पुरानी परम्पराओं और धार्मिक रूढ़ियों की जकड़न से अपने मस्तिष्क को आज़ाद कीजिए! 9 अक्टूबर 2014

मन

कल जब मैंने आपसे कहा कि आपके लिए अपने दिमागी कचरे को भी साफ़ करना आवश्यक है तब मैं आपकी स्मृतियों और आपके व्यक्तिगत इतिहास के बारे में बात कर रहा था। लेकिन मेरे मन में एक और ख़याल आया है: बासी, दकियानूसी खयालात, पुराने मूल्य और पुराने रवैयों का क्या किया जाए?

दरअसल मेरा पक्का विचार है कि आपके लिए बीच-बीच में अपनी नैतिक मान्यताओं को भी साफ करते रहना ज़रूरी है। उन चीजों को, जिन पर पहले आपने काफी सोच-समझकर गहरा विश्वास किया था! जिनकी आप पूजा करते हैं या जिनके सामने प्रार्थना करते हैं, क्या आप आज भी उन शक्तियों पर विश्वास करते हैं? क्या आप उन्हीं परम्पराओं से चिपके हुए हैं, जो अब आपको ऊब से भर देती हैं और जो उन बातों के विरुद्ध हैं, जो आप अब करना चाहते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि क्योंकि वे पुरातन काल से चली आ रही हैं या क्योंकि उन्हें अपने पूर्वजों से सीखा था, आप उन्हें आँख मूंदकर जारी रखे हुए हैं?

परम्पराओं और धर्मों का स्वभाव ही होता है कि वे एक मूल्य, एक नियम और व्यवहार का एक तरीका निर्धारित कर देते हैं और लोग भी यह विश्वास करने लगते हैं कि यही उचित है, इन्हें अगले हजारों साल तक ऐसा ही बना रहना है, तयशुदा, पत्थर की लकीर की मानिंद। किसी पवित्र धार्मिक पुस्तक में लिखा होने से ही उसे शाश्वत सत्य के रूप में मान्यता प्राप्त हो जाती है। मगर यह हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण है।

समय बदलता है, लोग बदल जाते हैं, एक-दूसरे के साथ व्यवहार बदल जाता है, यहाँ तक कि भाषा बदल जाती है। फिर हमारे मूल्यों को क्यों नहीं बदलना चाहिए? समय के साथ विज्ञान ने इतनी सारी खोजें की हैं कि 200 साल पहले स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली बहुत सी बातों पर आज विश्वास करना मूर्खतापूर्ण ही कहा जाएगा! स्कूलों में पहले पढ़ाई जाने वाली बातों में हमने परिवर्तन किया है तो फिर घर में सिखाई जाने वाली बातों को हम क्यों नहीं बदलते? हमें स्वयं अपने विश्वासों में, अपने व्यवहार में परिवर्तन क्यों नहीं करना चाहिए?

पुरानी धार्मिक परम्पराओं या कई सांस्कृतिक रूढ़ियों के बोझ को उतार फेंकने में कई लोगों को बड़ा संकोच होता है! यह स्पष्ट है कि कई बार वे ऐसा करना भी चाहते हैं, वे लोग उनके प्रति ईर्ष्या का अनुभव करते हैं जो आसानी के साथ ऐसा करते हुए स्वतंत्रता पूर्वक, अपनी मर्ज़ी से अपने चुने हुए आधुनिक मूल्यों पर चलना शुरू कर चुके होते हैं। लेकिन, साथ ही वे यह भी समझते हैं और महसूस करते हैं कि वे ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। वे भी ऐसा करना चाहते हैं मगर उनमें यह विश्वास नहीं होता कि ऐसा करना उचित होगा। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि वे डरते हैं और ऐसा करने की हिम्मत नहीं कर पाते। वे इसलिए डरते हैं क्योंकि वे समझते हैं कि अपने अभिभावकों या दादा-दादियों के विश्वासों पर नहीं चलने या उनके अनुसार व्यवहार न करने पर उन्हें नुकसान पहुँच सकता है। और इसलिए भी डरते हैं कि न जाने उनके पड़ोसी, रिश्तेदार या उनका समाज उनके बारे में क्या सोचेंगे!

सिर्फ एक पग आगे बढ़ाने की हिम्मत दिखाइए। यह अपने आप पर आपका एहसान होगा! आप उन लोगों के पदचिह्नों पर चल रहे हैं, जो आपसे एक या दो पीढ़ी पहले पैदा हुए थे। तो अगली बार जब आप दीवाली पर या बसंत ऋतु में घर की सफाई करें तो बैठकर सोचें कि क्या आपको अपने दिमाग की सफाई भी नहीं करनी चाहिए। क्या अपने व्यक्तिगत इतिहास, अपने विश्वासों और मूल्यों पर पुनर्विचार करते हुए उन्हें त्यागने के बारे में नहीं सोचना चाहिए?

यह कदम आगे बढ़ाते ही आप देखेंगे कि आप कितना हल्का और स्वतंत्र महसूस कर रहे हैं!

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