क्या सकारात्मक नज़रिया आपको फूड पॉयज़निंग से बचा सकता है? 1 नवंबर 2015

कल के स्वादिष्ट व्यंजन के बाद मैं आज भोजन संबंधी एक और ब्लॉग लिखना चाहता हूँ। ठीक-ठीक कहें तो, भारतीय भोजन संबंधी। बल्कि कहें कि भारत में सड़क के किनारे मौजूद ठेलों पर मिलने वाले भोजन के संबंध में, तो अधिक उचित होगा। सामान्य रूप से वह भोजन और उन्हें स्वास्थ्य संबंधी कारणों से ग्रहण करना उचित होगा या नहीं, इस संबंध में।

पिछले हफ्ते हमारे मेहमानों के साथ हुई चर्चा में यह प्रश्न उभरकर सामने आया था। शहर की सड़कों पर उड़ने वाली धूल को इंगित करते हुए एक महिला अतिथि ने कहा कि वह बाहर सड़क पर मौजूद ठेलों पर कभी कोई चीज़ नहीं खाएगी क्योंकि वहाँ के खाने की गुणवत्ता और साफ़-सफाई संतोषजनक नहीं होती, कि सस्ती चाट के ठेले वाले आपको उच्चस्तरीय और साफ़-सुथरा भोजन उपलब्ध नहीं करा सकते। दूसरे मेहमान का तर्क था कि यह महज एक मानसिक स्थिति है, दिमाग की व्यर्थ कुशंका है और यदि आप सकारात्मक नज़रिया रखें तो ठेलों पर खाने से आपके सामने कोई समस्या पेश नहीं आएगी!

आप जानते हैं, मैं स्वयं सकारात्मक रवैया रखने का कायल हूँ। उसके बगैर न सिर्फ बहुत सी चीज़े उससे अधिक खराब नज़र आती हैं, जितनी कि वे वास्तव में होती हैं बल्कि वे और बदतर होती चली जाती हैं। निश्चय ही सकारात्मक होना आपको स्वस्थ रहने में मदद करता है। यदि आप अत्यंत नकारात्मक हैं तो आप ज़रा-ज़रा सी बात पर कुशंकाएँ करेंगे और भयभीत होंगे। उसके चलते आपका शरीर और मन और उनकी पूरी कार्यप्रणालियाँ हर वक़्त तनावग्रस्त रहेंगी। तनाव का मुकाबला करने में आपकी बहुत सारी शारीरिक और मानसिक ऊर्जा खर्च होती है जो अन्यथा आपके शरीर की सम्पूर्ण कार्यप्रणाली को मज़बूती प्रदान करती। इसलिए तनावग्रस्त होने पर रोगों से लड़ने वाले इम्यून सिस्टम को मज़बूती प्रदान करने के लिए पर्याप्त ऊर्जा प्राप्त नहीं हो पाती। रोगों या व्याधियों का आक्रमण होने पर आपका शरीर पूरी शक्ति के साथ उनका मुकाबला नहीं कर पाता, जैसा सामान्यतया उसे करना चाहिए-और इसलिए आप आसानी से और जल्दी-जल्दी बीमार पड़ते रहते हैं। इसके अलावा, आपके नकारात्मक रवैये के चलते आपको मामूली चीजें और घटनाएँ ज़रूरत से ज़्यादा गंभीर लगती हैं!

स्वास्थ्य और सकारात्मकता के बारे में मेरे सोच का यह संक्षिप्त और तात्कालिक विवरण है। लेकिन कुछ इससे अधिक गंभीर कारक भी होते हैं, जैसे, जीवाणु, विषाणु और नुकसानदेह रसायन और ये कारक इससे अधिक महत्वपूर्ण है कि आप सकारात्मक रवैया रखते हैं या नहीं!

महज सकारात्मक होने के कारण आप ज़हर नहीं खा सकते! मैं बहुत से सकारात्मक लोगों को जानता हूँ, जिन्हें सकारात्मक रवैया रखने के बावजूद तरह-तरह की बीमारियों का मुकाबला करना पड़ता है, खान-पान संबंधी ही नहीं, दूसरी भी! मैं ज़ोर देकर कहना चाहता हूँ कि महज सकारात्मक रवैया आपको स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से दूर नहीं रख सकता!

अब अगर आप भारत दौरे पर हैं और मुझसे या हमसे सलाह चाहते हैं तो मैं भी आपसे यही कहूँगा कि सड़क पर खोमचे या ठेले वालों के यहाँ मत खाइए। मैं खुद वहाँ कभी नहीं खाता क्योंकि मैं इस बात का पूरा ख़याल रखता हूँ कि कौन-कौन से और कैसे खाद्य पदार्थ मेरे पेट में और मेरे शरीर में प्रवेश कर रहे हैं। हमारे आश्रम आने वाले बहुत से मेहमान जब तक यहाँ आश्रम का भोजन ग्रहण करते रहे, स्वस्थ रहते हैं लेकिन जैसे ही वे घूमने निकलते हैं और जहाँ, जैसा खाना मिलता है, खा लेते हैं तो वे बीमार पड़ जाते हैं।

भारतीय लोग उनका सेवन कर सकते हैं क्योंकि उनके शरीर उन बैक्टेरिया के आदी हो चुके हैं, जो इन ठेलों के खानों के ज़रिए पेट में पहुँचते होंगे। जीवन की शुरुआत से वे वहाँ हर तरह का भोजन, चाट-पकौड़े इत्यादि खाते रहे हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि वे बैक्टेरिया उनके लिए अच्छे हैं-लेकिन आप लोग, जो पश्चिमी देशों से कुछ दिन के लिए यहाँ आते हैं और जिनके पेट ने पहले कभी ऐसे भोजन का अनुभव नहीं लिया, उन्हें खाकर अवश्य बीमार पड़ जाएँगे!

सकारात्मक रवैया होना निश्चय ही बड़ी अच्छी बात है लेकिन साथ ही आपको इस बात की सावधानी भी रखनी चाहिए कि आप कहाँ खा-पी रहे हैं और क्या और कैसा खा रहे हैं। सड़क के किनारे ठेलों पर खाने के स्थान पर किसी अच्छे रेस्तराँ में भोजन या नाश्ता-पानी कीजिए। सड़क पर खड़े होकर फलों का रस भी मत लीजिए, भले ही फल आपके सामने रखे हों और ताज़े ही क्यों न दिखाई दे रहे हों-आप नहीं जानते, कहाँ के पानी से उन्हें धोया गया है और जूसर में कौन-कौन से बैक्टेरिया पहले से मौजूद हैं!

मेरा उद्देश्य किसी को भयभीत करना नहीं है लेकिन यह बात हर टूरिस्ट गाइड बुक में निरपवाद रूप से लिखी होती है। कृपया अपने शरीर का ख़याल रखिए, भले ही आप कितना ही सकारात्मक रवैया रखते हों!

जब आश्रम आना ऐसा लगता है जैसे किसी विशाल चिड़ियाघर देखने आए हों – 20 अक्टूबर 2015

अगर आप भारत में हमारे आश्रम आते हैं तो यहाँ बहुत से जानवरों से आपकी मुलाक़ात होगी। जी नहीं, पालतू नहीं-जंगली, आवारा, देसी जानवरों से। यहाँ आपको लगेगा कि आप किसी चिड़ियाघर में आ गए हैं!

हँसी-मज़ाक में हम अक्सर इसकी चर्चा करते रहते हैं! जब आप हमारे बगीचे में सैर करते हैं या बेंच पर आराम से बैठे हैं तब स्वाभाविक ही तरह-तरह की चिड़ियाँ और तितलियाँ आपका मनोरंजन करेंगी लेकिन आपको कई बंदर और गिलहरियाँ भी नज़र आएँगी। जब आप शहर में घूमने निकलेंगे तो उधम मचाते आवारा कुत्तों, बेसहारा गायों, अनियंत्रित सूअरों और आज़ादी के साथ इधर-उधर मुँह मारती बकरियों के दर्शन होंगे। आपको घोड़े, गदहे और कभी-कभी ऊँट भी मिल जाएँगे-लेकिन ऊँट अक्सर कोई गाड़ी खींचते या अपनी पीठ पर कोई बोझा ढोते हुए ही दिखेंगे। यह संभव ही नहीं है कि आप हमारे शहर में पैदल घूम-फिर रहे हैं और आपको किसी गाय से बचने की या उसे रास्ता देने के लिए अलग हटने की ज़रूरत न पड़ी हो क्योंकि गाएँ आपको हर जगह खुले आम सड़क पर घूमती हुई मिल जाएँगी या बीच सड़क पर जुगाली करते हुए! ऐसा नज़ारा आप अपने यहाँ रोज़-ब-रोज़ नहीं देखते होंगे! ठीक?

आप अपने कमरे में ही क्यों न बैठे हुए हों, आपको कोई न कोई ऐसा जानवर दिखाई दे जाएगा जिसे आप अक्सर घरों में देखने के आदी नहीं होते! एक बार आश्रम की एक मेहमान पहले ही दिन बड़ी उत्तेजित, हमारे पास आई। सीढ़ियों से तेज़ी से उतरते हुए उसकी साँस रुक रही थी और कुछ कहने से पहले उसे एक गहरी साँस भरनी पड़ी और बात करते हुए भी वह गहरी साँसे लेती रही: "मेरे कमरे में एक मगर का बच्चा है!" पल भर के लिए हम भी स्तब्ध रह गए! दौड़ते हुए उसके साथ ऊपर पहुँचे और सावधानी पूर्वक दरवाजा खोलकर उधर देखा जिधर वह इशारा कर रही थी। वह छत की ओर इशारा कर रही थी कि वहाँ! और एक छिपकली वहाँ मज़े में शांतिपूर्वक बैठी हुई थी! खैर, अगर आपने जीवन में कभी छिपकली न देखी हो तो उसे देखकर आप यही सोचेंगे कि रेंगने वाले किसी बड़े जीव का बच्चा होगा!

निश्चय ही गिरगिट से आपको डरने की ज़रूरत नहीं है लेकिन शायद बंदर के साथ आप अधिक सतर्क रहना चाहेंगे! यहाँ के बंदर बड़े शैतान और शातिर चोर हैं और शहर के बीचोंबीच उनके झुंड आदतन लोगों की आँखों पर से चश्में चुरा लेते हैं। चश्मा लेकर वे कूदकर किसी दीवार पर चढ़कर बैठ जाते हैं। फिर आपकी सहायता के लिए कोई आगे आता है और उनकी ओर बिस्किट या फ्रूट जूस का पाउच फेंकता है और उसे लपकने के लिए वे चश्मा फेंक देते हैं और चश्मा वापस दिलाने की एवज में स्वाभाविक ही आप उस व्यक्ति को कुछ न कुछ इनाम देने के लिए मजबूर हो जाते हैं। उस व्यक्ति को कुछ पैसे मिल जाते हैं, बंदर को बिस्किट मिल जाते हैं और आपको आपका कीमती चश्मा: सबका लाभ, सब खुश!

हालाँकि आश्रम में भी बहुत से बंदर मौजूद हैं, हमें अपने चश्मों की उतनी फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। लेकिन बगीचे की निगरानी ज़रूर करनी पड़ती है क्योंकि वे उसे अपना खेल का मैदान समझ लेते हैं और पेड़ों की डालियों पर कूदते-फांदते रहते हैं, झूलते-लटकते हैं, फूल-पत्तियों से खेल-खिलवाड़ करते हैं; कुल मिलाकर बड़ा नुक्सान पहुँचाते हैं। कई बार पेड़ों की डगालें तक टूट जाती हैं। लेकिन देखने में वे बड़े प्यारे लगते हैं-और सामान्यतया अगर आप उन्हें अकेला छोड़ दें तो कोई समस्या पेश नहीं आती और वे भी आपकी तरफ ध्यान नहीं देते।

हाल ही में जानवरों से अत्यधिक प्रेम करने वाली एक महिला मित्र आश्रम आई थी और बाहर आवारा कुत्तों को देखकर उसके मन में दया जाग उठी और उसने उनकी मदद करने की ठानी। यह उतना आसान नहीं है लेकिन अंततः उसने एक दूकान खोज ही निकाली, जहाँ कुत्तों का तैयार भोजन मिलता है। बड़े गर्व के साथ वह एक बड़े से थैले में खाना भरकर दूकान से बाहर निकली। कुत्तों का पहला झुंड देखते ही वह रुकी और थैला खोलकर थोड़े से खाने के टुकड़े उनके लिए ज़मीन पर रख दिए। उस दिन हमें पता चला कि वृंदावन के आवारा कुत्ते कुत्तों का तैयार पैकेज्ड फ़ूड पसंद नहीं करते! आखिर उसे बंदरों और सूअरों ने खाया!

मुझे एक और मेहमान की याद आ रही है जो अपने आप में एक अजूबा ही थी-वैसा व्यक्ति आज तक मुझे नहीं मिला: वह गिलहरियों से डरती थी! वास्तव में वे दुनिया के सबसे शर्मीले और डरपोक प्राणी होते हैं और बड़े प्यारे भी! वे बचा हुआ खाना, नीचे पड़े खाने के टुकड़े उठाकर ले जाते हैं। अक्सर आप उन्हें किसी सुरक्षित स्थान पर अपने सामने वाले पैरों में खाना लिए कुतरते हुए देख सकते हैं। ये महिला आश्रम में पेड़ के नीचे खाने की प्लेट लिए बैठी थी और एक चंचल सी गिलहरी खाने के टुकड़े गिरने की अपेक्षा में उसकी तरफ लपकी। महिला उसे हाथ के इशारों से हकालने लगी तो स्वाभाविक ही, डर के मारे गिलहरी उसके चारों ओर चक्कर काटने लगी। महिला ने अपने पीछे उसकी आवाज़ सुनी तो उसे लगा गिलहरी पीछे से हमला करने वाली है और वह पहले तो चीखती-चिल्लाती, वहीं कूद-फांद मचाने लगी और फिर अंदर भागी। हमारे कर्मचारियों ने आवाज़ सुनी तो भागते हुए आए कि कोई बंदर परेशान कर रहा होगा। लेकिन एक पेड़ के पीछे से ताकती, स्वाभाविक ही, बहुत घबराई सी गिलहरी को देखकर वे सब हँसे बिना न रह सके और फिर महिला सहित हम सब भी हँस-हँस कर लोट-पोट हो गए!

तो, अगर आप कोई दर्शनीय चिड़ियाघर देखने का इरादा कर रहे हैं और खुद जानवरों के साथ रहने का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करना चाहते हैं तो हमारा आश्रम आपको बढ़िया लगेगा!

आक्रामक टूरिस्ट गाइड्स भारत में स्वच्छंद घूमने-फिरने का मज़ा किरकिरा कर देते हैं – 11 अक्टूबर 2015

मैं पहले ही आपको बता चुका हूँ कि टूरिस्ट सीज़न शुरू हो चुका है और हमारे यहाँ आश्रम में कई मेहमान आ चुके हैं। स्वाभाविक ही वे भी बाहर घूमने जाते हैं लेकिन कभी-कभी उन्हें कई अप्रिय अनुभवों से गुज़रना पड़ता है-विशेष रूप से सामान बेचने वालों, गाइडों और आसपास मौजूद दूसरे भारतीयों के कारण। इसलिए हमने कुछ दर्शनीय स्थानों की अनुशंसा करना बंद कर दिया है। आज ही हमारे दो मेहमानों के साथ यहीं, वृंदावन में ऐसी ही एक घटना हुई!

जर्मनी से आई हुई दो महिलाएँ वृंदावन के कुछ दर्शनीय स्थल देखने निकलीं। वे वृंदावन के शाहजी मंदिर के पास स्थित निधि वन पहुँचीं और जैसे ही अपने इलेक्ट्रिक रिक्शा से उतरीं, उन्हें कुछ धार्मिक टूरिस्ट गाइडों ने घेर लिया, जो उन्हें मंदिर इत्यादि के दर्शन कराना चाहते थे और विशेष रूप से निधि वन के भीतर यहाँ से वहाँ घुमाना-फिराना चाहते थे, जहाँ हिन्दू आस्थावान मानते हैं कि हर रात भगवान कृष्ण नृत्य करते हैं। टूरिस्टों और तीर्थयात्रियों द्वारा अर्पित की जाने वाली दान-दक्षिणा में से घुमाने-फिराने वाले गाइड अच्छा-खासा कमीशन पाते हैं। स्वाभाविक ही, वे गैर-भारतीय टूरिस्टों और भक्तों को वहाँ की सैर कराने के लिए लालायित रहते हैं क्योंकि अक्सर वे दान-दक्षिणा में अच्छी ख़ासी रकम देते हैं।

तो इस तरह हमारी जर्मन मित्रों ने अपने आपको अचानक इतने सारे उत्तेजित पुरुषों के बीच घिरा पाया और सभी चाहते थे कि वे दोनों उनके साथ निधि वन की सैर करें। दोनों परेशान हो गईं और रिक्शावाला किसी तरह उन्हें निधि वन के द्वार तक छोड़कर आया। इस बीच सभी गाइड चिल्ला-चिल्लाकर उनसे उनकी सेवाएँ लेने की गुहार लगाते ही रहे। आखिरकार, हारकर उन महिलाओं ने उनमें से एक गाइड चुन ही लिया और तब जाकर बाकी सारे गाइड पीछे हटे और फिर उस रिक्शावाले पर अपना गुस्सा उतारने लगे, यहाँ तक कि उसके रिक्शे के टायरों को नुकसान पहुँचाने से भी बाज़ नहीं आए!

गाइड ने अपेक्षानुरूप हिन्दू मिथकों की बहुत सी कहानियाँ सुनाईं, कई जगहों पर उन्हें दान-दक्षिणा अर्पित करने पर मजबूर किया और अंत में अपनी सेवाओं के मुआवजे के रूप में तगड़ी रकम ऐंठने की कोशिश करने लगा। उनके बीच लगभग झगड़ा होने की नौबत आ गई, वह बहुत गुस्से में था कि उसके द्वारा अनुचित रूप से मांगी जा रही विशाल राशि वे देना नहीं चाहतीं। किसी तरह उनके बीच सहमति बनी-हालांकि उसने उनसे अच्छी खासी रकम ठग ली थी!

उनके लिए यह एक अच्छा-खासा रोमांचक अनुभव था और अंत में महिलाएँ अच्छे मूड में ही आश्रम वापस आईं-लेकिन उस पल उस अनुभव से गुजरना उनके लिए कतई सुखकर नहीं था और इसलिए वे दोबारा वहाँ जाने की सोच भी नहीं सकतीं। इसके अलावा भी हमारे कई मित्र विभिन्न दर्शनीय स्थलों से इसी तरह दुखी, व्यथित, विचलित होकर लौटे हैं, यहाँ तक कि कई बार भीड़-भाड़ के ऐसे हमलों के चलते उनकी आँखों में आँसू आ गए हैं!

इसीलिए हमने सबसे पहले पास ही स्थित एक दर्शनीय स्थान, बरसाना की अनुशंसा करना बंद कर दिया। यहाँ खूबसूरत मंदिर हैं लेकिन साथ ही बड़ी संख्या में जिद्दी भिखारी, आक्रामक गाइड और पंडे-पुजारी भी हैं! उसके बाद हमने फ़तेहपुर सीकरी जाने की सलाह देना बंद किया, जब कि सालों से ताजमहल देखने जाने वाला हर यात्री इस भुतहा शहर की बेहद सुंदर और अनमोल वास्तुकला देखने अवश्य जाता था। वहाँ के गाइड आपकी टॅक्सी को पार्किंग तक पहुँचने से पहले ही रोक लेते है और तब तक अलग नहीं होते जब तक कि आप उतरकर उनमें से किसी एक गाइड का चुनाव नहीं कर लेते या फिर जब तक कि आप जल्दी से उतरकर गाइडों और तरह-तरह का सामान बेचने वालों की भीड़ के बीच से बचकर प्रवेशद्वार की ओर निकल नहीं जाते!

कोई भी इन स्थानों को शांतिपूर्वक नहीं देख सकता! उन्हें देखने का मज़ा ही किरकिरा हो जाता है, वास्तव में दूसरों को अपने सामने से अलग करना लगातार संघर्ष जैसा महसूस होता है। स्वाभाविक ही, अक्सर इस पर काबू पाया जा सकता है-लेकिन काफी मशक्कत के बाद ही और उसके बाद उस स्थान का पूरा आनंद लेने की ताकत ही नहीं बची होती!

इसीलिए अब हम कुछ जगहों की अनुशंसा नहीं करते-और कुल मिलाकर यह भारतीय टूरिज़्म उद्योग को हानि पहुँचाता है! यह सबके लिए बुरा है: यात्रियों के लिए, क्योंकि वे स्वच्छंद घूम-फिर नहीं पाते, दर्शनीय स्थलों का आनंद नहीं ले पाते और दोबारा वहाँ आने से कतराते हैं; सामान बेचने वालों के लिए, जिनका व्यापार बढ़ सकता था अगर यात्री खुश होकर लौटते और, यहाँ तक कि सामान्य भले व्यक्तियों के लिए भी, जो वहाँ बेहतर माहौल बनाए रखना चाहते हैं या जो विदेशी यात्रियों की सुरक्षा की चिंता करते हैं, उन्हें इन आक्रमणों से बचाए रखना चाहते हैं! इन झूठे पंडे-पुरोहितों, आक्रामक गाइडों और सामान बेचने वालों के विरुद्ध कुछ न कुछ किया जाना बहुत ज़रूरी है जिससे लोग शांति और सुकून के साथ इस देश की पुरातात्विक सम्पदा और दर्शनीय स्थानों का भरपूर आनंद ले सकें!

भारत में सामाजिक परिस्थिति लगातार बेहद शर्मनाक, शोचनीय और पीड़ादायक हो चली है – 7 अक्टूबर 2015

आम तौर पर मैं अपने ब्लॉग में राजनीति पर नहीं लिखता। उसके लिए मैं सोशल मीडिया का उपयोग करता हूँ लेकिन क्योंकि भारत में सामाजिक परिस्थितियाँ तेज़ी के साथ बिगड़ती जा रही हैं और अब यह विषय लगातार अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का ध्यान अपनी ओर खींचा रहा है, अगर आप इजाज़त दें तो आज मैं भी अपना खेद और प्रतिरोध दर्ज कराना चाहूँगा।

हाल ही में भारत में हुई एक घटना दुनिया भर के बड़े समाचार-पत्रों की मुख्य खबर बनी। संभव है, आपने भी इसके विषय में सुना हो। एक गाँव के हिन्दू मंदिर में वहाँ के पुजारी ने भारत की सत्ताधारी पार्टी के एक नेता के बेटे ने उससे जो कहा था, जस की तस उसकी घोषणा कर दी। वास्तव में वह महज एक अफवाह थी कि गाँव के एक मुस्लिम परिवार ने गाय का मांस खाया है। यह सुनते ही भीड़ जुट गई और उसने उस परिवार के घर की दिशा में कूच कर दिया, परिवार के पिता और उसके बेटे को घर से बाहर निकालकर उस पर ईटों से हमला किया। हमला इतना जोरदार था कि पिता की मृत्यु हो गई और बेटे को घायल अवस्था में अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जो इस बुरी तरह से घायल हुआ है कि उसकी जान जा सकती है। फिलहाल वह मौत से संघर्ष कर रहा है। जाँच से पता चला है कि उन्होंने गाय का मांस नहीं बल्कि बकरे का मांस खाया था-लेकिन इससे बच्चों का पिता और उनकी माँ का पति वापस नहीं आ सकते!

यह घटना स्वयं में बेहद घृणास्पद थी और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने ठीक ही उसे अपने पृष्ठों में प्रमुखता से जगह दी लेकिन उससे भी भयावह सत्ताधारी पार्टी के दूसरे सदस्यों की प्रतिक्रिया रही! अफवाह फैलाने वाले बीजेपी के नेता के बेटे तथा कुछ और लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है। लेकिन उनकी पार्टी के नेता उस लड़के के व्यवहार को नज़रअंदाज़ करते हुए तरह-तरह के बहाने बना रहे हैं। उनका कहना है कि वे सब भोले-भाले बच्चे हैं, और उत्साह में यह सब कर बैठे हैं! वे हत्या के आरोप में हुई उनकी गिरफ़्तारी का विरोध कर रहे हैं!

लेकिन साथ ही वे उनके इस कृत्य पर खुले आम यह कहकर मुहर भी लगा रहे हैं कि जो भी गाय का मांस खाए, उसे यही सज़ा मिलनी चाहिए! हमारे देश की सत्ताधारी पार्टी के एक लोकसभा सदस्य ने कहा कि गाय हमारी माँ है और अगर आपने हमारी माँ की हत्या की है तो आपकी हत्या भी जायज़ है! ये लोग सिर्फ गाय का मांस खाने पर किसी की भी हत्या करने पर उतारू हैं!

निश्चित ही ये सभी राजनैतिक नेता पाखंडी हैं! देश के सबसे महंगे रेस्तराँ गाय का मांस बेचते हैं, देश के कई प्रांतों में, वहाँ की स्थानीय जनता के लिए गाय का मांस एक सामान्य भोजन है। इन सब तथ्यों से उन्हें कोई परेशानी नहीं है! लेकिन वे सामान्य, धार्मिक हिंदुओं की गाय के प्रति अत्यंत संवेदनशील भावनाओं का उपयोग जानबूझकर हिंसा फैलाने में कर रहे हैं, जिससे देश की जनता का ध्रुवीकरण हो जाए, वे दो गुटों में विभक्त हो जाएँ और इन नेताओं को अधिक से अधिक वोट मिल सकें!

जी हाँ, यह एक बहुत बड़ी साजिश है। एक और बीजेपी नेता ने प्रांतीय चुनावों से पहले कहा था, ‘अगर दंगे होते हैं तो हम चुनाव जीत जाएँगे’ और अतीत में यह बात सत्य सिद्ध हो चुकी है! राजनैतिक नेता विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच, विशेष रूप से हिंदुओं और मुसलमानों के बीच, हिंसक प्रतिक्रिया को प्रोत्साहित करते हैं और इस तरह उन्हें अलग-अलग गुटों में विभक्त कर देते हैं और इस तरह देश के टुकड़े-टुकड़े कर देना चाहते हैं। इन दंगों में, निश्चित ही बहुत से लोग मारे जाएँगे। और अंत में उन्हें अधिकांश हिन्दू वोट प्राप्त होंगे और बहुमत मिल जाएगा। जो लोग अभी कुछ साल पहले तक दंगों के आरोपी थे, आज संसद और विधानसभाओं में बैठे हैं! धर्म और जाति के आधार पर वोट प्राप्त करने और चुनाव जीतने की यह बड़ी आसान सी रणनीति है!

जो थोड़ी बहुत कसर रह गई थी, वह प्रधानमंत्री की चुप्पी ने पूरी कर दी है। उनकी पार्टी विकास का मुद्दा जनता के सामने रखती है लेकिन वह एक प्रहसन से अधिक कुछ भी नहीं है-विकास सिर्फ अमीरों का हो रहा है और वे दिन-ब-दिन और अमीर होते जा रहे हैं जब कि सामान्य गरीब जनता की आर्थिक स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ा है! अगर वे धार्मिक हिन्दू नहीं हैं तो उनकी हालत खराब ही हुई है, बल्कि वे संकट में हैं। दुर्भाग्य से दक्षिणपंथी पार्टी की सरकार होने के कारण अतिवादी और अतिराष्ट्रवादी हिन्दू सत्ता में आ गए हैं और न सिर्फ बहुत शक्तिशाली हो गए हैं बल्कि उन्हें इसके लिए पूरा राजनैतिक समर्थन भी मिलता है कि उन लोगों के विरुद्ध हिंसा भड़का सकें, जिनकी आस्थाएँ अलग हैं और जो उनके अनुसार नहीं सोचते।

इसी कारण जाने-माने तर्कवादियों, नास्तिक लेखकों की हत्या की जा चुकी है और धार्मिक चरमपंथियों ने बाकायदा एक सूची बना रखी है, जिसके अनुसार वे एक के बाद एक बुद्धिजीवियों, तर्कवादियों, धर्मविरोधियों या नास्तिकों को निशाना बनाने का विचार रखते हैं।

इस समय हमारा देश अत्यंत नाज़ुक दौर से गुज़र रहा है और इसीलिए मैं आज यह ब्लॉग लिख रहा हूँ कि इस बहुत संवेदनशील समय की एक झलक आपको दे सकूँ। कल मैंने आपको बताया था कि कैसे एक छोटा सा प्रयास भी मददगार साबित हो सकता है और बहुत से प्रख्यात लेखकों का भी यही विचार है। उन्होंने इसके इस आतंकवाद के प्रतिरोध में सरकार को अपने पुरस्कार वापस कर दिए हैं। हमें यह साबित करना होगा कि हम ऐसा भारत नहीं चाहते। यह एक खुला, सांस्कृतिक विविधतापूर्ण, सबको साथ लेकर चलने वाला और सबके विचारों का सम्मान करने वाला भारत नहीं है, जिसका दावा करते हम नहीं थकते!

जब मुझे अछूत के पास बैठने पर आगाह किया गया – 4 अक्टूबर 2015

आज मैं अपने साथ हाल ही में हुए एक वाकए के बारे में लिखना चाहता हूँ, जो दर्शाता है कि भारतीय समाज में जाति-व्यवस्था की जड़ें कितनी मजबूत हैं। दुर्भाग्य से आज भी यह व्यवस्था हर जगह व्याप्त है और अभी भी बहुत से लोगों के मन से यह खयाल बाहर नहीं निकला है कि कुछ लोग ‘अछूत’ हो सकते हैं।

अभी कुछ सप्ताह पहले की बात है, जब मैं बाहर, हाल में सोफ़े पर बैठा हमारे सफाई कर्मचारी से बात कर रहा था, जो रोज़ सबेरे स्कूल के संडास-बाथरूम साफ करने आता है। उसने हाल ही में अपनी भतीजी को हमारे स्कूल में भर्ती करवाया था और मैं उस लड़की के बारे में उससे बातचीत कर रहा था।

अभी हम बात ही कर रहे थे कि एक और व्यक्ति ने आश्रम के मुख्य हाल में प्रवेश किया। वह हमारे शहर का ही व्यापारी था और कोई सामान पहुँचाने आया था। मेरे साथ बात कर रहा व्यक्ति उठकर खड़ा हो गया और तुरंत बाहर निकल गया और मैं नए आगंतुक से बात करने लगा। मैंने उससे बैठने के लिए कहा और उठकर यशेंदु को बुलाने जाने लगा, जो काम के बारे में आगंतुक से बात करता। मैं निकल ही रहा था कि वह मेरे पास आकर फुसफुसाते हुए कुछ कहने लगा, जैसे कोई बहुत ज़रूरी और दूसरों से छिपाने वाली रहस्यपूर्ण बात हो: ‘शायद आप नहीं जानते, ‘वह’ नीच जाति का आदमी है!’ उसने अभी-अभी बाहर गए व्यक्ति के बारे में कहा।

मैं जानता था कि यह व्यक्ति अपेक्षा कर रहा होगा कि मैं चौंक उठूँगा। बल्कि शायद अरुचि और ग्लानि से मुँह बनाऊँगा क्योंकि अभी-अभी ‘वह’ व्यक्ति मेरे साथ उसी तरह सोफ़े पर बैठा था, जिस तरह मैं इस नए आगंतुक के साथ बैठता। निश्चय ही, मेरी प्रतिक्रिया उसकी अपेक्षानुरूप नहीं रही! मैं अच्छी तरह जानता था कि मैं किससे साथ बात कर रहा था और उसकी जाति से निश्चित ही मेरा कोई सरोकार नहीं था!

‘अरे वह?’ मैंने जवाब दिया। ‘वह यहाँ कई सालों से काम कर रहा है और बहुत अच्छा आदमी है!’ और इतना कहकर मैं वहाँ से यशेंदु को बुलाने निकल गया।

अब चौंकने की बारी उस आगंतुक की थी! मैं देख पा रहा था कि यह जानकारी उसके गले से नीचे नहीं उतर रही थी कि मैं ‘उसके’ बारे में अच्छी तरह जानते-बूझते भी कि वह एक ‘अछूत’ है, मज़े में उसकी बगल में बैठा हुआ था।

दुर्भाग्य से, भारतीय समाज में यह प्रतिक्रिया असामान्य नहीं है। अफ़सोस कि आज भी यह जानने के बाद कि यह व्यक्ति किस परिवार का है और क्या काम करता है, अधिकांश लोग उसके पास नहीं बैठते, वह भी एक ही सोफ़े पर! दुर्भाग्य से, यह व्यक्ति भी किसी दूसरे परिवार में होता और संडास-बाथरूम साफ करने का काम कर रहा होता तो उनके साथ या उनके सोफ़े पर बैठने की हिम्मत भी नहीं करता। अर्थात, बैठने के लिए उससे कहा भी नहीं जाता और उसका ऐसा करना वहाँ कोई पसंद भी नहीं करता।

रमोना अक्सर स्कूल देखने आने वालों और आश्रम आने वाले मेहमानों से इस विषय में बताती रहती है। हर कोई यह जानकार स्तब्ध रह जाता है कि यहाँ, भारत में आज भी एक इंसान दूसरे को ‘अस्पृश्य’ समझता है। लेकिन यह घटना एक बार फिर इस बात को उजागर करती है कि हमारे स्कूल और हमारे आश्रम जैसे और भी कई स्थान होने चाहिए जहाँ हर कोई, चाहे जिस जाति का हो, एक साथ बैठ सकें, एक साथ भोजन कर सकें, पढ़-लिख सकें और जहाँ यही सिखाया जाता हो कि हर इंसान दूसरे के बराबर है!

भारत में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस – चीन से चटाइयां और योग के शक्तिशाली व्यापारियों को धनलाभ – 21 जून 2015

आज फिर इतवार है: 21 जून, जिसे इस साल पहली बार ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ के रूप में भी मनाया जा रहा है। यह मेरी आँखों से कैसे ओझल हो सकता था- क्योंकि भारत में आज के कार्यक्रम और समारोह कई दिनों से टीवी समाचारों के केंद्र में थे और उसे स्वास्थ्य जागरूकता के प्रसार के स्थान पर मीडिया का बहुत बड़ा तमाशा, दिखावे का पाखंडी समारोह और सरकारी प्रचार तंत्र में बदल दिया गया। क्यों और कैसे? अभी बताता हूँ।

भारत सरकार ने आज के दिन को ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ घोषित करवाने के प्रयास किए थे और बहुत से दूसरे देशों की सहमति प्राप्त हो जाने के बाद आखिर संयुक्त राष्ट्र संघ ने सूचना जारी कर दी कि भविष्य में 21 जून का दिन इसी नाम से जाना जाएगा। विश्व के किसी भी भाग में अगर आप किसी सामान्य व्यक्ति से भी पूछें कि योग की शुरुआत कहाँ हुई तो वह भारत का ही नाम लेगा क्योंकि यह बात सभी जानते हैं। और योग के लाभों को कौन नकारेगा? मैं तो निश्चित ही नहीं, लेकिन भारत सरकार द्वारा मनाए जा रहे समारोह में पर्दे के पीछे कुछ ऐसी बातें चल रही हैं जो दर्शाती हैं कि इस धूमधाम का मकसद सिर्फ योग-भावना का उत्साह नहीं है, कुछ और भी है।

इस आयोजन और उसके प्रचार पर आज के दिन के लिए भारत सरकार ने करोड़ों रुपए खर्च कर दिए। स्वाभाविक ही, सबसे बड़ा आयोजन दिल्ली में हुआ, जहाँ राजपथ पर-जहाँ अक्सर औपचारिक सरकारी कार्यक्रम होते रहते हैं- प्रधान मंत्री, नरेंद्र मोदी ने आज प्रातः 35000 लोगों के साथ योग किया। इस आँकड़े पर गौर कीजिए-गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स में भारत का नाम दर्ज कराने के लिए इतना बड़ा तमाशा किया गया था, जैसे दुनिया को भारत की देन यही है!

सरकार ने भारत भर में 651 केंद्र शुरू किए, जहाँ एक साथ, एक ही समय में योग समारोह आयोजित किए गए। एक घंटे का यह योग समारोह सफलता पूर्वक सम्पन्न हो सके, इसके लिए हर केंद्र को 1 लाख रुपए अर्थात् 1500 यू एस डॉलर प्राप्त हुए। इसे बड़े पैमाने पर किया गया एक अच्छा प्रयास कहा जा सकता है लेकिन तब तक ही जब तक आपको पता नहीं चलता कि इन 651 में से 191 केंद्रों को चलाने का ठेका रामदेव को और 69 का श्री श्री रविशंकर को दिया गया है, जो, दोनों ही, दूर दूर तक योगी नहीं हैं बल्कि योग के बड़े व्यापारी हैं और उनका करोड़ों डॉलर का विस्तृत व्यवसाय है!

पिछले चुनावों में सत्ताधारी पार्टी को जिताने के लिए रामदेव ने बहुत काम किया था। स्पष्ट ही, इसे उसकी सेवाओं का मेहनताना कहा जाना चाहिए। उसके इसी काम की वे कीमत चुका रहे हैं-और यह सौदा बड़े काम का है क्योंकि अपने तरह-तरह के उत्पादों के साथ रामदेव अब मीडिया में छाया हुआ है।

फिर सरकार को अचानक होश आया कि इतने सारे सहभागियों के लिए चटाइयों की ज़रूरत होगी और चीन से आयात करने के सिवा उन्हें कोई बेहतर विकल्प नहीं सूझा! मोदी, जो दुनिया को यह समझाने में लगे हुए हैं कि भारत एक बढ़िया निर्माता है और दुनिया भर में घूम-घूमकर ‘मेक इन इंडिया’ का प्रचार-अभियान चला रहे हैं, अब यह व्यापार एक दूसरे देश की झोली में डालने के लिए तैयार हो गए! क्या चटाइयाँ भारत में तैयार नहीं की जा सकती थीं? या पूरी तरह परंपरागत तरीके से स्थानीय दस्तकारों से घास-फूस की चटाइयाँ ही बनवा लेते! कल्पना कीजिए, कितने गरीब कारीगरों को इस समारोह के चलते रोज़गार मिल जाता!

मेरा इशारा अब आप समझ गए होंगे! स्वाभाविक ही, मैं योग के विरुद्ध नहीं हूँ और न ही इसके विरुद्ध हूँ कि वैश्विक पैमाने पर किसी दिन को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया जाए। लेकिन प्रश्न दूसरा है। उसी संयुक्त राष्ट्र ने हाल ही में घोषित किया है कि भारत में दुनिया के सबसे ज़्यादा संख्या में भूखे लोग बसते हैं। उन्नीस करोड़ चालीस लाख लोग लोग रोज़ भूखे पेट सोने को मजबूर हैं। देश के 48% बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। और सरकार करोड़ों रुपया गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स में प्रवेश की चमक-दमक के ग्लेमर पर खर्च कर रही है!

देश के मजदूरों को साल में एक दिन के योग की ज़रुरत नहीं है। वे खेतों और निर्माण-स्थलों में कड़ी मेहनत करके पर्याप्त व्यायाम कर लेते हैं और मुश्किल से इतना कमा पाते हैं कि बच्चों को खिला सकें! योग उन्हें क्या देगा? और उन्हें रोज़गार मुहैया करवाने की जगह आप अपने यहाँ के रोजगार और अपना पैसा चीन भेज देते हैं।

निश्चित ही, पतंजलि अगर जीवित होते और यह ड्रामेबाज़ी देखते तो अविश्वास से दीवार पर सिर फोड़ लेते!

खैर, मैंने तो रोज की तरह आज भी योग किया- और मैं सलाह दूंगा कि आप भी यही करें। योग एक जीवन पद्धति है। उसे अपने दैनिक जीवन में उतारिए। साल में एक दिन का योग पर्याप्त नहीं है और उसे सिर्फ कुछ व्यायामों तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। जीवन के हर एक पल में जीना सीखिए, भविष्य की अनावश्यक चिंता मत कीजिए और न ही पिछली बातों पर पछतावा कीजिए। खुद पर नज़र रखिए और अपने विचारों, शब्दों और कामों के प्रति हर वक़्त जागरूक रहिए। जब भी संभव हो, दूसरों की मदद करने की कोशिश कीजिए- जैसे किसी ज़रूरतमन्द को काम देकर- न कि दूसरों से सम्मान या मान्यता प्राप्त करने के लिए पैसे बरबाद कीजिए- जैसे विश्व रेकॉर्ड बनाने के लिए…

मेरी प्रिय, पश्चिम की महिलाओं: भारतीय पुरुषों से ऑनलाइन प्रेम संबंध बनाते समय सतर्क रहें – 15 जून 2015

आज से मैं एक ऐसे विषय पर लिखने की शुरुआत करना चाहता हूँ, जो मेरे मुताबिक़ अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह मैं इसलिए जानता हूँ कि हमारे आश्रम में अक्सर विदेशी महिलाएँ आती रहती हैं या बहुत सी महिलाएँ इस मामले में लिखकर भी पूछती हैं: वे इंटरनेट पर चैटिंग करते हुए एक भारतीय पुरुष के साथ प्रेम करने लगीं और अब उससे मिलने भारत आना चाहती हैं। कई बार वे बेहद निराश होकर अपने देश वापस लौटती हैं।

शुरू करने से पहले मैं आपके सामने यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि जो मैं आज लिखूँगा और शायद अगले कुछ दिनों तक लिखता रहूँगा, वह मेरे अनुभवों और मेरी राय के आधार पर व्यक्त किए गए मेरे विचार होंगे। निश्चय ही इसके बिल्कुल विपरीत रूप से घटित प्रकरण भी बहुत से मौजूद होंगे और स्पष्ट है कि यह उस व्यक्ति, उसके रवैये और उसके व्यवहार पर निर्भर होता है कि अंततः किसी को क्या हासिल हुआ।

लेकिन 35 से 50 साल उम्र वाली पश्चिमी महिलाओं के प्रकरण सामान्यतया ज़्यादा देखने में आते हैं और वैसी ही एक महिला के बारे में मैं आपको बताने जा रहा हूँ। इंटरनेट पर चैट-रूम में और सोशल मीडिया के ज़रिए इस महिला का परिचय एक भारतीय पुरुष से हो गया और जैसा कि अक्सर होता है, उससे कम उम्र के पुरुष से। काफी समय एक-दूसरे से बातचीत करने के बाद उसे महसूस हुआ कि वे आपस में सिर्फ सामान्य परिचित या मित्र से आगे कुछ आगे बढ़कर अधिक घनिष्ट हो सकते हैं। लगता था, उनके बीच गहरे तार जुड़ गए हैं और युवक भी उसे बार-बार भारत आने का निमंत्रित देता रहता था तो उसने सोचा, क्यों न एक बार हो आए, देखे, भरोसा करे और इस संबंध में कुछ गहरा उतरे?

ऐसी स्थिति में पड़ी हर महिला से मैं एक बात कहना चाहूँगा: सतर्क रहें और तुरंत इस मामले में अपने दिल को पूरी तरह न झोंक दें! आप सोच रही हैं कि इससे कुछ गंभीर बात निकलकर आएगी और यह कि शायद आपके पास जीवन-साथी प्राप्त करने का जीवन में सिर्फ एक बार मिलने वाला मौका हाथ आ गया है। सपने देखना मत छोड़िए-लेकिन यथार्थ का दामन भी कभी मत छोड़िए और इस बात को समझिए कि हो सकता है कि यह व्यक्ति उतना गंभीर न हो जितना आप हैं!

इसके विपरीत कई बार हमने देखा है कि महिलाएँ भारत आती हैं और उस व्यक्ति से रूबरू मिल भी नहीं पातीं। पहली बात तो यह कि आप नहीं जानते कि जिस आदमी से आप इतने दिन चैट करती रहीं वह यथार्थ में कोई व्यक्ति है भी या नहीं। इंटरनेट पर कोई भी बेधड़क झूठ बोल सकता है और निडर होकर कि कोई सच्चाई जान लेगा, झूठे चित्र अपलोड कर सकता है!

तो अब जबकि आपने भारत आने का टिकिट भी बुक कर लिया है, यह सुनिश्चित करें कि आपके पास पहले से कोई न कोई वैकल्पिक योजना (बॅकअप प्लान) हो! पहले से होटल वगैरह की छानबीन करके और होटल से बात करके आपको लेने आने वाली टॅक्सी आदि की व्यवस्था कर लें, जिससे आपको पता हो कि आपको कौन लेने आ रहा है। इस बात पर ही भरोसा मत कीजिए कि यह आदमी आपको लेने आ ही जाएगा-और इस विदेशी धरती और पूरी तरह अलग देश में हवाई जहाज से उतरते ही क्या आप पहली ही रात इस आदमी के साथ रहना पसंद करेंगी? न सिर्फ आप इस बिल्कुल अपरिचित संस्कृति, अलग टाइम ज़ोन, और बिल्कुल अलग मौसम द्वारा अभिभूत कर ली जाएँगी बल्कि वे भावनाएँ भी इसमें अपनी भूमिका अदा करेंगी, जिनमें आप इस समय मुब्तिला है।

आप उनसे रूबरू मिलने की जगह तय कर सकती हैं लेकिन तब भी आपको हर वक़्त सतर्क रहना होगा। इस बात की पहले से योजना बना लें कि अगर वह तय समय पर, तय जगह पर न आए, अगर उसने कोई पता नहीं दिया है कि आप वहाँ जाकर उससे मुलाक़ात कर लें या अचानक उसका वह फोन, जिस पर आप हमेशा उससे बात करती थीं, स्विच ऑफ मिले।

मैं बताना चाहता हूँ कि यह सब मैंने होते हुए देखा है। महिलाएँ भारत आती रही हैं, मिलने की जगह भी तय होती है, उनके पास एक पता और फोन नंबर होता है, सैकड़ों किलोमीटर रेल और कार का सफर करने के बाद वे पाती हैं कि एक अनजान कस्बे या शहर के अजनबी चौराहे पर वे बिल्कुल तनहा खड़ी हैं। पता गलत था, फोन लग नहीं रहा। कोई लेने नहीं आया। फेसबुक और ईमेल संदेशों का कोई जवाब नहीं या अगर उस आदमी के अंदर थोड़ी भी मनुष्यता, थोड़ा सा भी अपराधबोध हुआ तो जवाब के रूप में कोई न कोई बहाना-सॉरी, अचानक ट्रांसफर हो गया या देश के दूसरे कोने में रहने वाले किसी रिश्तेदार की मृत्यु हो गई और उसे तुरंत वहाँ के लिए निकलना पड़ा।

अन्य कई महिलाओं के किस्से कुछ अलग होते हैं। जिस आदमी से वे इतने दिनों से बात कर रही थी, वह उन्हें मिल जाता है। फिर वे यहाँ खूब बढ़िया छुट्टियाँ मनाते हुए देश भर में घूमते-फिरते हैं और स्वाभाविक ही, सारा यात्रा खर्च, होटल का किराया और दूसरी खरीदारियों के खर्चे ये महिलाएँ ही उठाती हैं। उन्हें उम्मीद होती है कि जीवन भर के उनके संग-साथ का यह पहला महीना है लेकिन आखिर जब वे गंभीरता से भविष्य के बारे में बात करते हैं तो उसे गोलमोल वादे, झूठे बहाने सुनने को मिलते हैं और अंततः उन्हें पता चलता है कि सिर्फ मौज मस्ती करने के इरादे से उसने इतना नाटक किया था!

ऐसे निराशाजनक अनुभवों को झेलने के बाद कभी-कभार ये महिलाएँ हमारे आश्रम पहुँच जाती हैं। कई बार वे इतनी समझदार और सतर्क होती हैं कि अपने रोमांच की ओर निकलने से पहले हमारे पास आ जाती हैं और सुनिश्चित कर लेती हैं कि ऐसी किसी अनहोनी के बाद आश्रय के लिए उनके पास कोई विकल्प मौजूद हो। कुछ तो उस आदमी की खोज में हमारी कार तक ले जाती हैं। हमें ख़ुशी होती है कि चलो, इतना परेशान होने के बाद कुछ समय वे हमारे आश्रम में शारीरिक और मानसिक विश्रांति प्राप्त कर सकेंगी और शांत मन से विचार कर सकेंगी कि उनके साथ ठीक-ठीक क्या हुआ था, उनसे क्या गलती हो गई थी और उससे उपजी निराशा से किस तरह उबरा जाए, और जब वे भारत से बिदा हों तो निराशा के साथ कुछ अच्छे अनुभव भी साथ लेती जाएँ!

कल मैं इन परिस्थितियों के भावनात्मक पहलुओं पर कुछ और विस्तार से लिखूँगा।

भारत में शिक्षा व्यवसाय को बंद कराने में अम्माजी’ज़ आयुर्वेदिक रेस्तराँ किस तरह सहायक होगा? 21 मई 2015

इस हफ्ते की शुरुआत में मैंने भारत में शिक्षा संबंधी एक महती समस्या और बराबरी को लेकर अपनी परिकल्पना के बारे में आपको बताया था। शिक्षा व्यवसाय में मौजूद बड़े व्यापारी घरानों को कैसे चुनौती दी जा सकती है, इस संबंध में मैंने कल विस्तार से अपने विचार प्रस्तुत किए थे। आज मैं इससे भी अधिक ठोस योजना आपके सामने रखने जा रहा हूँ और बताना चाहता हूँ कि मैं कैसे इस बात की कल्पना कर पा रहा हूँ कि हमारे आयुर्वेदिक रेस्तराँ, अम्माजी’ज़ की सहायता से मेरा यह स्वप्न यथार्थ में परिणत हो सकता है।

इतने साल तक हम अपने स्कूल और दूसरी चैरिटी परियोजनाओं को अपने व्यवसाय और प्रायोजकों तथा दूसरे मददगारों के सहयोग से चलाते रहे हैं। हमारे सारे व्यावसायिक ग्राहक और अधिकांश आर्थिक मददगार पश्चिमी देशों के लोग रहे हैं। ऐसे गैर भारतीय, जो योग और आयुर्वेद विश्राम सत्रों में शामिल होने यहाँ आते हैं, जो हमारी कार्यशालाओं में सम्मिलित होते हैं या व्यक्तिगत सलाह-सत्रों में अपनी समस्याएँ लेकर आते हैं। इसके अलावा कुछ गैर भारतीय वैसे भी, हर तरह से गरीब बच्चों की आर्थिक मदद करना चाहते हैं इसलिए हमारे इन कामों में आर्थिक सहयोग करते हैं।

अब एक आयुर्वेदिक रेस्तराँ, अम्माजी'ज़ शुरू करने के साथ हम एक नए व्यवसाय में कदम रखने जा रहे हैं। वहाँ हम भोजन के शौकीनों के लिए उच्च गुणवत्ता वाला भोजन मुहैया कराएँगे और इस तरह उनके शरीर और स्वास्थ्य के लिए भी कुछ बेहतर कर पाएँगे। गलत खाद्य के ज़रिए हम बहुत सी बीमारियों को न्योता देते हैं-और अम्माजी'ज़ में न सिर्फ स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोग स्वास्थ्यवर्धक भोजन कर पाएँगे बल्कि अपने चटोरे मित्रों और बच्चों को भी परितुष्ट कर पाएँगे! वहाँ हम आहार और शारीरिक पोषण संबंधी टिप्स और जानकारियाँ उपलब्ध कराएँगे, जो हमारे यहाँ की विशेषता होगी और एक अतिरिक्त लाभ भी क्योंकि जब भी आप यहाँ भोजन करने आएँगे, अपने बच्चों की निःशुल्क शिक्षा में मददगार भी हो रहे होंगे!

जल्द ही हमारे यहाँ बहुत से भारतीय मेहमान भी आने लगेंगे और तब हम ऐसे बिंदु पर पहुँच जाएँगे जब न सिर्फ हम गरीब बच्चों की मदद करते रह सकेंगे बल्कि कुछ बड़ी परियोजनाओं पर भी काम कर सकेंगे! हम एक स्तरीय स्कूल खोलेंगे, जहाँ हर संभव सुविधाएँ होंगी-वह भी पढ़ने वाले हर बच्चे के लिए पूरी तरह मुफ़्त! और हाँ, हमारे रेस्तराँ के ग्राहकों के बच्चों के लिए भी!

जी हाँ, वास्तव में जब भी आप हमारे स्कूल में भोजन करने आएँगे तो उस पर खर्च होने वाला एक एक रुपया आपके बच्चे की बेहतर शिक्षा पर खर्च किया जाएगा! इस तरह हमारा यह नया व्यवसाय भी इस स्कूल की मदद में पूरी तरह सहभागी होगा!

मेरा विश्वास है कि इस मिशन और हमारी परियोजना से सभी संतुष्ट होंगे: गरीब बच्चों के माता पिता, जिनके बच्चे अपढ़ रह जाने के अभिशाप से मुक्त होंगे और मुफ़्त विद्यार्जन कर पाएँगे; मध्यवर्गीय अभिभावक, जिन्हें बच्चों की अच्छी शिक्षा हेतु संघर्ष नहीं करना होगा क्योंकि शिक्षा निःशुल्क होगी और आर्थिक रूप से संपन्न अभिभावक, जिनके बच्चे वही शिक्षा मुफ़्त पा सकेंगे, जिसके लिए उन्हें मोटी रकम खर्च करनी पड़ती! किसी विशाल मॉल में खरीदी जाने वाली वस्तु की तरह विद्या खरीदने के स्थान पर समानता और बंधुत्व की शिक्षा देने वाले स्कूल में निःशुल्क शिक्षा कौन नहीं पसंद करेगा?

सिर्फ ऐसे व्यवसायी, जिनकी ऐसी मॉलनुमा शिक्षा संस्थाएँ होंगी, वही मेरी इस परियोजना पर आपत्ति करेंगे क्योंकि वह उनके लिए नुकसानदेह होगी!

लेकिन कोई भी दूसरा व्यवसाय करने वाले लोग इसे पसंद करेंगे। और यही मुख्य बिन्दु है, जहाँ मैं लोगों से कहूँगा कि वे आगे आएँ और अपने व्यापार के माध्यम से और आर्थिक मदद के ज़रिए इस मिशन का समर्थन करें! व्यापारी अपने व्यापारिक लाभ का एक नियत प्रतिशत इस परियोजना के खर्च में लगा सकते हैं। समर्थ अभिभावक गण इस कार्य हेतु उपहार स्वरूप पैसे दे सकते हैं, भले ही उतनी ही रकम, जितना वे किसी भी दूसरे अच्छे स्कूल में अदा करते। और हाँ, फर्नीचर से लेकर भोजन या किताबों तक वे कई प्रकार से स्कूलोपयोगी वस्तुओं को प्रायोजित कर सकते हैं! हर व्यक्ति अपने तरीके से अपना अंशदान कर सकता है! स्वाभाविक ही, विदेशों से आने वाले डोनेशंस और प्रायोजन का स्वागत तो है ही!

फिर यह दूसरे कई शहरों में फैल सकता है, जहाँ हम आगे चलकर अपना रेस्तराँ खोलने का प्रयास करेंगे और हर रेस्तराँ के साथ एक स्कूल भी। सबके लिए निःशुल्क, इतना स्तरीय कि सभी इस परियोजना में शामिल होना चाहेंगे! एक इलाके में जब हमारे इस तरह के कई स्कूल खुल जाएँगे तो फिर लोग स्कूल जैसे दिखाई देने वाले इन मॉलों में इतना रुपया खर्च करने के लिए राज़ी नहीं होंगे-और बहुत से दूसरे लोग भी हमारे उदाहरण का अनुसरण करेंगे!

मैं नहीं जानता की इस विचार को मूर्त रूप देने में किस हद तक सफलता प्राप्त होगी और कितनी जल्दी सब कुछ आगे बढ़ेगा लेकिन मैं तो कल्पना करने की स्वतन्त्रता में आनंदमग्न रहता हूँ। अपने विचार रखने और सपने देखने की स्वतन्त्रता। समाज के हर आर्थिक और सामाजिक वर्ग से आने वाले हर बच्चे के लिए एक समान शिक्षा के अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से इस रास्ते पर हम आगे बढ़ते रहेंगे!

धनवान और गरीब सभी के लिए एक जैसी उच्च स्तरीय मुफ्त शिक्षा का सपना – 20 मई 2015

कल मैंने आपको बताया था कि मेरी दिली इच्छा है कि भारत में सभी के लिए एक जैसी शिक्षा हो। ऐसी शिक्षा, जो सभी बच्चों के लिए एक सी हो, भले ही अभिभावक उसके लिए कितना पैसा भी खर्च कर सकते हों, जिससे सभी लड़कियों और लड़कों को उन लक्ष्यों को प्राप्त करने के समान अवसर उपलब्ध हो सकें, जिन्हें वे प्राप्त करना चाहते हैं! विश्वास करें या न करें, मेरे पास इस स्वप्न को अंजाम तक पहुँचाने की एक कार्य योजना मौजूद है।

अब आप शायद सोच रहे होंगे कि मैं मूर्ख हूँ, दिवास्वप्नी हूँ या हवाई किले बनाने वाला अयथार्थवादी व्यक्ति हूँ। मैं शिक्षा में पैसे की भूमिका का महत्व समाप्त करना चाहता हूँ- भारत जैसे देश में, एक ऐसे समाज में, जहाँ कुछ लोगों के लिए पैसा ही सब कुछ है- क्योंकि बिना पैसे के यहाँ कुछ नहीं होता।

लेकिन आप जानते हैं कि हम पिछले आठ साल से यह स्कूल चला रहे हैं और पहले से ही गरीब बच्चों को शिक्षा प्रदान करने के अभियान में भरपूर शक्ति के साथ अपना योगदान कर रहे हैं और इस तरह ऐसे कामों का हमारे पास काफी तजुर्बा है। मेरे विचार हवाई नहीं होते, वे अनुभव की ठोस, यथार्थवादी भूमि पर आकार लेते हैं। हर साल हमारे स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है। उदार आर्थिक मददगारों की सहायता से हमने अपने स्कूल की इमारत की पहली मंज़िल का निर्माण कार्य पूरा कर लिया है, जिसमें पाँच नई कक्षाएँ शुरू हो चुकी हैं और अब हम कुछ अधिक बच्चों को पढ़ा पा रहे हैं!

स्वाभाविक ही हर चीज़ की एक सीमा होती है और हमेशा होगी।

मैं नहीं समझता कि सपने में भी मैं इस देश के भ्रष्टाचार को समाप्त कर सकता हूँ। न ही मैं हर एक को इतना धनवान बना सकता हूँ कि वे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा वाले ख़र्चीले स्कूलों में भेज सकें। जी नहीं, मेरा विचार यथार्थ को मद्देनजर रखते हुए, कुछ छोटे-छोटे कदमों के साथ आगे बढ़ने का है लेकिन संभव हुआ तो, क्रमशः काम को इतने विशाल पैमाने पर फैला देने का भी है कि उसका अच्छा खासा असर दिखाई दे सके!

बराबरी के अपने स्वप्न के अनुसार मैं स्कूल का निर्माण करूँगा। एक ऐसा स्कूल, जहाँ आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से समाज के हर वर्ग से आए बच्चे एक साथ पढ़ सकें और वह भी मुफ्त! हम वहाँ हर विद्यार्थी को एक जैसी उच्च स्तर की शिक्षा प्रदान करने का इरादा रखते हैं, चाहे किसी रिक्शा-चालक का लड़का हो, चाहे बैंक के उच्च प्रबंधन से जुड़े किसी उच्चाधिकारी की लड़की हो!

जैसा कि अभी भी हो रहा है, हमारा स्कूल आगे भी हर बच्चे को किताब-कापियाँ, वर्दियाँ और भोजन मुहैया कराएगा। हर बच्चे का स्कूल की ओर से स्वास्थ्य बीमा करवाया जाएगा और हर बच्चा हर तरह से अपने साथ बैठे अगले बच्चे के बराबर होगा।

जब हमने अपना मुफ्त स्कूल शुरू किया था तब कई छोटे और सस्ते स्कूलों के व्यापार पर बुरा असर पड़ा था और एक स्कूल तो बंद ही हो गया-क्योंकि बच्चे अब हमारे स्कूल में पढ़ने आने लगे थे।

अब उस स्थिति की कल्पना कीजिए कि हम कई ऐसे स्कूल खोलें, जहाँ भर्ती के समय आने वाले हर बच्चे को मुफ्त शिक्षा प्रदान की जाती है-स्वाभाविक ही, सीट भरने तक! शिक्षा व्यवसाय के इस दीर्घाकार दैत्य पर यह एक करारा प्रहार होगा-क्योंकि तब सामान्यतया उन स्कूलों में प्रवेश लेने वाले बच्चे भी हमारे यहाँ आएँगे क्योंकि यहाँ भी वैसी ही बढ़िया शिक्षा का इंतज़ाम होगा, वह भी बिल्कुल मुफ्त!

अब एक स्वाभाविक प्रश्न- यह स्वप्न कैसे साकार होगा, इसके लिए इतना पैसा कहाँ से आएगा? अम्माजी’ज़ से! अपने आयुर्वेदिक रेस्तराँ से! क्या? कैसे? इस विषय में आप कल पढ़ सकेंगे!

भारत – जहाँ शिक्षा भ्रष्टाचार और पैसे वालों की शिकार हो गई है – 19 मई 2015

कल मैंने हमारे स्कूल में होने वाली बच्चों की भर्तियों की चर्चा करते हुए आपको बताया था कि कभी-कभी हमें कुछ बच्चों को इस बिना पर ‘नहीं’ कहना पड़ता है कि उनके माता-पिता ‘पर्याप्त गरीब नहीं हैं’, हालांकि हम जानते हैं कि उनके परिवार भी किसी भी दृष्टिकोण से धनवान नहीं हैं। मैंने ज़िक्र किया था कि मैं ‘गरीब’ और ‘ज़्यादा गरीब नहीं’ के बीच अंतर करने की आवश्यकता से निजात पाना चाहता हूँ। लेकिन मेरी कामना एक कदम और आगे बढ़ चुकी है: मैं आर्थिक परिस्थिति के अंतर के अनुसार निर्णय करने की आवश्यकता को पूरी तरह समाप्त करना चाहता हूँ! मैं शिक्षा में सबके बीच पूरी समानता चाहता हूँ, चाहे किसी के लिए भी हो!

दुर्भाग्य से भारत में शिक्षा सबके लिए समान रूप से सुलभ नहीं है। बहुत से पश्चिमी देशों में, खास कर जर्मनी में, मैंने कई स्कूल देखे, जिन्हें सरकार चलाती है और जहाँ हर सामाजिक हैसियत वाले बच्चे एक साथ पढ़ते हैं। वहाँ भी निजी स्कूल हो सकते हैं, जहाँ काफी महंगे बोर्डिंग स्कूलों में उनकी अच्छी देखभाल होती होगी और जहाँ बहुत धनवान लोग अपने बच्चों को भेजते होंगे-लेकिन अगर आपके पास पर्याप्त पैसे न भी हों, तो भी न सिर्फ आपके बच्चे को विद्यार्जन का अधिकार होगा बल्कि कानूनी नियमों के अनुसार उसे स्कूल जाना अनिवार्य होगा! और माता-पिता चाहे जितना कमाते हों, हर लड़का या लड़की ऐसे स्कूल में पढ़ाई करेंगे, जहाँ पढ़ाई का स्तर अच्छा होगा। वे सब बराबर होंगे और एक ही कतार में, एक साथ बैठकर, एक समान ही शिक्षक से शिक्षा ग्रहण करेंगे!

भारत में यह एक दूर का सपना है। यहाँ सिर्फ वही बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं, जिनके माता-पिता काफी पैसा कमाते हैं। अगर किसी बच्चे के अभिभावक अपढ़ हैं तो वे वैसे भी शिक्षा को अधिक महत्व नहीं देते क्योंकि उन्हें स्वयं अपने जीवन में उसकी ज़रूरत नहीं पड़ी थी। दूसरी तरफ, अगर वे वास्तव में बच्चे को स्कूल भेजना ही चाहते हैं, तो वे उन्हें सरकारी स्कूलों में या फिर किसी सस्ते निजी स्कूल में ही भेज पाने की क्षमता रखते हैं। नतीजा: वहाँ उन्हें निचले स्तर की शिक्षा से ही संतोष करना पड़ता है और कहीं-कहीं तो बिल्कुल पढ़ाई नहीं होती!

गावों में सरकारी स्कूलों की हालत इतनी बुरी है कि सिर्फ कागजों पर ही इन स्कूलों का अस्तित्व मौजूद है और शिक्षक साल में सिर्फ दो बार स्कूल आते हैं-अपनी तनख़्वाहें लेने! मैंने एक बार आपको एक ग्रामीण स्कूल के बारे में बताया था, जहाँ स्कूल की इमारत तबेले के रूप में इस्तेमाल हो रही थी! यह सबकी खुली आँखों के सामने होता रहता है और सभी जानते हैं कि भ्रष्टाचार ही इस बुराई की जड़ है। तो ऐसी स्थिति में अभिभावक अपने बच्चों को इन सरकारी स्कूलों में क्यों भेजें?

भारत में उन्हीं अभिभावकों के बच्चे दूर तक आगे बढ़ सकते हैं, जिनके पास काफी पैसा है। हमारे देश में भ्रष्टाचार और फिर बड़े व्यावसायिक घरानों ने शिक्षा से सबसे अधिक लाभ उठाया है। भ्रष्टाचार के चलते सरकारी स्कूल किसी काम के नहीं हैं और बड़े लोगों ने इस क्षेत्र में व्यापार करने और पैसा बनाने की अपर संभावना देख ली: उन्होंने उसे एक उद्योग की तरह शुरू कर दिया, पैसा निवेश किया और शिक्षा की दुकाने खोल लीं। अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार आप विभिन्न स्तरों की शिक्षाओं में से किसी एक को चुन सकते हैं। शिक्षा के एक ब्रांड के अंतर्गत भी अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार आप खरीदी जाने वाली सुविधा और शिक्षा का चयन कर सकते हैं!

मैं इस बात को स्पष्ट करना चाहता हूँ कि भले ही बच्चा बहुत बुद्धिमान और प्रतिभाशाली हो, अगर उसके माता-पिता बेटे की स्तरीय शिक्षा पर पर्याप्त खर्च नहीं कर सकते तो उसे अच्छी शिक्षा प्राप्त नहीं हो सकती! और अगर आपके पास औसत मात्रा में ही धन उपलब्ध है तो? तो आपका बच्चा औसत स्तर की शिक्षा ही प्राप्त कर पाएगा!

ऐसे अभिभावकों के दुख का अंदाज़ा मैं लगा सकता हूँ। वे मध्यम वर्ग के माता-पिता होते हैं, जो जानते हैं कि उनका बच्चा बहुत बुद्धिमान है, होनहार है और वे मेहनत करके पर्याप्त रकम का जुगाड़ करने में लगे रहते हैं और यहाँ तक कि बेटे या बेटी की पढ़ाई के लिए ऋण तक लेते हैं- लेकिन वे अपने बच्चे को अपनी अपेक्षा के अनुसार शिक्षा नहीं दिलवा पाते, शिक्षा के स्तर के साथ कोई न कोई समझौता करना ही पड़ता है। दरअसल अच्छी शिक्षा बहुत महंगी और उनकी कूवत से बाहर होती है!

एक बार मैंने आपको बताया था कि कैसे एक बार एक दंपति कार से हमारे स्कूल आए। वे अपने बच्चों को हमारे स्कूल में भर्ती करवाना चाहते थे। हमने उन्हें नम्रतापूर्वक मना कर दिया क्योंकि स्पष्ट ही वे किसी भी निजी स्कूल की फीस अदा करने में समर्थ थे। लेकिन अभिभावकों के चेहरे पर छाई निराशा देखकर हम उनका दर्द समझ गए: हमारे स्कूल जैसे अच्छे निजी स्कूल की फीस अदा करना उनकी सामर्थ्य के बाहर था। इस तरह उनका यही दोष था कि वे इतना अधिक कमाते थे कि हमारे स्कूल में उनके बच्चों के लिए कोई जगह संभव नहीं थी!

इस देश में, जहाँ शिक्षा भ्रष्टाचार और बड़े उद्योगपतियों की दबंगई का शिकार है, सारे बच्चे एक बराबर नहीं हैं। मैं गैर बराबरी की इस व्यवस्था में बदलाव देखना चाहता हूँ! और मैं इस दिशा में काम करता रहूँगा! कैसे? यह आप कल के ब्लॉग में पढ़ेंगे!