दुनिया भर के राजाओं की एक सी रुचियाँ: पैसा, युद्ध और औरतें – 17 जनवरी 2016

Apra

हमने पुनः एक परिपूर्ण सप्ताह गुज़ारा और आज मैं इस दौरान हुए अपने रोमांचक अनुभव के बारे में आपको थोड़ा-बहुत बताना चाहता हूँ!

शायद आप पहले ही अपरा के नाना के आश्रम आगमन के बारे में जानते होंगे। वे वर्ष की शुरुआत में भारत आए थे और पिछले गुरुवार की शाम तक यहाँ रहे। इस तरह वे हमारी प्यारी बेटी, अपरा के जन्मदिन पर भी यहाँ रहे। उस पार्टी के बारे में मैं आपको पिछले रविवार के ब्लॉग में पहले ही बता चुका हूँ।

पार्टी के पश्चात् और उपहारों को खोलकर देखने और अपरा द्वारा उनमें से एक, राजकुमारी वाली शानदार ड्रेस पहनकर देखने के बाद हम लोग वापस सामान्य दिनचर्या में वापस आ ही रहे थे कि कुछ दिन बाद ही एक और अवसर हमारे सामने उपस्थित था: हम परिवार सहित मेरे ससुर के साथ जयपुर घूमने जाने वाले थे! हालांकि वे कई बार यहाँ आ चुके हैं लेकिन अभी तक सिर्फ दिल्ली के कुछ ऐतिहासिक स्थान, ताजमहल और आगरा का लाल किला और स्वाभाविक ही वृंदावन के मुख्य-मुख्य स्थान भर देखे थे! इस बार हम उन्हें कुछ और आगे ले जाना चाहते थे!

हमें लगा, यह सबसे आसान और सही निर्णय होगा कि हम वहाँ कार से जाएँ। वृंदावन से जयपुर की यह सिर्फ चार या पाँच घंटे की कार यात्रा थी और वहाँ से दिल्ली की यात्रा भी लगभग उतना समय ही लेती है, जहाँ से हम उन्हें समय रहते वापस जर्मनी के लिए बिदा करना चाहते थे।

इसलिए हम बुधवार को सबेरे वृंदावन से रवाना होकर दोपहर को जयपुर पहुँच गए। नाश्ता-वाश्ता करके हम तुरंत ही शहर के प्रसिद्ध और दर्शनीय स्थानों की ओर रवाना हो गए और सबसे पहले ऊँची चढ़ाई चढ़कर आमेर का किला देखा। मेरे लिए दोबारा वहाँ आना बड़ा सुखद रहा। सन 2008 में मैं और रमोना कुछ दिनों के लिए जयपुर आ चुके हैं लेकिन उस समय यहाँ बड़ी गर्मी थी। इस बार मौसम बड़ा सुहावना था और हम सबने किले के लंबे गलियारों में घूम-घूमकर बहुत खूब आनंद लिया और उसके विशाल, सुंदर और मेहराबदार दरवाजों और ऊँचाई से नीचे दिखाई देने वाले सुंदर नज़ारों को जी भरकर देखा। इसके अलावा राजा की बारह रानियों के लिए निर्मित अलग-अलग महलों को भी! हम लोग मज़ाक-मज़ाक में चर्चा करते रहे कि दुनिया भर में राजाओं के एक जैसे शौक रहे हैं: पैसा, युद्ध और औरतें!

अपरा के लिए जैसे यह राजा-महाराजों, रानियों और राजकुमारियों की उस दुनिया में पहुँच जाने जैसा था, जिनकी कहानियाँ उसने सुन रखी थीं। वह जानना चाहती थी कि राजा कहाँ बैठकर खाना खाते थे, कहाँ सोते थे, क्या पहनते थे। आमेर के किले में और उसके बाद जयपुर के सिटी पैलेस में उसे उन सब चीजों को देखने का मौका भी मिला।

रमोना के पिताजी के लिए, जो अपने इलाके के विशाल बवेरियन किलों के बारे में अच्छी तरह जानते हैं, यह जानना बड़ा रुचिकर था कि भारतीय उच्चवर्गीय परिवार किस तरह राज करते थे और कैसा जीवन गुज़ारते थे-और मेरे ख़याल से उन्हें जयपुर में जंतर-मंतर सबसे अच्छा लगा। वह एक खगोलशास्त्रीय स्मारक है, जिसमें विभिन्न पत्थरों पर सूरज की किरणों से बनने वाली छाया का उपयोग ठीक-ठीक समय बताने में किया जाता है और साथ ही किसी समय में कोई बच्चा किस राशि में पैदा हुआ है, यह और यहाँ तककि उसका लग्न भी उस खगोलीय यंत्र से पता किया जा सकता है। वह वाक़ई बहुत रोचक है और यह जानना कि उसे सैकड़ों साल पहले बनवाया गया था, अपने आप में अत्यंत प्रभावशाली और आश्चर्यचकित करने वाला है!

हम गुरूवार को दिल्ली आए और रात को बढ़िया खाना खाने के बाद अपने ससुर को दिल्ली विमानतल पर भावभीनी बिदाई दी। यह सोचते हुए हमने उन्हें गुडबाय कहा कि यह जुदाई ज़्यादा दिनों की नहीं है-और वैसे भी आधुनिक तकनीकी उपकरणों की मदद से अपने लोगों को अपने नजदीक महसूस करना बहुत सुलभ हो गया है!

गट्टे की कढ़ी – पीली, खट्टी तरी में बेसन के गट्टे – 16 जनवरी 2016

आज मैं आपके लिए एक ऐसी डिश प्रस्तुत करने जा रहा हूँ जिसे आप अगर मेरी बताई गई विधियों को आजमाते रहे हैं तो उनमें से दो अन्य व्यंजनों के मिलन के रूप में आसानी से पहचान जाएँगे: कढ़ी और गट्टे की सब्ज़ी, जो दोनों मिलकर एक अन्य स्वादिष्ट डिश यानी पीली, खट्टी तरी में बेसन के गट्टे मिलाकर तैयार गट्टे की कढ़ी में तबदील हो जाते हैं। यह अत्यंत स्वादिष्ट व्यंजन है और आजकल के ठंड के मौसम में विशेष आनंददायक लगता है!

गट्टे की कढ़ी – पीली, खट्टी तरी में बेसन के गट्टे

कढ़ी और बेसन के गट्टे की सब्ज़ी के मिश्रण से तैयार इस स्वादिष्ट व्यंजन को घर में बनाकर देखें, एक अलग, अनोखा स्वाद प्राप्त होगा, जो ठंड में पेट में गर्माहट के साथ तरावट भी प्रदान करेगा!

गट्टे की कढ़ी बनाने में कितना वक़्त लगता है?

तैयारी करने में:
पकाने में:
कुल समय:

सामग्री

कढ़ी के लिए

1 किलोग्राम: दही
1.5 लीटर: पानी
1.5 बड़े चम्मच: वनस्पति तेल
80 ग्राम: बेसन
1/2 छोटी चम्मच: मेथी के बीज
1/2 छोटी चम्मच: हींग
1 छोटी चम्मच: सरसों के बीज
10 नग: कढ़ी पत्ते
1 नग: नींबू
1 छोटी चम्मच: हल्दी पाउडर

गट्टों के लिए

500 ग्राम: बेसन
50 मिलीलीटर: सूरजमुखी तेल
1/4 छोटी चम्मच: बेकिंग पाउडर
1/2 छोटी चम्मच: नमक
1/2 छोटी चम्मच: अजवाइन
200 मिलीलीटर: पानी

और अलग से:

1 लीटर: पानी
1/2 बड़ा चम्मच सूरजमुखी तेल
स्वाद के अनुसार नमक

गट्टे की कढ़ी कैसे तैयार करें?

बेसन के गट्टे बनाने से शुरुआत करें क्योंकि कढ़ी तैयार करने का काम बाद में ही किया जाएगा। बेसन में तेल डालकर दोनों को अच्छी तरह मिलाएँ। फिर उसमें बेकिंग पाउडर, नमक और अजवाइन मिलाकर मिश्रण को अच्छी तरह मसल-मसलकर एकसार कर लें।

बेसन और अन्य सामग्रियों के इस मिश्रण को इस तरह माड़ते हुए धीरे-धीरे उसमें 200 मिलीलीटर पानी भी मिला दें और पुनः अच्छी तरह माड़ते हुए उसका अच्छा सख्त मिश्रण तैयार कर लें। दस मिनट बाद उसे रोल करके अंगूठे की मोटाई के बराबर मोटी लंबी छड़ी या रस्सी का आकार दें।

अब एक बरतन में पानी लेकर उसे स्टोव पर रखकर उबालें और जब वह उबलने लगे, उसमें बेसन के रोल को रख दें और उसे अगले पंद्रह मिनट तक बरतन पर ढक्कन रखकर मध्यम आँच में उबालें।

इस बीच आप कढ़ी तैयार करने की प्रक्रिया भी शुरू कर सकते हैं। दही और पानी को एक बड़े बरतन में एक साथ लेकर एक झारे या कड़छुल से अच्छी तरह चलाकर एकसार कर लें। फिर उसमें धीरे-धीरे बेसन मिलाते जाएँ और मिश्रण को अच्छी तरह चलाते हुए बेसन को दही और पानी के मिश्रण में घोलें। यह सुनिश्चित किया जाना अत्यंत ज़रूरी है कि बेसन दही और पानी के मिश्रण में अच्छी तरह घुल जाए।

जब बेसन का रोल पंद्रह मिनट तक उबल जाए, उसे बरतन से बाहर निकालकर ठंडा होने के लिए अलग छोड़ दें।

जबकि रोल ठंडा हो रहा है, आप कढ़ी तैयार करने का काम जारी रखें। एक बरतन में तेल गर्म करें और जब वह पर्याप्त गर्म हो जाए तो उसमें मेथी के बीज, सरसों के बीज, हींग, और कढ़ी पत्ते डालकर मिश्रण को चलाते हुए थोड़ी देर भून लें और फिर तुरंत दही वाला मिश्रण उसमें मिला दें। इस मिश्रण को भी लगातार चलाते रहें जिससे वह नीचे, तले में चिपकने न लगे। मिश्रण में हल्दी पाउडर और नमक मिलाएँ और लगातार चलाते रहें। जब तक उबलने न लगे, मिश्रण को चलाते रहना ज़रूरी है। जब उबलने लगे तो आँच को मध्यम कर दें, जिससे मिश्रण थोड़ी देर उबलता रहे। बीच-बीच में मिश्रण को चलाते रहें, जबकि इस बीच आप गट्टे बनाने का काम जारी रख सकते हैं।

अब तक बेसन का रोल ठंडा हो गया होगा और आप आसानी से उसके टुकड़े कर सकेंगे। रोल को काटकर उसके मुँह में समाने लायक मध्यम आकार के टुकड़े कर लें। एक नॉन स्टिक कड़ाही में एक बड़ा चम्मच तेल लेकर गर्म करें। गट्टे के टुकडों को गर्म तेल में अच्छी तरह चलाते हुए दस मिनट तक भूनें जिससे वे चारों ओर से एक जैसे भुन जाएँ। इस बीच कढ़ी को भी चलाते रहना न भूलें।

दस मिनट भूनने के बाद गट्टे गहरे भूरे रंग के हो गए होंगे और अब आप उन्हें बाहर निकाल सकते हैं। कढ़ी भी अब तक तैयार हो गई होगी लेकिन आप उसे कुछ देर और उबाल सकते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि सबसे बढ़िया स्वाद पाने के लिए उसे दो घंटे तक उबालना चाहिए! खैर, अब आप कढ़ी में गट्टे मिला सकते हैं और अगर आप कुछ अधिक खट्टा पसंद करते हैं तो आँच पर से कढ़ी उतारकर उसमे अपनी पसंद के अनुसार उचित मात्रा में नींबू का रस मिला दें।

अब आपकी गट्टे की कढ़ी तैयार है। दोस्तों के साथ उसका आनंद लें!

जब एक नाई लड़का पैदा करने के चक्कर में पाँच-पाँच बच्चे पैदा कर देता है – हमारे स्कूल के बच्चे – 15 जनवरी 2016

Mohini with her father

आज मैं आपका परिचय अपने स्कूल की एक लड़की, मोहिनी से करवाना चाहता हूँ, जिसने लगभग चार साल पहले हमारे स्कूल में पढ़ना शुरू किया था। दस साल की मोहिनी पाँच सहोदर बहनों में सबसे बड़ी है।

मोहिनी के घर हम पहले भी आ चुके हैं: जब हम शशि, कृष्ण और जानकी के घर आए थे, जो उसी घर में रहते हैं जहाँ मोहिनी का परिवार रहता है, तब उसके यहाँ भी गए थे। इस घर में सात कमरे हैं जो पाँच भिन्न-भिन्न परिवारों को किराए पर दिए गए हैं। उन्हीं में से एक परिवार मोहिनी का है। जबकि हमारे स्कूल कीदूसरी तीन लड़कियाँ ऊपर, छत पर रहती हैं, मोहिनी के पिता और चाचा ने निचली मंज़िल पर किराए के कमरे लिए हैं। यहाँ थोड़ा अंधेरा रहता है लेकिन इससे लाभ यह है कि गर्मियों में ये कमरे कुछ ठंडे होते हैं!

उसके घर के पिछले दौरे के समय न तो मोहिनी की माँ और न पिता घर पर थे। इस बार भी माँ घर पर नहीं मिली और हमें पहले जाकर उसके पिता को लेकर आना पड़ा। हालांकि यह मुश्किल नहीं था: वह नाई है और आश्रम से 300 मीटर दूर सड़क पर स्थित अपनी दूकान पर दाढ़ी बनाता है और बाल काटता है। मेरे ख़याल से हमारे आश्रम के कुछ पुरुष मेहमान भी निश्चित ही उसके यहाँ दाढ़ी बनवाने का आनंद ले चुके होंगे!

मोहिनी का पिता और चाचा साझे में अपनी नाई की दुकान चलाते हैं, जो सड़क के किनारे महज एक कुर्सी भर है, जिसके सामने एक टेबल पर उनका सारा सामान करीने से रखा रहता है, जिसके पीछे एक आइना है। थोड़ा गौर से देखने पर पता चलता है कि कोई भी सामान नया नहीं है- कहीं-कहीं जंग लगा है और कंघों के कुछ दाँत टूटे हुए हैं।

यह एक सीधा-सादा ईमानदार सा धंधा है लेकिन इसमें ज़्यादा कमाई नहीं हो पाती! हमें बताया गया कि मोहिनी का चाचा अस्थमा (दमे) का मरीज़ है और अक्सर बीमार पड़ा रहता है, जिसके कारण अक्सर परिवार के लिए पैसे कमाने का पूरा भार मोहिनी के पिता पर आ पड़ता है। परिवार में दो पुरुष, मोहिनी की माँ और मोहिनी की चार सहोदर बहने हैं! 4000 रुपए अर्थात 60 डॉलर की मासिक आमदनी में, जिसका चौथाई हिस्सा मकान किराए में चला जाता है, परिवार का खर्च चलाना अक्सर बहुत कठिन होता है!

शायद इसी कारण मोहिनी की माँ से घर पर मुलाक़ात हो पाना मुश्किल होता है: वह अक्सर बच्चों को लेकर अपनी माँ या अपने सास-ससुर के यहाँ चली जाती है। बच्चों के दादा-दादी सारे बच्चों को खिला-पिलाकर और अपने यहाँ रखकर उनकी मदद करने की कोशिश करते हैं! दस वर्ग मीटर के उस छोटे से कमरे में, स्वाभाविक ही, उनके गाँव की खुली सड़कों के मुकाबले खेलने-कूदने की जगह बहुत कम मिल पाती है!

इस तरह मोहिनी अक्सर अपने पिता के साथ अकेली ही रहती है या फिर, जब पिता काम पर चला जाता है और वह उसके साथ सड़क किनारे बैठना नहीं चाहती तो घर में पूरी तरह अकेली! दरअसल ऐसे समय में ही उसे अच्छा लगता है क्योंकि तब ठीक उनके ऊपर रहने वाली सहेलियाँ उससे खेलने नीचे आ जाती हैं!

हम जानते हैं कि अगले कुछ सालों में हम मोहिनी की दूसरी बहनों के बारे में जान सकेंगे, जब वे एक के बाद एक हमारे स्कूल आना शुरू करेंगी। वास्तव में मोहिनी जैसी दो और लड़कियाँ भी इसी कारण इस दुनिया में आ गईं क्योंकि उनके अभिभावक लड़कों की तमन्ना (आशा) कर रहे थे। ये सबसे अंत में आईं और जब हमने उनकी उम्र पूछी तो वे बगलें झाँकने लगीं क्योंकि उन्हें उत्तर पता नहीं था-क्योंकि उनके पिता भी सिर्फ अंदाज़ा लगा रहे थे!

हमें आशा है कि अच्छी पढ़ाई का आधार पाकर मोहिनी अपने जीवन में और अपने परिवार के जीवन में भी सकारात्मक परिवर्तन लाने में कामयाब होगी!

भारत में महिलाओं के जीवनों में तब्दीली आ रही है लेकिन वहाँ नहीं, जहाँ कि सबसे अधिक ज़रूरत है – 14 जनवरी 2016

working woman

कल मैंने बताया था कि कैसे पुरानी परंपराएँ समाज के ताज़ा बुरे हालात का कारण हैं। जैसे, विवाह के बाद परिवार और दूसरे बहुत से लोगों का महिलाओं पर जल्द से जल्द बच्चे पैदा करने का दबाव। कुछ पाठक मेरी बात से सहमत थे लेकिन उन्होंने भी जोड़ा, ‘हालात बदल रहे हैं।’ मैं भी मानता हूँ, मगर एक हद तक ही!

सर्वप्रथम, उन जगहों पर गौर करें जहाँ वास्तव में परिवर्तन हो रहा है: महानगरों में निश्चय ही सबसे पहले परिवर्तन नज़र आता है। इन जगहों में महिलाएँ कोई न कोई काम करती हैं, वहाँ लड़कों की तरह लड़कियाँ भी पढ़ने स्कूल जाती हैं और वहाँ कामकाजी महिलाओं के लिए डे-केयर सेंटर्स उपलब्ध हैं, जहाँ वे काम पर जाते हुए बच्चों को छोड़ सकती हैं। इत्यादि, इत्यादि।

लेकिन मैं कुछ बातें स्पष्ट करना चाहता हूँ: पहली यह कि वह भारत की आबादी का बहुत छोटा सा हिस्सा है। दूसरे, वहाँ भी इस मसले पर मानसिकता में उतना परिवर्तन नहीं हुआ है जितना हम सोचते हैं कि हुआ है!

हाँ, दिल्ली, मुम्बई और दूसरे बड़े शहरों में महिलाओं की हालत में परिवर्तन हुआ है। अभिभावक उन्हें काफी आज़ादी देते हैं और अब गाँव की लड़कियों की तुलना में वहाँ लड़कियाँ जीवन को पूर्णतः अलग तरीके से जानने-समझने के लिए स्वतंत्र हैं।

इस तथ्य के अलावा कि स्पष्ट ही वह देश की कुल जनसंख्या का एक छोटा सा हिस्सा है, वहाँ भी महिलाओं के लिए जीवन अन्यायपूर्ण ही बना हुआ है क्योंकि वहाँ भी अभिभावकों, रिश्तेदारों और सामान्य रूप से सारे समाज में ही परंपराओं को अब भी ऊँची प्राथमिकता प्राप्त है! जबकि लड़के स्वतंत्रता पूर्वक कहीं भी घूम-फिर सकते हैं, लड़कियों को समाज के सुरक्षा घेरे में बंद रहना होता है, जो उन्हें सुरक्षा तो प्रदान करता है मगर उन्हें एकाकी भी कर देता है। उन्हें किसी लड़के के साथ घूमने-फिरने की आज़ादी नहीं होती और अगर होती भी है तो अभिभावक इस पर गहरी नज़र रखते हैं कि वे किसके साथ मिल-जुल रही हैं। देर रात तक बाहर रहना वर्जित है, रात को अगर बाहर रुकना ही है तो सिर्फ अपनी सबसे पक्की सहेली के यहाँ भर सोने की आज़ादी मिल सकती है, वह भी तब, जब अभिभावक भी उस सहेली के माता-पिता को अच्छी तरह जानते हों कि वे सभ्य लोग हैं। इसके अलावा, हर समय उसे अपनी खबर देनी आवश्यक हैं कि वह कहाँ जा रही है।

यह स्वतंत्रता का मिथ्या दिखावा है। विज्ञापन है, पूरी फिल्म नहीं। ज़्यादातर प्रकरणों में अभी भी विवाह का समय आते-आते उसका अंत हो जाता है और तब लड़की को, पढ़ी-लिखी और नौकरी करने वाली लड़की को, पति और परिवार की इच्छाओं और अपेक्षाओं के सामने घुटने टेकने की सलाह दी जाती है। क्योंकि यही परंपरा है और यह परंपरा अभी टूटी नहीं है! ‘पति का आदर करो’ का अर्थ है, जैसा वह कहे, करो!

और इस दृष्टिकोण से देखें तो पता चलता है कि अपेक्षाएँ वही पुरानी हैं, आगे की प्रक्रिया भी वही है और दबाव, दुख और आँसू भी वही हैं। इसलिए नहीं, अभी भी बड़े शहर भी इस समस्या से अछूते नहीं हैं, वे भी उन परंपरागत समस्याओं का अंत नहीं कर सके हैं-असलियत यह है कि इसके चलते कुछ दूसरी समस्याओं ने जन्म ले लिया है, जिन पर, संभव हुआ तो, मैं अगले हफ्ते चर्चा करूँगा।

क्या आप भी सोचते हैं कि ‘शादी से पहले सेक्स नहीं’ – 13 जनवरी 2016

पिछले दो दिनों से मैं उन दबावों के बारे में लिखता रहा हूँ, जिन्हें भारतीय समाज में, खास तौर पर महिलाओं को, विवाह के बाद बर्दाश्त करना पड़ता है: एक तरफ उनसे विवाह-सूत्र में बंधने से पहले कुँवारी होने की अपेक्षा की जाती है तो दूसरी तरफ अब उन्हें जल्द से जल्द गर्भवती होने का निर्देश दिया जाता है! भारतीय समाज में नैतिकता को लेकर अनेक प्रकार के प्रतिबंध होते हैं और मेरे विचार में इसमें तब्दीली आनी चाहिए, जिससे आधुनिक जीवन की आकांक्षाओं और अपेक्षाओं के अनुरूप खुशियों और संतोष के लिए उपलब्ध जगह का विस्तार किया जा सके!

सच बात यह है कि किस परिस्थिति में आपका व्यवहार कैसा होना चाहिए इत्यादि बहुत से नैतिक मूल्यों और विचारों की जड़ पुरानी और परंपरागत धारणाओं में पाई जाती है और उस पुराने समय में, संभव है, वे नैतिकताएँ उचित भी रही हों। पुराने जमाने में लोगों का अनुमानित जीवन काल आज के मुक़ाबले बहुत कम हुआ करता था। इस बात को सुनिश्चित करने के लिए कि उनकी मौत से पहले तक बच्चे पर्याप्त बड़े हो जाएँ, उनके लिए कम उम्र में बच्चे पैदा करना आवश्यक था और इसलिए विवाह के तुरंत बाद से ही इस दिशा में प्रयास करना तर्कपूर्ण कहा जा सकता है। किन्तु आज भी वही पुरानी परंपरा भारतीय मानदंड बना हुआ है और जितना जल्दी संभव हो, बच्चे पैदा करने को उचित माना जाता है। इस तरह शादी के नौ माह बाद के समय को ही बच्चे पैदा करने का मुहूर्त मान लिया जाता है!

लेकिन विवाह से पहले नहीं! बिलकुल नहीं! अविवाहित महिला को गर्भवती नहीं होना चाहिए, वैसा होने पर आसमान टूट पड़ेगा! पुराने जमाने में वास्तव में यह उसकी बरबादी का बायस हो सकता था क्योंकि महिलाएँ ही घर की देखभाल करती थीं और सिर्फ पुरुष ही परिवार के लिए भोजन-पानी का इंतज़ाम किया करते थे। महिलाओं के लिए यह संभव नहीं था कि बाहर निकलकर पैसे कमाएँ और अपनी और अपने बच्चे की देखभाल कर सकें!

लेकिन अब परिस्थितियाँ बदल चुकी है। बाहरी माहौल बदल चुका है और तदनुसार विचारों में भी बदलाव आना चाहिए। आज के समय में हम तुलनात्मक रूप से लंबा जीवन जीते हैं- इतना कि सिर्फ बच्चे ही नहीं नाती-पोते भी बड़े होकर खुद अपनी देखभाल करने योग्य हो जाएँ! इसलिए, हम कुछ अधिक साल शादी का इंतज़ार कर सकते हैं और शादी के बाद कुछ और साल बच्चे पैदा करने का! जल्दबाज़ी में किसी अनजान लड़की या लड़के से शादी करने की अब आवश्यकता नहीं रह गई है। और इसीलिए माता-पिता द्वारा तय विवाह का कोई औचित्य नज़र नहीं आता-आपके पास अपनी पसंद के किसी व्यक्ति को खोजने का पर्याप्त समय होता है, जिसके साथ आप सारा जीवन गुज़ार सकें! और इसीलिए बच्चे पैदा करने में जल्दबाज़ी करने की भी आपको ज़रूरत नहीं है!

अंत में, आज महिलाओं को इस बात का अवसर प्राप्त होना चाहिए कि वे स्वयं पैसे कमाकर अपनी देखभाल कर सकें। और तब अगर वे शादी से पहले सेक्स संबंध बनाना चाहती हैं या गर्भवती हो जाती हैं और बच्चे को जन्म देकर उसका लालन-पालन करना चाहती हैं तो आसमान नहीं टूट पड़ने वाला है!

दुर्भाग्य से, भारत में हम अभी उस मंज़िल तक नहीं पहुँचे हैं, जैसा कि, अगर आप मेरे ब्लॉग नियमित रूप से पढ़ रहे हैं या यहाँ की वस्तुस्थिति से परिचित हैं, तो जानते होंगे। लेकिन हमें वहाँ तक पहुँचना चाहिए-और मुझे लगता है कि कुछ समय गुज़रने के बाद हम अवश्य पहुँचेंगे!

महिलाओं पर बच्चा पैदा करने के दबाव के भयंकर परिणाम – 12 जन 2016

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कल मैंने नवविवाहित दंपतियों से भारतीय अभिभावकों, सास-ससुर और समाज की इस अपेक्षा के बारे में आपको बताया था कि वे जल्द से जल्द बच्चे पैदा करें अन्यथा वे समझने लगते हैं कि उनमें कोई न कोई कमी है! इसका उन पर अच्छा-खासा दबाव होता है, विशेष रूप से महिलाओं पर, कि वे हर बात बताएँ और उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे हर बात बताएँगी। और बहुत सी महिलाएँ यही मानती हैं कि शादी के बाद उनकी अपेक्षा स्वाभाविक ही है और वे खुद भी चाहने लगती हैं कि यही हो। वे गर्भवती होना चाहती हैं-लेकिन यह सब मनुष्यों के हाथ में नहीं होता! समझ लीजिए, कभी-कभी ऐसा संभव नहीं हो पाता। और तब उनके लिए समाज का दबाव बर्दाश्त करना बहुत कठिन हो जाता है!

मैं इस परिस्थिति का सामना करती हुई बहुत सी महिलाओं से मिला हूँ, जहाँ वे गर्भवती नहीं हो पातीं या उनका गर्भ उनके शरीर में ठीक से विकास नहीं कर पाता। मैंने दुनिया भर की महिलाओं से उनके मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक समस्याओं पर बात की है। इसका तनाव उन सभी पर बड़ा भयानक होता है-लेकिन भारत में यह बाहरी दबाव सबसे असहनीय होता है!

स्वाभाविक ही, अगर आपने काफी समय से कोशिश की और दुर्भाग्य से कई गर्भपात हो गए या किसी कारण से आप गर्भवती नहीं हो पाईं तो यह भावनात्मक रूप से आपको तोड़ देता है। यह शारीरिक रूप से भी बेहद चुनौतीपूर्ण होता है। यह आप पर मानसिक बोझ होता है। लेकिन पश्चिम में अक्सर यह बोझ आतंरिक होता है, महिलाओं द्वारा खुद अपने लिए महसूस किया जाता है। अपनी खुद की मर्ज़ी से वह माँ बनने का फैसला करती है और यह तथ्य कि वह माँ नहीं बन पा रही है और यह डर कि संभव है, वह कभी माँ नहीं बन पाएगी उस बोझ और तनाव का कारण होता है।

भारत में यह बोझ ज़्यादातर इस डर के कारण होता है कि आपकी यह असमर्थता दूसरों को निराश कर देगी, नाती या पोते की दूसरों की चाहत के कारण, आपसे उनकी अपेक्षा के कारण और उस अपेक्षा के दबाव के कारण-क्योंकि ऐसा ही चलन है कि बच्चे पैदा करना है और वैसा संभव नहीं हो पा रहा है। यह डर कि आपको अयोग्य और अधूरा माना जाएगा, कि आप महिला होने के मूलभूत कर्तव्य का निर्वाह नहीं कर पा रही हैं और यह भावनात्मक कष्ट कि आप दूसरों की अत्यंत सहज-स्वाभाविक इच्छा पूरी नहीं कर पा रही हैं। इसके अलावा यह एहसास कि खुद आपकी इच्छा और उससे उपजे आपके दुःख की कोई कीमत नहीं है। वैसे खुद अपने आपसे निराशा सिर्फ मामूली दुःख पैदा करता है और वह बाहरी प्रभावों के सम्मुख वास्तव में नगण्य ही होता है!

जब आप सामान्य रूप से बच्चे पैदा नहीं कर पातीं तो भारत में भी कुछ प्रावधान हैं जिनका उपयोग किया जा सकता है। पति-पत्नी, दोनों के फर्टिलिटी टेस्ट की सुविधा है, अंडोत्सर्ग का ठीक समय पता करने के यंत्र उपलब्ध हैं और कई दूसरे तरीके मौजूद हैं, जिनसे नैसर्गिक रूप से गर्भ धारण करना संभव किया जाता है और अंत में निश्चित ही, विट्रो फर्टिलाइजेशन के ज़रिए IVF का उपाय भी उपलब्ध है, जिसमें पत्नी के गर्भ का निषेचन पति के शुक्राणुओं के द्वारा प्रयोगशाला में किया जाता है। लेकिन इनमें से कुछ सुविधाएँ बहुत खर्चीली होती हैं और उनका लाभ लेने के लिए युवा दंपति को क़र्ज़ लेने की ज़रूरत पड़ती है। इसके अलावा ये तरीके न सिर्फ भावनात्मक रूप से बल्कि शारीरिक रूप से भी बड़े तकलीफदेह होते हैं। सबसे बड़ी बात, इतना करने के बाद सफलता की संभावना हताश कर देने की हद तक कम होती है और इतनी परेशानियों के बाद अगर गर्भ धारण करना संभव नहीं हुआ तो महिलाएँ बुरी तरह टूट जाती हैं! शरीर से निकाले गए अंडे या गर्भ के साथ खुशी की सारी आशा, बाहर से प्रेम और आदर की अंतिम संभावना भी धूल में मिल जाती है और वे अपने आपको समाज के सामने फिर उसी रूप में खड़ा पाती हैं, जिस रूप में इस ताम-झाम की शुरुआत के समय खड़ी थीं-एक गर्भधारण करने में असमर्थ एक महिला के रूप में!

महिलाएँ अवसादग्रस्त हो जाती हैं। उनकी जीने की इच्छा समाप्त हो जाती है। इन कारणों से आए दिन बहुत सी महिलाएँ आत्महत्या तक कर लेती हैं! खास तौर पर परिवार द्वारा तय की गई शादियों में, जहाँ आप शादी करके एक तरह से वचनबद्ध होती हैं कि आप अपने नए परिवार को उनका वारिस प्रदान करेंगी और जहाँ प्रेम जैसी बात दृश्यपटल से पूरी तरह गायब होती है। यह लगभग ऐसा होता है जैसे दूल्हा ठगा गया हो और बाज़ार से टूटा-फूटा सामान ले आया हो, जो किसी काम का नहीं है और जिससे अपेक्षित नया निर्माण संभव नहीं है!

क्या आप विश्वास करेंगे कि इस मूर्खतापूर्ण अपेक्षा के चलते हम कई जानें गंवा बैठते हैं? निश्चित ही, अभिभावकों का अधिकार है कि वे नाती-पोतों की आशा करें। लेकिन उन्हें यह अधिकार नहीं है कि वे अपनी बहू पर इसके लिए बेजा दबाव डालें और सारे समाज को यह पता होना चाहिए: भविष्य में आने वाले बच्चे की मृग-मरीचिका की कीमत पर आप एक जीती जागती महिला को बीमार बनाए दे रहे हैं। आपके व्यवहार के चलते क्रमशः हर माहवारी के बाद भीतर ही भीतर आप उसकी जान ले रहे हैं! क्या आप यही चाहते हैं? मुझे नहीं लगता!

तो कृपा करके दंपतियों को आपस में प्यार करने दीजिए और प्यार के कारण विवाहबद्ध होने दीजिए। उन्हें निर्णय करने दीजिए कि कब उन्हें बच्चा चाहिए। उन्हें अपना जीवन जीने की आज़ादी दीजिए। जब उन्हें मदद की ज़रूरत हो, उनके साथ उनके पास खड़े रहिए-चाहे वह बच्चे की चड्डियाँ बदलनी हों या बच्चा पैदा न कर पाने के दुख में आँसू बहाने के लिए आपके कंधे की ज़रूरत हो!

आपके विवाह के बाद जब आपकी सास आपकी माहवारी का हिसाब रखने लगती है – 11 जनवरी 2016

अपरा के जन्मदिन के सिलसिले में बहुत से मित्र आश्रम आए थे और उन समान सोच-विचार वाले मित्रों के साथ एक बार फिर खुलकर बातचीत करना अत्यंत सुखद रहा! जब हम एक साथ बैठे हुए थे तो एक महिला मित्र ने, जिसका विवाह अभी एक साल पहले ही हुआ था, बताया कि उस पर न सिर्फ उसके परिवार और उसके सास-ससुर का बल्कि सामान्य रूप से सारे समाज का ही बड़ा ज़बरदस्त दबाव है। किस बात का? जल्द से जल्द गर्भवती होने का!

जी हाँ। भारत में यह बिल्कुल सामान्य बात है कि शादी के कुछ ही माह बाद- शादी, जो अक्सर परिवार द्वारा तय की हुई शादी होती है-हर व्यक्ति यह खुशखबर सुन लेता है: बच्चा होने वाला है! यहाँ यही चलन है, यही होना चाहिए और आपकी शादी का यही एकमात्र मुख्य उद्देश्य है! आपसे अपेक्षा की जाती है कि आप बच्चे, और जहाँ तक हो सके, लड़का, पैदा करें और परिवार की वंश वृद्धि सुनिश्चित करें और उसके कारोबार के लिए वारिस तैयार हो! आपके जीवन का यही मुख्य उद्देश्य है: जितना जल्दी हो सके, बच्चा पैदा करो!

उस मित्र ने बताया कि वह और उसका पति फिलहाल बच्चा न पैदा करके पर्याप्त खुश और संतुष्ट हैं और उसके स्थान पर एक दूसरे को जानते-समझते हुए और अपने संबंध को कुछ और प्रगाढ़ बनाने की कोशिश करते हुए कुछ वक़्त गुज़ारना चाहते हैं। लेकिन भारत में यह विचार ही अत्यंत असामान्य विचार है। यहाँ लोग अक्सर कहते पाए जाते हैं कि बच्चे तो वह गोंद है या वह चुंबक है जो माता-पिता को एक-दूसरे से मज़बूती के साथ जोड़े रखता है! लेकिन जबकि वे इस तरह रहते हुए खुश हैं, उनका परिवार दुखी है! और वह महिला मित्र परिवार और दूसरे सब लोगों के इस दबाव से बहुत अप्रसन्न है!

एक और मित्र, जिसकी तीन साल की बच्ची उस वक़्त अपरा के साथ खेल रही थी, अपने साथ पेश आए इसी तरह के व्यवहार को याद करने लगी। उसकी सास हर माह उससे पूछती कि उसकी माहवारी रुकी या नहीं! यहाँ तककि बाद में उसने कैलेंडर पर उसकी माहवारी के दिनों का हिसाब-किताब रखना शुरू कर दिया और ठीक उन्हीं दिनों में उससे खबर दरियाफ्त करने लगी। जब उसे पता चलता कि माहवारी हो गई है और कम से कम इस माह वह गर्भवती नहीं होगी तो वह बहुत दुखी हो जाती!

क्या आपने कभी कल्पना की है कि किसी महिला को अपने साथ होने वाले ऐसे व्यवहार पर कैसा महसूस होता होगा? उसे लगता होगा कि उस घर में वह सिर्फ प्रजनन की मशीन भर है, और कुछ भी नहीं! किसी को इससे कोई मतलब नहीं है कि वह खुद क्या चाहती है-आपके आसपास का सारा वातावरण यह सोचता है कि आपको भी बच्चे की चाहत होनी चाहिए। और सब के सब पूरी शिद्दत के साथ वह खुशखबर सुनने का इंतज़ार करते रहते हैं।

अगर कुछ माह या साल भर तक उस खबर की घोषणा नहीं होती तो अफवाहों का बाज़ार गर्म हो जाता है: उन्हें बच्चा पैदा नहीं हो पा रहा है, कुछ न कुछ गड़बड़ है! कौन दोषी है? ज़रूर लड़की ही बाँझ होगी! अभी इलाज शुरू किया या नहीं? ऐसा तो नहीं कि लड़का सम्भोग में रुचि ही न लेता हो? कहीं वह समलैंगिक तो नहीं! इत्यादि, इत्यादि!

अफवाह फरोश पड़ोसी ऐसी बातों के इंतज़ार में ही होते हैं और रस ले-लेकर मुहल्ले भर में इस सामान्य बात को बहुत बड़े कलंक की तरह पेश करते हैं, जबकि वहाँ सिर्फ प्रकृति अपना खेल खेल रही होती है।

यह बेहद हास्यास्पद है कि हम महिलाओं से, और पुरुषों से भी, कहें कि उनका जीवन कैसा होना चाहिए और जीवन के किस बिंदु पर उन्हें क्या सोचना चाहिए, क्या इच्छा करनी चाहिए! समाज के लिए यह कतई स्वस्थ दृष्टिकोण नहीं कहा जा सकता और न ही उस महिला के लिए या उस दंपति के लिए। क्योंकि क्या होगा यदि वे वास्तव में बच्चा पैदा न कर पाएँ? इस परिस्थिति पर दृष्टिपात करेंगे, कल…!

अपरा का चौथा जन्मदिन समारोह – 10 जनवरी 2016

कल अपरा का चौथा जन्मदिन था! हर साल की तरह स्कूल के बच्चों और बहुत सारे दोस्तों के साथ इस साल भी शानदार पार्टी आयोजित की गई, जिसमें स्वादिष्ट खाने का लुत्फ भी लिया गया!

दिन की शुरुआत हुई आश्रम की सजावट के साथ। हमारा इरादा सिर्फ फुग्गे लगाने का था-लेकिन हजारों की संख्या में! इस इरादे से हमने फुग्गे और फुग्गे फुलाने की मशीन खरीदी, जो बिजली से चलती है और पल भर में फुग्गे फुला देती है। अन्यथा हमें कई दिन पहले से मुँह से फुग्गे फुलाने पड़ते! कुछ अनुभवी लोगों ने तड़के सबेरे से फुग्गे फुलाने शुरू किए और फिर उनसे रंगीन तोरणद्वार बनाए और बड़ी-बड़ी सुंदर मालाएँ भी बनाईं।

हमारी अपेक्षा से कुछ देर से रसोइयों ने अपना काम शुरू किया। मेरे खयाल से गलती उनकी नहीं थी, हमारी थी कि हम कुछ ज्यादा उम्मीद कर गए। रसोइयों ने सफाई पेश की: “इतनी ठंड है, कोई भी इतनी जल्दी सबेरे नहीं उठना चाहता!” खैर, आखिर किसी तरह वे जागे और फिर योजना के अनुसार एक से एक स्वादिष्ट खाने की वस्तुएँ बनाने की तैयारी शुरू कर दी।

दस बजे लगभग सारे खास मेहमान पधार चुके थे: यानी हमारे स्कूल के बच्चे! उनके अलावा हमारे कुछ सबसे प्यारे मित्र भी धीरे-धीरे आने लगे-और उसके बाद नाच-गाने के साथ तुरंत ही हमने पार्टी शुरू कर दी। बच्चे जब झूम-झूमकर नाचने-गाने लगते हैं, तो वह समय सबसे खूबसूरत होता है और बड़ों सहित दूसरे सब भी अपनी झिझक और शर्म भूलकर उसमें शामिल हो जाते हैं!

इसी बीच अपरा को भूख लग गई-आखिर जब से उठी थी उसने कुछ नहीं खाया था, क्योंकि वह भी तो सारी तैयारियों में लगी हुई थी और बाद में उपहार ले रही थी, चॉकलेट खा रही थी! तो जब सब लोग गानों की धुनों पर थिरक रहे थे, रमोना उसे लेकर खाने के स्टाल्स की तरफ चली गई, जहाँ नूडल्स थे, पैनकेक थे और कुछ दूसरे नाश्ते और मिठाइयाँ रखी थी और अब भी तैयार किए जा रहे थे, जिससे मेहमानों को गरमागरम नाश्ता प्राप्त हो सके। वहाँ रमोना ने एक प्लेट में अपरा के लिए सबसे पहले नूडल्स निकाले और उसके जर्मन नाना के लिए आलू की टिकिया। धींगामस्ती और होहल्ले के सबसे पीछे बैठकर दोनों ने पार्टी के पहले स्वादिष्ट कौर का स्वाद लिया!

अपरा को पहले ही खिलाकर रमोना ने अच्छा किया क्योंकि जब औपचारिक रूप से नाश्ते का दौर शुरू हुआ तो स्कूल के बच्चे उन पर टूट पड़े और बहुत देर तक कोई दूसरा खानों तक पहुँच ही नहीं सकता था क्योंकि सामने अपनी बारी का इंतज़ार करता हुआ बच्चों का विशाल हुजूम होता था! काफी समय बाद तक वे लोग अपने मुँह में एक से एक स्वादिष्ट नाश्ते लिए फिरते रहे और पेट भरने तक खाते रहे। उनके लिए यह पार्टी का सबसे शानदार दौर होता है और वे उस अत्यंत सुस्वादु नाश्ते को भोजन की तरह खाते हुए बेहद खुश और रोमांचित थे।

केक काटने से पहले कुछ और नाच-गाना हुआ। अपरा ने पहला कट लगाया और बाद में सबको उस अत्यंत स्वादिष्ट केक का एक-एक टुकड़ा प्राप्त हुआ। जब अपरा ने अपना हिस्सा खा लिया, वह भी डांस फ्लोर पर नाच रहे लोगों में शामिल हो गई और अपना खुद का प्रदर्शन भी प्रस्तुत किया-एक डांस जिसे पिछले हफ्ते ही उसने सीखा था।

अंत में, जब बच्चे और हमारे कुछ मेहमान चले गए, अपरा ने अपने उपहार खोलना शुरू किया: सुंदर वस्त्र, रंगीन पेंसिलें और दूसरे खेल-खिलौने!

अंत में हमने आराम से बैठकर सुस्वादु डिनर के साथ पार्टी का समापन किया और शाम का बाकी का समय उन दोस्तों के साथ बढ़िया गपशप में गुज़ारा, जो रात को रुकने वाले थे।

पार्टी बहुत शानदार रही: अपरा के जन्म का चौथा स्मरण और पुराने मित्रों के साथ दोबारा एकत्र होने का सुअवसर!

कद्दू की खीर – कद्दू और दूध की मिठाई बनाने की विधि – 19 दिसंबर 2015

आज मैं आपको एक अत्यंत स्वादिष्ट खीर बनाने की विधि बताने जा रहा हूँ, जिसे कद्दू और दूध से बनाया जाता है: कद्दू की खीर! अपने स्वाद के अनुसार निश्चित ही आप उसे थोड़ा-बहुत बदलकर भी बना सकते हैं-लेकिन जैसा भी बनाएँ, इसके शानदार स्वाद का आनंद लेने से वंचित न रहें और घर पर अवश्य तैयार करें!

कद्दू की खीर – कद्दू और दूध से तैयार मिठाई

भोजनोपरांत ग्रहण करने के लिए कद्दू और दूध के मिश्रण में काजू और शक्कर मिलाकर यह स्वादिष्ट व्यंजन तैयार करें! इसका स्वाद वाकई कुछ खास है!

कद्दू की खीर तैयार करने में कितना वक़्त लगता है?

तैयारी करने में:
पकाने में:
कुल समय:

सामग्री

1 लीटर: दूध
500 ग्राम: कद्दू
50 ग्राम: काजू
50 ग्राम: बादाम
50 ग्राम: किशमिश
200 ग्राम: शक्कर
सजावट के लिए केसर

कद्दू की खीर कैसे तैयार करें?

सर्वप्रथम कद्दू के बड़े टुकड़े काट लें और उसके बाद उन्हें छील लें। टुकड़े बहुत छोटे न करें क्योंकि बाद में उन्हें पकड़कर किसना भी है! कद्दू को किसने के बाद आप मनपसंद आकार के काजू और बादाम के छोटे-छोटे टुकड़े कर लें।

अब स्टोव जलाकर, उस पर एक बड़ी सी कड़ाही रखकर दूध उबालें। जब दूध काफी गरम होकर ऊपर आने लगे, उसमें किसा हुआ कद्दू मिला दें। लगातार मिश्रण को चलाते हुए मध्यम आँच में पकने दें। मिश्रण को चलाते रहना महत्वपूर्ण है: कद्दू पककर मुलायम हो जाए, इसके लिए आपको लगातार मिश्रण को चलाते रहना होगा। इस काम में लगभग 30 मिनट का समय लगता है।

जब कद्दू पककर मुलायम हो जाए और दूध भी अच्छा गाढ़ा हो जाए तब आप उसमें बादाम और काजू के टुकड़े और शक्कर भी मिला दें। अच्छी तरह मिश्रण को चलाएँ जिससे सारी सामग्रियाँ अच्छी तरह आपस में एकसार हो जाएँ और शक्कर भी पूरी तरह घुल जाए। जब इतना हो जाए, कड़ाही को स्टोव पर से नीचे उतार लें। आपकी डिश तैयार है!

अंत में केसर मिलाकर खीर की सजावट करें!

भोजन के बाद इस स्वादिष्ट खीर का आनंद लें!

हर साल घर में पानी घुस जाता है – हमारे स्कूल के बच्चे – 18 दिसंबर 2015

हर साल घर में पानी घुस जाता है

आज फिर शुक्रवार है और मैं आपका परिचय अपने स्कूल के दो बच्चों से करवाना चाहता हूँ। इस साल शिक्षा-सत्र की शुरुआत से यानी जुलाई से ही वे हमारे स्कूल में पढ़ रहे हैं- लेकिन उनका परिवार मूलतः सिर्फ एक बच्चे का दाखिला करवाने हमारे यहाँ आया था!

वास्तव में इस परिवार को हम कई सालों से जानते हैं। उनके सबसे बड़े लड़के, संजू ने हमारे स्कूल की शुरुआत के साथ ही हमारे यहाँ पढ़ाई शुरू की थी और अभी पिछले साल ही पाँचवी कक्षा पास की है। अब वह 15 साल का है। जब 2013 में हम उनके घर गए थे, तभी उन्होंने वादा किया था कि अपने दोनों छोटे बच्चों को भी वे हमारे स्कूल में पढ़ने भेजेंगे, लेकिन दुर्भाग्य से उन्होंने ऐसा नहीं किया। इस साल भर्तियाँ शुरू होने पर संजू अपने छोटे भाई, सात साल के सुमित को लेकर हमारे पास आया था। लेकिन वह अपनी बहन, दस वर्षीय अंजू को लेकर नहीं आया, जबकि अब तक उसने पहले कभी स्कूल का मुँह तक देखा नहीं था।

यह बिल्कुल स्पष्ट है कि अभिभावकों के लिए लड़की को स्कूल भेजना उतना महत्वपूर्ण नहीं था। लेकिन हमें याद था कि उनकी एक बहन भी है और हमने उनसे कहा कि उसे भी स्कूल भेजें। और इस तरह दोनों छोटे सहोदर अब हमारे स्कूल आ रहे हैं और दोनों ही हमारे स्कूल की सबसे निचली कक्षा में एक साथ पढ़ने का आनंद प्राप्त कर रहे हैं।

इन बच्चों का परिवार हमारे स्कूली बच्चों के कुछ सबसे गरीब परिवारों में से एक है। पिता रिक्शा चलाता है और जब उसे एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाने हेतु पर्याप्त सवारियाँ नहीं मिलतीं, वह रद्दी और कबाड़ इकठ्ठा करके बेचता है। सबेरे उसकी पत्नी एक आश्रम की सफाई करने जाती है और इस तरह खुद भी थोड़ा-बहुत कमाकर लाती है। वे अपने खुद के घर में निवास करते हैं मगर वास्तव में पिछले कुछ सालों से वहाँ रहना भी खतरनाक हो चला है:हर साल मानसूनी बारिश में यमुना नदी में बाढ़ आ जाती है बाढ़ का पानी उनके घर में प्रवेश कर जाता है। सन 2010 की बाढ़ में उन्हें अपना घर खाली करना पड़ा था। उस समय हमने उनकी मदद की थी और तब से हम अक्सर उनकी मदद करते रहे हैं।

उनके घर के इस बार के दौरे में हम सचमुच आश्चर्यचकित रह गए: परिवार इतनी रकम जमा करने में सफल रहा है कि घर के पीछे के हिस्से को थोड़ा ऊपर उठाकर एक कमरा बनवा लिया है, जहाँ अब हर साल बारिश का पानी नहीं आ पाएगा! सिर्फ अतिवृष्टि होने पर और अप्रत्याशित रूप से भयंकर बाढ़ आने पर ही उनके बेडरूम में पानी आने की संभावना हो सकती है।

उनकी सकारात्मक आर्थिक प्रगति से हम बहुत खुश हैं कि परिवार अपने रहन-सहन का स्तर किंचित सुधार सका है और अब उन्हें हर साल अपने पूरे घर की चिंता नहीं करनी होगी। अगर सामने की क्षतिग्रस्त दीवार किसी दिन गिर भी जाए तो भी उनके पास पीछे की तरफ मजबूत छत होगी और कुछ दिन गुजारने के लिए एक नया सुरक्षित कमरा!

और, वे आगे भी बचत करते रह सकें और सामने वाली क्षतिग्रस्त दीवार की जगह नई, मजबूत दीवार बनवा सकें, हम उनकी मदद जारी रखे हुए हैं और भविष्य में भी जारी रखेंगे: उनके बच्चों को लगातार मुफ्त शिक्षा प्रदान करके!