बात करने के लिए कभी-कभी आपको किसी दूरस्थ मित्र की ज़रूरत पड़ती है – 8 सितंबर 2015

हाल ही में मैं अपने एक मित्र से बात कर रहा था। वह आस्ट्रिया में रहता है और उससे मेरी मुलाक़ात छह साल पहले अपने आस्ट्रिया दौरे के समय हुई थी। इस बीच हम लोग कभी-कभार बात करके एक-दूसरे के हालचाल ले लिया लिया करते थे, एक दूसरे की गतिविधियों के बारे में पूछ-ताछ कर लेते थे। पिछले हफ्ते उसका फोन आया, सिर्फ मौसम का हाल जानने के लिए नहीं बल्कि एक मित्र के रूप में, मुझसे मदद चाहता था।

हर व्यक्ति जानता है कि मित्र होते ही इसलिए हैं कि ज़रूरत पड़ने पर उनकी मदद ली जा सके। लेकिन ऐसे मौके भी आते हैं, जब आप अपनी कुछ बातें अपने करीबी मित्रों को नहीं बता सकते, आप कुछ बातें उनके साथ साझा करने में संकोच करते हैं। ऐसे वक़्त, आपका कोई ऐसा दूर रहने वाला मित्र हो, जो सारी परिस्थिति को कुछ दूर से देख-समझ सके, तो अच्छा होता है। मेरे आस्ट्रियाई मित्र के साथ कुछ ऐसा ही था।

जब पहले-पहल मेरा उससे परिचय हुआ था, तब, हाल ही में अपनी पत्नी और दो छोटे-छोटे बेटों के साथ वह अपने नए घर में रहने आया था। नई जगह में नए जीवन की शुरुआत करते हुए वे बहुत उल्लसित थे। उनका बड़ा बेटा उसी साल स्कूल जाना शुरू करने वाला था और सब कुछ बढ़िया चल रहा था।

फोन पर उसने मुझे बताया कि परिस्थितियों में बहुत सारी तब्दीलियाँ आ चुकी हैं। उसे पता चला है कि सालों से उसकी पत्नी उसके साथ छल कर रही थी और उनके साझा दोस्त के साथ उसके संबंध थे। इसलिए वह उससे अलग होकर तलाक लेना चाहता था। उसका दिल टूट चुका था और वह यह निर्णय ले भी चुका था: अर्थात, वह उसे भूल भी नहीं पा रहा था और उससे संबंध भी तोड़ना चाहता था।

यह समझने के लिए कि वह अपने स्थानीय मित्रों से इस बारे में बात क्यों नहीं कर सकता था, आपको दो और बातें जाननी आवश्यक हैं। मेरा दोस्त बहुत छोटे से गाँव में रहता था, जहाँ हर कोई अक्षरशः एक-दूसरे को जानता है। संबंध टूटने या संबंध में तनाव होने जैसी कोई भी खबर वहाँ छिपी नहीं रह सकती थी- बाज़ार-मुहल्लों में इसकी चर्चा होनी शुरू हो जाती और तुरंत हर कोई इसे जान सकता था।

दूसरा कारण यह था कि उसकी पत्नी कुछ समय से शराब की आदी हो चुकी थी। मेरे मित्र ने पत्नी की मदद की लेकिन इस बात का भी भरसक प्रयास किया कि गाँव में यह बात न फैले। वह अपनी पत्नी को, परिवार की प्रतिष्ठा को और बच्चों को इन सब परेशानियों से दूर रखना चाहता था और उन्हें बदनामी से बचाना चाहता था।

और अभी भी वह यही कर रहा था। वह अपना सिरदर्द अपने दोस्तों के साथ साझा नहीं करना चाहता था-वह अपनी वैवाहिक समस्याओं के बारे में उनसे कहना नहीं चाहता था सिर्फ इसलिए कि सारा गाँव तुरंत इस बात को जान जाएगा। दूसरी समस्या यह थी कि पत्नी की शराब की लत की वजह से वह अपने बेटों को उसके पास छोडना नहीं चाहता था! बिना पत्नी को तकलीफ पहुँचाए यह बात भी वह किसी से नहीं कह सकता था- कम से कम वह ऐसा समझता था! क्योंकि, हर कोई वह बात जान जाएगा, जिसे वह इतने समय से छिपाने की कोशिश कर रहा था!

तो इस तरह उसने मुझे यह पूछने के लिए फोन किया था कि क्या किया जाए।

सबसे पहले तो मैंने उससे कहा कि उसके और शीघ्र ही भूतपूर्व हो जाने वाली पत्नी के विषय में लोग क्या सोचेंगे, उसे इस बात की चिंता छोड़ देनी चाहिए! उससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। उसके दिल में मची हलचल, उसकी भावनाएँ और उसके बच्चे अधिक महत्वपूर्ण हैं! इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि दूसरे क्या सोचते हैं और दूसरे क्या कहेंगे- उसके बच्चों को सुरक्षित होना चाहिए! उसे चिंता न करने की सलाह देने के अलावा मैंने उससे कहा कि किसी अच्छे वकील से मिलकर उससे सारी बातों की चर्चा करे।

फिर अपने दोस्त से मिले और बात करे। आपको चाहिए कि अपने अंदर की बात किसी न किसी को अवश्य बताएँ! उसकी पत्नी को शराब की लत के संबंध में मदद की ज़रूरत है और यह बात छिपाकर कोई लाभ नहीं है, उससे यह लत छूटने वाली नहीं है। उसे दबाने की कोशिश करके वह उसकी कोई मदद नहीं कर रहा होगा-और अंत में मैंने उससे कहा कि अब तुम्हारे बेटों को तुम्हारी ज़रूरत है!

मैंने उसे उससे कहा कि कैसे गाँव छोड़कर किसी दूसरे शहर में रहना भी एक विकल्प हो सकता है, फिर से एक नया जीवन शुरू करना- लोगों की बेकार चर्चाओं से, अफवाहों, कानाफूसियों से दूर किसी शांत जगह में। इस बीच एक दिन सब ठंडा पड़ जाएगा और सिर्फ वही, जो उसके सच्चे मित्र हैं, उसके साथ खड़े रहेंगे!

वह खुश हुआ, मुख्य रूप से इसलिए कि वह किसी से अपनी बात साझा कर सका। और मैं खुश हूँ कि मेरे ऐसे मित्र भी हैं, जो आवश्यकता पड़ने पर मुझे, इतनी दूरी के बावजूद, याद कर लेते हैं!

तलाक विकल्प नहीं है, तब भी नहीं जब पति और पत्नी सिर्फ पराई स्त्री या पराए मर्द के साथ सेक्स सम्बन्ध रखते हों! 6 अप्रैल 2015

पिछले सप्ताह सेक्स पर लिखते हुए मैं लगातार बताता रहा हूँ कि सेक्स को लेकर दम्पतियों के बीच ज़्यादा से ज़्यादा खुलापन होना चाहिए। दुर्भाग्य से पिछले हफ्ते ही एक उदाहरण मेरे सामने आया कि कैसे लोग सेक्स को लेकर कुछ ज़्यादा ही खुले होते हैं: वे आपस में एक दूसरे को ही धोखा दे रहे हैं! यहाँ आकर पुनः हमारा सामना भारत की जटिल मगर चिरपरिचित समस्या, अरेंज्ड मैरेज (प्रायोजित विवाह) से होता है।

आजकल मैं देखता हूँ कि बड़ी संख्या में पुरुष अपनी पत्नियों के साथ और महिलाएँ अपने पतियों के साथ धोखा करते हैं! यह एक तथ्य है। हमारे आसपास ही इतने सारे मामले देखने में आते हैं कि मुझे इसके उदाहरण ढूँढ़ने कहीं दूर जाने की ज़रूरत नहीं है। पिछले हफ्ते हमें ऐसे ही एक दंपति के बारे में पता चला है।

पुरुष और महिला, दोनों ही हमारे आश्रम के कर्मचारी रहे हैं और अब किसी और आश्रम में काम करते हैं। यह पुरुष लंबे समय से अपनी पत्नी के साथ धोखा करता आया था। पहले भी हमने सुना था और हम जानते थे कि घर में इसी कारण वे आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं लेकिन इस विषय में हमने उनसे पूछताछ नहीं की थी क्योंकि कोई भी 'सामान्यतया' दूसरों के साथ ऐसी बातें करना पसंद नहीं करता-लेकिन सिर्फ 'सामान्यतया'।

इस शब्द पर मैं ज़ोर दे रहा हूँ क्योंकि अब यह बात छिपाना संभव नहीं रह गया है। जिस आश्रम में वे काम कर रहे थे, उस आश्रम और उसका झगड़ा अब सड़क पर आ गया है क्योंकि वह आश्रम के कुछ धनाढ्य मेहमानों के साथ भी सेक्स करने लगा था। जैसी कि आप कल्पना कर रहे होंगे यह बात किसी को भी नागवार गुज़रेगी और निश्चित ही अब वे वहाँ के रोजगार से हाथ धो बैठेंगे।

स्वाभाविक ही इस विवाद से उनके घर में भी कोहराम मच गया, बीबी यह कहकर लड़ने-झगड़ने लगी कि क्यों वह अपने जननांग को काबू में नहीं रख पाता। वह उस आश्रम का काम छोड़ने की ज़िद कर रही है क्योंकि वहाँ पति को सुहुलियत है कि वहां वह दूसरी औरतों के साथ यौन संबंध रख सके!

लेकिन उसकी बात सुनकर वह बेशर्मी से हँसने लगा। यह उसके लिए कोई धमकी नहीं थी, जैसा कि उसने पत्नी से कहा भी। जो भी उसे समझाने जाता या इस विषय में बात करता उसे भी वह हँसकर टाल देता! वह बेधड़क कहता, हम कहीं भी चले जाएँ, मेरे लिए औरतों की कोई कमी नहीं है!

यहाँ मैं एक मज़ेदार खुलासा करना चाहता हूँ: सिर्फ वही अपनी पत्नी को धोखा नहीं दे रहा है! पत्नी भी उसे धोखा दे रही है!

उनके यहाँ और भी कई समस्याएँ हैं, जिनमें पत्नी के साथ घरेलू हिंसा से लेकर पति का जुआ खेलना और खासा रुपया उसमें बरबाद करना भी शामिल है। लेकिन आज मैं उनकी व्यक्तिगत समस्याओं पर लिखना नहीं चाहता- मैं आपका ध्यान सेक्स के कारण होने वाली तबाही की ओर खींचना चाहता हूँ: दरअसल वे आपस में प्यार ही नहीं करते। उनके आपस में यौन संबंध नहीं हैं। साथ रहकर वे कतई खुश नहीं हैं। वे साथ रहते हैं तो सिर्फ एक कारण से: क्योंकि वे शादीशुदा हैं। वे शादीशुदा क्यों हैं? क्योंकि उनके अभिभावकों ने आपस में उनकी शादी करवा दी।

और अब उन्हें इस शादी को ज़िंदगी भर ढोना है-लड़ते-झगड़ते, आपस में मार-पीट करते, एक-दूसरे के साथ बेईमानी करते हुए। इसके कारण वे नौकरी छोड़ने की बात करते हैं, कहीं और जाकर रहने की बात करते हैं लेकिन एक बार भी अलग होने की, तलाक लेने की बात नहीं करते, बल्कि सोचते तक नहीं! क्योंकि बाहरी व्यक्ति के लिए सबकुछ ठीकठाक दिखना चाहिए!

इस मामले में बाहरी व्यक्ति कोई भी वह व्यक्ति हो सकता है, जिससे वे कभी मिले तक न हों क्योंकि उन्हें जानने वाले तो अब सभी जानते कि उनके घर की क्या हालत है, उनके आपसी संबंध कैसे हैं!

मैं एक बार और दोहराना चाहता हूँ: यह बहुत असाधारण या अनोखी परिस्थिति नहीं है! ऐसे न जाने कितने मामले सामने आते रहते हैं और मैं समझता हूँ कि इस समस्या की जड़ में अरेंज्ड मैरेज यानी प्रायोजित विवाह और सेक्स को लेकर भारतीय समाज में व्याप्त कई तरह की वर्जनाएँ हैं।

धार्मिक और सामाजिक कारण, जिनके चलते भारतीय महिलाएँ अत्याचारपूर्ण संबंधों में बंधी रहती हैं – 2 दिसंबर 2014

कल मैंने एक स्कूली लड़की की माँ के बारे में बताया था, जो अपने पति को छोड़ने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी, इसके बावजूद कि वह खुद पैसे कमाती है और उसका पति उसे मारता-पीटता है। मैं इस विषय पर और विस्तार से लिखना चाहता था कि क्यों भारतीय महिलाएँ, उनके घर के अत्याचारी और कई बार अकल्पनीय रूप से हिंसक माहौल के बावजूद, अक्सर अपने पति और परिवार के साथ ही बंधी रहती हैं।

जैसा कि मैंने ज़िक्र किया था, सामान्यतः आर्थिक सुरक्षा इसका एक प्रमुख कारण है। बहुत सी महिलाएँ पढ़ी-लिखी नहीं होतीं, कभी घर से बाहर निकलकर कोई काम नहीं किया होता और इसलिए अक्सर उनकी अपनी कोई आमदनी नहीं होती। स्वाभाविक ही, उन्हें यह एहसास होता है कि वे अपना भरण-पोषण खुद नहीं कर सकतीं, अपने बच्चों का खर्च उठाना तो दूर की बात है!

दूसरा, और मेरे विचार में ज़्यादा महत्वपूर्ण कारण है, तलाक को लेकर भारतीय समाज का दकियानूसी रवैया। तलाक किसी भी महिला के लिए भयानक होता है। पहले एक जीवनसाथी का होना, फिर अचानक उसका न होना। अक्सर तलाक के लिए महिला को ही दोषी ठहराया जाता है, पुरुष को नहीं। भले ही वह कहती रहे कि उसका पूर्व-पति शराबी था, उसके साथ मार-पीट करता था, लोगों की प्रतिक्रिया यही होती है कि ताली एक हाथ से नहीं बजती, अर्थात उसने भी कुछ न कुछ गलत बात की होगी और इसी कारण वह उस पर हाथ उठाने पर आमादा हुआ, जोकि, स्वाभाविक ही, उसका अधिकार है। दुर्भाग्य से भारत में घरेलू हिंसा आज भी इतनी सामान्य और सर्वव्यापी है कि लोगों को इन बातों पर कोई अचरज भी नहीं होता!

दुखद, अपमानजनक और अत्याचार पूर्ण सम्बन्ध में बने रहने का एक और कारण धर्म है। जी हाँ, मेरे विचार से हर धर्म दंपत्तियों से और विशेष रूप से महिलाओं से कहता है कि दांपत्य एक पवित्र बंधन है। कि तुम्हें अपने पति या पत्नी की देखभाल करनी चाहिए। महिलाओं के मामले में यह भी कि उसका भला-बुरा, सब कुछ अपने पति पर निर्भर है। कि तुम्हें पति की आज्ञा का पालन करना ही होगा।

हिन्दू धर्म में स्त्रियों के लिए पति को छोड़ना पाप माना जाता है। विवाह दैवी कार्य है और आपसे इस बात की अपेक्षा नहीं की जाती कि आप इस पवित्र बंधन को तोड़ेंगे, जो कि ईश्वर की ओर मिली नेमत है। सच तो यह है कि जब आप हिन्दू धर्म के अनुसार विवाह करते हैं तो सिर्फ इस जन्म के लिए नहीं करते बल्कि अगले सात जन्मों के लिए विवाह बंधन में बंधे रहते हैं!

जब मैंने रमोना को यह बताया तो उसने रूखे स्वर में उत्तर दिया: 'तो क्या हुआ? हो सकता है यह उनका सातवाँ जीवन हो? और मैं हँसे बगैर न रह सका। बिल्कुल, सही बात है, आप कैसे जान सकते हैं?

इस धर्मप्रधान देश में, जहाँ बहुसंख्यक लोग परम्पराओं और पुराने रीति-रिवाजों पर बहुत ज़ोर देते हैं और अपने तरीके से अपना जीवन ‘मर्यादा' के साथ जीते हैं, अपने अधिकारों के प्रति जाग्रत महिला को सराहना नहीं मिलती। एक महिला, जो अपने विवाह को बर्बाद करने पर तुली हो, जो अपने बच्चों को उनके पिता से दूर कर रही हो या जो परिवार के लिए शर्मनाक स्थितियाँ पैदा कर रही हो, उसे कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है!

या उस महिला को जो स्वाभिमानी हो, जो अपने शरीर, मस्तिष्क और भावनाओं सहित अपने जीवन का आदर करती हो। जो आईने में बिना आँसू बहाए झाँक सकती हो। जो इतनी मजबूत हो कि खुद पर आने वाली हर मुसीबत का सामना कर सकती हो और जो उसे सही लगता हो, अपनी मर्ज़ी से कर सकती हो। अपनी और अपने बाल-बच्चों कि सुरक्षा कर सकती हो।

अपने आत्मसम्मान के लिए उठ खड़े हों और पुनः अपने जीवन की लगाम खुद अपने हाथ में ले लें। आप कर सकते हैं-और, हालांकि बहुत से लोग आपके विरुद्ध होंगे, आपके साथ खड़े होने वाले भी कम नहीं होंगे!

परस्पर विपरीत रुचियों के चलते रिश्तों में आने वाली दिक्कतें – 18 दिसंबर 2013

परसों मैंने बताया था कि यह संभव है कि आपके दोस्तों और परिवार वालों के विचार आपसे बिल्कुल विपरीत हों। कल मैंने लिखा था कि आपको इस तथ्य को हर हाल में स्वीकार करना ही पड़ता है भले ही इस कारण आपकी मित्रता उतनी अंतरंग न हो सके जितनी कि आप चाहते हैं। जब आप बदलते हैं तो आवश्यक नहीं कि आपके आसपास के लोग भी बदल ही जाएँ या बदलें तो किसी और ही रूप में बदलें। सबसे बुरा यह होता है कि आपका जीवन-संगी या आपकी जीवन-संगिनी ऐसे हों। तब क्या हो, जब वह व्यक्ति आपके अनुसार न बदल पाए, जिसके साथ आपको सारा जीवन बिताना है?

दुर्भाग्य से मैं बहुत से ऐसे लोगों को जानता हूँ जो इस परिस्थिति का सामना कर रहे हैं। उनके विचार समय बीतने के साथ बदलते गए हैं लेकिन उनके जीवन साथी उस दिशा में उतना विकास नहीं कर सके। अब आपके साथ एक ऐसा व्यक्ति रह रहा है, जिसके साथ जीवन भर साथ रहने की आपने कसमें खाई हैं, जिसे आप दुनिया में सबसे ज़्यादा प्यार करना चाहते हैं, जिसके लिए आप सब कुछ छोड़ सकते हैं-लेकिन आप दोनों के विचार आपस में नहीं मिलते!

आप दोनों एक दूसरे से प्रेम करने का इरादा रखते हैं लेकिन इतने सारे विषय हैं, जिन पर आप बात ही नहीं कर सकते क्योंकि आप जानते हैं कि आपका साथी आपकी बात पसंद नहीं करेगा, आपके विचारों और आपके निर्णयों का प्रतिवाद करेगा और आपकी भावनाओं का समर्थन नहीं करेगा। आप उसके साथ बहुत सी बातों को साझा करने में हिचकते हैं और चिंतित होते हैं कि कैसे आप दिन-ब-दिन उससे दूर होते जा रहे हैं।

स्वाभाविक ही, इस मामले में आपका वह रवैया नहीं हो सकता जैसा एक मित्र के साथ संभव हो सकता है कि सप्ताह में एक बार फोन कर लिया या माह में एकाध बार मिल लिए। आपका 24 घंटे का साथ है और आप रहना भी चाहते हैं लेकिन फिर सवाल खड़ा हो जाता है कि अब, इसके बाद एक-दूसरे का क्या करें! आपके दिलों के बीच दूरी पैदा होने लगती है, आप लंबी और आत्मीय बातचीत नहीं कर सकते और सिर्फ मौसम और राजनीति पर बात करते हुए संबंध सामान्य नहीं बने रह सकते! उसके लिए कुछ अंतरंग वार्तालाप की ज़रूरत पड़ती है और जो नदारद है!

आप आने वाली समस्याओं की कल्पना कर सकते हैं। असहमतियाँ, झगड़े, निःशब्दता, मौन, यौनेच्छा की कमी या शायद कुछ समय बाद किसी दूसरे के साथ सेक्स संबंध की इच्छा, क्रोध, कुंठा और निराशा और उन लोगों के संदर्भ में, जो आपसी निकटता हासिल करने में असमर्थ होते हैं, दुर्भाग्यपूर्ण अलगाव।

अगर आप इस अवस्था में है तो मैं आपसे इतनी ही गुजारिश करूंगा कि अपने साथी से बात करें, चर्चा करें। लगातार चर्चा करते रहें। अपना दिल खोलकर रख दें कि आप क्या महसूस कर रहे हैं और क्यों वैसा महसूस कर रहे हैं। मैं आशा करता हूँ कि वह, जिसे आप प्यार करते हैं और जो आपसे प्यार करता है, दोनों एक-दूसरे को समझ सकेंगे। भले ही वह आपके जैसा ही महसूस न कर सके मगर इतना ही काफी होगा अगर वह आपके विचारों को स्वीकार कर ले और उन संवेदनाओं और प्रेरणाओं को जान ले, जिन पर आपके निर्णय आधारित होते हैं। दिल को सदा खुला रखें और कुछ भी छिपाएँ नहीं।

आपको भी यह समझने की कोशिश करनी होगी कि क्यों आपका साथी आपकी बात समझने में असमर्थ हो रहा है या क्यों वह उसे समझने का इच्छुक ही नहीं है। आपको भी दूसरे के विचारों का आदर करना होगा और अपने साथी की मदद करनी होगी भले ही इसका नतीजा कहीं बीच में किया गया समझौता ही क्यों न हो। कोई ऐसी बात खोजिये, जिसकी आप दोनों को चिंता है, जिसकी आप परवाह करते हैं और सम्बन्धों के उन आयामों को महत्व दीजिये, जिन पर आप दोनों एकमत हैं, एक जैसे विचार रखते हैं। परस्पर संबंध में आवेग पैदा कीजिए और आप पाएंगे कि आप पुनः एक-दूसरे के साथ वैसा ही उत्कट प्रेम महसूस कर रहे हैं।

हम सब भिन्न मिट्टी के बने हुए हैं और जब हम किसी से दिल की गहराइयों से प्रेम करते हैं तो हमें थोड़ी सी परस्पर समानता की आवश्यकता होती है और यह समानता सिर्फ इतनी-सी भी हो सकती है कि हम सब मनुष्य हैं!

भारत में तलाक इतना मुश्किल क्यों है और पश्चिम में इतना आसान क्यों है! – 7 मई 2013

मैंने ज़िक्र किया था कि कई लोग जिनके विवाह में बहुत सारी परेशानियाँ होती हैं, बाहरी दुनिया को उसकी हवा तक नहीं लगने देते, अपने खास मित्रों तक को नहीं। क्योंकि भारत में मैं अक्सर ही ऐसे प्रकरण देखता रहता हूँ कि लोग दस-दस साल लड़ते-झगड़ते बिता देते हैं, मैंने लिखा था कि पश्चिम में लोग ऐसी समस्याओं से बहुत समय तक अपने आपको दुखी नहीं करते बल्कि अलग होने का निर्णय लेकर जल्द ही तलाक ले लेते हैं। मेरे कुछ भारतीय मित्रों ने बहुत उत्तेजित होते हुए मुझसे पूछा कि क्या मैं वास्तव में इस तरह तलाक लेकर अलग हो जाने का समर्थन करता हूँ। इस विषय पर मेरे विचार मैं यहाँ विस्तार से रखना चाहता हूँ।

मैं समझता हूँ कि आपको जीवन में अधिक से अधिक खुश रहना चाहिए। निस्संदेह, हम सब यही चाहते हैं कि हम खुश रहें और खुशी पाने की कोशिश करते हैं। लेकिन कुछ लोगों को लगता है कि वे तभी सुखी और प्रसन्न रह सकते हैं जब समाज, उनके आसपास के लोग, उनके बारे में अच्छा सोचें और इसके लिए वे अपने व्यक्तिगत जीवन की शांति को दांव पर लगा देते हैं, अपने घर की शांति को बाहरी प्रतिष्ठा पर न्योछावर कर देते हैं। इससे आपको थोड़ा-बहुत संतोष मिल जाता है कि दूसरे आपको प्रेमपूर्ण संबंध में बंधा हुआ एक अच्छा व्यक्ति मानते हैं लेकिन मेरे विचार में यह सच्चे प्रेम सम्बन्धों की खुशी के सामने, बहुत छोटी सी बात है! दरअसल, कई ऐसे लोग हैं जो रोज़ के घरेलू लड़ाई-झगड़ों और तनावों को सहन करते रहते हैं सिर्फ इसलिए कि उन्हें तलाक न लेना पड़े। जब आपका दुख इतना बड़ा है और आप जानते हैं कि आप कुछ भी कर लें, इस संबंध को जारी नहीं रख सकते तो मुझे लगता है कि आपको अब बिल्कुल लड़ना-झगड़ना नहीं चाहिए!

मैं जानता हूँ कि पश्चिम में यह कदम उठाना बिल्कुल आसान है क्योंकि तलाक वहाँ कलंक नहीं माना जाता और भारतीय समाज में वही लोगों को दहशत में डाल देता है। पश्चिम का व्यक्तिवाद इसमें लोगों की मदद करता है। लेकिन इसके बावजूद मैं यह भी महसूस करता हूँ कि संबंध तोड़ने की इस आसानी की भी अति हो सकती है। यह जो थोड़े-थोड़े समय के संबंध बनते-बिगड़ते हम पश्चिम में देखते हैं यह इसी आसानी का नतीजा है। लोग इतनी जल्दी-जल्दी अपने साथी बदलते हैं जैसे कपड़े बदल रहे हों। हर बार जब आप उनसे मिलते हैं कोई नया बॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड उनके साथ होता है या होती है, जिन्हें वे अपने ‘जीवन का सबसे बड़ा प्यार’ बताकर आपसे मिलवाते हैं। जब आप उनसे पूछते हैं कि पिछले वाले का क्या हुआ तो वे कहते हैं, ‘ओह, वह चल नहीं पाया’।

समस्या, दरअसल, यह होती है कि अलग होना वहाँ इतना आसान हो गया है कि वे उसे चलाने की आवश्यकता ही नहीं समझते, कोशिश ही नहीं करते। मेरा कहना है कि एक तरफ जहां आयोजित विवाह (अरेंज्ड मैरेज) भारतीय युवाओं के स्वप्न चूर-चूर किए दे रहे हैं वहीं पश्चिमी युवा अपने जीवन साथी से ऐसी-ऐसी अपेक्षाएँ कर बैठते हैं कि वे संबंध को जारी रखने के लिए थोड़ा सा भी समझौता नहीं करना चाहते! अक्सर वे यह नहीं समझ पाते कि ऐसे व्यक्तित्व का कोई अस्तित्व ही नहीं है जिसका वे सपना देख रहे हैं और भूल जाते हैं कि दूसरे की भी अपनी कुछ कल्पनाएँ होंगी।

जब दो लोगों का अहं आपस में टकराता है तभी समस्याएं जन्म लेती हैं चाहे उनकी कोई भी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि हो। मेरी धारणा है कि आपको हमेशा अपने दिल की बात सुननी चाहिए और अपने अहं को काबू में रखना चाहिए। अगर कोई ऐसा तरीका है कि आप ज़रा सा अपने अहं को पीछे रखते हुए अपने संबंध को बनाए रख सकें तो आपको ऐसा अवश्य करना चाहिए लेकिन ऐसे समझौते अपनी खुशी की कीमत पर कभी न करें। अगर आपको लगता है कि आपको बहुत भारी समझौते करने पड़ रहे हैं और इससे आप अपने जीवन की खुशी गंवा रहे हैं तो उन्हें सालों-साल जारी न रखें। हर हाल में संबंध बनाए रखने की ज़िम्मेदारी का बोझ ढोते न रहें। जीवन बीत जाएगा और आपको पता भी नहीं चलेगा।

अगर संबंध को बनाए रख पाने का कोई उपाय आपको दिखाई नहीं देता तो इस आशा में आत्मसमर्पण न करें कि अगले जन्म में वह बेहतर हो सकेगा। यह जीवन बहुत कीमती है, उसे यूं ही बरबाद न करें।

भारत का उच्च वर्ग – प्रतिष्ठा खोने के डर ने तलाक रोका – 3 मई 2013

पिछले दो दिनों में मैंने निम्न वर्ग और मध्यम वर्ग के दंपतियों की हालत का वर्णन किया जो वैवाहिक समस्याओं के बावजूद विवाह में बने रहने के लिए मजबूर होते हैं। मैंने उन कारणों का विश्लेषण किया जिनके चलते सुखी होने का झूठा दिखावा करते हुए विवाह को बनाए रखना उनके लिए ज़रूरी होता है, भले ही रोज़ घर में लड़ाइयाँ होती रहें। मैं समझता हूँ कि पाठक पढ़ना चाहते होंगे कि ऐसी ही परिस्थिति में उच्च वर्ग की प्रतिक्रिया भी समान ही क्यों होती है-आखिर उनके पास तो दौलत होती है कि तलाक का सामना आसानी के साथ कर सकें। मैं आज यही स्पष्ट करने की कोशिश करूंगा कि क्यों वे भी अलग होना ठीक नहीं समझते और तलाक को टालने में ही अपनी भलाई देखते हैं।

आप कल्पना कर सकते हैं कि जब निम्न वर्ग कर्ज़ लेकर और मध्य वर्ग जीवन भर की पूंजी को दांव पर लगाते हुए अपने बच्चों के विवाह के आयोजन और दहेज देने में खर्च कर डालते हैं तो उच्च वर्ग विवाह पर कितना धन खर्च करता होगा! उनके लिए धन की कोई समस्या नहीं होती और वे बड़े से बड़े 5 सितारा होटलों में समारोहों का आयोजन करते हैं जहां अनगिनत खाने-पीने की वस्तुएं, महंगे से महंगे मनोरंजन के कार्यक्रम, महिला बैरे और विदेशी नाचने-गाने वलियाँ, दुल्हा और दुल्हन के लिए ढेर सारे आभूषण और स्वाभाविक ही दहेज की विशाल राशि पर खर्च किया जाता है! लाखों-करोड़ों रुपए फूँक दिये जाते हैं, प्रतिष्ठित मेहमानों की लंबी सूची होती है और वह आडंबर का विशाल समारोह बन जाता है!

यह वर्ग दौलत का फूहड़ प्रदर्शन करता है। विवाह के हर कार्यक्रम और समारोह में यही किया जाता है और विवाह के पेशेवर आयोजक नियुक्त किए जाते हैं जो नई-नई महंगी युक्तियाँ प्रयुक्त करते हैं जिससे विवाह को ज़्यादा से ज़्यादा उत्तेजक बनाया जा सके और जो पिछले सभी विवाहों को मात करे! उनके विवाह फिजूलखर्ची और आडंबर से भरे होते हैं और एक से एक बढ़कर प्रतिष्ठित व्यक्तियों से आप वहाँ मिल सकते हैं। ढ़ोल-मजीरों और तुरहीनाद से इस विवाह की घोषणा की जाती है!

दुल्हन का स्वागत उसके सास-ससुर के विशाल महलनुमा बंगले में किया जाता है। वहाँ पर्याप्त जगह होती है, उन्हें मध्य वर्ग की तरह 24 घंटे परिवार के साथ एक ही कमरे में दिन गुजारने की समस्या नहीं होती। लेकिन प्रेम के स्थान पर दंभ और अहं हो तो दुनिया की तमाम दौलत भी तनाव और समस्याओं को पैदा होने से नहीं रोक सकती!

खुशी और उत्सव के इतने बड़े आडंबर के बाद वे असफलता कैसे स्वीकार करें? समाज के सामने यह कैसा लगेगा? वे मुंह दिखने के काबिल नहीं रह जाएंगे! वे इतने लोगों को जानते हैं, सब उन्हें लेकर बातें करेंगे, चुहलबाजियाँ करेंगे! नहीं-वे यह खतरा नहीं उठा सकते! इसलिए वे अपने व्यक्तिगत जीवन पर पर्दा डालने की और आसपास के लोगों को एक दूसरा ही रूप दिखाने की कोशिश करते हैं। बंद दरवाजों के पीछे से आने वाली आहटों को सुन पाने वाले उनके कर्मचारियों के अलावा उनकी समस्याओं को कोई नहीं जान सकेगा।

इसके अलावा यह सार्वभौमिक सच्चाई-यह सभी वर्गों के लिए समान रूप से लागू होती है-कि तलाक़शुदा व्यक्ति के लिए दूसरा साथी खोज पाना बहुत मुश्किल होता है। हो सकता है कि वे अपने जैसा कोई तलाक़शुदा व्यक्ति खोज लें मगर आयोजित विवाहों (अरेंज्ड मैरेज) के बाज़ार में कोई भी तलाक़शुदा व्यक्ति को अपना लड़का या लड़की देना पसंद नहीं करता। लड़कियों को तो टूटा-फूटा समान ही समझा जाता है और पुरुषों को? पता नहीं वह कैसा है? हो सकता है पीकर पत्नी को मारता-पीटता हो…ज़रूर कोई बहुत बुरा आदमी होगा अन्यथा क्यों उसका पहला विवाह टूटता?

कैच 22 वाली परिस्थिति बन जाती है: अगर आप विवाह में बने रहते हैं तो आप जीवन भर दुखी रहेंगे क्योंकि आपकी अपेक्षाओं का वैवाहिक जीवन आपको मिलने वाला नहीं है। अगर तलाक लेते हैं तो आपको दूसरी बार उपयुक्त साथी मिल ही जाए यह ज़रूरी नहीं। क्यों? क्योंकि हर कोई यही सोचता है कि आपमें ज़रूर कोई न कोई ऐसी खराबी होगी कि तलाक तक की नौबत आ गई। किस बुराई का चुनाव किया जाए?

आयोजित विवाहों (अरेंज्ड मैरेज) के बारे में मैंने जो भी लिखा है, अपने अनुभवों के आधार पर लिखा है, उन्हें मैंने अपने आसपास घटते देखा है और अपने खुद के सोच-विचार के बाद प्रस्तुत किया है। निस्संदेह, यह व्यक्ति-व्यक्ति की बात होती है और कई आयोजित विवाह होते हैं जो पूरी तरह सफल भी होते हैं क्योंकि इत्तफाक से दंपतियों के मन और विचारों में तालमेल बैठ गया। लेकिन समस्याग्रस्त विवाहों की संख्या बहुत ज़्यादा होती है और इसीलिए मैंने ऐसे विवाहों के असफल होने के कारणों को रेखांकित करने की कोशिश की है।

मध्य वर्गीय लड़कियां- विवाह के लिए इतनी बचत करने के बाद तुम तलाक नहीं ले सकती!-2 मई 2013

कल के ब्लॉग में यह बताने के बाद कि तलाक लेने की जगह निचले वर्ग की लड़कियां खुश रहने का दिखावा करती हुई अपने विवाह में क्यों बनी रहती हैं आज मैं इसी संबंध में मध्य वर्ग की लड़कियों की बात करूंगा। अर्थात, मैं उन खाते-पीते परिवारों के बारे में लिखूँगा जिन्हें जीवित रहने की चिंता नहीं है, जिनके पास बच्चों को स्कूल भेजने के लिए, उनके लिए कपड़े खरीदने और अच्छा भोजन मुहैया कराने के लिए पर्याप्त धन है मगर इसके बावजूद जिन्हें कोई बड़ा खर्च करने से पहले चार बार सोचना पड़ता है।

लड़की पैदा होते ही उसके विवाह के लिए वे बचत करना शुरू कर देते हैं। वे यह जानते हैं कि एक दिन आएगा जब उन्हें अपनी संपत्ति का आधा हिस्सा खर्च कर देना होगा और वे बैंक जाकर अपने सामर्थ्यानुसार विवाह बचत योजना में हर माह पैसा जमा करना शुरू कर देते हैं। आम तौर पर बीस साल के बाद वह रुपया उन्हें प्राप्त होता है और वे अपनी लड़की के विवाह पर एक बड़े खर्च के लिए तैयार होते हैं।

उनके लिए यह एक बड़ा आयोजन होता है और विवाह की तैयारियों के दौरान आप बार-बार उनके मुंह से सुन सकते हैं कि 'शादी जीवन में एक बार ही होती है!' इस तरह यह लड़की और लड़का, दोनों के लिए जीवन का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण आयोजन बन जाता है। शादी होने के बाद अगर वे महसूस करते हैं कि मामला जमा नहीं तो यह उनके लिए बहुत संकटपूर्ण घड़ी होती है। उनके परिवारों ने उनके विवाह पर इतना अधिक खर्च कर दिया होता है, एक दिन में ही सारा प्रेम और सारी जमा-पूंजी, कि दोनों के लिए यह सोचना भी मुश्किल होता है कि इस व्यक्ति के साथ रहने के स्थान पर वे अब अलग हो जाएंगे, लड़की के मामले में इसका यह अर्थ होता है कि वह उस घर से ही बाहर निकल जाएगी।

आपको यह ध्यान रखना होगा कि ऐसी आर्थिक स्थिति वाले लोग अपना रहन-सहन हमेशा अच्छा बनाए रखने के लिए बहुत प्रयास करते हैं। वे अपनी आमदनी का बेहतर प्रबंध करने की कोशिश करते रहते हैं और चाहते हैं कि आस-पड़ोस और दोस्त-रिश्तेदार भी उनके रहन-सहन को देखें और समझें कि वे बिल्कुल निचले वर्ग जितने गरीब नहीं हैं। वे कुछ ज़्यादा कमा लेते हैं और विवाह पर ज़्यादा खर्च भी करते हैं। लेकिन दरअसल यह खर्च उनकी कूवत के बाहर का होता है और जीवन भर की बचत इसमें खर्च होती है और अगर दंपति अलग होना चाहते हैं तो यह बचत उन्हें डूबती हुई दिखाई देती है। वे यह जानते हैं और सभी देख सकते हैं कि उनका सारा खर्च एक तरह का अपव्यय ही था।

लेकिन मध्य वर्ग में तलाक न लेने का कारण सिर्फ आर्थिक नुकसान ही नहीं होता। लोग जितना अधिक अमीर होते हैं उतना ही उनके लिए आडंबरपूर्ण दिखावा करना महत्वपूर्ण होता है। वे विश्वास करते हैं कि अपने परिवार में आप जितना खुश हैं, समाज में आपकी प्रतिष्ठा का स्तर भी उतना ही ऊंचा माना जाता है। अगर आप लड़ते-झगड़ते हैं या अलग होने के बारे में सोच रहे हैं तो समझा जाता है कि आप निचले वर्ग के लोगों जैसा व्यवहार कर रहे हैं और आपको यह शोभा नहीं देता।

उनकी लड़कियां पढ़ी-लिखी हो सकती हैं और तलाक के बाद नौकरी करके कमा-खा सकती हैं। दुर्भाग्य से ऐसा समझा जाता है कि वही औरतें नौकरी करती हैं और पैसा कमाती हैं जो निर्धन हैं और यह उनकी प्रतिष्ठा को कम करने वाला होता है। बहुत सी औरतों के लिए यह उनके अहं को चोट पहुंचाने वाली बात होती है। इसलिए वे यही बेहतर समझती हैं कि मुश्किल हालातों के बावजूद किसी तरह घर में बनी रहें, अपने पति और उसके परिवार के साथ लड़ते-झगड़ते!

अकसर यह घर के ही टूटने का कारण बनता है। पति-पत्नी तय करते हैं कि रोज़ की तू-तू, मैं-मैं से अलग होना ही बेहतर है और वे अलग हो जाते हैं। यह उनकी आर्थिक स्थिति पर थोड़ा बोझ तो होता है मगर अपने विवाह के तनावों को कम करने का इसके सिवा उन्हें कोई चारा नज़र नहीं आता। लेकिन तलाक किसी हालत में विकल्प नहीं होता!

निचले वर्ग की भारतीय लड़कियां-दहेज जुटाना मुश्किल और तलाक पाना असंभव! – 1 मई, 2013

पिछले कुछ दिनों से मैं आयोजित विवाहों की (अरेंज्ड मैरेज) विभिन्न समस्याओं के बारे में लिखता आ रहा हूँ। अपनी कुछ प्रविष्टियों को दोबारा पढ़ने पर मुझे लगा कि इनसे कोई सोच सकता है कि मैं समाज के एक खास वर्ग के बारे में ही लिख रहा हूँ। पश्चिम के लोग, जिन्हें आयोजित विवाह का विचार एक नयी बात लगता है, सोच सकते हैं कि सिर्फ उस खास वर्ग के लोग ही समस्याओं के बावजूद अपने विवाह में बंधे रहते होंगे। वे नहीं जानते कि असफल विवाहों कि समस्या समाज के सभी वर्गों में समान रूप से पाई जाती है और सभी वर्गों के लोग अपने दुर्भाग्य को नियति मानकर भुगतते रहते हैं मगर नाता तोड़कर तलाक नहीं लेते। आप निचले वर्ग, मध्यम वर्ग या उच्च वर्ग के लोगों से पूछिए, आयोजित विवाह सफल भले न हो मगर पति-पत्नी शादीशुदा ही बने रहेंगे। यह बहुत तार्किक है, अगर आप समाज की संरचना पर गौर करें। मैं बताता हूँ कि क्यों।

हम उनसे शुरू करते हैं जिन्हें आप उनकी आर्थिक स्थिति के अनुरूप निचला वर्ग कहेंगे। उनकी आमदनी अधिक नहीं होती, निश्चित रूप से खर्चीले आयोजित विवाह सम्पन्न करने के लिए वे पर्याप्त बचत कर पाने में असमर्थ होते हैं। वे रोज़ मजदूरी करते हैं ताकि इतना कमा सकें कि खुद और बाल-बच्चों को खाना खिला सकें, उनके कपड़े-लत्ते खरीद सकें और उन्हें किसी तरह बड़ा कर सकें। बड़े आयोजनों के लिए वे दूसरों पर निर्भर होते हैं।

लड़कियों की शादी तय होने पर जहां कहीं भी उन्हें सहायता की उम्मीद होती है वे हाथ फैलाते हैं। उदार मना लोग उन्हें कुछ रुपया देते हैं, चैरिटी संस्थाएं भी मदद करती हैं जिससे वे दूल्हे को देने के लिए दहेज का जुगाड़ कर सकें और कुछ रुपये विवाह के आयोजन और पार्टी के लिए भी उपलब्ध हो सके। वे पूरा प्रयास करते हैं कि पर्याप्त धन इकट्ठा हो जाए लेकिन अगर पूरा नहीं पड़ता तो वे अपने रिश्तेदारों से उधार लेते हैं, या किसी मित्र या किसी साहूकार से लेते हैं, जो रुपये वापसी के समय मूल के साथ ब्याज भी वसूल करता है।

रुपया इकट्ठा करने के इस आवश्यक मगर बेहद कष्टकर काम के चलते ज्यादातर लोग लड़के की कामना करते हैं। अगर उनकी कई लड़कियां हैं तो सभी के विवाह का इंतज़ाम उन्हें करना पड़ता है और ऊपर से दहेज भी देना पड़ता है।

पैसा आने पर और उचित कीमत पर दुल्हा मिल जाने पर लड़की की शादी कर दी जाती है। यह बहुत कम उम्र में भी हो सकता है, खासकर गरीब परिवारों में। तेरह और चौदह साल की लड़कियों को भी ब्याह दिया जाता है जबकि 18 साल की लड़कियों के ब्याह गैरकानूनी हैं। गांवों में हर साल अनगिनत बाल-विवाह होते हैं। ये लड़कियां इतनी परिपक्व नहीं होतीं कि अपने लिए कोई निर्णय ले सकें और जैसा उनके अभिभावक चाहते हैं वही करती हैं। उसने अब तक का पूरा जीवन अपने अभिभावकों के कहे अनुसार गुज़ारा है इसलिए विवाह के बाद अगर उसे अपना पति पसंद नहीं आता तो वह यह बात भी अपने अभिभावकों से कहती हैं। और वे उसे समझाते हुए कहते हैं कि उसे स्वीकार करो, उसके साथ सामंजस्य बिठाओ और किसी भी हालत में अपनी गृहस्थी की गाड़ी को पटरी से उतरने मत दो।

लड़की की हालत की कल्पना कीजिये। उसने कोई काम नहीं सीखा है और अगर उसे अपने दम पर जीना है तो या तो उसे भीख मांगनी होगी या कड़ी मेहनत वाला काम करना होगा। उसके माँ-बाप के लिए उसे वापस अपने पास रखना मुश्किल है। प्रेम के वशीभूत वे ऐसा कर भी लें तो उस लड़की की आत्मग्लानि की कल्पना कीजिये। वह न सिर्फ अपने पिता का कहा न मानने की दोषी है बल्कि उनकी आर्थिक तंगी को और बढ़ाने का कारण भी बन गई है! अगर उसका कोई बच्चा हो चुका है तो और भी परेशानी हो सकती है।

लड़के के लिए यानी नए दूल्हे के लिए भी परिस्थिति बहुत आसान नहीं होती। अगर उसे लगता है कि उसकी पत्नी उसके परिवार के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रही है और उसके साथ भी लड़ने का कोई न कोई बहाना ढूंढती रहती है तो उसे क्या करना चाहिए? अगर उनके बीच तलाक हो जाता है तो लोग उस पर हंस सकते हैं कि वह एक औरत को भी अपने साथ नहीं रख पाया! और फिर क्या वह अपनी पत्नी के प्रति कोई ज़िम्मेदारी महसूस न करने वाला गैरजिम्मेदार पति है? इन सब बातों के कारण वे साथ ही रहे आते हैं, चाहे उनके बीच विवाद के कई मुद्दे हों, रोज़ लड़ाइयाँ ही क्यों न होती हों। वे दुखी रहते हैं, झगड़ा करते रहते हैं, अक्सर सबके सामने, क्योंकि गरीब होने के कारण सब छोटे-छोटे घरों में आसपास ही रहते हैं। फिर भी जीवन में परिवर्तन के लिए कुछ भी नहीं करते।