चिंता, अवसाद और निष्क्रियता के लिए एक नास्तिक और भूतपूर्व गुरु के द्वारा बताई ध्यान की इस विधि का प्रयोग करें – 15 अक्टूबर 2015

आजकल बहुत से लोगों के साथ अवसाद, थकान और निष्क्रियता तथा चिंताग्रस्त होने की समस्या जुड़ी होती है। दैनिक जीवन में पेश आने वाले तनावों और श्रम के चलते वे शिथिल और थके हुए लगते हैं। मैं ऐसे बहुत से लोगों से मिल चुका हूँ, कई लोगों के साथ समय गुज़ारा है और अपने सलाह-सत्रों में बातचीत की है। मैंने उनके साथ ध्यान किया है और आज मैं उन लोगों के लिए, जो ऐसी परिस्थितियों से दो-चार होते रहते हैं, एक संक्षिप्त सलाह-सूची प्रस्तुत करना चाहता हूँ। सम्भव है, आपको आज का मेरा ब्लॉग थोड़ा सा अजीब लगे और आम तौर पर यहाँ मैं जैसा लिखता हूँ, उसके विपरीत नज़र आए। मैं खुद यह जानता हूँ कि कुछ ही समय पहले मैंने लिखा था कि ध्यान और योग के लिए किसी सहायता की ज़रूरत नहीं है-लेकिन मैं यह भी जानता हूँ कि इससे बहुत से लोगों को काफी लाभ प्राप्त हुआ है! और यह पाठकों को भी लाभ पहुँचाएगा!

अगर आपको लग रहा है कि आसमान फट पड़ा है और अब कुछ नहीं हो सकता तो ये चंद पंक्तियाँ आपके ही लिए हैं: अगर आपको लग रहा है कि आप अकेले हैं, अगर आपको लग रहा है कि जीवन में अब कुछ भी अच्छा नहीं होगा।

सर्वप्रथम तसल्ली रखें। सबसे पहले शरीर को विश्रांति प्रदान करें-उसके पीछे-पीछे मस्तिष्क भी शांत हो जाएगा। अच्छी, आरामदेह कुर्सी पर बैठें या दीवार से पीठ लगाकर ज़मीन पर आराम से बैठ जाएँ और गहरी साँस लें। अगर आपको ठीक लगता हो तो आँखें बंद करें अन्यथा अपने आसपास की किसी छोटी वस्तु पर मन को एकाग्र करें-कोई बटन, फूल या पर्दे पर बनी कोई आकृति आदि पर। अपनी साँस पर मन को एकाग्र करते हुए गिनती गिनें-साँस भीतर लेते हुए तीन और बाहर छोड़ते हुए पाँच तक गिनें। दिल की धड़कन को धीमा होने दें।

अब हम एक के बाद दूसरी मांसपेशी को विश्रांति देंगे, मतलब कि अपना ध्यान वहां ले जाकर उसे तनाव रहित करके उसे शिथिल करेंगे। शुरुआत पैर की उँगलियों से करें। उन मज्जा-तंत्रिकाओं के विषय में सोचें, जो पैर के पंजों के अंतिम सिरे तक पहुँचती हैं। उसके बाद धीरे-धीरे, पूरा समय लेते हुए क्रमशः पैर के पंजे, टखने, फिर पैरों के ऊपरी हिस्से तक आइए। पूरी तरह चैतन्य रहते हुए हर अवयव को महसूस कीजिए। जब भी किसी विशेष स्थिति में आप दर्द महसूस करें तो उसे याद रखिए लेकिन विचारों को आगे बढ़ने दीजिए, वहीं स्थिर मत होइए। ऊपर बढ़ते हुए कूल्हों तक आइए, उसके बाद पेट और पीठ से होते हुए कंधों तक पहुँचिए। यहाँ आकर अपनी मांसपेशियों को आराम देने की प्रक्रिया शुरू कीजिए-पूरी गरदन से होते हुए बाँहों पर आइए और आगे बढ़ते हुए उँगलियों तक जाने दीजिए। यहाँ हर ऊँगली पर हल्के से रुककर सोचिए और महसूस कीजिए कि कैसे तनाव आपका शरीर छोड़कर बाहर निकल रहा है।

एक बार यहाँ पहुँचने के बाद समझिए कि आप काफी दूर आ गए हैं और तब आप नोटिस भी करेंगे कि आप अब काफी शांत और तनावमुक्त महसूस कर रहे हैं। अब मन में पूरी चैतन्यता में सोचते हुए इन बातों को समझने का प्रयास कीजिए:

कुछ भी हो जाए, जीवन इसी तरह चलता रहेगा। मैं साँस ले रहा हूँ, मैं ज़िंदा हूँ।

आप अकेले नहीं हैं। भले ही आपके बहुत से साथियों-रिश्तेदारों ने आपका साथ छोड़ दिया हो, दुनिया में बहुत से ऐसे लोग भी मौजूद हैं जो आपकी मदद कर सकते हैं। और ऐसे लोग भी हैं, जो आपकी परवाह करते हैं!

आपमें शक्ति है। आप यहाँ तक पहुँच गए हैं तो और भी आगे बढ़ेंगे।

अंधियारे में आपको अपने चारों तरफ रोशनी नज़र आ रही है। जब आप खुद को शक्तिशाली महसूस करने लगें तो उठ खड़े हों और उसे पाने की कोशिश करें। क्या अब भी आप अकेलापन महसूस कर रहे हैं? किसी को बुलाइए, जो आपकी मदद कर सके-कोई दोस्त, कोई रिश्तेदार, कोई चिकित्सक या कोई हॉटलाइन भी! अगर किसी की मदद की ज़रूरत महसूस करें तो उसे प्राप्त करने में संकोच न करें!

सबसे मुख्य बात यह कि कभी पीछे मुड़कर न देखें और अपने आपको अपराधी न समझे और न खुद पर शर्म करें। जीवन में ऐसे क्षण या ऐसी कालावधि का आना कोई अनहोनी बात नहीं है। हम उनके साथ विकास करते रह सकते हैं। हम पहले से और अधिक मज़बूत होकर निकलेंगे!

ध्यान – मस्तिष्क को नियंत्रित करने का फर्जी तरीका – 13 अप्रैल 2015

आज मैं एक ऐसे विषय पर लिखने जा रहा हूँ जिस पर चाहे जितनी बार बोलूँ या लिखूँ, वह मुझे हमेशा प्रिय और महत्वपूर्ण लगता है: ध्यान। ध्यान और ध्यान के विभिन्न प्रकार, जिनका विभिन्न गुरु प्रचार करते रहते हैं और सामान्य लोग उस पर अधिकार पाने के लिए कड़ा संघर्ष करते हैं। और यहीं पर मैं अपने मुख्य बिंदु पर आता हूँ: ध्यान को कभी भी संघर्ष नहीं होना चाहिए!

यह सच है, बहुत से लोगों के लिए वह सिर्फ इतना ही है: अपने ही मस्तिष्क के साथ युद्ध! योगाभ्यास के आसन पर बैठने का पहला उद्देश्य तो विश्रांति और शारीरिक तनाव से मुक्ति ही होता है मगर अकसर इस मंसूबे का निष्पादन उस तरह नहीं होता, जिस तरह होना चाहिए। इसका कारण यह है कि वे सोचते हैं-या उन्हें विख्यात योग गुरुओं या ध्यान-मार्गदर्शकों द्वारा बताया जाता है-कि उनका लक्ष्य विचार-शून्यता (सोचना बंद कर देना) होना चाहिए।

लेकिन होता यह है कि वे आसन बिछाकर बैठ जाते हैं और उनका मस्तिष्क दुनिया भर की बातें सोचने लगता है, हर तरफ दौड़ने लगता है और सब कुछ करता है सिर्फ उनके पास रहकर उस क्षण पर एकाग्र नहीं हो पाता। उनके दिमाग में हजारों तरह के खयाल आते हैं, वे मन ही मन दूरस्थ देशों की यात्रा करने लगते हैं और फिर अचानक उन्हें एहसास होता है कि: "अरे, यह क्या? मुझे यहाँ होना चाहिए, इस पल में, इस चटाई पर"! वे अपने मस्तिष्क पर कुपित होते हैं, हताश, हतोत्साहित होते हैं कि वे उसे इस पल पर केन्द्रित नहीं रख सके और फिर दुखी और परेशान हो उठते हैं।

अगली बार जब वे ध्यान लगाने बैठते हैं तो जैसे किसी से युद्ध करने निकले हों। ध्यान लगाने का कुशन या चटाई युद्धभूमि बन जाती है। वे अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित युद्धभूमि में उतरते हैं: अगरबत्तियाँ, शांतिदायक संगीत और शायद साँस लेने और ध्यान लगाने की हिदायतों वाली सीडियाँ! वे युद्ध के लिए सन्नद्ध हैं!

भीषण युद्ध है यह। दुश्मन ताकतवर है, दिमागी लड़ाई में कभी-कभी गलत तरीके भी इस्तेमाल किए जाते हैं मगर अक्सर विजय मस्तिष्क की ही होती है!

इस तरह आप अपने दिमाग को पालतू नहीं बना सकते। क्वचित आपको लगेगा कि आपने उसे साध लिया है लेकिन अगली बार कोशिश करने पर आपको पता चलेगा कि आप ऐसा नहीं कर पाए हैं। लेकिन मैं आपको एक अलग, आसान सा तरीका बताता हूँ: अपने दिमाग को खुला छोड़ दीजिए, मुक्त कर दीजिए!

आपको संघर्ष करने की या युद्ध करने की ज़रुरत नहीं है! आपकी रोज़मर्रा ज़िंदगी में पर्याप्त संघर्ष है और इसीलिए तो आप शरीर और मस्तिष्क की विश्रांति के लिए ध्यान का सहारा लेना चाहते हैं! तो फिर उसे आराम करने दें! आपका लक्ष्य होना चाहिए कि आप वर्त्तमान में रहें-लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि आपको चटाई पर बैठकर पद्मासन लगाना ज़रूरी ही है!

हाँ, आप जो चाहें करते हुए ध्यान कर सकते हैं, सबेरे घूमते हुए, तैरते हुए, पढ़ते हुए, पेंटिंग करते हुए, यहाँ तक कि अपना कोई काम निपटाते हुए। बस, जो भी कर रहे हैं, उसमें अपने आप को पूरे मन से संलग्न कर लें। बहुत से काम एक साथ न करें, कोई एक काम करते हुए सैकड़ों दूसरे कामों के बारे में न सोचें कि यह भी करना है और वह भी करना है, बल्कि अपने पूरे अस्तित्व के साथ जो उस पल कर रहे हैं, उसके साथ संलग्न कर लें। अगर आप पेंटिंग कर रहे हैं तो सिर्फ रंगों के बारे में सोचें, सबेरे घूमने निकले हैं तो हवा में मौजूद खुशबुओं को महसूस कीजिए, गहरी साँस लीजिए, अपने शरीर में लीन रहिए, अगर कोई सामान्य सा काम भी कर रहे हैं तो उस काम में पूरी तरह संलग्न रहें। यही वास्तविक ध्यान है-जब आपको हर क्षण सिर्फ यह पता होता है कि आप क्या कर रहे हैं, चाहे वह कोई भी काम हो!

अगर आप मस्तिष्क के साथ लगातार युद्ध की तैयारी में लगे रहेंगे तो वह कभी भी विश्रांति प्राप्त नहीं कर पाएगा! अपने मस्तिष्क के साथ शांति कायम करें और आप देखेंगे कि आपका मस्तिष्क भी शांत हो रहा है, उसे विश्रांति प्राप्त हो रही है! लड़ें नहीं-उसे खुला छोड़ दें, आज़ाद कर दें!

एक सामान्य मगर त्रुटिपूर्ण समझ: ध्यान मस्तिष्क को नियंत्रण में रखना है – 9 मार्च 2015

कुछ दिन पहले आश्रम में आयुर्वेद-योग विश्रांति शिविर हेतु एक महिला आई थी। उसे आशा थी कि न सिर्फ यहाँ उसे शारीरिक समस्याओं से निजात मिलेगी बल्कि उसकी अप्रसन्नता का इलाज भी हो सकेगा, जिसके बारे में वह जानती थी कि वह उसकी मनोवैज्ञानिक समस्या है। लेकिन जब मैंने उससे बात की तो इस समस्या के निदान हेतु मेरी सलाह सुनकर वह आश्चर्य में पड़ गई।

दरअसल उस महिला का विचार था कि यहाँ आकर वह दैनिक योग-कक्षाओं में शामिल होगी, मालिश करवाएगी और सबसे बड़ी बात मस्तिष्क को काबू में रखने के लिए ध्यान सीखेगी और उसका अच्छा अभ्यास कर लेगी। लेकिन, मैंने खास तौर पर इसके ठीक विपरीत बात उससे कही: मैंने कहा, अपने मस्तिष्क को स्वतंत्र विचरण करने दो! इसे मैं कुछ विस्तार से आपके सामने रखना चाहता हूँ।

बहुत से लोग पहले से जानते हैं कि उनकी अप्रसन्नता का कारण कोई बाहरी चीज़ नहीं है। वे इस तथ्य से परिचित होते हैं कि उनका खुद का मन है, जो उन्हें प्रसन्न नहीं रहने देता, उनके पड़ोसी, बॉस, साथी और सहायक या उनका काम या व्यवसाय नहीं। वे इतना पढ़ चुके होते हैं कि जानते हैं कि उन्हें खुद प्रयास करना होगा, खुद को भीतर से बदलना होगा क्योंकि वे दूसरों को वैसे भी बदल नहीं सकते। अधिकतर लोग सोचते हैं कि इसका इलाज ध्यान में उपलब्ध है और वे गलत नहीं समझते।

गलत वे यह समझते हैं कि इसके इलाज लिए उन्हें मस्तिष्क को काबू में रखना सीखना चाहिए।

विचार-नियंत्रण या मस्तिष्क-नियंत्रण: मुझे लगता है कि यह शब्द-युग्म ही दर्शाता है कि मैं क्यों उसे नापसंद करता हूँ। क्या यह अच्छी बात होगी? स्पष्ट ही, नहीं! किसी दूसरे व्यक्ति का मस्तिष्क नियंत्रित करना ही नहीं बल्कि खुद अपना मस्तिष्क नियंत्रित करना भी! यह एक आम गलत धारणा है कि ध्यान का उपयोग मस्तिष्क नियंत्रण में किया जाता है। लेकिन नहीं- ध्यान आपको विश्रांति पहुँचाता है! तो विश्रांति प्राप्त करें क्योंकि आपको किसी नियंत्रण की जरूरत नहीं है, विश्रांति प्राप्त करें क्योंकि आप इस समय इसी पल में अवस्थित हैं और सोचते-समझते हुए, पूरे होशोहवास के साथ हैं। वैसे भी हर वक़्त पूरे नियंत्रण में रहने का सवाल नहीं है, जबकि अधिकतर लोग पूरी शक्ति के साथ ठीक यही करने का प्रयास कर रहे होते हैं और इस पर कुछ ज़्यादा ही शक्ति खर्च कर देते हैं!

ठीक यही मामला उस महिला का भी था, जिससे मेरी बात हुई: वह हर उस परिस्थिति पर विचार करती, जो उसके सामने पेश आई है, उसका विश्लेषण करती और निष्कर्ष निकालने की कोशिश करती और फिर उसके आधार पर भविष्य में पेश आने वाली संभावित परिस्थितियों पर विचार करती। उसके बाद उसके विचार से जो हो सकता है, उसके लिए वह वर्तमान परिस्थितियों को प्रभावित करती और यहाँ तक कि दूसरों के कामों को नियंत्रित करने की कोशिश भी करती। परिणामस्वरूप, लोग उससे नाराज़ हो जाते, वह स्वयं अपने आप से नाखुश रहती और सबसे बड़ी बात, उसका मस्तिष्क हर वक़्त इतना व्यस्त रहता कि उसे मानसिक तनाव की समस्या का सामना करना पड़ता और लगातार अवसाद की स्थिति पैदा हो जाती।

इस परिस्थिति का सामना करने वाली वह अकेली नहीं थी! अगर आप अपने आपको थोड़ा सा भी इस स्थिति में पाते हैं तो मेरा कहना है कि ध्यान आपको लाभ पहुँचा सकता है-लेकिन अपने मस्तिष्क पर नियंत्रण रखकर नहीं। मैं जानता हूँ कि आप सोच रहे होंगे कि आखिर मस्तिष्क ही तो है जो बार-बार हर संभावित दिशा में बहकता रहता है और ऐसी परिस्थिति के निर्माण का कारण बनता है। अगर आप सोचते हैं कि एक बात पर मस्तिष्क को एकाग्र करके आप उसे ऐसा करने से रोक सकेंगे तो यह आपकी भूल है। बल्कि इसका उल्टा होगा-वह और अधिक बहकेगा!

आपके शरीर के बिना आपके मस्तिष्क का कोई अस्तित्व नहीं है। इसलिए कुछ भी हो जाए, वह बार-बार वापस उसी बात पर आएगा। मस्तिष्क जहाँ-जहाँ भटकता है, आपको उधर भटकने की जरूरत नहीं है। स्थिर रहकर जो आप कर रहे हैं, करते रहिए और वह फिर भी वापस आएगा। लेकिन ऐसा करके आप अपने मस्तिष्क को खुला, स्वतंत्र छोड़ देते हैं और उसकी ओर ध्यान नहीं देते। इसके विपरीत आप अपने काम में ध्यान दे रहे होते हैं-चाहे खाना पका रहे हों, नृत्य कर रहे हों, काम कर रहे हों, पढ़-लिख रहे हों या सिर्फ टहल ही क्यों न रहे हों। आप देखेंगे कि ऐसा करने पर आपका मस्तिष्क इधर-उधर न बहकने का आदी होता जाता है!

समय बीतने के साथ आप नियंत्रण में न रहकर प्रसन्न होंगे बल्कि अपनी मर्ज़ी से जो कर रहे हैं, वही करते रहेंगे। यही ध्यान है: किसी पल में आप जो कर रहे हैं, उसे जानते हुए, उसके बोध के साथ उसे करना। और इसका किसी अनिवार्य या जबर्दस्त मस्तिष्क-नियंत्रण से कोई संबंध नहीं है-खुद आपके अपने मस्तिष्क पर नियंत्रण से भी नहीं!

ध्यान कैसे करें-एक ऐसी चीज़ का मार्गदर्शक (गाइड) जिसके लिए मार्गदर्शन की ज़रूरत ही नहीं है- 14 नवंबर 2013

कल मैंने कहा था कि सभी व्यक्ति ध्यान कर सकते हैं। आज मैं उसी बात को ज़रा विस्तार देते हुए ध्यान के संबंध में कुछ हिदायतें और सलाहें देना चाहता हूँ। बात अनोखी लगती है, न? लेकिन मैं मानता हूँ कि विचारशून्यता ध्यान करने का सही लक्ष्य नहीं है और फिर ध्यान आप इसलिए नहीं करते कि आप किसी असंभव लक्ष्य को प्राप्त कर सकें। लेकिन संभव है, कुछ लोग ऐसे भी हों, जो सोच रहे होंगे कि "किसी क्रिया में पूरी तरह उपस्थित" होने का अर्थ क्या है और उसे कैसे हासिल किया जा सकता है।

मेरे विचार में विचारशून्यता प्राप्त करना असंभव है इसलिए उस स्थिति को प्राप्त करने का प्रयास ही व्यर्थ है। लेकिन किसी खास वक़्त पर "अपने काम में पूरी तरह उपस्थित" रहने के लिए आपको आसपास के सारे शोर को अपने कानों से दूर रखना होगा। आपके भीतर प्रवेश करने वाली चीजों को कम से कमतर रखने का प्रयास करना होगा और इसका अभ्यास करना होगा कि आपके मस्तिष्क को अधिकांश बातों का विश्लेषण करने की आवश्यकता ही न पड़े। अपने मस्तिष्क को सिर्फ एक काम पर एकाग्र करने का प्रयास करें। सभी विचार उसी एक काम के विषय में हों। अब आप इन विचारों के विषय में लगभग अनभिज्ञ रहेंगे क्योंकि वे आपके काम के साथ इस तरह घुलमिल जाएंगे कि आप उस काम पर बेहतर तरीके से एकाग्र हो पाएंगे और सहज ही आपकी रचनात्मकता बढ़ जाएगी तथा थकावट भी नहीं होगी।

क्या आपको इसमें कोई दिक्कत महसूस हो रही है? अगर हो रही है तो आश्चर्य नहीं है क्योंकि जैसा मैं बता रहा हूँ, अधिकांश लोग अपने व्यस्त दैनिक जीवन में उससे बिलकुल विपरीत कर रहे होते हैं। उनके दिमाग में हर वक्त एक साथ कई काम घूमते रहते हैं! विभिन्न विषयों पर कई माध्यमों से आने वाली जानकारियों को ग्रहण करना महत्वपूर्ण होता है, इन सभी जानकारियों को एक साथ विश्लेषित कर पाने की ऊंची कीमत है और जितनी कुशलता से विभिन्न जगहों से आती हुई इन जानकारियों को आपका मस्तिष्क ग्रहण और विश्लेषित कर पाता है उतना ही आपको प्रतिभाशाली माना जाता है। लेकिन, दरअसल ऐसी परिस्थिति में ही आपको "किसी क्रिया में पूरी तरह उपस्थित" हो पाने की इस योग्यता की आवशयकता पड़ती है! अगर आप समझते हैं कि आपको इसके अभ्यास के लिए कुछ व्यायामों की आवश्यकता है तो मैं नीचे कुछ व्यायाम बता रहा हूँ, जिन्हें अपने सेमीनारों और कार्यशालाओं के जरिये मैंने दुनिया भर में सफलतापूर्वक आजमाया है:

एक पेन और कागज लें और एक अलार्म क्लॉक को तीन मिनट के लिए सेट कर दें। अब उन तीन मिनटों में जो भी विचार आपके मन में आ रहे हैं, उन्हें संक्षिप्त में (keywords में) नोट करते जाएँ। इस बात का विचार बिल्कुल न करें कितने विचार आने चाहिए और कागज पर पूरे-पूरे वाक्य लिखने की ज़रूरत नहीं है, उनके पहले शब्द या अक्षर भी पर्याप्त होंगे, जिनसे आप बाद में उन विचारों को याद कर सकेंगे। तीन मिनट बाद रुक जाएँ।

इस लिस्ट पर नज़र दौड़ाने पर आप पाएंगे कि शायद आपके मस्तिष्क में एक साथ बहुत ज़्यादा विचार आते हैं! अधिकतर बिल्कुल गैरज़रूरी होते हैं और आपकी लिस्ट ऐसी नज़र आती होगी: पार्टनर (जीवन-साथी), बच्चे, बढ़िया सप्ताहांत, टमाटर सौस के धब्बे, काम, बर्तन धोने का साबुन, पिछड़ गई योजनाएँ, धोने वाले कपड़ों का अंबार, पड़ोसी की बिल्ली…. और मच्छर!…

इनमें से उन्हें काट दें जो बिल्कुल गैरज़रूरी विचार हैं और सिर्फ दस महत्वपूर्ण विषयों को विचार करने के लिए रखें। इसी खेल को फिर दोहराएँ और अब सिर्फ इन्हीं दस विचारों पर अपने ध्यान को केन्द्रित करने की कोशिश करें-मस्तिष्क पर नियंत्रण रखने की कोशिश करें कि वे इधर-उधर भटकने न पाए। क्या कुछ बात बनी? अब फिर से कम महत्वपूर्ण पाँच विषयों को बाहर करें और बचे हुए पाँच पर ध्यान केन्द्रित करने का प्रयास करें। इसी प्रक्रिया को तब तक दोहराएँ जब तक आपके पास सोचने के लिए सिर्फ एक विषय ही न रह जाए! तब आप "अपने काम में पूरी तरह उपस्थित" होंगे!

स्वाभाविक ही यह व्यायाम आप शांतिपूर्वक एक स्थान पर बैठकर करेंगे, ध्यान के लिए जिसकी अनिवार्यता मैंने पहले ही खारिज कर दी है। लेकिन एक बार इस तरह एकाग्र होकर, ध्यान भंग करने वाले विचारों को दूर रखने का अभ्यास हो जाने पर आप यही चीज़ खाना बनाते हुए या टहलते हुए या मित्र के साथ बात करते हुए भी कर सकते हैं। पुस्तक पढ़ते समय बरतन धोने के साबुन का विचार मन में न आने दें! फिर साबुन खरीदते समय उस पुस्तक का विचार न करें! यह सुनिश्चित करें कि जब आप पढ़ें तो पूरी सजगता के साथ पढ़ें-तब आप पुस्तक ज़्यादा आनंद उठा पाएंगे! और जब ख़रीदारी करें तो पूरी सजगता के साथ ख़रीदारी करें-इससे आप भूलेंगे नहीं कि आपको क्या-क्या चीज़ें खरीदनी है और आपको बार-बार बाज़ार नहीं जाना पड़ेगा! वह आनंददायक होगा क्योंकि आप "उस क्रिया में पूरी तरह उपस्थित" होंगे!

कोशिश कीजिए, आप नोटिस करेंगे कि इस उपाय से सफलता मिलती है। ध्यान करने का यह तरीका समय का बेहतर उपयोग करने में आपकी मदद करता है, आप उस पल को महसूस कर सकेंगे और देखेंगे कि काम कोई भी हो, आप उसमें बहुत एकाग्रता के साथ प्रवेश कर पा रहे हैं!

ध्यान-योग कोई रहस्य नहीं है लेकिन परेशानी यह है कि आप ऎसी चीज़ नहीं बेच सकते, जो सबको उपलब्ध हो-13 नवंबर 2013

मुझे अंदेशा है कि मेरे कल और परसों के ब्लोगों को पढ़कर मेरे कुछ पाठक संशय में पड़ गए होंगे। वे सोच रहे होंगे कि पहले मैंने अपना गुरु का जीवन त्यागा, फिर धर्म त्यागा और नास्तिक हो गया और अब ध्यान और योग के विरुद्ध भी लिखना शुरू कर दिया है! मैं ज़ोर देकर कहना चाहता हूँ कि ऐसी बात बिल्कुल नहीं है! जिस तरह ध्यान का प्रचार किया जाता है, उससे मेरी असहमति है। ऐसा ज़ाहिर किया जाता है कि ध्यान कुछ विशेष, चुने हुए आध्यात्मिक लोगों के लिए ही है, जबकि मैं यह सलाह देता रहता हूँ कि सभी इसे करें। मैं स्वयं इसे पसंद करता हूँ लेकिन मेरे लिए इसकी परिभाषा बिल्कुल भिन्न है! मैंने कुछ ब्लॉग भी ध्यान-योग के संबंध में लिखे हैं, जिसमें मैंने स्पष्ट किया है कि मेरे लिए ध्यान का अर्थ क्या है। आज भी उसी संबंध में यह ब्लॉग लिख रहा हूँ।

सबसे पहले मैं एक वाक्य में यह परिभाषा दे रहा हूँ: अंग्रेज़ी में मेडिटेशन, हिन्दी और संस्कृत में ध्यान वह अभ्यास है, जिसमें आप पूरी तरह वर्तमान में होते हैं, 100% जाग्रत होते हैं, हर तरह से वाकिफ कि आप क्या कर रहे हैं।

कभी भी मैं यह नहीं कहता कि ध्यान का लक्ष्य विचारशून्यता है। मैं यहाँ तक मानता हूँ कि ध्यान का अभ्यास करने के लिए आपको किसी खास आसन में बैठने की आवश्यकता नहीं है और न ही किसी विशेष श्वसन तकनीक या किसी और चीज़ की। आप अपना काम करते हुए भी ध्यानस्थ हो सकते हैं या बातचीत, चित्रकारी करते हुए या खेलते हुए और यहाँ तक कि संभोग करते हुए भी! आपको उस वक़्त पूरी तरह वहाँ होना चाहिए, वर्तमान में; भविष्य में नहीं और न अतीत में। उस क्रिया में पूरी तरह उपस्थित, बस यही मेरे लिए ध्यान है।

मुख्य बात यह है कि हर कोई ध्यान कर सकता है! आपको विशिष्ट होने की ज़रूरत नहीं है! यह सभी के लिए सहज सुलभ है और किसी भी वक़्त। ध्यान के लिए वर्षों के अभ्यास की आवश्यकता नहीं है और न ही आपमें किसी कलात्मक प्रतिभा का होना आवश्यक है। यह कोई जटिल क्रिया नहीं है और इसे करने के लिए आपको किसी लॉरी को दांतों से खींचने या लोहे की राड को हाथों से मोड़ने का करिश्मा दिखाने की ज़रूरत नहीं है! आप, जी हाँ आप भी इसे कर सकते हैं!

अब यह बताएं कि क्या यह अच्छा नहीं होगा कि आप जानें और आपका पड़ोसी न जाने? उसमें कुछ रहस्य या पेचीदगी हो तो क्या वह ज़्यादा रोचक नहीं हो जाएगा? यही वह विचार है जिसे गुरु और ध्यान का व्यापार करने वाले पसंद करते हैं और रुपया कमाते हैं! वे चाहते हैं कि आप न सिर्फ कुछ खास बल्कि अपने आसपास के लोगों से बेहतर महसूस करें और इसलिए वे ध्यान को कुछ विशिष्ट और जटिल बनाकर पेश करते हैं!

उनका यह व्यवहार, दरअसल, आपके अहं को बढ़ाने के लिए होता है न कि उसे कम करने के लिए! तो, जब आप पंद्रह मिनट तक ध्यान करते हैं तो आप चेतना की उच्च अवस्था में होते हैं! तो, आपको पहले वहाँ जाना पड़ता है और फिर एक खास मुद्रा में आसन लगाना होता है, आपको एक विशिष्ट वातावरण चाहिए और आप उसे धीरे-धीरे बढ़ाते हुए एक घंटे तक कर सकते हैं! फिर दिन के बचे हुए 23 घंटे आपकी चेतना कहाँ मंडराती रही? नीचे ज़मीन पर, अलसाई हुई, जैसे बाकी सभी लोगों की चेतना पड़ी होती है? इसलिए आप इस एक घंटे तक खुद को विशिष्ट समझने लगते हैं और अपने भीतर शांति का अनुभव करते हैं, व्यापक ब्रह्माण्ड के साथ एकाकार! लेकिन आप सारा दिन आनंद की उसी अवस्था में क्यों नहीं रह सकते?

जी हाँ, आप ध्यानस्थ होकर भी दिन के 24 घंटे अपना काम कर सकते हैं, खेल सकते हैं, किताब पढ़ सकते हैं और जो मर्ज़ी हो, वह कर सकते हें। आपको बिना एक स्थान पर बैठे, बिना विचारशून्यता को प्राप्त किए, लगातार आनंदमग्न रहना चाहिए!

स्वाभाविक ही, कोई गुरु आपको इतना बड़ा रहस्य नहीं बताएगा अन्यथा वे उस आश्चर्य मिश्रित प्रशंसा से वंचित हो जाएंगे, जो आपसे उन्हें प्राप्त होती है। ऐसा करने से उनका धंधा चौपट हो जाएगा! लेकिन सच्चाई यही है कि आप भी ध्यान कर सकते हैं। आपको सिर्फ सजग रहना है, चैतन्य रहना है, विचारशून्य नहीं!

ध्यान कोई कला नहीं है लेकिन ध्यान का प्रदर्शन करने वाले कलाकार अवश्य हैं! 12 नवंबर 2013

कल मैंने बताया था कि क्यों अपने मस्तिष्क को पूरी तरह रिक्त कर पाना या कुछ भी न सोचना असंभव है, जबकि लोग इसे ही ध्यान का लक्ष्य मानते हैं। आज मैं कुछ लोगों द्वारा इसी ध्यान की सहायता से प्राप्त उपलब्धियों के बारे में लिखना चाहता हूँ। लेकिन मैं यह भी बताऊंगा कि कैसे ये लोग सिर्फ कलाकार हैं, ध्यान-योगी नहीं।

मुझे विश्वास है आप लोगों ने भी इस तरह के चमत्कार अवश्य देखे होंगे, कम से कम टीवी पर तो अवश्य: एक व्यक्ति लोहे की मोटी राड को अपने हाथों से मोड़ देता है, एक महिला बहुत सी ईंटों को खड़ी हथेली से एक ही वार में चूर-चूर कर देती है या एक आदमी रस्सी बांधकर अपने दांतों से एक ट्रक को खींच लेता है। अति-एकाग्रता की ताकत से ऐसे कई और रेकार्ड-तोड़ करिश्मे किए जाते हैं और ध्यान-योगी गुरु इन करिश्मों के बारे में दावा करते हैं कि यह ध्यान-योग की ताकत से ही किया जा सकता है! इसके पीछे उनका सिद्धान्त यह होता है कि आप अपनी सारी ऊर्जा को एक बिन्दु पर एकाग्र कर लेते हैं, जहां से उसका मनचाहा उपयोग किया जा सकता है और इस शक्ति से अतिमानवीय और अलौकिक कामों को भी अंजाम दिया जा सकता है!

मैं इस बात को नहीं मानता। मैं इन करामातों में किसी आध्यात्मिक या यौगिक शक्ति का हाथ नहीं देखता। यह एक प्रदर्शन है, शायद इन लोगों का धंधा और इसमें कोई बुराई नहीं है। यह, मेरी नज़र में एक तरह की कला है। आप इसका अभ्यास करते हैं और ऐसी उपलब्धि प्राप्त कर लेते हैं जो हर कोई प्राप्त नहीं कर सकता। आप अभ्यास के उस मरहले पर पहुँच चुके हैं जो आपको ऐसा कुछ अनोखा करने की योग्यता प्रदान करता है, जो लोगों को अचंभित करता है।

अब अगर आप कहेंगे कि यह योग के चलते है तो मैं आप से सहमत नहीं हो सकता। मैं यह भी नहीं कहुंगा कि ये लोग ध्यान-योग नहीं सीखते। सीखते होंगे लेकिन सिर्फ ध्यान को ही पूरा श्रेय देकर आप इन मेहनतकशों के अभ्यास और लगन के साथ अन्याय करते हैं और ध्यान-योग को इतना महिमामंडित कर देते हैं, जैसे ऐसे मुश्किल और अभूतपूर्व कारनामे वे कर पा रहे हैं तो सिर्फ ध्यान-योग के बल पर! सिर्फ वही ऐसे कारनामे अंजाम दे सकते हैं, जिन्होंने सालों हिमालय की गुफाओं में ध्यान का अभ्यास किया हो, जो किसी खास परिवार में पैदा हुए हों और जिन्होंने अतींद्रिय शक्तियाँ प्राप्त कर ली हों। जिन्हें बोध हो चुका हो। जिन्हें ज्ञान प्राप्त हो चुका हो। ऐसा प्रचार करके आप लोगों को यह संदेश देते हैं: ये लोग महान लोग हैं और ध्यान-योग की वर्षों की तपस्या के बाद इस ऊंचाई पर पहुंचे हैं और सामान्य लोगों के लिए ऐसे कामों को अंजाम देना यानी ध्यान की इस अवस्था को प्राप्त करना लगभग असंभव है।

जब भी आप लोगों को ऐसा कहते सुनें या इस दिशा में आपको इंगित करने की कोशिश करता हुआ पाएँ तो आप देखेंगे कि वे आपको ध्यान-योग के अपने तरीके की ओर मोड़ना चाहते हैं, जिससे आप उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उनकी सलाह खरीदने के इच्छुक हों। जब भी आप योग के माध्यम से शक्तिशाली या अधिक कार्यक्षम बनने की अभिलाषा व्यक्त करेंगे, आप ऐसे गुरुओं को अपने मार्गदर्शन के साथ उपस्थित पाएंगे। वे आपको अपने इच्छित कामों को अंजाम देने की शक्ति प्रदान करने का दावा करेंगे, यहाँ तक कि अलौकिक शक्तियां उपलब्ध कराने का भी, बशर्ते आप कुछ अतिरिक्त श्रम कर सकें, लगन के साथ प्रयास करें।

लेकिन मैं उनसे सहमत नहीं हो सकता।

ध्यान-योग कोई कला नहीं है, जिससे इच्छित लाभ पाने के लिए या जिसका अभ्यास करने के लिए आपको बहुत श्रम करना पड़े। ध्यान कोई ऐसी चीज़ नहीं है, जिसे सिर्फ कुछ चुने हुए लोग ही कर सकते हों। ध्यान सबके लिए है और जबकि वह आपके मस्तिष्क को एकाग्र करने में सहायक हो सकता है, वह ऐसी चीज़ नहीं है जिसका सड़क पर या स्टेज पर किसी शो में प्रदर्शन किया जाए।

कल आपको विस्तार के साथ बताऊंगा कि मैं स्वयं ध्यान के बारे में क्या सोचता हूँ।

ध्यान में विचारशून्यता की बात महज भ्रम है या व्यापार कौशल! 11 नवंबर 2013

मैं समझता हूँ कि आप लोगों ने ध्यान की एक प्रचलित परिभाषा सुनी होगी, जो मेरे विचार में गलत परिभाषा है। लोग अक्सर कहते हैं कि ध्यान मन (मस्तिष्क) को विचारशून्यता की स्थिति में लाने का अभ्यास है। यह ऐसी स्थिति है जब आप कुछ भी सोच नहीं रहे होते, आपका मस्तिष्क जब पूरी तरह रिक्त हो जाता है। मेरा मानना है कि ऐसा संभव ही नहीं है। इससे भी आगे बढ़कर मैं कहना चाहूँगा कि इस विचार का उपयोग आजकल पैसा कमाने में किया जा रहा है!

यह संभव ही नहीं है। क्या आप कभी ऐसी स्थिति में पहुँच सके हैं? मैं नहीं समझता कि ऐसा हो सकता है। क्या आप ऐसे किसी व्यक्ति से मिले हैं, जो यह दावा करता है? अगर ऐसा कोई व्यक्ति है तो फिर इसका प्रमाण क्या है? कौन इस बात की जांच करेगा कि उसका दावा सही है? यह ऐसा ही दावा है जैसा कि लोग कहते हैं कि ईश्वर का अस्तित्व है या वह हर जगह मौजूद है-आप उसे देख नहीं सकते, आप उसे छू नहीं सकते, फिर कैसे कहा जा सकता है कि वह है? इस बात का प्रमाण कहाँ है कि ईश्वर है या इस बात का कि आप पूर्ण विचारशून्यता की अवस्था प्राप्त कर सकते हैं?

सोचने के लिए यह खयाल रुचिकर हो सकता है लेकिन कार्यरूप में यह असंभव है। इस ‘रिक्त-मस्तिष्क’ वाली स्थिति प्राप्त करने के अभ्यास की पहली सीढ़ी क्या है? आपको शून्य पर ध्यान केन्द्रित करना होता है! आप अपने मस्तिष्क को उस बिन्दु तक ले जाते हैं जहां आप कुछ नहीं सोचते। लेकिन कुछ न कुछ तो होगा ही, भले ही वह अतिसूक्ष्म विचार हो, यही कि कुछ नहीं सोचना है!

इसे इस प्रकार देखें: आपका पेट है, खाद्य पदार्थों को हजम करने के लिए और उसके लिए भोजन चाहिए। आपकी आँख बनी हैं, देखने के लिए और उन्हें देखने के लिए कुछ चाहिए। आपके कान आवाजों को सुनने के लिए बने हैं और आवाज़ चाहिए, जिन्हें वे सुन सकें। आपका मस्तिष्क बना है सोचने के लिए और यह आवश्यक है कि वह सोचे। उसके बगैर उसका अस्तित्व ही संभव नहीं है। मस्तिष्क में किसी न किसी विचार का होना अवश्यंभावी है। अगर आप भोजन नहीं करेंगे तो आप भूखे मर जाएंगे। अगर आप सोचेंगे नहीं तो क्या होगा? आपका मस्तिष्क बिना विचार के ज़िंदा बच नहीं सकता।

चाहे जितना अच्छे शब्दों में इस बात को प्रस्तुत किया जाए, एक प्रश्न बरकरार रहेगा: आप अपने मस्तिष्क को इतनी पीड़ा क्यों पहुंचाना चाहेंगे? मस्तिष्क का विचार से सीधा संबंध है और मस्तिष्क को विचार से दूर रखना उसे उसकी खुराक से वंचित कर देना है! इसके विपरीत आप उसे कोई बढ़िया पोषक-तत्व क्यों नहीं मुहैया कराते? सोचना, विचार करना बहुत अच्छी बात है। अपने मस्तिष्क को कुपोषण का शिकार न बनाएँ-और अपने विचारों को समाप्त करने का प्रयास करते हुए उसे विचारशून्य बनाने की कोशिश करना एक तरह की मूर्खता और उसके प्रति लापरवाही के सिवा कुछ नहीं है।

फिर क्यों लोग आपसे कहते हैं कि यह आपका लक्ष्य होना चाहिए? क्योंकि वे अपना व्यापार चलाना चाहते हैं। इससे ज़्यादा अच्छा धंधा क्या होगा कि जिस चीज़ की इच्छा आप अपने ग्राहक के मन में पैदा कर देते हैं वह चीज़ आप उसे कभी देते नहीं हैं और न वह कभी उसे प्राप्त कर पाएगा और फिर भी वह उसे थोड़ा बहुत प्राप्त करने की आस में आपके पास बराबर आता रहेगा। आपको बताया जाता है कि एक ऐसी अवस्था, जो किसी भी तरह प्राप्त नहीं की जा सकती, आपको अतीव आनंद से भर देगी। अब आप उसके लिए मरे जा रहे हैं, उसे मुंहमांगी कीमत पर खरीद रहे हैं कि किसी तरह उस लक्ष्य तक पहुँच सकें। ये वही लोग हैं, जो भगवान बेचते हैं, जो हवा में से भभूत या सोना निकालने का चमत्कार बेचते हैं, जो कि कोई भी समझ सकता है कि संभव नहीं है। वही लोग अब कुछ ज़्यादा होशियार हो गए हैं और अब ध्यान-योग बेच रहे हैं। उनके ग्राहक एक ऐसे चक्रव्यूह में प्रवेश कर रहे होते हैं, जहां से बाहर निकल पाना मुश्किल है, ऐसी चीज़ पाने की कोशिश, जो प्राप्त होना असंभव है, एक ऐसा लक्ष्य जिसे हासिल करने का दावा वह गुरु करता है।

लेकिन इसमें इन गुरुओं की गलती नहीं होती क्योंकि अधिकतर योग और ध्यान-योग के गुरु यह विचार इसलिए प्रचारित करते हैं कि उन्हें भी उनके गुरु द्वारा मूर्ख बनाया गया होता है कि यह मस्तिष्क की कोई अद्भुत और दुर्लभ अवस्था है। सच बात तो यह है कि बहुत कम लोग मुझे मिले, जो यह दावा करते हैं कि उन्होंने विचारशून्यता की यह अवस्था वास्तव में प्राप्त की है। कुछ लोग भ्रमित होते हैं और कहते हैं कि शायद एकाध मिनट के लिए यह अवस्था उन्होंने प्राप्त की है। मगर अधिकतर लोग यह ईमानदारी के साथ स्वीकार करते हैं कि वे इस लक्ष्य को प्राप्त करने से कोसों दूर हैं। वे पूरा प्रयास कर रहे हैं मगर अभी वहाँ पहुंचे नहीं हैं। अपनी इस हालत पर उन्हें संकोच होता है, बुरा लगता है और वे अपने आपको उन लोगों से कमतर आँकते हैं, जो इस विचारशून्यता की अवस्था को प्राप्त करने का दावा करते हैं।

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप दूसरों से यह कहते हैं या किसी दूसरे से यह बात सुनते हैं। थोड़ा समय निकालकर मेरी बात पर गौर करें और फिर ध्यान करते समय विचारशून्यता प्राप्त करने का प्रयास करने के स्थान पर कोई अच्छी बात सोचें, कोई अच्छा विचार मन में रखें!

इस विषय पर इस ब्लॉग द्वारा आपके मन में थोड़ी सी हलचल पैदा करने के बाद मैं कल ध्यान-योग से संबन्धित कुछ दूसरे पहलुओं पर बात करूंगा।

आप ‘ध्यान’ लगा रहे हैं या सिर्फ उसका दिखावा कर रहे हैं? – 5 अप्रैल 2013

वाह! कल की डायरी लिखते हुए मुझे अंदाज़ नहीं था कि मैं 'ध्यान' पर प्रश्नोत्तर प्रतियोगिता शुरू कर रहा हूँ! जहां एक ओर मेरे लिए खुशी की बात है कि अधिकतर लोग मुझसे सहमत हुए कि अपरा के साथ खेलते हुए समय बिताना समय बिताने का एक अच्छा तरीका है; वहीं कुछ लोगों ने प्रश्न उठाया कि क्या समय व्यतीत करने के इस तरीके को 'ध्यान' कहा जा सकता है। मैं 'अवस्थित' या 'ध्यानस्थ' कैसे रह सकता हूँ जबकि मुझे हर वक़्त इस बात का भी ध्यान रखना होता होगा कि वह गिर न पड़े, उसे चोट न लग जाए। यह भी कि स्वाभाविक रूप से अपरा के पीछे भागते हुए आप बहुत क्रियाशील होते हैं न कि बैठ कर अपने शरीर को विश्राम और मन को शांति पहुंचा रहे होते हैं, जैसा कि एक ध्यानस्थ व्यक्ति को करना चाहिए। मैं समझता हूँ, समय आ गया है कि मैं 'ध्यान' के बारे में पुनः अपने विचारों को विस्तार से प्रस्तुत करूँ।

पहले हम 'ध्यानस्थ' व्यक्ति की पारंपरिक और शास्त्रीय कल्पना को लें। ऐसा व्यक्ति पद्मासन लगाकर बैठता है, उसकी पीठ सीधी होती है, हाथ घुटनों पर ज्ञान मुद्रा में रखे होते हैं और अंगूठे और तर्जनी के पोर आपस में मिले होते हैं। 'ध्यान' के बारे में किंचित जानकारी रखने वाले किसी बच्चे को भी आप कहें तो वह इस 'ध्यान' मुद्रा का बड़ा आकर्षक प्रदर्शन आसानी के साथ कर देगा, बाकायदा ऊंचे स्वर में 'ॐ' शब्द का उच्चारण करते हुए। 'ध्यान' की यह एक मान्य कल्पना है।

ध्यानस्थ अवस्था में हमें क्या करना चाहिए इसकी भी एक बंधी-बंधाई रूढ़िबद्ध धारणा है। वह यह कि अपने सारे विचारों को स्थगित कर दो, मस्तिष्क को रिक्त करो, कुछ भी मत सोचो। यही वह आधारभूत धारणा है जिसके वशीभूत अधिकतर लोग यह सोचते हैं कि उनके लिए ऐसा कर पाना असंभव है। 'कुछ मत सोचो' ही वह आदेश है जो कुछ लोगों को डराता है और कुछ दूसरे लोगों के लिए एक चुनौती पेश करता है।

मुझे विश्वास है कि जिन्होंने गंभीरता से ध्यान लगाने का प्रयत्न किया है उन्होंने गौर किया होगा कि ध्यानस्थ होने का यह कोई जादुई नुस्खा नहीं है। अगर आपका रियाज़ नहीं है तो कुछ देर बाद ही इस मुद्रा में आपके पैरों और पीठ में दर्द शुरू हो जाता है और आपका मस्तिष्क अपने आपको विचारशून्य बनाने के स्थान पर अपनी मर्ज़ी के मुताबिक अपना काम करता रहता है। आप कसमसाने लगते हैं और अगर आप लोगों के बीच बैठे हैं तो आप कितना भी शांत बने रहना चाहें और सोचें कि अब आपको कुछ आराम मिल रहा है, खिंचाव के कारण अनजाने में कुछ गॅस अवश्य विसर्जित हो जाती है, जो लोगों को सुनाई देकर आपको हास्यास्पद स्थिति में पहुंचा सकती है।

मुझे लगता है हम सहमत होंगे कि यह ध्यान लगाने का कोई आदर्श तरीका नहीं है। मेरा विश्वास है कि जबकि ध्यान की यह छवि उसके प्रचार का एक लोकप्रिय विज्ञापन हो सकता है, है वह एक ढोंगी प्रदर्शन मात्र ही। ऐसे लोग भी हैं जिनके पास इस तरह ध्यान लगा सकने की शारीरिक और मानसिक शक्ति होती है और वे ऐसा बहुत समय तक भी कर सकते हैं मगर आम लोग, अगर उनमें ध्यान लगाने और उससे आत्मिक शांति प्राप्त करने की वाकई इच्छा है, तो कोई आसान तरीका ही पसंद करेंगे, अगर उन्हें पता हो कि ऐसा आसान तरीका भी हो सकता है।

जहां तक ध्यान लगाने की दूसरी विधियों का प्रश्न है इसकी कई विधियाँ हैं। एक है, नाद-ध्यान, जिसे हमारे मित्र थॉमस बहुत बढ़िया तरीके से करते हैं और जो संगीत के माध्यम से विश्रांति पहुंचता है और मस्तिष्क को एकाग्र करके उसे व्यर्थ विचारों से मुक्त करने में आपकी मदद करता है। दूसरा है, प्रकृति-भ्रमण, जिसके बारे में हमारे हिमालय भ्रमण पर निकले सहभागी मित्र आज रात आश्रम में वापस आकार हमें अवश्य बताएंगे ऐसा मुझे पूरा विश्वास है। तारों की छांव में या घने जंगल के सुनसान में पैदल चलना ध्यान का एक अनूठा तरीका हो सकता है, अगर आप वर्तमान में अवस्थित हो सकें। व्यायाम एक तरह का ध्यान हो सकता है और कला, पेंटिंग बनाना, जिसमें एक चित्र की रचना करते हुए आप अपनी कला में गुम हो सकते हैं। खाने का कोई पकवान बनाते समय, मसालों को अवचेतन में महसूस करते हुए आप उस पूरी प्रक्रिया में ध्यानस्थ हो सकते हैं। पौधा रोपते हुए, किताब पढ़ते हुए, यहाँ तक कि अपना कोई काम पूरी तल्लीनता के साथ करते समय भी आप ध्यानस्थ हो सकते हैं। जी हाँ, कंप्यूटर के सामने भी, शर्त यह है कि आपको उस खास क्षण में इस बात का इल्म होना चाहिए कि आप क्या कर रहे हैं।

जैसा कि मैंने बताया, जब आपको यह ठीक-ठीक पता होता है कि किसी एक क्षण में आप यथार्थ में क्या कर रहे हैं, तब मैं उसे ध्यानस्थ होना कहता हूँ। और जब मैं अपनी नन्ही बच्ची के साथ खेल रहा होता हूँ, जब वह इधर-उधर दौड़ती है और मैं उसके पीछे होता हूँ या वह कुछ भी कर रही होती है और मैं उसे ध्यान से देखता रहता हूँ तब मैं उस क्षण में होता हूँ, यह जानता हुआ कि मैं ठीक-ठीक क्या कर रहा हूँ। आपको अपरा जैसे किसी बच्चे के साथ होना चाहिए-जैसे ही आपका 'ध्यान' उससे हटा, उसने कुछ गलत हरकत की! और यही है सबसे बढ़िया 'ध्यान'।

क्या आप ध्यान साधना की अवधि से किसी की चेतना के स्तर को नाप सकते हैं? – 4 अप्रैल 2013

हमारे आश्रम में कुछ दिन पहले एक मेहमान आए थे। उनके साथ मेरी जो बातचीत हुई मैं उसे आपके साथ साझा करना चाहता हूँ। हम ध्यान के बारे में बात कर रहे थे, ध्यान साधना के बारे में मेरे विचार और उसके बारे में आम तौर पर प्रचलित या प्रचारित विचार और दोनों के बीच भेद।

मैं अपने मेहमान के पास बैठा और कुछ इधर-उधर की बातचीत के बाद उन्होंने पूछा, 'अच्छा बताइए, आप दिन भर में कितना समय ध्यान में व्यतीत करते हैं?' वे मेरी तरफ जिज्ञासु आँखों से देख रहे थे और लगता था कि वे एक प्रभावशाली उत्तर की अपेक्षा कर रहे हैं। वे अनुमान लगा रहे थे कि मैं कम से कम एक घंटा तो अवश्य ही ध्यान और चिंतन-मनन में व्यतीत करता हूंगा, क्योंकि वे स्वयं काम पर जाने से पहले ऐसा करते हैं।

मैं उनकी तरफ देखकर मुस्कुराया और बताया कि क्योंकि हमारी नन्ही बच्ची अपरा हमारे साथ है, मैं उसके साथ खेलते हुए ध्यान में मग्न हो जाता करता हूँ। मेरा सारा ध्यान और चिंतन-मनन उसके साथ होना, उसके साथ समय बिताना है । उसे हँसाना, उसके साथ खेलना, किस तरह वह गेंद या दीवार पर चढ़ते छिपकली के पीछे भाग रही है यह सब देखते हुए ही मेरी ध्यान साधना हो जाती है।

मैं देख रहा था कि उनका मुंह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया। कोशिश तो की, मगर मेरे इस ईमानदार उत्तर पर अपनी निराशा को वे छिपा नहीं पाए। मैं जानता हूँ कि उनके मन में यह विचार आ रहा है कि मैंने अपना आत्मनियंत्रण खो दिया है, कि मैं अपनी पहले अर्जित आध्यात्मिकता से बहुत नीचे आ गया हूँ। अपनी मानसिक स्थिति के बारे में मैं लापरवाह हो गया हूँ और यह भी कि उपयुक्त और धर्मसम्मत मार्ग से मैं भटक गया हूँ। अपने बारे में ऐसी बातें मैं पहले भी कई लोगों से सुन चुका था, इसलिए मुझे आश्चर्य नहीं हुआ।

ज़ाहिर है कुछ लोग मेरे विवाह या मेरी पत्नी जो एक पश्चिमी महिला हैं, को इसका दोष देने लगते हैं कि उसने इस आध्यात्मिक या धार्मिक व्यक्ति को बिगाड़ दिया और उसे उसकी आध्यात्मिक साधना से दूर कर दिया। जो ऐसा करते हैं वे नहीं जानते कि ध्यान साधना के बारे में हमेशा से मेरे विचार आम पारंपरिक विचारों से ज़रा हटकर रहे हैं। आम तौर पर यह धारणा है कि एक आध्यात्मिक व्यक्ति को विवाह नहीं करना चाहिए या बच्चे पैदा नहीं करने चाहिए।

लेकिन यह तो तब ठीक माना जाएगा जब आप ध्यान को किसी प्रतियोगिता ही तरह समझें। जो ध्यान लगाकर सबसे ज्यादा समय तक बैठ सकता है वह जीता! ऐसा व्यक्ति इस प्रतियोगिता में दूसरों से पहले ज्ञान प्राप्त कर लेगा या उसे ज्ञान प्राप्त हो चुका है! जो आधा घंटा भी एक मुद्रा में नहीं बैठ सकते वे तो अभी शुरुआत कर रहे हैं, हार चुके हैं, भौतिकवादी हैं और आध्यात्मिक व्यक्ति हैं ही नहीं!

मैं ध्यान साधना को बिल्कुल अलग दृष्टि से देखता हूँ। मैं नहीं समझता कि इसके लिए आपको पद्मासन लगाकर ही बैठना होगा, आँखें बंद करनी होंगी और गहरी सांसें ही लेनी होंगी। ध्यान का अर्थ है कि आपकी चेतना सदा वर्तमान में उपस्थित रहे, अतीत या भविष्य के बारे विचार स्थगित रखते हुए आपको बोध होना चाहिए कि आप उस क्षण क्या कर रहे हैं, कर भले ही कुछ भी रहे हों!

और ठीक यही मैं करता हूँ जब अपरा के साथ होता हूँ। आपके पास ध्यान लगाने के अलावा कोई मौका ही नहीं होता जब आप अपरा के साथ होते हैं क्योंकि वह उस क्षण आपका सारा ध्यान अपनी ओर खींचे रहती है। आपको उसे देखते रहना पड़ता है और आप वही अनुभव करते हैं जो वह अनुभव कर रही होती है। आप उसके चेहरे की ओर देखें तो आपको पता चल जाता है कि वह क्या सोच रही है। उसके साथ खेलना, बात करना, अपने विचारों की तरफ उसे आकृष्ट करना और अपनी दुनिया दिखाना; इन सब बातों का मुझ पर अद्भुत असर होता है जो ध्यान साधना ही है। इससे मुझे परम आनंद और असीम शांति का अनुभव होता है।

बहुत बड़ा साधक होने का दिखावा करने के लिए अगर मुझे दिन के कई घंटे किसी बंद कमरे के एकांत में रहना पड़े तो वह मेरी कमी महसूस करेगी और मैं भी उसे मिस करूंगा। अपनी बेटी के साथ होना ही मेरा ध्यान है और मैं प्रसन्न हूँ कि मैं उसके साथ इस तरह समय व्यतीत कर सकता हूँ और उसे और अपने आपको खुश कर पाता हूँ।