यहाँ सब कुछ आभासी नहीं है: जब सोशल मीडिया मित्रों को वास्तविक जीवन में एक-दूसरे से मिलवाता है! 16 दिसंबर 2015

सोशल मीडिया मित्रों को वास्तविक जीवन में एक-दूसरे से मिलवाता है

मेरे कल और परसों के ब्लॉगों की ध्वनि से कुछ लोगों को यह प्रतीत हो सकता है कि मैं सोशल मीडिया को कतई पसंद नहीं करता। लेकिन यह सही नहीं है। सोशल मीडिया दुनिया में बहुत सारे सकारात्मक परिवर्तन लेकर आया है और एक आधुनिक व्यक्ति के नाते मैं उससे होने वाले लाभों के प्रति सजग हूँ। लेकिन फिर भी मैं उसकी तुलना में वास्तविक जीवन को विशेष तरज़ीह देता हूँ।

मैं तकनीकी प्रगति पसंद करता हूँ। मैं शुरू से ही नई-नई मशीनों, जैसे कैमेरा, के प्रति आकर्षित होता रहा हूँ। अपने शहर में मैं कुछ पहले लोगों में से था, जिन्होंने पहले पहल डिजिटल कैमेरा खरीदा था और जब फोन आया तो बहुत से पड़ोसी फोन करने हमारे घर आते थे, पहला मोबाइल, जो मैंने खरीदा था वह एक बड़ी सी ईंट जैसा था क्योंकि तब मोबाइल फोन अभी आए ही आए थे और उस समय ऐसे ही होते थे! मेरा विश्वास है कि तकनीकी खोजें हमारी बहुत अधिक मदद कर सकती हैं। इंटरनेट मैं काफी समय से इस्तेमाल करता रहा था और स्वाभाविक ही एक दिन सोशल मीडिया नेटवर्क से भी जुड़ गया।

मैं यह कहना चाहता हूँ कि आज के दिन यह लोगों के साथ जुड़ने का एक प्रमुख तरीका है और इसकी तुलना किसी भी पुराने तरीके से नहीं की जा सकती! बहुत से मेरे परिचित, जिनसे मैं वास्तविक दुनिया में पहले से जुड़ा हुआ हूँ, अब नेट के ज़रिए भी मेरे साथ जुड़े हुए हैं और मैं नेट-संदेशों के माध्यम से उनसे एक साथ बातचीत कर सकता हूँ। इसी के साथ, उनके अलावा भी बहुत से दूसरे लोग हैं, जिन्हें मैं बिल्कुल नहीं जानता और जो मुझसे कभी रूबरू नहीं मिले हैं-जो मेरे शब्दों को पढ़कर, शायद उन्हें पसंद करके मेरे बारे में और भी अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं।

मैं एक ही समय में बहुत सारे लोगों से जुड़ सकता हूँ और उनमें से हर व्यक्ति इस बात का चुनाव कर सकता है कि वह और आगे पढ़ना चाहता है या नहीं! वे अपनी कंप्यूटर सेटिंग इस तरह रख सकते हैं कि जब भी मैं कुछ लिखूँ, वे पढ़ सकें या वह उनके स्क्रीन पर ही ना आए! मेरी नज़र में वह लोगों को चुनने का बहुत शानदार अवसर प्रदान करता है कि वे क्या करना चाहते हैं।

यह तो हुई लोगों से जुड़ने की बात। लेकिन उसके बाद, मुझे लगता है, एक कदम और रखने की ज़रूरत है। उन आभासी लोगों को वास्तविक जीवन में लेकर आने की। जब आपको लगता है कि आप किसी से ऑनलाइन जुड़े हैं तो वास्तव में वह बहुत एकतरफा एहसास होता है! सामने वाले के लिखे शब्द आप अक्सर पढ़ते हैं। आप उसके पोस्ट किए हुए चित्र देखते हैं और फेसबुक पर उन्हें ‘लाइक’ भी कर देते हैं। लेकिन संभव है, सामने वाला इस बात को नोटिस ही न करे कि इस तरह आप उसके कितने करीब हैं। वह नोटिस करे, इसके लिए आपको सीधे संदेश भेजना होगा, ईमेल करना होगा या फोन करना होगा या फिर रूबरू जाकर मिलना होगा।

और हमने इसे संभव किया है: मेरे कई ऑनलाइन मित्र मुझसे मिलने यहाँ आए हैं। भारतीय, जो जीवन के प्रति अलग नज़रिए को और सोचने के भिन्न तरीके को पसंद करते हैं, एक दिन के लिए या सप्ताहांत में यहाँ आते रहे हैं। दुनिया भर के लोग कुछ हफ़्तों या महीनों के लिए हमारी योग और आयुर्वेद की कार्यशालाओं में या विश्रांति शिविरों में शामिल होने आश्रम आते हैं।

इसी परिप्रेक्ष्य में मैं समझता हूँ कि वास्तव में सोशल मीडिया वास्तविक जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी है: जब कोई बताता है कि उन्होंने मेरे बारे में कहीं ऑनलाइन पढ़ा और फिर मेरे ब्लॉग पढ़ने लगे और उनसे उन्हें सहायता प्राप्त हुई। जब किसी ने मुझे ऑनलाइन देखा, वेबसाइट पर जाकर हमारे चैरिटी कार्यों के बारे में पढ़ा और किसी बच्चे के प्रायोजक बने। जब किसी ने मेरी ऑनलाइन टिप्पणियों को पढ़ा और मुझसे रूबरू बातचीत करने लंबी यात्रा करके भारत आ गए। जब किसी ने हमारे विश्रांति शिविरों के फोटो देखे और हमारे योग अवकाश शिविर में शामिल होने का निर्णय लिया।

मैं वास्तविक संपर्क में विश्वास करता हूँ और सोशल मीडिया महज इसका एक साधन है, उस दिशा में आगे बढ़ने का एक माध्यम। ऑनलाइन हो या ऑफ़लाइन, मैं उसकी वास्तविकता कायम रखना चाहता हूँ।

ऑनलाइन संसार – कितना झूठा, कितना सच्चा? 15 दिसंबर 2015

ऑनलाइन संसार – कितना झूठा, कितना सच्चा

कल मैंने लिखा था कि सोशल मीडिया को आप अपना दूसरा यथार्थ न बनने दें। क्योंकि अंततः वह झूठी दुनिया ही सिद्ध होता है! सोशल मीडिया पर दूसरों की टिप्पणियाँ पढ़ते हुए और तब भी जब आप खुद कुछ लिख रहे हैं या अपनी पढ़ी हुई कोई टिप्पणी साझा कर रहे हैं, इस बात को सदा याद रखें।

आपके लिए यह याद रखना आवश्यक है कि इंटरनेट पर कोई भी कुछ भी लिख सकता है। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि सभी लोग झूठ ही लिखते हैं मगर लोगों के लिए किसी भी बात को वास्तविकता से अधिक उजला दिखाना आसान होता है! कुछ शब्दों के हेर-फेर से एक उत्कृष्ट दिन साल का सर्वोत्कृष्ट दिन बन जाता है। कोई फोटो आपके मन में अपने प्रिय साथी के लिए लालसा पैदा कर सकता है कि वह आपको अपनी बाँहों में भर ले क्योंकि उस फोटो में मित्र को वैसा दिखाया गया है-लेकिन फोटो लेने से पहले हुई नोक-झोंक आप नहीं देख सकते…ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं!

यह सिर्फ दोस्त की तस्वीरों से गलत संदेश लेने का मामला ही नहीं है! जी नहीं, आपको वास्तव में यह बात समझनी होगी कि आभासी दुनिया, आभासी दुनिया है और आभासी ही रहेगी। निश्चित ही आप वहाँ शुभकामना संदेश लिखकर भेज सकते हैं और उन्हें खुश करने के लिए फेसबुक पर ‘लाइक’ क्लिक कर सकते हैं। लेकिन आप माउस क्लिक करके दुनिया को बचा नहीं सकते!

ओह, रुकिए! यहाँ मुझे भेद करना होगा: निश्चित ही बहुत सारे आंदोलन इन्हीं क्लिक्स और व्यूज़ की मदद से परवान चढ़ते हैं। बहुत सारे प्रतिरोध सिर्फ ऑनलाइन चलते हैं, जिनमें हज़ारों लोगों की आभासी भागीदारी होती है। लेकिन बहुत से घोटाले भी यही से उद्भूत होते हैं और मैं उन्हीं की बात कर रहा हूँ।

आप एक लड़की की भयंकर जन्मजात विकृति का चित्र देख सकते हैं, जिसके नीचे आपसे गुजारिश की जाती है कि चित्र को ज़्यादा से ज़्यादा लाइक और शेयर करें क्योंकि कोई अज्ञात और अनजान संगठन लड़की के इलाज के लिए हर लाइक पर पाँच डॉलर और हर शेयर पर 10 डॉलर दान देगा। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि ऐसा होने वाला नहीं है क्योंकि वास्तविक जीवन में ऐसा नहीं होता। यहाँ तक कि उस लड़की का फोटो भी वास्तविक नहीं होगा या पूर्णतया किसी दूसरे संदर्भ में लिया गया होगा!

न तो आप अफ्रीका के किसी देश की सरकार को किसी अपराधी को खोजने में अतिरिक्त प्रयास करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं और न ही फेसबुक से अपनी नीति बदलने की गुहार करती हुई आपकी टिप्पणी से वे अपनी नीतियाँ बदलेंगे।

अरे हाँ, मैं भूल रहा था: न तो किसी हिन्दू देवता का चित्र साझा करके आपको कोई अतिरिक्त कर्मा पॉइंट्स नहीं मिलने वाले हैं और न ही पाँच मिनट में उस संदेश को अपने दस दोस्तों के साथ साझा न करने पर उस देवता का कोप आप पर बरसने वाला है।

मैं इस तथ्य से पूरी तरह वाकिफ हूँ कि बहुत से ऑनलाइन रहने वाले लोग यह भेद नहीं कर पाते। उदाहरण के लिए हमारे एक कर्मचारी ने रमोना से पूछा कि क्या वाकई उसने कोकाकोला से 3 मिलियन रुपए जीते हैं, जैसा कि उसे उसके इनबॉक्स में मिला एक स्पैम बता रहा है!

ऐसे संदेशों का इन लोगों तक पहुँचना भी अपने आप में कोई अच्छी बात नहीं है लेकिन आखिर यह वर्ल्ड वाइड वेब के खेल का ही हिस्सा है! आप सिर्फ इतना कर सकते हैं कि सतर्क रहें और ऑनलाइन दुनिया की अपनी जानकारी को सदा अप टू डेट रखें। अपनी सोशल मीडिया साइट्स पर हर वक़्त नज़र रखें और हर ऑनलाइन पढ़ी हुई बात पर भरोसा न करें!

क्या सोशल नेटवर्किंग साइट्स जीवन में अकेलापन पैदा कर रहीं हैं? 14 दिसंबर 2015

क्या सोशल नेटवर्किंग साइट्स जीवन में अकेलापन पैदा कर रहीं हैं

मैं कभी-कभी सोच में पड़ जाता हूँ कि अंततोगत्वा, लंबे अंतराल के बाद सोशल मीडिया का हमारे समाज पर क्या असर होगा। हालांकि सोशल नेटवर्किंग की शुरुआत ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को आपस में जोड़ने के उद्देश्य से की गई थी, मुझे लगता है कि वास्तव में वह लोगों में अकेलापन पैदा कर रही हैं।

मैं इस नतीजे पर कैसे पहुँचा? बहुत आसान है: मैंने इस बात पर गौर किया है कि अधिकतर लोग सोशल नेटवर्किंग साइटों पर क्या देखते हैं और उस पर उनकी प्रतिक्रिया क्या होती है! उन साइटों के साथ उनका संबंध अत्यंत विरोधाभासी होता है: ऐसा प्रतीत होता है जैसे वहाँ उन्हें अपनी पसंद का पर्याप्त मसाला नहीं मिल पा रहा है और वे बार-बार उन्हीं साइटों को खोलते हैं लेकिन फिर खिन्न होकर उन्हें बार-बार बंद भी कर देते हैं। जो कुछ वे देखते हैं, उसी से यह उदासी पैदा होती है: वे क्या देखते हैं? पार्टियाँ करते हुए, प्रसन्नचित्त होकर समय बिताते हुए और कुल मिलाकर जीवन का आनंद लेते हुए मित्रों के चित्र-परिवार के साथ, अन्य मित्रों के साथ, बहुत सारे लोगों के बीच!

और आप? आप यहाँ बैठे हैं अकेले, अपने मोबाइल फोन, टेबलेट या कंप्यूटर स्क्रीन पर टकटकी लगाए। आप उस मौज-मस्ती का हिस्सा नहीं हैं। पार्टी आपके बगैर जारी है। आपका कोई अपना, साथी या जीवन साथी, नहीं है जो आपको कैंडल लाइट डिनर पर बुलाकर अचरज में डाल दे, जैसा कि एक मित्र ने पोस्ट किया है। आप किसी हिप पार्टी में नहीं जाते, जहाँ हर व्यक्ति झूम-झूमकर नाचता-गाता है और उल्लास में सुध-बुध भूल जाता है। और लगता है, आप उन सब मित्रों से भी दूर हैं, जो इनका विवरण नेट पर पोस्ट करते हैं।

आपका सोशल नेटवर्क, जिसे आपको दूसरे लोगों से जोड़ने के लिए बनाया गया है, वही आपको पूरी तरह अपने हाल पर छोड़ देता है, अकेला और तनहा। वह अगर न होता तो आपको पता ही नहीं चल पाता कि दूसरे किस प्रकार आपकी अनुपस्थिति में आपस में मिल-जुलकर मौज कर रहे हैं। संभव है, तब आप घर में कोई किताब पढ़ते हुए या नहाते हुए या कोई भी अपनी मर्ज़ी का काम करते हुए अपने आप में मस्त रहे आते।

या, कम्प्यूटर के पर्दे को ताकते हुए, नेट पर लिखने के लिए कोई समझदारी से भरी बात पर अपना दिमाग खपाते हुए या ख़ुशी मनाते हुए अपनी कोई पुरानी फोटो तलाशते हुए आप भी वास्तव में बाहर निकल सकते हैं। दोस्त क्या-क्या मौज-मस्ती कर रहे हैं, इसकी ऑनलाइन ताक-झाँक करने की जगह आप किसी दोस्त को फोन कर सकते हैं, उससे रूबरू बात कर सकते हैं!

इस तरह सोशल मीडिया आपको अकेलेपन की ओर ले जा सकता है, जैसा कि इंटरनेट के आने से पहले संभव नहीं था। तब आप हर वक़्त उपलब्ध होते थे, तब आप अपने सभी स्कूली और कॉलेज के दोस्तों से, अपने कार्यालयीन सहकर्मियों से और अपने रिश्तेदारों से एक साथ और हर समय जुड़े होते थे।

इस बात को तब आप अधिक शिद्दत के साथ नोटिस करते हैं जब आप किसी परेशानी में होते हैं और किसी दोस्त की मदद चाहते हैं, जब आप संदेशों के ज़रिए तो लोगों के सम्पर्क में होते हैं लेकिन उनसे रूबरू सम्पर्क नहीं होता। क्योंकि जब आप पर आसमान टूट पड़ा है, आपको किसी गले लगाने वाले की ज़रूरत होती है, न कि किसी आभासी आलिंगन की। कोई वास्तविक कंधा, जिस पर सिर रखकर आप आँसू बहा सकें। कोई आपके पास आए और आपकी बात सुने, आपके वास्तविक जीवन में आपके साथ खड़ा होने वाला ऐसा कोई शख्स।

न भूलें कि सोशल नेटवर्क महज साधन है, ऐसी सुविधा, जिससे आप वास्तविक जीवन के अनुभवों को अधिक गतिशील और पुख्ता बना सकें, न कि वह यथार्थ का विकल्प है कि उसमें लिप्त होकर आप अपनी वास्तविक दुनिया से ही कट जाएँ। अपने सामाजिक जीवन में उसे आनंद-वृद्धि का साधन बनाएँ। उसके गुलाम बनकर उसे यह इजाज़त न दें कि वह आपको अकेलेपन और अवसादग्रस्तता की ओर खींच ले जाए!

आपकी ‘सेक्स लाइफ’ कैसी है? पश्चिमी महिलाओं से भारतीयों द्वारा पूछा जाने वाला सबसे लोकप्रिय सवाल – 7 दिसंबर 2014

जब 2007 की शुरुआत में मैं आस्ट्रेलिया दौरे पर था, मैं उस महिला के पास दोबारा गया था, जिसके बारे में मैं पहले भी आपको बता चुका हूँ और जो लगभग पूरा दिन कंप्यूटर के सामने बैठकर गुज़ारती थी और हर वक़्त ऑनलाइन रहा करती थी। उसकी एक विशाल आभासी दुनिया थी और स्वाभाविक ही इस विषय में भी हमारी चर्चा हुई। जब अपने देशवासियों के ऑनलाइन व्यवहार के बारे में मैंने सुना तो…, क्या कहा जाए……. क्या आपको लगता है कि मुझे खुशी हुई होगी?

जब मैंने उससे पूछा कि दिन भर ऑनलाइन रहकर वह क्या करती रहती है तो मुझे पता चला कि उसका अधिकतर समय वास्तविक लोगों से बातचीत करते हुए गुज़रता है। वह सोशल मीडिया में बहुत सक्रिय है और सारा दिन विभिन्न लोगों के साथ चैटिंग करती रहती है।

हालांकि वह आस्ट्रेलिया से बाहर कभी नहीं गई मगर विभिन्न देशों के बारे में उसे बहुत कुछ पता है-और सारी जानकारी उसे कंप्यूटर के सामने बैठकर दुनिया भर के लोगों से बातचीत करते हुए प्राप्त हुई है। जब उसने उन जगहों के बारे में बारीक जानकारियाँ देना शुरू किया, जहाँ मैं हो आया था तो मैं प्रभावित हुए बगैर नहीं रह सका क्योंकि वह उनकी ऑनलाइन आदतों के बारे में वही बातें बता रही थी, जिनके बारे में मैं जानता था कि वहाँ के लोग वास्तविक जीवन में भी यही बातें करते हैं। उसके बाद वह इस प्रश्न पर आई कि भारतीयों का व्यवहार कैसा होता है! और वह वास्तविक जीवन से बहुत, बल्कि पूरी तरह, अलग निकला-मैं हँस पड़ा तो इसमें आश्चर्य क्या है!

उसने बताया: "यह अक्षरशः सत्य है कि जिस विषय पर भारतीय सबसे पहले चर्चा करना चाहते हैं वह सेक्स होता है! आप लिखना शुरू करते हैं; पूछते हैं, कैसे हैं, क्या हालचाल है आदि और वहाँ स्क्रीन पर यह सवाल उपस्थित हो जाता है: "आपकी सेक्स लाइफ कैसी है?" और जवाब देने में हीला-हवाला काम नहीं आएगा, सब कुछ बताना पड़ेगा! आप कहेंगे कि "बहुत अच्छी है" तो अगला प्रश्न होगा: "सप्ताह में कितनी बार सेक्स करते है?" या ऐसा ही कुछ!" वह पूरे समय हँसती रही और अंत में कहा कि वह बातचीत बंद कर देती है जब वे पूछते हैं, "कैमेरा चालू कर सकती हैं क्या?"

मुझे भी हँसना ही पड़ा! आप दुनिया पता नहीं किस कोने में बैठे हुए व्यक्ति से यह सब कैसे पूछ सकते हैं कि उसकी सेक्स लाइफ कैसी है या कितनी बार सेक्स करते हैं? उसने बताया कि वह खुले दिमाग वाली महिला है और सेक्स पर कभी-कभार बात करने पर उसे कोई एतराज़ नहीं है-लेकिन हर वक़्त? और सिर्फ वही: सेक्स? बिल्कुल नहीं!

उसने यह नतीजा निकाला कि या तो भारतीय हर वक़्त सेक्स के बारे में ही बात करते रहते होंगे या फिर बिल्कुल नहीं करते होंगे और इस कारण उस कुंठा को ऑनलाइन बाहर निकालते होंगे! उसकी बात सही थी और मैं सहमत था। भारतीय लोग विपरीत लिंगियों से कभी सेक्स विषयक बात नहीं करते। इसे उचित नहीं माना जाता। लेकिन ऑनलाइन वे स्वाभाविक ही आज़ाद महसूस करते हैं। अपने दिमाग में चल रही सनसनीखेज सेक्सी बातों को बाहर निकालने का मौका आखिर उन्हें ऑनलाइन ही मिल पाता है-अन्यथा उन्हें इन बातों को मन में दबाकर रखना पड़ता है, ज़बान पर हर वक़्त लगाम लगानी पड़ती है!

यह मूलतः सारे भारतीय समाज की समस्या है-लेकिन उसकी ऐसी अभिव्यक्ति वाकई हास्यास्पद है! कल्पना कीजिए कि यह अगर वास्तविक जीवन में हो जाए! आप किसी से मिलते हैं और फिर: "हैलो, क्या हालचाल है?"-"बढ़िया है, आप कहिए, आपकी सेक्स लाइफ कैसी चल रही है?" 🙂

जो पुरुष जो अपनी लड़कियों को ढँककर रखना चाहते हैं वही दूसरों की लड़कियों को नग्न देखने के सबसे ज़्यादा उत्सुक होते हैं! 5 अगस्त 2014

मैंने कल जिस विषय की तरफ इशारा किया था, उस पर आज ज़रा विस्तार से चर्चा करना चाहता हूँ: भारतीय पुरुषों का बहुत बड़ा पाखंड-और दूसरे देशों के पुरुषों का भी, जहाँ यही स्थिति पाई जाती है-कि वे चाहते हैं कि उनकी पत्नियाँ और लड़कियाँ ढँकी-छिपी रहें। वास्तव में मैं तो यह समझता हूँ कि वे भावनाओं के जंजाल में फँसे हुए होते हैं इसलिए बहुत पाखंडी रवैया अख़्तियार कर लेते हैं। और उनके इस रवैये का संचालन एक बार फिर उसी शक्ति के, यानी धर्म के, हाथों में होता है!

अगर आप ऐसे लोगों की पत्नियों और लड़कियों के साथ उनकी बातचीत सुनें तो आपको हमेशा उनके आदेश, बल्कि चेतावनियाँ सुनाई देंगी, जो वे अपनी स्त्रियॉं को देते रहते हैं, जिनमें उन्हें शालीन, मर्यादित और सादे वस्त्र पहनने के लिए कहा जाता है। अपनी कम से कम त्वचा दूसरे पुरुषों को दिखाई दे, इसका विशेष ख्याल रखने की हिदायत दी जाती हैं। ये शिक्षाएँ प्रकारांतर से स्त्रियॉं को यह बताती हैं कि अगर उनके साथ बलात्कार या कोई यौन दुराचार होता है तो उन्हीं का दोष माना जाएगा! उन्हें अपने घुटने, कंधे और सिर ढँककर रखने होंगे, जिससे कोई भी पुरुष उनकी ओर यौन आकर्षण न महसूस करे। यही सब बातें उनके पिता और उनके पति उन्हें सिखाते हैं।

अब अगर आप इन लड़कियों के पिताओं के ऑनलाइन व्यवहार पर नज़र डालें या यह जानने की कोशिश करें कि वे व्हाट्सऐप या फेसबुक पर किस तरह की तस्वीरें अपने मित्रों के साथ साझा करते हैं तो आप आश्चर्यचकित रह जाएँगे: वे अपने दिन का बहुत बड़ा हिस्सा अर्धनग्न महिलाओं की तस्वीरों को ताकते हुए बिताते हैं! वे "हॉट इंडियन गर्ल्स" शीर्षक वाले पेज फॉलो करते हैं, ऐसी समाचार एजेंसियों की सदस्यता ग्रहण करते हैं, जो उनकी ईमेल पर हर हफ्ते "हॉटेस्ट पिक्चर्स ऑन द वेब" जैसी तस्वीरें भेजती रहती हैं और जब आप उनकी पसंदीदा हस्तियों की जानकारी लेंगे तो उनमें प्रसिद्ध सुपर मॉडेल्स को अंगवस्त्रों और बिकनियों में पाएँगे। अधिकतर लोग शायद असली पॉर्न ढूँढ़ने और देखने से कतराते हैं-लेकिन अगर उन्हें यह विश्वास हो जाए कि यह पूरी तरह गोपनीय, सुरक्षित और व्यक्तिगत रहा आएगा तो वे उन्हें भी अवश्य देखेंगे।

कोई इससे अधिक पाखंडी क्या हो सकता है? आप सोचते हैं कि महिलाओं का अपनी त्वचा की नुमाइश करना गलत है, यहाँ तक कि आप अपनी पत्नी को भी नंगा देखने से कतराते हैं मगर दूसरी औरतों को, जो दूसरे पुरुषों की पत्नियाँ और बेटियाँ हैं, नंगा या अधनंगा देखने के लिए लालायित रहते हैं!

आपकी यह प्राकृतिक और उत्तेजक इच्छा होती है इसलिए आप उसे पसंद करते हैं! आप जिज्ञासु होते हैं, आप अपने अंदर मौजूद सभी इंद्रिय-संवेदनाओं और उत्तेजनाओं को जानना और महसूस करना चाहते हैं। यह बहुत प्राकृतिक है! लेकिन फिर जब आप सोचते हैं कि आप वहाँ, उन वेबसाइटों पर क्या कर रहे थे तो अपराधबोध से भर जाते हैं! फिर आप उन महिलाओं के बारे में अनुमान लगाने लगते हैं, उनका मूल्यांकन करने लगते हैं! फिर आप उन्हें गालियाँ बकना शुरू कर देते हैं, ऐसी-ऐसी बातें उनके बारे में कहते हैं, जिन्हें अपनी लड़कियों और पत्नियों के बारे में आप सुनना पसंद नहीं करेंगे! सुन लेंगे तो क्रोध से भर उठेंगे! लेकिन इसमें क्या शक कि आप उन अजनबी औरतों को देखना पसंद करते हैं।

यह सब बहुत विकृत और घृणित है, यह गलत है और यह भयंकरतम है कि इसका नतीजा बलात्कार में परिणत होता है। ऐसे लोगों द्वारा ही, जिन्होंने अपनी नैसर्गिक इच्छाओं का दमन किया होता है, बलात्कार और यौन दुराचार किया जाता है क्योंकि वे अपनी दमित इच्छाओं को इससे आगे काबू में नहीं रख पाते। ऐसे लोग सबसे बड़े पाखंडी होते हैं। और उन्हें धर्म ने ही पाखंडी बनाया है। धर्म ने सेक्स को वर्जित किया। धर्म ने सेक्स का मज़ा लेने वालों और कामोत्तेजना महसूस करने वालों के दिलों में अपराधबोध भर दिया। धर्म ने आदेश दिया कि महिलाओं को ढँका-छिपा जीवन बिताना चाहिए। धर्म कहता है कि स्त्रियाँ ही पुरुषों को बलात्कार करने के लिए उद्यत करती हैं।

पाखंड, धर्म, अपराधबोध और बलात्कार! भयानक रूप से एक दूसरे से नाभिनालबद्ध हैं! .

बिटिया, अपने आपको ढँककर रखो, नहीं तो अंकल अपना संयम खो बैठेंगे! 4 अगस्त 2014

नेट पर एक तस्वीर देखने के बाद मैं विचलित हो उठा हूँ। चित्र में एक छह साल की भारतीय बच्ची को कागज का बना एक बैनर लिए दिखाया गया था, जिस पर लिखा हुआ था: "अंकल, अपनी बेटी को सर से पाँव तक कपड़े पहनने के लिए कहें। कपड़े बदन ढँकने के लिए बनाए गए हैं, उसे उघाड़ने के लिए नहीं।"

मेरी फ्रेंड लिस्ट में से एक भारतीय मित्र ने इस तस्वीर को साझा किया और मैंने देखा कि उस तस्वीर को हजारों लोगों ने साझा किया है। मैं यह देखकर विचलित हो उठा कि इस मूर्खतापूर्ण संदेश को इतने लोगों ने साझा किया है! मुझे आशा थी कि उन लोगों ने भी यह बात समझी होगी कि तस्वीर में हाथ की सफाई की गई है, कि इबारत को फॉटोशॉप करके बच्ची के बैनर पर लगाया गया है। नेट पर थोड़ी सी खोजबीन के बाद मुझे मूल तस्वीर प्राप्त हो गई, जिस पर यह संदेश लिखा था: "मेरी मान-मर्यादा की सुरक्षा कीजिए। मैं आपकी बेटी हूँ!"

सबसे पहली बात, जिस पर मुझे एतराज़ है, वह यह कि आप किसी और की खींची हुई तस्वीर उठाते हैं और इस छोटी सी बच्ची की तस्वीर का उपयोग करते हुए, उसके बैनर पर अपना संदेश चस्पा कर देते हैं, जो आपके लिए तो सत्य हो सकता है लेकिन उस बच्ची या उसके माता-पिता के लिए नहीं! आप एक गलत उद्देश्य के लिए उस बच्ची का उपयोग कर रहे हैं!

और ऊपर से आप तस्वीर देखने वालों को ऐसा भद्दा संदेश देते हैं! मैं विचार करने लगा कि न सिर्फ तस्वीर को फॉटोशॉप करने वाला बल्कि तस्वीर साझा करने वाले सभी लोग मानसिक रूप से कितने बीमार होंगे! अवश्य ही यह किसी न किसी धर्मांध व्यक्ति का काम है, जो यह दावा करता है कि वह भारतीय या हिन्दू संस्कृति की रक्षा कर रहा है।

प्रकारांतर से यह तस्वीर यही दर्शाती है कि वह बच्ची चाहती है कि सभी पुरुष-यहाँ अंकल शब्द उन सभी पुरुषों के लिए इंगित है-अपनी बेटियों को बलात्कार से बचाकर रखने के लिए उन्हें ज़बरदस्ती सर से पाँव तक ढँककर रखें!

इसके अलावा यही लोग नेट पर, सोशल मीडिया पृष्ठों पर, जो इसीलिए बनाए गए होते हैं कि अंतःवस्त्रों में या उनके बगैर भी महिलाओं की तस्वीरें दिखाई जाएँ, जिससे पुरुष उन्हें देखकर काल्पनिक यौन सुख प्राप्त कर सकें, महिलाओं की नंगी-अधनंगी तस्वीरें देखते हुए आनंद-मग्न रहते हैं। आखिर ये लडकियाँ और महिलाएँ भी किसी की बेटियाँ हैं-आप उन्हें बिना कपड़ों के क्यों देखना चाहते हैं, जबकि दूसरा कोई आपकी बेटी या बहन के थोड़े से खुले कंधे या घुटने भी देख ले तो आपको एतराज़ हो जाता है?

मैं सिर्फ एक छोटी सी टिप्पणी लिखकर इसका उत्तर देता हूँ:

"क्योंकि, अन्यथा प्रिय अंकल, अगर आप एक छह साला बच्ची को बिना कपड़ों के देख लें तो आपकी कामेच्छा जाग्रत हो जाएगी और आप बलात्कार करने हेतु उद्यत हो जाएँगे। हमारे धर्म में और हमारे समाज में यह पूरी तरह जायज़ और सामान्य बात है और हज़ारों साल से यह प्रथा चली आ रही है: पिताओं और चाचाओं द्वारा अपनी बेटियों का बलात्कार! वास्तव में छोटी-छोटी बच्चियों को खुद अपने कपड़े पहनते समय अपनी सुरक्षा का ख्याल रखते हुए शरीर को पूरी तरह ढँकने वाले कपड़े ही पहनना चाहिए क्योंकि उनके चाचा खुद पर और अपनी कामेच्छा पर काबू नहीं रख पाते! वे अपने पैन्टों का ध्यान नहीं रख पाते- किसी भी स्त्री का शरीर देखने पर वस्त्र खुलकर नीचे गिर जाते हैं, चाहे स्त्री की उम्र 6 साल हो या 60 साल!"

और यह सच है। मैं निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि उन लोगों की बेटियाँ और भतीजियाँ यौन प्रताड़ना और बलात्कारों से बची नहीं रह सकतीं, जो इन वाक्यों से सहमत हैं! विभिन्न सर्वेक्षणों में यह बात सामने आई है कि लगभग 93% बलात्कार उन्हीं लोगों द्वारा अंजाम दिए जाते हैं, जो पीड़िताओं के करीबी और यहाँ तक कि करीबी रिश्तेदार तक होते हैं-जैसे पिता, चाचा या परिवार के दूसरे नजदीकी सदस्य या घनिष्ठ मित्र!

आज की महिलाओं की सुरक्षा पर धर्म और संस्कृति के भयावह असर के बारे में मैंने बहुत कुछ लिखा है। इन्हीं के चलते समाज में यौन अपराध बढ़ते चले जा रहे हैं और कई बार मैं सोच में पड़ जाता हूँ कि आखिर छोटी-छोटी बच्चियाँ अपने ही घर में अपनी सुरक्षा किस तरह सुनिश्चित कर सकती हैं। यह असंभव है। अगर कोई बलात्कारों के लिए महिलाओं के कपड़ों को ज़िम्मेदार ठहराता है और इसलिए बुरका, ढँकी हुई बाँहें और पैर और संभव हो तो, सिर और चेहरा ढँककर रखने की सलाह देता है, तो यकीन मानिए वह व्यक्ति नंगे शरीर को देखकर कभी भी अपने आप पर काबू नहीं रख सकता। धर्मग्रंथों में ऐसी कहानियाँ बड़ी संख्या में मौजूद हैं और ये धर्मग्रन्थ उन्हीं बलात्कारियों की पूजा-अर्चना करने का उपदेश देते हैं।

दुनिया भर में हर जगह सामान्य अपराधी ही बलात्कार में लिप्त होते हैं। भारत ही ऐसा देश है जहाँ यह साफ़-साफ़ यहाँ की संस्कृति और विचारधारा से उद्भूत है, उसके कारण सामान्य व्यक्ति भी जो बलात्कार में लिप्त होता है स्वयं को अपराधी भी नहीं समझता।

सोशल मीडिया में उस तस्वीर को साझा करने वालों की बड़ी संख्या मेरे सामने इस बात का स्पष्ट प्रमाण प्रस्तुत करती है।

और मुझे आश्चर्य होता है कि वाकई यह समाज कितना बीमार समाज है!

Friendshiplog.com – अपने मित्रों की याद को साझा कीजिए- 28 अक्तूबर 2013

मुझे लोकप्रिय होने का अनुभव रहा है। मैंने उस चमक-दमक और ऐश्वर्य को नजदीक से देखा है, जो लोकप्रिय होने के नतीजे में स्वतः प्राप्त हो जाते हैं। मेरे सामने लोगों का हुजूम होता था और सभी मेरे करीब आना चाहते थे। वह सब बड़ा उत्तेजक है, जीवंत और शानदार है-लेकिन मैंने इससे एक चीज़ सीखी है: आप भीड़ के करीब नहीं हो सकते। भले ही ख्यातिप्राप्त यशस्वी व्यक्ति दिन में अपनी जयजयकार के बीच हाथ हिलाकर अभिवादन स्वीकार करते हुए गर्व से भर उठते हों मगर को शाम को उन्हें भी किसी कंधे की ज़रूरत पड़ती है, जिस पर अपना थका हुआ सिर रखकर वे सुकून पा सकें। ऐसा कोई व्यक्ति, जिसके साथ वे दिल से हंस सकें या रो सकें, अपनी भावनाओं को साझा कर सकें। ऐसा एक मित्र!

जिन लोगों को अपनी परेशानियों के वक़्त मित्र की ज़रुरत पड़ी है वे जानते हैं कि जीवन में इस संबंध (व्यक्ति) की क्या महत्ता है! इन सम्बन्धों को हर वक़्त तरोताजा बनाए रखना आवश्यक है-और इसी उद्देश्य को सामने रखते हुए हमने एक वैबसाइट शुरू की है: Friendshiplog.com!

यह एक अलग तरह का सोशल मीडिया पेज है। बहुत से परिचितों, या अपरिचितों को जोड़ने के स्थान पर इसमें व्यक्तिगत संबंध स्थापित करने की सुविधा है। फेसबुक पर बहुत सारे लोग नए सम्बन्धों, नए मित्रों और यहाँ तक कि नए कारोबार आदि की तलाश में रहते हैं। बहुत से लोग समझ नहीं पाते कि इतने सारे अनजान लोगों की रोज़ आने वाली फ्रेंड्ज़ रेक्वेस्ट्स का क्या करें? Friendshiplog पर आप अपने वास्तविक मित्रों से मिलते हैं, जिन्हें आप व्यक्तिगत रूप से जानते हैं, उनसे प्रेम करते हैं और जिनके साथ बिताए समय की आपके पास बहुत सी साझा स्मृतियाँ हैं!

आप उन स्मृतियों को लिखकर उनका रिकॉर्ड रख सकते हैं, समझ लीजिए, डायरी के रूप में उन यादों का अभिलेख तैयार कर सकते हैं-और आप उन्हें कई भाषाओं में लिख सकते हैं! पेज के फुटर पर आप अंग्रेज़ी, हिन्दी, जर्मन, स्पेनिश और फ्रेंच भाषाओं को सिलैक्ट कर सकते हैं। अपने मित्र को उन पुराने वक़्तों की याद दिलाइए जब आपने एक साथ सुखद समय गुज़ारा था या उनकी मदद के लिए धन्यवाद दीजिए। आपके बारे में पढ़कर और यादों में बसे उन संस्मरणों को पढ़कर आपके मित्र बहुत खुश होंगे। अपने अनुभवों की कहानी लिखकर अपने मित्रों को आभासी आलिंगन में भर लीजिए।

एक छोटी सी कथा लिखने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगता-दोस्ती की शुरुआत से अब तक का पूरा विवरण देने की आवश्यकता नहीं है! एक छोटी सी घटना चुनिए, कोई मज़ेदार दिन, कोई रोचक बातचीत, कोई दुखद लमहा, जब मित्र ने आपकी मदद की हो, और उसे अपने मित्र के साथ यहाँ साझा कीजिए। जब आपका मित्र उसे पढ़ेगा तो वह यादों में खो-सा जाएगा! आप उसकी खुशी की कल्पना नहीं कर सकते!

आपके संस्मरण पढ़कर दूसरे भी अपनी मित्रताओं को लेकर प्रेरित होते हैं, उन पर हंस सकते हैं या आपकी कहानी के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ सकते हैं। आज की दुनिया में, जहां टीवी, अखबार और इंटरनेट नकारात्मक खबरों से भरे हुए हैं, यह वैबसाइट एक नखलिस्तान की तरह हो सकती है, जहां इन नकारात्मक खबरों के चलते अवसादग्रस्त होने पर आप अपनी और दूसरों की मित्रताओं के विषय में सकारात्मक बातें साझा करके सुकून का अनुभव कर सकते हैं। लोगों द्वारा साझा की गईं मित्रता के अटूट बंधन की कहानियाँ पढ़कर मानवता में अपनी आस्था को पुनर्जीवित कीजिए।

तो आइए, अपने मित्रों तथा मित्रताओं की कहानियों के जरिये हमसे जुड़िये!

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किसी दुसरे की ज़िम्मेदारी ओढ़ने की कोशिश भी मत कीजिए- 24 अक्तूबर 2013

कल मैंने बताया था कि कैसे एक मित्र ने अपने गृहप्रवेश के समारोह में मेरे परिवार को आमंत्रित नहीं किया और उससे मैं काफी हद तक उदासीन बना रहा, हालांकि शुरू में मुझे हल्का सा दुख ज़रूर हुआ था। लेकिन कहानी वहीं समाप्त नहीं हुई-आज मैं आपको उस घटना के चलते पैदा हुए क्रोध, भ्रम और दूसरी भावनाओं के विषय में बताता हूँ।

सभी जानते हैं कि मैं बहुत स्पष्टवादी व्यक्ति हूँ और ज़्यादा देर तक किसी बात को दिल में नहीं रखता। दो दिन बाद जब हमारी भावनाएँ और सारा मामला थोड़ा ठंडा पड़ गया, मैंने संक्षेप में यह कहानी और अपनी भावनाएँ फेसबुक पर शेयर कर दीं। मेरी आदत है कि मैं कभी किसी की पहचान फेसबुक पर ज़ाहिर नहीं करता और इस मामले में भी अपने नियम का पालन करते हुए सिर्फ अपनी भावनाओं का निष्कर्ष ही फेसबुक पर व्यक्त किया।

लेकिन हमारा एक मित्र, जो उस मेजबान का रिश्तेदार था, उस फेसबुक पोस्ट पर बहुत नाराज़ हुआ। फेसबुक पर अपनी नाराजगी ज़ाहिर करते हुए और मेरी नास्तिकता पर, साथ ही फेसबुक पर भी हज़ारों लानतें भेजते हुए उसने उस मेजबान की पहचान ज़ाहिर कर दी, जो मैं बिलकुल नहीं चाहता था। इसलिए मैंने फेसबुक पर उसके कमेन्ट को हटाकर उसे फोन किया और सारे मामले को स्पष्ट करने का आग्रह किया।

संक्षेप में यह कि हमारे उस मित्र ने, जो मेजबान के रूप में उस आयोजन में शामिल हुआ था, मुझसे कहा कि मैंने न्योता न मिलने की बात को गलत ढंग से लिया है और मेजबान का घर इतना छोटा है कि सारे मेहमानों का स्वागत करने में दिक्कत हो सकती थी, और वैसे भी मैं वहाँ आयोजित धार्मिक कार्यक्रम और मिर्च-मसालेदार खाना पसंद नहीं करने वाला था और सबसे ऊपर यह कि कुछ दिन बाद वह मेजबान मुझे अलग से, कुछ ज़्यादा पारिवारिक भोजन के लिए आमंत्रित करने वाला था।

एक हफ्ते बाद मुझे जन्मदिन की मुबारकबाद देते हुए उस मेजबान का फोन आ गया। मगर उस मामले पर अपना स्पष्टीकरण देते हुए उसने बिल्कुल अलग बात बताई। उसने कहा कि उसने किसी को भी बुलाया नहीं था लेकिन सबको आयोजन की तारीख बताई थी। यह बड़ा अजीबोगरीब बयान था- उसके मेहमान यह कैसे जान पाए कि किस समय आना है? क्या यह महज संयोग था कि सभी मेहमान एक समय पर आयोजन में पहुँच गए? अंततः उसे भी अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने माफी मांगी। हैरान करने वाली बात यह थी कि उसने इस बात से इंकार किया कि उसने बाद में हमें, अलग से खाने पर बुलाने की बात कही थी और दूसरे स्पष्टीकरणों से भी, जो उस मित्र द्वारा मुझे उसकी तरफ से दिये गए थे।

अब यह स्पष्ट था कि हमारा मित्र उस गलती पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहा था जो उसने नहीं, उसके रिश्तेदार मेजबान ने की थी। अगर कोई हमें कुछ दिन बाद खाने पर बुलाना चाहता था तो वह हमें उसी दिन फोन करके बता सकता था। फोन करने में कितना वक़्त लगता है! बाद में उस मित्र से कई बार बात हुई और मैंने उससे कहा कि कोई भी अपने सारे परिवार की और सारे रिश्तेदारों की ज़िम्मेदारी नहीं ले सकता। ऐसा कर पाना संभव ही नहीं है क्योंकि उनके अपने अलग व्यक्तित्व हैं और वे अपने निर्णय खुद लेते हैं, जो, हो सकता है उससे बिल्कुल भिन्न हों, जो उसी परिस्थिति में आप लेते! मैंने उसे यह भी बताया कि मेरे सब भाई और पत्नी तक अपने कामों की ज़िम्मेदारी खुद उठाते हैं!

मेरे मित्र ने मुझसे झूठ बोला था। यह एक अजीब-सा, अनोखा एहसास था, खासकर इसलिए कि झूठ बोलने की उसे कतई आवश्यकता नहीं थी। पहले मुझे न बुलाए जाने का दुख था फिर फेसबुक पर अपनी भावनाओं को व्यक्त करने पर प्रताड़ित होने का और अब यह, कि मुझसे व्यर्थ झूठ बोला जा रहा है।

फिर भी, मेरे अंदर उस मित्र के प्रति कोई दुर्भावना नहीं है और इस पूरे वाकये के बावजूद हमारी मित्रता पर कोई आंच नहीं आएगी। क्यों? क्योंकि मैं समझ रहा हूँ कि उसने ऐसा क्यों किया। वह मेरे दुख को कुछ हल्का करना चाहता था और चाहता था कि मेरे और उसके रिश्तेदार मेजबान के बीच कोई कटुता न रहे। यह प्रेम और मित्रता से लबालब कोमल हृदय से की गई मासूम कोशिश थी। मैं जानता हूँ, यह उसका स्वभाव है-दूसरों की गलतियों की अथवा उनके कामों की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर लेना। लेकिन अगर कोई दूसरा भोजन करता है तो उसका पेट नहीं भरने वाला। अगर कोई दूसरा कोई गलती करता है तो उसकी जिम्मेदारी आप नहीं ले सकते! दूसरों की गलतियों का बोझ आप क्यों ढोना चाहते हैं? मुझे अच्छा लगता अगर दूसरे की ज़िम्मेदारी लेने की कोशिश करने की जगह वह सिर्फ इतना कहता: "मुझे पता नहीं, उसने तुझे क्यों नहीं बुलाया"। आखिर, मित्रता इस बात की मोहताज नहीं होनी चाहिए कि आप मुझे अपने हर आयोजन में बुलाएँ ही।

अंत भला तो सब भला! यह कहकर कि यह इतनी बड़ी बात नहीं है, मैंने सारे मामले को रफा-दफा किया। अपनी भावनाएँ और विचार दर्ज करने की गरज से मैंने सोशल मीडिया में इस विषय पर लिखा और अब यहाँ लिख रहा हूँ। इन विषयों पर हमारे विचार और धारणाएँ अलग हो सकते हैं मगर मैं जानता हूँ कि उसके दिल में प्रेम, मित्रता और नेकनीयती हैं- और मैं उससे अभी भी उसी तरह प्रेम करता हूँ।

मेरा पूरा ब्लॉग, विषयानुसार वर्गीकृत, डाउनलोड के लिए उपलब्ध- 10 अक्टूबर 2013

अभी आप जो पढ़ रहे हैं वह मेरे ब्लॉग के अंग्रेज़ी संस्करण की 2117वीं प्रविष्टि है। उनके हिन्दी अनुवाद का कार्य जारी है। मैंने 1 जनवरी 2008 से रोज़ यह ब्लॉग लिखना शुरू किया था और इस बीच एक दिन का भी अवकाश नहीं लिया है। ये सभी प्रविष्टियाँ विषयानुसार 97 अलग-अलग समूहों में विभक्त की गई हैं। ब्लॉग के विकास की ओर अब हमने एक और कदम बढ़ाया है: अब आप इन अलग-अलग समूहों को खरीदकर अपने ई-बुक रीडर, मोबाइल या कंप्यूटर पर डाउन लोड भी कर सकते हैं!

अपने काम के बारे में सामूहिक रूप से अपने मित्रों को बताने के उद्देश्य से शुरू की गई यह आलेख-श्रंखला अब मेरे विचारों की दैनिक अभिव्यक्ति का माध्यम बन चुकी है-और जिसे लोग रोज़ पढ़ते भी हैं। मैं खुश हूँ कि इस दौरान मुझे इन आलेखों पर उत्साहजनक प्रतिक्रियाएँ और फीडबैक मिलते रहे। मैं इस बात पर भी खुश हूँ कि इतने अधिक लोग मेरे विचारों को पढ़ना पसंद करते हैं, भले ही कई बार मेरे विचार उनके विचारों और धारणाओं से मेल नहीं खाते।

कुछ लोग मेरे जीवन के बारे में विस्तार से जानना चाहते थे इसलिए 2011 से प्रति रविवार मैंने आत्मकथात्मक टिप्पणियाँ लिखनी शुरू कीं। 144 ब्लॉग प्रविष्टियों में फैली ये टिप्पणियाँ ‘मेरा जीवन’ नाम से वर्गीकृत की गई हैं और मेरी जीवन-कथा कहती हैं।

कुछ दिन बाद ही हमने हर शनिवार, एक और नियमित ब्लॉग शुरू किया, जो स्वादिष्ट व्यंजनों को पकाने की विधियां पाठकों तक पहुंचाता है। अगर आप खाना पकाना पसंद करते हैं तो यह ब्लॉग समूह आपके लिए ही है! परंपरागत भारतीय व्यंजनों से लेकर विभिन्न नाश्ते और मिठाइयाँ बनाने की विधियाँ इन 146 ब्लोगों में आपको पढ़ने को मिल सकती हैं, जिनमें उन्हें पकाने की विधियाँ बहुत विस्तार से समझाई गई हैं! आप इन ब्लोगों को डाउनलोड करके घर में ही, जब आपका जी चाहे, एक से एक बढ़कर स्वादिष्ट व्यंजन तैयार कर सकते हैं!

कुछ ब्लॉग प्रविष्टियाँ नियमित नहीं दी जातीं लेकिन उन्हें भी आप डाउनलोड कर सकते हैं। जैसे एक लोकप्रिय विषय है धर्म, जिस पर 107 आलेख उपलब्ध हैं। सेक्स, भारतीय संस्कृति, पश्चिमी संस्कृति, रिश्ते, बच्चों की परवरिश, गुरु आदि बहुत से विषय हैं जिनमें आपकी रुचि हो सकती है और आप उन्हें डाउनलोड करके अपनी सुविधानुसार पढ़ सकते हैं!

शुरू से ही लोगों की मांग थी कि इन ब्लोगों को पुस्तकाकार में छपा जाए लेकिन हमेशा कोई न कोई महत्वपूर्ण योजना और अन्य खर्चे आड़े आ जाते थे इसलिए आज भी हमारे पास इन आलेखों की कोई लिखित प्रति नहीं है। फिर भी, कम से कम अब आप अपने पसंदीदा ब्लॉग-समूहों को ऑफलाइन भी पढ़ सकते हैं। सिर्फ 5 यूरो अदा करके आप किसी एक समूह के सभी आलेखों को पीडीएफ़ फ़ारमैट में डाउनलोड कर सकते हैं! उसे आप ई-बुक रीडर, मोबाइल या कम्प्यूटर में ट्रांसफर कर सकते हैं और जब मर्ज़ी हो, पढ़ सकते हैं। अपनी रसोई में व्यंजन बनाने की विधि सीख लीजिए या बिस्तर पर आराम फरमाते हुए या बगीचे में बेंच पर बैठकर विभिन्न समाजों के बीच मौजूद सांस्कृतिक विभिन्नता के बारे में जानकारी प्राप्त कीजिये!

आप या तो हमारी शॉपिंग-कार्ट पर चले जाएँ और पसंदीदा कैटेगिरी पर पहुँचकर उसे डाउनलोड कर लीजिये। या अगर आप कोई ब्लॉग पढ़ रहे हैं तो स्क्रॉल करके नीचे पहुंचिए और मेरे हस्ताक्षर के बाईं तरफ आपको लिंक मिल जाएगा। हर कैटेगिरी के पृष्ठ के ऊपरी सिरे पर भी लिंक दिया हुआ है।

सबसे अच्छी बात यह है कि जब आप कोई कैटेगिरी खरीद लेते हैं तो उस कैटेगिरी के भविष्य में लिखे जाने वाले ब्लॉग्ज़ भी आप मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं! जब भी मैं उस कैटेगिरी का कोई ब्लॉग लिखूंगा, आप उसका अपडेटेड पीडीएफ़ भविष्य में कभी भी फ्री डाउनलोड कर सकते हैं!

इन ब्लॉग-कैटेगिरी की बिक्री से होने वाली आय से, स्वाभाविक ही, हमारे बच्चों के लिए जारी चैरिटी परियोजनाओं के कार्यान्वयन में सहायता मिलेगी-क्योंकि सब कुछ हम उन्हीं के लिए कर रहे हैं! मेरे लिए लिखने का एक दूसरा कारण यही है कि आपको कुछ अच्छा पढ़ने को मिले और हमारे बच्चों को कुछ बेहतर खाने को! 🙂

नोट: हिंदी के ब्लॉग का अनुवाद कार्य जारी है अतः यह सुविधा अभी केवल ब्लॉग के मूल अंग्रेजी संस्करण के लिए ही उपलब्ध है!