आपके विवाह के बाद जब आपकी सास आपकी माहवारी का हिसाब रखने लगती है – 11 जनवरी 2016

अपरा के जन्मदिन के सिलसिले में बहुत से मित्र आश्रम आए थे और उन समान सोच-विचार वाले मित्रों के साथ एक बार फिर खुलकर बातचीत करना अत्यंत सुखद रहा! जब हम एक साथ बैठे हुए थे तो एक महिला मित्र ने, जिसका विवाह अभी एक साल पहले ही हुआ था, बताया कि उस पर न सिर्फ उसके परिवार और उसके सास-ससुर का बल्कि सामान्य रूप से सारे समाज का ही बड़ा ज़बरदस्त दबाव है। किस बात का? जल्द से जल्द गर्भवती होने का!

जी हाँ। भारत में यह बिल्कुल सामान्य बात है कि शादी के कुछ ही माह बाद- शादी, जो अक्सर परिवार द्वारा तय की हुई शादी होती है-हर व्यक्ति यह खुशखबर सुन लेता है: बच्चा होने वाला है! यहाँ यही चलन है, यही होना चाहिए और आपकी शादी का यही एकमात्र मुख्य उद्देश्य है! आपसे अपेक्षा की जाती है कि आप बच्चे, और जहाँ तक हो सके, लड़का, पैदा करें और परिवार की वंश वृद्धि सुनिश्चित करें और उसके कारोबार के लिए वारिस तैयार हो! आपके जीवन का यही मुख्य उद्देश्य है: जितना जल्दी हो सके, बच्चा पैदा करो!

उस मित्र ने बताया कि वह और उसका पति फिलहाल बच्चा न पैदा करके पर्याप्त खुश और संतुष्ट हैं और उसके स्थान पर एक दूसरे को जानते-समझते हुए और अपने संबंध को कुछ और प्रगाढ़ बनाने की कोशिश करते हुए कुछ वक़्त गुज़ारना चाहते हैं। लेकिन भारत में यह विचार ही अत्यंत असामान्य विचार है। यहाँ लोग अक्सर कहते पाए जाते हैं कि बच्चे तो वह गोंद है या वह चुंबक है जो माता-पिता को एक-दूसरे से मज़बूती के साथ जोड़े रखता है! लेकिन जबकि वे इस तरह रहते हुए खुश हैं, उनका परिवार दुखी है! और वह महिला मित्र परिवार और दूसरे सब लोगों के इस दबाव से बहुत अप्रसन्न है!

एक और मित्र, जिसकी तीन साल की बच्ची उस वक़्त अपरा के साथ खेल रही थी, अपने साथ पेश आए इसी तरह के व्यवहार को याद करने लगी। उसकी सास हर माह उससे पूछती कि उसकी माहवारी रुकी या नहीं! यहाँ तककि बाद में उसने कैलेंडर पर उसकी माहवारी के दिनों का हिसाब-किताब रखना शुरू कर दिया और ठीक उन्हीं दिनों में उससे खबर दरियाफ्त करने लगी। जब उसे पता चलता कि माहवारी हो गई है और कम से कम इस माह वह गर्भवती नहीं होगी तो वह बहुत दुखी हो जाती!

क्या आपने कभी कल्पना की है कि किसी महिला को अपने साथ होने वाले ऐसे व्यवहार पर कैसा महसूस होता होगा? उसे लगता होगा कि उस घर में वह सिर्फ प्रजनन की मशीन भर है, और कुछ भी नहीं! किसी को इससे कोई मतलब नहीं है कि वह खुद क्या चाहती है-आपके आसपास का सारा वातावरण यह सोचता है कि आपको भी बच्चे की चाहत होनी चाहिए। और सब के सब पूरी शिद्दत के साथ वह खुशखबर सुनने का इंतज़ार करते रहते हैं।

अगर कुछ माह या साल भर तक उस खबर की घोषणा नहीं होती तो अफवाहों का बाज़ार गर्म हो जाता है: उन्हें बच्चा पैदा नहीं हो पा रहा है, कुछ न कुछ गड़बड़ है! कौन दोषी है? ज़रूर लड़की ही बाँझ होगी! अभी इलाज शुरू किया या नहीं? ऐसा तो नहीं कि लड़का सम्भोग में रुचि ही न लेता हो? कहीं वह समलैंगिक तो नहीं! इत्यादि, इत्यादि!

अफवाह फरोश पड़ोसी ऐसी बातों के इंतज़ार में ही होते हैं और रस ले-लेकर मुहल्ले भर में इस सामान्य बात को बहुत बड़े कलंक की तरह पेश करते हैं, जबकि वहाँ सिर्फ प्रकृति अपना खेल खेल रही होती है।

यह बेहद हास्यास्पद है कि हम महिलाओं से, और पुरुषों से भी, कहें कि उनका जीवन कैसा होना चाहिए और जीवन के किस बिंदु पर उन्हें क्या सोचना चाहिए, क्या इच्छा करनी चाहिए! समाज के लिए यह कतई स्वस्थ दृष्टिकोण नहीं कहा जा सकता और न ही उस महिला के लिए या उस दंपति के लिए। क्योंकि क्या होगा यदि वे वास्तव में बच्चा पैदा न कर पाएँ? इस परिस्थिति पर दृष्टिपात करेंगे, कल…!

मेरी प्रिय, पश्चिम की महिलाओं: भारतीय पुरुषों से ऑनलाइन प्रेम संबंध बनाते समय सतर्क रहें – 15 जून 2015

आज से मैं एक ऐसे विषय पर लिखने की शुरुआत करना चाहता हूँ, जो मेरे मुताबिक़ अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह मैं इसलिए जानता हूँ कि हमारे आश्रम में अक्सर विदेशी महिलाएँ आती रहती हैं या बहुत सी महिलाएँ इस मामले में लिखकर भी पूछती हैं: वे इंटरनेट पर चैटिंग करते हुए एक भारतीय पुरुष के साथ प्रेम करने लगीं और अब उससे मिलने भारत आना चाहती हैं। कई बार वे बेहद निराश होकर अपने देश वापस लौटती हैं।

शुरू करने से पहले मैं आपके सामने यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि जो मैं आज लिखूँगा और शायद अगले कुछ दिनों तक लिखता रहूँगा, वह मेरे अनुभवों और मेरी राय के आधार पर व्यक्त किए गए मेरे विचार होंगे। निश्चय ही इसके बिल्कुल विपरीत रूप से घटित प्रकरण भी बहुत से मौजूद होंगे और स्पष्ट है कि यह उस व्यक्ति, उसके रवैये और उसके व्यवहार पर निर्भर होता है कि अंततः किसी को क्या हासिल हुआ।

लेकिन 35 से 50 साल उम्र वाली पश्चिमी महिलाओं के प्रकरण सामान्यतया ज़्यादा देखने में आते हैं और वैसी ही एक महिला के बारे में मैं आपको बताने जा रहा हूँ। इंटरनेट पर चैट-रूम में और सोशल मीडिया के ज़रिए इस महिला का परिचय एक भारतीय पुरुष से हो गया और जैसा कि अक्सर होता है, उससे कम उम्र के पुरुष से। काफी समय एक-दूसरे से बातचीत करने के बाद उसे महसूस हुआ कि वे आपस में सिर्फ सामान्य परिचित या मित्र से आगे कुछ आगे बढ़कर अधिक घनिष्ट हो सकते हैं। लगता था, उनके बीच गहरे तार जुड़ गए हैं और युवक भी उसे बार-बार भारत आने का निमंत्रित देता रहता था तो उसने सोचा, क्यों न एक बार हो आए, देखे, भरोसा करे और इस संबंध में कुछ गहरा उतरे?

ऐसी स्थिति में पड़ी हर महिला से मैं एक बात कहना चाहूँगा: सतर्क रहें और तुरंत इस मामले में अपने दिल को पूरी तरह न झोंक दें! आप सोच रही हैं कि इससे कुछ गंभीर बात निकलकर आएगी और यह कि शायद आपके पास जीवन-साथी प्राप्त करने का जीवन में सिर्फ एक बार मिलने वाला मौका हाथ आ गया है। सपने देखना मत छोड़िए-लेकिन यथार्थ का दामन भी कभी मत छोड़िए और इस बात को समझिए कि हो सकता है कि यह व्यक्ति उतना गंभीर न हो जितना आप हैं!

इसके विपरीत कई बार हमने देखा है कि महिलाएँ भारत आती हैं और उस व्यक्ति से रूबरू मिल भी नहीं पातीं। पहली बात तो यह कि आप नहीं जानते कि जिस आदमी से आप इतने दिन चैट करती रहीं वह यथार्थ में कोई व्यक्ति है भी या नहीं। इंटरनेट पर कोई भी बेधड़क झूठ बोल सकता है और निडर होकर कि कोई सच्चाई जान लेगा, झूठे चित्र अपलोड कर सकता है!

तो अब जबकि आपने भारत आने का टिकिट भी बुक कर लिया है, यह सुनिश्चित करें कि आपके पास पहले से कोई न कोई वैकल्पिक योजना (बॅकअप प्लान) हो! पहले से होटल वगैरह की छानबीन करके और होटल से बात करके आपको लेने आने वाली टॅक्सी आदि की व्यवस्था कर लें, जिससे आपको पता हो कि आपको कौन लेने आ रहा है। इस बात पर ही भरोसा मत कीजिए कि यह आदमी आपको लेने आ ही जाएगा-और इस विदेशी धरती और पूरी तरह अलग देश में हवाई जहाज से उतरते ही क्या आप पहली ही रात इस आदमी के साथ रहना पसंद करेंगी? न सिर्फ आप इस बिल्कुल अपरिचित संस्कृति, अलग टाइम ज़ोन, और बिल्कुल अलग मौसम द्वारा अभिभूत कर ली जाएँगी बल्कि वे भावनाएँ भी इसमें अपनी भूमिका अदा करेंगी, जिनमें आप इस समय मुब्तिला है।

आप उनसे रूबरू मिलने की जगह तय कर सकती हैं लेकिन तब भी आपको हर वक़्त सतर्क रहना होगा। इस बात की पहले से योजना बना लें कि अगर वह तय समय पर, तय जगह पर न आए, अगर उसने कोई पता नहीं दिया है कि आप वहाँ जाकर उससे मुलाक़ात कर लें या अचानक उसका वह फोन, जिस पर आप हमेशा उससे बात करती थीं, स्विच ऑफ मिले।

मैं बताना चाहता हूँ कि यह सब मैंने होते हुए देखा है। महिलाएँ भारत आती रही हैं, मिलने की जगह भी तय होती है, उनके पास एक पता और फोन नंबर होता है, सैकड़ों किलोमीटर रेल और कार का सफर करने के बाद वे पाती हैं कि एक अनजान कस्बे या शहर के अजनबी चौराहे पर वे बिल्कुल तनहा खड़ी हैं। पता गलत था, फोन लग नहीं रहा। कोई लेने नहीं आया। फेसबुक और ईमेल संदेशों का कोई जवाब नहीं या अगर उस आदमी के अंदर थोड़ी भी मनुष्यता, थोड़ा सा भी अपराधबोध हुआ तो जवाब के रूप में कोई न कोई बहाना-सॉरी, अचानक ट्रांसफर हो गया या देश के दूसरे कोने में रहने वाले किसी रिश्तेदार की मृत्यु हो गई और उसे तुरंत वहाँ के लिए निकलना पड़ा।

अन्य कई महिलाओं के किस्से कुछ अलग होते हैं। जिस आदमी से वे इतने दिनों से बात कर रही थी, वह उन्हें मिल जाता है। फिर वे यहाँ खूब बढ़िया छुट्टियाँ मनाते हुए देश भर में घूमते-फिरते हैं और स्वाभाविक ही, सारा यात्रा खर्च, होटल का किराया और दूसरी खरीदारियों के खर्चे ये महिलाएँ ही उठाती हैं। उन्हें उम्मीद होती है कि जीवन भर के उनके संग-साथ का यह पहला महीना है लेकिन आखिर जब वे गंभीरता से भविष्य के बारे में बात करते हैं तो उसे गोलमोल वादे, झूठे बहाने सुनने को मिलते हैं और अंततः उन्हें पता चलता है कि सिर्फ मौज मस्ती करने के इरादे से उसने इतना नाटक किया था!

ऐसे निराशाजनक अनुभवों को झेलने के बाद कभी-कभार ये महिलाएँ हमारे आश्रम पहुँच जाती हैं। कई बार वे इतनी समझदार और सतर्क होती हैं कि अपने रोमांच की ओर निकलने से पहले हमारे पास आ जाती हैं और सुनिश्चित कर लेती हैं कि ऐसी किसी अनहोनी के बाद आश्रय के लिए उनके पास कोई विकल्प मौजूद हो। कुछ तो उस आदमी की खोज में हमारी कार तक ले जाती हैं। हमें ख़ुशी होती है कि चलो, इतना परेशान होने के बाद कुछ समय वे हमारे आश्रम में शारीरिक और मानसिक विश्रांति प्राप्त कर सकेंगी और शांत मन से विचार कर सकेंगी कि उनके साथ ठीक-ठीक क्या हुआ था, उनसे क्या गलती हो गई थी और उससे उपजी निराशा से किस तरह उबरा जाए, और जब वे भारत से बिदा हों तो निराशा के साथ कुछ अच्छे अनुभव भी साथ लेती जाएँ!

कल मैं इन परिस्थितियों के भावनात्मक पहलुओं पर कुछ और विस्तार से लिखूँगा।

हमारे गरीब बच्चों की और हमारी निराशा और असहाय स्थिति – 12 मई 2015

कल मैंने आपको बताया था कि हम अगले शिक्षा-सत्र से 6ठी और 7वीं कक्षाएँ समाप्त कर रहे हैं और अपने स्कूल की कक्षाओं को 8वीं तक बढ़ाने की योजना भी स्थगित कर रहे हैं। हम जानते हैं कि हालांकि अब हम उन बच्चों को अपने स्कूल में नहीं पढ़ा पाएँगे लेकिन उनकी पढ़ाई-लिखाई में हर संभव मदद करते रहेंगे। लेकिन इस दिशा में क्या किया जाए, यह प्रश्न हमारे लिए समस्या बनता नज़र आ रहा है! यह काम इतना कठिन होगा, हमें अनुमान नहीं था!

हमारे शहर में कई स्कूल हैं और स्वाभाविक ही एक या दूसरे स्कूल की खबरें दूसरे सभी स्कूलों को भी मिलती ही रहती हैं। तो इसलिए हमारे स्कूल के पास ही स्थित एक निजी स्कूल वालों ने हमसे संपर्क किया। वे हमारे स्कूल के बारे में जानते थे और यह भी जानते थे कि हम गरीब बच्चों को सब कुछ मुफ्त मुहैया कराते हैं। हमने उन्हें आश्रम आकर बात करने का न्योता दिया।

जब उस स्कूल के मालिक अपने प्रधानाध्यापक के साथ हमारे पास आए तो मैंने खुद उनसे बात की। उन्होंने अपने स्कूल में हमारे बच्चों को भर्ती करने का प्रस्ताव रखा। मैं साफ बात करना चाहता था और मैंने पूछा कि खर्च कितना आएगा। मैं जानता हूँ कि वे किसी तरह का चैरिटी स्कूल नहीं चला रहे हैं। उनका स्कूल एक तरह का व्यापार है और दाखिले के समय जो पैसा आता है और फिर हर माह बच्चों से जो स्कूल फीस वसूली जाती है वह उनकी आमदनी का जरिया होते हैं। इसलिए मैंने उनसे कहा कि बच्चों के अभिभावक नहीं, बल्कि हम फीस अदा करेंगे क्योंकि बच्चे गरीब हैं और उनके माता-पिता के पास स्कूल फीस जमा करने के लिए पैसे नहीं होते। क्योंकि वे हमारी आर्थिक स्थिति और हमारे चैरिटी कार्यों के बारे में जानते थे, हमने उनसे अच्छे-खासे डिस्काउंट की मांग की।

उनकी प्रतिक्रिया टिपिकल भारतीय प्रतिक्रिया थी। अर्थात मुझे खर्च की ठीक-ठीक रकम नहीं बताई गई-बल्कि उसकी जगह उन्होंने बड़ी दरियादिली दिखाते हुए कहा: "अरे आप चिंता मत कीजिए। हम जानते हैं कि आप समाज की भलाई के लिए कितना बड़ा काम कर रहे हैं! जो आपकी मर्ज़ी हो, दे दें!" आप कल्पना कर सकते हैं कि मैं कितना खुश हुआ होऊँगा! हम इस निजी स्कूल में अपने बच्चों को भेज पाने में समर्थ हो पाएँगे!

हमने दो दिन बाद अपने सभी 35 बच्चों को स्कूल बुलाया। हमारे स्कूल के प्रधानाध्यापक उन बच्चों के साथ उनके प्रवेश फॉर्म्स भरने और भर्ती की औपचारिकताएँ पूरी करने उस निजी स्कूल गई। दुर्भाग्य से एक दुखद आश्चर्य हमारा इंतज़ार कर रहा था: जब बच्चे वहाँ पहुँचे, वहाँ के प्रबन्धक ने वह रकम बताई, जो हमें प्रवेश फीस के रूप में जमा करानी थी और इसके अलावा मासिक फीस की जानकारी भी दी। ये दोनों फ़ीसें भरना आर्थिक रूप से हमारी कूवत के बाहर की बात थी। फीस के अलावा बच्चों की वर्दियों का, किताब-कापियों और दूसरे लिखने-पढ़ने के सामान का खर्च भी था, जिसे हमें उठाना था!

प्रधानाध्यापक ने हमें फोन किया और हमने स्कूल के मालिक और कर्ता-धर्ता से बात की तो हमें जवाब मिला: ये खर्चे तो डिस्काउंट के बाद के हैं, आपके लिए इससे ज़्यादा हम कुछ नहीं कर सकते!

हम बुरी तरह निराश हो गए! सभी बच्चे वापस आए, उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या हुआ। यही बात हमें सबसे ज़्यादा परेशान कर रही थी। अगर हमें पता होता कि हम उन्हें उस स्कूल में नहीं भेज सकेंगे तो हम उन्हें भर्ती की संभावना का दिलासा ही नहीं देते और इस तरह उन्हें भावनात्मक द्वंद्व से बचा लेते! उस व्यक्ति ने पहली मुलाक़ात में ही मुझसे स्पष्ट बात क्यों नहीं की, जब वह हमारे कार्यालय में सामने बैठकर रूबरू बात कर रहा था? क्या इससे हम और हमारे बच्चे बेकार की निराशा बच नहीं जाते?

खैर, संक्षेप में कहें तो हमने एक दूसरे स्कूल की तलाश की कोशिश की, जहाँ फीस कम हो मगर पता चला कि सभी निजी स्कूलों में फीस का ढाँचा लगभग एक जैसा ही है, या फिर इससे भी ऊँचा है। हमने अपने आपको बच्चों के अभिभावकों की जगह महसूस किया-फर्क सिर्फ इतना था कि हम एक साथ 35 बच्चों के लिए स्कूल ढूँढ़ने की कोशिश कर रहे थे!

अंत में हम एक सरकारी स्कूल गए, जहाँ मेरे भाई और मैं बचपन में पढ़े थे। हमने उस स्कूल में अपने बच्चों को भर्ती कराने का निर्णय किया। स्वाभाविक ही, वहाँ पढ़ाई का स्तर वह नहीं है, जैसा हम बच्चों के लिए चाहते हैं-लेकिन क्योंकि वहाँ खर्च बहुत कम है, हम बच्चों के लिए अलग से निजी कोचिंग की व्यवस्था करने में समर्थ हो सकते हैं और इस तरह उनकी आगे की शिक्षा में मदद कर सकते हैं!

इस बीच हमारे घर में और हमारे दिमागों में यह प्रकरण बहुत उथल-पुथल मचाता रहा। अगले कुछ दिन मैं उन्हीं तथ्यों, विचारों और उनसे उपजी भावनाओं को विस्तार से अपने ब्लॉगों के ज़रिए व्यक्त करता रहूँगा!

आसाराम द्वारा प्रताड़ित लड़की के पिता को रिश्वत का प्रयास, मारने की धमकी के बावजूद सराहनीय है मजबूती-9 सितंबर 13

पिछले हफ्ते मैंने आसाराम के बारे में और उसके द्वारा किए गए यौन दुराचार के बारे में बहुत सी बातें आपको बताई थीं, जिसके लिए अब वह गिरफ्तार भी हो गया है। जब कि लगातार अधिकाधिक विस्तृत सूचनाएँ प्राप्त हो रही हैं, मैं चाहूँगा कि उन लोगों की मानसिक हालत का भी जायजा ले लिया जाए जो इन घटनाओं से किसी न किसी तरह प्रभावित हुए हैं; क्योंकि, वैसे भी, यह कोई इकलौता, इस प्रकार का प्रकरण नहीं है। यह रोज़-बरोज होता रहता है, गुरु और शिष्य बदल जाते हैं, किस्सा वही रहता है और कभी न कभी भक्त को पता चल ही जाता है कि उसके गुरु वैसे धार्मिक और पवित्र नहीं हैं जैसा कि उन्होंने इतने दिनों से समझ रखा था। सबसे पहले धोखा खाए हुए शिष्यों और भक्तों की भावनाओं और उनकी परिस्थिति पर नज़र दौड़ा लें।

आसाराम के प्रकरण में यह व्यक्ति उस 16 वर्षीय पीड़िता के पिता हैं। सालों से उन्होंने अपना जीवन, अपना प्रेम, अपना बहुमूल्य समय, अपनी भक्ति और बहुत सारा धन अपने इस गुरु को समर्पित किया हुआ था। उन्होंने अपने बच्चों को उसके स्कूल में पढ़ने भेजा, यह सोचकर कि उनके बच्चे अच्छी से अच्छी शिक्षा वहाँ पाएंगे-जबकि यह शिक्षा भी कोई सस्ती शिक्षा नहीं थी! लेकिन उन्होंने सब कुछ खुशी-खुशी किया क्योंकि वह जानते थे कि इससे उनके प्रिय गुरु की उसके पवित्र काम में मदद होगी।

और उसके बाद यह सिला! उनके विश्वास की ऐसी धज्जियां उड़ीं कि कोई बाप इससे अधिक बुरा कुछ सोच ही नहीं सकता! क्या आप पूरी तरह ध्वस्त भावनाओं की कल्पना कर सकते हैं? किसी पर समर्पित सालों की बरबादी की कल्पना या समर्पण के साथ अपने आप आ जाने वाली बेबसी की? और यह सब उस व्यक्ति के लिए जिसने, उनकी लड़की के अनुसार उसके साथ यौन संबंध स्थापित करने का प्रयास किया और हत्या तक करने की धमकी दे डाली? पूरी तरह निर्भ्रांत, भग्न-हृदय और साथ ही इतना क्रोधित, जितना ज़िंदगी में कभी हुआ न हो!

जो वे अधिक से अधिक कर सकते थे, उन्होंने किया: पुलिस में अपराध की रपट लिखवाई। दुर्भाग्य से पुलिस, या कहें, भारतीय राजनीति ने उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ करना शुरू कर दिया। उसने आसाराम को वीआईपी माना और लगभग दो हफ्ते उसे गिरफ्तार ही नहीं किया!

इस दौरान, उन्हें आसाराम के चेलों की तरफ से धमकियाँ मिलती रहीं। आखिर उन्हें प्रयास करके अपने फोन को पुलिस की निगरानी में रखना पड़ा। कुछ दूसरे चेलों ने उन्हें रिश्वत का लालच दिखलाया, खरीदने की कोशिश की कि वह अपने आरोप वापस ले ले। आसाराम की एक करीबी महिला जो उसकी बेटी कहलाती है और उसके परिवार के दूसरे सदस्य व्यक्तिगत रूप से उनके घर आए और आसाराम के लिए उनके पैरों पर गिरकर माफ़ी की भीख मांगी।

लेकिन वे टस से मस नहीं हुए-और क्यों और कैसे हों? उन्होंने बताया कि "मैंने आसाराम को इतना रुपया दिया लेकिन उसने मेरी ऐसी चीज़ छीन ली है जिसे वापस पाना असंभव है! ऐसे अपराध के लिए मैं क्या मांगूँ जिससे मुझे उसका प्रतिदान मिल सके? और फिर मुझे भयभीत क्यों होना चाहिए, जबकि पहले ही मैं इतना अपमान झेल चुका हूँ?"

नहीं, वे एक बार भी ढीले नहीं पड़े। इसके विपरीत, जब ऐसा लग रहा था कि पुलिस सम्मन की समय सीमा गुज़र जाने के बाद भी आसाराम पर कोई कार्रवाई नहीं कर रही है, वे यह कहते हुए भूख हड़ताल पर बैठ गए कि वे तब तक भोजन नहीं करेंगे जब तक पुलिस आसाराम को गिरफ्तार नहीं कर लेती, जैसा कि कानूनन उसे करना ही चाहिए।

मेरा मानना है कि उन्होंने पूरी तरह उचित कदम उठाया: बहुत से दूसरे पिताओं के विपरीत, इस प्रकरण को जनता के सामने लाकर शायद वे बहुत सी लड़कियों को बचा रहे हैं। इसके अलावा बहुत से अंधों की आँखों पर पड़ा पर्दा भी इससे हट सकेगा!

और मैं उन्हें यह सलाह दूँगा कि जब भी आपको छ्ले जाने का गम सताए कि इस कुपात्र पर इतना समय, धन, ऊर्जा और प्रेम अर्पित करने के बाद मुझे क्या मिला, तो आप यही सोचिए कि एक बार आंखे खुलने के बाद कि क्या सही है और क्या गलत, आपने कार्रवाई की और आपके इस कदम से कई दूसरे लोग ऐसी निराशाजनक स्थितियों का सामना करने से बच सकेंगे।

अफसोस मत कीजिए, जो भी हुआ उसे स्वीकार कीजिए और उसे लेकर बेहतर भविष्य के विश्वास के साथ आगे बढ़ें! दूसरों की मदद करें, उन्हें अपने पास आने दें और उनको बार बार अपनी कहानी बयान करें जिससे कई और लोगों की आँखें खुल सकें और वे आपसे सीख लेकर ऐसे संत-महात्माओं के चंगुल से आज़ाद हो सकें और उन्हें ऐसी समस्याओं का सामना न करना पड़े!

मैं कईयों के साथ सेक्स करूं तो रोमांस – आप करें तो धोखाधड़ी – 28 फरवरी 13

कल मैंने लैंगिक समानता और स्त्री पुरुष को लेकर दोहरे मानदंडों की बात की थी। उसे पढ़कर कई पुरुषों ने मुझे लिखा कि वे भी ऐसा ही महसूस करते हैं। बहुत सी महिलाओं ने इस बात से इंकार किया कि कभी ऐसा खयाल उनके दिमाग़ में आया हो, वहीं कुछ महिलाओं ने माना कि मेरी बात ठीक थी। आज मैं जिस मुद्दे पर लिखने जा रहा हूं उस पर सहमत होना लोगों के लिए ज्यादा मुश्किल होगाः मैं सबके बारे में यह बात नहीं कह रहा हूं लेकिन बहुत से लोग दूसरों के बारे एक अलग मानदंड रखते हैं और जब बात उनके क्रियाकलापों, विचारों और भावनाओं की आती है तो उनका पैमाना एकदम बदल जाता है।

अलग अलग नैतिकता और मूल्यों का सबसे अच्छा और स्पष्ट उदाहरण जीवन के सबसे अंतरंग पहलू सेक्स का लिया जा सकता है। लोगों के यौन व्यवहार का एक उदाहरण मैं आपको देता हूं।

एक स्थिति की कल्पना कीजिए : आप एक महिला हैं और एक सेमीनार में भाग ले रही हैं और अपनी बगल में बैठे हुए पुरुष से बातचीत करने लगती हैं। बातचीत के दौरान आपको पता चलता है कि आप दोनों एक ही होटल में ठहरे हुए हैं। आप दोनों ही अविवाहित हैं। आप शाम साथ में गुजारने का फैसला करते हैं। आप साथ डिनर करते हैं, होटल के बार में शराब पीते हैं और वापिस लौटकर एक ही कमरे में, एक ही बिस्तर पर सेक्स का आनंद लेते हैं। इस तरह आपका सप्ताहांत मौजमस्ती में बीत जाता है।

आप दोनों को पता है कि ज़िंदगी में अब दोबारा आप दोनों की भेंट शायद ही हो। सेमीनार खत्म होने के बाद आप दोनों अपने – अपने घरों को लौट जाते हैं और अपना रोजमर्रा का जीवन जीने लगते हैं। आपके एक दोस्त का दोस्त है और आपको वह पसंद है और आपको ऐसा लगता है कि बस यही आपके सपनों का राजकुमार है। आप दोनों कोशिश करते हैं, कुछ हफ्ते साथ साथ गुजारते हैं लेकिन फिर आपको लगता है कि बात कुछ जम नहीं रही है और आप दोनों अलग हो जाते हैं।

यह तो थी कहानी की शुरुआत। इसमें एक बड़ा मजेदार मोड़ तब आता है जब कुछ ही महीनों के बाद आप उसी शहर में एक दूसरे सेमीनार में भाग लेने जाती हैं। इस बार वह पुरुष आपको नहीं मिलता। मिलती है एक महिला जो उसी ग्रुप में है जिसमें आप हैं। ज़ाहिर है कि आप दोनों शाम को फिर मिलती हैं और उस पिछले सेमीनार के बारे में बात करने लगती हैं। बातों बातों में उस पुरुष का ज़िक़्र आ जाता है। आप अपनी उस नई मित्र को चटकारे लेकर सुना रही हैं कि आपने कितनी मस्त रात गुजारी थी उस पुरुष के साथ! उसने हैरान होकर आपके चेहरे को देखा और फिर बताया कि आपके तीन या चार हफ्ते बाद उसने भी उस पुरुष के साथ सेक्स किया था।

वह महिला हंस रही है और इस विचित्र संयोग का मज़ा ले रही है और आपके भीतर ज्वालामुखी फट रहा है! आप गुस्से में हैं। आपको लगता है कि आपके साथ धोखा हुआ है, आपको इस्तेमाल किया गया है और आप हताश महसूस कर रही हैं। उस रात की सुहानी यादें अब कांटों की तरह चुभ रही हैं।

यदि आप इस कहानी को पूरी तरह समझ रही हैं और खुद को इस स्थिति में रखकर सोच पा रही हैं तो मैं आपसे कहूंगा कि अब आप जरा एक कदम पीछे हटें और अपनी भावनाओं पर गौर फरमाएं। क्या हुआ? आप गुस्से से क्यों भर गई हैं? आप सोच रही हैं : "मेरी कोई औकात ही नहीं है! वो जब चाहे, जहां चाहे और जिससे चाहे सेक्स कर सकता है" यही वजह है कि आप इस पुरुष पर गुस्सा हो रही हैं।

एक बार फिर सोचें : क्या आपको नहीं लगता कि ग़लत सोच रही है आप? आपने भी तो एक दूसरे पुरुष के साथ सेक्स किया था? अग़र उस पुरुष को आपके बारे में पता चले तो उसे बुरा लगेगा या नहीं? आप दोनों ने एक रात हमबिस्तरी की, उसके बाद आप किसी तरह का कोई रिश्ता नहीं चाहते थे और आप दोनों इस बात को बखूबी समझते थे।

आपने अपने दिमाग़ में एक काल्पनिक फिल्म बना ली है जो एक फंतासी है, वास्तविकता नहीं। जब इस दूसरी स्त्री की कहानी सुनकर आपकी यह काल्पनिक कथा धराशायी हुई तो आपको बहुत निराशा हुई। उस स्त्री ने आपको अचानक सच्चाई से रूबरू करवा दिया!

अब वापिस वास्तविक दुनिया में लौट आइए, अपने गुस्से और निराशा को काबू कीजिए, अपने अहं और दर्प का शमन कीजिए और सामान्य जीवन जीना शुरु कीजिए। एक बार सपनों को दुनिया को छोड़कर जब आप इस कड़ुवी सच्चाई का सामना कर लेंगीं तो आपको खुद पर हंसी आएगी कि आपने भी तो वही सब किया है जो इस पुरुष द्वारा करने पर आपको गुस्सा आया।

यहां मैं एक बात स्पष्ट कर दूं कि मैं यहां जो कुछ भी कह रहा हूं वह स्त्री और पुरुष दोनों पर समान रूप से लागू होता है। यह घटना स्त्री और पुरुष दोनों के साथ घट सकती है। ऊपर आपने जो कहानी पढ़ी है उससे आपको स्थितियों को समझने में आसानी होगी।

दूसरे के लिए अपने से ज्यादा ऊंचे नैतिक मानदंड स्थापित करने से बचें। यदि आप सोचते हैं कि जिस व्यक्ति के साथ लंबे समय तक संबंध रखना हो उसी के साथ सेक्स संबंध बनाने चाहिए तो उसी तरह का व्यवहार करें। ऐसे व्यक्ति के साथ सेक्स संबंध न बनाएं जो आपसे शादी करने या बच्चे पैदा करने की मंशा नहीं रखता है। बाद में किसी पर दोषारोपण करने का कोई औचित्य नहीं है।

सपनों और आशाओं को मरने मत दीजिये – मग़र निराशाओं से सबक सीखिए! 25 फरवरी 13

हम सब खुश रहना चाहते है। परंतु दुर्भाग्य से कई लोग अपने दैनिक जीवन में इस लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाते हैं। जब प्रश्न उठता है कि ऐसा क्यों, तो स्पष्टतया प्रत्येक व्यक्ति की व्यक्तिगत स्थिति पर इसका उत्तर निर्भर करता है। लेकिन एक जवाब जो हम अकसर सुनते हैं और जो लगभग सभी पर एक समान लागू होता है, वह यह है कि वे सभी लोग बहुत सारी और बहुत ही ऊंची अपेक्षाएं रखते हैं। मैंने भी आशा और निराशा पर बहुत कुछ लिखा और कहा है। लेकिन आपके जीवन में इसका वास्तविक अर्थ क्या है, यह जानना आव्श्यक है ।

कई लोग सोचते हैं कि उनकी अपेक्षाएं बहुत ऊंची हैं लेकिन जब वे निराशा से बचने के लिए इस समस्या का हल खोजने लगते हैं तो वे विपरीत की पराकाष्ठा पर पहुंच जाते हैं और यह सोच लेते हैं कि उन्हें अपेक्षाएं रखनी ही नहीं चाहिएं। वे किसी भी चीज़ की उम्मीद करना छोड़ देते हैं, ऊंचे लक्ष्य निर्धारित करना छोड़ देते हैं। जब कभी भी उन्हें यह महसूस होता है कि वे कुछ चाहते हैं तो वे तुरंत ही खुद समझाने लगते हैं सपने देखना व्यर्थ है। वे अपना दिमाग़ वहां से हटा लेते हैं और वापिस अपने दैनिक कामों में लग जाते हैं।

नतीज़ाः वे पहले की तुलना में अधिक व्याकुल और मायूस हो जाते हैं! अपेक्षाएं ना रखने पर भी जब खुशी नहीं मिलती तब वे स्वयं से सवाल करते हैं कि उनके जीने का आखिर अर्थ ही क्या है। अगर कुछ पाने के इच्छा ही नहीं है तो मेरी ज़िंदगी के मायने ही क्या हैं? जीवन का कोई उद्देश्य ही न हो तो मैं क्या करूं?

मेरा मानना है कि इन दोनों के बीच का भी एक रास्ता है। आप उम्मीदों के बिना एक सामान्य जीवन नहीं जी सकते। आप सामान्य जीवन की गतिविधियों से पूरी तरह विमुख होकर एकांतवास में जा सकते हैं। यदि आप स्वयं को मित्रों, परिवार और सामाजिक जीवन से अलग कर सकते हैं, यदि आप सारे काम छोड़कर केवल ध्यान में मग्न हो सकते हैं तो संभव है कि आप उस अवस्था के नज़दीक पहुंच सकते हैं। परंतु दोस्तों, परिवार और दैनिक कामकाज के बीच यह कर पाना संभव नहीं है। यदि आप ध्यान करने में समय व्यतीत करते हैं तो भी यह संभव है कि आप पूर्ण समाधि में उतरने की अपेक्षा करने लगें। हो सकता है कि ऐसा ना हो पाए। तब पुनः आप निराश और नाखुश होंगें। जहां अपेक्षाएं होती हैं, वहां निराशाओं की गुंजाइश अवश्य रहती है।

निराशा के भय को अपने ऊपर हावी न होने दें। इस भय की वजह से अपने लिए उच्चतम लक्ष्य निर्धारित करने से पीछे न हटें। यदि आप ऐसा करते हैं तो आप स्वयं अपने विकास का रास्ता अवरुद्ध कर रहे हैं। आपका विकास नहीं होगा तो ज़िंदगी में कोई मुकाम हासिल करने की आशा ही समाप्त हो जाएगी।

अपनी अपेक्षाओं को घटाकर शून्य पर लाने की ग़लती कदापि न करें। बल्कि इसके बजाए उनसे उचित तरीके से निपटना सीखें। बेशक़ आप समय – समय पर यह जांच कर सकते हैं कि आपकी अपेक्षाएं जायज़ हैं या नहीं। और यदि वे जायज़ हैं और उन्हें पूरा कर पाने की ज़रा सी भी संभावना आप देखते हैं, तो ज़रूर आगे बढ़ें। जी-जान लगाकर कोशिश करें। यदि फिर भी निराशा हाथ लगती है तो भी छोटी-छोटी निराशाओं से घबराएं नहीं, ये तो आपको और अधिक मज़बूत बनाती हैं और आपके विकास में मदद करती हैं।

एक बार प्रयास करने पर यदि असफलता हाथ लगती है तो आप दोबारा प्रयास कर सकते हैं। इस बार आपका यह प्रयास अधिक विश्वास से भरपूर और सटीक होगा क्योंकि अब आपके पास एक प्रयास का अनुभव जो है। केवल इसी रास्ते पर चलकर आप अपने लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। यदि आप किसी भी दिशा में पूरी शिद्दत से प्रयास करते हैं तो कुछ न कुछ नतीजा अवश्य निकलेगा। चाहे मंज़िल तक न पहुंच पाएं हों लेकिन फिर भी एक कदम तो आपने आगे बढ़ाया है। जितना आगे बढ़ते जाएंगें, उतना ही आपके अनुभवों में वृद्धि होती जाएगी।

यदि आशाएं, सपने और उम्मीदें नहीं होंगी तो ज़िंदगी थम सी जाएगी। जीवन नीरस हो जाएगा, आप कहीं के भी नहीं रहेंगें और सबसे बड़ी बात, आप खुश नहीं रह पाएंगें। नहीं, आप अपने जीवन के साथ ऐसा नहीं कर सकते। सपने देखें, अपेक्षाएं रखें, कल्पना की उड़ान भरें और साथ ही अपने सपनों को साकार करने के लिए दिमाग और हाथ-पैरों का इस्तेमाल करें।

जब धार्मिक परम्पराओं के सामने 50 साल की दोस्ती को ताक पर रख दिया जाता है – 27 दिसंबर 2012

हमने बहुत से लोगों को अपनी माँ के देहांत की खबर नहीं की थी और उसे धीरे-धीरे लोगों को पता चलने के लिए छोड़ दिया था। फिर भी हम सभी ने अपने बहुत करीबी मित्रों को इसकी सूचना दी थी और बब्बाजी ने भी दो-तीन लोगों को, जो उनके या अम्माजी के नजदीकी मित्र थे, इसकी सूचना दे दी थी। उनमें से कुछ लोगों की प्रतिक्रिया ने मुझे धार्मिक परम्पराओं के प्रति क्षोभ से भर दिया, क्योंकि उन लोगों ने मेरे पिताजी को दुख पहुंचाया था!

अम्माजी के देहांत के एक दिन बाद, मंगलवार की सुबह, हमने बब्बाजी के एक मित्र को घर के गेट से भीतर आते देखा। हमारा दर्द अभी ताज़ा-ताज़ा था और हम लोग बार-बार बब्बाजी की ओर देखते रहते थे कि वे ठीक तो हैं। अम्माजी की मृत्यु के बाद उनके एकदम अकेले पड़ जाने की संभावना थी और उनकी तबीयत भी खराब हो सकती थी। इसलिए जब हमने उनके इस मित्र को देखा तो हम बड़े खुश हुए। ये व्यक्ति बब्बाजी के मित्र होने के अलावा आश्रम में भी महीनों रह चुके थे और ऐसे वक़्त उन्हें देखकर उनके प्रति हम कृतज्ञ भी महसूस कर रहे थे। हमें लगा कि अपने पुराने मित्र के साथ पुराने दिनों को याद करते हुए, अम्माजी के बारे में बातचीत करते हुए बब्बाजी दुख कुछ हल्का होगा। किसी करीबी मित्र का सिर्फ पास बैठना ही ऐसे वक़्त बहुत सहारा देता है।

बब्बाजी के मित्र को देखकर बाहर ही खड़े पूर्णेन्दु ने उन्हें नमस्कार किया फिर जाकर बब्बाजी को खबर की। हम लोग उन कार्यों को, जो पहले अम्माजी किया करती थीं, संभालने में लगे थे, इसलिए हम भाइयों का पूरे समय उनके पास बैठना संभव नहीं था। मित्र को आए अभी कुछ मिनट ही हुए थे और हम लोग ऑफिस में किसी आवश्यक कार्य के विषय में चर्चा कर रहे थे कि तभी बब्बाजी ऑफिस में आए और कहा कि ऊपर कोई फ्री कमरा हो तो उनके मित्र के लिए तैयार करवा दें जिससे वे उन्हें वहाँ भिजवा सकें।

मगर इतना कहकर जब वे वापस गए तो देखा कि उनके मित्र जा चुके हैं। जैसे अचानक विलुप्त हो गए हों। उन्होंने चाय या पानी पीने से इंकार कर दिया था, रुकने से मना कर दिया था और अब बिना बताए गायब हो गए थे। सभी आश्चर्यचकित और दुखी थे। साफ दिखाई दे रहा था कि पिताजी को बहुत बुरा लगा है! दस मिनट में जब वापस ही चले जाना था तो इतनी दूर, दिल्ली से वे आए ही क्यों? दिल्ली में भी उन्हें कोई काम नहीं था, तो फिर वे यहाँ रुके क्यों नहीं? और इस तरह बिना किसी से बोले-बताए चले जाना क्या उचित था?

दोपहर को मित्र का फोन आया तो बब्बाजी ने अपनी नाराजी ज़ाहिर करते हुए कहा कि उनका बर्ताव उन्हें बहुत बुरा लगा है। उनके मित्र ने कहा कि "यही हमारे परिवार में होता आया है, यही हमारे यहाँ की परंपरा है और मैंने उसी का पालन किया है। हम लोग मिलने तो जाते हैं मगर वहाँ रुकते नहीं हैं, न ही उनके यहाँ कुछ भी खाते-पीते हैं। बस मिलकर वापस आ जाते हैं।" उन्होंने कहा कि अम्माजी के देहांत के 13 वें दिन, जब ‘तेरहवीं’ के कार्यक्रम के बाद हम लोग ‘शुद्ध’ हो जाएंगे, वे फिर आएंगे। मेरे पिताजी ने उनसे कहा कि वे न आएँ क्योंकि हम शुद्धिकरण हेतु किसी प्रकार का कर्मकांड या मृत्युभोज करने नहीं जा रहे हैं जैसा कि धार्मिक लोग आम तौर पर उस दिन करते हैं।

जब दोनों के पारस्परिक मित्र से बात हुई तो बब्बाजी ने उन्हें अपने उस मित्र के बारे में पूरी कथा सुनाते हुए कहा कि उनके व्यवहार से उन्हें और उनके परिवार को बहुत दुख पहुंचा था और यह भी कि वे भी न आएँ क्योंकि वे भी ऐसा ही करेंगे और उससे हमारा दुख कम होने की जगह और बढ़ेगा ही।

हमने अपने पिताजी से इस घटना के बारे में बात की और हम सभी इस बात पर सहमत थे कि ऐसे दुख के समय ऐसे कूढ़मगज लोगों की हमें कोई आवश्यकता नहीं है। हमारे पिताजी, स्वाभाविक ही, अपनी जीवनसंगिनी के वियोग में अकेलापन महसूस कर रहे थे और हालांकि हम लोग आसपास बने रहते थे और यशेंदु तो उनके साथ ही सोता भी था, फिर भी यह बहुत अच्छा होता कि कोई उनकी उम्र का व्यक्ति, जो युवावस्था में साथ बिताए समय के बारे में उनसे बात कर सकता, उनके साथ होता। इस दिलासे की जगह उन्हें, धार्मिक अंधविश्वासों के चलते, अपमान सहन करना पड़ा। ऐसे लोगों के लिए 50 साल की मित्रता धार्मिक रीति-रिवाजों के सामने कोई माने नहीं रखती।

बब्बाजी दुखी मन से उस समय की भी याद करते रहे जब मेरी बहन के देहांत के बाद लोग आए और अपनी बिन मांगी सलाहें देते रहे कि हमारे लिए क्या करना ज़रूरी है, कि हमें कौन-कौन से कर्मकांड करने होंगे; पूछते रहे कि ऐसा किया या कि किसी दूसरे तरीके से सारे कर्मकांड करवाए गए और कोशिश करते रहे कि हम हर तरह के धार्मिक कर्मकांड और समारोह सम्पन्न करें जिन्हें हम त्याग चुके थे और बिल्कुल नहीं करना चाहते थे।

हमने निर्णय किया कि जो लोग फोन पर ऐसे सवाल पूछें या सलाह दें उन्हें कह दिया जाए कि वे न आएँ। उनकी मुफ्त धार्मिक सलाहों की हमें आवश्यकता नहीं है और उनके हाथों अपना अपमान भी हम बर्दाश्त नहीं करेंगे-भले ही यह अपमान किसी दुर्भावनावश न हो बल्कि बेहूदे धार्मिक रीति-रिवाजों के चलते होता हो। हम सिर्फ उनका प्रेम चाहते हैं, सहानुभूति और साथ चाहते हैं। लेकिन अगर आप यह नहीं दे सकते तो फिर आपको इस अवसर पर हमारे यहाँ आने की कोई आवश्यकता नहीं है।

भारतीयों, अपने वादे निभाओ, आप विदेशियों और स्थानीय लोगों को निराश करते हैं! – 3 नवंबर 11

कल मैंने ज्यादा उम्मीद लेकर भारत आने वाले पर्यटकों के बारे में लिखा था जिन्हें यहां कई बार निराशा हो सकती है। मैं सभी पर्यटकों को ये सलाह दे चुका हूं कि उन्हें खुले दिमाग के साथ यहां आना चाहिए और रोमांच के लिए तैयार रहना चाहिए। मैं पहले भी इसका जिक्र कर चुका हूं और उन्हें भी ये बात समझनी चाहिए कि भारत के गरीब लोगों की तुलना में वे अमीर हैं और कुछ लोग इसका फायदा उठाने की कोशिश कर सकते हैं। मैं प्रार्थना करता हूं कि हमारे देश में आने और ठहरने का वे मजा लें और यहां की खूबसूरत चीजों को देखें। मैं उन भारतीयों को भी संबोधित करना चाहता हूं जो पर्यटकों को होने वाली निराशाओं के लिए जिम्मेदार हैं।

यहां का एक रवैया खास है जिसे मैंने कई बार अनुभव किया है और दुर्भाग्य से कभी-कभी हमारे पश्चिमी दोस्तों को भी उसे झेलना पड़ा है। कुछ भारतीयों को किसी भी बात पर वादा करने की आदत है लेकिन वे उसे पूरा नहीं करते।

मैं सही मायने में क्या कहना चाहता हूं ये समझाने के लिए आपको कुछ उदाहरण देता हूं। पिछले दिनों हमारे आश्रम में एक संगीत प्रेमी मेहमान आई थी। उसने हमारे योग शिक्षक प्रशिक्षण में हिस्सा लिया था और एक हारमोनियम खरीदना चाहती थी ताकि अपने भारत प्रवास के दौरान इसे बजाना सीख सके। अपने चार हफ्ते के प्रवास के शुरू में ही वह वृंदावन की एक वाद्य यंत्र की दुकान पर गई और एक हारमोनियम का ऑर्डर किया। उन्होंने सौदा किया कि दुकानदार उसके लिए हारमोनियम बनाएगा और इसके लिए उसने अग्रिम भुगतान भी कर दिया। सौदे के अनुसार दो हफ्ते बाद वह दुकानदार के पास गई तब उसने उससे एक हफ्ता और इंतजार करने को कहा। और तब तक तैयार करने का भरोसा दिलाया। एक हफ्ते बाद जब उसके यहां से जाने की तारीख पास आ चुकी थी, कई बार फोन करने के बाद दुकानदार आश्रम आया और अग्रिम भुगतान की रकम वापस करते हुए कहा कि वह हारमोनियम नहीं बना सकता।

ऐसा ही एक वाकया हाल में भी हुआ। आइरिस और थॉमस यहां आये थे और आने के तुरंत बाद आइरिस ने कहा कि वह अपने साथ लाये नमूने जैसी ही स्कर्ट और जैकेट सिलवाना चाहती है। उनके पास कपड़ा, बटन, चेन हर चीज थी। हम उन्हें लेकर दर्जी के पास पहुंचे। आइरिस ने दर्जी को हर बात समझा दी और वो एक हफ्ते में बना कर देने पर राजी हो गयी। दो दिन बाद दर्जी ने उसे बुलाया और कहा कि कपड़ा कम है जिससे इसे बनाने में दिक्कत आ रही है इसीलिए थोड़ा कपड़ा और चाहिए ताकि वो बेहतर चीज बना कर दे सके। इसके लिए उसने और पैसों की जरूरत बताई। कुछ मोल भाव के बाद इस पर भी सहमति बन गई। एक हफ्ता बीतने के बाद हम स्कर्ट और जैकेट लेने गये लेकिन दर्जी के पास यह तैयार ही नहीं था! वास्तव में उसने तो कपड़ा काटा भी नहीं था! उसने बहुत ही आसानी से कपड़ा वापस कर दिया और कहा कि वह इसे बनाने में सक्षम नहीं है।

दोनों ही मामलों में ऐसे बर्ताव की वजह से साफ तौर पर स्वाभाविक रूप से हमारे दोस्तों को निराशा हुई। ये तो सिर्फ दो उदाहरण हैं लेकिन ऐसे सैकड़ों मिल जाएंगे। हमारे पास अक्सर मेहमान आते रहते हैं और हम उनके लिए बाजार में दुकानदारों से बातचीत करते हैं। ऐसा कई बार होता है। ये हमारे लिए आम बात है लेकिन निश्चित रूप से इसी वजह से हमारे मेहमान निराश होते हैं और इससे हम भी खुश नहीं होते।

अगर आप अपनी निर्धारित समय सीमा का ध्यान नहीं रख सकते तो काम हाथ में लेने से पहले ही बता दें। आप वादा क्यों करते हैं और आखिर में सबको निराश करते हैं ? क्या आप वाकई सोचते हैं कि आप इसे कर सकते हैं? तब आप समय रहते ये क्यों नहीं मानते कि ये आपके लिए असंभव है ताकि सामने वाले के पास कहीं और जाकर अपना काम करवाने का मौका रहे? इमानदार बनिये। अगर आप ये कहेंगे कि आप ये काम नहीं कर सकते तो भी ठीक है। कम से कम आप किसी को ठग तो नहीं रहे।

ये ऐसा अनुभव नहीं है जो सिर्फ विदेशियों को होता है। मैं खुद भी कई बार इस तरह के बर्ताव की वजह से परेशान हुआ हूं। हो सकता है कि मैं यहां इसीलिए भी निराश होता होऊं कि मैं पश्चिम में बहुत ज्यादा रहा हूं। भारत में आपको दूसरों के समय पर नहीं आने की वजह से अक्सर इंतजार करना पड़ता है। कभी-कभी आप लोगों को किसी कार्यक्रम में बुलाते हैं, वे जवाब देते हैं कि वे आयेंगे लेकिन आप बैठकर इंतजार करते रहते हैं और आपको कोई भी दिखाई नहीं देता। जब आप अगली बार उनसे मिलते हैं और इस बारे में पूछते हैं तो वे कहेंगे कि उन्हें कुछ और काम पड़ गया था। वे आपको ये बताने की जहमत भी नहीं उठाते कि वे नहीं आ सकते या दो घंटे देर से आयेंगे। ये उनके लिए जरूरी ही नहीं है। ये उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है। और इसे वे आपके लिए असम्मान की तरह भी नहीं देखते। मुझे और जो लोग इसके शिकार हुए हैं उन्हें तो फर्क पड़ता है। विदेशी होने के नाते कृपया ये मत सोचें कि ऐसा सिर्फ आपके साथ हुआ है। ये हम भारतीयों के साथ भी होता है। लेकिन इस संस्कृति में रहने वाले इसके आदी हो सकते हैं लेकिन वे ऐसा सबके साथ करते हैं।

ऐसी हालत में हम सिर्फ यही कह सकते हैं- ‘कोई नहीं, यही भारत है।’ लेकिन इससे किसी भी तरह से अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता। यह अच्छा है निराशा के बावजूद अगर वे लोग हालात के बारे में सोच कर हंसते हैं। लेकिन सामान्य तौर पर मैं ऐसा करने वाले उन सभी भारतीयों से कहना चाहूंगा कि भविष्य में ऐसा ना करें। आप केवल ईमानदार होकर आसानी से इसे छोड़ सकते हैं। अपना वादा निभाइये।

भारत में यात्रा – सभी नकारात्मक पहलुओं के बावजूद देश और लोगों को प्यार करता हूँ – 2 नवम्बर 11

कल जब मैंने परोपकार के काम के बारे में लिखा था तब भारत में दुर्भाग्य वश होने वाली इस तरह की ठगी का जिक्र किया था। इसीलिए भी दूसरे देशों के लोग भारत में दान करने से हिचकते है – वे जानते हैं कि जिस देश में भ्रष्टाचार बहुत ही सामान्य चीज है वहां उनका पैसा कहां जाएगा। लेकिन सिर्फ दानदाता ही नहीं, भारत आने वाले यात्रियों को भी अनुभव होता है कि यहां के सभी लोग उतने ईमानदार नहीं हैं जितना वे दिखाई देते हैं। इस अनुभव से कई लोगों को निराशा होती है।

यह काफी सामान्य है कि आध्यात्मिक लोग योग विज्ञान के मूल देश का पता लगाने के लिए भारत आते हैं, उस देश में जिसके बारे में कहा जाता है कि हर कोने में आध्यात्मिकता वास करती है। जहां के लोगों के दिल जितने बड़े हैं उनमें उतना ही ज्यादा प्यार है। उन्हें भारतीय आध्यात्मिकता से बहुत अधिक उम्मीद होती है।

इसलिए वे यहां आते हैं और बनारस की यात्रा करते हैं, ये मान कर कि इस पवित्र तीर्थ स्थल में उन्हें कई ज्ञानी लोग मिलेंगे, आध्यात्मिकता और प्यार मिलेगा। जबकि बनारस खासतौर से इसलिए भी प्रसिद्ध है कि यहां के ज्यादातर लोग कपटी होते हैं, झूठ बोलते हैं और अपने फायदे के लिए दूसरों को ठगते हैं।

हालांकि ऐसा सिर्फ बनारस के साथ ही नहीं है। यात्री के तौर पर आपको पूरे भारत में हर कहीं सचेत रहना होगा क्योंकि यहां कई घोटाले सामने आते रहते हैं। सभी जानते हैं कि दुकानदार पर्यटकों से ज्यादा पैसे लेते हैं, कभी-कभी तो स्थानीय लोगों से लेने वाली रकम से कई गुना ज्यादा। ट्रैवल एजेंट भी ऐसे लोगों से बहुत ज्यादा रुपये ऐंठ लेते हैं, ये बता कर कि अब किसी ट्रेन या हवाई जहाज में टिकट उपलब्ध नहीं है और अगर टिकट चाहिए तो उन्हें उनके नेटवर्क का इस्तेमाल करना पड़ेगा। आपका टूर गाइड आपको महंगी दुकानों पर ले जाएगा और वहां से खरीदारी की सलाह देगा क्योंकि वहां आप जो कुछ भी खरीदेंगे, उस पर उन्हें कमीशन मिलेगा। नकली जौहरी नकली रत्न बेचते हैं, पंडित लोग समारोहों का दिखावा कर रहे होते हैं और एक भविष्य वक्ता आपको भविष्य बताता है। दवा बेचने वाले अपने ज्यादा फायदे के लिए डॉक्टर की लिखी दवा देने के बजाए आपको दूसरी दवाएं दे देंगे। और डॉक्टर ऐसे इलाज और जांच की सिफारिश कर देंगे जिनकी जरूरत नहीं होगी। लोग वादा करके नहीं निभाएंगे, टैक्सी और रिक्शे वाले सौ मीटर की दूरी तय करने के लिए आपको शहर में घुमाते रहेंगे। खाने का सामान बेचने वाले आपको एक्सपायर्ड सामान देंगे और आप मिनरल वाटर की बोतल में सामान्य टंकी से भरा हुआ पानी खरीद सकते हैं।

क्या इसमें कोई आश्चर्य की बात है कि लोगों को भारत से निराशा हो जाती है? वे बहुत ज्यादा आध्यात्मिकता की उम्मीद करते हैं, भरपूर ईमानदारी, सहानुभूति और प्यार की उम्मीद करते हैं… लेकिन बदले में धोखा खाते हैं, ठगे जाते हैं, उनसे झूठ बोला जाता है और लगातार उन्हें परेशान किया जाता है। ऐसे में कौन निराश नहीं होगा?

हाल ही में हमें अनुभव हुआ, दो व्यक्ति जो कि भारत घूमना चाहते थे और आश्रम भी आना चाहते थे। भारत में उतरने के बाद उन्होंने अपनी यात्रा की शुरूआत बनारस जाने से की। तीन दिन बाद उन्होंने हमें एक ईमेल भेजा, जिसमें लिखा था कि वे नहीं आ सकते। उन्होंने जो अनुभव किया था, वह बहुत ज्यादा निराश करने वाला था और उन्होंने वापस अपने देश जाने का फैसला कर लिया था।

इसीलिए भारत आने वाले यात्रियों को मेरी पहली सलाह यही है कि वे भारत में यात्रा के बारे में पढ़ लें ताकि आपको अंदाजा लग सके कि आप जितनी उम्मीद कर रहे हैं उसमें से कितना मिल सकता है। आपके योग शिक्षक ने क्या कहा या जो भी कुछ आपने किसी धार्मिक पुस्तक में पढ़ा है सिर्फ इसकी वजह से बहुत ज्यादा उम्मीदें मत रखें। भारतीय लोग धार्मिक होते हैं, आपने जो कुछ सुना है उसमें से बहुत कुछ यहां देखने को मिलेगा लेकिन ये कोई धरती पर गुलाबी बादलों वाला स्वर्ग नहीं है, ऐसा नहीं है कि भारत में हर कोई पूर्ण आनन्द में रहता है और सड़क पर चलने वाले हर किसी को गले लगा लेता है, जो भी ऐसा सोच कर यहां आएगा उसे निराशा ही हाथ लगेगी।

भारत में बहुत गरीबी है और ये भी एक वजह है कि पर्यटकों को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। लेकिन जब आप कुछ तैयारी करके और खुले दिमाग से आयेंगे तो पायेंगे कि पूरा देश ठगों से भरा हुआ नहीं है। यहां कई बहुत अच्छे लोग भी हैं, जो ईमानदार और आध्यात्मिक हैं, जो एक-दूसरे से प्यार करते हैं और जो आपके बारे में जानने को इच्छुक हैं और आपकी मदद करना चाहते हैं। आप पायेंगे कि लोग रास्ता खोजने में आपकी मदद करते हैं। और ऐसे समय में आपको सहायता मिलती है जब आपको उसकी जरा भी उम्मीद ना हो। आपको ठगों से सावधान रहने की जरूरत है लेकिन मदद करने वालों और प्यार करने वालों के लिए अपने दरवाजे खुले रखें। वैसी चीजें होती रहती हैं लेकिन उनसे बहुत ज्यादा निराश और हताश ना हों। अपनी यात्रा रोक कर एक दिन में ही वापस मत जाइये। भारत को एक मौका दीजिए। हम आपको यहां आमंत्रित करना चाहते हैं और आपको यहां की और यहां के लोगों की खूबसूरती और संस्कृति से रूबरू कराना चाहते हैं।

मैं आपको सिर्फ अपने घर और परिवार की गारंटी दे सकता हूं और मैं आपको भरोसा दिला सकता हूं कि यात्रा शुरू करने से पहले अगर आप ठहरने के लिए आश्रम का चुनाव करते हैं तो आप सुंदर संस्कृति से रूबरू हो सकेंगे। भारत आपको परिजनों के बीच स्नेह के बारे में, एक-दूसरे की मदद करने, आजादी और शांति से साथ रहने के बारे में सीखने का मौका देता है। आप पायेंगे कि कैसे दोस्त एक-दूसरे के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं और कैसे आप दूसरों को अपने परिवार का सदस्य बना लेते हैं जबकि उनके बीच खून का रिश्ता नहीं होता। भारत को इसके सभी कोणों से जानने के लिए तैयार रहें।

साथी नहीं, जीवनसाथी ढूंढिए – 19 नवम्बर 08

कोई भी व्यक्ति संबंध बनाने से पहले अपने भावी प्रेमी में कुछ खूबियों की तलाश में रहता है। वह चाहता है कि पृष्ठभूमि जिसमें सामने वाला पला – बढ़ा है उसकी तलाश के अनुकूल हो। भारत में जातिप्रथा की जड़ें बहुत गहरी है लिहाजा यह देखा जाता है कि वह किस जाति से संबंध रखता या रखती है। पश्चिमी देशों में लोग अभिजात्यता, बौद्धिक स्तर या शैक्षिक योग्यता को ध्यान में रखते हैं शायद। लोग चाहते हैं कि प्रेम उससे किया जाए जिसकी रुचियां और आदतें खुद से मेल खाती हों। आजकल लोग शारीरिक सौन्दर्य पर खास जोर देने लगे हैं। देहयष्टि , बाल और त्वचा की सुंदरता उनके लिए खास मायने रखती है। कहने का मतलब यह है कि एक संबंध को स्थापित करने से पहले कई तरह की शर्तें दिमाग़ में रहती हैं। गोया कि साथी नहीं कार या कपड़े खरीदने जा रहे हों। हम पर कौन सा डिज़ाइन फबेगा, किस रंग की कार ज्यादा सुंदर दिखेगी?

इसी कारण से अकसर सुनने में आता है कि फलां प्रेमसंबंध असफल हो गया। आननफानन में यह सब हो जाता है, चीज़ें हमारी काम की नहीं रह जातीं। दुनिया बड़ी तेज़ रफ्तार से आगे बढ़ रही है और हमारा दिमाग़ उससे भी ज्यादा तेज़ी से। सभी कुछ तेजी से बदल रहा है। वही वस्तु और वही व्यक्ति जिसे पाकर और जिसके साथ कभी आप खुशी से फूले नहीं समाते थे, थोड़ा समय बीतने के बाद वही सब कुछ नीरस लगने लगता है। मात्र छ्ह महीनों में ही हालात तब्दील हो गए और अब वही रिश्ता अपना आकर्षण खो बैठा है। बदलाव रिश्ते में नहीं आया है, बदलाव आया है रुचियों में, खूबियों में और मनोदशा में।

ऐसे संबंध का नाकामयाब होना लाजमी था क्योंकि यह एक ग़लत बुनियाद पर खड़ा हुआ था। दिमाग़ में एकसाथ कई चीज़ें चल रही थीं। यह रिश्ता हमारे प्रेम से प्रस्फुटित नहीं हुआ था। इसका जन्म हमारी ख्वाहिशों, उम्मीदों और कल्पनाओं से हुआ था। भ्रमजाल टूटा तो निराशा आनी स्वाभाविक थी। लोग एक दूसरे को जानने समझने के लिए न जाने कितने यत्न करते हैं, एक दूसरे से मिलते हैं और डेटिंग पर जाते हैं। एक दूसरे की रुचियों और आदतों को जानने की समझने में समय लगाएं। अपनी भावनाओं को बिना किसी झिझक के व्यक्त करें। प्रेम का रिश्ता कोई व्यापार नहीं है कि जिसमें किन्हीं शर्तों के तहत एक दूसरे को बांध दिया जाए। पहले से ही भावी प्रेमी या प्रेमिका के सौंदर्य और चालढाल के बारे में मापदंड निर्धारित न करें। भावों को निर्बाध रूप से बहने दें। उसके बाद यदि आप दोनों के बीच कुछ प्रस्फुटित होता है तो वह एक अटूट रिश्ता होगा।