मुफ्त सुविधाओं का लाभ उठाते हुए आर्थिक बराबरी का उपदेश – 25 नवम्बर 2015

कुछ समय पहले हमारे आश्रम में एक बहुत कट्टर विचारों वाला व्यक्ति मेहमान बनकर आया। उसका विचार था कि हर व्यक्ति को एक-दूसरे के बराबर होना चाहिए। हम भी बराबरी के विचार के हामी हैं और आश्रम में भी बराबरी के इस विचार को प्रोत्साहित करते हैं लेकिन उसने अपने कुछ विचारों और आदर्शों का जैसा वर्णन किया, उससे हम कतई सहमत नहीं हो सकते थे। उनमें से एक यह था कि हर एक को काम के घंटों के अनुसार एक समान पारिश्रमिक दिया जाना चाहिए। और हर एक को उतने घंटे ही काम करना चाहिए, जितने घंटे वह करना चाहता हो। इस विचार को इस तथ्य के साथ जोड़कर देखने पर कि वह स्वयं बेहद आलसी था, उसकी बात से सहमत होना मेरे लिए असंभब था!

मैं उसके विचार के मर्म को समझ रहा हूँ और निश्चित ही उसके कुछ बिंदुओं से सहमत भी हो सकता हूँ: कि एक तरफ कुछ लोग हैं जो कम से कम समय श्रम करके इतना अधिक कमा लेते हैं कि उस पैसे को जीवन भर खर्च नहीं कर सकते और दूसरी तरफ ऐसे लोग भी हैं जो दिन भर हाड़तोड़ मेहनत करते हैं, छुट्टियाँ भी नही ले पाते और बड़ी मुश्किल से अपना घर-खर्च चला पाते हैं। इस स्थिति में सुधार होना चाहिए और किसी व्यक्ति को पैसे की कमी के कारण भूखा मरने के लिए नहीं छोड़ देना चाहिए।

लेकिन अपने उस मेहमान के विचार में मैं इस समस्या का समाधान नहीं देखता! उसने मुझसे कहा कि एक डॉक्टर, वैज्ञानिक, एक निर्माण मजदूर और सफाई कर्मचारी को एक समान वेतन मिलना चाहिए। और साथ ही, हम सबको चाहिए कि अपनी ज़रूरतों को कम करें, अर्थात हमें कम से कम साधनों में जीवन यापन करना चाहिए। इस तरह हर किसी को उसकी आवश्यकतानुसार प्राप्त हो जाएगा।

सैद्धांतिक रूप से यह पूरी तरह सही विचार लगता है लेकिन व्यावहारिक जीवन में यह संभव नहीं है! निश्चित ही सभी का काम महत्वपूर्ण है, भले ही वे कोई भी काम कर रहे हों क्योंकि हमें फर्श भी लगवाना पड़ता है और उसे साफ़ भी करवाना पड़ता है और उसके बाद ही हम उस पर चल सकते हैं और उस पर प्रयोगशाला बनाकर वैज्ञानिक प्रयोग कर सकते हैं! लेकिन एक डॉक्टर ने अपनी पढ़ाई में सालों खर्च किए हैं और उसका काम जीवन बचाता है। वह बरतन भी साफ़ कर सकता है मगर इसका उल्टा संभव नहीं है! है क्या?

इसके अलावा, हम सब अलग-अलग लोग हैं! एक व्यक्ति किसी काम को किसी दूसरे के मुकाबले बहुत कम समय में पूरा कर सकता है। अगर यह बार-बार हो तो सिर्फ यही कहा जा सकता है कि पहला व्यक्ति उस काम में दूसरे से अधिक निपुण है-और तब यदि वह दूसरे से अधिक पैसे कमाता है तो इसमें कतई कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। है कि नहीं?

अब अगर आपका जवाब ‘नहीं’ है तो इसका अर्थ हुआ कि व्यक्तिगत क्षमता या दक्षता से कोई फर्क नहीं पड़ता और किसी काम पर जो जितना समय लगाएगा, उसी के अनुसार सबको भुगतान किया जाना चाहिए। तब मेरा प्रतिप्रश्न यह होगा: ‘उनका क्या किया जाएगा जो आलसी हैं’? और फिर एक प्रश्न और कि आप कौन होते हैं, किसी से उनकी ज़रूरतों को कम करने का आदेश देने वाले? हो सकता है, ज़रूरतों पर उनके एहसासात आपसे जुदा हों!

और इसीलिए उस पूरे विचार पर ही मैं हँसे बिना नहीं रह सका: जबकि वह बढ़िया गरम पानी से नहा-धोकर, स्वादिष्ट नाश्ता करके आराम से ए सी कमरे में बैठा हुआ था, अपना खुद का काम करने में उसकी कोई रुचि भी दिखाई नहीं दे रही थी।

इसलिए, जबकि वास्तव में मैं विश्वास करता हूँ कि हमें गरीबों की मदद करनी चाहिए और हममें से ज़्यादातर लोग थोड़ा न थोड़ा खर्च कम भी कर सकते हैं लेकिन जो लोग इसके समर्थन में सबसे अधिक भाषण झाड़ते हैं, वही अपने छोटे, सुखद दायरे में आराम फरमाते हैं और इस तरह अपने कथन के विरुद्ध आचरण करते हैं।

हाँ, मुझे सेक्स, पैसा, भौतिक पदार्थ और मेरी पत्नी पसंद हैं और मुझे कोई अपराधबोध भी नहीं है! 19 नवंबर 2015

कुछ समय पहले हमारे आश्रम में एक ऐसा मेहमान आया, दुनिया के बारे में जिसका बहुत कट्टर नज़रिया था। कल मैंने आपको बताया था कि कुछ लोग ऐसे होते हैं जो, आप कुछ भी कहें या करें, आपको नीचा दिखाने की चाह रखते हैं। यह व्यक्ति उसी तरह का व्यक्ति था- और आज मैं उसी व्यक्ति को ऐसे व्यवहार का उदाहरण बनाना चाहता हूँ।

यह व्यक्ति अपने आप को कम्युनिस्ट विचारधारा का नास्तिक कहता था। वह हमेशा बातचीत के लिए सन्नद्ध रहता था-जो अक्सर दूसरों को नीचा दिखाने की कवायत में बदल जाती थी। इसी तरह जब एक बार हम आश्रम में टहल रहे थे तो उसने मेरे कपड़ों के बारे में पूछा। निश्चय ही, यह पहला मौका नहीं था जब किसी ने मुझसे मेरे कपड़ों के बारे में पूछा था। दरअसल यह अक्सर होता है लेकिन इस बार प्रश्न के स्वर में एक प्रकार का आरोप नज़र आता था: अगर मैं खुद को नास्तिक कहता हूँ तो ऐसे कपड़े क्यों पहनता हूँ जिससे कोई अन्य धारणा बनती है?

अपने ब्लॉगों में पहले ही मैं स्पष्ट कर चुका हूँ कि अपने कपड़ों से मैं कोई सन्देश नहीं दे रहा हूँ। जैसे भी हों, मुझे यही कपड़े पसंद हैं और दूसरी तरह के कपड़े मैं नहीं पहनना चाहता।

अपने प्रश्न के इस उत्तर पर उसने दूसरा प्रश्न दाग दिया: आपको अपने कपड़े पसंद हैं? यानी आपको भौतिक वस्तुएँ पसंद हैं?

जी हाँ, पसंद हैं! मुझे बहुत से साज़ो-सामान पसंद हैं और पैसा कमाना भी पसंद है। मुझे अपने काम से प्यार है और मैं अपनी पत्नी और बेटी से भी प्यार करता हूँ! मैं किसी तरह की धार्मिक जड़ता से या ऐसे किसी अन्य दर्शन से बंधा हुआ नहीं हूँ, जो मुझे सलाह दे कि यह पहनो और वह न पहनो! मैं किसी दूसरे व्यक्ति के विचारों को इजाज़त नहीं देता कि वे मेरी भावनाओं को निर्देशित करने लगें!

बहुत से लोग हैं जो मानते हैं कि भौतिक वस्तुओं से अलिप्तता ही सही रास्ता है। बहुत से लोग ब्रह्मचर्य पर विश्वास करते हैं और भावनाओं के प्रति अलिप्तता को भी उचित मानते हैं। भारत में ऐसे लोग अधिकतर धार्मिक साधू होते हैं। पश्चिम में भी ऐसे लोग अध्यात्मवादियों में पाए जाते हैं। वे अधार्मिक हो सकते हैं लेकिन फिर भी उनकी कोई न कोई विचारधारा होती है और साथ ही यह विचार कि आपको क्या प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए।

ये सारे लोग मानते हैं कि हमें अपने कपड़ों से लगाव नहीं होना चाहिए, पैसे से प्यार नहीं होना चाहिए और हमें अपने करीबी लोगों से अलिप्त रहना चाहिए। उन्हें जो मानना है, मानते रहें लेकिन मैं अपने जीवन का पूरा मज़ा लेना चाहता हूँ! मैं मानता हूँ कि जीवन का आनंद न लेना गलत है इसलिए मुझे अपने वस्त्र पसंद हैं और मैं अपने काम से प्रेम करता हूँ। जैसे मुझे गरीब बच्चों की मदद करना अच्छा लगता है, उसी तरह पैसे कमाना भी बहुत अच्छा लगता है। मैं अपनी बेटी से और पत्नी से प्यार करता हूँ, मुझे सेक्स बहुत पसंद है और मुझे हर तरह की आरामदेह सुविधाओं का उपभोग भी बहुत पसंद है। मैं छुट्टियाँ मनाना पसंद करता हूँ-जैसा कि मैं इस समय जर्मनी में अपने परिवार और बहुत सारे दोस्तों के साथ कर रहा हूँ!

मुझे जीवन का आनंद लेना पसंद है। मुझे जीवन से प्यार है और मानता हूँ कि हम सब को जीवन का हरसंभव अधिक से अधिक आनंद प्राप्त करना चाहिए। यदि आप कोई इतर विचार रखते हैं, तो बेशक अपने विचार के साथ खुश रहें और उसी के अनुसार जीवन बिताएँ-मुझे अपने विचारों के लिए नीचा दिखाने की कोशिश न करें। इसमें आपको सफलता नहीं मिलेगी और आप बेकार ही मेरा और खुद अपना समय बरबाद करेंगे। मैं आपको सहमत करने की कभी कोशिश नहीं करूँगा। मैं सिर्फ एक सलाह दूँगा: सिर्फ एक बार मेरी तरह जीवन का आनंद लेने और उससे प्यार करने की कोशिश करके देखिए। आप पछताएँगे नहीं!

भरोसा करना अच्छी बात है – मगर अपने शक पर भी भरोसा करें – 16 नवंबर 2015

अक्सर मैं लोगों से कहता हूँ कि उन्हें दूसरों पर भरोसा करने की क्षमता बढ़ानी चाहिए। लोगों से मिलते समय शुरू से उनके प्रति नकारात्मक रवैया रखना ठीक नहीं। लेकिन कुछ परिस्थितियों में समुचित जाँच किए बगैर कि सामने वाला झूठा इंसान या फ्रॉड तो नहीं, भरोसा नहीं करना चाहिए। अधिकतर मामलों में ऐसी स्थिति पैसों के संबंध में पेश आती है। अगर आपके सामने ऐसी परिस्थितियाँ आती रहती हैं, जहाँ आपको सामने वाले पर शक होता है कि वह भला व्यक्ति है या चालबाज़ (फ्रॉड) तो आज का ब्लॉग पढ़ना आपके लिए उपयोगी होगा।

सर्वप्रथम, इस बात का ध्यान रखें कि सामने वाले के पहनावे, चाल-ढाल और रहन-सहन से कतई प्रभावित न हों। हो सकता है कि वह बड़ी सी कार में घूमता-फिरता हो, डिज़ाइनर कपड़े पहनता हो और नवीनतम आईफोन लेकर चलता हो-लेकिन ये बातें उसे ईमानदार या भला व्यक्ति सिद्ध नहीं करतीं! कोई व्यक्ति जितना बड़ा चालबाज़ (फ्रॉड) होगा उतना ही उसका पहनावा, एक्सेसरीज़ और रहन-सहन भड़कीला होगा। पहुँचे हुए चालबाज़, छलछद्मी और धोखेबाज़ लोग प्रभावित करने वाले हर तरह के औज़ारों से लैस होते हैं और अक्सर यह सिद्ध करने में कामयाब हो जाते हैं कि वे वास्तव में बड़े भले और सत्यनिष्ठ व्यक्ति हैं।

दूसरा बिंदु है: झूठे और बेईमान लोग लगभग हमेशा ज़्यादा बोलते हैं। और इसी एक बात से आप अक्सर समझ सकते हैं कि वे और कुछ भी हो सकते हैं मगर ईमानदार नहीं! सिर्फ उस व्यक्ति की बातें ध्यान से सुनें: अगर झूठा इंसान होगा तो वह दो मिनट पहले कही अपनी ही बात भूल चुका होगा। बस वह लगातार बात करता रहेगा और अपनी ही पिछली बात का खंडन करती हुई बात कहेगा-ज़ाहिर है, बार-बार आपसे कोई न कोई झूठी बात कह रहा होगा। आदतन झूठ बोलने वालों को इस बात का एहसास ही नहीं होता कि अभी-अभी वे क्या कह चुके हैं क्योंकि वे इतना अधिक झूठ बोलते हैं कि वे अपने सारे झूठे वचनों को याद ही नहीं रख सकते। इसलिए अगर आप कुछ देर शान्त बैठे रहें तो उसी वक़्त आपको पता चल जाएगा कि वह झूठ बोल रहा है।

अंत में, इन बातों का यह अर्थ नहीं है कि आप जिस मामले में चर्चा कर रहे हैं, अनिवार्य रूप से उस मामले में भी वह चालबाज़ी कर रहा हो। लेकिन अब हम उस बिंदु पर बात करते हैं, जहाँ मामला पैसे से संबंधित होता है: उस व्यक्ति पर कतई भरोसा न करें, जो कहे- 'तुम मुझ पर भरोसा कर सकते हो, मुझे पैसे दे दो'। उसके बाद अगर आप साफ़ शब्दों में यह कह दें कि आप उसे नहीं जानते और इसलिए उस पर भरोसा नहीं कर सकते तो जवाब में वह कह सकता है, 'अगर आप मुझ पर भरोसा नहीं कर सकते तो हम साथ में काम नहीं कर सकते!' बस, इसी बिंदु पर वह धोखेबाज़ रफूचक्कर हो जाएगा।

इससे हमें यह शिक्षा मिलती है: कभी-कभी शक सही निकलते हैं। अगर आपके मन में किसी व्यक्ति के प्रति किसी प्रकार का शकोशुबहा है तो उसे व्यक्त करने में कतई संकोच न करें! अगर वह गंभीर है, ईमानदार है तो हर तरह के प्रयास करके अपनी नेकनीयती सिद्ध करेगा और अंततः आपका विश्वास हासिल कर लेगा। सिर्फ चालबाज़ और मक्कार ही भाग जाएँगे!

सामान्य टूरिस्ट गाइडों से हम किस तरह अलग हैं? 22 जुलाई 2015

पिछले दो ब्लॉगों में मैंने आपको बताया कि कैसे हमारे आश्रम में एक टूर गाइड आया जो चाहता था कि अपने कमीशन में से एक हिस्सा हमें नियमित रूप से दे दे। बिल्कुल शुरू ही में मैंने ज़िक्र किया था कि आम टूर गाइडों से हम बहुत अलग तरह से यह काम करते हैं और इसी अंतर को अपने व्यापार के लिए सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं। ठीक इसी बात को और स्पष्ट करने के लिए मैं आज का ब्लॉग लिखना चाहता हूँ।

पिछले दो दिनों के ब्लॉग पढ़कर आप भी इस बारे में समझ गए होंगे। मैंने बताया था कि हमारे कर्मचारी लोगों से टिप (बख्शीश) नहीं माँगते, बल्कि इसके विपरीत, हम अपने मेहमानों से हमारे किसी भी कर्मचारी को टिप न देने की गुज़ारिश करते हैं। कारण है- समानता, निष्पक्षता। हम चाहते है लोग प्रसन्न और संतुष्ट हों। यह उनके लिए भी सच है जो यहाँ काम करते हैं और उनके लिए भी जो यहाँ विश्रांति प्राप्त करने या किसी प्रशिक्षण हेतु आते हैं या पर्यटक के रूप में आते हैं! संतोष की मुख्य बात यह होती है कि जो उन्हें प्राप्त होता है, उसकी जायज़ कीमत वे अदा करते हैं और कोई उनका गलत लाभ नहीं उठाता। हम सिर्फ ग्राहक नहीं बनाना चाहते, हम दोस्त बनाना चाहते हैं!

भारत भर के टूर और पर्यटन प्रस्ताव हम तब लेकर आए जब दोस्तों ने हमसे इनके लिए खुद कहा। उन लोगों ने कहा, जो पहले से हमें जानते थे और जो इस आशा से हमारे आश्रम में मेहमान बनकर आते थे कि हम उनके पर्यटन कार्यक्रमों की व्यवस्था में सहायता करेंगे। उन्हें आशंका होती थी कि कहीं उनके साथ धोखाधड़ी न हो, कोई दुर्व्यवहार न हो। कुछ लोगों के साथ पहले ऐसा हो चुका होता था और वे आश्वस्त होना चाहते थे, इसलिए हमारे पास आते थे कि हम उन्हें सही जानकारियाँ और घूमने-फिरने की उचित राय देंगे और मदद करेंगे।

इन सब बातों का ध्यान रखते हुए हमने यह प्रस्ताव रखा कि खुद मेरे भाई यशेन्दु और पूर्णेन्दु उनके साथ गाइड के रूप में जाएँगे और आज तक यही व्यवस्था लागू है। अगर वे यहाँ नहीं हैं तो हम कोई टूर कार्यक्रम नहीं रखते क्योंकि आज तक हमें ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिल पाया है, जो इतना विश्वसनीय हो कि अपने मेहमानों के साथ उसे भेजा जा सके। अपने मेहमानों को हम उसके भरोसे छोड़कर निश्चिन्त हो सकें। वास्तव में इसे हम अपना कर्तव्य समझते हैं कि अपने मित्रों को हर तरह के कमीशन व्यापार से मुक्त रखें, जिसमें सामान्य टूर गाइड खुले आम, धड़ल्ले के साथ लिप्त रहते हैं!

आप कल्पना नहीं कर सकते कि न जाने कितनी बार मेरे भाइयों को विदेशी पर्यटकों की खरीदी पर दुकानदारों ने 80-80 प्रतिशत तक कमीशन देने का प्रस्ताव रखा! लेकिन हम यह नहीं करते! वे आपके साथ दुकान पर खड़े होंगे और अगर आप चाहेंगे तो दुकानदार के साथ मोल-भाव भी करेंगे, जिससे आपको उचित कीमत पर आपकी मनचाही वस्तु मिल सके! जब आप पूछेंगे कि दुकानदार द्वारा बताई जा रही कीमत पर सामान खरीदना ठीक होगा या नहीं, वे आपको सच्चा और प्रामाणिक जवाब देंगे! जहाँ आप सैर करना चाहेंगे, जहाँ जाना चाहेंगे, वे पूरी कोशिश करेंगे कि आप उचित खर्च पर वहाँ जाकर वहाँ का लुत्फ उठा सकें। भारत में गाइडेड टूर लेना हो तो हमारे साथ दूसरी और सुविधाओं के अलावा यह एक अतिरिक्त लाभ भी आपको हो जाता है!

इसके साथ ही, हमारा ड्राईवर भी पूरी तरह विश्वास-योग्य है अतः जो भी उसके साथ कहीं आना-जाना चाहता है, निश्चिंत होकर उसके साथ कहीं भी जा सकता है। न दुर्घटना की चिंता, न ही पर्यटन-स्थलों से बाहर निकलने पर उसे खोजने की ज़रूरत। न कहीं भटकने का डर, न इस बात का कि वह किसी मिलीभगत वाली दुकान पर आपको ले जाएगा और बाद में आकर अपना मोटा कमीशन प्राप्त लेगा!

हम आशा करते हैं कि किसी न किसी दिन हमें एक ऐसा गाइड मिल जाएगा, जिस पर हम पूरा भरोसा कर सकेंगे लेकिन तब तक हमें खुद अपने आप पर निर्भर रहना होगा। लेकिन एक बात तय है, मैं किसी को भी एक ऐसे व्यक्ति के साथ कहीं नहीं भेज सकता, जिस पर मुझे पूरा भरोसा नहीं है कि वह उसके साथ धोखेबाज़ी नहीं करेगा!

और इसी बात पर, मेरे मित्रों, हम दूसरे गाइड टूरों से अलग हैं!

पूरी ईमानदारी के साथ बेईमानी – भारत में टूर-गाइडों का कमीशन व्यापार – 21 जुलाई 2015

कल मैंने आपको हमारे यहाँ से काम पाने की आशा से आए एक सरकारी मान्यता प्राप्त टूर गाइड के साक्षात्कार के बारे में बताया था। उसका कहना था कि लोग उसे जबरदस्ती पैसे दे देते हैं तो मजबूरी में लेना पड़ता है। मैंने आपसे कहा था कि आम तौर पर टूर गाइड, सीधे तौर पर या घुमा-फिराकर पैसों की उम्मीद रखते ही हैं। आज मैं जो उदाहरण आपके सामने रखूँगा, उससे आपके सम्मुख स्पष्ट हो जाएगा कि कैसे यह आदमी भी कोई अलग बात नहीं कह रहा था- बल्कि उसे लग रहा था कि वह हम पर कोई एहसान कर रहा है।

‘टिप’ (बख्शीष) पर उस आदमी के इस रवैये से मैं यह जान गया कि यह आदमी हम लोगों के लिए किसी काम का नहीं है। उसने आगे जो कहा, उससे मेरा यह शक सही सिद्ध हो गया:

‘फिक्र न करें, आप ब्राह्मण हैं, मैं ब्राह्मण हूँ, इसलिए मैं आपके साथ काम करने के लिए तैयार हूँ। मैं इन लोगों को बाज़ार की सैर कराऊँगा और कमीशन का हिस्सा नियमित रूप से लाकर आपको देता रहूँगा। हम लोग ब्राह्मण हैं, मै ईमानदारी से कमीशन का आपका हिस्सा आप तक पहुँचाता रहूँगा!”

अरे भाई, मुझे पता है कि भ्रष्टाचार के सभी कार्य पूरी ईमानदारी से किए जाते हैं! उसी तरह यह आदमी भी ईमानदारों का सरताज नज़र आ रहा था! वह पूरी ईमानदारी के साथ हमारे मेहमानों को ताजमहल के बिल्कुल आसपास स्थित अत्यधिक महँगी दुकानों पर ले कर जाएगा, उनको विश्वास दिलाएगा कि इन दुकानों द्वारा बेची जा रही घटिया वस्तुएँ सबसे अच्छी हैं, वैसी यादगार-निशानियाँ आगरा में कहीं और नहीं मिल सकतीं और उनसे उन दुकानदारों को दस गुना कीमत दिलवाएगा! पूरी ईमानदारी से वह दुकानदार से अपना कमीशन लेगा, हमारा हिस्सा अलग निकालकर बाकी अपनी जेब के हवाले करेगा!

इस प्रकार बहुत से लोग इन परिस्थितियों का लाभ उठाते हुए काफी पैसा कमा लेते हैं, लेकिन उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। हम ऐसे आदमी के साथ अपने मेहमानों को कैसे भेज सकते हैं?

बिदा लेने से पहले उस आदमी ने कहा: “यह अच्छा होगा कि एक ब्राह्मण दूसरे ब्राह्मण की मदद करे। मैं आपकी मदद करूँ, आप मेरी!”

मेरा मित्र इस आदमी को हमसे मिलवाने लाया था और मेरी बगल में बैठा था। सिर्फ यही कारण था कि मैंने अपने आपको यह कहने से रोक लिया: “आपको गलत जानकारी प्राप्त हुई है, मैं तो अछूत या निम्न जाति से हूँ! और अब आपने मेरे घर में पानी भी पी लिया है और चाय भी।”

मैं अपने मित्र को किसी असुविधाजनक स्थिति से दूर रखना चाहता था इसलिए मैंने इस तरह की कोई बात नहीं की। लेकिन मैंने फोन पर उससे साफ कह दिया कि ऐसे व्यक्ति की हमें ज़रूरत नहीं है। इसलिए जब तक हमें कोई ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिल जाता, जिस पर हम वाकई पूरा भरोसा कर सकें, तब तक हमारे मेहमानों की सभी यात्राओं में यशेंदु या पूर्णेन्दु ही साथ जाते रहेंगे!

क्या भारत में टिप की अपेक्षा न रखने वाला पर्यटन-गाइड मिलना असंभव है? 20 जुलाई 2015

स्वाभाविक ही, हमारे योग और आयुर्वेद शिविरों में विदेशों से आने वाले अधिकांश मेहमान पर्यटक होते हैं। हम खुद भी उन्हें गाइडेड पर्यटन के लिए उनके मनपसंद स्थानों पर ले जाते हैं या अपनी टैक्सी उनके साथ भेज देते हैं, जिससे वे भारत की सुंदरता को करीब से देख सकें। यही ‘टूर गाइड’ और ‘पर्यटक’ की परिभाषा है- लेकिन फिर भी हमारा दावा है कि हम सबसे बहुत अलग हैं। भारत के आम ‘टूर गाइडों’ से बिल्कुल अलग और इसके अलावा हमारे साथ हुए अनुभवों के चलते हमारे ‘पर्यटक’ भी सिर्फ पर्यटक नहीं बल्कि उससे बढ़कर कुछ होते हैं। आज मैं आपको बताना चाहता हूँ कि यह विचार मेरे मन में कैसे आया और क्यों मैं समझता हूँ कि ऐसा ही है।

एक दिन मेरा एक करीबी मित्र एक व्यक्ति को लेकर आया और मुझसे मिलवाया। क्योंकि मेरा मित्र जानता था कि हमारे यहाँ अक्सर ऐसे मेहमान आते रहते हैं, जो ताजमहल और आगरा के आसपास के दर्शनीय स्थलों की सैर करना चाहते हैं, स्वाभाविक ही, दोस्त को लगा कि हम उसे काम दे सकते हैं क्योंकि वह अधिकृत सरकारी गाइड था।

अधिकृत होने के कारण पहले-पहल हमें उसका व्यवहार बहुत पेशेवर लगा: एक दिन की आगरा यात्रा का फिक्स्ड रेट, एक व्यक्ति का इतना, दस के समूह के लिए एक ख़ास शुल्क और ज़्यादा लोगों के लिए कुछ और-लेकिन सब कुछ फिक्स्ड! वह इतिहास, इतिहास-पुरुषों और महिलाओं या ऐतिहासिक तारीखों का जानकार और ऐतिहासिक कहानी-किस्सों से पूरी तरह वाकिफ था और ग़रज़ यह कि, जो भी आप जानना चाहें, उसकी ज़बान पर मौजूद!

मैं उसे रखने के लिए तैयार हो गया और कहा कि फिक्स्ड रेट तो ठीक है मगर आश्रम आने वाले हर मेहमान के लिए हमारी एक शर्त होगी: आपके शुल्क का भुगतान हम करेंगे और आपके साथ जाने वाले हमारे मेहमान से आप अलग से एक रुपया भी नहीं माँगेंगे।

उत्तर मिला: ओह, मैं नहीं माँगूंगा। उसकी कोई बात नहीं, लेकिन आप तो जानते ही हैं, जब आप किसी के साथ बाहर होते हैं, उन्हें जानकारी देते हुए और जो कुछ भी बन पड़ता है, उनके लिए अच्छा से अच्छा करते हुए उनकी सेवा में हर वक़्त तत्पर होते हैं तो उन्हें भी लगता है, कुछ इनामो-इकराम दे दिया जाए! सभी देते हैं कुछ न कुछ, तब ऐसी हालत में क्या किया जाए?… जी, शायद वे आपको पकड़कर आपकी जेब में जबरदस्ती पैसे ठूँस देते होंगे? है न?

निश्चित ही ऐसा नहीं होता! हमारे बहुत से मेहमान अपने एक दिनी सफर में ऐसा करके देख चुके हैं और जबकि कुछ लोग टिप देना पसंद करते हैं, ज़्यादातर लोग टिप नहीं देते क्योंकि वे कार और गाइड-शुल्क सहित पूरे पैकेज का पूरा शुल्क अदा कर चुके होते हैं! यह सिर्फ यह दर्शाता है कि आप इसकी अपेक्षा रखते हैं कि कोई आपको टिप या बख्शीश दे, अन्यथा आप अपना काम पूरी ज़िम्मेदारी से नहीं करेंगे!

मैंने उससे कहा कि हमारे आश्रम में टिप देने की प्रथा नहीं है। बल्कि, सच्चाई यह है कि हम अपने ग्राहकों से कहते हैं कि हमारे कर्मचारियों को पैसे न दें! जो अनुभव उन्हें यहाँ प्राप्त होते हैं, जो सुविधा और सेवा वे यहाँ पाते हैं, उसमें बहुत से लोगों का योगदान होता है और अगर आप मालिशकर्ता या ड्राईवर को टिप देते हैं तो रसोइये या बगीचे के मालियों को कुछ नहीं मिल पाता, अनजाने में ही सही, उनकी उपेक्षा होती है। हम समानता के समर्थक हैं और इसलिए हम समय-समय पर सभी को उनके वेतन पर बोनस भी देते हैं। हमारे उस बोनस-फंड में कोई भी अपना योगदान दे सकता है।

लेकिन मैं जानता हूँ कि सामान्य रूप से टूरिस्ट-गाइड अपने तयशुदा शुल्क के अलावा अतिरिक्त पैसों की अपेक्षा भी करते हैं- सीधे तौर पर या घुमा-फिराकर! या तो वे सीधे तौर पर माँग लेते हैं या फिर पर्यटकों को अपने दोस्तों की दुकानों पर ले जाते हैं, जहाँ दुकानदार पर्यटकों से सस्ते स्मारक-चिह्नों की ऊँची कीमत वसूल करते हैं और लाभ में से गाइडों को उनके इस अनुग्रह का अच्छा-खासा कमीशन अदा करते हैं।

कल मैं आपको बताऊँगा कि कैसे यह व्यक्ति भी उन गाइडों से कतई अलग नहीं था- और कैसे हम उन सबसे वाकई बहुत अलग हैं!

भारत में शिक्षा व्यवसाय को बंद कराने में अम्माजी’ज़ आयुर्वेदिक रेस्तराँ किस तरह सहायक होगा? 21 मई 2015

इस हफ्ते की शुरुआत में मैंने भारत में शिक्षा संबंधी एक महती समस्या और बराबरी को लेकर अपनी परिकल्पना के बारे में आपको बताया था। शिक्षा व्यवसाय में मौजूद बड़े व्यापारी घरानों को कैसे चुनौती दी जा सकती है, इस संबंध में मैंने कल विस्तार से अपने विचार प्रस्तुत किए थे। आज मैं इससे भी अधिक ठोस योजना आपके सामने रखने जा रहा हूँ और बताना चाहता हूँ कि मैं कैसे इस बात की कल्पना कर पा रहा हूँ कि हमारे आयुर्वेदिक रेस्तराँ, अम्माजी’ज़ की सहायता से मेरा यह स्वप्न यथार्थ में परिणत हो सकता है।

इतने साल तक हम अपने स्कूल और दूसरी चैरिटी परियोजनाओं को अपने व्यवसाय और प्रायोजकों तथा दूसरे मददगारों के सहयोग से चलाते रहे हैं। हमारे सारे व्यावसायिक ग्राहक और अधिकांश आर्थिक मददगार पश्चिमी देशों के लोग रहे हैं। ऐसे गैर भारतीय, जो योग और आयुर्वेद विश्राम सत्रों में शामिल होने यहाँ आते हैं, जो हमारी कार्यशालाओं में सम्मिलित होते हैं या व्यक्तिगत सलाह-सत्रों में अपनी समस्याएँ लेकर आते हैं। इसके अलावा कुछ गैर भारतीय वैसे भी, हर तरह से गरीब बच्चों की आर्थिक मदद करना चाहते हैं इसलिए हमारे इन कामों में आर्थिक सहयोग करते हैं।

अब एक आयुर्वेदिक रेस्तराँ, अम्माजी'ज़ शुरू करने के साथ हम एक नए व्यवसाय में कदम रखने जा रहे हैं। वहाँ हम भोजन के शौकीनों के लिए उच्च गुणवत्ता वाला भोजन मुहैया कराएँगे और इस तरह उनके शरीर और स्वास्थ्य के लिए भी कुछ बेहतर कर पाएँगे। गलत खाद्य के ज़रिए हम बहुत सी बीमारियों को न्योता देते हैं-और अम्माजी'ज़ में न सिर्फ स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोग स्वास्थ्यवर्धक भोजन कर पाएँगे बल्कि अपने चटोरे मित्रों और बच्चों को भी परितुष्ट कर पाएँगे! वहाँ हम आहार और शारीरिक पोषण संबंधी टिप्स और जानकारियाँ उपलब्ध कराएँगे, जो हमारे यहाँ की विशेषता होगी और एक अतिरिक्त लाभ भी क्योंकि जब भी आप यहाँ भोजन करने आएँगे, अपने बच्चों की निःशुल्क शिक्षा में मददगार भी हो रहे होंगे!

जल्द ही हमारे यहाँ बहुत से भारतीय मेहमान भी आने लगेंगे और तब हम ऐसे बिंदु पर पहुँच जाएँगे जब न सिर्फ हम गरीब बच्चों की मदद करते रह सकेंगे बल्कि कुछ बड़ी परियोजनाओं पर भी काम कर सकेंगे! हम एक स्तरीय स्कूल खोलेंगे, जहाँ हर संभव सुविधाएँ होंगी-वह भी पढ़ने वाले हर बच्चे के लिए पूरी तरह मुफ़्त! और हाँ, हमारे रेस्तराँ के ग्राहकों के बच्चों के लिए भी!

जी हाँ, वास्तव में जब भी आप हमारे स्कूल में भोजन करने आएँगे तो उस पर खर्च होने वाला एक एक रुपया आपके बच्चे की बेहतर शिक्षा पर खर्च किया जाएगा! इस तरह हमारा यह नया व्यवसाय भी इस स्कूल की मदद में पूरी तरह सहभागी होगा!

मेरा विश्वास है कि इस मिशन और हमारी परियोजना से सभी संतुष्ट होंगे: गरीब बच्चों के माता पिता, जिनके बच्चे अपढ़ रह जाने के अभिशाप से मुक्त होंगे और मुफ़्त विद्यार्जन कर पाएँगे; मध्यवर्गीय अभिभावक, जिन्हें बच्चों की अच्छी शिक्षा हेतु संघर्ष नहीं करना होगा क्योंकि शिक्षा निःशुल्क होगी और आर्थिक रूप से संपन्न अभिभावक, जिनके बच्चे वही शिक्षा मुफ़्त पा सकेंगे, जिसके लिए उन्हें मोटी रकम खर्च करनी पड़ती! किसी विशाल मॉल में खरीदी जाने वाली वस्तु की तरह विद्या खरीदने के स्थान पर समानता और बंधुत्व की शिक्षा देने वाले स्कूल में निःशुल्क शिक्षा कौन नहीं पसंद करेगा?

सिर्फ ऐसे व्यवसायी, जिनकी ऐसी मॉलनुमा शिक्षा संस्थाएँ होंगी, वही मेरी इस परियोजना पर आपत्ति करेंगे क्योंकि वह उनके लिए नुकसानदेह होगी!

लेकिन कोई भी दूसरा व्यवसाय करने वाले लोग इसे पसंद करेंगे। और यही मुख्य बिन्दु है, जहाँ मैं लोगों से कहूँगा कि वे आगे आएँ और अपने व्यापार के माध्यम से और आर्थिक मदद के ज़रिए इस मिशन का समर्थन करें! व्यापारी अपने व्यापारिक लाभ का एक नियत प्रतिशत इस परियोजना के खर्च में लगा सकते हैं। समर्थ अभिभावक गण इस कार्य हेतु उपहार स्वरूप पैसे दे सकते हैं, भले ही उतनी ही रकम, जितना वे किसी भी दूसरे अच्छे स्कूल में अदा करते। और हाँ, फर्नीचर से लेकर भोजन या किताबों तक वे कई प्रकार से स्कूलोपयोगी वस्तुओं को प्रायोजित कर सकते हैं! हर व्यक्ति अपने तरीके से अपना अंशदान कर सकता है! स्वाभाविक ही, विदेशों से आने वाले डोनेशंस और प्रायोजन का स्वागत तो है ही!

फिर यह दूसरे कई शहरों में फैल सकता है, जहाँ हम आगे चलकर अपना रेस्तराँ खोलने का प्रयास करेंगे और हर रेस्तराँ के साथ एक स्कूल भी। सबके लिए निःशुल्क, इतना स्तरीय कि सभी इस परियोजना में शामिल होना चाहेंगे! एक इलाके में जब हमारे इस तरह के कई स्कूल खुल जाएँगे तो फिर लोग स्कूल जैसे दिखाई देने वाले इन मॉलों में इतना रुपया खर्च करने के लिए राज़ी नहीं होंगे-और बहुत से दूसरे लोग भी हमारे उदाहरण का अनुसरण करेंगे!

मैं नहीं जानता की इस विचार को मूर्त रूप देने में किस हद तक सफलता प्राप्त होगी और कितनी जल्दी सब कुछ आगे बढ़ेगा लेकिन मैं तो कल्पना करने की स्वतन्त्रता में आनंदमग्न रहता हूँ। अपने विचार रखने और सपने देखने की स्वतन्त्रता। समाज के हर आर्थिक और सामाजिक वर्ग से आने वाले हर बच्चे के लिए एक समान शिक्षा के अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से इस रास्ते पर हम आगे बढ़ते रहेंगे!

धनवान और गरीब सभी के लिए एक जैसी उच्च स्तरीय मुफ्त शिक्षा का सपना – 20 मई 2015

कल मैंने आपको बताया था कि मेरी दिली इच्छा है कि भारत में सभी के लिए एक जैसी शिक्षा हो। ऐसी शिक्षा, जो सभी बच्चों के लिए एक सी हो, भले ही अभिभावक उसके लिए कितना पैसा भी खर्च कर सकते हों, जिससे सभी लड़कियों और लड़कों को उन लक्ष्यों को प्राप्त करने के समान अवसर उपलब्ध हो सकें, जिन्हें वे प्राप्त करना चाहते हैं! विश्वास करें या न करें, मेरे पास इस स्वप्न को अंजाम तक पहुँचाने की एक कार्य योजना मौजूद है।

अब आप शायद सोच रहे होंगे कि मैं मूर्ख हूँ, दिवास्वप्नी हूँ या हवाई किले बनाने वाला अयथार्थवादी व्यक्ति हूँ। मैं शिक्षा में पैसे की भूमिका का महत्व समाप्त करना चाहता हूँ- भारत जैसे देश में, एक ऐसे समाज में, जहाँ कुछ लोगों के लिए पैसा ही सब कुछ है- क्योंकि बिना पैसे के यहाँ कुछ नहीं होता।

लेकिन आप जानते हैं कि हम पिछले आठ साल से यह स्कूल चला रहे हैं और पहले से ही गरीब बच्चों को शिक्षा प्रदान करने के अभियान में भरपूर शक्ति के साथ अपना योगदान कर रहे हैं और इस तरह ऐसे कामों का हमारे पास काफी तजुर्बा है। मेरे विचार हवाई नहीं होते, वे अनुभव की ठोस, यथार्थवादी भूमि पर आकार लेते हैं। हर साल हमारे स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है। उदार आर्थिक मददगारों की सहायता से हमने अपने स्कूल की इमारत की पहली मंज़िल का निर्माण कार्य पूरा कर लिया है, जिसमें पाँच नई कक्षाएँ शुरू हो चुकी हैं और अब हम कुछ अधिक बच्चों को पढ़ा पा रहे हैं!

स्वाभाविक ही हर चीज़ की एक सीमा होती है और हमेशा होगी।

मैं नहीं समझता कि सपने में भी मैं इस देश के भ्रष्टाचार को समाप्त कर सकता हूँ। न ही मैं हर एक को इतना धनवान बना सकता हूँ कि वे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा वाले ख़र्चीले स्कूलों में भेज सकें। जी नहीं, मेरा विचार यथार्थ को मद्देनजर रखते हुए, कुछ छोटे-छोटे कदमों के साथ आगे बढ़ने का है लेकिन संभव हुआ तो, क्रमशः काम को इतने विशाल पैमाने पर फैला देने का भी है कि उसका अच्छा खासा असर दिखाई दे सके!

बराबरी के अपने स्वप्न के अनुसार मैं स्कूल का निर्माण करूँगा। एक ऐसा स्कूल, जहाँ आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से समाज के हर वर्ग से आए बच्चे एक साथ पढ़ सकें और वह भी मुफ्त! हम वहाँ हर विद्यार्थी को एक जैसी उच्च स्तर की शिक्षा प्रदान करने का इरादा रखते हैं, चाहे किसी रिक्शा-चालक का लड़का हो, चाहे बैंक के उच्च प्रबंधन से जुड़े किसी उच्चाधिकारी की लड़की हो!

जैसा कि अभी भी हो रहा है, हमारा स्कूल आगे भी हर बच्चे को किताब-कापियाँ, वर्दियाँ और भोजन मुहैया कराएगा। हर बच्चे का स्कूल की ओर से स्वास्थ्य बीमा करवाया जाएगा और हर बच्चा हर तरह से अपने साथ बैठे अगले बच्चे के बराबर होगा।

जब हमने अपना मुफ्त स्कूल शुरू किया था तब कई छोटे और सस्ते स्कूलों के व्यापार पर बुरा असर पड़ा था और एक स्कूल तो बंद ही हो गया-क्योंकि बच्चे अब हमारे स्कूल में पढ़ने आने लगे थे।

अब उस स्थिति की कल्पना कीजिए कि हम कई ऐसे स्कूल खोलें, जहाँ भर्ती के समय आने वाले हर बच्चे को मुफ्त शिक्षा प्रदान की जाती है-स्वाभाविक ही, सीट भरने तक! शिक्षा व्यवसाय के इस दीर्घाकार दैत्य पर यह एक करारा प्रहार होगा-क्योंकि तब सामान्यतया उन स्कूलों में प्रवेश लेने वाले बच्चे भी हमारे यहाँ आएँगे क्योंकि यहाँ भी वैसी ही बढ़िया शिक्षा का इंतज़ाम होगा, वह भी बिल्कुल मुफ्त!

अब एक स्वाभाविक प्रश्न- यह स्वप्न कैसे साकार होगा, इसके लिए इतना पैसा कहाँ से आएगा? अम्माजी’ज़ से! अपने आयुर्वेदिक रेस्तराँ से! क्या? कैसे? इस विषय में आप कल पढ़ सकेंगे!

भारत – जहाँ शिक्षा भ्रष्टाचार और पैसे वालों की शिकार हो गई है – 19 मई 2015

कल मैंने हमारे स्कूल में होने वाली बच्चों की भर्तियों की चर्चा करते हुए आपको बताया था कि कभी-कभी हमें कुछ बच्चों को इस बिना पर ‘नहीं’ कहना पड़ता है कि उनके माता-पिता ‘पर्याप्त गरीब नहीं हैं’, हालांकि हम जानते हैं कि उनके परिवार भी किसी भी दृष्टिकोण से धनवान नहीं हैं। मैंने ज़िक्र किया था कि मैं ‘गरीब’ और ‘ज़्यादा गरीब नहीं’ के बीच अंतर करने की आवश्यकता से निजात पाना चाहता हूँ। लेकिन मेरी कामना एक कदम और आगे बढ़ चुकी है: मैं आर्थिक परिस्थिति के अंतर के अनुसार निर्णय करने की आवश्यकता को पूरी तरह समाप्त करना चाहता हूँ! मैं शिक्षा में सबके बीच पूरी समानता चाहता हूँ, चाहे किसी के लिए भी हो!

दुर्भाग्य से भारत में शिक्षा सबके लिए समान रूप से सुलभ नहीं है। बहुत से पश्चिमी देशों में, खास कर जर्मनी में, मैंने कई स्कूल देखे, जिन्हें सरकार चलाती है और जहाँ हर सामाजिक हैसियत वाले बच्चे एक साथ पढ़ते हैं। वहाँ भी निजी स्कूल हो सकते हैं, जहाँ काफी महंगे बोर्डिंग स्कूलों में उनकी अच्छी देखभाल होती होगी और जहाँ बहुत धनवान लोग अपने बच्चों को भेजते होंगे-लेकिन अगर आपके पास पर्याप्त पैसे न भी हों, तो भी न सिर्फ आपके बच्चे को विद्यार्जन का अधिकार होगा बल्कि कानूनी नियमों के अनुसार उसे स्कूल जाना अनिवार्य होगा! और माता-पिता चाहे जितना कमाते हों, हर लड़का या लड़की ऐसे स्कूल में पढ़ाई करेंगे, जहाँ पढ़ाई का स्तर अच्छा होगा। वे सब बराबर होंगे और एक ही कतार में, एक साथ बैठकर, एक समान ही शिक्षक से शिक्षा ग्रहण करेंगे!

भारत में यह एक दूर का सपना है। यहाँ सिर्फ वही बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं, जिनके माता-पिता काफी पैसा कमाते हैं। अगर किसी बच्चे के अभिभावक अपढ़ हैं तो वे वैसे भी शिक्षा को अधिक महत्व नहीं देते क्योंकि उन्हें स्वयं अपने जीवन में उसकी ज़रूरत नहीं पड़ी थी। दूसरी तरफ, अगर वे वास्तव में बच्चे को स्कूल भेजना ही चाहते हैं, तो वे उन्हें सरकारी स्कूलों में या फिर किसी सस्ते निजी स्कूल में ही भेज पाने की क्षमता रखते हैं। नतीजा: वहाँ उन्हें निचले स्तर की शिक्षा से ही संतोष करना पड़ता है और कहीं-कहीं तो बिल्कुल पढ़ाई नहीं होती!

गावों में सरकारी स्कूलों की हालत इतनी बुरी है कि सिर्फ कागजों पर ही इन स्कूलों का अस्तित्व मौजूद है और शिक्षक साल में सिर्फ दो बार स्कूल आते हैं-अपनी तनख़्वाहें लेने! मैंने एक बार आपको एक ग्रामीण स्कूल के बारे में बताया था, जहाँ स्कूल की इमारत तबेले के रूप में इस्तेमाल हो रही थी! यह सबकी खुली आँखों के सामने होता रहता है और सभी जानते हैं कि भ्रष्टाचार ही इस बुराई की जड़ है। तो ऐसी स्थिति में अभिभावक अपने बच्चों को इन सरकारी स्कूलों में क्यों भेजें?

भारत में उन्हीं अभिभावकों के बच्चे दूर तक आगे बढ़ सकते हैं, जिनके पास काफी पैसा है। हमारे देश में भ्रष्टाचार और फिर बड़े व्यावसायिक घरानों ने शिक्षा से सबसे अधिक लाभ उठाया है। भ्रष्टाचार के चलते सरकारी स्कूल किसी काम के नहीं हैं और बड़े लोगों ने इस क्षेत्र में व्यापार करने और पैसा बनाने की अपर संभावना देख ली: उन्होंने उसे एक उद्योग की तरह शुरू कर दिया, पैसा निवेश किया और शिक्षा की दुकाने खोल लीं। अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार आप विभिन्न स्तरों की शिक्षाओं में से किसी एक को चुन सकते हैं। शिक्षा के एक ब्रांड के अंतर्गत भी अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार आप खरीदी जाने वाली सुविधा और शिक्षा का चयन कर सकते हैं!

मैं इस बात को स्पष्ट करना चाहता हूँ कि भले ही बच्चा बहुत बुद्धिमान और प्रतिभाशाली हो, अगर उसके माता-पिता बेटे की स्तरीय शिक्षा पर पर्याप्त खर्च नहीं कर सकते तो उसे अच्छी शिक्षा प्राप्त नहीं हो सकती! और अगर आपके पास औसत मात्रा में ही धन उपलब्ध है तो? तो आपका बच्चा औसत स्तर की शिक्षा ही प्राप्त कर पाएगा!

ऐसे अभिभावकों के दुख का अंदाज़ा मैं लगा सकता हूँ। वे मध्यम वर्ग के माता-पिता होते हैं, जो जानते हैं कि उनका बच्चा बहुत बुद्धिमान है, होनहार है और वे मेहनत करके पर्याप्त रकम का जुगाड़ करने में लगे रहते हैं और यहाँ तक कि बेटे या बेटी की पढ़ाई के लिए ऋण तक लेते हैं- लेकिन वे अपने बच्चे को अपनी अपेक्षा के अनुसार शिक्षा नहीं दिलवा पाते, शिक्षा के स्तर के साथ कोई न कोई समझौता करना ही पड़ता है। दरअसल अच्छी शिक्षा बहुत महंगी और उनकी कूवत से बाहर होती है!

एक बार मैंने आपको बताया था कि कैसे एक बार एक दंपति कार से हमारे स्कूल आए। वे अपने बच्चों को हमारे स्कूल में भर्ती करवाना चाहते थे। हमने उन्हें नम्रतापूर्वक मना कर दिया क्योंकि स्पष्ट ही वे किसी भी निजी स्कूल की फीस अदा करने में समर्थ थे। लेकिन अभिभावकों के चेहरे पर छाई निराशा देखकर हम उनका दर्द समझ गए: हमारे स्कूल जैसे अच्छे निजी स्कूल की फीस अदा करना उनकी सामर्थ्य के बाहर था। इस तरह उनका यही दोष था कि वे इतना अधिक कमाते थे कि हमारे स्कूल में उनके बच्चों के लिए कोई जगह संभव नहीं थी!

इस देश में, जहाँ शिक्षा भ्रष्टाचार और बड़े उद्योगपतियों की दबंगई का शिकार है, सारे बच्चे एक बराबर नहीं हैं। मैं गैर बराबरी की इस व्यवस्था में बदलाव देखना चाहता हूँ! और मैं इस दिशा में काम करता रहूँगा! कैसे? यह आप कल के ब्लॉग में पढ़ेंगे!

कठिन निर्णय: कब कोई बच्चा हमारे स्कूल में भर्ती होने के लिहाज से ‘पर्याप्त गरीब नहीं’ होता? 18 मई 2015

पिछले हफ्ते मैंने भ्रष्टाचार के चलते हमारे सामने पेश आने वाली स्कूल संबंधी दिक्कतों के बारे में बताया था। मैंने बताया था कि भारत में शिक्षा पूरी तरह व्यवसाय बन चुकी है। अंत में मैंने संक्षेप में स्कूल खोलने के पीछे मौजूद सोच को स्पष्ट करते हुए बताया था कि हम किसके लिए और क्या कर रहे हैं: अपने आसपास के गरीब बच्चों के लिए मुफ़्त शिक्षा और उनके परिवारों की मदद! मैं पहले ही घोषणा कर चुका हूँ कि अपनी भविष्य की योजनाओं के बारे में अपने सोच-विचार को आपके सामने लगातार रखता रहूँगा और मुझे लगता है कि इस काम में पूरा अगला हफ्ता लग जाएगा! आज इसकी शुरुआत करते हुए मैं हमारे सामने आने वाले सबसे पहले प्रश्न पर चर्चा करूँगा: कौन हमारे स्कूल के लिए 'पर्याप्त गरीब' है और कौन आर्थिक रूप से पर्याप्त समर्थ है?

जब भी हमारे यहाँ नई भर्तियाँ शुरू होती हैं, हम व्यक्तिगत रूप से हर बच्चे के घर जाते हैं और देखते हैं कि वे कहाँ रहते हैं। इससे हमारे सामने कई बातें स्पष्ट हो जाती हैं- पहली बात तो यह कि हम हर बच्चे और उसकी परिस्थिति को व्यक्तिगत रूप से जानने लगते हैं और इससे बच्चा स्वतः ही हमसे नज़दीकी महसूस करने लगता है। और स्वाभाविक ही हम यह जानने में समर्थ हो जाते हैं कि वास्तव में उस परिवार के बच्चे को हमारे स्कूल में स्थान की ज़रूरत है या नहीं।

वास्तव में यह काम आसान नहीं होता और अक्सर हमें अपने स्कूल के बच्चों के परिवारों के बीच काफी अंतर नज़र आता है। कुछ लोगों के पास रहने के लिए अपना खुद का मकान होता है-अपने बाप-दादाओं से प्राप्त या कहीं से ऋण लेकर बनवाया हुआ। कुछ झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले परिवार होते हैं, किसी में सिर्फ तीन तरफ ईंट की दीवारें होती हैं, टीन की छत होती है, जिसमें अभी से छेद नज़र आ रहे होते हैं। कुछ लोगों को रोज़ काम की खोज में निकलना पड़ता है या कुछ ऐसे होते हैं, जो बीमारी के चलते कोई काम ही नहीं कर पाते, जब कि कुछ लोगों के पास काफी हद तक काम तो होता है मगर उससे पर्याप्त आमदनी नहीं होती। कुछ लोग चार बच्चों को पालने लायक कमा लेते हैं लेकिन उनके पास पालने-पोसने के लिए सात बच्चे होते हैं! कुछ और होते हैं, जहाँ परिवार में बच्चा तो एक ही होता है मगर कमाने वाला भी एक ही होता है-दूसरा या तो मर चुका होता है या फिर वे अलग हो चुके होते हैं!

आप अभी से देख सकते हैं कि अंतर बहुत है और ज़्यादातर प्रकरणों में जब हम उनके घर जाते हैं तो तुरंत ही उस परिवार की कठिन परिस्थिति के बारे में जान जाते हैं। ऐसे प्रकरण कम ही होते हैं, जहाँ हम बच्चों के माता-पिता से कहते हैं कि हम उनके बच्चों को भर्ती नहीं कर पाएँगे। लेकिन ऐसे प्रकरण भी होते ही हैं।

हम अक्सर पाते हैं कि बच्चों के माता या पिता की आय औसतन 4000 रुपए प्रतिमाह होती है और जब हम किसी ऐसे घर में पहुँचते हैं, जहाँ परिवार की आय लगभग 10000 रुपए है और खिलाने, लालन-पालन करने और पढ़ाने-लिखाने के लिए सिर्फ एक ही बच्चा है तो हम नम्रतापूर्वक अभिभावकों से कोई दूसरा स्कूल देखने के लिए कह देते हैं। हमारे स्कूल में, जिस जगह यह बच्चा पढ़ता, वह अब किसी अधिक गरीब बच्चे के उपयोग में आ सकती है, जिसके माता-पिता वास्तव में किसी दूसरे स्कूल में उसकी शिक्षा का खर्च वहन नहीं कर सकते! ऐसा परिवार, जिसे तुलनात्मक रूप से मदद की अधिक आवश्यकता है।

लेकिन साथ ही हम यह भी जानते हैं कि यह पिता भी अधिक धनवान नहीं है! हम जानते हैं कि वह कई स्कूल ढूँढ़ लेगा लेकिन उसके लिए ऐसा स्कूल ढूँढ़ना मुश्किल होगा, जहाँ बच्चे को अच्छी शिक्षा भी मिल सके और जिसका खर्च वहन करने में उसे कठिनाई भी न हो। निश्चित ही, हमारे स्कूल की पढ़ाई का स्तर उसे किसी दूसरे स्कूल में नहीं मिलेगा! आखिर हम क्या कर सकते हैं-हमारी अपनी सीमाएँ भी हैं! अधिक से अधिक संख्या में गरीब बच्चों को पढ़ाने की परिकल्पना तो है लेकिन एक बिन्दु के बाद हमें ‘नहीं’ कहना ही पड़ता है।

मैं नहीं चाहता कि आगे ऐसी परिस्थिति निर्मित हो कि हमें यह तय करने की समस्या से दो-चार होना पड़े कि कौन पर्याप्त गरीब है और किसके पास काफी पैसा है कि बच्चे को हमारे स्कूल में भेजना उनके लिए आवश्यक न हो। फिलहाल तो हम ऐसा कर रहे हैं लेकिन भविष्य में हमारे पास एक कार्य-योजना है, जिससे हम यह काम कुछ अलग तरह से कर सकेंगे। उसके बारे में मैं आपको अगले कुछ दिनों तक बताता रहूँगा।