महत्वाकांक्षी होना अच्छा है – लेकिन स्वार्थी न हों – 3 मार्च 2015

आज मैं ‘महत्वाकांक्षा’ पर कुछ लिखना चाहता हूँ। उसकी अच्छाइयों और बुराइयों पर, मैं उसे कैसे देखता हूँ, और उसके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। क्योंकि महत्वाकांक्षा सबमें होती है-किसी में ज़्यादा तो किसी में कम!

सामान्यतया बल्कि, मेरे खयाल से, अधिकतर आप महत्वाकांक्षा को नकारात्मक गुण की तरह सुनते-समझते हैं। मैं अक्सर सुनता हूँ कि फलाँ व्यक्ति ‘अति महत्वाकांक्षी’ है। लेकिन एक अपवाद भी है: जब भी व्यापार की बात होती है तो किसी को ‘महत्वाकांक्षी’ कहना निश्चय ही सकारात्मक अर्थ में लिया जाता है!

नौकरी के आवेदन में महत्वाकांक्षा का ज़िक्र कीजिए, प्रबंधक प्रभावित होगा और सोचेगा कि आप हर काम लगन से करेंगे। किसी महत्वाकांक्षी व्यक्ति को उसकी मेहनत की सफलता से कम्पनी को होने वाली कमाई का कुछ हिस्सा दीजिए, कोई पुरस्कार घोषित कीजिए या पदोन्नति का भरोसा दिलाइए तो वह जी जान से काम में लग जाएगा, बल्कि कम्पनी के लिए ज़्यादा से ज़्यादा कमाई के उद्देश्य से पहले से ज़्यादा मेहनत और लगन से काम करेगा! यह व्यक्ति आदर्श कर्मचारी है-बशर्ते वह खुद बॉस बनने की महत्वाकांक्षा न पाल बैठे!

इन भावनाओं को लेकर मेरे मन में मिले-जुले विचार हैं। एक तरफ मैं महत्वाकांक्षा को बुरी निगाह से देखने को गलत मानता हूँ। उनकी आपको ज़रूरत है। लोगों के लिए वह खाद-पानी की तरह है। महत्वाकांक्षा आपको अपना लक्ष्य प्राप्त करने की दिशा में अधिकाधिक प्रयास करने को प्रेरित करती है-चाहे वह आपकी नौकरी हो, व्यवसाय हो या फिर आपकी निजी ज़िंदगी। किसी भी क्षेत्र में वह आपको अपने कामों पर चिंतन-मनन करने की पृष्ठभूमि प्रदान करती है, वह आपमें उसे उचित रीति से पूरा करने की इच्छा पैदा करती है, जिससे आप अपने उद्देश्यों में सफल हो सकें।

बिना महत्वाकांक्षा के सामान्य परिणाम प्राप्त हो सकते हैं। आप उसे करना है इसलिए करते हैं। वह बहुत बढ़िया हो यह ज़रूरी नहीं है, काम को निपटाना भर है। उसे कुछ खास, कुछ अधिक रचनात्मक होने की ज़रूरत नहीं है, उसे सिर्फ पूरा करना ही काफी है। महत्वाकांक्षा आपके काम में उत्साह, जीवन और भावनाओं के रंग भरती है।

लेकिन दूसरी ओर मैंने ऐसे प्रकरण भी देखे हैं, जहाँ पाया है कि महत्वाकांक्षा ने उन्हें बरबाद कर दिया, विशेष रूप से उनके सामाजिक जीवन को तहस-नहस कर दिया। जब कोई व्यक्ति बहुत महत्वाकांक्षी होता है तो वह अपने काम में इतना डूब जाता है कि दायें-बाएँ उसे कुछ दिखाई नहीं देता। वह यह समझ नहीं पाता कि उसका यह व्यवहार दूसरों पर भी असर डालता है। अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वह अपने सहकर्मियों के साथ अनुचित व्यवहार करने लगता है। वह अपने लाभ के बारे में ही सोचता रहता है, जिससे मित्रों की भावनाओं को चोट पहुँचती है क्योंकि उन्हें होने वाली असुविधाओं और दिक्कतों के बारे में वह सोच ही नहीं पाता।

और फिर, जो आम तौर पर अक्सर देखा गया है, वह यह कि अपनी पत्नी और बच्चों तक के प्रति वह लापरवाह हो जाता है। या अपने पति और बच्चों के प्रति-क्योंकि महत्वाकांक्षा सिर्फ पुरुषों तक ही सीमित नहीं होती! महिलाएँ भी बहुत अधिक, बल्कि असामान्य रूप से महत्वाकांक्षी हो सकती हैं। और जब पुरुष या स्त्री, किसी के साथ भी यह होता है तो महत्वाकांक्षा उन्हें स्वार्थी बना देती है।

निष्कर्ष के रूप में, अंत में मुझे यही कहना है कि हमें कोई न कोई बीच का रास्ता निकालना चाहिए, एक संतुलन-बिन्दु की खोज करनी चाहिए। महत्वाकांक्षाएँ जहाँ खाद-पानी है, वहीं हम अपने आसपास के लोगों को नहीं भूल सकते, उनके प्रति अपनी कोमल भावनाओं को, प्रेम को और सौजन्यता को नहीं छोड़ सकते। हो सके तो अपनी महत्वाकांक्षा का इस तरह उपयोग करें कि उससे दूसरों की सहायता भी संभव हो सके-कम से कम यह ध्यान रखें कि वह दूसरों को नुकसान न पहुँचाए!

जिस लक्ष्य का आप पीछा कर रहे हैं, उसे पूरी एकाग्रता और महत्वाकांक्षा के साथ करें-लेकिन इस बात का खयाल रखें कि आप अपनी सह्रदयता को न खो दें!

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