एक बच्चे की आँख से दुनिया को देखें और अपना तनाव शांत करें – 17 अगस्त 2015

जब आप अभिभावक बन जाते हैं तो आपके जीवन में और आपकी दिनचर्या में बहुत बड़ा परिवर्तन आ जाता है। समझिए, दुनिया ही बदल जाती है! आपका बच्चा हर वक़्त आपके सोच में मौजूद होता है और इसलिए मैं समझता हूँ कि जीवन के बारे में मेरे चिंतन-मनन और सोच-विचार के केंद्र में अक्सर अपरा मौजूद होती है। आज मैं इस विषय में एक उदाहरण देना चाहता हूँ: अगर हम दुनिया को उस तरह देखें, जिस तरह एक बच्चा देखता है तो हम वास्तव में अपने तनाव को बहुत कुछ कम कर सकते हैं!

अपनी बच्ची को खेलता हुआ देखकर मैं इस बिन्दु पर पहुँचा हूँ। क्या कभी आपने ऐसा होते हुए देखा है कि बच्चा खेल रहा है और तभी अचानक कुछ गलत हो जाता है और जैसे उसका सारा संसार ही भरभराकर कर ढह गया हो? एक कागज का सितारा अपरा का प्रिय खिलौना था और वह अक्सर उससे खेलती रहती थी। अभी कुछ दिन पहले उसका एक कोना टूटकर अलग हो गया और जैसे प्रलय आ गया हो! लेकिन तब तक ही जब तक रमोना ने एक रंगीन, चमकता, भड़कीला पीला टेप उस पर चिपकाने के लिए ढूँढ़ नहीं निकाला। फिर तो वह पहले से भी ज़्यादा बढ़िया हो गया!

अब एक वयस्क बन जाइए और मान लीजिए कि चीज़ें उस तरह नहीं हो रही हैं, जैसी उन्हें होना चाहिए। बच्चे की तरह निराशा में हाथपैर मत पटकिए- बल्कि उसे तुरत-फुरत ठीक करने की जुगत भिड़ाइए! मामले को लंबा मत खींचिए और आगे बढ़िए! समस्या का निदान ढूँढ़िए और भूल जाइए! क्या गलत था यह सोचते हुए अपने निर्णयों पर पछताने से कोई लाभ नहीं है क्योंकि उन्हें आप अब वापस लौटा नहीं सकते और यह बहुत से व्यर्थ तनावों का मुख्य कारण होता है!

एक बात और नोट कीजिए: बच्चे एक साथ बहुत से काम नहीं करते बल्कि एक काम पर ही पूरा ध्यान केन्द्रित करते हैं। वयस्क इस मामले में बच्चों से इस तरह अलग हैं कि वे हर वक़्त भूत और भविष्य के बारे में ही सोचते रहते हैं, बहुत सी योजनाओं के बारे में, तरकीबों, तिकड़मों के बारे में, जब कि कर कुछ और रहे होते हैं। नतीजा यह होता है कि आप कोई काम पूरा करना चाहते हैं लेकिन ध्यान-भंग की ऐसी हालत में आप उसे उचित समयावधि में या ठीक तरह से निपटा नहीं पाते। ये विचार पहले ही आपकी ऊर्जा नष्ट कर रहे होते हैं और फिर काम में होने वाली देर आपका तनाव और बढ़ाती जाती है। बच्चा बनने की कोशिश कीजिए- एक बार में सिर्फ एक पैर आगे बढ़ाइए!

लचीलापन लाइए, खोजबीन कीजिए। बच्चे हर वक़्त कुछ नया करने के लिए तैयार रहते हैं। वे जानते हैं कि किसी समस्या के और भी कई हल हो सकते हैं जिन्हें वे अभी तक आजमा नहीं सके हैं। आपके पास एक लाभ है- बच्चों के मुक़ाबले आप बेहतर स्थिति में हैं: आपके पास अनुभव है। लेकिन ज़्यादातर लोग इस अनुभव का नकारात्मक उपयोग करते हैं और उन्हीं, सैकड़ों बार आजमाई हुई बातों को दोहराते हैं जब कि उन्हें नए तरीकों को खोजने और उन्हें आजमाने के लिए सदा तैयार रहना चाहिए! बच्चे की तरह सोचिए- आप चकित रह जाएँगे!

और सबसे बड़ी बात- वही कीजिए, जो आप करना चाहते हैं। बच्चे कभी भी कोई ऐसा काम नहीं करते, जिसमें उन्हें मज़ा नहीं आता। जो काम उन्हें नहीं करना है, वे साफ मना कर देते हैं और उन्हें मनाते-मनाते आपकी हालत खराब हो जाती है। वयस्क के रूप में आपको कई काम ऐसे भी करने पड़ते हैं जो आपको पसंद नहीं हैं लेकिन अगर आप ठीक तरह से उनके बारे में सोचें तो आपको पता चलेगा कि वास्तव में उन्हें करने की ज़रूरत भी आपको नहीं थी। कई दूसरे तरीके भी मौजूद हैं। भरसक ऐसे कामों से दूर रहिए- और एक बच्चे की तरह जीवन का आनंद लीजिए!

अगर आप बहुत व्यस्त होने के कारण मौज-मस्ती नहीं कर पाते तो आपके साथ कहीं न कहीं कोई गड़बड़ ज़रूर है – 2 मार्च 2015

वृन्दावन में होली-समारोह की शुरुआत हो चुकी है! अगर आप होली के बारे में अभी भी नहीं जानते तो यह समझिए कि यह रंगों का मस्ती भरा त्योहार है, जो एक दिन के लिए तो भारत भर में मनाया ही जाता है लेकिन हमारे इलाके, ब्रज में यह पूरे एक सप्ताह चलता है! पुरातन काल में फसल कटाई के बाद धन्यवाद देने के लिए मनाए जाने वाले समारोह के साथ इसकी शुरुआत हुई थी और आज इसे हर तरह के हँसी-मज़ाक और अराजक मौज-मस्ती के साथ मनाया जाता है। एक दूसरे पर रंगीन पानी की बौछार की जाती है और सूखे रंगों का प्रयोग भी किया जाता है। थोड़ा हुड़दंग और बहुत सारी मौज-मस्ती होती है!

बहुत से लोग समझते हैं कि होली सिर्फ बच्चों का त्योहार होता है। स्वाभाविक ही बच्चे सारा साल इस त्योहार का इंतज़ार करते हैं लेकिन इस त्योहार में वयस्कों के लिए भी बहुत से मौज-मस्ती के अवसर उपलब्ध होते हैं! और अगर आप इसमें कोई मज़ा नहीं पाते तो मैं यही कहूँगा कि आप कुछ गलत कर रहे हैं, कुछ खो रहे हैं! मैं कहना चाहता हूँ कि यह बात सिर्फ होली के लिए ही सही नहीं है बल्कि हर तरह के समारोह के लिए, जिसे नीचे दिए गए कारणों से आप छोड़ देते हैं, सही है।

संभव है, आप इतना व्यस्त रहते हैं कि त्योहार मनाने का या समारोहों में सक्रिय भागीदारी का आपके पास समय नहीं होता। मैं जानता हूँ कि आपके पास बहुत काम है। कई परियोजनाएँ हैं, जिनकी ज़िम्मेदारी आप पर है, लोगों को फोन करना है, उनसे मिलना-जुलना है और बहुत सी कागजी कार्यवाहियाँ पूरी की जानी हैं। आपके जीवन का यह सबसे व्यस्त समय है और आप अपने ग्राहकों या अपने कंप्यूटर को छोड़कर कहीं नहीं जा सकते कि त्योहारों का या समारोहों का आनंद ले सकें।

हो सकता है कि आप किसी कारण से उदास हैं और सोचते हैं कि त्योहार मनाने का आपका मूड नहीं हैं। आप कमरे में बैठे हुए पाते हैं कि आप बहुत अवसाद ग्रस्त हैं और इतना दुखी हैं कि खुश होने का आपका मन ही नहीं है। या शायद आप अपने दुख में ही खुश हैं!

ये बेहूदी या निरर्थक बातें हैं! अगर आप हर वक़्त व्यस्त रहते हैं, इतने तनाव में हैं कि जीवन का आनंद ही नहीं ले सकते तो फिर आखिर जीवन किसलिए है? और क्या आप नहीं समझते कि मनमौजी लोगों के साथ घुलमिलकर, मौज-मस्ती करके, खुशमिजाज़ मित्रों के साथ मिलकर थोड़ा हँसी-मज़ाक करके आपका मूड ठीक ही होगा?

अगर आप अभी बाहर नहीं निकलते, अपने बच्चों, अपने साथी या अपने मित्रों के साथ या अपने आप में, खुद ही त्योहार का मज़ा नहीं लेते तो भविष्य में आप अवश्य पछताएंगे। अगर आज आप बाहर निकलकर लोगों के साथ त्योहारों का रस लेते हैं तो आप न सिर्फ आज खुश होंगे बल्कि आने वाले वर्षों में भी आपका बहुत सारा समय इन पलों को याद करके भी इस खुशी में सराबोर रहेगा। इस मौज-मस्ती की यादें आपको सदा गुदगुदाती रहेंगी!

कभी-कभी थोड़ा सा अंदरूनी परिवर्तन, एक सक्रिय कदम, समारोहों और त्योहारों में शामिल होने का निर्णय-खुश होने का, उल्लसित होने का निर्णय आवश्यक होता है!

हम बिना किसी तनाव, परेशानी या शिकायत के व्यस्त रहने का मज़ा ले रहे हैं! 19 जनवरी 2015

पिछले दिनों हम बहुत काम करते रहे हैं। और पिछले दिनों से मेरा मतलब है पिछले दो महीनों से। बहुत से कार्यक्रम, घटनाएँ और बहुत से लोगों से मिलना-जुलना, हमारे नियमित कामों के अतिरिक्त ये सब व्यस्तताएँ रहीं और आज मैं सोच रहा हूँ कि दरअसल यह कितना अच्छा रहा। मैं थकान महसूस कर सकता था, तनावग्रस्त हो सकता था या शिकायत कर सकता था- मगर क्या वास्तव में यही जीवन नहीं है? हर समय सक्रिय रहना, तरोताज़ा और जीवन से भरपूर!

आश्रम में आयोजित सामान्य विश्रांति-शिविरों के साथ हमारी व्यस्तता की शुरुआत हुई। यह कोई अनहोनी बात नहीं थी। मित्रगण आते रहे और हर पल को उनके सान्निध्य की प्रसन्नचित्त सक्रियता से भरते हुए हम थोड़ा व्यस्त हो गए। फिर कई दिनों बाद मोनिका स्कूल आई।

स्वाभाविक ही, उसके पश्चात हम कुछ ज़्यादा ही व्यस्त हो गए क्योंकि हमें उसके इलाज के सम्बन्ध में कई तरह की जानकारियाँ लेनी थी, हर चीज़ के सम्बन्ध में कागज़ी कायवाहियों को अंजाम देना था, ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को उसके बारे में बताना था, उसका प्रचार करना था, जिससे जल्द से जल्द हम पूरी क्षमता के साथ उसकी सहायता कर सकें।

इस काम में हमें सफलता प्राप्त हुई और शल्य-चिकित्सा हेतु डॉक्टर के साथ मिलने का समय निश्चित किया गया। इसी बीच हमने एक छोटी सी अमृतसर की यात्रा भी संपन्न की। वास्तव में हम वहाँ छुट्टियाँ मनाने गए थे-लेकिन वह भी तो दैनिक कार्यों के अतिरिक्त काम था।

अमृतसर से लौटते हुए हम मोनिका से मिले, वहाँ हमें अपने कार्यक्रम में परिवर्तन करना पड़ा और हम दिल्ली में ही रुक गए। फिर तुरंत ही रमोना के पिताजी को विमान-तल लेने गए। एक और शानदार समय की शुरुआत हुई लेकिन रेस्तराँ के काम की तेज़ प्रगति और आश्रम में मेहमानों की उपस्थिति के चलते हम लगातार व्यस्त बने रहे।

उन्हें बिदा करने के बाद और एक दिन और दिल्ली में रहने के बाद हम वापस आए-लेकिन फिर दो दिन बाद पुनः हमें वहाँ जाना पड़ा: पूर्णेन्दु के पेट में दर्द था और बाद में पता चला कि उसका पुच्छ (appendix) बढ़ा हुआ है! तो हमें तुरंत ही यानी गुरुवार की शाम आपात-शल्यक्रिया के लिए वहाँ जाना पड़ा।

और शुक्रवार की रात हम फिर वापस आ गए। हम थके हुए थे और हमारे साथ पूर्णेन्दु था, जो एक अंग खो चुका था और पेट में तीन छेद लिए वापस लौटा था! लेकिन सब कुछ भली प्रकार से हो सम्पन्न हो गया और हमें खुशी है कि तुरत-फुरत शल्यक्रिया का निर्णय लेकर हमने अच्छा किया।

दो दिनों तक पिछले कुछ दिनों के लंबित कामों को निपटाने के बाद अब हम अपने ऑफिस में बैठे हैं। और मुझे कहना चाहिए कि जिस तरह से चीज़ें घटित हो रही हैं, उससे हम खुश हैं। स्वाभाविक ही, एक तरफ तो हम बेतरह व्यस्त हैं, कामों के बोझ तले पिस रहे हैं और कई काम रोज़ ही छूट जाते हैं-लेकिन दूसरी तरफ इस बात की खुशी भी है कि इसी बीच अनगिनत कार्य सम्पन्न हुए, पूरे करवाए गए। ठंड और स्वास्थ्य-लाभ के दौरान होने वाले दर्द के अलावा हम सब स्वस्थ हैं। और अभी भी हमें बहुत से काम निपटाने हैं, हम लगातार सक्रिय हैं, चीज़ें सामने आती हैं और उन्हें पूरा किया जाता है। हर चीज़ आगे बढ़ रही है!

इससे बढ़िया क्या बात हो सकती है!

तनाव कैसे कम करें: अपने काम से प्रेम करके – 11 नवंबर 2014

आश्रम में चलने वाली रिट्रीट्स, रोज़ सैकड़ों की संख्या में आने वाले ईमेल और दूसरे संदेश, स्कूल का काम आदि जैसी रोज़मर्रा की व्यस्तताओं के साथ ही हम सब इस वक़्त आयुर्वेदिक रेस्तराँ के ज़ोर-शोर से चल रहे निर्माण कार्य में बहुत व्यस्त हैं। शाम को शांत बैठकर आज के अपने ब्लॉग में क्या लिखूँ, यह सोचते हुए मुझे महसूस होता है कि जीवन के विभिन्न अंतरालों में समय का एहसास भी अलग-अलग होता है!

जब आपके पास करने के लिए कुछ नहीं होता, समय जैसे लंबा खिंचता चला जाता है, जैसे बहुत धीरे-धीरे बीत रहा हो और जब आप बहुत से कामों में व्यस्त होते हैं और चाहते हैं दिन में 24 घंटे से ज़्यादा समय उपलब्ध तो जैसे वह पंख लगाकर उड़ने लगता है! जब आप अपने काम में डूबे हुए होते हैं तो हर बार घड़ी देखकर आश्चर्य में पड़ जाते हैं-घड़ी हमेशा आपके अनुमान से आगे का समय बता रही होती है!

यह आपके तनाव का कारण बन सकता है। समय भाग रहा होता है, आपके पास निपटाने के लिए बहुत से काम पड़े होते हैं और कामों की सूची छोटी होने का नाम नहीं लेती बल्कि बहुत से काम हर बार लंबित रह जाते हैं! इसके विपरीत, बार-बार कोई न कोई मामला दरपेश होता है, कोई नई समस्या मुँह बाए सामने खड़ी रहती है या अचानक आपको महसूस होता है कि आप कोई काम भूल गए हैं और अब उसे अंजाम देने में दूनी मेहनत करनी पड़ेगी! उन अतिरिक्त कामों को निपटाना, उनके लिए व्यर्थ ही अतिरिक्त श्रम करना, भले ही काम कोई सा भी हो, आपको अखरता है। उसके कारण आपका काम बढ़ गया, आपको अतिरिक्त श्रम करना पड़ा और नतीजतन, आपके तनाव में भी इज़ाफ़ा हुआ-इसलिए यह काम अब आपको पसंद नहीं आता।

इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि काम का यह माहौल आपको चिड़चिड़ा और गुस्सैल बना देता है। दूसरा कोई बताता है कि फलाँ काम अब तक नहीं हुआ है तो आप तुरंत और तीखा जवाब देने को उद्यत होते हैं, भले ही बाद में आपको खुद इस पर पछतावा हो। लेकिन यह भी संभव है कि आप अपनी प्रतिक्रिया को जायज़ ठहराएँ और सोचें: ये नहीं जानता कि पहले ही आप पर काम का कितना अधिक बोझ है और उसे निपटाने के लिए समय कितना कम?

दुर्भाग्य से, इसका परिणाम यह होता है कि काम ठीक तरह से हो नहीं पाता। इस तनाव के चलते आप काम की महत्वपूर्ण बारीकियाँ मिस कर जाते हैं, उसे अच्छी तरह नहीं कर पाते और अंततः काम पूरा होने के बाद आप उससे पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो पाते और दुखी रहते हैं कि काश आपके पास पर्याप्त समय होता और आप उसे पूरे मन से, अच्छी तरह कर पाते।

मैं अपने कामों के साथ यह नहीं होने देता। मैं तनाव को दूर से ही सलाम करता हूँ, सिर्फ इसलिए नहीं कि वह स्वास्थ्य के लिए हानिकर है बल्कि इसलिए भी क्योंकि मैं जो भी करता हूँ उससे प्रेम करता हूँ। मैं चाहता हूँ कि वह अच्छा हो और उसे करते हुए मुझे मज़ा आता है। इसलिए मैं तनाव जैसे फालतू कारण से न तो उसके निर्माण की प्रक्रिया को बरबाद होता देख सकता हूँ और न ही काम पूर्ण होने के बाद उससे असंतुष्ट रह जाने का खतरा मोल ले सकता हूँ।

कहा जाता है कि एकाग्रता तनाव के प्रतिकूल है। मैं भी यही मानता हूँ मगर अलग तरह से। प्रतिवाद में आप कह सकते हैं कि इतनी व्यस्तता के बीच आपके पास इतना समय नहीं होता कि आप एक जगह ध्यान लगाकर बैठ सकें। लेकिन ध्यान के मेरे तरीके में आपको यह करने की ज़रूरत ही नहीं है।

मेरा विचार यह है कि ध्यान तब सम्पन्न होता है जब आप अच्छी तरह जान रहे होते हैं कि आप क्या कर रहे हैं। अक्सर मैं दिन भर ही इस तरह का ध्यान लगाना पसंद करता हूँ। मैं जो कर रहा होता हूँ, उससे प्रेम करता हूँ और इस तरह मैं पूरे होशोहवास के साथ उसमें लिप्त रहता हूँ। भले ही बहुत से और भी काम करने हों, जो भी काम सामने आता जाता है, मैं उसी संलग्नता के साथ एक के बाद उन्हें निपटाता रहता हूँ। शाम होने पर जब मुझे पता चलता है कि अभी भी बहुत से काम बकाया है तो मैं उन्हें भी पूरी संलग्नता और उसी आनंद के साथ निपटाता चला जाता हूँ।

मैं आपको भी यही करने की सलाह दूँगा। जो भी आप करें पूरे प्रेम के साथ करें। उन्हें अच्छी तरह सम्पन्न करने के लिए उन पर पूरा समय लगाएँ। काम करते हुए आनंद का अनुभव करें!

दाम्पत्य संबंधों पर तनाव का नकारात्मक असर! 2 अक्टूबर 2014

कल मैंने बताया था कि 'आवश्यक कार्यों' की सूची आपको तनावग्रस्त कर सकती है। आजकल बहुत से लोगों की शिथिलता और काम पर न जा सकने का मुख्य कारण उनका तनावग्रस्त होना है। उसका नकारात्मक प्रभाव कार्यालय में या काम करते समय कम नहीं हो जाता। कई सर्वेक्षण यह बात स्पष्ट करते हैं कि ज़्यादातर दम्पतियों की समस्याओं का कारण पति या पत्नी का तनावग्रस्त होना या किसी दबाव में होना होता है। तनाव के कारण सम्बन्ध पूरी तरह टूटकर बिखर भी सकते हैं!

यह साधारण बात है कि काम के समय या कार्यालय में लोग तनावग्रस्त हों। आपका अधिकारी आपसे ज़्यादा से ज़्यादा की अपेक्षा करता है और आप पाते हैं कि समय बहुत कम है, महत्वपूर्ण व्यावसायिक मीटिंगों में शामिल होना है, बहुत बड़ी रकम का सवाल है या आपकी प्रतिष्ठा का मामला है और हर चीज़ आजकल इतनी तेज़ गति से भाग रही है कि सारे काम निपटाने का आपको वक़्त ही नहीं मिल पाता।

यह समझना थोड़ा कठिन हो सकता है कि आखिर यह तनाव पत्नी या पति के साथ आपके प्रेम सम्बन्धों को किस तरह नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है या तहस-नहस कर सकता है। लेकिन यह पूरी तरह संभव है-क्योंकि आपके दिमाग में घर कर गया यह तनाव सिर्फ ऑफिस तक ही महदूद नहीं रहता! आप इस तनाव को घर ले आते हैं!

अधिकतर लोग आजकल उनके निजी वक़्त में भी काम करने के लिए उपलब्ध होते हैं। उनका फोन ईमेल तथा वार्तालाप के ज़रिए उन्हें अपने काम के साथ अद्यतन रखता है। कुछ नियोक्ता उन्हें 24/7 उपलब्ध रहने के लिए मजबूर करते हैं। स्वाभाविक ही, अगर आप ऑफिस में या काम के कारण तनावग्रस्त हैं तो पत्नी या पति के प्रति सामान्य, स्नेहिल व्यवहार के लिए आपको कुछ देर आराम और सुकून की ज़रुरत है और अच्छे अभिभावक बनने के उद्देश्य से भी।

निश्चय ही पत्नी या पति आपके साथ अच्छा, रचनात्मक समय बिताना चाहते हैं लेकिन काम के लम्बे और तनावपूर्ण दिन के पश्चात संभावना यही होती है कि आप ज्यादा कुछ नहीं करना चाहते! यहाँ तक कि, हो सकता है, आप ज़्यादा बात भी करना पसंद न करें! बल्कि आप चाहेंगे कि कोई आपकी मालिश कर दे, नहा लें, बढ़िया भोजन किया जाए और सोफे पर पसरकर शांति के साथ वक़्त गुज़ारा जाए। लेकिन हो सकता है आपसे ही कोई मालिश की अपेक्षा कर रहा हो, चाहता हो कि लोगों से मिला-जुला जाए, बाहर चलकर थोड़ा नाच-गाना हो या साथ बैठकर कुछ अलग सा किया जाए।

इसके विपरीत, क्योंकि अभी आप थोड़ा आराम करके तनावमुक्त नहीं हो पाए हैं, आपकी प्रतिक्रिया सामान्य से बहुत अलग होती है। लगातार तनाव आपको चिड़चिड़ा बना देता है और आप असंयमित व्यवहार करने लगते हैं, बात-बात पर गुस्सा होते हैं। अपने साथी के साथ आपका यह व्यवहार कतई स्नेहपूर्ण नहीं कहा जा सकता!

आप में इतनी ऊर्जा नहीं बची होती कि आप अपने संबंधों पर अपेक्षित ध्यान दे सकें। आपके प्रेम में कोई कमी नहीं आई है, कतई नहीं, और शायद यह बात आपका साथी भी जानता है लेकिन एक स्नेहपूर्ण सम्बन्ध आपसे थोड़ी सी अतिरिक्त अपेक्षा करता है। आपको ऐसा समय चाहिए, जिसमें दिन भर के काम के चलते ऊँघते हुए सुप्त मस्तिष्क की जगह तनाव मुक्त और चैतन्य मन के साथ आप कुछ देर एक साथ बैठ सकें। सिर्फ काम से हुई थकान से मुक्ति के लिए ही नहीं बल्कि यूँ ही बातचीत करने, हँसने-खिलखिलाने और एक साथ मौज-मस्ती करने के लिए भी आपमें इच्छा और शक्ति होनी चाहिए। यही कारण है कि कई लोग हफ्ते भर की छुट्टियों में भी पूरा विश्राम और सुकून प्राप्त नहीं कर पाते: उन्हें कुछ दिन अपने आपको शांत करने में लगते हैं और उसके बाद ही वे छुट्टियों का आनंद उठा पाते हैं!

तो, इससे पहले कि आपका साथी ऐसी अवस्था को प्राप्त कर ले कि नाराज़ होने लगे कि आप इतने तनावग्रस्त क्यों हैं, ऐसी कोई बात हो इससे पहले: कुछ बदलिए। जीवन में प्रेम से बढ़कर कुछ नहीं है। काम नहीं, पैसा नहीं। मैं जानता हूँ कि जीने के लिए काम आपको करना है, पैसा भी आपको कमाना है लेकिन अपने तनाव की सीमा को कुछ कम कीजिए!

यह नितांत आवश्यक है-आपके लिए, आपके जीवन के लिए और आपके प्रेम के लिए!

‘आवश्यक कार्यों’ की सूची द्वारा पैदा तनाव को कैसे कम करें! 1 अक्टूबर 2014

कुछ समय पहले मैंने आपको मेरी पत्नी की आवश्यक कार्यों की सूची बनाकर काम करने की आदत के बारे में बताया था। व्यवस्थित बने रहने और अपने आवश्यक और इच्छित कामों को न भूलने का यह एक अच्छा तरीका है। लेकिन इस आदत में मैं इस बात का खतरा भी देखता हूँ कि वह आपके मस्तिष्क को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती है। जी हाँ, ‘आवश्यक कार्यों’ की सूची आपको तनाव से भर सकती है!

ऐसी सूची बनाने वाले सभी लोग जानते हैं कि इस सूची में ज़्यादा और कम महत्वपूर्ण काम एक साथ दर्ज होते हैं। कंप्यूटर पर आप ऐसी एक से एक बेहतरीन सूचियाँ बना सकते हैं, जिसमें विभिन्न रंगों का, याद रखने के लिए सुंदर-सुंदर निशानों का और कामों की प्रगति का जायजा लेने हेतु चिप्पियों आदि का उपयोग करके सूची को सुंदर और दर्शनीय बनाया जा सकता है। या फिर एक ‘आवश्यक कार्य’ बोर्ड बना सकते हैं, जो सदा आपके सामने भौतिक रूप से उपलब्ध होगा और जिसमें आप विभिन्न रंगों से अपने कामों को क्रमवार सजाकर लिख सकते हैं। कैसे भी बना लें, आप सामान्यतः महत्वपूर्ण कामों को पूरा करने की तरफ पहले ध्यान देंगे और कम महत्वपूर्ण कामों को बाद में करने का विचार करते रहेंगे।

इनमें से कुछ आसान काम होते हैं और उन्हें निपटाने में आपको आनंद मिलता है-जब भी आपके पास कुछ खाली समय होता है, उन्हें तुरंत निपटाया जाता है। लेकिन कुछ काम ऐसे होते हैं, जिन्हें करने की आपकी इच्छा नहीं होती। जब भी आप उन कामों की ओर देखते हैं, आप नाक भौं सिकोड़ने लगते हैं और सोचते हैं कि इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण बहुत से काम हैं, जिन्हें निपटाना ज़रूरी है। या सोचते हैं, अभी आपको थोड़े विराम की ज़रूरत है और उस काम को हाथ लगाने से पहले कुछ देर आराम कर लेना चाहिए। आप हीला-हवाला करते हैं, उसे टालते हैं, स्थगित करते जाते हैं और अंततः लंबे समय तक उन्हें अपनी ‘आवश्यक कार्यों’ की सूची में बने रहने देते हैं, कई बार सालों तक।

एक बार जब कोई काम आवश्यकता से अधिक समय तक आपकी इस सूची में बना रहता है और पुराना पड़ जाता है तो फिर आप भूल जाते हैं कि उस काम को निपटाने में कितनी मशक्कत करनी होगी। आपके मन में अस्पष्ट सा विचार तो होता है कि इस संबंध में क्या किया जाना है मगर जितनी बार आप उसे टालते हैं, उसे स्थगित करते जाते हैं, उतना ही वह दुष्कर होता जाता है और फिर उसे निपटाने में उत्तरोत्तर अधिक से अधिक प्रयास करना पड़ता है।

धीरे-धीरे आपकी ‘आवश्यक कार्यों’ की सूची लंबी होती चली जाती है। जब भी आप निश्चित रूप से करने के लिए उसमें कोई नया काम जोड़ते हैं, ऐसे कामों की सूची कुछ लंबी दिखाई देती है। काम, जिन्हें अंजाम तक पहुँचाना ही है। काम, जिन्हें आपको निपटाना चाहिए! कोई न कोई काम हमेशा रहा आता है, सूची कभी समाप्त नहीं होती!

आप समझ रहे होंगे, मैं किस तरफ इशारा कर रहा हूँ-इन कामों का हमेशा हमेशा के लिए दिमाग में बने रहना आपकी दिमागी सेहत के लिए ठीक नहीं है! कब होगा कहना मुश्किल है मगर कभी न कभी आपके मन में यह एहसास घर करने लगेगा कि आप अपने काम कभी भी समाप्त नहीं कर पाएँगे। फिर आपको अपने लिए पूरी तरह उन्मुक्त समय कभी नहीं मिल पाएगा क्योंकि ऐसा समय तो सिर्फ ‘आवश्यक कार्यों’ के बीच ही उपलब्ध होगा!

मुझे लगता है कि यह तनाव पैदा करता है। यह बहुत धीरे-धीरे होता है और शायद इतने सूक्ष्म स्तर पर काम करता है कि आपको उसका एहसास ही नहीं हो पाता। आप सोचते हैं कि आप कंप्यूटर बंद करके इस सूची से मुक्त हो जाएँगे। लेकिन वह वहाँ मौजूद रहती है। यह एहसास कि काम निपटाने के लिए आपने पर्याप्त प्रयास नहीं किए, कि अभी भी आपको कोई न कोई काम निपटाना है।

इसलिए इस ‘आवश्यक कार्यों’ की सूची के संबंध में मैं एक सलाह दूँगा: उन कामों को निपटाने का एक समयबद्ध कार्यक्रम भी उन कामों के साथ दर्ज कीजिए। लिखिए कि कोई काम आप कब तक पूरा कर लेंगे-और उस कार्यक्रम पर अटल रहिए! अगर कुछ काम ऐसे हैं, जिन्हें आप कर सकते हैं तो ‘आइडिया’ नामक एक और सूची बनाइए और उन्हें वहाँ लिख लीजिए। यह आप पर कोई दबाव नहीं डालेगा और जब भी समय मिलेगा, उन्हें आप निपटा सकेंगे। या फिर, इस सारे झमेले को ही दिमाग से बाहर निकाल रद्दी की टोकरी में झोंक दीजिए और अपने महत्वपूर्ण कामों को याद रखना और उन्हें समय पर निपटाना सीखिए। इतना भर कीजिए कि उसके कारण जीवन भर का तनाव न हो!

मुख्य रूप से पश्चिमी (विदेशी) मेहमानों वाला एक आश्रम – 11 फरवरी 2014

कल मैंने आपको बताया था कि हाल ही में हमें अपने पहले हनीमून दंपति का स्वागत करने का अवसर मिला था। वे हमारे पहले भारतीय ग्राहक थे। क्यों? सामान्यतः हमें भारतीयों की बुकिंग प्राप्त क्यों नहीं होती? और क्या भविष्य में इस बारे में कोई परिवर्तन हो सकेगा? आज मैं इसी बात पर चर्चा करूंगा।

आज तक हमेशा विदेशी और कुछ एनआरआई ग्राहक ही हमारी सेवाएँ लेते रहे हैं। इनमें से एनआरआई ग्राहक तो विदेशों में पले-बढ़े और अपनी मानसिकता में भारतीय से ज़्यादा गैर-भारतीय ही कहे जाएंगे।

हमने अपने आपसे प्रश्न किया कि ऐसा क्यों है? क्यों हमारे आश्रम में ज़्यादातर सिर्फ पश्चिमी मेहमान ही होते हैं। हमें लगता रहा है कि भारतीय वह खरीदते ही नहीं, जो हम बेचते हैं।

इस बात में कुछ हद तक सच्चाई भी है: योग और आयुर्वेद विश्रांति शिविर सभी भारतीयों के लिए विशेष रुचिकर नहीं होते! वे भी जो इस विषय में रुचि रखते है, स्वास्थ्यकर दिनचर्या के चलते भारत में ही स्थित हमारे आश्रम आकर इन विश्रांति शिविरों में शामिल होना आवश्यक नहीं समझते। योग संबंधी डीवीडी या वीडियो की सहायता से या किसी स्थानीय योग शिविर में जाकर वे योग की मूलभूत जानकारियाँ हासिल कर लेते हैं। उन्हें सम्पूर्ण विश्रांति शिविर में शामिल होकर ज़्यादा कुछ सीखने की इच्छा नहीं होती। वैसे भी इन विश्रांति शिविरों को वे एक तरह की विलासिता ही समझते होंगे और उस पर पैसा खर्च करना उन्हें व्यर्थ लगता होगा।

वैसे यह खर्च का प्रश्न उतना नहीं है जितना कि जीवन-पद्धति का है। यह बात अब हमारे सामने स्पष्ट होने लगी है। हम देख रहे हैं कि भारत में भी हमारे पृष्ठों में रुचि बढ़ रही है और हमें लगता है कि जब व्यस्त और तनावपूर्ण कारपोरेट दुनिया में और उसके चलते उस जीवनचर्या में लोग ज़्यादा से ज़्यादा संख्या में प्रवेश करेंगे, जिसे पश्चिमी जीवनचर्या कहा जाता है, तब लोगों के लिए हमारे आयुर्वेद और योग विश्रांति शिविर रुचिकर साबित होंगे। वैसे भी यह पश्चिमी जीवनचर्या सारे संसार में तेज़ी के साथ अपने पाँव पसार रही है। जब लोग अपने स्वास्थ्य से ज़्यादा महत्व अपने काम और अपने कैरियर को देते हैं, जब काम, पैसे कमाना और व्यस्त रहना उनकी प्राथमिकता बन जाते हैं और जब एक दिन उन्हें एहसास होता है कि यह सब उनके जीवन में पूर्णता नहीं ला सकता तब योग विश्रांति शिविरों की उन्हें आवश्यकता प्रतीत होती है। जब वे पूरी तरह निचोड़ लिए जाएंगे, जब वे अपना काम गवां देने की चिंता में अवसादग्रस्त हो जाएंगे, जब फोन की घंटी बजते ही उन्हें हर तरह की आशंकाएँ घेर लेंगी क्योंकि उनका शरीर और मस्तिष्क उस तनाव को झेल सकने के काबिल नहीं रह जाएगा।

ऐसी जीवन-शैली में लोगों के पास अपने ही लिए समय नहीं होता। न तो जीवन का वास्तविक आनंद लेने का उनके पास समय होता है और न ही भावनात्मक रूप से वे वास्तविक जीवन से जुड़ पाते हैं। ऐसी हालत में उनके पास अपने परम्परागत ज्ञान जैसे आयुर्वेदिक उपचार पर या रोज़ योग करने के लिए भी समय नहीं होता। उन्हें पुनः सीखना पड़ता है, उन्हें अपनी विश्रांति के लिए अलग से समय निकालना होता है।

कभी-कभी हम यह भी सोचते हैं कि एक टिपिकल भारतीय हमारे आश्रम में किसी पश्चिमी मेहमान की तुलना में उतना सहज नहीं रह पाता होगा क्योंकि हमारे यहाँ रूढ़ियों और परम्पराओं से दूर एक उन्मुक्त और अनौपचारिक जीवन-शैली अपनाई जाती है।

इसलिए हो सकता है कि भविष्य में हमारे यहाँ कुछ भारतीय मेहमानों का आना भी शुरू हो जाए। यह समय ही बताएगा और सामान्य जीवन-शैली, संस्कृति और लोगों की जरूरतों में होने वाले परिवर्तनों पर हमारी पैनी नज़र बनी रहेगी।

दूसरों से तुलना करने पर न तो आपकी सुन्दरता बढ़ती है न ही घटती है- 27 अगस्त 2013

कल मैंने बताया था कि लोग लगातार हर बात में दूसरों से अपनी तुलना करके बहुत अवसादग्रस्त हो जाते हैं। जिस बात पर, खासकर महिलाएं, अपनी तुलना दूसरों से करती हैं, वह है सुंदरता। लेकिन मेरी नज़र में, इस तरह की तुलना ही महिलाओं में स्वाभिमान की कमी और अपने शरीर के बारे में कुंठा और अवहेलना का कारण है।

मुख्य समस्या फिर वही है: बाहरी बातों से अपनी तुलना करना। यह बिल्कुल असामान्य दृश्य नहीं है कि एक महिला किसी और के कमरे में प्रवेश करती हैं और पूरे कमरे का बारीक मुआयना करना शुरू कर देती हैं। यह पिश्टोक्ति होगी लेकिन अधिकांश महिलाएं यह बात मानेंगी-कम से कम दिल ही दिल में-कि वे दूसरी महिलाओं के शरीर और चेहरे को बड़ी उत्सुकता से देखती हैं और उनके वस्त्रों, उनकी देहयष्टि, उनकी तंदरुस्ती, केशसज्जा और यहाँ तक कि मेकअप आदि की तुलना खुद की इन्हीं चीजों से करती हैं। इस जांच के आधार पर उनका स्वाभिमान या तो बढ़ जाता है या कम हो जाता है। अगर सामने वाली महिला थोड़ी मोटी है या उसके चेहरे पर मुहासे हैं या बाल खराब हैं तो उसी अनुपात में वे खुद को ज़्यादा सुंदर अनुभव करने लगती हैं। इसके विपरीत अगर वह महिला उन्हें अपने आप से ज़्यादा सुंदर लगती हैं तो वे अपने वज़न या जिस बात को भी वे अपनी कमजोर नब्ज़ समझती हैं, उसके प्रति अचानक चैतन्य और सतर्क हो जाती हैं।

वैसे मैं यहाँ महिलाओं की बात कर रहा हूँ लेकिन यह सिर्फ महिलाओं की ही समस्या नहीं है! जब पुरुष यही बात करते हैं तो, हो सकता है, सुंदरता के विषय में न सोचें लेकिन कुल मिलाकर मतलब अलग नहीं होता! पुरुष, दूसरे पुरुषों (के पेट की, बाँहों की) की मांसपेशियाँ, उनकी दौलत और स्वाभाविक ही उनका बेफिक्र व्यवहार और विश्वस्त मुस्कुराहट देखते हैं और वैसा ही अनुभव करते हैं जैसा महिलाएं करती हैं!

लेकिन क्या सुंदरता तभी साबित होगी, जब आप तुलना में जीत जाएंगे? क्या आप वास्तव में तभी अपने आपको सुंदर समझ पाती हैं जब उस फिल्म-स्टार या सुपर-मोडेल स्त्री से, तुलना में, आपसे भी कम सुंदर महिला खड़ी हो? क्या आप वाकई यह सोचती हैं कि आप तभी सुंदर होंगी जब आप उस पोस्टर वाली या टीवी विज्ञापन वाली महिला जैसी दिखने लगेंगी?

मैं समझ सकता हूँ कि जब आप किसी तुलना में बेहतर सिद्ध होते हैं तो अच्छा लगता ही है (फील-गुड फैक्टर जैसी कोई चीज़ होती ही है), भले ही वह आपके मस्तिष्क में होता हो और आपकी विजय को देखने के लिए कोई दर्शक मौजूद नहीं है। लेकिन आपको समझना चाहिए कि वास्तव में आप वहाँ कर क्या रही हैं और इस बात पर पुनर्विचार करना चाहिए कि आपका खूबसूरती का मानदंड क्या है!

सच्चाई यह है कि सुंदरता का यह आदर्श, यह मानदंड किसी भी तरह से वास्तविक नहीं है क्योंकि हर मीडिया चैनल, हर मोडेल और अभिनेत्री के चेहरे को बेहतर दिखाने के लिए कंप्यूटर प्रोग्रामिंग करते हैं। और ऐसे अवास्तविक चित्र को आप अपना आदर्श मान लेती हैं, उसे अपने लिए एक लक्ष्य बना लेती हैं, जिसे पाने के लिए आप कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाती हैं और इसके अलावा, इसी मानदंड पर आप दूसरी औरतों को भी तौलने लगती हैं।

फिर प्रश्न वही है कि अपने आपको समझने (परिभाषित करने) और अपनी पहचान के लिए कि आप कौन हैं, आपको बाहर कितना देखना चाहिए? क्या आपको यह सोचना चाहिए कि "मैं हीथर से दुबली हूँ, मेरी त्वचा का रंग मेरी से बेहतर है, मेरे बाल लूसी से घने हैं?" क्या यह सोचना पर्याप्त नहीं होगा कि "मैं सुंदर हूँ?"

मैं यह कितनी बार कहूँ कि सुंदरता सिर्फ बाहर नहीं है और यह कि सुंदरता की समझ सबके पास अलग-अलग होती है! जब आप कमरे में अकेली होती हैं और तुलना करने के लिए कोई आदर्श या कोई प्रतिस्पर्धी आपके सामने नहीं होता, तब भी आपको खुद को सुंदर ही समझना (महसूस करना) चाहिए! और सुपरस्टार्स की भीड़ के बीच भी आपको अपनी सुंदरता का एहसास होना चाहिए। आप अनूठे हैं, आप जैसा कोई नहीं है और आप सुंदर हैं।

दूसरों के साथ अपनी तुलना मत कीजिए और खुश रहिए! 26 अगस्त 2013

पिछले सप्ताह मैंने कार्यक्षेत्र में होने वाली प्रतिस्पर्धा के बारे में लिखा था, जिसकी अधिकता लोगों को मानसिक रूप से तोड़ देती है और उनका मानसिक और शारीरिक क्षरण होने लगता है। अंततः वे गहरे अवसाद में डूब जाते हैं। लेकिन यह प्रतिस्पर्धा सिर्फ कार्यक्षेत्र में ही देखने को मिलती हो, ऐसा नहीं है, जीवन के हर क्षेत्र में यह सामान्य रूप से मौजूद होती है और अगर आप लगातार दबाव में जीवन बिताना चाहते हैं तो कहीं भी उससे साबका पड़ सकता है! यह काफी हद तक आप पर निर्भर हैं: आप दूसरों के साथ कितनी स्पर्धा करना चाहते हैं या कितनी हद तक किसी के साथ अपनी तुलना करना चाहते हैं? इसके विपरीत, आप खुद अपने आप पर कितनी मानसिक और शारीरिक ऊर्जा खर्च करना चाहते हैं?

यह आश्चर्य की बात नहीं है कि आज समाज में बड़ी संख्या में लोग तनावग्रस्त पाए जाते हैं क्योंकि समाज में आपसी प्रतिस्पर्धा बहुत सामान्य और आम बात हो गई है। प्रतिस्पर्धा करना है इसलिए दूसरों से अपनी तुलना करना भी सहज-स्वाभाविक है क्योंकि तभी तो आप जान पाएंगे कि कहीं दूसरे आपसे बेहतर तो नहीं कर रहे हैं! अगर आपसे खराब कर रहे हैं तो वह भी अपनी तात्कालिक खुशी के लिए ज़रूरी है। लोग अपने सहकर्मियों के साथ ही प्रतिस्पर्धा नहीं करते, वे अपने बचपन के सहपाठियों के साथ भी यह तुलना करते हैं कि उन्होंने कितनी तरक्की ही है, और उनकी खुद की तरक्की से वे कितना आगे या पीछे हैं! किसी जिम में ट्रेडमिल पर वे कितना तेज़ दौड़ते हैं और उनके मित्र कितना! खुद वे कितना कमा रहे हैं, इसके अलावा वे यह भी देखते हैं कि उनकी पत्नी कितना कमा रही है और फिर उससे अपने पड़ोसी परिवार की कमाई से तुलना करते हैं। यहाँ तक कि वे अपनी सुंदरता की तुलना किसी अजनबी से भी करने लगते हैं! अपने अवकाश के समय में वे क्या पढ़ रहे हैं, इसकी तुलना वे लोगों द्वारा पूल पर, सी-बीच पर या मेट्रो में पढ़ी जा रही किताबों से करते हैं। क्या मैं अधिक बुद्धिमान हूँ? क्या मैं ज़्यादा सफल हूँ? क्या मैं ज़्यादा सुंदर हूँ? क्या मैं ज़्यादा तेज़, ऊंचा या अच्छा हूँ?

अगर इन सभी सवालों के जवाब ‘हाँ’ में हों, तभी वे संतुष्ट होते हैं। अगर आपमें यह प्रवृत्ति है तो आप समझ सकते हैं कि मैं क्या कह रहा हूँ। आप हर वक्त तुलना करते रहते हैं, बार-बार अपनी तरफ देखते हैं और फिर किसी दूसरे की तरफ और अगर आप जीत रहे हैं तो इस तुलना का आप पर सकारात्मक असर होता है अन्यथा आप निराश हो जाते हैं।

समस्या यह है कि ऐसा करके आपका ध्यान पूरी तरह दूसरों पर केन्द्रित हो जाता है और आप इन्हीं तुलनाओं के जरिये अपनी पहचान सुनिश्चित करने लगते हैं। आप कौन हैं? मैं दौड़ में जैक से तेज़ हूँ, मैं काम में जैस्मिन से ज़्यादा सफल हूँ, मैं अपने पड़ोसी, मिलर्स से बेहतर अभिभावक हूँ! सब कुछ बाहर है, दूसरे प्रगति में कितना आगे हैं और आप कहाँ है। आप अपने आंतरिक मूल्य, अपनी आंतरिक शक्तियों, अपनी आंतरिक सुंदरता से सम्बद्ध नहीं रह पाते और अंततः अपना महत्व कम कर लेते हैं। यहाँ तक कि आपके ये गुण आपकी जानकारी में ही नहीं रहते क्योंकि आप तो अपना ध्यान दूसरों पर (बाहरी बातों पर) केन्द्रित किए हुए हैं।

आप हमेशा जीत नहीं सकते और स्वाभाविक ही बार-बार हारना तनाव पैदा करता है! पूर्णतावादी और खुद से बहुत ज़्यादा अपेक्षा रखने वाले, हार को और भी ज़्यादा दिल पर ले लेते हैं, जो उन पर और भी ज़्यादा शारीरिक और मानसिक दबाव पैदा करने का कारण बनता है। वैसे ही आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी द्वारा निर्मित दबाव कोई कम नहीं हैं। इसलिए कम हाई-प्रोफ़ाइल नौकरी वाले लोग या जो लोग नौकरी नहीं करते या कोई काम भी नहीं करते, वे भी शारीरिक और मानसिक क्षय (breakout) से पीड़ित रहते हैं।

आप जो हैं, जैसे हैं, वैसे ही महत्वपूर्ण हैं, इस बात को आपको समझना होगा। अपनी सीमाओं के कारण अपने आपको कम आंकने की आदत छोड़कर, अपनी कीमत पहचानना सीखना सीखिए। यह आवश्यक नहीं है कि हमेशा आप सर्वोत्तम या नंबर वन ही हों-सच तो यह है कि आप हो ही नहीं सकते! कोई भी नहीं हो सकता! इस बात को स्वीकार कीजिए कि आप अपना पूरा प्रयास कर रहे हैं और आपकी प्रतिभा हर वक़्त, हर क्षेत्र में सर्वोत्तम नहीं हो सकती।

अगर आप अपनी यह आदत बदलना चाहते हैं तो प्रतिदिन कम से कम थोड़े समय के लिए ध्यान लगाने की कोशिश अवश्य कीजिए या अपने आप को याद दिलाते रहिए कि किसी के साथ अपनी तुलना करने की आपको आवश्यकता नहीं है। जब भी आप निराश या दुखी हों, उसका कारण जानने की कोशिश कीजिए-कहीं यह इसलिए तो नहीं है कि आप किसी से अपने आपको कमतर महसूस कर रहे हैं? फिर इस एहसास से मुक्त होने का प्रयत्न कीजिए, अपने आपको समझाइए कि आप दोनों ही मनुष्य हैं इसलिए दोनों का एक ही महत्व है, सिर्फ इतना ही कि उसके पास दूसरी विशेषताएँ हैं।

दूसरों से अपनी तुलना करना छोड़ें और खुश रहें!

गहरे अवसाद और बर्न आउट के बाद वापस सामान्य होने की लम्बी और थका देने वाली प्रक्रिया- 22 अगस्त 2013

कल मैंने इस बारे में लिखा था कि कैसे आजकल बहुत से लोग काम के दबाव और उसके तनावों के कारण शारीरिक और मानसिक क्षय से पीड़ित होकर टूट जाते हैं और अंततः गहरे अवसाद में डूब जाते हैं। आज मैं संक्षेप में ऐसी क्षरण की स्थितियों से उबरने की प्रक्रिया के बारे में लिखना चाहता हूँ।

अपने व्यक्तिगत परामर्श-सत्रों में और अपने आश्रम में मैं कई क्षयग्रस्त लोगों से मिलता रहा हूँ और मैंने कई मनोचिकित्सकों के साथ भी इस विषय पर काम किया है, इसलिए ऐसी स्थितियों में फंसे व्यक्तियों की मानसिक हालत और उनकी भावनाओं की मुझे काफी हद तक ठीक-ठीक समझ है-और इस बात की भी कि अब उन्हें क्या करना चाहिए, जिससे वे सामान्य जीवन में वापस आ सकें।

कल मैंने यह भी लिखा था कि दरअसल उन्हें ‘वापस उसी अवस्था’ में आने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि उनकी क्षय से पहले की, तथाकथित सामान्य जीवन-पद्धति, उनका जीने का तरीका, उनकी सोच और व्यवहार ने ही मिलकर उन्हें इस हालत में पहुंचाया था! अब तो उन्हें सब कुछ नए सिरे से और नए तरीके से शुरू करना होगा!

जो शारीरिक और मानसिक रूप से क्षयग्रस्त है उसे सबसे पहले किसी पेशेवर की मदद लेनी होगी क्योंकि वह बीमारी की अंतिम अवस्था में पहुँच चुका है। कई लोगों को चिकित्सालय में कुछ दिन रहना भी पड़ सकता है क्योंकि वे अभी यह भी नहीं समझ पाते कि कैसे जिएँ, क्यों जिएँ?-उनके जीवन का मूल उद्देश्य ही अर्थहीन हो चुका होता है! अक्सर अपने अस्तित्व को वे अपनी नौकरी, अपने पद, अपने काम से पूरी तरह जोड़ चुके होते हैं और उन्हें यह एहसास ही नहीं होता कि अपने आप पर उन्होंने असीमित दबाव डाला हुआ है। इस पतन ने उनके पैरों के नीचे से ज़मीन खींच ली है। उनका शरीर अब जवाब दे गया है और कह रहा है कि इसे अब और चलते रहने नहीं दिया जा सकता, कि वे अब अपनी, खुद की जरूरतों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।

आम तौर पर डॉक्टर ऐसे क्षयग्रस्त लोगों को दवाइयाँ खिलाते हैं-अवसाद-रोधी, नींद की गोलियां और कुछ अन्य दवाइयाँ। शुरुआत में या आपातकाल में ये दवाइयाँ अच्छा असर दिखाती हैं, लेकिन कुछ समय बाद, और यह समय कुछ महीने हो सकता है, उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होना सीखना होगा और खुद शारीरिक और मानसिक स्थिरता की तलाश करनी होगी। यही वह समय है, जब वे अपनी भीतरी खोज शुरू कर सकते हैं और इसी हालत में हमारे आश्रम में कुछ दिन विश्राम लेना कई लोगों को लाभ पहुंचा चुका है।

जब आप ऐसी हालत में होते हैं तो सबसे मुख्य बात आपको यह करनी होती है कि आप अपने आपको खोजें। पैसे और सफलता की दौड़ में आपने अपने आपको पूरी तरह खो दिया है, आपको खुद अपना कोई एहसास नहीं होता। आप कौन हैं? अपने जीवन में आप क्या करना चाहते हैं? क्या करके आप प्रसन्न होते हैं? ये और ऐसे ही कुछ और प्रश्न हैं, जिनका जवाब आपको देना होगा। उसके बाद ही कोई क्षयग्रस्त मरीज अपने जीवन के टुकड़ों को बटोरकर पुनः स्थिरचित्त हो सकता है। कई लोग अपनी नौकरी या कार्यक्षेत्र बदलने का निर्णय लेते हैं, क्योंकि जो वे इतने दिन करते रहे थे, अब नहीं कर सकते क्योंकि वैसा करने पर वे अपने शारीरिक दबाव और मानसिक तनाव से उबर नहीं पाएंगे।

लेकिन बाहरी चीजों और वातावरण के बदलाव से ही बात नहीं बनेगी, बहुतेरे आंतरिक प्रतिमानों और विचारों से भी आपको मुक्ति पानी होगी! और शुद्धिकरण की इस प्रक्रिया को कार्यान्वित करने के लिए अपने सामान्य और उबाऊ वातावरण से बाहर निकलकर बिल्कुल नई और अलग जगह पर कुछ दिन बताने से बढ़कर क्या बात होगी! ऐसी परिस्थितियों में हमारे आश्रम आकर आयुर्वेदिक-योग-अवकाश लेने वाले लोगों के साथ हमारा अनुभव बहुत सुखद, प्रेरणास्पद और आशाप्रद रहा है।

उन्होंने हमें बताया है कि रोजाना नियमित आयुर्वेदिक मालिश किस तरह इसमें सहायक रही क्योंकि उन्हें महसूस हुआ कि कोई है, जो पूरे एक घंटे उन पर और उनके शरीर के छोटे-छोटे अंगों पर पूरा ध्यान केन्द्रित किए हुए है। कई सालों से उनका शरीर अपने प्रति उनकी लापरवाही झेल रहा था। वह उनके ध्यान से वंचित था और ठीक यही पाने के लिए वह बेताब था! यह उपचार उन्हें, शारीरिक और मानसिक रूप से विष-मुक्त करने में बहुत सहायक रहा। दैनिक योग-सत्रों में आप शरीर के प्रति अपने प्रेम को पुनर्जीवित करते हैं। खुद से ऊंची से ऊंची अपेक्षाओं के दबाव में, एक नियुक्ति से दूसरी की तरफ भागने-दौड़ने की मजबूरी में आप अपने शरीर के प्रति यह प्रेम-भावना भूल ही चुके थे!

और फिर, और शायद सबसे महत्वपूर्ण भी, आप यहाँ ऐसा वातावरण और परिवेश प्राप्त करते हैं, जहां आप इस खोज को ज़्यादा अच्छी तरह अंजाम दे सकते हैं कि आप कौन हैं और आपके जीवन का उद्देश्य क्या है, आप क्या चाहते हैं? आप अपने आप में मगन रह सकते हैं-स्वतंत्र, बच्चों के साथ, हमारे परिवार और आश्रम के बच्चों के बीच या विश्रांति के लिए आए दूसरे मेहमानों के साथ। आप विश्राम कर सकते हैं या हमारे कामों में हमारे सहभागी हो सकते हैं, आप पढ़-लिख सकते हैं, ध्यान में लीन हो सकते हैं, दिल जो कहे, वह सब कुछ आप करने के लिए स्वतंत्र हैं। और यह बहुत बड़ा मौका है:आप अपने दिल की आवाज़ सुनना शुरू कर सकते हैं। यही तो आपने आज तक नहीं किया था कि अपने दिल की तनावपूर्ण, चीखती आवाज़ को आप कभी सुन लेते और जिसका खामियाजा आप आज भुगत रहे हैं!

मानसिक रूप से पूरी तरह ध्वस्त होने के बाद, धीरे-धीरे, बहुत धीरे-धीरे लोग अपनी पूर्वावस्था में लौट पाते हैं और अधिकतर लोग यही कहते हैं कि यह बाद की अवस्था उनकी पिछली अवस्था से बहुत बेहतर है! मैं कामना करता हूँ कि उन सभी लोगों को, जो ऐसी स्थिति को प्राप्त हुए हैं, यह शक्ति प्राप्त हो कि वे अपने वास्तविक स्वत्व को प्राप्त कर सकें और उनके लिए, जो अब भी पैसे और सफलता की अंधी दौड़ के चलते शारीरिक दबाव और मानसिक तनाव से ही जूझ रहे हैं, यह कि वे यह समझ सकें कि जो वे कर रहे हैं वह उन्हें बड़ी गहरी पीड़ा पहुंचा सकता है।

और जब कभी भी आप अपने परिवेश और वातावरण से दूर कहीं जाना चाहें, हमारे आश्रम के दरवाजे आपके लिए सदा खुले हैं।