आपका प्रत्यक्ष ज्ञान (ग्रहण-बोध) आपकी दुनिया को बदल देता है – 21 अक्टूबर 2015

मैंने हाल ही में लिखा था कि अपने आसपास की दुनिया को सकारात्मक रूप से देखना चाहिए लेकिन क्योंकि यह एक बहुत महत्वपूर्ण विषय है-विशेष रूप से, जब आप इस बात का विचार करते हैं कि बड़ी संख्या में लोग अवसाद और मानसिक तथा शारीरिक थकान से ग्रसित दिखाई देते हैं-मैं आज इसी विषय पर एक बार फिर कुछ विस्तार से लिखना चाहता हूँ। अपने आसपास की विसंगतियों के बीच अच्छाइयाँ तलाश करने के हुनर के बारे में!

यथार्थ को हम सब अलग-अलग नज़रिए से देखते हैं। किसी भी मनोवैज्ञानिक अध्ययन का यह मूल तत्व है: आपका कोई भी अनुभव दूसरे को भी वैसा ही अनुभव के बावजूद ठीक वैसा ही नहीं होता क्योंकि आपकी और उसकी पृष्ठभूमि अलग-अलग होती है। यहाँ तक कि जुड़वाँ बच्चों का ग्रहण-बोध भी भिन्न होता है क्योंकि वे अलग-अलग अनुभवों से गुज़रे होते हैं।

इस मामले में आपके लालन-पालन का तरीका एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। आपके अभिभावकों ने आपको किस तरह बड़ा किया, किन मूल्यों को वे ज़्यादा महत्व देते हैं और उन्होंने दुनिया को देखने का कौन सा नजरिया आपको दिया, इत्यादि? इन प्रश्नों के उत्तर, मुख्य रूप से, आपको यह बता देते हैं कि आप किस तरह दुनिया को देखते हैं।

आप पर दूसरा बड़ा प्रभाव होता है, आपकी संस्कृति का। जिस देश में आप रहते हैं, आपके आसपास के लोग जिन मूल्यों और जिन आदर्शों को साधारणतया मानते हैं। ये बातें आपके अभिभावकों द्वारा सिखाई गई बातों से अधिक व्यापक होती हैं और ये बातें आपके नज़रिए को एक ख़ास दिशा में मोड़ देती हैं और आपके यथार्थ को परिवर्तित करती हैं। रमोना और मैं इसे अक्सर देखते हैं और और कई मामलों में इसे घटित होता हुआ पाते हैं! ज़्यादा विस्तार में न जाते हुए अब खबरों को हम अपने-अपने भिन्न नज़रियों के अनुसार ग्रहण करते हैं क्योंकि हम लोग मूलतः इस धरती के भिन्न और सुदूर इलाकों के रहने वाले अलग अलग व्यक्ति हैं! निश्चय ही हर व्यक्ति अपने आप में अलग और विशिष्ट होता है लेकिन संस्कृति आप पर ऐसा गहरा प्रभाव डालती है, जिससे आप आसानी के साथ मुक्त नहीं हो सकते!

अंत में, एक क्षणिक स्थिति में, उस वक़्त जिस खास पल में आप व्यवहार कर रहे हैं, वह भी आपके आसपास होने वाली घटनाओं के बारे में आपके ग्रहण-बोध को प्रभावित करता है। मैं कुछ उदाहरण आपके सामने रखता हूँ: गर्भवती होने की इच्छा रखने वाली या स्वयं कोई गर्भवती महिला अचानक अपने आसपास मौजूद गर्भवती महिलाओं को दूसरों से ज़्यादा नोटिस करने लगती है। वे पहले भी उसके आसपास मौजूद थीं-लेकिन अब वह उन्हें नोटिस करती है क्योंकि वह स्वयं उसी स्थिति से गुज़र रही है और उसका मन उसी बात पर लगा हुआ है!

मान लीजिए अगर आप अपने काम में व्यस्त हैं और अधिकतर काम के बारे में ही सोचते रहते हैं और आपके पास इस बात की फुर्सत नहीं है कि अपने शहर की सुंदरता को देख सकें, उसका आनंद ले सकें या इस बात का आपको पता नही हो पाता कि आपके आसपास के लोग क्या कर रहे हैं। यह सब पहले भी मौजूद था लेकिन जब आपका काम पूरा हो जाता है और आपको उन्हें देखने का अवसर मिलता है तो आपको लगता है, जैसे आप उन्हें पहली बार देख रहे हैं!

जब आप पहले-पहल प्रेम में पड़ते हैं तो सारी दुनिया आपको खूबसूरत, शानदार, आश्चर्यजनक और अत्यंत सुखद नज़र आती है! आपको लगता है, आपके आसपास का हर शख्स सुंदर और भला है और दुनिया में प्रेम के सिवा कुछ भी नहीं है।

लेकिन जब आप मुश्किल में होते हैं तो आपको अपने चारों ओर बुरी चीजें ही दिखाई देती हैं। क्योंकि आप बुरे विचारों से घिरे हुए हैं, आपको कोई चीज़ सुंदर नज़र ही नहीं आती!

मैं इनकी ओर इशारा क्यों कर रहा हूँ? मेरे ख़याल से यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि आपके पास एक और संभावना भी मौजूद है! कि आप दूसरे नज़रिए से भी चीजों को देख सकते हैं! आपको अपने सोचने की दिशा में परिवर्तन करना होगा और आप देखेंगे कि चीज़े तुरंत, उसी समय से ठीक होना शुरू हो गई हैं!

अपने अंदर गहरे जड़ जमाए बैठे मूल-तत्वों को और उन अनुभूतियों को दरकिनार करना वास्तव में बहुत मुश्किल होता है। हालाँकि यह संभव है! लेकिन आपको इसी से शुरुआत करने की ज़रूरत नहीं है-निश्चित ही चीजों को देखने के तरीके को बदलने के काम को आप अपनी वर्तमान परिस्थितियों के मुताबिक़ क्रमशः, धीरे-धीरे शुरू कर सकते हैं! जब आपके विचार नकारात्मक दिशा में गमन करने लगें तो उन पर लगाम लगाने का प्रयास कीजिए और अपने आपको बताइए कि यह सिर्फ इसलिए है कि इस समय आपका ग्रहण-बोध नकारात्मक है! आप भी अलग तरह से सोच सकते हैं! सोचने का एक अलग तरीका निर्मित करने भर की ज़रूरत है!

मुझे लगता है कि यह महत्वपूर्ण है-क्योंकि यह आपको एक पूर्णतया नई सकारात्मकता से भर देगा, आपको शान्ति और सुकून का अनुभव होगा। दरअसल वह आपको अधिक खुशनुमा जीवन की ओर अग्रसर होने में मदद करेगा!

ध्यान कैसे करें-एक ऐसी चीज़ का मार्गदर्शक (गाइड) जिसके लिए मार्गदर्शन की ज़रूरत ही नहीं है- 14 नवंबर 2013

कल मैंने कहा था कि सभी व्यक्ति ध्यान कर सकते हैं। आज मैं उसी बात को ज़रा विस्तार देते हुए ध्यान के संबंध में कुछ हिदायतें और सलाहें देना चाहता हूँ। बात अनोखी लगती है, न? लेकिन मैं मानता हूँ कि विचारशून्यता ध्यान करने का सही लक्ष्य नहीं है और फिर ध्यान आप इसलिए नहीं करते कि आप किसी असंभव लक्ष्य को प्राप्त कर सकें। लेकिन संभव है, कुछ लोग ऐसे भी हों, जो सोच रहे होंगे कि "किसी क्रिया में पूरी तरह उपस्थित" होने का अर्थ क्या है और उसे कैसे हासिल किया जा सकता है।

मेरे विचार में विचारशून्यता प्राप्त करना असंभव है इसलिए उस स्थिति को प्राप्त करने का प्रयास ही व्यर्थ है। लेकिन किसी खास वक़्त पर "अपने काम में पूरी तरह उपस्थित" रहने के लिए आपको आसपास के सारे शोर को अपने कानों से दूर रखना होगा। आपके भीतर प्रवेश करने वाली चीजों को कम से कमतर रखने का प्रयास करना होगा और इसका अभ्यास करना होगा कि आपके मस्तिष्क को अधिकांश बातों का विश्लेषण करने की आवश्यकता ही न पड़े। अपने मस्तिष्क को सिर्फ एक काम पर एकाग्र करने का प्रयास करें। सभी विचार उसी एक काम के विषय में हों। अब आप इन विचारों के विषय में लगभग अनभिज्ञ रहेंगे क्योंकि वे आपके काम के साथ इस तरह घुलमिल जाएंगे कि आप उस काम पर बेहतर तरीके से एकाग्र हो पाएंगे और सहज ही आपकी रचनात्मकता बढ़ जाएगी तथा थकावट भी नहीं होगी।

क्या आपको इसमें कोई दिक्कत महसूस हो रही है? अगर हो रही है तो आश्चर्य नहीं है क्योंकि जैसा मैं बता रहा हूँ, अधिकांश लोग अपने व्यस्त दैनिक जीवन में उससे बिलकुल विपरीत कर रहे होते हैं। उनके दिमाग में हर वक्त एक साथ कई काम घूमते रहते हैं! विभिन्न विषयों पर कई माध्यमों से आने वाली जानकारियों को ग्रहण करना महत्वपूर्ण होता है, इन सभी जानकारियों को एक साथ विश्लेषित कर पाने की ऊंची कीमत है और जितनी कुशलता से विभिन्न जगहों से आती हुई इन जानकारियों को आपका मस्तिष्क ग्रहण और विश्लेषित कर पाता है उतना ही आपको प्रतिभाशाली माना जाता है। लेकिन, दरअसल ऐसी परिस्थिति में ही आपको "किसी क्रिया में पूरी तरह उपस्थित" हो पाने की इस योग्यता की आवशयकता पड़ती है! अगर आप समझते हैं कि आपको इसके अभ्यास के लिए कुछ व्यायामों की आवश्यकता है तो मैं नीचे कुछ व्यायाम बता रहा हूँ, जिन्हें अपने सेमीनारों और कार्यशालाओं के जरिये मैंने दुनिया भर में सफलतापूर्वक आजमाया है:

एक पेन और कागज लें और एक अलार्म क्लॉक को तीन मिनट के लिए सेट कर दें। अब उन तीन मिनटों में जो भी विचार आपके मन में आ रहे हैं, उन्हें संक्षिप्त में (keywords में) नोट करते जाएँ। इस बात का विचार बिल्कुल न करें कितने विचार आने चाहिए और कागज पर पूरे-पूरे वाक्य लिखने की ज़रूरत नहीं है, उनके पहले शब्द या अक्षर भी पर्याप्त होंगे, जिनसे आप बाद में उन विचारों को याद कर सकेंगे। तीन मिनट बाद रुक जाएँ।

इस लिस्ट पर नज़र दौड़ाने पर आप पाएंगे कि शायद आपके मस्तिष्क में एक साथ बहुत ज़्यादा विचार आते हैं! अधिकतर बिल्कुल गैरज़रूरी होते हैं और आपकी लिस्ट ऐसी नज़र आती होगी: पार्टनर (जीवन-साथी), बच्चे, बढ़िया सप्ताहांत, टमाटर सौस के धब्बे, काम, बर्तन धोने का साबुन, पिछड़ गई योजनाएँ, धोने वाले कपड़ों का अंबार, पड़ोसी की बिल्ली…. और मच्छर!…

इनमें से उन्हें काट दें जो बिल्कुल गैरज़रूरी विचार हैं और सिर्फ दस महत्वपूर्ण विषयों को विचार करने के लिए रखें। इसी खेल को फिर दोहराएँ और अब सिर्फ इन्हीं दस विचारों पर अपने ध्यान को केन्द्रित करने की कोशिश करें-मस्तिष्क पर नियंत्रण रखने की कोशिश करें कि वे इधर-उधर भटकने न पाए। क्या कुछ बात बनी? अब फिर से कम महत्वपूर्ण पाँच विषयों को बाहर करें और बचे हुए पाँच पर ध्यान केन्द्रित करने का प्रयास करें। इसी प्रक्रिया को तब तक दोहराएँ जब तक आपके पास सोचने के लिए सिर्फ एक विषय ही न रह जाए! तब आप "अपने काम में पूरी तरह उपस्थित" होंगे!

स्वाभाविक ही यह व्यायाम आप शांतिपूर्वक एक स्थान पर बैठकर करेंगे, ध्यान के लिए जिसकी अनिवार्यता मैंने पहले ही खारिज कर दी है। लेकिन एक बार इस तरह एकाग्र होकर, ध्यान भंग करने वाले विचारों को दूर रखने का अभ्यास हो जाने पर आप यही चीज़ खाना बनाते हुए या टहलते हुए या मित्र के साथ बात करते हुए भी कर सकते हैं। पुस्तक पढ़ते समय बरतन धोने के साबुन का विचार मन में न आने दें! फिर साबुन खरीदते समय उस पुस्तक का विचार न करें! यह सुनिश्चित करें कि जब आप पढ़ें तो पूरी सजगता के साथ पढ़ें-तब आप पुस्तक ज़्यादा आनंद उठा पाएंगे! और जब ख़रीदारी करें तो पूरी सजगता के साथ ख़रीदारी करें-इससे आप भूलेंगे नहीं कि आपको क्या-क्या चीज़ें खरीदनी है और आपको बार-बार बाज़ार नहीं जाना पड़ेगा! वह आनंददायक होगा क्योंकि आप "उस क्रिया में पूरी तरह उपस्थित" होंगे!

कोशिश कीजिए, आप नोटिस करेंगे कि इस उपाय से सफलता मिलती है। ध्यान करने का यह तरीका समय का बेहतर उपयोग करने में आपकी मदद करता है, आप उस पल को महसूस कर सकेंगे और देखेंगे कि काम कोई भी हो, आप उसमें बहुत एकाग्रता के साथ प्रवेश कर पा रहे हैं!

ध्यान-योग कोई रहस्य नहीं है लेकिन परेशानी यह है कि आप ऎसी चीज़ नहीं बेच सकते, जो सबको उपलब्ध हो-13 नवंबर 2013

मुझे अंदेशा है कि मेरे कल और परसों के ब्लोगों को पढ़कर मेरे कुछ पाठक संशय में पड़ गए होंगे। वे सोच रहे होंगे कि पहले मैंने अपना गुरु का जीवन त्यागा, फिर धर्म त्यागा और नास्तिक हो गया और अब ध्यान और योग के विरुद्ध भी लिखना शुरू कर दिया है! मैं ज़ोर देकर कहना चाहता हूँ कि ऐसी बात बिल्कुल नहीं है! जिस तरह ध्यान का प्रचार किया जाता है, उससे मेरी असहमति है। ऐसा ज़ाहिर किया जाता है कि ध्यान कुछ विशेष, चुने हुए आध्यात्मिक लोगों के लिए ही है, जबकि मैं यह सलाह देता रहता हूँ कि सभी इसे करें। मैं स्वयं इसे पसंद करता हूँ लेकिन मेरे लिए इसकी परिभाषा बिल्कुल भिन्न है! मैंने कुछ ब्लॉग भी ध्यान-योग के संबंध में लिखे हैं, जिसमें मैंने स्पष्ट किया है कि मेरे लिए ध्यान का अर्थ क्या है। आज भी उसी संबंध में यह ब्लॉग लिख रहा हूँ।

सबसे पहले मैं एक वाक्य में यह परिभाषा दे रहा हूँ: अंग्रेज़ी में मेडिटेशन, हिन्दी और संस्कृत में ध्यान वह अभ्यास है, जिसमें आप पूरी तरह वर्तमान में होते हैं, 100% जाग्रत होते हैं, हर तरह से वाकिफ कि आप क्या कर रहे हैं।

कभी भी मैं यह नहीं कहता कि ध्यान का लक्ष्य विचारशून्यता है। मैं यहाँ तक मानता हूँ कि ध्यान का अभ्यास करने के लिए आपको किसी खास आसन में बैठने की आवश्यकता नहीं है और न ही किसी विशेष श्वसन तकनीक या किसी और चीज़ की। आप अपना काम करते हुए भी ध्यानस्थ हो सकते हैं या बातचीत, चित्रकारी करते हुए या खेलते हुए और यहाँ तक कि संभोग करते हुए भी! आपको उस वक़्त पूरी तरह वहाँ होना चाहिए, वर्तमान में; भविष्य में नहीं और न अतीत में। उस क्रिया में पूरी तरह उपस्थित, बस यही मेरे लिए ध्यान है।

मुख्य बात यह है कि हर कोई ध्यान कर सकता है! आपको विशिष्ट होने की ज़रूरत नहीं है! यह सभी के लिए सहज सुलभ है और किसी भी वक़्त। ध्यान के लिए वर्षों के अभ्यास की आवश्यकता नहीं है और न ही आपमें किसी कलात्मक प्रतिभा का होना आवश्यक है। यह कोई जटिल क्रिया नहीं है और इसे करने के लिए आपको किसी लॉरी को दांतों से खींचने या लोहे की राड को हाथों से मोड़ने का करिश्मा दिखाने की ज़रूरत नहीं है! आप, जी हाँ आप भी इसे कर सकते हैं!

अब यह बताएं कि क्या यह अच्छा नहीं होगा कि आप जानें और आपका पड़ोसी न जाने? उसमें कुछ रहस्य या पेचीदगी हो तो क्या वह ज़्यादा रोचक नहीं हो जाएगा? यही वह विचार है जिसे गुरु और ध्यान का व्यापार करने वाले पसंद करते हैं और रुपया कमाते हैं! वे चाहते हैं कि आप न सिर्फ कुछ खास बल्कि अपने आसपास के लोगों से बेहतर महसूस करें और इसलिए वे ध्यान को कुछ विशिष्ट और जटिल बनाकर पेश करते हैं!

उनका यह व्यवहार, दरअसल, आपके अहं को बढ़ाने के लिए होता है न कि उसे कम करने के लिए! तो, जब आप पंद्रह मिनट तक ध्यान करते हैं तो आप चेतना की उच्च अवस्था में होते हैं! तो, आपको पहले वहाँ जाना पड़ता है और फिर एक खास मुद्रा में आसन लगाना होता है, आपको एक विशिष्ट वातावरण चाहिए और आप उसे धीरे-धीरे बढ़ाते हुए एक घंटे तक कर सकते हैं! फिर दिन के बचे हुए 23 घंटे आपकी चेतना कहाँ मंडराती रही? नीचे ज़मीन पर, अलसाई हुई, जैसे बाकी सभी लोगों की चेतना पड़ी होती है? इसलिए आप इस एक घंटे तक खुद को विशिष्ट समझने लगते हैं और अपने भीतर शांति का अनुभव करते हैं, व्यापक ब्रह्माण्ड के साथ एकाकार! लेकिन आप सारा दिन आनंद की उसी अवस्था में क्यों नहीं रह सकते?

जी हाँ, आप ध्यानस्थ होकर भी दिन के 24 घंटे अपना काम कर सकते हैं, खेल सकते हैं, किताब पढ़ सकते हैं और जो मर्ज़ी हो, वह कर सकते हें। आपको बिना एक स्थान पर बैठे, बिना विचारशून्यता को प्राप्त किए, लगातार आनंदमग्न रहना चाहिए!

स्वाभाविक ही, कोई गुरु आपको इतना बड़ा रहस्य नहीं बताएगा अन्यथा वे उस आश्चर्य मिश्रित प्रशंसा से वंचित हो जाएंगे, जो आपसे उन्हें प्राप्त होती है। ऐसा करने से उनका धंधा चौपट हो जाएगा! लेकिन सच्चाई यही है कि आप भी ध्यान कर सकते हैं। आपको सिर्फ सजग रहना है, चैतन्य रहना है, विचारशून्य नहीं!