ध्यान – मस्तिष्क को नियंत्रित करने का फर्जी तरीका – 13 अप्रैल 2015

ध्यान

आज मैं एक ऐसे विषय पर लिखने जा रहा हूँ जिस पर चाहे जितनी बार बोलूँ या लिखूँ, वह मुझे हमेशा प्रिय और महत्वपूर्ण लगता है: ध्यान। ध्यान और ध्यान के विभिन्न प्रकार, जिनका विभिन्न गुरु प्रचार करते रहते हैं और सामान्य लोग उस पर अधिकार पाने के लिए कड़ा संघर्ष करते हैं। और यहीं पर मैं अपने मुख्य बिंदु पर आता हूँ: ध्यान को कभी भी संघर्ष नहीं होना चाहिए!

यह सच है, बहुत से लोगों के लिए वह सिर्फ इतना ही है: अपने ही मस्तिष्क के साथ युद्ध! योगाभ्यास के आसन पर बैठने का पहला उद्देश्य तो विश्रांति और शारीरिक तनाव से मुक्ति ही होता है मगर अकसर इस मंसूबे का निष्पादन उस तरह नहीं होता, जिस तरह होना चाहिए। इसका कारण यह है कि वे सोचते हैं-या उन्हें विख्यात योग गुरुओं या ध्यान-मार्गदर्शकों द्वारा बताया जाता है-कि उनका लक्ष्य विचार-शून्यता (सोचना बंद कर देना) होना चाहिए।

लेकिन होता यह है कि वे आसन बिछाकर बैठ जाते हैं और उनका मस्तिष्क दुनिया भर की बातें सोचने लगता है, हर तरफ दौड़ने लगता है और सब कुछ करता है सिर्फ उनके पास रहकर उस क्षण पर एकाग्र नहीं हो पाता। उनके दिमाग में हजारों तरह के खयाल आते हैं, वे मन ही मन दूरस्थ देशों की यात्रा करने लगते हैं और फिर अचानक उन्हें एहसास होता है कि: "अरे, यह क्या? मुझे यहाँ होना चाहिए, इस पल में, इस चटाई पर"! वे अपने मस्तिष्क पर कुपित होते हैं, हताश, हतोत्साहित होते हैं कि वे उसे इस पल पर केन्द्रित नहीं रख सके और फिर दुखी और परेशान हो उठते हैं।

अगली बार जब वे ध्यान लगाने बैठते हैं तो जैसे किसी से युद्ध करने निकले हों। ध्यान लगाने का कुशन या चटाई युद्धभूमि बन जाती है। वे अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित युद्धभूमि में उतरते हैं: अगरबत्तियाँ, शांतिदायक संगीत और शायद साँस लेने और ध्यान लगाने की हिदायतों वाली सीडियाँ! वे युद्ध के लिए सन्नद्ध हैं!

भीषण युद्ध है यह। दुश्मन ताकतवर है, दिमागी लड़ाई में कभी-कभी गलत तरीके भी इस्तेमाल किए जाते हैं मगर अक्सर विजय मस्तिष्क की ही होती है!

इस तरह आप अपने दिमाग को पालतू नहीं बना सकते। क्वचित आपको लगेगा कि आपने उसे साध लिया है लेकिन अगली बार कोशिश करने पर आपको पता चलेगा कि आप ऐसा नहीं कर पाए हैं। लेकिन मैं आपको एक अलग, आसान सा तरीका बताता हूँ: अपने दिमाग को खुला छोड़ दीजिए, मुक्त कर दीजिए!

आपको संघर्ष करने की या युद्ध करने की ज़रुरत नहीं है! आपकी रोज़मर्रा ज़िंदगी में पर्याप्त संघर्ष है और इसीलिए तो आप शरीर और मस्तिष्क की विश्रांति के लिए ध्यान का सहारा लेना चाहते हैं! तो फिर उसे आराम करने दें! आपका लक्ष्य होना चाहिए कि आप वर्त्तमान में रहें-लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि आपको चटाई पर बैठकर पद्मासन लगाना ज़रूरी ही है!

हाँ, आप जो चाहें करते हुए ध्यान कर सकते हैं, सबेरे घूमते हुए, तैरते हुए, पढ़ते हुए, पेंटिंग करते हुए, यहाँ तक कि अपना कोई काम निपटाते हुए। बस, जो भी कर रहे हैं, उसमें अपने आप को पूरे मन से संलग्न कर लें। बहुत से काम एक साथ न करें, कोई एक काम करते हुए सैकड़ों दूसरे कामों के बारे में न सोचें कि यह भी करना है और वह भी करना है, बल्कि अपने पूरे अस्तित्व के साथ जो उस पल कर रहे हैं, उसके साथ संलग्न कर लें। अगर आप पेंटिंग कर रहे हैं तो सिर्फ रंगों के बारे में सोचें, सबेरे घूमने निकले हैं तो हवा में मौजूद खुशबुओं को महसूस कीजिए, गहरी साँस लीजिए, अपने शरीर में लीन रहिए, अगर कोई सामान्य सा काम भी कर रहे हैं तो उस काम में पूरी तरह संलग्न रहें। यही वास्तविक ध्यान है-जब आपको हर क्षण सिर्फ यह पता होता है कि आप क्या कर रहे हैं, चाहे वह कोई भी काम हो!

अगर आप मस्तिष्क के साथ लगातार युद्ध की तैयारी में लगे रहेंगे तो वह कभी भी विश्रांति प्राप्त नहीं कर पाएगा! अपने मस्तिष्क के साथ शांति कायम करें और आप देखेंगे कि आपका मस्तिष्क भी शांत हो रहा है, उसे विश्रांति प्राप्त हो रही है! लड़ें नहीं-उसे खुला छोड़ दें, आज़ाद कर दें!

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