कामुकता – एक आनंदित करने वाली नैसर्गिक अनुभूति – उसे बीमारी समझने वाले स्वयं बीमार हैं – 1 जून 2015

कुछ समय पहले मेरे एक परिचित ने अश्लील फिल्मों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी नज़र में ये फिल्में लोगों के मन में काम-वासना या कामोत्तेजना पैदा करती हैं और उसी का परिणाम है कि भारत में बलात्कार की घटनाएँ बढ़ती चली जा रही हैं। संक्षेप में, वे सोचते हैं कि जितना ज़्यादा अश्लील फिल्में लोग देखेंगे, उतनी ही अधिक संख्या में महिलाओं पर बलात्कार होगा।

इससे पहले कि मैं और विस्तार में जाऊँ, मैं एक बात स्पष्ट करना चाहता हूँ: कामुकता या कामोत्तेजना बुरी चीज़ कतई नहीं है। यह इंद्रियों में होने वाली एक नैसर्गिक संवेदना, अनुराग और एहसास है और वह सभी में पाई जाती है। पुरुष और स्त्रियाँ, शारीरिक रूप से सक्षम या अक्षम, बच्चों से लेकर बूढ़ों तक, यह हर एक व्यक्ति में मौजूद होती है। काम-वासना सब में है-सच यह है कि अगर आपमें नहीं है तो आपके शरीर में कोई न कोई विकृति है! हर एक में अलग-अलग परिमाण में काम-वासना पाई जाती है, जो उनके शरीर में मौजूद हार्मोन्स और निश्चित ही, मानसिक अवस्थाओं से उपजी भौतिक परिस्थितियों पर निर्भर होती है।

सामान्य परिस्थितियों में भी वह आसानी से उत्पन्न हो जाती है। वास्तव में, एक मामूली विचार भी काम-वासना पैदा करने के लिए पर्याप्त है। इसके लिए फिल्म या किसी कामोत्तेजक फोटो या तस्वीर की ज़रूरत नहीं है! इसके अलावा, सामान्य बॉलीवुड या हॉलीवुड मूवी भी आपमें कामोत्तेजना या काम-वासना पैदा कर सकती है-या अपने कार्यालय में अपनी कुर्सी पर बैठे, कोई बिल्कुल अलग काम करते हुए भी महज एक विचार आपमें कामोत्तेजना पैदा कर सकता है! इसके विपरीत, अगर किसी व्यक्ति में कोई शारीरिक या मानसिक गड़बड़ी है और वह कामोत्तेजना महसूस नहीं कर पाता तो घंटो अश्लील फिल्में देखता रहे, उसे कभी, कोई कामोत्तेजना नहीं होगी!

न सिर्फ कामवासना नैसर्गिक है, वह वास्तव में बहुत खूबसूरत चीज़ भी है! काम-वासना की भावना से और खासकर जब आप उसे संतुष्ट कर देते हैं तो आप भीतर तक स्वतः ही खुशी और आनंद में डूबने-उतराने लगते हैं, परितुष्ट महसूस करते हैं, प्रेम की गहरी अनुभूति में सराबोर हो उठते हैं। काम-वासना आपको असीम प्रसन्नता और मुक्ति प्रदान करती है और मेरी नज़र में, वह बलात्कार जैसे घृणित अपराध का कारण हो ही नहीं सकती! इस उत्कट आनंद के साथ बलात्कार की कोई संगति नहीं बैठती। लेकिन इसके बारे में और अधिक विस्तार से कल लिखूँगा।

काम-वासना हमेशा से इस संसार का हिस्सा रही है। यह सर्वव्यापी है-साहित्य से लेकर कलाओं तक, घरों में मौजूद मूर्तियों से लेकर पूजास्थलों में उकेरी गई चित्रकारी तक। तकनीक के विकास के साथ इनकी प्रतिकृतियाँ सर्वसुलभ हो गई हैं, माउस के एक क्लिक के साथ आपके कंप्यूटर स्क्रीन पर तुरंत हाजिर! लेकिन दुर्भाग्य से कामवासना या कामोत्तेजना के बारे में वही पुरानी समझ अब भी बरकरार है, उसमें रत्ती भर भी परिवर्तन नहीं हुआ है।

आज भी बहुत से लोग काम-वासना को बुरी चीज़ समझते हैं। जितना अधिक वे कट्टर होते जाते हैं, काम-वासना, सेक्स और उसके आसपास मौजूद हर चीज़ को वे उतना ही अधिक बुरा समझते जाते हैं। कामुक होना बीमार मस्तिष्क होने का प्रमाण माना जाता है। एक स्वस्थ मस्तिष्क में ऐसे कामोत्तेजक विचार नहीं आ सकते और पाक-साफ़ शरीर में ऐसे एहसासात, ऐसी इच्छाएँ और वासनाएँ पैदा भी नहीं होनी चाहिए। अगर आप सेक्स का आनंद लेते हैं या उसके बारे में सोचते भी हैं तो अपने आपको अपराधी महसूस करना चाहिए। शारीरिक वासनाओं की अनुभूति का दमन किया जाना चाहिए। अतिधार्मिक लोग ब्रह्मचर्य की इसी धारणा पर विश्वास करते हैं। सन्यास के ज़रिए वे पवित्रता प्राप्त करने की कोशिश करते हैं।

मैं समझता हूँ कि यही वास्तव में रुग्ण सोच है। धर्म ने लोगों के मन में यह बात बिठा दी है कि कामुकता बुरी चीज़ है। यह पूर्वाग्रह ही लोगों को शारीरिक और मानसिक रूप से बीमार बनाता है! ब्रह्मचर्य पूरी तरह अप्राकृतिक विचार है। संभोग का दमन करके शुद्धि प्राप्त करने का दावा करना पूरी तरह अवैज्ञानिक है लेकिन धर्म इसकी परवाह नहीं करता!

यौनेच्छाओं का यही दमन पुरुषों और महिलाओं को उसकी खोज की ओर, उसकी अधिकाधिक जाँच-परख की ओर उद्यत करता है, भले ही यह वे ढँके-छुपे तरीके से करते हों। और उसके बाद वह कई रुग्ण तरीकों से फूट पड़ता है-यौन अपराध की शक्ल में, जिन्हें होता हुआ हम रोज़ देखते हैं, क्योंकि अपनी नैसर्गिक उत्तेजनाओं को बाहर निकालने का कोई रास्ता उनके पास नहीं होता!

कामुकता: सैकड़ों सालों से उसकी शोहरत एक मनोविकार के रूप, एक गर्हित अनुभूति के रूप में रही है और मेरे विचार में, इस धारणा को बदलने का वक़्त आ गया है!

मैं पुनः कभी दक्षिण अफ्रीका क्यों नहीं जाऊँगा? 19 अक्टूबर 2014

सन 2006 में अपनी बहन के विछोह और दुःख के साए में हमारा समय कटता रहा। एक सीमा के बाद लगने लगा कि हमारे सारे आँसू बहकर निकल चुके हैं। मैं और यशेंदु उसके बाद एक माह या शायद उससे कुछ अधिक भारत में ही रहे और उसके बाद अपनी-अपनी हवाई यात्राओं पर निकल पड़े। वह जर्मनी चला गया और मैं वापस दक्षिण अफ्रीका की ओर निकल पड़ा।

बहन के अपघात से पहले दक्षिण अफ्रीका में मैं सिर्फ कुछ दिनों के लिए ही रहा था। वह दक्षिण अफ्रीका का बल्कि अफ्रीका का ही मेरा पहला दौरा था-और आज तक का वह पहला दौरा ही बना हुआ है। मैं नहीं कह सकता कि मैंने उसे ज़्यादा पसंद किया था।

जोहंसबर्ग में मैं अपने व्यक्तिगत-सत्र आयोजित करता रहा, व्याख्यान भी दिए और कुछ कार्यशालाएँ भी आयोजित कीं। इस कारण मैं भारतीयों के यहाँ तो रहता ही रहा लेकिन कुछ गैर भारतीय दक्षिण अफ्रीकियों से भी मेरा संपर्क हुआ। स्वाभाविक ही मेरे बाकी के कार्यक्रम स्थगित कर दिए गए थे लेकिन मेरे आरक्षित टिकिटों के कारण, जो दक्षिण अफ्रीका से भारत और भारत से वापसी के टिकिट थे, मुझे उस देश में दो दिन और रुकना था।

मुझे बहुत अच्छा कतई नहीं लग रहा था। मैं अशांत और असुरक्षित महसूस कर रहा था। हर जगह, जहाँ मैं रुका हुआ था और जहाँ भी मैं गया, बिना किसी अपवाद के सभी मकानों में तारों की बड़ी-बड़ी बाड़ें या दीवारें खड़ी की गई थीं और उनके ऊपर सुरक्षा हेतु काँटेदार तार बिछाए गए थे और मुझे बताया गया कि अधिकतर इन तारों में बिजली का करंट भी प्रवाहित कर दिया जाता था, जिससे अनधिकृत प्रवेश करने वालों को बिजली का झटका लगे।

मैंने अपने प्रायोजकों से पूछा कि क्या वहाँ बहुत अधिक अपराध होते हैं तो उन्होंने बताया- और जिसकी बहुत से दूसरे लोगों ने भी ताईद की- कि वहाँ अपराधों की संख्या खतरनाक रूप से बहुत ज़्यादा है! एक परिवार ने, जिसने मुझे भोजन के लिए आमंत्रित किया था, बताया कि सिर्फ दो-तीन माह पहले ही सारे सुरक्षा इंतजामों के बाद भी अपराधियों ने उनका ऑफिस लूट लिया था।

स्वाभाविक ही, ऐसी बातों का बखान करते वक़्त लोग कुछ बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं लेकिन जब भी मैं बाहर निकलता, यह बात मेरे दिमाग में बनी रहती। सिर्फ मोबाइल के लिए कोई आपकी जान भी ले सकता है। या पाँच डॉलर जेब में रखकर बाहर निकलना भी खतरे से खाली नहीं है।

मुझसे कहा गया कि शाम के वक़्त, बाहर अँधेरे में पैदल घूमने न निकलूँ। सिर्फ दिन में और वह भी सिर्फ सुरक्षित इलाकों में ही आप पैदल घूम सकते हैं- और बेहतर हो, अगर कार का उपयोग करें। मुझे याद आया मेरे दो दोस्तों ने बताया था कि वे वहाँ छुट्टियाँ बिताने गए थे और इसी तरह उन्हें लूट लिया गया था। मैं जानता था कि बहुत से लोगों को दक्षिण अफ्रीका बहुत पसंद आता है और वे पर्यटन के लिए यहाँ जाते हैं।

लेकिन मुझे वहाँ बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। एक ऐसी जगह, जहाँ हर वक़्त खतरा आपके दिमाग पर हावी हो और आपका बाहर निकलकर पैदल घूमना-फिरना भी मुहाल हो। तो फिर ऐसी जगह दोबारा क्यों जाया जाए, जहाँ आप सुरक्षित महसूस नहीं करते? जहाँ आपको लगे कि अपनी सुरक्षा को लेकर हर वक़्त चौकन्ना रहना होगा?

किसी तरह दो दिन और गुज़ारकर मैंने उस जगह से बिदा ली और जर्मनी के लिए हवाई जहाज़ पकड़ा!

मुझे दक्षिण अफ्रीका आने का निमंत्रण बाद में फिर मिला मगर मैंने इंकार कर दिया। मेरे लिए एक बार का अनुभव ही बहुत था।

यदि भारतीय पुरुष चाहते हैं कि उन्हें एक संभावित बलात्कारी न समझा जाए तो उन्हें क्या परिवर्तन लाने होंगे! 28 जनवरी 2014

मैं पिछले सप्ताह पश्चिमी महिलाओं के विरुद्ध होने वाले यौन उत्पीड़न के विषय में लिखता रहा हूँ। इस दौरान मैंने बताया कि भारतीय महिलाओं को भी अपने दैनिक जीवन में, रोज़ ही ऐसे उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, मैंने तर्क और उदाहरण देकर यह भी स्पष्ट किया कि कैसे महिलाओं के वस्त्र उनके विरुद्ध होने वाले उत्पीड़न या बलात्कार के कारण नहीं हैं और अंत में इस समस्या के मूल कारणों की पड़ताल करते हुए स्पष्ट किया कि भारतीय समाज में व्याप्त सेक्स वर्जनाएँ ही इस समस्या के जड़-मूल में स्थित हैं। मैं आज भारतीय पुरुषों को संबोधित करते हुए एक अपील लिखना चाहता हूँ क्योंकि समाज में बदलाव आवश्यक है!

और क्या परिवर्तन की शुरुआत खुद अपने आपसे करना व्यावहारिक नहीं होगा?

जब मैं भारत में होने वाले बलात्कारों के बारे में लिखता हूँ तो अक्सर इस तरह की प्रतिक्रियाएँ प्राप्त होती हैं: लेकिन सिर्फ अपराधी ही तो बलात्कारी होते हैं, सामान्य लोग इन अपराधों में लिप्त नहीं होते! मैं मानता हूँ कि अपराधी प्रवृत्ति वाला कोई व्यक्ति ही ऐसा घृणित अपराध कर सकता है मगर दूसरी तरफ आप किसी भी भारतीय महिला से पूछें तो वह यही बताएगी कि जीवन में कम से कम एक बार उसके साथ यौन उत्पीड़न हुआ है। यह बात क्या प्रदर्शित करती है? या तो देश के अधिकांश पुरुष अपराधी हैं या फिर महिलाओं के प्रति ऐसे अशिष्ट व्यवहार को अधिकांश पुरुष बहुत सामान्य मानते हैं, महिलाओं के प्रति असभ्यता और निरादर उनकी मूल प्रवृत्तियों में शामिल हो गया है। स्त्रियॉं के प्रति यौन प्रताड़ना हमारी संस्कृति में रूढ़ है और उसी तरह हम दैनिक जीवन में उनके साथ व्यवहार करते हैं।

एक बात स्पष्ट है: जब तक भारत की सड़कों पर स्त्रियॉं का यौन उत्पीड़न जारी है तब तक एक सामान्य भारतीय पुरुष के रूप में आप इस बात के लिए अभिशप्त हैं कि आपको महिलाओं द्वारा एक संभावित खतरे के रूप में देखा जाए, चाहे वे महिलाएं विदेशी हों या भारतीय।

आशा करता हूँ कि मेरे ब्लॉग पढ़ने के बाद आप किसी महिला के साथ बलात्कार नहीं करेंगे। मैं यह भी आशा करता हूँ कि आप उनमें से नहीं हैं जो महिलाओं को छूने का कोई मौका नहीं गँवाते, जो सरे-राह उन पर फब्तियाँ कसते हैं छीटाकशी करते हैं या वे असहज हो जाएँ इतना घूर-घूरकर उनकी तरफ देखते हैं। लेकिन सवाल यह है कि इस विषय में आप क्या विचार रखते हैं? मित्रों के साथ चर्चाओं में आप महिलाओं के विषय में किस तरह बात करते हैं? अपने परिवार और आस-पड़ोस की महिलाओं के प्रति आपका रवैया क्या है? महिलाओं के विषय में सामान्य रूप से आप क्या महसूस करते हैं? पत्नी के साथ आपका बर्ताव कैसा है? अपने बच्चों को आप इस विषय में क्या सिखाते हैं? कहीं अपनी बेटी और अपने बेटे के साथ आपके व्यवहार में अंतर तो नहीं है?

सामान्य रूप से भारतीय संस्कृति, पूर्वाग्रह और मनोवृत्तियां भारतीय पुरुषों में महिलाओं के प्रति सम्मान की कमी के लिए उत्तरदायी हैं। स्त्रियों को देवियों के रूप में मंदिरों में पूजा जाता है लेकिन घर में सबसे निचली पायदान पर उनकी उपस्थिति होती है, उनका दमन किया जाता है और उन्हें पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता, घर के महत्वपूर्ण निर्णयों में उनका दखल वर्जित होता है: यानी कुल मिलाकर उन्हें सम्मानजनक रूप से बराबरी के अधिकार प्राप्त नहीं हैं। आपको अपने जीवन में परिवर्तन लाकर इस परिस्थिति के खिलाफ हरसंभव कार्यवाही करनी चाहिए।

मेहरबानी करके अपने लड़कों को महिलाओं का आदर करना सिखाएँ, कि वे उन्हें अपने समान मानें और उनके साथ बराबरी का व्यवहार करें। अपने व्यवहार से यह बात साबित करें और अपने मित्रों के लिए भी उदाहरण बनें। अपनी पत्नी, बेटियों, बहनों और महिला मित्रों को ठीक वही सम्मान दें, जो आप अपने पुरुष संबंधियों को देते हैं। सबसे मुख्य बात यह कि उन्हें खुद से प्रेम और खुद का आदर करना सिखाएँ। उन्हें यह न सिखाएँ कि वे क्या पहनें और क्या नहीं। अगर वे पढ़ना या नौकरी करना चाहें तो अपने स्वप्न पूरे करने की न सिर्फ उन्हें छूट दें बल्कि उनकी मदद करें कि वे उन्हें पूरा कर सकें। अपनी बेटियों को अपना जीवनसाथी चुनने की पूरी छूट दें, एक ऐसा व्यक्ति चुनने की, जो उसे प्रेम करता हो। उन्हें शक्ति और समर्थन प्रदान करें।

अपने यौन जीवन का पूरा लुत्फ उठाएँ। अपनी यौनिकता का दमन न करें बल्कि अपनी पत्नी के साथ अपनी और उसकी कामनाओं और स्वैर कल्पनाओं (fantasies) पर चर्चा करें। उन्हें अधिक से अधिक पूरा करने का प्रयास करें। एक दूसरे के लिए पर्याप्त समय निकालें, अपने प्यार का प्रदर्शन करें और प्यार की अति करके उसे अचंभित कर दें। अपने सम्मान युक्त प्रेम-सम्बन्ध को ऐसा बनाए कि आपके बच्चों और दोस्तों के सामने वह एक दृष्टांत के रूप में प्रस्तुत हो सके, उन्हें पता चले कि एक महिला का सम्मान किस तरह किया जाना चाहिए।

देश की सड़कों पर महिलाओं के विरुद्ध होने वाले यौन दुराचार को आप महज अपराधियों का काम कह कर अनदेखा नहीं कर सकते। इसका नतीजा आपके लिए ही बुरा होगा। जी हाँ, सिर्फ देश की प्रतिष्ठा के लिए ही नहीं, न ही सिर्फ पर्यटन उद्योग के लिए क्योंकि फिर विदेशी महिलाएं पर्यटन के लिए किसी दूसरे देश को वरीयता देंगी, बल्कि आपके लिए भी। जी हाँ, यह आपके लिए बुरी बात होगी क्योंकि इन महिलाओं द्वारा आपको एक संभावित बलात्कारी के रूप में देखा जाएगा, भले ही आप वैसे न हों। क्या आप चाहते हैं कि आपको एक बलात्कारी के रूप में देखा जाए?

जब तक आप अपने समाज को पूरी तरह बदलते नहीं तब तक आप भी महिलाओं की नज़र में एक संभावित खतरा हैं।

इसलिए इस सामाजिक परिवर्तन के लिए पूरी शक्ति के साथ काम करें।

बलात्कारी पंच – पंचायतें जहां बलात्कार अपराध नहीं बल्कि प्रेम की सज़ा है – 27 जनवरी 2014

पिछले सप्ताह से मैं भारत में महिलाओं के विरुद्ध होने वाली यौन प्रताड़नाओं और बलात्कारों के विषय में लगातार लिखता रहा हूँ और देखिये, इसी बीच बंगाल में एक और वीभत्स हादसा पेश आ गया। कलकत्ता से सिर्फ 180 किलोमीटर दूर एक गाँव में एक महिला पर सामूहिक बलात्कार किया गया। और इस बार यह बिना सोचे-समझे या दुर्भाग्यवश चंगुल में फंसी किसी महिला के साथ नहीं हुआ है बल्कि यह काफी सोच-विचार करने के बाद, महिला पर आरोप मढ़कर, पंचायत द्वारा सज़ा दिलवाकर किया गया सामूहिक बलात्कार है। वाकई यह एक सामान्य बलात्कार नहीं है। बलात्कारियों में सज़ा मुकर्रर करने वाले जज, पंच-सरपंच आदि सभी शामिल थे।

20 वर्षीय एक लड़की का एक पुरुष के साथ प्रेम हो जाता है। उनकी नज़र में पड़ोस के गाँव का वह पुरुष बुरा व्यक्ति था और उसके साथ गाँव की लड़की का प्रेम समाज को स्वीकार नहीं था। एक बार गाँव वालों को वे दोनों एक साथ दिखाई दे गए और वे उन दोनों को घसीटते हुए गाँव ले आए और तुरत-फुरत पंचायत (ग्राम अदालत) बिठा दी गई।

लड़की के परिवार को आदेश दिया गया कि वे 50000 रुपए अदा करें जो इतनी बड़ी रकम थी कि वे अदा नहीं कर सकते थे और यह बात पंचायत भी जानती थी। जब परिवार वालों ने कहा कि उनके पास इतनी रकम नहीं है तो पंचायत ने लड़की के विरुद्ध यह भयंकर फैसला सुनाया, जिसमें गाँव के कुछ पुरुषों से कहा गया कि वे उस लड़की पर बलात्कार करके उसे उपयुक्त सज़ा दें।

अब उसे याद नहीं है कि कितने लोगों ने उसके साथ बलात्कार किया लेकिन उनकी संख्या कम से कम तेरह थी। इनमें से कई तो ऐसे थे, जिन्हें वह चाचा और भाई कहा करती थी और जिनके साथ उसके संबंध परिवार के सदस्यों जैसे आत्मीय थे। बलात्कार के बाद लड़की के बुरी तरह ज़ख्मी होने और रक्तरंजित होने के बावजूद परिवार वालों को घंटों उसे अस्पताल ले जाने से रोका गया। आखिर जब वे उसे अस्पताल ले जा सके तभी पुलिस में रपट भी लिखाई जा सकी।

पुलिस ने तेरह लोगों को इस आपराधिक मामले में गिरफ्तार किया है, जिनमें वह पंच भी शामिल हैं जिन्होंने यह ‘सज़ा’ सुनाई थी। फिर भी वे गिरफ्तारी से बचने की कोशिश करते रहे और पुलिस को अतिरिक्त पुलिस बुलवानी पड़ी तब जाकर संदिग्ध अपराधियों को गिरफ्तार किया जा सका।

हाल में पढ़ने में आया, इस तरह स्तब्ध कर देने वाला यह सबसे भयानक अपराध है। इसलिए नहीं कि दूसरे ऐसे अपराध कम गंभीर हैं बल्कि इसलिए कि यह आपराधिक प्रवृत्ति के व्यक्ति द्वारा शारीरिक और मानसिक उत्तेजना में तत्क्षण किया जाने वाला अपराध नहीं था। इस मामले में अपराध करने वाले समझ रहे थे कि वे न्याय कर रहे हैं, वे सोच रहे थे कि उस लड़की के साथ बलात्कार किया जाना आवश्यक है!

महिलाओं के विरुद्ध भारत में होने वाले कुल अपराधों में पश्चिम बंगाल का हिस्सा सबसे बड़ा है। सुदूर गावों में बुज़ुर्गों द्वारा अपने कानून बना लिए जाते हैं और उनके आधार पर अपराधों की सजाएँ सुनाई जाती हैं। इन्हें ग्राम पंचायत कहा जाता है और ऐसी घटनाओं से आप समझ सकते हैं कि वे महिलाओं के बारे में क्या विचार रखते हैं, उस समाज में महिलाओं की स्थिति क्या है और उनकी तुलना में ज़ुल्म करने वाले पुरुष कितने शक्तिशाली हैं।

ऐसी घटनाएँ आपके मन में क्षोभ, जुगुप्सा ही पैदा करती हैं और आप सोचने के लिए मजबूर हो जाते हैं कि आज भी ऐसे लोग मौजूद हैं, ऐसे समाज मौजूद हैं, जहां बलात्कार को पीड़िता की ही गलती के कारण होने वाला अपराध माना जाता है, जैसे मानसिक रूप से बीमार पुरुष का कोई अपराध ही न हो!

महिलाओं के कपड़े बलात्कार या यौन उत्पीडन का कारण नहीं हैं! 22 जनवरी 2014

परसों के ब्लॉग में यह लिखने पर कि जब भारतीय पुरुष मेरी पश्चिमी पत्नी और पश्चिमी महिला मित्रों की तरफ राह चलते आंखे फाड़-फाड़कर देखते हैं तो वे लोग असहज हो उठते हैं, मुझे एक अप्रत्याशित टिप्पणी प्राप्त हुई है:किसी ने यह कहा है कि ऐसा उनके कपड़ों के चलते होता है! अब इस बात को एक बार और स्पष्ट कर दूँ कि यौन उत्पीड़न और बलात्कार में महिलाओं के कपड़ों का कोई योगदान नहीं होता!

उसने लिखा, और स्वाभाविक ही वह पुरुष ही होगा, कि भारत में रहते हुए विदेशी महिलाओं को भारतीय वस्त्र पहनने चाहिए, साड़ी जैसे वस्त्रों से ‘महिलाओं की तरह अपने आपको ढँककर रखना चाहिए’; तब आपकी तरफ कोई ध्यान नहीं देगा लेकिन ‘अगर आप पश्चिमी महिला की तरह वस्त्र पहनेंगे तो लोगों की निगाहों से बच नहीं सकते!’

जहां तक मेरी पत्नी का और उसे घूरती निगाहों का प्रश्न है तो बता दूँ कि वह कभी भी ऐसे (अंगप्रदर्शक) वस्त्र नहीं पहनती लेकिन वह पंजाबी सूट (शलवार-कमीज़), साड़ी या जींस-टीशर्ट में भी बाहर निकले तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता: उसका रंग सफ़ेद है, वह महिला है, घूरने के लिए इतना ही भारतीय पुरुषों के लिए काफी होता है। और फिर वह कुछ भी पहने, किसी के इस तरह घूरने को उचित नहीं ठहराया जा सकता। एक और बात, और यह बात मैं उसके विशेष अनुरोध पर लिख रहा हूँ: वह यह कि साड़ी उस तरह पूरे शरीर को नहीं ढँकती जिस तरह जींस और टीशर्ट जैसे पश्चिमी वस्त्र ढँकते हैं! साड़ी में तो पेट और पीठ का बड़ा हिस्सा खुला ही रह जाता है यानी अगर वह साड़ी पहने तो उसके बदन का ज़्यादा हिस्सा दिखाई देता है!

दरअसल मैं तो समझता था कि हम इस विवाद से आगे निकल आए हैं कि महिलाओं को उनके वस्त्रों के कारण प्रताड़ित होना पड़ता है! लेकिन नहीं। स्पष्ट ही आज भी ऐसे लोग मौजूद हैं, जो यह समझते हैं कि महिलाओं पर बलात्कार इसलिए होता है कि वह स्कर्ट पहनती है, क्योंकि वह अपने कंधे ढँककर नहीं रखती, क्योंकि वह ऊंचा पैंट पहनती है। संक्षेप में कहें तो यह विचार बेहद मूर्खतापूर्ण है।

महिलाएं कुछ भी पहनें उन्हें प्रताड़ित होना पड़ता है, चाहे वह कहीं की भी हो। अगर पहनावा ही इसके मूल में होता तो फिर साड़ी पहनकर घूमने वाली महिलाओं को भी वैसी ही गलत निगाहों और फब्तियों का सामना क्योंकर करना पड़ता है? कल ही मैंने कहा था कि भारतीय महिलाओं को इस तरह की प्रताड़ना ज़्यादा झेलनी पड़ती है। इसके अलावा उन्हें समाज की मदद भी कम मिल पाती है और उन घटनाओं पर कार्यवाही भी कम ही हो पाती है!

जो लोग आज भी सोशल मीडिया में ऐसी बकवास बातें लिख रहे हैं उनसे मैं पूछना चाहता हूँ कि क्या आप लोगों ने ‘यह आपका दोष है (It’s your fault)’ शीर्षक वीडियो देखा है जो इस समय नेट पर बहुत ज़्यादा देखा जा रहा है और जो यौन उत्पीड़न की शिकार महिला को ही दोषी ठहराने के इस रवैये का मज़ाक बनाता है? क्या आपने उन चित्रों को कभी नहीं देखा, जिनमें बलात्कार पीडिताओं को उनके द्वारा पहने हुए कपड़ों में दिखाया जाता है? क्या वे वही कपड़े नहीं पहने होतीं जिनकी आप अनुशंसा कर रहे हैं। बलात्कार का कारण परिधान नहीं हैं, इसका कारण यह नहीं है कि वे क्या पहनती हैं!

वह कहाँ जाती है, कौन से कपड़े पहनी है, वह कैसी दिखती है और उसके हावभाव कैसे हैं, इनमें से किसी भी तर्क के आधार पर आप उसे दोषी नहीं ठहरा सकते। आप यह कभी नहीं कह सकते कि वह ‘यही चाहती थी’! ऐसे अपराधों का कोई तार्किक औचित्य सिद्ध नहीं किया जा सकता और इनमें घूर-घूरकर देखना और छूने की कोशिश करना भी शामिल हैं!

वाकई, बलात्कार से बचने के लिए किसी महिला के लिए अपने शरीर को पूरी तरह ढँककर रखना क्यों ज़रूरी हो? क्या बुर्के वाली महिलाओं पर बलात्कार नहीं होता? शरीर ढँक लिया, फिर प्रताड़ित क्यों हुईं? भारत में अधिकतर बलात्कार गावों में होते हैं, जहाँ कोई महिला पेंट या टीशर्ट नहीं पहनतीं बल्कि परम्परागत भारतीय वस्त्र पहनती हैं, जिसमें उनका सिर, केश और पूरा बदन ‘उचित रूप से ढँका’ होता है! और बच्चों पर, यहाँ तक कि दूध पीते बच्चों पर बलात्कार क्यों होता है? वे किस तरह का अंगप्रदर्शन करते हैं और किस तरह ‘यही चाहते हैं’?

किसी महिला को सिर्फ अपने परिधानों के कारण यौन सुरक्षा के लिए चिंतित क्यों होना पड़े? सिर्फ इसलिए कि पुरुष अपनी यौन पिपासा को काबू में नहीं रख पाते? क्योंकि दरअसल वही अपने उच्छृंखल मस्तिष्क द्वारा परिचालित कमजोर कमजोर लिंगी मनुष्य है!

अगर आप ऊपर दिए गए तर्क पर अडिग हैं तो अंगप्रदर्शक वस्त्रों में किसी महिला को अपने करीब से गुजरते देखकर आपके मन में क्या चल रहा होता होगा, इसे आप स्पष्ट रूप से ज़ाहिर कर रहे हैं। अब मैं आपसे एक प्रश्न करता हूँ: बताइये कि उसे यौन रूप से प्रताड़ित करने से आप कितनी दूर हैं? अखबारों में समाचार बनने वाला बलात्कार करने में आपको और कितना समय लगने वाला है?

स्वाभाविक ही, ज़्यादा दूर नहीं हैं आप! या आपमें इतनी शर्म बाकी है कि ऐसे बेहूदा तर्कों से अपने आपको अलग कर लें?

सामान्य भारतीय महिला के जीवन में यौन प्रताड़ना दैनिक अनुभव है – 21 जनवरी 2014

मुख्य रूप से पश्चिमी महिलाओं पर हो रहे यौन अपराधों पर लिखी कल की टिप्पणी को आगे बढ़ाते हुए आज मैं उन अनगिनत महिलाओं के विषय में लिखना चाहता हूँ, जिनके लिए यौन प्रताड़ना रोज़ का अनुभव है: जी हाँ, भारतीय महिलाएं, जो इस देश में निवास करती हैं और जिन्हें इन्हीं सड़कों और गलियों से होते हुए रोज़ ही गुजरना होता है। इन पीड़ित महिलाओं के प्रकरण अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में बहुत कम चर्चित हो पाते हैं। यहाँ तक कि स्थानीय मीडिया भी उन शिकायतों पर पर्याप्त तवज्जो नहीं देता। समस्या यह है कि ये प्रकरण बहुत ‘सामान्य’ माने जाते हैं क्योंकि ऐसी घटनाएँ रोज़ ही होती हैं, दिन दहाड़े, अगल-अलग जगहों पर, कई-कई बार होती रहती हैं और इन्हें जीवन का सामान्य हिस्सा मान लिया गया है।

मैं बलात्कार पर ज़्यादा कुछ नहीं कहूँगा क्योंकि यहाँ मैं महिलाओं पर रोज़ होने वाली प्रताड़नाओं के बारे में बात करना चाहता हूँ। हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार 93% बलात्कार ऐसे लोगों द्वारा किए जाते हैं, जिनसे प्रताड़ित महिला परिचित होती है, जिसे घरेलू हिंसा कहा जाता है, पिता या चाचा के द्वारा, मित्रों या दूसरे रिश्तेदारों द्वारा। मैं उन अपराधों पर बात करना चाहता हूँ जो रोजाना खुले आम, सड़कों, बसों, ट्रेनों और कार्यालयों में होते हैं: कामुकता के साथ घूरना, अपमानजनक फब्तियाँ कसना, भीड़ भरी बसों, ट्रेनों या दुकानों में स्त्रियॉं के नितंबों या स्तनों को छूना आदि आदि।

इन प्रताड़नाओं पर शुरुआत से चर्चा करें: घूरना। मैंने बताया था कि जब भी मैं अपने विदेशी मित्रों के साथ बाहर निकलता हूँ तो मेरी महिला मित्रों को भारतीय पुरुष बहुत अनुपयुक्त तरीके से देखते हैं। उनकी नज़रों में सम्मान नहीं होता और कई बार लगता है जैसे ये पुरुष आँखों ही आँखों में उन महिलाओं पर बलात्कार कर रहे हैं! एक बार मैंने ऐसा करने वाले एक व्यक्ति से पूछा भी: क्या घूर रहे हो? तो वो मुझपर ही आक्रामक हो गया और बोला "अरे देख ही तो रहे हैं!" मतलब यह कि गनीमत समझो कि इसके कपड़े तो नहीं फाड़ रहे हैं!!

मेरी प्रिय पश्चिमी महिलाओं, ऐसा होने पर आप तो स्तब्ध रह जाती हैं मगर भारतीय महिलाओं के साथ तो यह अक्सर होता रहता है। बहुत बुरा होने पर आप अपने राजदूतावास चली जाती हैं और अगर वे पुलिस बुला लें तो उन घूरने वालों पर कार्यवाही भी हो सकती है, मीडिया, और देश के बुद्धिजीवी आपके पक्ष में खड़े हो जाते हैं, यहाँ तक कि अगर आप चिल्ला दें तो आसपास के लोग आपका पक्ष लेकर उस आदमी की पिटाई तक कर दें। लेकिन भारतीय महिला के साथ ऐसा अपराध होने पर कोई कार्यवाही नहीं होती क्योंकि उसके साथ होने वाले अपराध रोज़मर्रा की बात हैं, उन्हें सामान्य घटना माना जाता है। मेरी असंख्य भारतीय मित्र बताती हैं कि ऐसी एक भी स्त्री नहीं होगी, जिसे इन अनुभवों से गुज़रना न पड़ा हो।

जी हाँ, एक औसत भारतीय महिला का यही कहना है कि इस तरह नज़रों से, ज़बान से और छूने से होने वाले यौन उत्पीड़न उनके दैनिक जीवन का हिस्सा हैं! इसीलिए माएँ अपनी बच्चियों को मर्दों से दूर रहने की हिदायत देती हैं। इसीलिए पिता अपनी लड़कियों को ज़्यादा बाहर निकलने नहीं देते और लौटने में देर होने पर चिंतित रहते हैं। यही कारण है कि अभिभावक, लड़कियों को बाहर निकलना ही पड़े तो भाइयों या चचेरे भाइयों को भी उनके साथ भेज देते हैं और यही कारण है कि लड़कियां समूह बनाकर बाहर निकलती हैं और हमेशा अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित रहती हैं।

यह कहना ज्यादती होगी कि महिलाओं की तरफ बिना किसी सम्मान के घूरने वाला हर व्यक्ति बलात्कारी ही है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि हर ऐसा व्यक्ति भविष्य में बलात्कार करेगा ही। फिर भी यह चिंता तो होती ही है कि जब वह सबके सामने आँखों से बलात्कार कर रहा है तो अकेला पाकर महिला के साथ क्या कर सकता है? मौका मिलने पर वह ऐसा नहीं करेगा इसकी क्या गारंटी है?

लेकिन यह बात भी सच है कि देश में एक नई हवा बह चली है। आजकल महिलाएं स्वसुरक्षा की ट्रेनिंग ले रही हैं, पुरुषों की गलत नज़रों पर या फब्तियों पर उन्हें लताड़ना शुरू कर चुकी हैं, आप पत्र-पत्रिकाओं में उन महिलाओं और उनके समूहों के बारे में पढ़ते हैं, जो अपने अधिकारों के लिए लड़ती हैं और ज़ुल्म के खिलाफ डटकर खड़े होने की हिम्मत दिखाती हैं, आप उन्हें प्रतिवाद और प्रतिरोध करता हुआ देख सकते हैं। हम देखते हैं कि चीज़ें बदल रही हैं और हम आशा करते हैं कि इन स्थितियों में बदलाव और तेज़ होगा।

मैं अगले कुछ दिन इस समस्या के मूल में स्थित कारणों का ज़िक्र करूंगा और साथ ही भारत भ्रमण पर आई महिला पर्यटकों के लिए कुछ सुरक्षा-टिप्स देने का प्रयास करूंगा। फिलहाल इतना ही कि: अपनी सुरक्षा के आप खुद जिम्मेदार हैं!

विदेशियों के मन में भारत की बद से बद्तर होती जा रही खराब छवि – 20 जनवरी 2014

पिछले सप्ताह हमें एक डैनिश महिला पर्यटक के साथ हुए सामूहिक बलात्कार का समाचार प्राप्त हुआ। दुर्भाग्य से उस रात वह अपने होटल का रास्ता भूल गई थी और भटक गई थी। यह जानकारी स्तब्ध कर देने वाली थी। बदकिस्मती से यह पहला ऐसा वाकया नहीं है बल्कि पिछले कुछ महीनों में हुए बलात्कार और सेक्स उत्पीड़न के अनेकानेक हादसों में से एक है!

कुछ लोग कहते हैं कि उस महिला ने, जो देर रात एक संग्रहालय देखकर वापस लौट रही थी, पुरुषों के समूह से सहायता का निवेदन करके गलती की। कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि उसी रास्ते से चलकर उसे वापस चले जाना चाहिए था। कुछ लोग यह भी कहेंगे कि उसे रास्ता भूलना ही नहीं चाहिए था या उस इलाके के होटल में नहीं ठहरना चाहिए था।

लेकिन सच बात यह है कि किसी भी स्थिति में बलात्कार को पीड़िता का दोष नहीं कहा जा सकता। ऐसे अपराध तो होने ही नहीं चाहिए। किसी से सहायता मांगते हुए डरना क्यों पड़े! सड़क पर आप निर्भय होकर चल सकें, चाहे रात हो या दिन, अकेले या किसी के साथ, महिला हों या पुरुष और कहीं के भी नागरिक हों। भारत से बाहर मेरे लिए भी यही जायज़ बात है। ऐसी घटनाएँ होनी ही नहीं चाहिए।

दुर्भाग्य से इन हादसों की बेरोकटोक पुनरावृत्ति होती चली जा रही है और इसके चलते भारतीय मेहमान-नवाज़ी की प्रतिष्ठा लगातार दागदार हो रही है। परिणामस्वरूप हम अपने मेहमानों से अक्सर यह सुनने के लिए मजबूर हैं कि विदेशी महिलाएं भारत भ्रमण करने से डरती हैं। नीचे मैं एक ईमेल प्रस्तुत कर रहा हूँ जो मुझे हाल ही में एक महिला से प्राप्त हुआ है:

"….मैं चाहती हूँ कि आप मुझे भारत में सफर के दौरान आने वाले संभावित खतरों के विषय में उचित सलाह दें, क्योंकि मैं पहली बार भारत की यात्रा कर रही हूँ और समाचारपत्रों में पढ़ती रही हूँ कि अपनी रूढ़िग्रस्त संस्कृति के चलते भारतीय पुरुष यौन पिपासा से पीड़ित पाए जाते हैं; जैसे पिछले दिनों एक बस में एक लड़की के साथ बलात्कार हो गया था, आदि आदि…। इसलिए मैं जानना चाहती हूँ कि पीछा किए जाने या लूटे जाने का खतरा उठाए बिना बस या ट्रेन में सफर करना या सड़क पर पैदल चलना सुरक्षित है या नहीं। सलाह के लिए अग्रिम धन्यवाद और आप सभी को शुभकामनाएँ। आपकी, ****।"

नोट करें कि यह पहला मौका नहीं है जब हमें ऐसा ईमेल प्राप्त हुआ है! यह अब एक सामान्य बात होती जा रही है और जब वे महिलाएं यहाँ आती हैं तब भी सुरक्षा के बारे में उनके अनेक सवाल होते हैं: सुरक्षित रहने के लिए उन्हें कैसा व्यवहार करना चाहिए, कैसे कपड़े पहनने चाहिए, आदि आदि! मैं उनकी आशंका समझ सकता हूँ क्योंकि अब महिलाओं के साथ यौन दुराचार भारत के यथार्थ का हिस्सा बनते जा रहे हैं।

मैं जब यहाँ, भारत में, अपनी यूरोपियन पत्नी और दूसरी गोरी महिलाओं सहित कुछ मित्रों के साथ बाहर निकलता हूँ तो देखता हूँ कि भीड़ किस तरह उनकी ओर आँख फाड़कर देखती है! यह उचित नहीं लगता, उनके पास से गुजरती इन महिलाओं के प्रति पुरुषों की नज़रों में कोई सम्मान नहीं होता! अपने मित्रों के साथ सड़क पर चलते हुए होने वाला यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है और जब मुझे यह बुरा लग रहा है तो सोचिए कि उन महिलाओं को वह कितना बुरा लगता होगा! वे ऐसी निगाहों के प्रति पहले से सचेत रहती हैं-फिर उस भीड़ का क्या, जहां पता नहीं किसका हाथ उनके नितंबों को सहलाकर चला गया? अंधेरी सड़क पर घर जाते वक़्त-ऐसी हालत में थोड़ा-बहुत डर लगना स्वाभाविक ही है!

लेकिन इस सबके बावजूद मैं यही कहना चाहूँगा कि भारत ज़रूर आइये। अगले कुछ दिन मैं आपको इस समस्या की जड़ों से रूबरू कराना चाहूँगा। इसके अलावा मैं भारतीय पुरुषों को संबोधित करते हुए एक अपील लिखना चाहूँगा और अंत में उन सभी गैर-भारतीय गोरी महिला पर्यटकों के लिए भारत भ्रमण से संबन्धित कुछ टिप्स देना चाहूँगा। ये टिप्स आजकल पत्र-पत्रिकाओं से प्राप्त होने वाली सामान्य सलाहों से कुछ अलग होंगी क्योंकि वे मेरे और मेरी जर्मन पत्नी के प्रत्यक्ष अनुभवों पर आधारित हैं। इस विषय में आगे पढ़ने के लिए अगले कुछ दिन मेरे ब्लोगों को अवश्य देखते रहें।

धार्मिक परम्पराएँ शिष्यों को गुरुओं के अपराधों पर पर्दा डालने पर मजबूर करती हैं-12 सितंबर 2013

आसाराम प्रकरण में सबसे बड़ी समस्या उनके शिष्यों की धार्मिक पृष्ठभूमि है। हिन्दू धर्म मनुष्य-पूजा (व्यक्ति पूजा) को प्रोत्साहित करता है! यह धार्मिक पृष्ठभूमि और संस्कार ही वे कारक हैं जो लोगों को अपने गुरु के विरुद्ध कुछ भी बोलने से रोकते हैं, भले ही उन्होंने गुरु को अपराध करते हुए देख लिया हो। यही कारण है कि गुरु द्वारा प्रताड़ित होने पर भी उनके शिष्य उसका प्रतिवाद नहीं करते और उसके अपराधों को किसी से कहते हुए सकुचाते हैं। ऐसे अपराध हो रहे हैं तो इनके पीछे सबसे मुख्य कारण यही है!

जिन धर्म-ग्रन्थों पर गुरु बनाने की परंपरा आधारित है, वे बताते हैं कि गुरु ईश्वर के समान या उससे भी बड़ा है। अर्थात, यह कि किसी दूसरे के मुंह से गुरु की आलोचना सुनना भी पाप है। जो भी गुरु करता है, ठीक करता है, इसलिए या तो आप उस व्यक्ति का मुंह बंद कर दें या अपने कान बंद कर लें, जिससे गुरु के विरुद्ध उच्चारे गए ऐसे कटु शब्द आपके दिमाग तक न पहुँचें।

हिन्दू धर्म कहता है कि गुरु के माध्यम से ही आपको मुक्ति प्राप्त हो सकती है-इसलिए हर मनुष्य के पास एक ऐसा व्यक्ति होना ही चाहिए जिसके बारे में वे कोई भी बुरी बात न सुनें। जैसे वे भगवान की मूर्ति के पाँव धोते हैं वैसे ही वे उसके भी पाँव पखारेंगे। भगवान के सामने नतमस्तक होते हैं उसी तरह गुरु के सामने भी होंगे। अपने गुरु के लिए उनका सम्पूर्ण समर्पण होगा।

हिन्दू धर्म की कुछ परम्पराओं में शिष्यों से अपने तन, मन और धन को गुरु के चरणों में समर्पित करने का आदेश है। कुछ गुरु जानबूझकर इसका शब्दशः अर्थ ग्रहण करते हैं और अपने शिष्यों से यथार्थ में अपने शरीर का समर्पण करने की अपेक्षा करते हैं। आसाराम के कुछ पूर्व शिष्य अब यह बता रहे हैं कि कैसे वह अश्लील बातें किया करता था और चाहता था कि वे धर्म-ग्रन्थों में लिखे आदेशानुसार अपने शरीर को उसे समर्पित करें!

ऐसी अपेक्षा रखने वाला अकेला आसाराम ही नहीं है। मैंने कई सम्प्रदायों के बारे में सुना है कि उनमें विवाह के तुरंत बाद घर की नई नवेली दुल्हिन को पहले परिवार के गुरु के पास जाना पड़ता है और उसके बाद ही वह अपने पति के साथ हमबिस्तर हो सकती है। उसे गुरु को प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है जैसे देवताओं को चढ़ाया जाता है! जब गुरु उसके साथ सो लेगा, उसे आशीर्वाद देगा तभी उसका पति और परिवार वाले उसका स्वागत करेंगे! भारत में आज भी यह सब चल रहा है, मगर क्यों? क्योंकि उनके लिए गुरु ईश्वर जैसा ही है!

काफी समय पहले, मेरा एक दोस्त था जो मेरी तरह ही प्रवचन इत्यादि किया करता था और उसने गुरु का चोला भी पहन लिया था। वह शादीशुदा था और लगभग 40 वर्ष का था लेकिन जब वह एक गाँव में गया तो उसके आयोजक ने अपनी 17 वर्षीय लड़की उसे दान कर दी! उसने क्या किया? उसने अपनी पत्नी को छोड़ दिया और उस लड़की से विवाह कर लिया और अब उनके कई बच्चे हैं!

विश्वास ने ऐसे रीति-रिवाजों को जन्म दिया है। धर्म ही गुरुओं द्वारा किए जा रहे सारे अपराधों की जड़ है। बचपन से ही लोगों को सिखाया जाता है कि गुरु ही ईश्वर है। वह कोई गलत काम कर ही नहीं सकता और तुमसे अपेक्षा की जाती है कि गुरु की हर आज्ञा का पालन करोगे। अगर कोई कहता है कि यह गलत है तो उसका मुंह बंद कर दो या उसकी बात सुनो ही मत। उसके कथन की उपेक्षा करो या आलोचना से बचो, मन में आ रहे अपने विचारों का त्याग करो।

आसाराम का प्रकरण एक युवा लड़की की बहादुरी के चलते सामने आया। भारत भर में ऐसी बहुत सी दुखद कहानियाँ पीड़ितों के दिलोदिमाग में वाबस्ता हैं। डर, अपराध और दमन-धर्म और उसके ग्रंथ हमें सिर्फ और सिर्फ यही दे सकते हैं।

ईश्वर से डरकर आपको क्या मिलता है? अच्छे नैतिक विचार या दिमागी बीमारियाँ? – 18 जून 2013

मैंने एक बार कहा था कि जो लोग ईश्वर से डरते हैं वे हर बात से डरते हैं। इस बात के पीछे तर्क है। क्योंकि वे मानते हैं कि ईश्वर हर जगह है और धरती पर होने वाली हर बात, हर घटना उसकी मर्ज़ी से हो रही है इसलिए जब वे ईश्वर से डरते हैं तो वे हर चीज़ से, हर उस बात से डरने लगते हैं जो हर जगह ईश्वर की मर्ज़ी से हो रही है! क्योंकि मैंने ऐसे विचार कई बार सामने रखे हैं इसलिए मुझे एक खास तरह के विचार भी कई बार प्राप्त हुए हैं: डर एक ऐसी चीज़ है जो आवश्यक है! डर ज़रूरी है, यह लोगों के लिए अच्छा है! यह देखकर कि यह अपवाद स्वरूप, किसी एक व्यक्ति का विचार नहीं है, मैंने महसूस किया कि इस बारे में मुझे कुछ विस्तार से लिखना चाहिए कि क्या डरना इतना महत्वपूर्ण है, विशेषकर ईश्वर से।

दरअसल एक व्यक्ति ने तो अपना बहुत सा समय और ऊर्जा खर्च करते हुए मुझे समझाने की कोशिश की कि ईश्वर से डरने के क्या-क्या लाभ हैं। पता चला कि बहुत से धार्मिक लोग यह समझते हैं कि दुनिया भर की संस्कृतियों में व्याप्त सारे नैतिक विचारों की जड़ धर्मभीरुता में निहित है। सिर्फ ईश्वर के डर के कारण ही लोग अपनी पत्नियों के साथ धोखा नहीं करते, गैरतमंद लोग चोरी नहीं करते, डाकेजनी और हत्याएँ नहीं करते और लोग एक-दूसरे के साथ अच्छा व्यवहार करते हैं और पड़ोसियों, दोस्तों और यहाँ तक कि अनजान लोगों की मदद करते हैं।

एक तुलना न्याय और व्यवस्था से भी की गई। अगर कानून, पुलिस और कोर्ट-कचहरी का डर न रहे तो सब कुछ उलट-पुलट जाएगा, अराजकता फैल जाएगी, लोग अपराधी हो जाएंगे और कोई भी शांति से नहीं रह पाएगा। स्पष्ट है कि ईश्वर का डर उनके विचार में इसी तरह की कोई चीज़ है।

जैसा कि मैंने कहा, अगर किसी एक व्यक्ति ने यह बात कही होती तो उसे उसका व्यक्तिगत विचार मानकर मैं इतना सब लिखने की ज़हमत नहीं उठाता क्योंकि यह मेरे लिए एक बेहूदा तर्क होता। क्योंकि मैंने बहुत से लोगों से ऐसी बातें सुनी हैं, इसी तर्क को आधार बनाकर लिखे गए बड़े-बड़े तर्कपूर्ण (?) लेखों और पुस्तकों को पढ़ा है, इसलिए मुझे लगता है मुझे भी इस बारे में अपनी बात अवश्य रखनी चाहिए। मैंने कभी एक छोटा सा पैराग्राफ पढ़ा था जो इस मामले में बहुत मौजूं प्रतीत होता है:

आप बिना ईश्वर पर विश्वास किए नैतिक कैसे हो सकते हैं? बिना ईश्वर के तो शायद मैं लोगों की हत्या करने लग जाऊंगा, बलात्कार कर सकता हूँ, बच्चों का यौन शोषण कर सकता हूँ, खुद अपने बच्चों को प्रताड़ित कर सकता हूँ, बैंकों में डाका डाल सकता हूँ, चोरी कर सकता हूँ, हर किसी पर जादू-टोना कर सकता हूँ, पत्नी को धोखा दे सकता हूँ, मार-पीट सकता हूँ, जानवरों की बेवजह हत्या कर सकता हूँ और खुद अपने आपको तकलीफ पहुंचा सकता हूँ। लेकिन क्योंकि मैं ईश्वर पर भरोसा करता हूँ और जानता हूँ कि ऐसे काम करने पर मैं अनंत काल तक नर्क में सड़ता रहूँगा, मैं ऐसे काम नहीं करता! बिना डर के आप अच्छे व्यक्ति बन ही नहीं सकते!

क्या यह तर्क कोई मानी रखता है? क्या आप वाकई हत्या नहीं कर रहे हैं क्योंकि आप डरते हैं कि कहीं ईश्वर आपको इसकी कोई सज़ा न दे दें? मैं यह नहीं मान सकता कि ईश्वर से डरने वाला हर व्यक्ति ऐसा दुष्ट और क्रूर होता अगर उसे ईश्वर के बारे में कोई जानकारी नहीं होती! और इतना मैं अच्छी तरह से जानता हूँ कि ईश्वर पर विश्वास न करने वाले अधिकतर व्यक्ति उतने ही अच्छे, सामान्य और व्यवहार कुशल होते हैं जैसे ईश्वर पर विश्वास करने वाले। फर्क सिर्फ इतना ही होता है कि वे ईश्वर से नहीं डरते!

नहीं, मैं नहीं समझता कि ईश्वर से डरना इतना महत्वपूर्ण है। बल्कि मैं मानता हूँ कि यह एकदम गलत बात है। यह डर धार्मिक माता-पिता अपने बच्चों के कोमल मन में बिठाते है। वे अपने बच्चों को बताते हैं कि वे उस सर्वशक्तिमान से डरकर रहें, जो कि एक तरह का खतरा या कोई गुस्सैल सुपरवाइसर जैसा कोई शख्स है जो हर वक्त, हर जगह आपको सज़ा देने के लिए विद्यमान रहता है! और यही असुरक्षा का भाव वयस्कों में भी पाया जाता है। वह उन्हें दब्बू, डरपोक और बच्चों जैसा बना देता है जिनमें कोई आत्मविश्वास नहीं होता और जो हमेशा अपने निर्णयों पर दूसरों की मुहर प्राप्त करने की कोशिश करते हैं, जो उन्हें बता सकें कि वे ठीक कर रहे हैं और ईश्वर उन्हें इसके लिए दंडित नहीं करेगा।

मैं निश्चय पूर्वक कह सकता हूँ कि यह डर बिल्कुल गलत है। जब नैतिकता की बात आती है तो मुझे लगता है कि हमें तथ्यों पर नज़र डाल लेनी चाहिए। दुनिया की जेलें सिर्फ नास्तिकों से ही भरी हुई नहीं हैं! नैतिक रूप से ठीक व्यवहार सिर्फ धार्मिक लोगों की बपौती नहीं है। सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी अभिभावकों की है कि वे अपने बच्चों को क्या सिखाते हैं। मेरे विचार में उन्हें चाहिए कि जो भी सिखाएँ, उनके भीतर किसी भी बात का डर पैदा किए बगैर सिखाएँ!

भारत में जुआ, शराब और सेक्स जैसी समस्याओं के लिए पश्चिमी संस्कृति जिम्मेदार नहीं – 16 जनवरी 13

कल मैंने आपको बताया था कि कई लोग भारत में होने वाले सभी यौन/लैंगिक अपराधों के लिए पश्चिमी सभ्यता के असर को जिम्मेदार मानते हैं। सिर्फ यौन/लैंगिक समस्या ही नहीं बल्कि दूसरी अन्य दिक्कतों के लिए भी पश्चिम को बलि का बकरा बना दिया गया है! लोग जब भी दूसरों को जुआ खेलते देखते हैं तब पश्चिम को कोसते हैं, जब भी किसी के परिवार का सदस्य शराब पीने लगता है तब भी उनके निशाने पर पश्चिम ही होता है। और हां, जब भी टीवी पर कामुकता से भरे दृश्य दिखाई देते हैं, या दुर्दांत किस्म के लैंगिक (सेक्सुअल) अपराधों को देखकर बच्चे सेक्स के बारे में पूछते हैं, तब भी इनमें से ज्यादातर लोग पश्चिम से क्रोधित होते हैं। लेकिन मैं आपको समझाता हूं कि इन सभी समस्याओं के लिए पश्चिम को जिम्मेदार ठहराना क्यों पूरी तरह से अनुचित है।

हमें जुए की समस्या से शुरुआत करनी चाहिए। भारत में जुआ खेलना गैर-कानूनी है। इस देश में आप सिर्फ गोवा में ही जुआघर (केसिनो) पा सकते हैं। इस सुदूरवर्ती स्थान पर आप चाहें तो भाग्य के इस खेल में कानूनी तौर पर हाथ आजमा सकते हैं। हालांकि लाखों नहीं तो हजारों लोग नियमित रूप से ताश के खेल में या शर्तों में पैसे लगाते हैं। कभी-कभी वे जीत जाते हैं लेकिन ज्यादातर बार वे हारते ही हैं। लेकिन इस उम्मीद में कि किसी न किसी दिन उनके हाथ जैकपॉट लग सकता है, वे लाखों रुपये जीत कर बहुत ज्यादा धनी बन सकते हैं वे इसके आदी हो जाते हैं। लेकिन इसके बजाए आमतौर पर वे हारे हुए खिलाड़ी की तरह ही इस खेल से बाहर जाते हैं। उनमें से कई लोग इतना ज्यादा हारते हैं कि अपनी जिंदगी तक दांव पर लगा देते हैं और अपने परिजनों को भी दुख पहुंचाते हैं। ऐसे में ज्यादातर धार्मिक लोग आरोप लगाते हैं कि भारत में इस व्यसन को पहुंचाने वाला पश्चिम ही है।

ऐसा ही शराब और इसे पीने वालों के बारे में भी है। चाहे किसी भी तरह की शराब हो, उससे होने वाली दिक्कतों के बारे में सभी जानते हैं। इसके बावजूद लोग पीते हैं, ऐसा बर्ताव करते हैं जैसे उनका खुद पर नियंत्रण नहीं रहता और यहां तक कि वे उग्र हो जाते हैं, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं, अपने परिवारवालों को पीटते हैं और अपराध करते हैं। भारत में सिर्फ उन्हीं दुकानों पर शराब बेची जा सकती है जिनके पास लाइसेंस है और यहां शराब या सिगरेट के प्रचार के लिए टीवी पर विज्ञापन भी नहीं दिखाया जाता, इसकी इजाजत नहीं है।

मैं मानता हूं कि ये सभी चीजें गलत हैं। मैं मानता हूं कि लोगों को ना तो जुआ खेलना चाहिए और ना ही शराब पीनी चाहिए। लेकिन इसके लिए पश्चिमी सभ्यता पर आरोप लगाए जाने से मैं सहमत नहीं हूं। पश्चिमी आधुनिक सभ्यता ना तो भारत में शराब लेकर आई और ना ही जुआ खेलना सिखाया। जुआ यहां के लिए नया नहीं है, और कोई ऐसी कल्पना भी नहीं है कि यह दुनिया के विभिन्न स्थानों में नहीं खेला जा सकता। जब हिन्दू धर्म ग्रंथ रचे जा रहे थे तब भी लोग जुआ खेलते थे और शराब पीते थे। महाभारत काल में भी जुआ अस्तित्व में था और उसका यहां वर्णन हुआ है। अन्य धर्म ग्रंथ 64 कलाओं की व्याख्या करते हैं जिनमें मानव आगे बढ़ सकता है और उनमें से एक है जुआ। इसी तरह, वेद बताते हैं कि भगवान को चढ़ावे के तौर पर भी शराब चढ़ाई जाती थी।

लेकिन जब बात सेक्स तक पहुंचती है, तब मेरे मूल विचार उन धार्मिक लोगों से बहुत अलग हो जाते हैं जो भारतीय मूल्यों में आ रही गिरावट के लिए पश्चिम पर आरोप मढ़ते हैं, जो पश्चिम के खुलेपन को यौन अपराधों के लिए दोषी ठहराते हैं। मेरा मानना है कि आपको अपनी प्रवृतियों को नहीं छुपाना चाहिए और सेक्स को सामान्य तौर पर प्राकृतिक रूप में ही लेना चाहिए। मैं इस विचार का विरोध करता हूं कि यह सब केवल एक पश्चिमी अवधारणा है, पूरे भारत के मंदिरों में बनाई गई उत्तेजक मूर्तियों के इंजीनियर और शिल्पकार कौन थे? खजुराहो, कोणार्क और अन्य जगहों के मंदिरों की दीवारों पर इन मूर्तियों को उकेरने की कल्पना किसने की? वे लोग पश्चिम से नहीं आए थे, वे भारतीय थे। शायद सबसे पुराने और सबसे चर्चित कामुक पुस्तक के लेखक वात्स्यायन भी अमेरिका या यूरोप से नहीं आये थे।

जुए और शराब का हमारी संस्कृति पर बहुत बुरा असर पड़ा है। सेक्स अपने आप में कोई समस्या नहीं है लेकिन इसके बावजूद यहां काफी यौन शोषण और यौन अपराध होते हैं। इन समस्याओं की जड़ें कम से कम पश्चिम में नहीं हैं। वास्तव में, भारत में आज हम जो समस्याएं देखते हैं वे पश्चिम की तुलना में अपने यहां ज्यादा खराब हैं। आप पश्चिम पर आरोप लगाते हैं कि लोग वहां खुलेआम जुआ खेलते हैं और यहां तक कि इसके लिए जुआघर भी बनाते हैं। जबकि हकीकत ये है कि वहां काफी कम संख्या में लोग अपने पूरे पैसे जुआघरों में गंवाते हैं। काफी लोग वहां जाते हैं, अपनी जेब में निर्धारित रकम रखते हैं और अगर वह रकम हार जाते हैं तो घर चले जाते हैं। शराब भी वहां एकदम दूसरे तरीके से इस्तेमाल की जाती है। आप देखेंगे कि वहां के लोग नियमित रूप से एक पैग या एक बोतल बीयर पीते हैं, लेकिन कभी खुद पर से नियंत्रण खोकर जानवरों जैसा बर्ताव नहीं करते। सेक्स भी खुलेआम होता है लेकिन वहां के लोग बसों में या भीड़ में महिलाओं को छूना शुरू नहीं कर देते।

मुझे गलत मत समझियेगा, मैं यहां ना तो शराब या जुए का प्रचार कर रहा हूं, ना ही पश्चिमी सभ्यता की नकल करने का हिमायती हूं। वहां की कमियों और लोगों की दिक्कतों को साफ तौर पर देखते हुए मैं पश्चिमी सभ्यता की प्रशंसा भी नहीं करता। मैं तो सिर्फ इस विचार का विरोध करना चाहता हूं कि भारत में शराब, जुए और लैंगिक अपराध पश्चिम से लाये गये हैं। यह सच नहीं है।

आप पश्चिमी सभ्यता को कोस रहे हैं, ये कह कर कि इससे आपकी संस्कृति और देश का पतन हो जाएगा, आप वहां से आने वाली हर चीज को कोस रहे हैं। अगर आपकी यही सोच है तो कृपया ठीक से सोचें कि आप कहते क्या हैं और करते क्या हैं। सबसे पहले अपनी पैंट और शर्ट उतार फेंकिये और धोती पहनिये। जो आप पहन रहे हैं वो पश्चिमी पहनावा है, भारतीय नहीं। फेसबुक से निजात पाईये और आई फोन बेच दीजिए-वो निश्चित रूप से भारतीय नहीं है। आप आधुनिक दुनिया में रह रहे हैं – अगर आप पश्चिम से आने वाली हर चीज का विरोध करेंगे तो आपको काफी चीजों का परित्याग करना होगा। देखिए कि आधुनिक विज्ञान ने आपको क्या दिया है, देखिए कि चिकित्सा के क्षेत्र में क्या-क्या संभव है, वो सिर्फ इसलिए कि पश्चिम में शोध हुआ है। निसंदेह, भारत में भी शोधकर्ता, वैज्ञानिक और प्रतिभाशाली लोग हैं लेकिन इनमें से ज्यादातर लोग अपने समारोह और धार्मिक क्रियाकलापों में ही कहीं ज्यादा व्यस्त होते हैं। और जिन्होंने इस दुनिया को ज्यादा आधुनिक बनाने में मदद की है वे कभी भी पश्चिम के योगदान की आलोचना नहीं करेंगे।

अपनी आंखें और दिल खोलिए और इस बात को स्वीकार कीजिए कि बुराई और खोट हर देश में होता है। सकारात्मक चीजों की ओर ध्यान केंद्रित कीजिए और बदलाव लाने की कोशिश कीजिए।