सही और गलत की पहचान करने और अपनी धारणाओं पर पुनर्विचार करने में यात्राएँ किस तरह मददगार होती हैं? 6 नवंबर 2014

यात्रा

कल मैंने लिखा था कि जीवनशैली या जीवन के अधिकांश निर्णयों के मामले में सही-गलत का कोई एक बंधा-बंधाया मानदंड नहीं होता। जबकि सामान्यतः मैं यही सलाह देता हूँ कि जो भी आप करें आत्मविश्वास के साथ करें, मैं यह भी कहना चाहूँगा कि सिर्फ अपने विचारों पर इतने जड़ न हो जाएँ कि दूसरों की उचित बातों पर ध्यान ही न दे पाएँ। मन को खुला रखें और अपने आपको इतना लचीला बनाकर रखें कि उचित बातों को ग्रहण कर सकें!

सही और गलत का पहला पाठ आप अपने माता-पिता से सीखते हैं फिर आसपास के माहौल से। लेकिन आसपास दूसरे माता-पिता भी होते हैं, जो वास्तव में उन्हें सही या गलत के बारे में दूसरी बातें सिखाते हैं। और यहाँ आपको अपना दिमाग खुला रखना चाहिए। दूसरी जगह, दूसरे घर-परिवार, दूसरे देश और वहाँ की संस्कृतियाँ-हर जगह सही या गलत के बारे अलग-अलग नज़रिया होता है और अगर आप अपने नज़रिए पर बहुत अधिक जड़ नहीं हैं तो आप उनके नज़रिए को अधिकाधिक जान और समझ सकते हैं! हो सकता है कि तब आप उनके नज़रिए के साथ बेहतर तरीके से तालमेल बिठा सकें।

यात्राएँ इस बारे में बहुत अधिक मदद करती हैं। स्वाभाविक ही मैं बीच पर हफ्ते भर की छुट्टियाँ बिताने की बात नहीं कर रहा हूँ, जहाँ आप लोगों से दूर अपने होटल की सुविधाओं के बीच रह रहे होते हैं। इससे आप दूसरी संस्कृतियों के करीब नहीं आ पाएँगे क्योंकि आपको खुश करने की ग़रज़ से होटल के आयोजक होटलों में और बीचों पर आपकी ही संस्कृति का प्रदर्शन करेंगे। जी नहीं, दूसरों की संस्कृतियों और परम्पराओं को और वहाँ की भिन्नता को जानने-समझने और अनुभव करने के लिए आपको वहाँ कुछ अधिक समय गुज़ारना होगा!

इसकी शुरुआत छोटी-छोटी बातों से होती है। पश्चिमी देशों में किसी अजनबी का स्वागत हाथ मिलाकर किया जाता है या शायद गालों को चूमकर। वहाँ इसे सही और उचित समझा जाएगा। भारत जैसे दूसरे देशों में शारीरिक संपर्क इतना सामान्य नहीं होता और छोटी-छोटी बातों पर या बार-बार शारीरिक संपर्क को उचित नहीं माना जाता। इतनी निकटता से कुछ लोग अपमानित भी महसूस कर सकते हैं। खाना खाते वक़्त टेबल पर हाथों से खाना, उंगलियाँ चाटना या डकार लेना पश्चिमी देशों में अनुचित माना जाता है। लेकिन भारत में भोजन पकाने वाला इन संकेतों को अपनी प्रशंसा समझेगा कि उसका भोजन आपको पसंद आया और आपने छककर, भरपेट भोजन किया।

लेकिन यह सिर्फ टेबल मैनर्स (भोजन की औपचारिकताओं) या लोगों के स्वागत तक ही महदूद नहीं है! जब आप थोड़ा गहरे उतरते हैं और सामने वाले को, दूसरे नज़रियों और दृष्टिकोणों को कुछ बेहतर जानने-समझने लगते हैं, आपमें खुलापन आता जाता है। दूसरों के जीवनों में हो रही घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में आप अपने जीवन को तौलते हैं और उनके विश्लेषण के बाद आपका दृष्टिकोण, आपका नजरिया, आपके विचार बदल भी सकते हैं।

संभव है आपके पास इतनी दूर, पश्चिमी देशों की यात्राएँ करने लायक पैसा न हो मगर इसके बावजूद आप यात्रा करके अपने नज़रिए को विस्तार दे सकते हैं। हल्की-फुल्की यात्राएँ कीजिए, ट्रेन या बसों में कीजिए, दूसरे किसी शहर घूम आइए, अपने आम गंतव्यों से परे कुछ दूर: दूसरी संस्कृतियाँ, जितना आप समझते हैं, उतनी दूर नहीं हैं!

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