बेहतर तरीके से तालमेल बिठा सकें।

यात्राएँ इस बारे में बहुत अधिक मदद करती हैं। स्वाभाविक ही मैं बीच पर हफ्ते भर की छुट्टियाँ बिताने की बात नहीं कर रहा हूँ, जहाँ आप लोगों से दूर अपने होटल की सुविधाओं के बीच रह रहे होते हैं। इससे आप दूसरी संस्कृतियों के करीब नहीं आ पाएँगे क्योंकि आपको खुश करने की ग़रज़ से होटल के आयोजक होटलों में और बीचों पर आपकी ही संस्कृति का प्रदर्शन करेंगे। जी नहीं, दूसरों की संस्कृतियों और परम्पराओं को और वहाँ की भिन्नता को जानने-समझने और अनुभव करने के लिए आपको वहाँ कुछ अधिक समय गुज़ारना होगा!

इसकी शुरुआत छोटी-छोटी बातों से होती है। पश्चिमी देशों में किसी अजनबी का स्वागत हाथ मिलाकर किया जाता है या शायद गालों को चूमकर। वहाँ इसे सही और उचित समझा जाएगा। भारत जैसे दूसरे देशों में शारीरिक संपर्क इतना सामान्य नहीं होता और छोटी-छोटी बातों पर या बार-बार शारीरिक संपर्क को उचित नहीं माना जाता। इतनी निकटता से कुछ लोग अपमानित भी महसूस कर सकते हैं। खाना खाते वक़्त टेबल पर हाथों से खाना, उंगलियाँ चाटना या डकार लेना पश्चिमी देशों में अनुचित माना जाता है। लेकिन भारत में भोजन पकाने वाला इन संकेतों को अपनी प्रशंसा समझेगा कि उसका भोजन आपको पसंद आया और आपने छककर, भरपेट भोजन किया।

लेकिन यह सिर्फ टेबल मैनर्स (भोजन की औपचारिकताओं) या लोगों के स्वागत तक ही महदूद नहीं है! जब आप थोड़ा गहरे उतरते हैं और सामने वाले को, दूसरे नज़रियों और दृष्टिकोणों को कुछ बेहतर जानने-समझने लगते हैं, आपमें खुलापन आता जाता है। दूसरों के जीवनों में हो रही घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में आप अपने जीवन को तौलते हैं और उनके विश्लेषण के बाद आपका दृष्टिकोण, आपका नजरिया, आपके विचार बदल भी सकते हैं।

संभव है आपके पास इतनी दूर, पश्चिमी देशों की यात्राएँ करने लायक पैसा न हो मगर इसके बावजूद आप यात्रा करके अपने नज़रिए को विस्तार दे सकते हैं। हल्की-फुल्की यात्राएँ कीजिए, ट्रेन या बसों में कीजिए, दूसरे किसी शहर घूम आइए, अपने आम गंतव्यों से परे कुछ दूर: दूसरी संस्कृतियाँ, जितना आप समझते हैं, उतनी दूर नहीं हैं!

पुरानी परम्पराओं और धार्मिक रूढ़ियों की जकड़न से अपने मस्तिष्क को आज़ाद कीजिए! 9 अक्टूबर 2014

कल जब मैंने आपसे कहा कि आपके लिए अपने दिमागी कचरे को भी साफ़ करना आवश्यक है तब मैं आपकी स्मृतियों और आपके व्यक्तिगत इतिहास के बारे में बात कर रहा था। लेकिन मेरे मन में एक और ख़याल आया है: बासी, दकियानूसी खयालात, पुराने मूल्य और पुराने रवैयों का क्या किया जाए?

दरअसल मेरा पक्का विचार है कि आपके लिए बीच-बीच में अपनी नैतिक मान्यताओं को भी साफ करते रहना ज़रूरी है। उन चीजों को, जिन पर पहले आपने काफी सोच-समझकर गहरा विश्वास किया था! जिनकी आप पूजा करते हैं या जिनके सामने प्रार्थना करते हैं, क्या आप आज भी उन शक्तियों पर विश्वास करते हैं? क्या आप उन्हीं परम्पराओं से चिपके हुए हैं, जो अब आपको ऊब से भर देती हैं और जो उन बातों के विरुद्ध हैं, जो आप अब करना चाहते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि क्योंकि वे पुरातन काल से चली आ रही हैं या क्योंकि उन्हें अपने पूर्वजों से सीखा था, आप उन्हें आँख मूंदकर जारी रखे हुए हैं?

परम्पराओं और धर्मों का स्वभाव ही होता है कि वे एक मूल्य, एक नियम और व्यवहार का एक तरीका निर्धारित कर देते हैं और लोग भी यह विश्वास करने लगते हैं कि यही उचित है, इन्हें अगले हजारों साल तक ऐसा ही बना रहना है, तयशुदा, पत्थर की लकीर की मानिंद। किसी पवित्र धार्मिक पुस्तक में लिखा होने से ही उसे शाश्वत सत्य के रूप में मान्यता प्राप्त हो जाती है। मगर यह हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण है।

समय बदलता है, लोग बदल जाते हैं, एक-दूसरे के साथ व्यवहार बदल जाता है, यहाँ तक कि भाषा बदल जाती है। फिर हमारे मूल्यों को क्यों नहीं बदलना चाहिए? समय के साथ विज्ञान ने इतनी सारी खोजें की हैं कि 200 साल पहले स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली बहुत सी बातों पर आज विश्वास करना मूर्खतापूर्ण ही कहा जाएगा! स्कूलों में पहले पढ़ाई जाने वाली बातों में हमने परिवर्तन किया है तो फिर घर में सिखाई जाने वाली बातों को हम क्यों नहीं बदलते? हमें स्वयं अपने विश्वासों में, अपने व्यवहार में परिवर्तन क्यों नहीं करना चाहिए?

पुरानी धार्मिक परम्पराओं या कई सांस्कृतिक रूढ़ियों के बोझ को उतार फेंकने में कई लोगों को बड़ा संकोच होता है! यह स्पष्ट है कि कई बार वे ऐसा करना भी चाहते हैं, वे लोग उनके प्रति ईर्ष्या का अनुभव करते हैं जो आसानी के साथ ऐसा करते हुए स्वतंत्रता पूर्वक, अपनी मर्ज़ी से अपने चुने हुए आधुनिक मूल्यों पर चलना शुरू कर चुके होते हैं। लेकिन, साथ ही वे यह भी समझते हैं और महसूस करते हैं कि वे ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। वे भी ऐसा करना चाहते हैं मगर उनमें यह विश्वास नहीं होता कि ऐसा करना उचित होगा। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि वे डरते हैं और ऐसा करने की हिम्मत नहीं कर पाते। वे इसलिए डरते हैं क्योंकि वे समझते हैं कि अपने अभिभावकों या दादा-दादियों के विश्वासों पर नहीं चलने या उनके अनुसार व्यवहार न करने पर उन्हें नुकसान पहुँच सकता है। और इसलिए भी डरते हैं कि न जाने उनके पड़ोसी, रिश्तेदार या उनका समाज उनके बारे में क्या सोचेंगे!

सिर्फ एक पग आगे बढ़ाने की हिम्मत दिखाइए। यह अपने आप पर आपका एहसान होगा! आप उन लोगों के पदचिह्नों पर चल रहे हैं, जो आपसे एक या दो पीढ़ी पहले पैदा हुए थे। तो अगली बार जब आप दीवाली पर या बसंत ऋतु में घर की सफाई करें तो बैठकर सोचें कि क्या आपको अपने दिमाग की सफाई भी नहीं करनी चाहिए। क्या अपने व्यक्तिगत इतिहास, अपने विश्वासों और मूल्यों पर पुनर्विचार करते हुए उन्हें त्यागने के बारे में नहीं सोचना चाहिए?

यह कदम आगे बढ़ाते ही आप देखेंगे कि आप कितना हल्का और स्वतंत्र महसूस कर रहे हैं!