एक सामान्य मगर त्रुटिपूर्ण समझ: ध्यान मस्तिष्क को नियंत्रण में रखना है – 9 मार्च 2015

ध्यान

कुछ दिन पहले आश्रम में आयुर्वेद-योग विश्रांति शिविर हेतु एक महिला आई थी। उसे आशा थी कि न सिर्फ यहाँ उसे शारीरिक समस्याओं से निजात मिलेगी बल्कि उसकी अप्रसन्नता का इलाज भी हो सकेगा, जिसके बारे में वह जानती थी कि वह उसकी मनोवैज्ञानिक समस्या है। लेकिन जब मैंने उससे बात की तो इस समस्या के निदान हेतु मेरी सलाह सुनकर वह आश्चर्य में पड़ गई।

दरअसल उस महिला का विचार था कि यहाँ आकर वह दैनिक योग-कक्षाओं में शामिल होगी, मालिश करवाएगी और सबसे बड़ी बात मस्तिष्क को काबू में रखने के लिए ध्यान सीखेगी और उसका अच्छा अभ्यास कर लेगी। लेकिन, मैंने खास तौर पर इसके ठीक विपरीत बात उससे कही: मैंने कहा, अपने मस्तिष्क को स्वतंत्र विचरण करने दो! इसे मैं कुछ विस्तार से आपके सामने रखना चाहता हूँ।

बहुत से लोग पहले से जानते हैं कि उनकी अप्रसन्नता का कारण कोई बाहरी चीज़ नहीं है। वे इस तथ्य से परिचित होते हैं कि उनका खुद का मन है, जो उन्हें प्रसन्न नहीं रहने देता, उनके पड़ोसी, बॉस, साथी और सहायक या उनका काम या व्यवसाय नहीं। वे इतना पढ़ चुके होते हैं कि जानते हैं कि उन्हें खुद प्रयास करना होगा, खुद को भीतर से बदलना होगा क्योंकि वे दूसरों को वैसे भी बदल नहीं सकते। अधिकतर लोग सोचते हैं कि इसका इलाज ध्यान में उपलब्ध है और वे गलत नहीं समझते।

गलत वे यह समझते हैं कि इसके इलाज लिए उन्हें मस्तिष्क को काबू में रखना सीखना चाहिए।

विचार-नियंत्रण या मस्तिष्क-नियंत्रण: मुझे लगता है कि यह शब्द-युग्म ही दर्शाता है कि मैं क्यों उसे नापसंद करता हूँ। क्या यह अच्छी बात होगी? स्पष्ट ही, नहीं! किसी दूसरे व्यक्ति का मस्तिष्क नियंत्रित करना ही नहीं बल्कि खुद अपना मस्तिष्क नियंत्रित करना भी! यह एक आम गलत धारणा है कि ध्यान का उपयोग मस्तिष्क नियंत्रण में किया जाता है। लेकिन नहीं- ध्यान आपको विश्रांति पहुँचाता है! तो विश्रांति प्राप्त करें क्योंकि आपको किसी नियंत्रण की जरूरत नहीं है, विश्रांति प्राप्त करें क्योंकि आप इस समय इसी पल में अवस्थित हैं और सोचते-समझते हुए, पूरे होशोहवास के साथ हैं। वैसे भी हर वक़्त पूरे नियंत्रण में रहने का सवाल नहीं है, जबकि अधिकतर लोग पूरी शक्ति के साथ ठीक यही करने का प्रयास कर रहे होते हैं और इस पर कुछ ज़्यादा ही शक्ति खर्च कर देते हैं!

ठीक यही मामला उस महिला का भी था, जिससे मेरी बात हुई: वह हर उस परिस्थिति पर विचार करती, जो उसके सामने पेश आई है, उसका विश्लेषण करती और निष्कर्ष निकालने की कोशिश करती और फिर उसके आधार पर भविष्य में पेश आने वाली संभावित परिस्थितियों पर विचार करती। उसके बाद उसके विचार से जो हो सकता है, उसके लिए वह वर्तमान परिस्थितियों को प्रभावित करती और यहाँ तक कि दूसरों के कामों को नियंत्रित करने की कोशिश भी करती। परिणामस्वरूप, लोग उससे नाराज़ हो जाते, वह स्वयं अपने आप से नाखुश रहती और सबसे बड़ी बात, उसका मस्तिष्क हर वक़्त इतना व्यस्त रहता कि उसे मानसिक तनाव की समस्या का सामना करना पड़ता और लगातार अवसाद की स्थिति पैदा हो जाती।

इस परिस्थिति का सामना करने वाली वह अकेली नहीं थी! अगर आप अपने आपको थोड़ा सा भी इस स्थिति में पाते हैं तो मेरा कहना है कि ध्यान आपको लाभ पहुँचा सकता है-लेकिन अपने मस्तिष्क पर नियंत्रण रखकर नहीं। मैं जानता हूँ कि आप सोच रहे होंगे कि आखिर मस्तिष्क ही तो है जो बार-बार हर संभावित दिशा में बहकता रहता है और ऐसी परिस्थिति के निर्माण का कारण बनता है। अगर आप सोचते हैं कि एक बात पर मस्तिष्क को एकाग्र करके आप उसे ऐसा करने से रोक सकेंगे तो यह आपकी भूल है। बल्कि इसका उल्टा होगा-वह और अधिक बहकेगा!

आपके शरीर के बिना आपके मस्तिष्क का कोई अस्तित्व नहीं है। इसलिए कुछ भी हो जाए, वह बार-बार वापस उसी बात पर आएगा। मस्तिष्क जहाँ-जहाँ भटकता है, आपको उधर भटकने की जरूरत नहीं है। स्थिर रहकर जो आप कर रहे हैं, करते रहिए और वह फिर भी वापस आएगा। लेकिन ऐसा करके आप अपने मस्तिष्क को खुला, स्वतंत्र छोड़ देते हैं और उसकी ओर ध्यान नहीं देते। इसके विपरीत आप अपने काम में ध्यान दे रहे होते हैं-चाहे खाना पका रहे हों, नृत्य कर रहे हों, काम कर रहे हों, पढ़-लिख रहे हों या सिर्फ टहल ही क्यों न रहे हों। आप देखेंगे कि ऐसा करने पर आपका मस्तिष्क इधर-उधर न बहकने का आदी होता जाता है!

समय बीतने के साथ आप नियंत्रण में न रहकर प्रसन्न होंगे बल्कि अपनी मर्ज़ी से जो कर रहे हैं, वही करते रहेंगे। यही ध्यान है: किसी पल में आप जो कर रहे हैं, उसे जानते हुए, उसके बोध के साथ उसे करना। और इसका किसी अनिवार्य या जबर्दस्त मस्तिष्क-नियंत्रण से कोई संबंध नहीं है-खुद आपके अपने मस्तिष्क पर नियंत्रण से भी नहीं!

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