हमारे स्कूल के भोजन के विषय में एक संदेह – क्या हमारी बेटी भी वही खाना खाती है? 24 नवंबर 2014

पिछले हफ्ते अपने ब्लॉग में मैंने एक चित्र पोस्ट किया था, जिसमें हमारे स्कूल के बच्चों को दोपहर का भोजन करते हुए दिखाया गया था। फेसबुक पर यह चित्र देखने के बाद एक व्यक्ति ने पूछा कि क्या मेरी बेटी भी इन बच्चों के साथ भोजन करती है। वैसे तो मैंने वहीं उस प्रश्न का उत्तर दे दिया था मगर मुझे लगा कि इस प्रश्न का अधिक विस्तृत जवाब मुझे अपने ब्लॉग के माध्यम से भी देना चाहिए।

इसका सादा सा मूल उत्तर यह है: जी हाँ, बिल्कुल करती है।

दरअसल अपरा तो खाने की छुट्टी का बेसब्री से इंतज़ार करती है कि स्कूल के सारे बच्चे दौड़ते-भागते आएँ और वह उनके साथ बैठकर खाना खा सके। किसके पास बैठे यह वह खुद तय करती है-अक्सर वह आश्रम में ही रहने वाले एक बच्चे के साथ, जो उसके भाई जैसा ही है, खाने बैठती है। दूसरे बच्चों की तरह वह भी अपने लिए एक प्लेट लेती है और वही खाना प्लेट में लेकर खाती है, जो दूसरे बच्चे खाते हैं।

स्वाभाविक ही लोग यह सोचते हैं कि हमारा चैरिटी का काम भी दूसरे कई सामाजिक कार्यों की तरह एक मज़ाक या दिखावा भर है। वे शक करते हैं कि हम इन गरीब बच्चों के लिए तैयार भोजन को इतना अच्छा अवश्य बनाते होंगे कि हमारी बेटी भी उसे खा सके।

शुरू में आपको दुख और आश्चर्य होगा कि कोई ऐसा भी सोच सकता है। लेकिन थोड़ा विचार करने के बाद आपको समझ में आ जाएगा कि ऐसे सोच की जड़ कहाँ है: दुर्भाग्य से बहुत से चैरिटी कार्यों में ठीक यही देखने में आता है! मैं जानता हूँ कि भारत में चैरिटी कार्य एक तरह का संगठित व्यवसाय हो गया है, जहाँ लोग बहुत सा पैसा इकठ्ठा करते हैं और ग़रीबों को खराब, कम गुणवत्ता वाला खाना, कपड़े इत्यादि वितरित करते हैं। फिर अपनी इस तथाकथित चैरिटी का इस्तेमाल अपने विज्ञापनों में करते हैं! वे जानते हैं कि जो खाना वे ग़रीबों को खिला रहे हैं, वह कैसा है और इसलिए उसे न तो वे खुद खाते हैं और न ही अपने बच्चों को खिलाते हैं।

मैं आपको एक बात बताना चाहता हूँ: हम कोई बहुत बड़ा संगठन नहीं हैं। हम एक परिवार हैं, जिसने गरीब बच्चों के लिए एक स्कूल शुरू किया है और उन बच्चों की मदद करने की कोशिश करते हैं। बच्चों को दिया जाने वाला भोजन हमारी ही रसोई में तैयार किया जाता है। जो रसोइया हमारा खाना पकाता है वही उनका खाना भी पकाता है और उन्हीं सब्ज़ियों, दाल-चावल और आटे का इस्तेमाल करता है; हमारे व्यंजनों में पड़ने वाले मसाले, नमक आदि भी एक ही होते हैं। सिर्फ एक ही अंतर होता है कि 20 के लोगों के मुक़ाबले 200 लोगों का खाना बनाने के लिए काफी बड़े बरतनों का इस्तेमाल किया जाता है।

एक बात और: बच्चों के दोपहर के भोजन के बाद अगर खाना बचा रह जाता है तो रात को हम लोग खुद वही खाना गरम करके खा लेते हैं। सिर्फ इसलिए नहीं कि हम खाना बरबाद नहीं करना चाहते और निश्चय ही इसलिए भी नहीं कि उसे खाने वाला और कोई नहीं मिल सकता। जी नहीं, दरअसल इसलिए भी कि वह खाना बड़ा रुचिकर, स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्धक होता है!

जब आस्ट्रेलिया जैसे विकसित देश में होने वाली धोखेबाज़ी ने मुझे आश्चर्यचकित किया! 23 नवंबर 2014

सन 2007 की शुरुआत में जब मैं आस्ट्रेलिया पहुँचा तो स्वाभाविक ही वहाँ मुझे कई जगहों की यात्राएँ करनी थी क्योंकि मेरे पास कई लोगों के निमंत्रण थे जो अपने यहाँ मेरा कार्यक्रम दोबारा आयोजित करना चाहते थे। इसी तरह कुछ नए आयोजक भी थे, जिनसे मैं पहली बार मिला और कुछ ऐसे भी, जिनसे मैं एक साल के अंतराल के बाद पुनः मिल रहा था। इनमें से एक मित्र ऐसा भी था जो इस बीच एक बार हमसे मिलने भारत भी आ चुका था। और जब हमें बातचीत करने की फुरसत मिली तो जो उसने बताया उस पर मैं विश्वास नहीं कर सका!

मेरा मित्र बहन के साथ हुई दुर्घटना से कुछ पहले आश्रम आ चुका था इसलिए उसे जानता था। लिहाजा कुछ समय हम उसे याद करते रहे। लेकिन फिर उसने बताया कि उसे एक सुनहरा मौका मिला है और उसे लेकर वह बहुत खुश और उत्साहित है: उसने किसी से सुना कि निवेश की कोई स्कीम है, जिसमें निवेश करने पर थोड़े समय में ही निवेशित धन का कई गुना वापस प्राप्त मिलने की पूरी उम्मीद है! वह एक व्यक्ति को जानता था, जिसने उस स्कीम में अपना धन लगाया था और वह इस निवेश की बदौलत बहुत जल्द अमीर हो जाने वाला था!

मुझे याद नहीं है कि ठीक-ठीक वह स्कीम क्या थी मगर मुझे लगता है कि वह एक कोश था जिसका संबंध साउथ अफ्रीका में सोने के खनन से था। किसी ने उसे बताया था कि सिर्फ पैसा लगाने वालों की ज़रूरत है और जैसे ही सोना निकलेगा, सब मालामाल हो जाएँगे!

उसकी बात सुनकर मैं अचंभित रह गया था: हमारे यहाँ, भारत में, ऐसे कई घोटाले हो चुके हैं और आज भी हो रहे हैं। मैंने उनके बारे में इतनी बार सुना है और अखबारों में विस्तार से पढ़ता रहता हूँ कि इन कपटपूर्ण स्कीमों की कार्य प्रणाली को पूरी तरह समझ चुका हूँ: लोगों को उनके पैसे का जल्द से जल्द कई गुना वापस करने का वादा करके, झाँसा देकर पैसा इकट्ठा करना। मुझे घोटाले का सुनकर इतना आश्चर्य नहीं हुआ जितना यह तथ्य जानकर हुआ कि यह सब आस्ट्रेलिया में भी होता है और स्वाभाविक ही वहाँ भी ऐसे लोग पाए जाते हैं, जो इन स्कीमों के झाँसे में आ जाते हैं!

उनमें से एक मेरा यह मित्र भी था। मैंने उससे पूछा, "तुमने तो उस स्कीम में पैसा नहीं लगाया होगा?" मुझे शक था कि उसने ज़रूर लगाया होगा। और यही हुआ था। "तुम्हें तो पता है कि मेरे पास ज़्यादा पैसे नहीं होते लेकिन जो भी मेरे पास जमा था, वह मैंने उसमें निवेश कर दिया है।" उसने मुझे आगे बताया कि करोड़पति होने के बाद वह क्या-क्या करेगा और मुझे भी उस अचूक और सुनिश्चित स्कीम में सहभागी होने के लिए सहमत करने की कोशिश करने लगा।

स्वाभाविक ही मैं धोखेबाज़ों के चंगुल में फँसकर अपना पैसा खोना नहीं चाहता था। मैंने अपना शक उस पर भी ज़ाहिर कर दिया था लेकिन स्पष्ट ही वह स्कीम के विरुद्ध कुछ भी सुनना नहीं चाहता था।

लेकिन इससे मुझे यह बात समझ में आई कि धोखेबाज़ दुनिया भर में मौजूद हैं और दुर्भाग्य से उनके झाँसे में आने वाले लोग भी बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। इससे बचने का एकमात्र उपाय इस बात को समझना है कि कोई भी आपको यूँ ही रुपए क्यों देने लगा! पैसा कमाने के लिए आपको अथक प्रयास करना पड़ता है, श्रम करना पड़ता है!