सामान्य टूरिस्ट गाइडों से हम किस तरह अलग हैं? 22 जुलाई 2015

पिछले दो ब्लॉगों में मैंने आपको बताया कि कैसे हमारे आश्रम में एक टूर गाइड आया जो चाहता था कि अपने कमीशन में से एक हिस्सा हमें नियमित रूप से दे दे। बिल्कुल शुरू ही में मैंने ज़िक्र किया था कि आम टूर गाइडों से हम बहुत अलग तरह से यह काम करते हैं और इसी अंतर को अपने व्यापार के लिए सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं। ठीक इसी बात को और स्पष्ट करने के लिए मैं आज का ब्लॉग लिखना चाहता हूँ।

पिछले दो दिनों के ब्लॉग पढ़कर आप भी इस बारे में समझ गए होंगे। मैंने बताया था कि हमारे कर्मचारी लोगों से टिप (बख्शीश) नहीं माँगते, बल्कि इसके विपरीत, हम अपने मेहमानों से हमारे किसी भी कर्मचारी को टिप न देने की गुज़ारिश करते हैं। कारण है- समानता, निष्पक्षता। हम चाहते है लोग प्रसन्न और संतुष्ट हों। यह उनके लिए भी सच है जो यहाँ काम करते हैं और उनके लिए भी जो यहाँ विश्रांति प्राप्त करने या किसी प्रशिक्षण हेतु आते हैं या पर्यटक के रूप में आते हैं! संतोष की मुख्य बात यह होती है कि जो उन्हें प्राप्त होता है, उसकी जायज़ कीमत वे अदा करते हैं और कोई उनका गलत लाभ नहीं उठाता। हम सिर्फ ग्राहक नहीं बनाना चाहते, हम दोस्त बनाना चाहते हैं!

भारत भर के टूर और पर्यटन प्रस्ताव हम तब लेकर आए जब दोस्तों ने हमसे इनके लिए खुद कहा। उन लोगों ने कहा, जो पहले से हमें जानते थे और जो इस आशा से हमारे आश्रम में मेहमान बनकर आते थे कि हम उनके पर्यटन कार्यक्रमों की व्यवस्था में सहायता करेंगे। उन्हें आशंका होती थी कि कहीं उनके साथ धोखाधड़ी न हो, कोई दुर्व्यवहार न हो। कुछ लोगों के साथ पहले ऐसा हो चुका होता था और वे आश्वस्त होना चाहते थे, इसलिए हमारे पास आते थे कि हम उन्हें सही जानकारियाँ और घूमने-फिरने की उचित राय देंगे और मदद करेंगे।

इन सब बातों का ध्यान रखते हुए हमने यह प्रस्ताव रखा कि खुद मेरे भाई यशेन्दु और पूर्णेन्दु उनके साथ गाइड के रूप में जाएँगे और आज तक यही व्यवस्था लागू है। अगर वे यहाँ नहीं हैं तो हम कोई टूर कार्यक्रम नहीं रखते क्योंकि आज तक हमें ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिल पाया है, जो इतना विश्वसनीय हो कि अपने मेहमानों के साथ उसे भेजा जा सके। अपने मेहमानों को हम उसके भरोसे छोड़कर निश्चिन्त हो सकें। वास्तव में इसे हम अपना कर्तव्य समझते हैं कि अपने मित्रों को हर तरह के कमीशन व्यापार से मुक्त रखें, जिसमें सामान्य टूर गाइड खुले आम, धड़ल्ले के साथ लिप्त रहते हैं!

आप कल्पना नहीं कर सकते कि न जाने कितनी बार मेरे भाइयों को विदेशी पर्यटकों की खरीदी पर दुकानदारों ने 80-80 प्रतिशत तक कमीशन देने का प्रस्ताव रखा! लेकिन हम यह नहीं करते! वे आपके साथ दुकान पर खड़े होंगे और अगर आप चाहेंगे तो दुकानदार के साथ मोल-भाव भी करेंगे, जिससे आपको उचित कीमत पर आपकी मनचाही वस्तु मिल सके! जब आप पूछेंगे कि दुकानदार द्वारा बताई जा रही कीमत पर सामान खरीदना ठीक होगा या नहीं, वे आपको सच्चा और प्रामाणिक जवाब देंगे! जहाँ आप सैर करना चाहेंगे, जहाँ जाना चाहेंगे, वे पूरी कोशिश करेंगे कि आप उचित खर्च पर वहाँ जाकर वहाँ का लुत्फ उठा सकें। भारत में गाइडेड टूर लेना हो तो हमारे साथ दूसरी और सुविधाओं के अलावा यह एक अतिरिक्त लाभ भी आपको हो जाता है!

इसके साथ ही, हमारा ड्राईवर भी पूरी तरह विश्वास-योग्य है अतः जो भी उसके साथ कहीं आना-जाना चाहता है, निश्चिंत होकर उसके साथ कहीं भी जा सकता है। न दुर्घटना की चिंता, न ही पर्यटन-स्थलों से बाहर निकलने पर उसे खोजने की ज़रूरत। न कहीं भटकने का डर, न इस बात का कि वह किसी मिलीभगत वाली दुकान पर आपको ले जाएगा और बाद में आकर अपना मोटा कमीशन प्राप्त लेगा!

हम आशा करते हैं कि किसी न किसी दिन हमें एक ऐसा गाइड मिल जाएगा, जिस पर हम पूरा भरोसा कर सकेंगे लेकिन तब तक हमें खुद अपने आप पर निर्भर रहना होगा। लेकिन एक बात तय है, मैं किसी को भी एक ऐसे व्यक्ति के साथ कहीं नहीं भेज सकता, जिस पर मुझे पूरा भरोसा नहीं है कि वह उसके साथ धोखेबाज़ी नहीं करेगा!

और इसी बात पर, मेरे मित्रों, हम दूसरे गाइड टूरों से अलग हैं!

एक अधार्मिक आश्रम धार्मिक प्रश्नों के क्या उत्तर देता है – 11 फरवरी 2015

कल मैंने आपको बताया था कि जैसे-जैसे मुझमें और मेरे परिवार में परिवर्तन आता गया वैसे-वैसे हमारे आश्रम में भी परिवर्तन आता गया। अब वह एक गैर-धार्मिक आश्रम बन गया है, जिसे लोग पसंद करते हैं, खास कर अगर वे गुरु और धर्म की खोज में या, पूजा-अर्चना करने यहाँ नहीं आए हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि ऐसे लोग हमसे पूछताछ नहीं करते! ऐसे लोगों से हम क्या कहते हैं?

अगर आपके पास समय कम है और आगे नहीं पढ़ना चाहते तो एक वाक्य में मैं इसका उत्तर बताता हूँ: हम उनसे हमारे यहाँ न आने के लिए कहते हैं। लेकिन विस्तार से इसका उत्तर मैं आगे लिख रहा हूँ।

जब हमारे बारे में कोई लिखित पूछताछ करता है तो उसके ईमेल की पंक्तियों के बीच पढ़कर ही हमें बहुत सी बातों का एहसास हो जाता है। जब कोई व्यक्ति हमारी नज़र में उपयुक्त नहीं होता तो यह आसानी के साथ पता चल जाता है: उसकी भाषा से, लिखने के तरीके से और यहाँ तक कि उसके नाम से भी अकसर उसके धार्मिक रुझानों और उनकी तीव्रता का पता चल जाता है। कुछ संप्रदाय खास तरह के नामों का प्रयोग करते हैं और दूसरों के लिए भी, अर्थात हमारे लिए भी, उनके सम्बोधन अलग तरह के होते हैं।

आम तौर पर हम उन्हें नम्रतापूर्वक मना कर देते हैं। न सिर्फ अपनी मानसिक शांति के लिए बल्कि उनके भले के लिए भी। हम पहले से जानते हैं कि वे यहाँ अपने समय का पूरा आनंद नहीं उठा पाएंगे! उन्हें यहाँ अच्छा नहीं लगेगा और उन्हें वे अनुभव नहीं मिल पाएंगे, जिनकी तलाश में इतनी दूर यात्रा करके आएँगे!

लगातार मंत्रोच्चार और धार्मिक समारोहों का माहौल उन्हें हमारे आश्रम में नहीं मिलेगा। यहाँ कोई साधू-संत नहीं हैं और न ही ध्यान लगाने के लिए अक्सर प्रोत्साहित किए जाने वाला दार्शनिक ज्ञान उन्हें यहाँ उपलब्ध होगा।

जीवन में जिन बातों को वे लोग महत्व देते हैं, हम लोग उन बातों पर विश्वास ही नहीं करते। और इसलिए ये सेवाएँ हम प्रदान भी नहीं करते और स्वाभाविक ही वे यहाँ आकर असंतुष्ट रह जाएँगे!

और ऊपर से, यहाँ आकर वे अपनी धार्मिकता का प्रदर्शन करने के अलावा और कुछ नहीं कर पाएँगे, कोशिश करेंगे कि किसी तरह उनकी आस्था का प्रचार कर सकें, उसे बिकाऊ माल की तरह यहाँ बेच सकें। अक्सर दूसरे यह पसंद नहीं करते और अगर वे हमारे मेहमान हैं तो दूसरे सभी यहाँ असुविधा महसूस करेंगे और आश्रम में हर वक़्त अशांति का माहौल बना रहेगा।

इसलिए हम उन्हें यहाँ आने के लिए क्यों कहें? हम अपने यहाँ व्यर्थ ही अप्रसन्न और बोझिल वातावरण निर्मित होता क्यों देखें? जी नहीं, हम बड़ी नफासत के साथ उन्हें मना करते हैं। अक्सर लोग समझ जाते हैं-और मेरी नज़र में यह इसका सबसे ईमानदार तरीका है।

वे अपने जैसे लोगों के बीच रहें और हम अपने जैसे लोगों के साथ रहें। यही सबसे उचित है। 🙂

पूरी तरह धर्म रहित अनुभव के लिए हमारे आश्रम में आपका स्वागत है – 10 फरवरी 2015

जैसा कि मैंने पहले ज़िक्र किया था, एक व्यक्ति ने मेरे बारे में शंका ज़ाहिर की थी कि मैं सदा से नास्तिक होते हुए भी एक धार्मिक प्रवचनकार का ढोंग किया करता था और बाद में जब मुझे लगा कि अब अधार्मिक या नास्तिक हो जाना लाभ पहुँचा सकता है तो मैंने अपना ‘वास्तविक चरित्र’ उजागर कर दिया और अधार्मिक और नास्तिक हो गया। मैंने यह भी स्पष्ट किया था कि कैसे यह मूर्खतापूर्ण होता क्योंकि धार्मिक और आस्तिक बने रहना आर्थिक रूप से मेरे लिए अधिक लाभप्रद था। मैं एक बार फिर कहना चाहता हूँ कि वृन्दावन जैसे तीर्थ स्थान में, जहाँ हर साल हजारों धार्मिक तीर्थ यात्री आते हैं, एक धार्मिक आश्रम ही आर्थिक रूप से ज़्यादा लाभप्रद हो सकता था। क्या आप ऐसा नहीं मानते?

इसमें कोई शक नहीं कि जब मैं धर्म से दूर हुआ तो मैंने अपने अच्छे-खासे, जमे-जमाए व्यवसाय का त्याग किया था, जो लोगों को बड़ी संख्या में आश्रम की ओर खींच सकने में समर्थ होता। बड़ी संख्या में मेरे अनुयायी थे, जो नियमित रूप से आश्रम आते और ऐसी पृष्ठभूमि वाला प्रतिष्ठित आश्रम होने के नाते तीर्थयात्रियों और दूसरे श्रद्धालुओं के लिए वह एक आदर्श स्थान बन जाता। जैसा कि वृन्दावन के कई दूसरे आश्रमों के साथ हुआ है, निश्चय ही हमारे आश्रम का भी विकास होता और नियमित समारोहों, धार्मिक कार्यक्रमों आदि के कारण वह व्यावसायिक रूप से अच्छी सफलता प्राप्त करता।

लेकिन खुद में हुए परिवर्तन के साथ मैंने ईमानदार बने रहने का फैसला किया। हम हमेशा घोषित रूप से कहते रहे कि सांप्रदायिक लोगों से हमारी पटरी नहीं बैठ सकती। धर्म और ईश्वर से विमुख होने की घोषणा भी मैंने सार्वजनिक रूप से की थी और इसलिए सभी लोगों को वैसे भी पता था कि हमारा आश्रम दूसरों से अलग है। लेकिन शायद आपको आश्चर्य होगा कि वास्तव में यह अच्छा ही साबित हुआ।

अब लोग यहाँ आकर रहते हैं और धर्मरहित अनुभव का आनंद लेते हैं। उन्हें यहाँ भारतीय संस्कृति में घुलने-मिलने का अवसर मिलता है लेकिन क्योंकि हम कोई धार्मिक संस्कार या कर्मकांड आयोजित नहीं करते इसलिए किसी प्रकार के अवांछित कामों को अंजाम देने की उन्हें ज़रूरत नहीं होती।

हमारे आश्रम में पूजा-पाठ, प्रार्थना या कोई और संस्कार (कर्मकांड) करने के लिए आपको 4 बजे सुबह उठने की ज़रूरत नहीं है। पाबंदी के साथ मौन व्रत रखने का न तो कोई नियम है और न उसका कोई नियत समय। मासिक-धर्म के दौरान इस तथ्य को उजागर करने के लिए कोई विशेष चिन्ह पहनना महिलाओं के लिए आवश्यक नहीं है जिससे भोजन के वक़्त उन्हें अलग बिठाया जा सके। किसी भी तरह के विशेष वस्त्र पहनने का यहाँ कोई नियम नहीं है। हमारे यहाँ कोई गुरु नहीं है कि उसके दैनिक प्रवचन सुनना या उसके चित्र की पूजा-अर्चना करना आपके लिए ज़रूरी हो। फलस्वरूप हमारे यहाँ आने वाला कोई मेहमान भी किसी खास आस्था का प्रचार नहीं करता और न ही अपना मतावलंबी बनाने की कोशिश करता है।

यहाँ आप जैसा चाहें, जिस तरह चाहें, अपनी मर्ज़ी के अनुसार, अपने में मगन रहने के लिए स्वतंत्र हैं। लोग आश्रम आ सकते हैं, शहर घूमने जा सकते हैं, मंदिर देखने जा सकते हैं, गीत-भजन आदि सुन सकते हैं, आसपास होने वाले समारोह या जो मर्ज़ी हो, धूम-फिर के देख सकते हैं-और वापस लौटकर आश्रम में आराम कर सकते हैं, दिन भर में जो कुछ देखा, उसका लेखा-जोखा ले सकते हैं, उस पर चिंतन-मनन कर सकते हैं।

एक ऐसी स्वतंत्र जगह जो आपको किसी ऐसी जगह की याद नहीं दिलाएगी, जहाँ अपने मत आरोपित किए जाते हों। हमारे पास सिर्फ दो चीज़ें हैं: एक संक्रामक रूप से सकारात्मक नज़रिया और जीवन के प्रति प्यार!

और हाँ, पहले कभी इस बात का खयाल नहीं आया था कि लोग इन्हीं बातों को पसंद करते हैं और यही बातें हैं, जिसके चलते वे हमारे पास आना भी पसंद करते हैं। और शायद इसीलिए ईर्ष्यालु लोग हमारे बारे में अजीबोगरीब बातें कहते रहते हैं। जहाँ तक मेरा सवाल है, यह एक और दृष्टांत की तरह मेरे सामने उपस्थित है कि जीवन में कभी भी आपको परिवर्तन से नहीं घबराना चाहिए! ईमानदारी के साथ, प्रयास करते हुए जीवन गुजारें और उद्यम से कभी न कतराएँ!

ईमानदार रहिए, अच्छे रहिए, प्यारे और भोलेभाले दिखाई दीजिए मगर धोखेबाजी से नहीं! 9 सितम्बर 2014

अपने दिल्ली प्रवास में शनिवार को मेरे साथ हुई एक घटना का ज़िक्र करते हुए मैंने आपको बताया था कि वहाँ एक महिला के नम्रता-प्रदर्शन पर हम खूब हँसे थे। नम्रता-प्रदर्शन भारतीयों की एक आम आदत है जो अक्सर बड़ी झूठी लगती है मगर सच होने पर कई बार उसे देखकर बड़ा अच्छा लगता है।

अगर आप दिल्ली में मेरे साथ हुई घटना पर गौर करें तो पाएँगे कि वह महिला नम्र दिखाई देना चाहती थी मगर वास्तव में उसकी नम्रता महज एक दिखावा था। उसने कहा तो यह कि मैं अपनी मर्ज़ी से कीमत अदा करूँ लेकिन जब मैंने ठीक वही किया तो वह इतना नाखुश हो गई और उसका फ़्लैट छोड़ने के बाद मुझे अपनी इच्छानुसार बकाया रकम वसूल करने के लिए फोन किया।

भारत आने के बाद शुरू में रमोना को भी ऐसे ही कई अनुभव हुए थे। किसी समारोह में वह किसी महिला से मिली और उसके साथ उसकी बड़ी अच्छी बातचीत भी हुई। उसने रमोना से कहा कि वह हमें बहुत अच्छी तरह से जानती है। फिर उस महिला ने उसे अपने घर बुलाया। रमोना बड़ी खुश हुई और उसके यहाँ आने पर तुरंत सहमत हो गई क्योंकि उस वक़्त वृन्दावन में उसके ज़्यादा मित्र नहीं थे। फिर रमोना ने उसके बारे में हमसे चर्चा की और पूछा कि वह कहाँ रहती है-लेकिन हममें से कोई भी उस महिला को बिल्कुल नहीं जानता था! जब वह रमोना से यह सब कह रही थी तब भी वह जान रही थी कि रमोना उसके घर किसी भी तरह नहीं पहुँच पाएगी क्योंकि हममें से कोई भी उसका मित्र नहीं था। इसके बावजूद वह ऐसा ज़ाहिर कर रही थी जैसे हम एक-दूसरे के बचपन के दोस्त थे!

दूसरी तरफ, कई बार आपको बहुत गंभीरतापूर्वक भी आमंत्रित किया जाता है। आप ख़ुशी-ख़ुशी उनके यहाँ जा सकते हैं और वहाँ आपको आदरपूर्वक भोजन कराया जाता है, चाय पिलाई जाती है, नाश्ता कराया जाता है या मिठाई खिलाई जाती है! भले ही उनका घर अव्यवस्थित हो, उतना साफ़-स्वच्छ न हो, उस वक़्त किसी मेहमान के आने की उन्हें अपेक्षा भी न हो तब भी वे दिल से आपका स्वागत करते हैं!

दुनिया भर में भारतीय अपनी मेहमाननवाज़ी और दूसरों की मदद करने के अपने स्वभाव के लिए जाने जाते हैं और वास्तव में इसमें कोई शक नहीं है। आम भारतीय न सिर्फ स्वभाव से ही नम्र होते हैं बल्कि लोगों को अपने घर बुलाकर स्वागत करते हैं, मेहमानों के साथ खुला, निश्छल व्यवहार करते हैं और दूसरों के प्रति सहिष्णुता और संवेदनशीलता प्रदर्शित करने के लिए प्रसिद्ध हैं। फिर इस तरह की झूठी नम्रता कहाँ से आती है, वे ऐसा क्यों करते हैं कि कहते तो प्यार भरी बातें हैं मगर उनका वास्तव में कोई अर्थ नहीं होता?

मुझे लगता है कि लोग जानते हैं कि क्या कि उन्हें कैसा ‘होना चाहिए’। उन्हें यह मालूम है कि उन्हें नम्र और दूसरों के स्वागत के लिए आतुर होना चाहिए। कि दूसरों को अपने घर बुलाकर उनका स्वागत करना अच्छी बात है और हाँ, सीधे-सीधे पैसे नहीं मांगने चाहिए भले ही आप अपनी कोई चीज़ बेच रहे हों क्योंकि आप अपनी चीजों का व्यवसाय नहीं कर रहे हैं। तो इस तरह के मूल्य और नैतिकताएँ समाज में व्याप्त हैं और हालाँकि लोग मन में ऐसा नहीं सोचते, वे उन्हीं अलिखित नियमों के दायरे में भले दिखाई देने की कोशिश करते हैं। वे सभ्य और अच्छे व्यक्ति होने का नाटक करते हैं और वास्तव में उनके शब्द उनके असली मकसद पर पड़ा पर्दा होते हैं।

जबकि मैं मानता हूँ कि लोगों को खुले दिल वाला, दूसरों का स्वागत करने के लिए तत्पर और एक दूसरे के प्रति संवेदनशील होना चाहिए, लेकिन इसका यह उचित तरीका नहीं है। अगर आपकी इच्छा नहीं है तो किसी को घर बुलाने की कोई आवश्यकता नहीं है। और अगर अपनी किसी वस्तु की आप कोई निश्चित कीमत चाहते हैं तो ‘जो चाहे, दे दें’, कहकर सामने वाले को उलझन में डालने की भी आवश्यकता नहीं है! बाद में यही बातें आपके सामने कई दूसरी समस्याएँ खड़ी कर सकती हैं!

ईमानदार रहिए, अच्छे दिखाई दीजिए, प्यारे और भले लगने की पूरी कोशिश कीजिए मगर झूठ बोलकर नहीं!

लेखकों: जब कोई आपकी रचना की नक़ल करे तो सम्मान महसूस करें! 1 सितम्बर 2014

क्या आप लेखक हैं? भले आपकी कोई पुस्तक प्रकाशित न हुई हो, हो सकता है आप ब्लॉग-राइटर भी न हों, सिर्फ आपकी लिखने में रुचि भर हो-और अपना लिखा कभी-कभार लोगों तक पहुँचा भर देते हों? हाँ? तब आपने इसका अनुभव अवश्य किया होगा, जिसके बारे में आज मैं यहाँ लिखने जा रहा हूँ: अर्थात आपके अत्यंत कुशल, मजेदार और आज तक न देखे गए सर्वथा मौलिक लेखन की शर्मनाक चोरी।

जी हाँ, यह अक्सर होता है। अतीत में भी यह होता रहा है और यह हमेशा होता रहेगा-लेकिन इसके तरीके बदलते रहेंगे! इस दौरान मुझे इसका पर्याप्त अनुभव हो चुका है!

जब मैं भारत में प्रवचन करता था, उस समय भी लोग मेरे व्याख्यानों की सफलता देखकर वैसे ही प्रवचन करना चाहते थे। लेकिन किस तरह? उसका सबसे अच्छा तरीका था- नोट्स बनाइये और खुद वैसा ही कीजिए! पुराने समय में- ऐसा कहते हुए लग रहा है जैसे मैं काफी वृद्ध हो चुका हूँ लेकिन दरअसल इस बीच तकनीक ने बहुत अधिक विकास कर लिया है! टेप-रिकॉर्डर हुआ करते थे, जिसमें व्याख्यान रिकॉर्ड करके लोग उसके टेप बेचते थे। और बहुत से कथावाचक कैसेट से सुनकर, घर बैठकर उस व्याख्यान को उसके लहजे और भावनात्मक उतार-चढ़ाव सहित शब्दशः याद कर लेते थे। उसके बाद, निश्चित ही, कई लोग हो सकते थे, जो हूबहू मेरी तरह प्रवचन कर सकते थे। परन्तु अवश्य ही वे प्रवचन समाप्त करते ही तुरत-फुरत स्टेज से भाग खड़े होते होंगे, जिससे कोई उनसे उस विषय पर कोई प्रश्न न कर सके! क्योंकि वे एक का भी उत्तर नहीं दे सकते थे!

उस वक़्त भी नहीं जानता था- और अब भी नहीं जानता कि कौन मेरे शब्दों का इस्तेमाल कर रहा था। लेकिन ऑनलाइन आपको कभी-कभी शब्दों के ऐसे टुकड़े या समूह या पूरे के पूरे वाक्य पढ़ने को मिल जाते हैं, जिनसे आपको एहसास होता है कि आपने उन्हें पहले भी कहीं देखा या पढ़ा है। आप उन्हें पढ़ते हैं और आपको लगता है, 'मैं पूरे मन से इनसे शब्दशः सहमत हूँ!' और जब आप कुछ आगे बढ़ते हैं तो कह उठते हैं, 'अरे वाह! यह तो ऐसा है जैसे मैंने ही लिखा हो!' और कुछ पलों बाद ही आपकी समझ में आ जाता है, 'अरे भई, यह तो मेरा ही लिखा हुआ है!' सिर्फ एक पंक्ति नहीं, दो नहीं, पूरा ब्लॉग ही, 600 या उससे ज़्यादा शब्द!

कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि क्या मुझे इस बात पर खुश होना चाहिए कि वे मेरा लिखा जस का तस मार ले गए- कि सावधानी पूर्वक रचे वाक्यों के साथ उन्होंने कोई छेड़छाड़ नहीं की, यह दावा करते हुए कि यह उनका खुद का लिखा हुआ है, बिना जाने-बूझे बीच-बीच में अपना कुछ जोड़ा नहीं!

एक बार अमेरिका में किसी ने मुझसे एक किताब की भूमिका लिखने को कहा। मैंने लिख दिया। जब मुझे उसकी प्रति मिली तो मैंने देखा, नाम तो मेरा है मगर नीचे लिखे शब्द मेरे नहीं हैं! शायद मुझे गर्व होना चाहिए कि मैं इतना लोकप्रिय हो गया हूँ कि दुनिया भर की उक्तियों को मेरे नाम से छाप दिया जाए। उसने मेरे द्वारा लिखा प्रस्तावना बदल दिया था और उसमें अपनी तरफ से भी काफी कुछ जोड़ दिया था! और किताब में अन्दर बहुत से मेरे वक्तव्य जैसे के तैसे अथवा थोड़ी छेड़छाड़ के साथ उसने अपने नाम से छाप दिए थे! अब किताब के साथ साथ मेरे भावों का रचयिता भी वही बन बैठा था!

खैर, किसी भी लेखक की यह कड़ुवी त्रासदी है। लेकिन फिर मुझे लगता है कि इसे मुझे एक चैरिटी का ही काम मानकर भूल जाना चाहिए: हाल ही में एक फेसबुक मित्र से मेरी झड़प हो गई, जिसके प्रोफाइल पर बिना मेरे नाम के या मेरे पृष्ठ या मेरी वेबसाइट की लिंक के लगातार मेरी टिप्पणियाँ दिखाई दे रही थीं। पहले तो पकड़े जाने पर वह शर्मिंदा हुआ और बदलने के लिए राज़ी हो गया। दूसरी बार उसने माफ़ी मांगी और बोला, 'यह मेरी आदत बन चुकी है'। लेकिन तीसरी बार उसने वास्तविकता बता ही दी:

"स्वामी जी जबसे मैं आपका लिखा अपनी प्रोफाइल पर पोस्ट करने लगा हूँ तबसे लोग मुझे भी समझदार समझने लगे हैं!" अपने साथी की अच्छी इमेज बनाने के लिए थोड़ी सी चैरिटी? 🙂

हम अपने स्कूली बच्चों के अभिभावकों के छोटे-मोटे झूठ क्यों स्वीकार कर लेते हैं? 18 अगस्त 2014

जो भी मेरे ब्लॉग नियमित रूप से पढ़ते हैं, जानते हैं कि हर शुक्रवार के दिन मैं अपने पाठकों का परिचय अपने स्कूल के किसी न किसी बच्चे से करवाता हूँ। इसके लिए हम बच्चों के घर जाकर उनके परिवार वालों से बात करते हैं, उनका वीडिओ बनाते हैं और उनके हाल-चाल जानने की कोशिश करते हैं। दुर्भाग्यवश अक्सर हमें महसूस होता है कि वे हमसे सच नहीं कह रहे हैं। ईमानदार न होना, कम से कम कुछ मामलों में, कुछ लोगों की आदत में शुमार होता है।

छोटे-छोटे झूठ बहुत आम हैं। शायद बहुत से झूठ तो हमें पता ही नहीं चलते। वैसे भी आर्थिक प्रश्नों पर उनके झूठ हमेशा पूरी तरह झूठ नहीं माने जा सकते। स्वाभाविक ही जब हम किसी परिवार से बात करते हैं तो पहला सवाल परिवार में कमाने वाले सदस्य के काम-धंधे को लेकर होता है और दूसरा उसकी मासिक आमदनी को लेकर। वह कितना कमाता है और क्या परिवार के पास आमदनी के दूसरे स्रोत भी हैं?

अब हमें उनके विभिन्न काम-धंधों में होने वाली आमदनी का मोटा अंदाज़ हो गया है। हम जानते हैं कि एक रिक्शा चलाने वाला, एक राजगीर, बैलगाड़ी हाँकने वाला या दर्ज़ी हर माह कितना कमाता होगा। हमें भी कई बार इस तरह के रोजगार करने वालों को काम पर रखना होता है। हमारे बच्चों के अभिभावक इन कामों से होने वाली जो आमदनी बताते हैं वह अक्सर सामान्य, औसत आमदनी से कम होती है। हम जानते हैं कि वे कम बता रहे हैं मगर हम अपनी ओर से कुछ जोड़-जाड़कर उसे स्वीकार कर लेते हैं। हम जानते हैं कि इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला।

वास्तव में कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर कोई व्यक्ति हर माह 50 $ कमाता है मगर हमें 40 या और भी कम, 30 $ ही बताता है तो हर हाल में वह गरीब ही होता है। 10 या 20 $ अधिक कमा भी लेता होगा तो उतने फर्क से उसे संपन्न नहीं माना जा सकता, खासकर तब, जब हमें पता चलता है कि उसके तीन या चार बच्चे भी हैं!

इसलिए हम उनके छोटे-छोटे झूठों को स्वीकार कर लेते हैं-लेकिन कई बार ये झूठ बहुत स्पष्ट और प्रत्यक्ष होते हैं! उनके झूठ इतने अवास्तविक और गैर वाजिब लगने लगते हैं कि कोई भी बता सकता है कि जो आमदनी वे बता रहे हैं, उतने कम में परिवार चलाना असंभव है-विशेष रूप से तब, जब आप उनके घर में बैठे हों और हर तरह से देख-समझ रहे हों कि वे अपनी आमदनी किन चीज़ों पर खर्च करते हैं।

लेकिन क्या किया जाए? यह तो हम देख ही रहे हैं कि वे धनवान नहीं हैं। बल्कि हम देखते हैं कि वे वाकई गरीब हैं और बच्चों की पढ़ाई का खर्च नहीं उठा सकेंगे। उस वक़्त उनसे बहुत वाद-प्रतिवाद करने का कोई अर्थ नहीं होता। तो हमें ऐसे झूठ स्वीकार करने पड़ने हैं-लेकिन हम यह बात आपको बताना चाहते हैं।

बहुत से गरीब अपने आपको उससे ज़्यादा गरीब दिखाते हैं, जितने कि वे वास्तव में होते हैं क्योंकि वे सोचते हैं कि इससे उन्हें लाभ मिल सकता है। यह सामान्य और समझ में आने वाली बात है। यह दिलचस्प भी है कि इसके लिए वे छोटा-मोटा झूठ बोलते हैं। लेकिन यही झूठ उनके बड़ी और महत्वपूर्ण बातों पर भी झूठ बोलने की जड़ है!

ईमानदारी से जवाब दें, चाहे किसी को बुरा लगे या भला – 23 मार्च 13

पिछले दो दिनों में मैंने किसी प्रश्न का उत्तर देने लिए दो विकल्पों का विश्लेषण किया। आज मैं अपने मनपसंद विकल्प के बारे में बात करूंगाः

तीसरा विकल्पः ईमानदारी से जवाब दें

निश्चय ही लोग इस विकल्प के बारे में इतना असहज महसूस करते हैं कि वे इस बारे में सोचना भी पसंद नहीं करते। लेकिन मैं आपको गारंटी देता हूं कि इस विकल्प को आजमाने के बाद आपको बहुत अच्छा लगेगा।

अपनी राय ज़ाहिर करने के मामले में मैं थोड़ा मुंहफट हूं क्योंकि मैं मानता हूं कि हमारी राय स्पष्ट होनी चाहिए। यदि आप अपने बारे में लोगों को साफ – साफ बता दें तो उन्हें आपके बारे में पूरी जानकारी रहेगी और भविष्य में आपको असहज स्थितियों का सामना कम करना पड़ेगा। यदि लोगों के बीच आपकी छवि स्पष्ट नहीं होगी तो लोग जानकारी के अभाव में यह नहीं समझ पाएंगें कि किसी विशेष मुद्दे पर आपकी राय क्या होगी।

इसी वजह से मैं हमेशा हर प्रश्न का ईमानदारी से जवाब देता हूं यह पता होते हुए भी कि मेरा उत्तर प्रश्नकर्ता को पसंद नहीं आएगा। सामने वाला चाहे तो इसे स्वीकार करे या न करे। वह मेरे जवाब को पसंद करता है या नहीं, इस बात से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। हम सबको अपनी अलग राय रखने का अधिकार है तो फिर दूसरों को खुश करने के लिए इसे क्यों छिपाएं?

इस विकल्प का सबसे अहम पहलू है इसका प्रस्तुतिकरण। मैं जब किसी के साथ बात करता हूं तो सामान्यतया इस बात का ध्यान रखता हूं कि मेरी बात स्पष्ट हो लेकिन तीखी नहीं। आप अपनी बात स्पष्ट शब्दों में अभिव्यक्त करें ताकि किसी प्रकार के संदेह की कोई गुंजाइश न रहे। इस बात को सुनिश्चित कर लें आपकी बात सामने वाले को अच्छी तरह समझ आ गई है ताकि इस तरह की स्थिति भविष्य में पैदा न हो। अग़र आप किसी को कोई ऐसी वस्तु देने जा रहे हैं जो उसे पसंद नहीं है तो आप इसे सुंदर से कवर में लपेटकर दें।

अपनी बात को सुंदरता से रखने के लिए आपको एक से ज्यादा वाक्यों का प्रयोग करना पड़ेगा। मान लीजिए कि कोई ऐसा व्यक्ति आपसे किसी दार्शनिक विषय पर सलाह मांगता है जिसकी जीवनशैली, धार्मिक विश्वास और दर्शन से आप बिल्कुल भी सहमत नहीं हैं तो ऐसे में आपको पहले से पता है कि आपका ईमानदार जवाब उसे रास नहीं आएगा। "देखो भई, मेरे विचार में तुम्हारा धर्म और दर्शन बक़वास है" ऐसा कहना के बजाए आप उसे अपने धार्मिक विश्वास के बारे में बताने से शुरु करें, मतभेदों और उनके कारणों के बारे में बताएं।

आप सीधे यह भी कह सकते हैः "मैं जानता हूं कि इस विषय में मेरे विचार आपके विचारों से कतई मेल नहीं खाते हैं" या फिर इसी प्रकार की अन्य कोई बात जो शुरु में ही सामने वाले को आगाह कर दे ताकि वह यह उम्मीद न रक्खे कि आप उसकी बात से सहमत हो जाएंगें। इससे सबसे बड़ा फायदा होगा कि आपके शब्दों का आघात सहनीय होगा और प्रभाव कम नकारात्मक।

और आखिर में यदि आपको लगे कि सामने वाला आपके जवाब से नाखुश है या बुरा मान रहा है, तो चिंता न करें। प्रश्नकर्ता को भी यह समझ में आना चाहिए कि अलग अलग लोगों के अलग अलग विचार होते हैं। थोड़ा समय अवश्य लगेगा लेकिन अंत में लोगों को आपकी बात समझ में आ जाएगी।

मेरे विचार से तीनों विकल्पों में से ईमानदार जवाब ही सर्वोत्तम विकल्प है।

उल्टा – सीधा जवाब देने के बजाए जवाब ही न दें तो बेहतर होगा – 21 मार्च 13

कल से मैंने एक श्रृंखला शुरु की है जिसमे मैं यह बताने का प्रयत्न करूंगा कि ऐसी स्थिति में आप क्या करें जब कोई आपसे सवाल पूछे और आपको पहले से यह पता हो कि यदि आपने ईमानदारी से उत्तर दिया तो प्रश्नकर्ता नाराज़ हो जाएगा । आज दूसरे विकल्प पर बात करते है।

दूसरा विकल्पः जवाब ही न दें

किसी प्रश्न के उत्तर में झूठ बोलने के विकल्प को मैं सिरे से नकारता हूं। परंतु किन्हीं विशेष परिस्थितियों में जवाब न देने के विकल्प को आजमाने का सुझाव देता हूं। उस स्थिति में इस विकल्प को आजमाएं जब आप किसी ऐसे व्यक्ति के साथ डिप्लोमैटिक होना चाहते हैं जो भविष्य में कभी भी आपकी ज़िंदगी में कोई महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाला नहीं है। किसी व्यक्ति से आप जीवन में एक ही बार मिलते हैं और उसे अपनी पूरी सोच से अवगत नहीं कराना चाहते हैं क्योंकि आपके अनुसार यह भैंस के आगे बीन बजाने जैसा होगा। वह आपकी बात से सहमत नहीं होगा, आपकी बात पर ध्यान भी नहीं देगा। यही एकमात्र ऐसी स्थिति है जहां आप इस विकल्प का इस्तेमाल कर सकते हैं। मग़र ध्यान रहे कि यह इतना आसान नहीं है, काफी सावधानी की आवश्यकता है।

आप मौनव्रत धारण करके बच नहीं सकते। यह तो झूठ बोलने से भी बदतर होगा और एक प्रकार की अशिष्टता होगी। किसी भी असहज स्थिति से बाहर आने का यह तरीका उचित नहीं होगा। बेहतर होगा कि आप कोई और तरक़ीब लगाएं।

मैं आपको अपना एक उदाहरण देता हूं जहां मैंने वास्तव में यह तरीका अपनाया । मैंने न केवल अपनी भावनाओं को आहत होने से बचाया बल्कि प्रश्नकर्ता के दिमाग की शांति को भी सुरक्षित रखा। कुछ महीने पहले यहां आश्रम में कुछ लोग आए जो मुझे उस ज़माने से जानते थे जब मैं एक गुरु हुआ करता था। वह एक वृद्ध महिला थी जो अकसर मेरे कार्यक्रमों में आया करती थी। वह अपने बेटे, बहू और पोते – पोतियों को भी साथ लाई थी। वृद्धा ने उनसे मेरा परिचय अपने गुरु के रूप में कराया। इधर – उधर की बातचीत के बाद उसने पूछा कि मैं उसके शहर में प्रवचन देने के लिए दोबारा कब पधार रहा हूं।

तीन जोड़ी आंखें मेरी ओर उत्सुकता और इस उम्मीद के साथ देख रही थीं कि मैं जल्दी ही उनके शहर में आ रहा हूं। मैंने अपनी सभी संभावनाओं पर विचार किया और वृद्धा की आंखों में झांकते हुए उसके प्रश्न का उत्तर देने का विकल्प चुना। अग़र मैं उस वक़्त उन्हें यह बताता कि मैं अब धर्म में विश्वास नहीं करता और न ही भगवान को मानता हूं, तो इससे वृद्धा बेवजह उलझन में पड़ जाती। "ओह, अब मैं पिता हूं" मैंने हंसकर जवाब देते हुए कहा और पास बैठी अपरा को उठाने के लिए झुका। बच्ची को गोद में लेते हुए मैंने कहा, "अब मेरा सारा ध्यान इस नन्हे सितारे पर लगा रहता है।" अपरा को गुदगुदी करते हुए मैंने बताया, "पिछले हफ्ते ही इसने चलना सीखा है।" अब सबका ध्यान अपरा के विकास पर चला गया। मूल प्रश्न अनुत्तरित रहा और वे लोग उसे भूल भी गए। न तो किसी की भावनाओं को चोट पहुंची और न ही कोई निराश हुआ।

जिस विषय पर प्रश्न किया गया है, उसका जवाब दिए बिना चतुराई से विषयांतर कर देना चाहिए। लेकिन यह दूसरा विषय इतना रोचक होना चाहिए कि प्रश्नकर्ता का ध्यान अपने मूल प्रश्न से हट जाए। आप कोई मजेदार चटकला सुना सकते हैं अथवा कोई विवादास्पद चर्चा छेड़ सकते हैं। आप सामने वाले से उसकी रुचि के किसी खास विषय पर कोई प्रश्न पूछ सकते हैं। आपका मकसद उसका ध्यान बदलना होना चाहिए। यह तकनीक जरा कठिन है और मैं आपको सचेत करना चाहूंगा कि यह हमेशा कारगर होगी इस बात की कोई गारंटी नहीं है। यदि किसी व्यक्ति ने आपसे एक प्रश्न पूछा है तो वह प्रश्न उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण है। वह आपको ऐसे नहीं छोड़ेगा। वह अपना प्रश्न दोबारा पूछेगा और यह बड़ा हास्यास्पद लगेगा कि आप दोबारा उसका ध्यान पलटने की कोशिश कर रहे हैं।

मुख्य बात यह है कि सामने वाले की बात का जवाब नहीं देना है। लेकिन यह निर्णय लेने से पहले आपको यह सुनिश्चित कर लेना है कि प्रश्नकर्ता उत्सुकतावश प्रश्न कर रहा है या वाकई प्रश्न को लेकर गंभीर है। यदि वह वास्तव में गंभीर है तो इस विकल्प को भूल जाएं – इससे समस्या नहीं सुलझेगी।

दूसरों को खुश करने के लिए झूठ न बोलें – 20 मार्च 13

मेरे जीवन में ऐसा कई बार हुआ है कि किसी ने मुझसे एक सवाल पूछा और मुझे यह पहले से ही पता था कि यदि मैंने पूरी ईमानदारी से उत्तर दिया तो प्रश्नकर्ता नाराज़ हो जाएगा। मैं जानता हूं कि आप सबों के साथ भी कभी न कभी ऐसा होता होगा। यह एक ऐसी स्थिति होती है जो कई लोगों को असहज कर देती है। आइए, आज और आने वाले कुछ दिनों में इस बात की पड़ताल करते हैं कि हमारे पास और क्या विकल्प हो सकते हैं जिससे सामने वाले को बुरा न लगेः

पहला विकल्पः झूठ बोल दीजिए

शायद यह एक ऐसा विकल्प है जो हर व्यक्ति के दिमाग़ में सबसे पहले आता हैः वही बोलो जो सामने वाले को पसंद आए। आप बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि यह झूठ है लेकिन फिर भी आपको उस समय यही विकल्प सबसे अधिक निरापद लगता है।

अग़र आप हमेशा सबको खुश करने की कोशिश करने वालों की जमात में शामिल हैं तो शायद आप कई बार ऐसी स्थिति का सामना कर चुके होंगें। कल्पना करेः आपकी मित्र और आप साथ सिनेमा जाने की सोच रहे हैं और मित्र कहती है "मेरी बहन भी यह फिल्म देखना चाहती है। आप बुरा तो नहीं मानोगे अग़र वह भी हमारे साथ चले?" आपको दोस्त की बहन के साथ फिल्म देखना कतई पसंद नहीं है। लेकिन आप अपनी दोस्त को नाराज़ भी नहीं करना चाहते और यह भी जाहिर नहीं होने देना चाहते कि आपको उसकी बहन बिल्कुल पसंद नहीं है। तो आपका जवाब होगा "हां, क्यों नहीं। तुम्हारी बहन भी साथ चलेगी तो अच्छा लगेगा।"

आप हर किसी को खुश रखना चाहते हैं और चाहते हैं कि हर कीमत पर समरसता बनी रहे। तो इस बात में आपको कोई नुकसान नज़र नहीं आता कि आप बस इस बार ईमानदारी से जवाब नहीं दे सके! आप दोस्त के साथ काफी वक़्त गुजारते हैं, यदि थोड़ा वक़्त उसकी बहन के साथ भी गुजार लेंगें तो कुछ घट नहीं जाएगा आपका। क्या आपको दोस्त के रिश्तेदारों के साथ भी थोड़ा वक़्त नहीं बिताना चाहिए?

आपको अपनी इस ग़लती का अहसास तब होगा जब आपकी शाम खराब हो जाएगी। आपने दोस्त को थोड़ी देर के लिए खुश भले ही कर लिया हो लेकिन कभी न कभी उसे असलियत का पता चल ही जाएगा । झूठ बहुत ज्यादा दिन नहीं चलता।

झूठ बोलकर दूसरे के लिए समस्याएं खड़ी करने के अतिरिक्त आपने स्वयं को भी नाखुश कर लिया है। चाहे आपकी आत्मा ने एक झूठ बोलने की गवाही दे दी हो परंतु आप उसके अनुसार व्यवहार नहीं कर पाएंगें क्योंकि आपके भीतर की सच्चाई तो कुछ और है। आप कहते है, "मुझे नीला रंग पसंद है।" लेकिन खरीदते हमेशा लाल रंग हैं तो क्या दूसरा व्यक्ति इस विसंगति पर ध्यान नहीं देगा। या फिर लाल रंग खरीदने का मन होते हुए भी आपको जबरन नीला रंग ही खरीदना पड़ेगा। नतीजाः आप नाखुश और दूसरा भी नाखुश। अर्थात यह विकल्प कामयाब नहीं रहा।

मैंने ऊपर जो उदाहरण दिया था, आइए, जरा उसे चित्रांकित करके देखें। आप सिनेमा हॉल में बैठे हैं और वे दोनों बहनें जमकर लुत्फ उठा रही हैं और आपको उनकी बातें जरा नहीं सुहा रही हैं। दोस्त की बहन आपसे कुछ पूछती है और आप, जो पहले से ही भरे बैठे थे, अभद्रता से जवाब देते हैं या उतनी सह्रदयता से जवाब नहीं देते जिसकी आदत आपकी दोस्त को है – तो अवश्य उसे बुरा लगेगा। वह आप पर नाराज़ भी हो सकती है। आखिरकार अपनी बहन को साथ लाने से पहले उसने आपसे इज़ाजत ली थी, तो अब क्या परेशानी है? आपकी शाम नाखुशग़वार गुजरी सो अलग।

झूठ बोलना किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। उल्टे इससे नई – नई समस्याएं खड़ी हो जाएंगीं। इसीलिए मेरा मानना है कि आपकी और आपके नज़दीक वालों की भलाई इसी में है कि इस विकल्प का चुनाव न करें।

धार्मिक और आध्यात्मिक लोगों के लिए 15 सवाल- 1 अक्तूबर 2012

-क्या आध्यात्मिक होने के लिए किसी गुरु की आवश्यकता है?

-क्या हर किसी को जीवन के तारणहार के रूप में आध्यात्मिक गुरु की आवश्यकता है?

-अगर ‘हाँ’, तो क्या आप अपने आत्मविश्वास और स्वाभिमान को त्यागकर किसी दूसरे की गुलामी स्वीकार नहीं कर रहे हैं?

-क्या आपका आशय यह है कि जो किसी धर्म, धर्मगुरु या संप्रदायवादी सिद्धान्त को नहीं मानते, उनका जीवन व्यर्थ है?

-क्या आप ऐसा नहीं समझते कि धर्म में विश्वास करना, गुरु का शिष्यत्व ग्रहण करना और किसी संप्रदाय का सदस्य बनना ऐसे काम हैं, जिन्हें वास्तव में किसी न किसी डर या लालच के चलते किया जाता है?

-क्या लोग धर्म की शरण में इसलिए नहीं जाते कि गलत और अनैतिक कामों को अंजाम देने में आसानी होती है और ज़मीर भी आहत नहीं होता?

-क्या आप यह विश्वास करते हैं कि आप मंदिरों, चर्चों और गुरुओं को चन्दा देकर उनका आशीर्वाद खरीद सकते हैं, जैसे बाज़ार में दाल-चावल खरीदते हैं?

-क्या आप समझते हैं कि अपना भविष्य बेहतर बनाने में आप कोई भूमिका निभाते हैं?

-क्या अध्यात्म ऐसी चीज़ है, जिसे गणित या वाणिज्य विषयों की तरह सीखा जा सकता है?

-क्या आप यह नहीं समझते कि प्रेम करना और सत्यनिष्ठा के साथ जीवन जीना सच्ची आध्यात्मिकता है?

-क्या अपने बच्चे को याद करने के लिए एक माँ को सुमिरनी (जपमाला) की आवश्यकता पड़ती है?

-क्या अपने पति के बारे में विचार करने के लिए पत्नी को किसी विशेष मुद्रा में आसन लगाना पड़ता है?

-क्या आप सहमत नहीं हैं कि अगर आप प्रेम में हैं तो आपको ध्यान लगाने की आवश्यकता नहीं है, वह अपने आप लग जाता है?

-क्या हमें सीखना पड़ता है कि प्रेम कैसे किया जाए?

-क्या हमें सत्यनिष्ठा सीखनी पड़ती है?

-अगर नहीं, तो किसी को भी अध्यात्म सीखने की भी आवश्यकता नहीं है।

-और अध्यात्म बेचने के लिए हमें किसी गुरु की आवश्यकता नहीं है!

-इस बात को मैंने पहले भी कई बार कहा है:

-अध्यात्म संस्थागत नहीं हो सकता, वह एक वैयक्तिक बात है। भले ही आप मंदिर या चर्च न जाएँ, भले ही आप कोई कर्मकांड न करें, अगर आप प्रेम और सत्यनिष्ठा में यकीन रखते हैं तो आप स्वतः ही आध्यात्मिक हैं।