यहाँ सब कुछ आभासी नहीं है: जब सोशल मीडिया मित्रों को वास्तविक जीवन में एक-दूसरे से मिलवाता है! 16 दिसंबर 2015

सोशल मीडिया मित्रों को वास्तविक जीवन में एक-दूसरे से मिलवाता है

मेरे कल और परसों के ब्लॉगों की ध्वनि से कुछ लोगों को यह प्रतीत हो सकता है कि मैं सोशल मीडिया को कतई पसंद नहीं करता। लेकिन यह सही नहीं है। सोशल मीडिया दुनिया में बहुत सारे सकारात्मक परिवर्तन लेकर आया है और एक आधुनिक व्यक्ति के नाते मैं उससे होने वाले लाभों के प्रति सजग हूँ। लेकिन फिर भी मैं उसकी तुलना में वास्तविक जीवन को विशेष तरज़ीह देता हूँ।

मैं तकनीकी प्रगति पसंद करता हूँ। मैं शुरू से ही नई-नई मशीनों, जैसे कैमेरा, के प्रति आकर्षित होता रहा हूँ। अपने शहर में मैं कुछ पहले लोगों में से था, जिन्होंने पहले पहल डिजिटल कैमेरा खरीदा था और जब फोन आया तो बहुत से पड़ोसी फोन करने हमारे घर आते थे, पहला मोबाइल, जो मैंने खरीदा था वह एक बड़ी सी ईंट जैसा था क्योंकि तब मोबाइल फोन अभी आए ही आए थे और उस समय ऐसे ही होते थे! मेरा विश्वास है कि तकनीकी खोजें हमारी बहुत अधिक मदद कर सकती हैं। इंटरनेट मैं काफी समय से इस्तेमाल करता रहा था और स्वाभाविक ही एक दिन सोशल मीडिया नेटवर्क से भी जुड़ गया।

मैं यह कहना चाहता हूँ कि आज के दिन यह लोगों के साथ जुड़ने का एक प्रमुख तरीका है और इसकी तुलना किसी भी पुराने तरीके से नहीं की जा सकती! बहुत से मेरे परिचित, जिनसे मैं वास्तविक दुनिया में पहले से जुड़ा हुआ हूँ, अब नेट के ज़रिए भी मेरे साथ जुड़े हुए हैं और मैं नेट-संदेशों के माध्यम से उनसे एक साथ बातचीत कर सकता हूँ। इसी के साथ, उनके अलावा भी बहुत से दूसरे लोग हैं, जिन्हें मैं बिल्कुल नहीं जानता और जो मुझसे कभी रूबरू नहीं मिले हैं-जो मेरे शब्दों को पढ़कर, शायद उन्हें पसंद करके मेरे बारे में और भी अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं।

मैं एक ही समय में बहुत सारे लोगों से जुड़ सकता हूँ और उनमें से हर व्यक्ति इस बात का चुनाव कर सकता है कि वह और आगे पढ़ना चाहता है या नहीं! वे अपनी कंप्यूटर सेटिंग इस तरह रख सकते हैं कि जब भी मैं कुछ लिखूँ, वे पढ़ सकें या वह उनके स्क्रीन पर ही ना आए! मेरी नज़र में वह लोगों को चुनने का बहुत शानदार अवसर प्रदान करता है कि वे क्या करना चाहते हैं।

यह तो हुई लोगों से जुड़ने की बात। लेकिन उसके बाद, मुझे लगता है, एक कदम और रखने की ज़रूरत है। उन आभासी लोगों को वास्तविक जीवन में लेकर आने की। जब आपको लगता है कि आप किसी से ऑनलाइन जुड़े हैं तो वास्तव में वह बहुत एकतरफा एहसास होता है! सामने वाले के लिखे शब्द आप अक्सर पढ़ते हैं। आप उसके पोस्ट किए हुए चित्र देखते हैं और फेसबुक पर उन्हें ‘लाइक’ भी कर देते हैं। लेकिन संभव है, सामने वाला इस बात को नोटिस ही न करे कि इस तरह आप उसके कितने करीब हैं। वह नोटिस करे, इसके लिए आपको सीधे संदेश भेजना होगा, ईमेल करना होगा या फोन करना होगा या फिर रूबरू जाकर मिलना होगा।

और हमने इसे संभव किया है: मेरे कई ऑनलाइन मित्र मुझसे मिलने यहाँ आए हैं। भारतीय, जो जीवन के प्रति अलग नज़रिए को और सोचने के भिन्न तरीके को पसंद करते हैं, एक दिन के लिए या सप्ताहांत में यहाँ आते रहे हैं। दुनिया भर के लोग कुछ हफ़्तों या महीनों के लिए हमारी योग और आयुर्वेद की कार्यशालाओं में या विश्रांति शिविरों में शामिल होने आश्रम आते हैं।

इसी परिप्रेक्ष्य में मैं समझता हूँ कि वास्तव में सोशल मीडिया वास्तविक जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी है: जब कोई बताता है कि उन्होंने मेरे बारे में कहीं ऑनलाइन पढ़ा और फिर मेरे ब्लॉग पढ़ने लगे और उनसे उन्हें सहायता प्राप्त हुई। जब किसी ने मुझे ऑनलाइन देखा, वेबसाइट पर जाकर हमारे चैरिटी कार्यों के बारे में पढ़ा और किसी बच्चे के प्रायोजक बने। जब किसी ने मेरी ऑनलाइन टिप्पणियों को पढ़ा और मुझसे रूबरू बातचीत करने लंबी यात्रा करके भारत आ गए। जब किसी ने हमारे विश्रांति शिविरों के फोटो देखे और हमारे योग अवकाश शिविर में शामिल होने का निर्णय लिया।

मैं वास्तविक संपर्क में विश्वास करता हूँ और सोशल मीडिया महज इसका एक साधन है, उस दिशा में आगे बढ़ने का एक माध्यम। ऑनलाइन हो या ऑफ़लाइन, मैं उसकी वास्तविकता कायम रखना चाहता हूँ।

एक और समारोह, जिसने बच्चों को आश्चर्य में डाल दिया – 19 अक्टूबर 2015

कल मैंने आपको शनिवार को संपन्न अपने जन्मदिन समारोह के बारे में बताया था। असल में पार्टी सुबह-सुबह बच्चों के भोजन और उनके लिए एक अनपेक्षित विस्मय के साथ शुरू होने वाली थी। लेकिन शनिवार को वृंदावन के एक इलाके में चुनाव होने वाले थे और क्योंकि हमारे स्कूल के कई बच्चे उसी इलाके से आते हैं, उनकी उस दिन की छुट्टी घोषित कर दी गई थी। लिहाजा वे उस दिन पार्टी में शामिल न हो सके और हमें एक बार और पार्टी आयोजित करने का मौका मिल गया-और इतना ही नहीं, इस समारोह में एक और सुयोग का आनंद भी सम्मिलित हो गया: थॉमस और आइरिस के भारतीय विवाह की दसवीं वर्षगाँठ के उत्सव का आनंद!

आज सुबह बच्चे आए तो यही सोच रहे होंगे कि रोज़ की तरह वह भी एक सामान्य दिन होगा लेकिन वे आश्चर्य में पड़ गए जब उन्हें भोजन के लिए पुकारा गया और उन्हें पता चला कि यह कोई सामान्य भोजन नहीं है, हम और हमारे मेहमान पहले से वहाँ मौजूद थे और उन लोगों का इंतज़ार कर रहे थे कि बच्चे आएँ और भोजन शुरू किया जाए! इस तरह हम सबने एक साथ दोपहर का भोजन किया और उसके बाद, जब सब खा-पीकर निपट गए और पुनः एकत्र हुए, बच्चों के लिए एक और आश्चर्य इंतज़ार कर रहा था: जी हाँ, सारे बच्चों को नए बस्ते प्राप्त हुए!

यह मेरे परिवार और मेरे मित्रों द्वारा मुझे दिया गया जन्मदिन का उपहार था! उन्होंने हर बच्चे के लिए पहले ही एक-एक बस्ता बनवाकर रख लिया था, जिन्हें अब हम वितरित कर सकते थे। लेकिन सबसे बड़ा उपहार तो मुझे मिला था बच्चों के चेहरों पर खिली मुस्कुराहटों के रूप में! जिस तरह वे अपने नए बस्तों को हाथ में लेकर उलट-पलट रहे थे, जाँच रहे थे कि नए बैग में क्या-क्या नई खूबियाँ हैं, हर ज़िप को खोलकर देखते थे कि नए बस्ते में पहले के मुकाबले कितनी जगह है, उसे देखकर मैं भाव विभोर हो गया!

लेकिन सिर्फ मेरे जन्मदिन के कारण ही हमने आज के दिन को इस तरह नहीं मनाया! असल में आज का दिन एक और संयोग के कारण खुशी और समारोह का एक ख़ास दिन बन गया था: आज थॉमस और आइरिस के भारतीय विवाह की दसवीं सालगिरह थी। विश्वास नहीं होता कि इतना समय गुज़र गया, मगर वास्तव में आज से दस साल पहले थॉमस और आइरिस पहली बार हमारे आश्रम आए थे। यह सन 2005 की बात है, जब जर्मनी में हम एक-दूसरे से मिले थे और हमें एक-दूसरे को जानने का सुअवसर प्राप्त हुआ था। फिर उन्होंने भारत की यात्रा की और हमारे यहाँ आए। और यहाँ उन्होंने भारतीय पद्धति से विवाह किया था-और, स्वाभाविक ही, हमें उस दिन को भी समारोह पूर्वक मनाना था!

इस प्रकार, एक तरह से वह बर्थडे और शादी की वर्षगाँठ की तीसरी सम्मिलित पार्टी थी जिसे हमने बच्चों के साथ साझा किया!

ऐसा शानदार परिवार और ऐसे खूबसूरत दोस्त पाकर मैं अभिभूत हूँ-और यह बड़ी ख़ुशी की बात है कि मैं इस ब्लॉग के ज़रिए आपके साथ भी इस ख़ुशी को साझा कर पा रहा हूँ! मुझे आशा है कि किसी दिन आप भी हमारे किसी समारोह में सम्मिलित होंगे!

दोस्तों के साथ मौजमस्ती से भरपूर समय बिताना – 18 अक्टूबर 2015

गज़ब! कितना मज़ेदार, सुखद समय! जी हाँ, वाकई शानदार-हम सब बहुत व्यस्त हैं, लोग आ रहे हैं, जा रहे हैं, रोज़ एक नया समारोह चल रहा है और इस वक़्त हमारे यहाँ, आश्रम में हमारे बहुत करीबी और बेहद शानदार मित्र आए हुए हैं और हम उनके साथ अपना सर्वश्रेष्ठ समय गुज़ार रहे हैं!

शुक्रवार को थॉमस और आइरिस हमारे साझा मित्र, पीटर और हाइके, उनके बेटे और अपने दो और मित्रों के साथ आए। एक दिन आराम करने के बाद कल हमारे यहाँ शानदार बर्थडे पार्टी हुई! हमने कोई बहुत बड़ा आयोजन नहीं किया था कि बहुत सारी तैयारियों की ज़रूरत हो, लेकिन फिर भी वह वाकई बहुत ख़ास पार्टी रही: शाम को सुस्वादु भोजन की व्यवस्था की गई थी और उसके बाद थोड़ा नाच-गाना हुआ! फिर सबके लिए चॉकलेट केक और फिर से थोड़ा सा नृत्य वगैरह! अपरा, प्रांशु और गुड्डू, हमारे सबसे छोटे बच्चों ने अपने-अपने नृत्य प्रस्तुत किए-दिखाया कि उन्होंने इस बीच क्या-क्या नया सीखा है-और उसके बाद फ़्रांस से आई हमारी मित्र, मेलनी ने अपना फायर डांस प्रदर्शित किया। अंत में जर्मन मित्रों द्वारा लाए गए विभिन्न वाद्ययंत्रों पर निबद्ध संगीत कार्यक्रम के साथ शाम के कार्यक्रम का समापन हुआ।

वह बहुत खूबसूरत शाम थी और हम सबने उसका भरपूर आनंद लिया-परिवार के सदस्यों ने, दोस्तों और हमारे अतिथियों ने! हमारी तीन महिलाओं के लिए राजस्थान यात्रा पर निकलने से पूर्व आश्रम में वह अंतिम शाम थी। हमने उनकी राजस्थान यात्रा का इंतज़ाम किया था और आज तड़के वे तीनों जयपुर के लिए रवाना हो गईं, जहाँ से वे जैसलमेर जाएँगी और फिर अंत में दिल्ली लौटेंगी, जहाँ से उनमें से एक घर चली जाएगी और दो यहाँ, वृंदावन वापस आएँगी।

इस तरह आज हमारे यहाँ मेहमानों और मित्रों की संख्या कुछ कम है लेकिन हम सब साथ बैठकर इस दौरान एक-दूसरे के जीवनों में घटित घटनाओं का जायज़ा ले रहे हैं, पुराने समय को याद कर रहे हैं और निकट भविष्य में कुछ रोमांचक कार्यक्रमों की योजना तैयार करते हुए समय का पूरा आनंद उठा रहे हैं।

थॉमस यहाँ आए हुए हैं इसलिए अपरा ख़ुशी से फूली नहीं समा रही है और वह सारा दिन उनके साथ खेलती-कूदती रहती है। कभी वह हमें बताती है कि उन दोनों ने मिलकर दिन भर क्या-क्या किया तो कभी बताती है कि आगे क्या-क्या करने वाले हैं। जब घर लोगों से भरा-पूरा होता है तब वह बहुत खुश रहती है और विशेष रूप से तब, जब अनजान लोगों के साथ बहुत से वे दोस्त भी होते हैं, जिनके साथ वह लगभग हर हफ्ते स्काइप पर रूबरू बात करती है!

इन सब बातों के अलावा हमारे सभी जर्मन मित्र अपरा और आश्रम के दूसरे बच्चों के लिए बहुत सारे उपहार भी लेकर आए हैं। हर बच्चा नए-नए खिलौनों को आजमाकर देखने और उनसे खेलने में व्यस्त हैं और साथ ही एक से एक बढ़कर स्वादिष्ट जर्मन मिठाइयों का आस्वाद भी ले रहे हैं! वास्तव में हम सब बहुत सुखद और शानदार समय बिता रहे हैं!

वाकई जीवन बहुत सुंदर है!

बात करने के लिए कभी-कभी आपको किसी दूरस्थ मित्र की ज़रूरत पड़ती है – 8 सितंबर 2015

हाल ही में मैं अपने एक मित्र से बात कर रहा था। वह आस्ट्रिया में रहता है और उससे मेरी मुलाक़ात छह साल पहले अपने आस्ट्रिया दौरे के समय हुई थी। इस बीच हम लोग कभी-कभार बात करके एक-दूसरे के हालचाल ले लिया लिया करते थे, एक दूसरे की गतिविधियों के बारे में पूछ-ताछ कर लेते थे। पिछले हफ्ते उसका फोन आया, सिर्फ मौसम का हाल जानने के लिए नहीं बल्कि एक मित्र के रूप में, मुझसे मदद चाहता था।

हर व्यक्ति जानता है कि मित्र होते ही इसलिए हैं कि ज़रूरत पड़ने पर उनकी मदद ली जा सके। लेकिन ऐसे मौके भी आते हैं, जब आप अपनी कुछ बातें अपने करीबी मित्रों को नहीं बता सकते, आप कुछ बातें उनके साथ साझा करने में संकोच करते हैं। ऐसे वक़्त, आपका कोई ऐसा दूर रहने वाला मित्र हो, जो सारी परिस्थिति को कुछ दूर से देख-समझ सके, तो अच्छा होता है। मेरे आस्ट्रियाई मित्र के साथ कुछ ऐसा ही था।

जब पहले-पहल मेरा उससे परिचय हुआ था, तब, हाल ही में अपनी पत्नी और दो छोटे-छोटे बेटों के साथ वह अपने नए घर में रहने आया था। नई जगह में नए जीवन की शुरुआत करते हुए वे बहुत उल्लसित थे। उनका बड़ा बेटा उसी साल स्कूल जाना शुरू करने वाला था और सब कुछ बढ़िया चल रहा था।

फोन पर उसने मुझे बताया कि परिस्थितियों में बहुत सारी तब्दीलियाँ आ चुकी हैं। उसे पता चला है कि सालों से उसकी पत्नी उसके साथ छल कर रही थी और उनके साझा दोस्त के साथ उसके संबंध थे। इसलिए वह उससे अलग होकर तलाक लेना चाहता था। उसका दिल टूट चुका था और वह यह निर्णय ले भी चुका था: अर्थात, वह उसे भूल भी नहीं पा रहा था और उससे संबंध भी तोड़ना चाहता था।

यह समझने के लिए कि वह अपने स्थानीय मित्रों से इस बारे में बात क्यों नहीं कर सकता था, आपको दो और बातें जाननी आवश्यक हैं। मेरा दोस्त बहुत छोटे से गाँव में रहता था, जहाँ हर कोई अक्षरशः एक-दूसरे को जानता है। संबंध टूटने या संबंध में तनाव होने जैसी कोई भी खबर वहाँ छिपी नहीं रह सकती थी- बाज़ार-मुहल्लों में इसकी चर्चा होनी शुरू हो जाती और तुरंत हर कोई इसे जान सकता था।

दूसरा कारण यह था कि उसकी पत्नी कुछ समय से शराब की आदी हो चुकी थी। मेरे मित्र ने पत्नी की मदद की लेकिन इस बात का भी भरसक प्रयास किया कि गाँव में यह बात न फैले। वह अपनी पत्नी को, परिवार की प्रतिष्ठा को और बच्चों को इन सब परेशानियों से दूर रखना चाहता था और उन्हें बदनामी से बचाना चाहता था।

और अभी भी वह यही कर रहा था। वह अपना सिरदर्द अपने दोस्तों के साथ साझा नहीं करना चाहता था-वह अपनी वैवाहिक समस्याओं के बारे में उनसे कहना नहीं चाहता था सिर्फ इसलिए कि सारा गाँव तुरंत इस बात को जान जाएगा। दूसरी समस्या यह थी कि पत्नी की शराब की लत की वजह से वह अपने बेटों को उसके पास छोडना नहीं चाहता था! बिना पत्नी को तकलीफ पहुँचाए यह बात भी वह किसी से नहीं कह सकता था- कम से कम वह ऐसा समझता था! क्योंकि, हर कोई वह बात जान जाएगा, जिसे वह इतने समय से छिपाने की कोशिश कर रहा था!

तो इस तरह उसने मुझे यह पूछने के लिए फोन किया था कि क्या किया जाए।

सबसे पहले तो मैंने उससे कहा कि उसके और शीघ्र ही भूतपूर्व हो जाने वाली पत्नी के विषय में लोग क्या सोचेंगे, उसे इस बात की चिंता छोड़ देनी चाहिए! उससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। उसके दिल में मची हलचल, उसकी भावनाएँ और उसके बच्चे अधिक महत्वपूर्ण हैं! इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि दूसरे क्या सोचते हैं और दूसरे क्या कहेंगे- उसके बच्चों को सुरक्षित होना चाहिए! उसे चिंता न करने की सलाह देने के अलावा मैंने उससे कहा कि किसी अच्छे वकील से मिलकर उससे सारी बातों की चर्चा करे।

फिर अपने दोस्त से मिले और बात करे। आपको चाहिए कि अपने अंदर की बात किसी न किसी को अवश्य बताएँ! उसकी पत्नी को शराब की लत के संबंध में मदद की ज़रूरत है और यह बात छिपाकर कोई लाभ नहीं है, उससे यह लत छूटने वाली नहीं है। उसे दबाने की कोशिश करके वह उसकी कोई मदद नहीं कर रहा होगा-और अंत में मैंने उससे कहा कि अब तुम्हारे बेटों को तुम्हारी ज़रूरत है!

मैंने उसे उससे कहा कि कैसे गाँव छोड़कर किसी दूसरे शहर में रहना भी एक विकल्प हो सकता है, फिर से एक नया जीवन शुरू करना- लोगों की बेकार चर्चाओं से, अफवाहों, कानाफूसियों से दूर किसी शांत जगह में। इस बीच एक दिन सब ठंडा पड़ जाएगा और सिर्फ वही, जो उसके सच्चे मित्र हैं, उसके साथ खड़े रहेंगे!

वह खुश हुआ, मुख्य रूप से इसलिए कि वह किसी से अपनी बात साझा कर सका। और मैं खुश हूँ कि मेरे ऐसे मित्र भी हैं, जो आवश्यकता पड़ने पर मुझे, इतनी दूरी के बावजूद, याद कर लेते हैं!

सीज़न शुरू होते ही दोस्तों का आना शुरू हो चुका है – आश्रम के जीवन में परिवर्तन हो रहा है – 6 सितंबर 2015

वास्तव में इस साल साल भर मेहमानों का आना जारी रहा, यहाँ तक कि भीषण गर्मियों के महीनों में भी। अब मौसम कुछ ठीक होता जा रहा है, हवा में नमी कुछ कम हो रही है और धीरे-धीरे तापमान भी नीचे गिर रहा है। इसके साथ ही पर्यटन के मौसम की शुरुआत हो चुकी है और अगले कुछ सप्ताह और महीनों में फिर से आश्रम पूरा भर जाएगा। असल में इसकी शुरुआत हो भी चुकी है- आने वाले नए और पुराने मित्रों का स्वागत हो रहा है और वापस जा रहे मित्रों को दोबारा आने के आग्रह के साथ बिदा किया जा रहा है।

कल सबेरे हम सूसन को बिदा करेंगे-वह ब्रिटेन की है और योग कक्षाओं में शामिल होने, आयुर्वेदिक मालिश लेने और वृन्दावन के नज़ारे देखने कुछ दिन के लिए यहाँ आई थी। उसने यहाँ अपना समय भरपूर आनंद और सुकून के साथ व्यतीत किया और बताया कि कैसे आयुर्वेदिक मालिश से उसे पीठ दर्द से मुक्ति मिली है। इसके अलावा, अब उसने पक्का इरादा कर लिया है कि वापस जाकर वह खुद अपनी योग क्रियाओं को जारी रखेगी क्योंकि उसने यहाँ बुनियादी मुद्राएँ और आसन सीख लिए हैं, जिनमें से ज़्यादातर उसकी पीठ और कमर के स्नायुओं को मजबूती प्रदान करने वाले आसन हैं। हमें खुशी है कि उसका यहाँ अनुभव बहुत सुखद और सार्थक रहा और हम अभी से उसके दोबारा वापस आने की उम्मीद कर रहे हैं।

दूसरी बिदाई आज शाम को ही हुई और बिदाई के समय हम पहले से जानते थे कि वापसी भी जल्द ही होगी: असल में यशेंदु की गर्लफ्रेंड, इफ़ा कुछ दिन से यहाँ थी और हमारे साथ बहुत शानदार समय बिताकर अभी-अभी रवाना हुई है। वाकई परिवार का विस्तार होता देखकर कितना अच्छा लगता है-और सिर्फ यशेंदु ही नहीं, हम सब अभी से उसके दोबारा आने का इंतज़ार कर रहे हैं!

हमें पक्का विश्वास है कि वापस यहाँ आने वालों में सिर्फ यही दो नहीं होंगे-और बड़ी खुशी मिलती है जब नए मेहमान यहाँ आते हैं, यहाँ आकर मित्र बन जाते हैं और फिर समय के साथ आते-वापस जाते हुए पुराने मित्र बन जाते हैं-ऐसे ही एक मित्र का कल हमने स्वागत किया! हमारा मित्र, स्कॉट पुनः आश्रम आया है! चार साल पहले, जब रमोना गर्भवती थी, वह पहली बार यहाँ आया था और उसके बाद उसका आना-जाना चलता रहा। अब वह पुनः यहाँ है और हमें चर्चा करने का मौका मिलेगा कि इस बीच क्या-क्या हुआ, दोनों स्थानों पर जीवन कैसा रहा, उसके और हमारे जीवनों में क्या-क्या परिवर्तन हुए!

उसके साथ ही दो और लोग आए-बड़े प्यारे लोग, जो अभी हमें जानने की प्रक्रिया में हैं और हम भी उन्हें जानने की कोशिश कर रहे हैं। वे भी पर्यटक हैं और हमें आश्चर्य नहीं होगा अगर वे दोबारा किसी समय हमसे मिलने यहाँ, वृंदावन आएँ!

नए सीजन की शुरुआत का इससे अच्छा तरीका नहीं हो सकता था और अगले माह हम और भी बहुत से सुखद संयोगों की आशा कर रहे हैं! हमारे काम की यही खुशनुमा विशेषता है- हम बहुत से शानदार लोगों से मिलते हैं, हम उन्हें अपना मित्र बना लेते हैं, एक-दूसरे के अनुभव और भावनाएँ आपस में साथ साझा करते हैं और उन्हें भारत का अंतरंग दर्शन करवाने का प्रयास भी करते हैं।

हो सकता है, आप भी जल्द ही यहाँ आएँ! यकीन मानिए, हमें आपसे मिलकर बड़ी प्रसन्नता होगी!

लोगों के जीवन पर धर्म और ईश्वर का प्रभाव – भारत और पश्चिमी देशों के बीच तुलना – 3 अगस्त 2015

पिछले सप्ताह मैं नास्तिकता के विषय पर काफी विस्तार से लिखता रहा हूँ और निश्चित ही अभी भी इस विषय पर मेरे मन में अनेकानेक विचार, अवधारणाएँ और कल्पनाएँ हैं, जिन्हें मैं आपके साथ साझा करना चाहता हूँ। लेकिन इस समय मुझे अपने पश्चिमी पाठकों का भी विचार करना चाहिए। मैं जानता हूँ कि वहाँ बहुत से लोगों के लिए इस बात का वास्तव में कोई महत्व नहीं है कि ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं। और दरअसल यही बात मैं अपने भारतीय मित्रों के साथ साझा करना चाहता हूँ और यह करते हुए पश्चिमी मित्रों को भी सहज ही यह पता चल जाएगा कि क्यों भारत में यह विषय इतना विस्फोटक है!

वास्तव में इसका संबंध संस्कृतियों के बीच मौजूद अंतर से है: पश्चिम में मेरे बहुत से मित्र हैं, जिनके बारे में ठीक तरह से मैं भी नहीं जानता कि वे ईश्वर पर आस्था रखते हैं या नहीं। भारत में यह तुरंत पता चल जाता है। पश्चिम में मेरे बहुत से मित्र हैं, जो किसी न किसी धर्म का, ज़्यादातर ईसाईयत का, अनुसरण करने वाले हो सकते हैं- लेकिन इसके बावजूद, अधिकांश विषयों पर हमारे विचार एक समान ही हैं! यह एक ऐसी बात है, जो भारत में सहज संभव नहीं है।

यह एक तथ्य है कि पश्चिम में बहुत बड़ी संख्या में लोगों के लिए धर्म और ईश्वर का विशेष महत्व नहीं है। वे एक विशिष्ट धार्मिक घेरे के भीतर रहकर बड़े होते हैं, बप्तिस्मा करवाते हैं, यौवन के ईसाई पुष्टिकरण कर्मकांड आयोजित करते हैं और फिर चर्च में जाकर शादी भी करते हैं। संभव है, वे क्रिसमस और ईस्टर के दिन चर्च भी जाते हों। लेकिन उसके बाद उनके सामान्य जीवन में धर्म की कोई दखलंदाज़ी नही होती, अक्सर वे धर्म और ईश्वर के विषय में बात करना भी पसंद नहीं करते। दैनिक जीवन में वे ईश्वर का विचार तक मन में नहीं लाते, भले ही उनके प्रति उनका बुनियादी रवैया कुछ भी हो।

इसलिए जब दो ऐसे लोग आपस में मिलते हैं तो उनके बीच उनकी आस्थाओं का व्यवधान नहीं होता। वे इसकी कतई परवाह नहीं करते कि सामने वाला ईश्वर पर विश्वास रखता है या नहीं क्योंकि वे नहीं समझते कि इसका ज़रा सा भी महत्व है। परिवार में अगर उनका लड़का कहे कि वह भविष्य में चर्च नहीं जाना चाहता या अपना विवाह चर्च में नहीं बल्कि कोर्ट में पंजीकृत करवाना चाहता है तो माता-पिता आसानी से उसकी बात मान लेते हैं। इसी तरह कोई लड़की क्रिसमस के दिन चर्च चली जाएगी, भले ही वहाँ के पादरी की कही बातों पर उसका एक रत्ती भरोसा न हो।

भारत में मामला बहुत अलग है। यहाँ आस्थाओं के प्रश्न परिवारों को जुदा कर देते हैं! दैनिक जीवन में आस्था बहुत बड़ी भूमिका अदा करती है और जितना अधिक आपके आसपास के लोग धार्मिक और परम्परावादी होंगे उतना ही आपका बचपन धार्मिक त्योहारों, समारोहों, रस्म-रिवाजों और कर्मकांडों के बीच गुज़रेगा। कुछ नियत दिन या सप्ताह होंगे जब उपवास रखना होगा, कुछ अवसरों पर मन्दिर जाना ज़रूरी होगा तो कुछ दिन आप मन्दिर नहीं जाएँगे। दूसरों की धार्मिक भावनाएँ न दुःखें या देवता अप्रसन्न न हो जाएँ इसलिए कुछ अवसरों पर धारण किए जाने वस्त्रों के बारे में आपको कुछ नियम याद रखने होंगे और यह भी कि किन भावभंगिमाओं या मुद्राओं और शब्दों का उपयोग करना है और किनका नहीं करना है। यहाँ इस बात पर लोगों की बहुत गहरी आस्था होती है कि आपका अच्छा-बुरा इन सब बातों पर निर्भर होता है!

इसलिए जब बेटा घोषणा करता है कि वह ईश्वर पर विश्वास नहीं रखता तो अभिभावक चिंताग्रस्त हो जाते हैं, गुस्सा होते हैं, उन्हें समझ नहीं आता कि अब क्या किया जाए। यार-दोस्त समझ नहीं पाते और सामान्य दैनिक कार्यकलापों पर विराम सा लग जाता है क्योंकि कोई भी अंतहीन वाद-विवाद, तनातनी और झगड़े नहीं चाहता! उनकी पुरानी जीवन-चर्या समाप्त हो जाती है, अपने परिवेश से कटकर वे पूरी तरह अलग, कोई नई सामाजिक मंडली खोजने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

इसीलिए यहाँ यह चर्चा बहुत महत्वपूर्ण है। यह आपके दैनिक जीवन के बारे में है, सिर्फ सालाना दो छुट्टियों के बारे में ही नहीं। आपके रवैये और नज़रिए की जड़ कहाँ है, इस बारे में है। और इसलिए मुझे हमेशा लगता रहा है कि मैं इस विषय में पहल करूँ, बातचीत करूँ- क्योंकि आम तौर पर लोग इस विषय में चर्चा करते हुए घबराते हैं!

मैं खुद एक धार्मिक और आस्तिक से नास्तिक हुआ हूँ। मुझे महसूस हुआ है कि उसके बाद मेरे बहुत से भारतीय मित्र मुझसे दूर हो गए, यहाँ तक कि दोस्ती तोड़ ली। लेकिन मेरे पश्चिमी मित्रों के साथ मुझे यह अनुभव नहीं झेलना पड़ा- ज़्यादातर लोगों के साथ मुझे लगता रहा कि इससे उन्हें कोई मतलब ही नहीं है! इसे इस तरह समझिए कि आस्था से ज़्यादा उनके लिए व्यक्ति का महत्व था!

मैं पहले कह चुका हूँ कि ज़्यादा से ज़्यादा नास्तिक होंगे तो दुनिया बेहतर जगह हो जाएगी। इसका संबंध इस बात से नहीं है कि आप ईश्वर को मानते हैं या नहीं। और इसीलिए यह बात दुनिया के लिए इतनी आवश्यक है! लेकिन उस विषय में आगे चर्चा कल!

वृन्दावन के हमारे आश्रम में नास्तिक सम्मेलन – 26 जुलाई 2015

मैंने आपको परसों और कल हुए कार्यक्रमों के बारे में पहले ही बताया है-नास्तिकों का सम्मेलन। कार्यक्रम की तैयारियों के समय तक हम लोगों को नहीं पता था कि शुक्रवार या शनिवार को कितने लोग आएँगे। आज मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि हर स्तर पर, हर एतबार से यह एक सफल कार्यक्रम रहा और अंततः उसने बहुत से समान रुचि वाले लोगों का मिलना संभव किया!

कार्यक्रम के लिए शुक्रवार और शनिवार के दो दिन नियत थे लेकिन गुरुवार से ही अतिथियों का आना शुरू हो गया था। निस्संदेह-कुछ लोग बहुत दूर से आए थे! भारत के 13 भिन्न प्रदेशों से कुल मिलाकर 70 से अधिक अतिथियों ने इस कार्यक्रम में शिरकत की! हमारे उत्तर प्रदेश या करीबी दिल्ली से ही नहीं बल्कि पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तरांचल, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, बिहार, उड़ीसा, महाराष्ट्र और जम्मू-कश्मीर से भी!

वर्ष के इस समय आम तौर पर आश्रम में ज़्यादा मेहमान नहीं होते और इस बार तो सिर्फ एक ही था। इस प्रकार हम अपने आश्रम में ही बहुत से मित्रों को ठहरा सके लेकिन इसके अलावा हमने पास में ही स्थित एक अतिथिगृह किराए पर लिया, यहाँ तक कि स्कूल के कमरों में भी रात में सोने की व्यवस्था करी। इस प्रकार रात में ठहरने की सब की व्यवस्था हो गयी और दिन में हम सभी आश्रम में आनंददायक समय व्यतीत करते रहे!

शुक्रवार को हमने सबको अपना स्कूल दिखाया। उन्होंने हमारे बच्चों और अध्यापिकाओं से भेंट की और वह सब प्रत्यक्ष देखा, जो वे लंबे समय से हमारी वैबसाइट पर चित्रों के माध्यम से देखा करते थे। उसके बाद मैं उन सबको हमारा निर्माणाधीन आयुर्वेदिक रेस्तराँ “अम्माजी’ज़” दिखाने ले गया।

दोपहर के समय वैसे भी हमारे पास एक दूसरे को जानने का पर्याप्त समय था फिर भी हमने शुक्रवार की शाम एक औपचारिक परिचय-सत्र भी आयोजित किया, जिसमें सभी प्रतिभागियों ने सबके सामने नास्तिकता के बारे में अपने विचार रखे और अपनी भावनाएँ व्यक्त कीं और उसके बाद संगीत, गिटार-वादन और गायन का कार्यक्रम हुआ।

कल, यानी शनिवार को हम सबने इस विषय में जानकारी हासिल की कि किस प्रकार मरणोपरान्त हम अपने शरीर चिकित्सा संबंधी प्रयोगों के लिए दान कर सकते हैं। मेरे पिताजी और नानी ने भी अपने देहदान संबंधी फॉर्म भरे और स्वाभाविक ही इस कार्यक्रम के बाद हमारी चर्चा का रुख इस ओर मुड़ गया कि किस प्रकार धर्म इस नेक काम में बाधाएँ पैदा करता है!

अंत में, यानी कल शाम को इस आयोजन का सबसे विशिष्ट हिस्सा एक नृत्य समारोह के रूप में आयोजित किया गया था, जिसका उद्देश्य जीवन का उत्सव मनाना था! हम पागलों की भांति नाचे और खूब मौजमस्ती की–जिसके बारे में कुछ धार्मिक लोग कहते हैं कि यदि आप ईश्वर को नहीं मानते तो आप आनंदित भी नहीं हो सकते! आज भारत भर से आए हमारे अनेकानेक मित्र एक-दूसरे से बिदा ले रहे हैं।

मेरे लिए यह सप्ताहांत बड़ा असाधारण और बहुत विशिष्ट रहा। इतने सारे समान रुचि रखने वाले लोगों से मिलना, उनके साथ विद्वत्तापूर्ण चर्चा में हिस्सा लेना, अपना दृष्टिकोण रखना और उनकी सुनना, आपसी विचार, भावनाएँ, ज्ञान और आदर्श एक-दूसरे के साथ साझा करना–वाकई बहुत ही अद्भुत अनुभव था। भविष्य में भी नास्तिकों, धर्म में विश्वास न रखने वालों और विवेकपूर्ण विचारकों के लिए मंच तैयार कर उन्हें आमंत्रित करने में मुझे अत्यंत प्रसन्नता होगी!

यहाँ आप हमारे नास्तिक सम्मेलन के चित्र देख सकते हैं

पश्चिमी महिला के लिए क्यों भारत में सामाजिक जीवन बनाने में दिक्कतें पेश आ सकती हैं – 2 जुलाई 2015

पिछले कुछ ब्लॉगों में मैं उन चुनौतियों के विषय में लिखता रहा हूँ, जिनका सामना उन पश्चिमी महिलाओं को करना पड़ सकता है, जो अपने भारतीय पति के साथ भारत में रहने का इरादा रखती हैं। मैंने यह भी बताया कि इन चुनौतियों का फैलाव काफी विस्तृत है- अपनी भारतीय सास के साथ पैदा होने वाले मतभेदों से लेकर इस प्रश्न तक कि आप किस हद तक अंधविश्वास से परिपूर्ण भारतीय परंपराओं को स्वीकार करेंगी, या घरेलू हिंसा को, यहाँ तक कि आपके बच्चों के साथ होने वाले दुर्व्यवहारों को आप कहाँ तक सहन करेंगी। आज मैं कुछ और आगे जाकर इस विषय में अपने विचार रखना चाहता हूँ- आपके घरेलू संबंधों से परे, अपने संयुक्त परिवार के बाहर की दुनिया से आपके संबंध कैसे होंगे? आपका सामाजिक जीवन कैसा होगा?

स्वाभाविक ही, जब आप किसी दूसरे देश में बसती हैं और अपने लिए एक सामाजिक जीवन तैयार करने की कोशिश करती हैं तब आपको लगभग शून्य से शुरुआत करनी पड़ती है। 'लगभग' मैं इसलिए कह रहा हूँ कि आपका पति और उसका परिवार इस काम में आपकी मदद कर सकते हैं। शायद! भारत की जनसंख्या इतनी अधिक है कि यह समस्या नहीं होती कि आपको लोग कहाँ मिलेंगे- लेकिन सवाल यह है कि क्या आप उनके साथ नज़दीकी बढ़ाना चाहेंगी!

पश्चिम में पली-बढ़ी होने के कारण और इस कारण कि वहाँ के खुले समाज में आपका लालन-पालन और विकास हुआ है, एक औसत भारतीय की तुलना में आप बिल्कुल अलग ढंग से सोच रही होती हैं। सिर्फ यही बात आपके लिए भारत में कुछ परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाने में बाधक हो सकती हैं।

एक उदाहरण लें: आप अपने पति के साथ बाज़ार में घूम रही हैं और अचानक पति की एक परिचित महिला से आप लोगों की मुलाक़ात हो जाती है। आप गपशप करने लगती हैं और आपको लगता है कि यही भारत में आपका सबसे पहला संपर्क है। शायद आपकी पहली मित्र। वह भी आपसे मिलकर उल्लसित दिखाई दे रही है। आपके बीच मोबाइल नंबरों का आदान-प्रदान होता है और वह वादा करती है कि सप्ताहांत में वह आपके पास आएगी। आप भी व्यग्र हो उठती हैं और नाश्ते की तैयारियाँ शुरू करते हुए इस बात की आदत डालने का प्रयास करने लगती हैं कि ‘सप्ताहांत’ का अर्थ कोई एक खास दिन नहीं है, वह कभी भी धमक सकती हैं!

लेकिन क्या आप कल्पना कर सकती हैं कि जब रविवार की शाम तक भी आपके यहाँ कोई न आए तो आपको कैसा लगेगा?

अधिकतर भारतीय खुद अपनी कही बात को कोई विशेष महत्व नहीं देते, खासकर इस तरह की मुलाकातों में कही बातों को। पश्चिम में आपकी आदत होती है कि आप मुलाक़ात का एक निश्चित दिन और समय तय करते हैं और अगर सामने वाले का कार्यक्रम किसी कारण स्थगित होता है तो वह अपने न आ पाने की सूचना देता है। पहली बात तो भारतीय लोग इसे बहुत गंभीर नहीं मानते! इसलिए उसके बारे में उन्हें कोई अफसोस भी नहीं होता-यह भिन्न विचारों और समझ की बात है! उनका फोकस दूसरी बातों पर होता है और कुल मिलाकर चीजों को देखने का नज़रिया भी बिल्कुल अलग प्रकार का होता है।

स्वाभाविक ही, बातचीत के विषय भी बिल्कुल अलग होंगे क्योंकि हर एक की रुचियाँ उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर भी निर्भर होती हैं। बहुत सी महिलाओं के पास बातचीत के लिए इसके अलावा कोई दूसरा विषय नहीं होता कि उसका पहला बच्चा कब होने वाला है या वह कितने बच्चे पैदा करेगी- जब कि आप कुछ अधिक गंभीर विषयों पर बात करना चाहेंगी!

ज़्यादातर भारतीय परिवारों में व्याप्त अंधविश्वास के बारे में आपको मैंने पहले ही बताया। आपका भारतीय परिवार बहुत असाधारण रूप से प्रगतिशील ही क्यों न ही क्यों न हो और मिथ्या अंधविश्वासों पर भरोसा न भी करता हो तो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि आपके आसपास के अन्य सभी लोगों में अंधविश्वास इस तरह कूट-कूटकर भरा होता है कि हर चर्चा में उसका प्रभाव दिखाई देता है! क्या आप मुहूर्त, व्रत-उपवास, धार्मिक समारोहों से सम्बंधित प्रश्नो से बचना चाहते हैं? उन्हें सुनने की आदत डालिए या फिर दोस्तों से बातचीत बंद कर दीजिए। आपको बुरा लग रहा है? किसी बिंदु पर आकर आप स्वयं अनुभव करेंगे कि इस मित्रता के लिए बहुत सारी ऊर्जा और बहुत सारा समय व्यर्थ करने में आप रुचि नहीं रखते।

मैंने घरेलू हिंसा के बारे में लिखा था और यह भी कि कैसे आपको अपने बच्चों के विरुद्ध किसी तरह की हिंसा स्वीकार नहीं करनी चाहिए। लेकिन आप अपने मित्रों और उनके घरों में होने वाली हिंसा का क्या करेंगे? क्या आप उनके घरों में जाना पसंद करेंगे कि आपके बच्चे उनके बच्चों के साथ खेलें और फिर उन्हें अपने माता-पिता से गालियाँ खाता या पिटता देखें? आप इसे पसंद नहीं करेंगे, आप नहीं चाहेंगे कि आपका बेटा या आपकी बेटी यह सब नज़ारा देखे और उनका संवेदनशील मन इन कटु बातों का अनुभव करे! फिर आप अपने बच्चे को अपने तरीके से, अपने परिवेश में पालना-पोसना शुरू कर देंगी।

हो सकता है कि भारत के बड़े शहरों में, जहाँ लोग अधिक खुले दिमाग वाले होते हैं और अलग तरह का जीवन व्यतीत करते हैं, ये बातें कुछ भिन्न हों। लेकिन बहुत भिन्न भी नहीं और फिर सारे लोग भी वैसे खुले दिमाग के नहीं होते! तथ्य यह है कि आज भी भारत में जीवन के प्रति अपरंपरागत रवैया रखने वाले इने-गिने लोग ही दिखाई पड़ते हैं।

अपनी जर्मन पत्नी के साथ हुए अपने निजी अनुभव के आधार पर कहना चाहता हूँ कि बहुत प्रयासों के बाद भी आपको बहुत थोड़े लोग ही मिल पाते हैं, जिनके साथ आप वास्तव में अपना समय गुज़ारना पसंद करेंगी। लेकिन फिर- यह सबकी व्यक्तिगत परिस्थितियों पर निर्भर करता है और इस पर भी कि आप ठीक-ठीक क्या चाहती हैं। तो आगे बढ़िए, मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं!

लेकिन अगर आप अपने भारतीय पति के साथ अपने देश में बसना चाहती हैं तो अगले सोमवार से मेरे ब्लॉग पढ़ना शुरू कीजिए क्योंकि मैं उन समस्याओं पर लिखने जा रहा हूँ, जिनसे उसकी मुठभेड़ हो सकती है, क्योंकि उसके लिए वह वातावरण बिल्कुल अपरिचित और नया होगा!

अगर आप अपनी पत्नी के साथ बलात्कार नहीं करते तो आप भारत के सिर्फ 25% लोगों में से एक हैं – 10 जून 2015

कल मैंने आपको बताया था कि कपड़ों को लेकर हुई चर्चा के कारण कैसे मुझे मित्रता में दूरी महसूस होने लगी। इस विषय पर हमारे बीच गहरी मतभिन्नता थी क्योंकि उसकी नज़र में महिलाओं के वस्त्रों की वजह से बलात्कार होते हैं। चर्चा आगे भी चलती रही थी और आज मैं उसके शेष हिस्से के बारे में आपको बताना चाहता हूँ।

मैं जानता हूँ कि वास्तव में बहुत से लोग हैं, जो मानते हैं कि किसी स्त्री के साथ कोई भी यौन दुराचार वास्तव में उसी की वजह से होता है, कम से कम एक विशेष सीमा तक। और इन लोगों के लिए गलत कपड़े पहनना उसकी मुख्य गलती होती है। लेकिन क्या आप तब भी यही समझते हैं कि जब दो साल की एक बच्ची के साथ बलात्कार होता है तो इसलिए कि वह अपने चाचा के सामने नंग-धड़ंग घूमती रहती थी? क्या आपकी नज़र में वाक़ई यह उसका दोष है?

राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आँकड़े दर्शाते हैं कि 93% बलात्कार पीड़िता के परिचित व्यक्तियों द्वारा ही किए जाते हैं। यह एक तथ्य है। और ऐसे लोग भी हैं, जो इस पर विश्वास नहीं करते।

अधिकतर ये लोग पीड़िता के चाचा, पिता, भाई या परिवार के परिचित मित्र होते हैं! यह कहना आवश्यक है कि उनकी जगह चाचियाँ, बहनें और परिवार की दूसरी महिलाएँ भी हो सकती हैं क्योंकि यौन दुर्व्यवहार सिर्फ पुरुषों तक ही महदूद नहीं है। बच्चों से वयस्क कहते हैं कि यह बात किसी को न बताएँ अन्यथा कोई भी उनसे प्यार नहीं करेगा। बड़ी उम्र की महिलाएँ भी बलात्कार का शिकार होती हैं और शर्मिंदगी के एहसास में डूब जाती हैं, स्वयं को अपराधी समझती हैं, किसी के सामने स्वीकार नहीं करतीं, शायद डरती हैं कि उल्टे उसी पर दोष मढ़ दिया जाएगा!

लेकिन ऐसे लोग भी समाज में हैं जो कहते हैं कि ये आँकड़े झूठे हैं-हालाँकि दुनिया भर में ऐसे आँकड़े बहुतायत से पाए जाते हैं! मेरा मित्र इन्हीं लोगों में से एक है! दरअसल उसने कहा भी- 'मैं इतने परिवारों को जानता हूँ और उनमें से किसी भी परिवार में बलात्कार नहीं हुआ है!'

वे आपको क्यों बताएँगे? और शायद वे खुद भी न जानते हों क्योंकि आप जैसे लोगों के चलते पीड़िता अपने आप से इस कदर शर्मिंदा होती है कि अपने साथ हुए दुर्व्यवहार को अपनी ही गलती समझती है!

एक और आँकड़ा है-इस बार संयुक्त राष्ट्र संघ की तरफ से-जिसे भारत सरकार तक झूठा मानती है: भारत में 75% शादीशुदा महिलाएँ अपने पतियों द्वारा बलात्कार का शिकार होती हैं।

इस पर मेरे मित्र का जवाब था कि यह आँकड़ा सरासर गलत है। तर्क: 'मैंने अपनी पत्नी के साथ कभी बलात्कार नहीं किया!'

मैं एक मिनट के लिए स्तब्ध रह गया और मेरी ज़बान से बोल नहीं फूटे! मैं तो इस तरह से सोच भी नहीं था! आप इस तरह का उत्तर क्योंकर देंगे? स्वाभाविक ही आप अपनी पत्नी के साथ बलात्कार नहीं करते, मैंने भी यह नहीं सोचा था- लेकिन इससे आप सिर्फ उन 25% लोगों में शुमार होते हैं, जो ऐसा नहीं करते! और इसका अर्थ यह नहीं है कि ऐसा करने वाला और कोई हो ही नहीं सकता!

लेकिन समस्या यह है कि परंपरागत और धार्मिक लोग, जिन्हें विश्वास है कि हमारी पुरातनकाल से चली आ रही भारतीय संस्कृति में हर बात अच्छी ही अच्छी है, वह इतनी महान है कि उसे जस का तस, जैसी वह शुरू से थी, बचाकर और संभालकर रखना ज़रूरी है, भले ही यथार्थ की रोशनी में आपको अपनी आँखों पर पट्टी ही क्यों न बांधनी पड़े! वे अपने आप से झूठ बोलते हैं और कहते हैं कि यह तो उनके धर्म और संस्कृति में हो ही नहीं सकता और इसलिए यह होता ही नहीं है, उनका अस्तित्व ही नहीं है!

यह मेरे लिए अत्यंत आश्चर्यजनक था कि मेरा मित्र भी इन आँकड़ों पर विश्वास नहीं करता- लेकिन फिर मैं जानता हूँ कि बहुत से दूसरे लोग भी इसी तरह सोचते हैं। मस्तिष्क के साथ होने वाले इस छल-कपट के बारे में कल मैं कुछ और विस्तार से लिखूंगा।

आप बिकनी पहनना ठीक नहीं समझते? मेरी पत्नी उन्हें बीच पर पहनती हैं! क्या हम अब भी दोस्त बने रह सकते हैं? 9 जून 2015

कल मैंने अपने एक मित्र के बारे में आपको बताया था, जिसके साथ, दुर्भाग्य से, मैं अब ज़्यादा नजदीकी महसूस नहीं करता। मैं एक उदाहरण से इस स्थिति का विश्लेषण करूँगा, जिसके अनुसार हमारे विश्वासों, नजरियों और विचारों ने हम दोनों के बीच दूरी पैदा कर दी है। यह इस बात से संबंधित है कि महिलाओं और लड़कियों को क्या पहनना चाहिए-और क्या ऐसे वस्त्र, बदन को पर्याप्त न ढँक पाने की वजह से बलात्कार और यौन दुराचार को आमंत्रित करते हैं।

मेरा यह मित्र पूजापाठी हिन्दू है, वह हिन्दू संस्कृति और परम्पराओं का समर्थक और उसका वाहक है और शायद आप पहले ही इन विषयों पर मेरे विचारों को जानते होंगे। हमारे बीच किसी अखबार में प्रकाशित एक चित्र पर चर्चा हुई थी, जिसने मुझे एक ब्लॉग- जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं- लिखने के लिए भी प्रेरित किया था। इस चित्र का संदेश यह था कि पुरुषों को चाहिए कि वे अपनी लड़कियों को ‘पूरे कपड़ों में ढँककर’ रखें।

मैंने पूरी शक्ति से इस विचार का विरोध किया और अपनी बात के पक्ष में हर तरह के तर्क दिए लेकिन स्वाभाविक ही, उसे सहमत नहीं कर पाया क्योंकि जीवन के बारे में उसके विचार दक़ियानूसी, परंपरावादी और धर्म से संचालित भारतीय संस्कृति से प्रभावित थे।

इस चर्चा के बाद मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। मुझे याद आया, कुछ ही दिन पहले मैंने अपने मित्र को उस समय के फोटो दिखाए थे, जब हम यूरोप में थे। उसमें एक बीच पर खींचे गए मेरे, मेरी पत्नी, बेटी और दूसरे मित्रों के फोटो थे। हम तैरने की पोशाकों में थे, जिनमें मेरी महिला मित्रों और स्वाभाविक ही मेरी पत्नी ने बिकनी पहनी हुई थी और मेरी बेटी ने तैरते समय पहनने वाले बच्चों के वस्त्र पहने हुए थे-जो महज रंगीन अंडरवीयर लग रहे थे।

अगर आप या कोई भी यह मानता है कि जो कपड़े पूरा शरीर नहीं ढँकते, बलात्कार को आमंत्रित करते हैं, अगर आप सोचते हैं कि महिलाओं को बिकनी नहीं पहनना चाहिए बल्कि बीच पर भी पूरे कपड़े पहनकर नहाना चाहिए तो उनके मन में ये सैर-सपाटे वाले चित्र गलत विचार पैदा करेंगे! मैं एक सैर-सपाटे वाला चित्र साझा कर रहा हूँ और आप एक चित्र साझा करके कह रहे हैं कि महिलाओं को अपना बदन ढँककर रखना चाहिए?

आप मेरे परिवार के बारे में, मेरी पत्नी के बारे में क्या सोच रहे हैं?

मुझे लगता है कि यह बिल्कुल स्पष्ट है और मैं ऐसे व्यक्ति से, जो मेरी पत्नी के बारे में ऐसा सोचता है, वही घनिष्ठता नहीं रख सकता!

आप सभी पहले से जानते हैं कि मैं अपने विचार दबाकर नहीं रखता और इसलिए मैंने ठीक यही बात अपने मित्र से साफ-साफ शब्दों में कह दी। उसकी प्रतिक्रिया थी, ‘तुम बहुत ज़्यादा सोचते हो’!

जी नहीं, दरअसल आप पर्याप्त नहीं सोच रहे हो! आपका धर्म आपको सोचने की इजाज़त ही नहीं देता और इसलिए आप सिर्फ धर्मग्रंथों में लिखी गई या आपके पुरोहितों द्वारा बताई गई बातें ही सोच पाते हो! और ईश्वर ही तो यह सब कर रहा है तो फिर आप क्यों परेशान होंगे?

लेकिन जब आप कोई वक्तव्य देते हैं, किसी भी तरह का वक्तव्य, जो बहुत सामान्य किस्म का होता है और कहता है कि ‘कपड़े शरीर ढँकने के लिए होते हैं, उसे उघाड़ने के लिए नहीं’ तो आप सबके लिए कह रहे होते हैं, हर देश के लिए, हर जगह के संदर्भ में कह रहे होते हैं। आपका वक्तव्य मुझ पर भी लागू होता है, मेरी पत्नी पर लागू होता है और मेरी बेटी पर भी लागू होता है! अगर आप कहते हैं कि नहीं करता तो आप झूठ बोल रहे हैं। आप सच देखना सुनना नहीं चाहेंगे लेकिन यही आपके मन में होता है और भले ही आप ढँके-छिपे रूप से मेरे परिवार को और दोस्तों को मिली स्वतन्त्रता की प्रशंसा करेंगे लेकिन आपके मन में यही बात होती है कि- ‘यह गलत है, यह पापकर्म है!’

नहीं, इन घटनाओं या चर्चाओं के परिप्रेक्ष्य में मैं आपके प्रति एक वास्तविक अच्छे दोस्त जैसी घनिष्ठता महसूस नहीं कर सकता। मुझे इस एहसास से महरूम होने का दुख होगा- लेकिन जब मैं इसके कारणों पर सोचता हूँ तो मुझे कोई दुख नहीं होता!