हानिरहित नीमहकीमी से खतरनाक अन्धविश्वासों तक – 2 जुलाई 2013

मेरा मित्र अकेला नहीं था जो डॉक्टर की दवाओं और अंधविश्वासों के बीच झूल रहा था। यहाँ, भारत में बड़ी संख्या में लोग हैं, जो यह जानते हुए भी कि बीमार पड़ने पर डॉक्टर के इलाज के अलावा कोई चारा नहीं है, अपने धार्मिक और पारंपरिक रस्म-रिवाजों और कर्मकांडों को अंजाम देना नहीं छोडते। यही नहीं, वे साक्षात नीमहकीमों और कठबैदों, जो अपने चमत्कारों से बीमारियों का इलाज करने का दावा करते हैं, के पास भी जाने से नहीं हिचकिचाते। जैसा कि मैंने पहले बताया, उनकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे उन पर भी पूरा भरोसा नहीं करते बल्कि डॉक्टर की सेवाएँ भी लेते हैं! ऐसे लोगों के इतने उदाहरण मेरे नज़र में हैं कि मैंने सोचा एक और किस्सा आपको सुनाऊँ। अपनी किशोरावस्था में हम लोग कस्बे में रहते थे। जहां हम रहते थे वहाँ एक व्यक्ति था जो पीलिया का इलाज करने में माहिर समझा जाता था। वह डॉक्टर नहीं था, न ही दवाइयों का जानकार (pharmacist) था, दवाई बेचने वाला दूकानदार तक नहीं था। वह एक साधु था, एक धार्मिक व्यक्ति जिसे लोग बहुत पहुंचा हुआ साधु समझते थे कि जो अपनी अर्जित शक्तियों से पीलिया के रोगी को रोगमुक्त कर सकता था।

एक बार हमारा एक पड़ोसी पीलिया से ग्रसित हुआ तो उसकी इच्छा पर मैं उसके साथ इलाज के लिए उस साधु के पास गया। इलाज का तरीका बहुत सरल और सीधा-सादा था: साधु ने पड़ोसी को कुछ दिया, जो किसी वृक्ष की छाल जैसा नज़र आता था, और उससे कहा कि थोड़ा सा आगे की ओर झुकते हुए उसे अपने सिर पर रख ले। फिर साधु ने एक जग में पानी लिया और उसे पड़ोसी के सिर पर रखी जड़ीबूटियों पर और सिर पर उंडेलने लगा। जग में रखा पानी स्वच्छ था मगर जब वह उन लकड़ियों के टुकड़ों को छूता हुआ नीचे उसके चेहरे पर बहता था तो उसका रंग गहरा पीला हो जाता था। साधु ने तुरंत हमें बताया कि पीले रंग के पानी के साथ, दरअसल पीलिया रोग बाहर निकल रहा है। स्वाभाविक ही रोगी आश्चर्यचकित रह गया और उसे विश्वास हो गया कि इस इलाज से उसे लाभ हुआ है!

उस किशोरावस्था में भी मुझे उस चमत्कारिक इलाज पर शक था। मैं सोच रहा था कि वह लकड़ी की छाल किस पेड़ की थी, और मुझे लग रहा था कि अवश्य ही उसमें कोई रसायन होगा जो पानी के साथ रासायनिक क्रिया करके उसे पीले रंग में बदल देता था। पाठकों को यह बहुत मूर्खतापूर्ण लगेगा कि बहुत से लोग ऐसे इलाज पर भरोसा करते थे और वह साधु अपने इस ‘इलाज’ के कारण बहुत सम्मानित था!

कहने की आवश्यकता नहीं कि हमारा पड़ोसी डॉक्टर के पास भी गया… उसे भी उस अंधविश्वास पर भरोसा नहीं था, मगर भरोसा डॉक्टर पर भी नहीं था!

उस साधु जैसे पता नहीं कितने लोग हैं जो अपनी चमत्कारिक हिकमतों से विभिन्न बीमारियों का इलाज करने का दावा करते हैं और असंख्य ऐसे भी लोग हैं जो उनके पास बीमारियों के इलाज के लिए जाते हैं। डॉक्टर से भी इलाज कराते हैं मगर ऐसे ढोंगियों के पास भी ज़रूर जाते हैं। वे पथरी निकलवाने के लिए, कैंसर सेल निकवाने के लिए और दूसरे संक्रमित अंगों को निकलवाने के लिए सर्जरी करवाते हैं, मगर किसी जादूगर या चमत्कारी साधु से हाथ की सफाई और झाड़फूँक भी करवाते हैं।

यह तुलनात्मक रूप से हानिरहित अंधविश्वास है लेकिन आप जब सुदूर गांवों में जाते हैं तो पाते हैं कि वहाँ लोग इससे ज़्यादा अंधविश्वासी हैं और उनके अंधविश्वास, किसी दूसरे विकल्प के अभाव में, बेहद खतरनाक हो चुके हैं। वे लोग छोटी-मोटी, सामान्य बीमारियों को प्रेतबाधा समझते हैं और अपने बीमार बाल-बच्चों पर आए ऐसे ‘भूत-प्रेतों’ को भगाने के लिए ओझाओं के पास जाते हैं। इन ओझाओं द्वारा किए जाने वाले इलाज अजीबोगरीब तो होते ही हैं, बेहद क्रूर और पीड़ादायक, और कई बार बीमार व्यक्ति के लिए खतरनाक भी साबित होते हैं। भारत में इसे तंत्र कहा जाता है और यह आपको मध्य-युग में ले जाता है। आज भी लोग जादू-टोना करने का आरोप लगाकर महिलाओं की हत्या कर देते हैं।

निश्चय ही मेरा पड़ोसी या मेरा मित्र ऐसा नहीं समझते कि कोई जादू-टोना कर सकता है और ऐसा करने वाले की हत्या कर देनी चाहिए। वे अंधविश्वासी हैं मगर उनका स्तर दूसरा है; वे उन गाँव वालों जितना अंधविश्वासी नहीं हैं और आधुनिक, प्रगतिशील दुनिया से उनका संपर्क हो चुका है। फिर भी मैं समझता हूँ कि अपने व्यवहार से वे ऐसे अति-अंधविश्वासों को बढ़ावा ही देते हैं। वे उन्हें खत्म नहीं होने देंगे, बल्कि नीमहकीमों के पास इलाज कराते रहेंगे और अंधविश्वासों को ज़िंदा रखेंगे।

शिक्षित आधुनिक अन्धविश्वासी का अंतर्द्वंद – 1 जुलाई 2013

मेरे एक मित्र ने बताया कि एक बार वह अपने दो मित्रों के साथ अंधेरे में पैदल एक मीटिंग में शामिल होने जा रहा था। वे एक सामान्य भारतीय सड़क पर, आप जानते ही हैं कि भारतीय सड़कें कैसी होती हैं, चले जा रहे थे कि मेरे मित्र के पैरों में जोर का दर्द हुआ और वह चिल्ला उठा। दूसरों ने उसकी ओर देखा और टॉर्च जलाकर देखने लगे कि उसे क्या हो गया।

मेरा मित्र घबराहट में चिल्ला रहा था कि उसे किसी साँप-वांप ने काट खाया है और यह देखकर कि वह अपना पाँव पकड़कर बैठा है, उसके मित्र टॉर्च की रोशनी उसके पैरों पर डालकर देखने लगे। उसके पैर के पास ही उन्हें एक बिच्छू दिखाई दिया जिसकी पूंछ पर ऊंचा उठा हुआ डंक अभी भी चमक रहा था। मेरे मित्र को बिच्छू ने काट लिया था।

इतनी वेदना में भी सबसे पहला काम जो मेरे मित्र ने किया वह था उस बिच्छू को जान से मार देना। मेरे ख्याल से सभी, यह सोचकर कि किसी और को न काटे, यही करते। लेकिन मेरे मित्र ने उसे मारने का जो कारण बताया वह दूसरा था। उसका कहना था कि मारना ज़रूरी इसलिए था कि बिच्छू का जहर उसके शरीर में न फैले! निश्चय ही यह एक अंधविश्वास है क्योंकि जहर तो उसके शरीर में पहुँच चुका था और बिच्छू उससे दूर था। लेकिन यह भी एक बहुत छोटा सा अंधविश्वास है।

असली अंधविश्वास तो मैंने बाद में देखा जब मेरे उस मित्र ने बताया कि वे सीधे पास के गाँव में रहने वाले एक साधु के पास गए जो इतना पहुंचा हुआ था कि मंत्रोच्चार से बिच्छू का जहर उतारने की हिकमत जानता था।

जी हाँ, वे उस साधु के पास गए जिसने कुछ दक्षिणा लेकर मेरे मित्र पर अपना जादू आजमाया। उसने एक कपड़ा मित्र की जांघ में कसकर बांध दिया और कुछ तिनके इकट्ठा करके उन्हें झाड़ू की शक्ल में बांधकर मंत्र पढ़ते हुए ब्रश की तरह मित्र के पैर पर चलाने लगा। यह नाटक इसलिए किया गया कि ऐसा करने से न सिर्फ बिच्छू का जहर उसके शरीर में फैलना बंद हो जाएगा बल्कि वह बाहर निकल जाएगा। और वाकई मेरे मित्र ने जहर को धीरे-धीरे नीचे की ओर उतरते हुए महसूस किया। लेकिन वापस कार में बैठते ही उसके विचारों में आपसी कलह शुरू हो गया: वह एक पढ़ा-लिखा, विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त व्यक्ति था और किताबों में उसने पढ़ा था, विद्वानों के मुख से भी सुना था कि बिच्छू के काटने पर डॉक्टर को अवश्य दिखाना चाहिए। उसे इस पर भी भरोसा था कि साधु ने जहर उतार दिया है। फिर वह डॉक्टर के पास क्यों जाना चाहता था? लेकिन वह गया, दवाइयाँ खरीदीं और शायद इंजेक्शन भी लगवाया। वह बिच्छू के काटने के हादसे से पूरी तरह निपटना चाहता था: उसकी नज़र में वह दुगना सुरक्षित हो गया था; धार्मिक मंत्र भी पढ़वा लिए और वैज्ञानिक इलाज भी करवा लिया।

मैं इस वाकये के बारे में इसलिए लिख रहा हूँ कि आप देखें कि अंधविश्वास अच्छे-खासे, पढे-लिखे समझदार व्यक्ति को कहाँ पहुंचा देता है! उसे लगता है कि उसके विश्वास और उस अटूट विश्वास के मनोवैज्ञानिक प्रभाव के कारण साधु के मंत्रों ने अपना काम किया होगा। मैं जानता हूँ कि सिर्फ डॉक्टर के इलाज से ही बिच्छू के जहर से उसे छुटकारा मिला था।

इस व्यक्ति के सामने बहुत बड़ी समस्या है। वह दुविधा में है कि विज्ञान पर भरोसा करे या अपने अंधविश्वास पर। वास्तव में वह पूरी तरह दोनों में से किसी पर भी विश्वास नहीं करता! उसे यह विश्वास नहीं है कि सिर्फ साधु के मंत्र जहर उतार सकते हैं और डॉक्टर पर भी विश्वास नहीं है कि सिर्फ उसकी दवाइयाँ उसे जहर से मुक्त कर सकती हैं। पहले वह उसके पास जाएगा जो उसका इलाज ईश्वरीय शक्ति से करेगा और फिर डॉक्टर के पास भी जाएगा जो फीस लेकर उसका वैज्ञानिक इलाज करेगा!

यह एक दिमागी बीमारी है जो इस व्यक्ति को पूरी हिम्मत और आत्मविश्वास के साथ किसी एक पर भरोसा करने और उसके अनुसार निर्णय लेने से रोकती है। वह हमेशा बीच का रास्ता चुनेगा और दोनों पर विश्वास करेगा, दोनों विश्वासों के आधार पर निर्णय लेगा और इस तरह अपना समय और पैसा बर्बाद करता रहेगा! आशा ही कर सकता हूँ कि कभी न कभी ऐसी परिस्थितियों में उलझे लोग वास्तविकता को समझेंगे कि अंधविश्वास किसी की रक्षा नहीं कर सकता।

ग़ैर-हिन्दुओं के पास ऊंची हिन्दु पदवियां – उस धर्म में जो अपनाने से नहीं जन्म से मिलता है – 30 जनवरी 13

पिछले कुछ समय से मैं कुंभ मेले के ऊपर लिख रहा था, स्पष्ट है कि इस दौरान मैंने हिन्दुओं पर, भारतीयों पर, यहां के तीर्थस्थानों पर और शायद बाहरी देशों में मौजूद तीर्थस्थानों पर भी बहुत लिखा। हालांकि इस दौरान मैंने उन गैर-भारतीय साधुओं और गुरुओं के बारे में नहीं लिखा जो ज़ाहिर है, कुंभ-मेले में तीर्थयात्री या पर्यटक बनकर नहीं आए हैं, बल्कि नुमाइश के इस खेल का हिस्सा हैं।

मैंने पहले भी इसकी व्याख्या की थी कि हिन्दुत्व धर्म-परिवर्तन करके हिन्दु बनने की इजाज़त नहीं देता। आप इस्लाम अपना सकते हैं, ईसाई बन सकते हैं, लेकिन हिन्दुत्व धारण करने का कोई उपाय या विकल्प नहीं है। आप केवल जन्म से ही हिन्दु हो सकते हैं। यही वो कारण है कि बनारस के विश्वनाथ मंदिर, उड़ीसा में पूरी के जगन्नाथ मंदिर और दक्षिण भारत के अधिकतर हिंदु मंदिरों में आज भी गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है। और यह संदेश मंदिर के बाहर लगे साइनबोर्ड पर साफ़-साफ़ लिखा होता है जिसके कारण कोई भी विदेशी मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकता। मैंने एक बार इस तरह के धार्मिक नस्लवाद की व्याख्या की थी, लेकिन यह भी एक प्रकार से धर्म-परिवर्तन करके हिन्दु बनने की अवधारणा को खारिज करता है।

हास्यास्पद बात तो यह है कि हिन्दुत्व के व्यापारी यानी धार्मिक नेताओं और गुरूओं ने नफ़ा-नुक़्सान के चक्कर में अपने धर्म की राह ख़ुद ही छोड़ दी है। अख़बारों में रोज़ इलाहाबाद के कुंभ मेले में अपनी छटा बिखेर रहे अमेरिका, रूस, स्वीडन और अन्य देशों के साधुओं के क़िस्से छप रहे हैं। वो किसी भारतीय गुरू के भक्त नहीं हैं, न कोई सामान्य साधु हैं, वो ख़ुद ही गुरू हैं जिनके बड़े-बड़े पंडाल लगे हैं और वो अपने आस-पास मौजूद भारतीय गुरुओं द्वारा पूरी तरह स्वीकार्य और मान्य हैं, क्योंकि उन्हें उस पद तक लाने में हिन्दुत्व के एक बहुत पुराने धार्मिक संगठन का योगदान है, जिसके पास एक व्यक्ति को महामंडलेश्वर (अनुयायियों के एक समूह का प्रधान) की उपाधि देने का अधिकार है। और उस संगठन ने ऐसी पदवियां विदेशियों को भी दी! हालांकि अब सबको मालूम है कि ऐसी उपाधियां ख़रीदी जा सकती हैं, बस आपके पास पर्याप्त पैसे होने चाहिए।

हिन्दु धर्म तो इस बात तक की अनुमति नहीं देता कि कोई विदेशी मंदिर में प्रवेश करे, तो फिर यह कैसे मुमकिन है कि इसी धर्म का एक प्राचीन संगठन उन्हीं विदेशियों को अपने साथ जोड़ता है और यहां तक कि उन्हें ऊंचे पदों पर बैठाता है? अब वो खुद गुरू हैं और उनके अनेक अनुयायी हैं, कुंभ मेले में उनके तंबू गड़े हैं, बड़े-बड़े पंडाल सजे हैं, उनकी पूजा दुनिया के हर हिस्से में की जाती है- ज़ाहिर है तकनीकी रूप से ग़ैर-हिन्दु गुरुओं के चरणों में आस्थावान भारतीय हिन्दु भी बिछे हैं जो शायद अपने ही धर्म ग्रंथों से अनभिज्ञ हैं।

बात और बदतर तब हो जाती है जब आप इन सबको एकसाथ मिलकर इस त्योहार में अपनी दुकानें चलाते हुए देखते हैं। पश्चिमी गुरुओं और साधुओं की ठाठ भारतीयों से रत्ती भर भी कम नहीं है, वो अपनी रईसी की नुमाइश में और महिला अनुयायियों का आनंद लेने में भारतीयों की तरह ही कोई कसर नहीं छोड़ रहे। हालांकि इन उपाधियों पर विराजमान संन्यासियों के लिए क़ायदे से एक महिला से बात तक करना उचित नहीं है! एक पश्चिमी गुरू एक चुटकी राख 1100 रुपये में बेचने के लिए विख्यात है – लगभग 20 अमेरिकन डॉलर! इस कुंभ के मेले में वो ख़ूब पैसा बना रहे हैं, जबकि इस दौरान क़ायदे की बात करें तो उन्हें भौतिकवाद से खुद को अलग रखना चाहिए था।

यही कारण है कि मैं धर्म को विशुद्ध व्यवसाय मानता हूं। सब धर्म को अपनी सुविधा के हिसाब से संशोधित करते हैं, अपने हिसाब से उसका मतलब निकालते हैं, अपनी ख़ुद की परंपरा का निर्माण कर लेते हैं और फिर धर्म और भगवान को बेचने वाली दुकान खोलकर बैठ जाते हैं।

मुझे मालूम है कि वो विदेशी जो खुद को हिन्दु बताते हैं, मेरी बातों से सहमत नहीं होंगे, बल्कि उनमें से कोई भी गुरू मेरी बातों से सहमत नहीं होगा जिनकी दुकान धर्म से चलती है। आख़िरी बार जब मैंने इस विषय पर लिखा था तो उनलोगों द्वारा बहुत सी रोषपूर्ण प्रतिक्रियाएं मिली जिन्हें लगा कि मैं सच को बाहर ले आया हूं। मैं यह भी जानता हूं कि धार्मिक लोग, अनुयायीगण नियमित तौर पर मुझे मेरी बातों के लिए खरी-खोटी सुनाते रहेंगे, लेकिन वो उन गुरुओं के सामने सिर और पैर एक करके बिछे रहेंगे, भले ही वो उनसे पैसे ऐंठकर रईसी की नुमाइश करे और धर्म के मूल सिद्धांतों की ऐसी-तैसी करता रहे। घूम-फिरकर मैं दुबारा इसी निष्कर्ष पर पहुंचता हूं कि यह या तो दुखद है या हास्यास्पद – मैं तो हंसना पसंद करूंगा।

क्या है नागा साधू की मूल अवधारणा – मोह-माया का त्याग या गांजा पीने और नंग-धडंग रहने की छूट? – 29 जनवरी 13

जब आप कुंभ मेले पर लिखा कुछ भी पढ़ते हैं, तो सबसे पहले संभवतः उन दृश्यों का ख़्याल आपके मन में आता होगा जिन्हें समाचारों में ज़्यादातर दिखाया जाता है: गंगा की ओर दौड़ लगाते हुए हज़ारों नंगे पुरुष। अधिकतर लोगों को इस तथ्य की जानकारी है कि वो केवल पवित्र स्नान के लिए नंगे नहीं हुए हैं बल्कि निःवस्त्र रहना ही उनका वस्त्र है। उन्हें नागा साधू कहा जाता है और वो इतने रोचक तो हैं हीं कि मैं उन पर और उनके दर्शन पर एक लेख लिखूं।

नागा को सरल अर्थों में नंगा कह सकते हैं, तो वो सब नंगे साधू हैं। आप ये भी कह सकते हैं कि वो विरक्ति के चरम तक पहुंच चुके साधू हैं। एक साधू का सिद्धांत बेहद स्पष्ट है: वो मोह-माया से दूर रहते हैं। उन्होंने अपने परिवारों से हर प्रकार का संबंध तोड़ लिया है ताकि वो भावनात्मक बंधन से मुक्त रहें, वो हमेशा घूमते रहते हैं ताकि वो किसी भौगोलिक परिवेश से जुड़ाव न महसूस करने लगें और उनके पास धन-संपदा जैसी चीज़ें नहीं होती हैं। वो कुछ जमा करके या बचक करके नहीं रखते, उतना ही रखते हैं जितना हाथों में आता है और जितने से उस वक़्त का गुज़ारा हो जाएगा।

एक नागा साधू दुनियावी चीज़ों से एक क़दम और आगे बढ़ता है और वस्त्रों से भी अपना जुड़ाव समाप्त कर लेता है। अधिक से अधिक विरक्ति की प्रक्रिया में यह एक तार्किक अगला क़दम माना जाता है। जब आपके साथ आपके शरीर पर वस्त्रों के अलावा और कोई जुड़ाव नहीं रह गया तो वस्त्रों का परित्याग ही विरक्ति की दिशा में आपका अगला क़दम होगा। अगर आपके पास वस्त्र हैं, आपको उन्हें धोना होगा, तो ऐसे में आपके पास कपड़ों का एक दूसरा जोड़ा भी होना चाहिए। अगर आपके पास दो जोड़े पतलून हैं, तो एक आप पहनेंगे और दूसरे को रखने के लिए या तो एक थैला रखेंगे या कोई गठरीनुमा कपड़ा। अगर आपके पास एक थैला है तो आपको इस बात का ध्यान रखना होगा कि सोते हुए आप इसे कहां रखना है और यह ध्यान भी रखना होगा कि आप इसे कहीं भूल न जाएं। अगर कोई इसे चुरा लेता है, तो आप इसे एक तथ्य के रूप में स्वीकार नहीं कर पाएंगे, आपको दुख होगा: अंततः आप मोह-माया के चक्कर में आ ही गए। तो नागा साधू ने ऐसी किसी भी चीज़ों को रखने से ही इन्कार कर दिया।

नागा साधुओं को क़ायदे से ईश्वर के प्रति आकंठ प्रेम और अध्यात्म की गहराई में कुछ इस तरह रहना चाहिए कि उन्हें इस बात से फ़र्क़ ही न पड़े कि वो कैसे दिखते हैं या मौसम में धूप की रूखी तपिश है या ठंड की गला देने वाली कंपकपाहट। न ही उन्हें अपने शरीर से इतना जुड़ाव है कि वे उसे ताप या ठंड से बचाएं।

नागा साधू की मूल अवधारणा ये है और शायद प्राचीन समय में नागा साधू ऐसे ही होते थे। उनके पास कुछ भी नहीं हुआ करता था, कपड़े भी नहीं। आज आप देखेंगे कि उनके पास केवल वस्त्र नहीं हैं, उसके अलावा सबकुछ है। उनमें से कइयों के पास पैसे हैं, सोना है, ज़ेवर हैं, गाड़ी तक है, वो असल में विलासी साधू हैं! साधारण वस्त्रों वाले साधू ने कुंभ मेले में अपने अस्थायी पंडालों के निर्माण और उनकी सजावट में लाखों रुपये खर्च किए हैं! ठीक उसी तरह इधर-उधर घूमने वाले नागा साधू घूमते तो नंग-धडंग होकर हैं, लेकिन उनकी उंगली पर बेशकीमती अंगूठियां होंगी और अपना यौनांग दिखाने के लिए वो आपसे पैसे मांगेंगे। नागा साधुओं को मालूम है फ़ोटोग्राफ़र को कैसे पोज़ देना है, उन्हें यह भी मालूम है कि पश्चिम से इस मेले को देखने आईं युवा महिलाओं को कैसे अपनी नंगई दिखानी है, चूंकि वो जानते हैं उनकी तस्वीरें अंतरराष्ट्रीय मीडिया में छपेंगी, दिखायी जाएंगी। वो नशा करते रहते है, इसलिए सर्दी का उनपर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। क्या इसे विरक्ति कहेंगे?

सुनने में आया है कि इस बार के कुंभ मेले में महिला नागा साधुओं की भी एक जमात है, उनका शिविर अलग है, लोगों की पहुंच से दूर। अगर यह सत्य है, तो वे लोगों के बीच क्यूं नहीं आतीं जैसे पुरुष नागा कर रहे हैं? खै़र, क्या यह अजीबोगरीब बात नहीं है कि अगर कोई सामान्य आदमी सार्वजनिक रूप से से नंगा होकर घूमे, तो उसे अश्लील और आपराधिक माना जाएगा जबकि यही काम एक धार्मिक व्यक्ति करे, तो कोई समस्या नहीं! अगर आप ऐसा करेंगे तो यक़ीन मानिए आपको हिरासत में ले लिया जाएगा और ज़ुर्माना भी भरना पड़ेगा। अगर वो करते हैं, तो लोग उनकी तस्वीरें लेते हैं, तस्वीरें व्यापक पैमाने पर दुनिया भर में छपती हैं और लोग बाग़-बाग़ हो जाते हैं, न कि आहत होते हैं।

अजीब दुनिया नहीं है ये?

प्रदूषित गंगा से रोगों को आमंत्रण-सिर्फ पापों के धुलने तक सीमित नही है गंगास्नान 28 जनवरी 2013

पिछले सप्ताह मैंने बताना शुरू किया था कि निश्चित रूप से मैं कुम्भ मेलें में नही जा रहा हूं जो कि इलाहाबाद में पूरे जोर-शोर से चल रहा था। इसके कई कारण है एक तो मैं धार्मिक नही हूं और दूसरा वहां जाने में मुझे कोई फायदा नही दिखाई देता क्योकि वहां पर बालशोषण और बड़े-बड़े धन्धें होते हैं। वहां पर न जाने का एक बहुत बड़ा कारण गंगा का प्रदूषण है जो कि सिर्फ मेरे जैसे अविश्वासी या नास्तिक का ही नही बल्कि बहुत बड़े आस्तिक लोगों का भी न जाने का यही कारण हो सकता है।

इलाहाबाद में यमुना नदी पवित्र गंगा नदी में मिल जाती है और इलाहाबाद से फिर गंगा नदी ही अविरल बहती है। धार्मिक लोगों के लिये यह एक पवित्र स्थान है क्योकि पावन यमुना पतित पावन गंगा में ही समाहित हो जाती है जिससे उसकी पावनता दोगुनी हो जाती है। इसके अतिरिक्त इस जगह के पीछे एक कथा है कि यहां पर अमरता का अमृत गिरा था और इसलिये यह संगम स्थल मेले का मुख्य स्थान है। कुम्भ मेले में आने वाले लोगों का मुख्य उद्देश्य यही रहता है कि वह गंगा में डुबकी लगाये। ऐसा माना जाता है कि यह आपके पापों को धोता है। उनके लिये यह एक पवित्र स्नान है और पापों से मुक्त करता है। मुझे तो यह सबसे ज्यादा गंदगी वाली जगहों में से एक जगह लगती है जहां पर लोग अपने आप को धोते हैं। शायद यह जगह दो नदियों के संगम का सबसे ज्यादा प्रदूषित स्थान है। यमुना नदी दिल्ली, आगरा व अन्य शहरों का प्रदूषण और अपशिष्ट जल अपने साथ लाती है और गंगा नदी भी पहाड़ों से निकलकर मैदानों की सारी गंदगी को इसी में मिला देती है। क्या वास्तव में आप इस गंदगी में कूदना चाहते है जिसमें मानवीय और औद्योगिक अपशिष्ट होता है?

हांलांकि मैं जानता हूं कि उन अंधविश्वासियों को उस प्रदूषित जल में नहाने और कुछ घूंट पानी पीने से से रोकने का कोई रास्ता नही है। ऐसा माना जाता है कि यह आपके पापों को धोता है लेकिन यह भी सच है कि यह जल अपने साथ कई तरह की बीमारियां जैसे एलर्जी, त्वचा रोग, पेट सम्बन्धी रोग, पाचन समस्याएं और भी अन्य गंभीर बीमारियों को जन्म दे सकता है क्योकि इस पानी में प्रदूषण होता है जो कि हमारे प्रतिदिन पीने वाले पानी के प्रदूषण स्तर से कहीं अधिक होता है।

अगर आप अपने शरीर के साथ ऐसा करना चाहते है तो मुझे नहीं लगता कि आपको बीमार होने से कोई बचा सकता है। मुझे ऐसे कर्मकाण्डीय स्नान से आपत्ति है क्योंकि परोक्ष रूप से यह मुझे भी नुकसान पहुंचाता है। यह बताता हूं कि कैसे? 14 जनवरी के बहुत बड़े जनसैलाब के स्नान से पहले और बाद के किये गये जल के परीक्षणों से पता चला है कि उस जल में प्रदूषण का स्तर बहुत अधिक है और यह स्तर लोगों के नहाने के बाद दोगुना हो गया था।

यह आश्चर्य की बात नहीं है कि लगभग आठ करोड़ लोगों ने अपने पापों को धोने के साथ-साथ अपनी शारीरिक गंदगी को भी उसमें धोया था। उम्मीद की जा रही है कि अपने पूर्ण समय में कुम्भ मेले में दस करोड़ लोग स्नान करेंगे और इसके अतिरिक्त स्नान के साथ वह धार्मिक अनुष्ठानों का अपशिष्ट भी नदी में प्रवाहित करेंगे। ऐसा करने से आप हमारे देश की सबसे बड़ी नदी को प्रदूषित कर रहे हैं। यह एक सच है कि यह मेरे साथ-साथ हर दूसरे भारतीय को प्रभावित कर रही है और भारतीय ही क्यों पृथ्वी पर रहने वाले हर प्राणी को प्रभावित कर रही है।

अधिकारियों ने अब इस पानी में और अधिक पानी छोड़ा है क्योकि वह चाहते है कि इससे प्रदूषण का स्तर एक स्थान पर इतना अधिक न होने पाये और शायद वह यह भी नही चाहते कि इतने बड़े जनसैलाब मे बीमारी और रोगों के फैलने का समाचार अन्तर्राष्ट्रीय ख़बर बने।

निष्कर्ष यही है कि इस त्यौहार में अपनी भागीदारी देना उचित नही है जो कि एक आध्यात्मिक बकवास है, जिसमें मानवीय शोषण होता है। इसमें तो सिर्फ धन्धा ही होता है और यह आपके स्वास्थ्य के साथ-साथ हमारे पर्यावरण को भी हानि पहुंचाता है। अब आप खुद ही सोच सकते है कि आप क्या करना चाहेंगे?

ये संत हैं या राजनेता – शंकराचार्य ने कुम्भ मेले में जाने से मना कर दिया – 25 जनवरी 2013

14 जनवरी 2013 को इलाहाबाद में पहले दिन ही पवित्र गंगास्नान के साथ ही कुम्भ मेला का शुभारम्भ हो गया था, पर इससे काफी पहले से ही कुम्भ मेले के बारे में बाते शुरू हो गयी थी। तैयारियां तो वैसे भी चल ही रही थी, लोग शिविर में जाने से पहले ही उसकी बुकिंग कराने में लगे हुये थे, साधुओं, गुरुओं और सभी धार्मिक लोगों ने भी इलाहाबाद जाने की यात्रा प्रारम्भ कर दी थी। तभी मीडिया द्वारा भारत में सबसे बड़ी खबर प्रसारित की गयी कि शंकराचार्य स्वरूपानन्द ने कहा कि वह कुम्भ मेले में नहीं आयेंगे, क्यों नहीं आयेंगे? इसका कारण हैं उनका अहंकार या अहम, इसके विषय में आपको विस्तार से बताता हूँ।

हिन्दू धर्म में चार मुख्य आध्यात्मिक गुरू होते हैं, हिन्दू धर्म के अनुसार चार व्यक्ति मुख्य पदों पर आसीन होते हैं। अतः आप शंकराचार्य को हिन्दू पोप कह सकते हैं, परन्तु यहाँ चार होते हैं। स्वरूपानन्द ने बताया कि वह इस सबसे बड़े पर्व में शामिल नहीं होंगे। एक सनसनी।

अगर हम पिछले कुछ सप्ताह पहले की बात करें तो यह पता चलता है कि सरकारी अधिकारी व सरकारी महकमा पूरे इंतजामात करने में व्यस्त था क्योकि उन्हें आशा थी कि दस करोड़ लोग इस मेले में शामिल होंगे। करोड़ों का खर्चा था इस आयोजन में जिसे कि बहुत सी चीज़ों में जैसे लोगों को रहने की, सोने, खाने-पीने, शौचालय, सुरक्षा, चिकित्सीय व्यवस्था, खाद्य सामग्री एवं साफ-सफाई आदि पर खर्च किया गया। यह भी ध्यान दिया गया कि लोगों ने जहां अपने कैम्प की बुकिंग करायी है वहां पर उनकी सुविधानुसार व्यवस्था की गयी है या नही। व्यवस्था कर्मचारियों के पास उन जगहों के नक्शें है व सूची भी है जिन जगहों के लिये पहले से लोगों ने आवेदन किया हुआ था। वहां पर रहने के लिये आपको धन के साथ-साथ धार्मिक अधिकार भी चाहिये जिससे कि आप वहां रह सकें। यह बात तो तय है कि इन दोनो चीज़ों की शंकराचार्य के पास कोई कमी नहीं थी।

उन्हें स्थान दिया गया पर दुर्भाग्य से यह वह स्थान नही था जो वे चाहते थे। वह एक ही ब्लॉक चाहते थे जहां पर चारों शंकराचार्य एक साथ रह सकें। इसका कारण उन्होंने बताया कि कुछ लोग है जो अपने आपको शंकराचार्य कह रहें हैं और इसलिये वह चाहते हैं कि हम चारों शंकराचार्य एक साथ रहे नही तो लोग असमंजस की स्थिति में पड़ जायेंगें कि वास्तविक शंकराचार्य कौन है? और इसलिये ही वह चाहते है कि चारों शंकराचार्य एक साथ रहें। मेरी राय में तो वह बहुत ही अच्छा स्थान इसलिये मांग रहे थे जिससे मेले में आये हुए लोग आसानी से उन्हें देख सकें। वह चाहते थे कि साधू-सन्यासियों की भीड़ उनके चारों ओर हो।

सदियों से अभिनेताओं, प्रवक्ताओ, प्रवाचकों आदि लोगों को हमेंशा से ही बहुत ही अच्छा स्थान दिया गया है। शंकराचार्यों को भी हमेशा से विशेष व्यवस्था के साथ बहुत ही अच्छा स्थान दिया जाता रहा है जहां पर लोग आसानी से आ जा सकते है और या फिर उनके रहने की व्यवस्था मेन रोड पर ही रखी जाती है। इस बार जो स्थान उन्हें दिया गया उससे वो खुश नहीं थे इसलिये उन्होंने धमकी दे दी कि वह कुम्भ मेले में नहीं आयेंगे।

यहां तक कि मुख्यमंत्री ने भी उनसे अनुरोध किया कि वह कुम्भ मेले में आ जाये और वहां के धार्मिक माहौल में भी उनके इस निर्णय से फर्क पड़ा लेकिन शंकराचार्य तो अपनी जि़द पर ही अड़े रहे। वह अभी तक नही आये। उनके अनुयायी वहां पहले ही आ चुके थे लेकिन अभी उन्होंने वहां पर कदम नही रखा है। वे तो उत्तर प्रदेश में ही नही है बल्कि वह तो मध्य प्रदेश में अपने आश्रम में हैं शायद कुम्भ मेले के समाचार टेलीविज़न पर देख रहें हैं।

तो आपने देखा कि हिन्दू धर्म के सर्वोच्च धार्मिक नेताओं में अपने धर्म के प्रति कितना आदर और सम्मान है? और ये लोग गंगास्नान को कितना महत्वपूर्ण मानते होंगे? इसका जवाब तो स्पष्ट है कि बिल्कुल भी नही। हिन्दुओं का यह सबसे बड़ा पर्व है और धार्मिक लोगों के लिये वहां शामिल होना एक महत्वपूर्ण बात है लेकिन हिन्दू धर्म का उच्चपदासीन व्यक्ति इस मेले में शामिल नही होना चाहता क्योंकि मेले में उसे निश्चित स्थान पर उचित जगह नही दी गयी है। वह गंगा में स्नान नही करना चाहते, वह उस स्थान पर भी नही आना चाहते जहां अमरता का अमृत पृथ्वी पर गिरा था, वह तो बस अपना टेन्ट ऐसी व्यस्त जगह चाहते हैं जहां लोग आसानी से उन्हें व उनकी महत्वता को देख सकें।

यह एक अन्य प्रमाण है इस बात को साबित करने के लिये कि ये सभी धार्मिक नेता वास्तव में राजनेता है और वह इस बात पर जरूर गुस्सा हो जायेंगे अगर उन्हें विशिष्ट व्यक्तियों की तरह सम्मान नही मिलेगा क्योकि यह उनका अधिकार है। यह धर्म की नही सम्मान की बात है। बेशक! उन्हें यह बिल्कुल नही मंजूर है कि उनका टेन्ट ज़रा भी पीछे हो, थोड़ा कमतर भी हो या फिर वह उन साधु सन्यासियों के साथ भी उस ब्लॉक में नही रहना चाहते क्योकि फिर लोग शंकराचार्यों को न देखकर दूसरे साधु सन्यासियों को देखेंगे। इससे तो यही लगता है कि वह प्रदर्शन करना चाहते हैं। वैसे यह प्रदर्शन आप सभी शंकराचार्यों में देख सकते हैं, ये शंकराचार्य हमेशा चांदी के सिंहासन पर रहते है, आभूषणों से युक्त, अनुयायियों की भीड़ चारों ओर रहती है और भीड़ चेतावनी देते हुए चलती हैं कि एक महत्वपूर्ण व्यक्ति (शंकराचार्य) आ रहें हैं। इस उच्च पद पर बहुत अहंकार आ जाता है और अहंकार के साथ-साथ धन भी, जिससे एक बार फिर यह वैराग्य की अवधारणा गलत साबित हो जाती है जो ये लोग बड़ी विनम्रता से अपने प्रवचन में देते रहते हैं। वास्तव में धार्मिक पाखण्ड अपने चरम पर है।

शंकराचार्य स्वरूपानन्द पहली डुबकी और पहले स्नान के समय वहां पर नही थे। कुछ और तिथियां निर्धारित की गयी है जब बड़े-बड़े लोग वहां गंगास्नान करेंगे। हो सकता है कि बाद की तिथियों में शंकराचार्य वहां जाए, पर यह भी स्पष्ट है कि बाद में कुम्भ मेले में जाना व्यापारिक हित को दर्शाता है जिससे कि शिविरों से अच्छी दान दक्षिणा की प्राप्ति हो सके। यह बात न ही पवित्रता के बारे में है, न ही धार्मिकता, न ही पावनता और न ही गंगा में स्नान की है। उन्होंने यह साबित कर दिया कि यह सब बिल्कुल भी महत्वपूर्ण नही है और वैसे भी यह सब नाटक है।

सावधान! श्रीमान शंकराचार्य जी ऐसा करने से आप स्वर्ग में अपनी जगह को खो सकते है।

प्रदर्शन और धन कमाने का धन्धा – कुम्भ मेले में साधु और गुरु – 24 जनवरी 2013

कल मैंने बताया कि मैं कुम्भ मेले में नही जा रहा हूं क्योकि इस बात को मैं नही मानता कि गंगास्नान से पाप धुलते हैं और सिर्फ इसलिये ही नही बल्कि और भी वजहें है जिसमें मुझे दिलचस्पी नही है और वास्तव में वे चीजे़ मुझे नापसन्द है पर साथ ही खुशी इस बात की है कि इस समय मैं इलाहाबाद के नज़दीक नही हूं। एक अति महत्वपूर्ण बात जो कि मैने देखी वह यह कि इन साधुओं और बाबाओं में धनलोलुपता बहुत होती है। एक बहुत बड़ा धन्धा धर्म के नाम पर चल रहा है।

मैंने ऐसी रिपोर्ट देखी और सुनी हैं जो लोग कुम्भ मेले से वापस आये है उनकी यही प्रतिक्रिया थी कि वहां पर धर्म के नाम पर धन्धा चल रहा है। मैं उन गुरुओं, महात्माओं और साधुओं के बारे में उल्लेख कर चुका हूं जो इस समय कुम्भ मेले में हैं। वो सिर्फ साधु और गुरु ही नहीं हैं बल्कि उन्हें धन कमाने के बहुत तरीके आते है और यही उनका धन्धा है।

वे प्रवाचक तो है और प्रवचन देना उनका काम है और भाषणबाज़ी भी अच्छी कर लेते हैं। वे अनुष्ठान करते हैं, गंगा में डुबकी लगाते हैं, और लोगों को भीड़ भी अपने पास इकट्ठा किये रहते हैं। हांलाकि वह अपनी भाषणबाज़ी के लिये धन नही मांगते हैं बल्कि वह व्यक्तिगत रूप से लोगों से अनुष्ठान कराने के लिये अवश्य धन मांगते हैं। वे अपने शिविरों में अनुयायियों के साथ इकट्ठा रहते हैं और उनका प्रयास रहता है कि इस आयोजन पर अधिक से अधिक अनुयायियों की जमात बनाते जायें। उनके अनुयायी उन्हें उनसे मिलने, आर्शीवाद लेने और अनुष्ठान कराने का धन देते हैं।

ये सभी गुरु सेल्समैन है, इनके शिविरों में इनकी खुद की दुकाने हैं जिसमें ये माला, ताबीज़, उनके व देवताओ के चित्र बने हुए पेंडेंण्ड्स आदि सब बेचते हैं। अब आप यह तर्क मत देने लगना कि वह खुद तो दुकान पर नही बैठते और न ही पैसे लेते हैं तो इसके लिये आपको बता दूं जैसे बड़े-बड़े सफल दुकानों के मालिक खुद अपनी दुकानों पर नहीं बैठते बल्कि उनके स्टोर मैनेजर बैठते है ठीक वैसे ही इनकी भी दुकानें चलती हैं।

ये होटलों के मालिक भी होते हैं और ये बात इस साल मुझे पता चली है। ये साधु लोग अपने अनुयायियों के लिये आध्यात्मिक छुट्टियों का एक पैकेज भी रखते है जिससे वे लोग कुम्भ मेले में आये और उनके शिविर से किराये पर टेन्ट आदि ले सकें। हमारे स्थानीय समाचार पत्रों में उन सामग्रियों का किराया भी छपा था जिसका मूल्य भी अकसर दर्शनार्थियों की संख्या के अनुसार घटता बढ़ता रहता है, अगर ज्यादा भीड़ हुयी तो अधिक मूल्य और कम हुयी तो कम मूल्य होता है। मूल्यों का विभाजन तीन श्रेणियों नियमित दर्शनार्थी, विशिष्ट दर्शनार्थी और अति विशिष्ट दर्शनार्थी में किया जाता है।

जब मैंने कुम्भ मेले में लोगों के अनुभवो को पढ़ा,तो उनका कहना था कि उन्होंने कुम्भ मेले में ज़रा भी आध्यात्मिकता और दिव्यता का अनुभव नही किया। वहां पर जो भी चींजे़ थी चाहे वो दुकाने हो, खाने का सामान हो और जो लोग टेन्ट लगाये हुये थे उनका बस एक ही उद्देश्य था कि लोग उनकी दुकानों में आये या फिर ये कह लीजिये कि यह सब मज़े लेने के लिये आयोजित किया गया एक मेला हो।

इन सब के साथ सभी गुरू और साधू अपना धन कमाने में लगे हुए थे। कुम्भ मेले में ये बड़ी-बड़ी लग्ज़री कारों से आते हैं और वातानुकूलित टेन्ट में रहते हैं। ये सोने और चांदी के सिंहासन पर बैठते हैं, इनकी मेज पर चांदी के बर्तन रहते हैं और रत्नजडि़त सोने के हार पहनते हैं। ये यह दिखाते हैं कि वह कितने धनी है, अब बताइए कि ये किस प्रकार किसी पैसे वाले सेठ से भिन्न हैं! आप इन्हें धार्मिक व्यापारी कह सकते हो

हास्यास्पद बात यह है कि वह अपने आप को साधु और सन्यासी कहते है मतलब उन्होंने वैराग्य ले लिया है। साधु और सन्यासी ऐसा शब्द है जिसका मतलब है कि जिसका इस भौतिक दुनिया से कोई मतलब न हो और जिसका धन से कोई लेना देना नहीं है। उनका भौतिकवाद और धन का प्रदर्शन साधु शब्द के वास्तविक अर्थ को ही बदल देता है, और ये सब ही आप उस मेले में देखते हैं। इसलिये निश्चित रूप से मैं वहां नहीं जाऊंगा।