कभी-कभी गप्पबाजी करते हुए अचानक आपके मुंह से शब्द नहीं निकलते! 4 दिसंबर 2013

आश्रम में कई बार बातचीत के दौरान ऐसी परिस्थिति पैदा हो जाती है जब रमोना निर्वाक रह जाती है-ज़्यादातर भारतीय लोगों की स्पष्टवादिता के सामने! मैं आपको हाल में आश्रम में घटित एक घटना के विषय में बताता हूँ।

मेरा एक पुराना सहपाठी अपनी पत्नी के साथ आश्रम में हमसे मिलने आया। नमस्कार-चमत्कार और एक दूसरे का हाल-चाल पूछने के बाद मेरे दोस्त की पत्नी ने चारों तरफ देख आश्रम परिसर का जायज़ा लिया और जब उसे पता चला कि हम फिर से आश्रम के नवीनीकरण में लगे हुए हैं तो उसने पूछा: "आपने फिर निर्माण कार्य शुरू करवा दिया!"

पूर्णेन्दु ने मज़ा लेते हुए कुछ इस तरह कहा: "जी, हम चाहते थे कि जब आप आएँ तो घर थोड़ा साफ-सुथरा लगे!" और इसके जवाब में उस महिला ने हँसते हुए कहा: "फर्श में नए टाइल्स लगवा रहे हैं, यह अच्छी बात हुई, अब आप यह नहीं कह सकेंगे कि पुराना फर्श मेरे वज़न से टूट गया।" इस बात पर सभी हंसने लगे।

रमोना उनके पास ही बैठी थी मगर वह इस टिपिकल भारतीय वार्तालाप को समझ नहीं पाई: इसका क्या जवाब होगा? वह महिला वाकई बहुत मोटी थी।

"अरे नहीं। आप इतनी मोटी नहीं हैं!" कुछ भी हो, आपसे तीन गुनी मोटी महिला से आप यह नहीं कह सकते, जब कि उसकी ऊंचाई आप जितनी ही है!

शायद ऐसा कुछ कहा जा सकता था:

"इसके बाद उन पत्थरों को तोड़ना है, क्या आप ज़रा उन पर खड़ी हो जाएंगी?" यह अच्छा परिहास हो सकता है मगर रमोना ऐसे परिहास से परहेज़ करती है, जो किसी व्यक्ति के मोटापे की खिल्ली उड़ाने जैसा लगे! लेकिन वह महिला वाकई मोटी थी और उसने स्वयं ही इस मज़ाक की शुरुआत की थी!

रमोना ने बाद में मुझे बताया कि जहां तक वह समझती है, पश्चिम में खुद अपने और अपने मोटापे (वज़न) के बारे में कोई महिला ऐसा नहीं कह सकती! हम लोग हंस रहे थे क्योंकि वह महिला ईमानदार थी और उसकी स्पष्टवादिता से रमोना सोच में पड़ गई थी।

किसी वार्तालाप के दौरान क्या आपके साथ भी ऐसा हुआ है, जब काफी अंतराल के बाद आपको कोई मज़ेदार जवाब सूझ गया हो? रमोना तो कई दिन से इस चुट्कुले का जवाब खोज रही है और आज तक वह एक पंक्ति उसके जेहन में नहीं आ पा रही है, जो मज़ेदार तो हो मगर किसी का दिल न दुखाती हो!

कम्प्यूटर के सामने एक अस्वास्थ्यकर जीवन-पद्धति- 29 सितंबर 2013

सन 2005 में, जब मैं आस्ट्रेलिया में था, वहाँ कई जगह मेरे कार्यक्रम हुए और सच बात तो यह है कि अब मैं भूल ही चुका हूँ कि मैं कहाँ-कहाँ घूमता-फिरता रहा। भले ही उन जगहों के नाम मुझे याद न हों, वे संबन्धित व्यक्ति, उनके घर, और निश्चय ही, उनका रहन सहन और जीवन-पद्धति आज भी मुझे अच्छी तरह याद हैं। एक जगह थी जहां मैं एक ऐसी जीवन-पद्धति से रूबरू हुआ जो मेरे लिए नई थी और जिसे मैं निश्चय ही बहुत अस्वास्थ्यकर मानता हूँ।

मैं एक महिला के यहाँ रहता था, जिसने, मेरी इन्टरनेट साईट देखने के बाद, मुझे आमंत्रित किया था। उसने मेरे कुछ व्याख्यान और ध्यान-सत्र आयोजित किए थे। कार्यक्रम के विषय में, स्वाभाविक ही, मेरा उसके साथ पहले से ही संपर्क हो चुका था और मैं चकित था कि उसने मेरी योग-कार्यशाला क्यों नहीं आयोजित की, जो लोगों के बीच साधारणतः काफी लोकप्रिय हुआ करती थी। यह एक विचार ही था और मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था-मैं अपने व्याख्यानों और ध्यान-सत्रों के कार्यक्रमों से ही संतुष्ट था।

लेकिन जब मैं उसके घर गया तो इस बारे में मेरा आश्चर्य काफ़ूर हो गया। वह बहुत मोटी थी और अपने वज़न के चलते उसे चलने-फिरने के लिए व्हील-चेयर की ज़रूरत पड़ती थी। हालांकि वह चल सकती थी लेकिन ज़्यादा दूर तक नहीं और स्वाभाविक ही अपना कई किलो का बोझ ढोते हुए चलना उसे बहुत जल्दी थका देता था। वह चल तो नहीं पाती थी मगर कार चला लेती थी।

वह अपनी बूढ़ी माँ और अपने बॉयफ्रेंड के साथ, जिसके साथ उसकी भेंट इंटरनेट के जरिये ही हुई थी, रहती थी। कुल मिलाकर उसका सारा समय कंप्यूटर के सामने ही बीतता था। मैंने आज तक ऐसा व्यक्ति नहीं देखा था, जो इतना समय कंप्यूटर के साथ बिताता हो और अपना, लगभग सारा काम ऑनलाइन करता हो!

इस कद-काठी और वज़न वाला व्यक्ति भी मैंने इसके पहले नहीं देखा था-वैसे, भारत में भी आवश्यकता से अधिक वज़न वाले लोग होते ही हैं। नहीं, लेकिन सारा समय कंप्यूटर के सामने बैठने के चलते शारीरिक रूप से निष्क्रिय जीवन-पद्धति और इसके कारण पैदा हुई उसकी असंख्य समस्याओं ने मेरे मन में सवाल खड़े कर दिए कि आखिर अपने शरीर के साथ उसने ऐसा व्यवहार क्यों किया? आप कम्यूटर के सामने लगातार बैठे रहते है, यह बात समझ में आती है मगर क्या आपको यह भी पता नहीं चल पाया कि दिनोंदिन आप मोटे, और मोटे, होते जा रहे हैं, इतने मोटे कि खड़े होने में भी आपकी सांस फूल जाती है?

वैसे, वह बहुत सहृदय महिला थी और मैंने उसके साथ बहुत सुखद समय बिताया। कंप्यूटर के सामने बैठे-बैठे ही उसने हमारा कार्यक्रम आयोजित भी किया था और उसका प्रचार-प्रसार भी। इसके बावजूद कार्यक्रम में लोगों की उपस्थिति काफी थी और न केवल कार्यक्रम सफल रहा, मैं भी पूरे समय बुरी तरह व्यस्त रहा।

जब मैंने उस महिला से कहा कि खाना मैं बनाऊँगा और वह क्या खाना पसंद करेंगी तो उसने अपना फ्रिज मुझे खोलकर दिखाया, जिसमें बहुत सारी खाने की चीज़ें रखी हुई थीं। उसने कहा "मैं ये सारी चीज़ें एक भारतीय रेस्तराँ से लेकर आई हूँ-बिलकुल ताज़ा बना हुआ है। जब इच्छा हो, निकालिए, गरम कीजिए और खा लीजिए!" भारतीय खानों की ऐसी दुर्गति देखकर हँसूँ या रोऊँ समझ में नहीं आ रहा था खैर हँसता नहीं तो और क्या करता! लेकिन मैंने उससे कुछ नहीं कहा। उस घर में पकाने, खाने का यही तरीका था।

एक बिल्कुल अलग जीवन-पद्धति। इतना अवश्य कहूँगा कि यह जीवन-पद्धति बहुत ही अस्वास्थ्यकर है। 🙂