भारतीय क्यों सोचते हैं कि बच्चों को अपने अभिभावकों से डरना चाहिए? 8 दिसंबर 2015

हमारे स्कूल के बच्चों की छमाही परीक्षाएँ शुरू हो गई हैं। वे पढ़ाई में बहुत व्यस्त हैं, उत्साहित हैं कि परीक्षा में किसी तरह उनके सारे सवाल सही हों और इंतज़ार कर रहे हैं कि कब अगले दो सप्ताह बीतेंगे और परीक्षाएँ समाप्त होंगी। एक दिन अगली परीक्षा के लिए रमोना आश्रम में ही रहने वाले एक बच्चे, प्रांशु को पढ़ा रही थी कि एक पुस्तक पलटते हुए उसकी नज़र इस सवाल पर पड़ी: 'घर में आप सबसे ज़्यादा किससे डरते हैं?' उसे विश्वास नहीं हुआ कि ऐसा प्रश्न भी किसी पाठ्य पुस्तक में हो सकता है!

‘नैतिक शिक्षा’ विषय का यह प्रश्न था। अधिकतर हमें यह विषय बच्चों के लिए काफी उपयोगी और महत्वपूर्ण लगता है। यह विषय उन्हें समझ प्रदान करता है कि एक-दूसरे के साथ कैसा सुलूक किया जाना चाहिए और अपने पर्यावरण और खुद अपने आप के प्रति आपका रवैया कैसा होना चाहिए। पाठ हैं, जिनमें नम्रता सिखाई जाती है और दूसरों का आदर करने की शिक्षा दी जाती है। कुछ पाठों में काम की महत्ता दर्शाई जाती है और यह भी कि कैसे कक्षा में अपने विवादों को मिलजुलकर सुलझाना चाहिए। इस विषय की एक ही समस्या है कि पाठ्य पुस्तक और शिक्षक भी अनिवार्य रूप से पाठों पर बहुत सी मनगढ़ंत बातें भी सिखाने लगते हैं और उन बातों से मैं हमेशा सहमत हो जाऊँ यह मुमकिन नहीं हो पाता।

प्रस्तुत प्रकरण में उस पुस्तक का एक पाठ बच्चों को यह बताता है कि घर का हर सदस्य महत्वपूर्ण है। दादा-दादी इसलिए कि वे आपको अपने संस्मरण सुनाते हैं, माता-पिता इसलिए कि दोनों बाहर जाकर काम करते हैं और पैसे कमाते हैं और बच्चे भी, इसलिए कि वे भी घर के कामों में मदद कर सकते हैं और बड़े-बूढ़ों की सहायता कर सकते हैं। यहाँ तक ठीक है। लेकिन उसके बाद प्रश्नावली में इस तरह के प्रश्न हैं, जिनके उत्तर बच्चों को अपनी परिस्थितियों और अनुभव के आधार पर लिखने हैं: आपके परिवार में कितने सदस्य हैं?, आपके घर में होमवर्क कौन करता है? इत्यादि।

और उसके बाद यह प्रश्न: 'घर में आप सबसे ज़्यादा किससे डरते हैं?'

भारत के घरों की स्थिति के बारे में जो बात मैं हमेशा से लिखता रहा हूँ, यह पाठ और यह प्रश्न उसे पूरी तरह सही ठहराता है: अर्थात, भारतीय घरों में हिंसा होती है और डर भी व्याप्त होता है! अभिभावक सोचते हैं कि उनके बच्चे तभी उनकी बात मानते हैं जब उनके मन में डर होता है। अगर उन्हें शिष्टाचार और सदाचार सिखाना है तो उन्हें डराकर रखा जाना ज़रूरी है। अगर वे नहीं डरते तो उनकी पिटाई भी होती है। और अंत में…उपरोक्त प्रश्न का आदर्श उत्तर क्या होना चाहिए? स्वाभाविक ही: पिता!

माँएँ, चाचियाँ और दादा-दादियाँ सारा दिन घर के बच्चों को इसी तरह धमकाती रहती हैं: 'आने दो तुम्हारे पिताजी को!' या, 'तुमने कहना नहीं माना तो पिताजी से शिकायत कर दूँगी!' स्वाभाविक ही इन धमकियों में शारीरिक सज़ा का पूरा इंतज़ाम होता है!

आखिर कब भारतीय पिता अपने बच्चों के साथ एक स्वस्थ संबंध विकसित कर पाएँगे? वह दिन भर घर में नहीं रहता, उसे पैसे कमाने बाहर निकलना ही पड़ता है और जब वह घर आता है तो उससे अपेक्षा की जाती है कि वह दिन भर तजवीज की गई सज़ाओं को एक जल्लाद की तरह अंजाम देगा! आप बच्चों के मन में क्या भरना चाहते हैं?

एक पिता के रूप में मुझे यह बड़ा भयानक लगता है और मेरे परिवार में कोई ऐसी बात मेरी बेटी से पूछने की कल्पना भी नहीं कर सकता। हमारे यहाँ शिक्षा में डर के लिए कोई जगह नहीं है-लेकिन ज़्यादातर भारतीय परिवारों में यही स्थिति पाई जाती है और इसलिए स्कूलों में भी, किताबों में भी!

लेकिन हमारे स्कूल में हमने यह सुनिश्चित कर लिया है कि पाठ्य पुस्तकों से इस प्रश्न को हटा दिया जाए और यह भी कि शिक्षक भी जानें कि हमने ऐसा क्यों किया है: क्योंकि बच्चों को डरना नहीं बच्चों को उनके घर तथा स्कूल में सबसे सुरक्षित वातावरण प्राप्त होना चाहिए और उनके अभिभावक और शिक्षक उनसे प्रेम करते हैं और उन्हें खुश देखना चाहते हैं।

संबंधों में आने वाली कठिनाइयों के समय मानसिक संतुलन न खोना – 27 अक्टूबर 2015

हमारी सभी समस्याएँ पैसे से संबंधित नहीं होती। कल के ब्लॉग में मैंने मुख्य रूप से सिर्फ उन समस्याओं पर अपने विचार व्यक्त किए थे जो व्यापार और वित्त से जुड़ी होती हैं लेकिन निश्चित ही कुछ दूसरी समस्याएँ भी होती हैं जो कभी-कभी आर्थिक समस्याओं से भी अधिक मुश्किल नज़र आती हैं: दोस्तों, रिश्तेदारों और सबसे बढ़कर, अपने जीवन साथी जैसे दूसरे लोगों के साथ संबंधों में पैदा होने वाली समस्याएँ या खटास! इन समस्याओं से कैसे निजात पाएँ?

पहली बात तो यह कि वही पुराना सिद्धांत यहाँ भी लागू होता है: कोई कदम उठाने से पहले समस्या पर शांत-चित्त होकर विचार करें। स्वाभाविक ही, किसी प्रियकर के साथ कोई कलह, कोई असहमति वाली बात या कोई वाद-विवाद, मतभेद या झड़प आपको बुरी तरह विचलित कर सकते हैं। आप बुरी तरह क्रोधित हो सकते हैं या आपको ऐसा लग सकता है कि आपका संसार टूटकर बिखर गया है, आपकी आँखों से आँसू निकल सकते हैं और विषाद से आप थर-थर काँपने लग सकते हैं। आप सोच सकते हैं कि आपकी बात सही थी या आप खुद अपनी करनी पर पछता रहे हो सकते हैं लेकिन फिर भी इससे आगे विचार करने से पहले या अगली कार्यवाही करने से पहले आपको अपनी भावनाओं पर काबू करते हुए अपना मानसिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए।

इसका अर्थ यह नहीं है कि आप सामने वाले के प्रति कोई कोई सहानुभूति न रखें या यही भूल जाएँ कि उसने आपके साथ कोई बुरा व्यवहार किया है! बल्कि इसका अर्थ यह है कि आप अपनी भावनाओं को समझने की कोशिश कर रहे हैं और जानते हैं कि उसका उद्गम क्या है। इसका विश्लेषण करें: आपके मन में इस तरह की भावनाएँ पैदा होने का मूल कारण क्या है? क्या सामने वाले की कोई बात इसका कारण है? या आपके किसी व्यवहार के चलते ऐसा हुआ है? आपको ऐसा क्यों महसूस हो रहा है? क्या वाकई ऐसा व्यवहार आपकी ओर से या सामने वाले की ओर से हुआ है या यह महज आपकी कल्पना है, जो आपको परेशान कर रही है?

मैं खुद भी बहुत भावुक व्यति हूँ लेकिन जबकि कुछ लोगों के लिए यह दिमागी प्रक्रिया बहुत जटिल और कष्टदायी लग सकती है, मेरा मानना है कि समस्या की जड़ तक पहुँचने के लिए कभी-कभी ऐसी पहेलियों से जूझना ही पड़ता है। अगर मैं इतना भावुक हूँ कि मुझे यह भी पता नहीं चल पाता कि मेरी भावनाएँ ऐसी क्यों है तो यह मेरे व्यवहार में भी व्यक्त हो सकता है।

अपने गुस्से पर काबू में न रख पाने के कारण लोग बड़े भयानक और हास्यास्पद अपराध कर बैठते हैं। बाद में अक्सर ऐसा होता है कि उन्हें समझ में भी नहीं आता कि ऐसा उन्होंने क्यों किया! वे क्रोधित थे-लेकिन गुस्सा उतरने पर वे अच्छी तरह जान रहे होते हैं कि उनका व्यवहार कतई तर्कसंगत और न्यायोचित नहीं था। कि किसी दुख या पीड़ा के चलते उन्हें क्रोध आया था, यह सही है लेकिन सामने वाला बेचारा यह भी नहीं जानता होगा कि उनकी पीड़ा का जिम्मेदार वह है।

इसलिए, अगर आपको पता चल जाए कि आप वैसा क्यों महसूस कर रहे हैं तो आप उस समस्या का समाधान निकाल सकते हैं।

अगर आपसे कोई गलती हुई है और अब आपको पछतावा हो रहा है तो मेरे खयाल से तुरंत माफी मांग लेनी चाहिए। लेकिन सामने वाले से आप यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि हर हाल में वह आपकी माफी स्वीकार कर ही ले लेकिन आपके लिए यह कदम उठाना और खुद अपने आपको यह तसल्ली देना कि आपसे गलती हुई थी और आपने माफी मांगली, उचित ही होगा। क्योंकि भले ही सामने वाले ने माफ नहीं किया लेकिन आपने कोशिश तो की। और इतना करने के बाद आप अपने मन में शांति का अनुभव करेंगे और प्रकरण को वहीं विराम देकर आगे बढ़ सकेंगे।

यदि सामने वाले ने आपके साथ कोई दुर्व्यवहार किया है, तब आपके पास मौका होता है कि आपको इस विषय में क्या करना चाहते हैं। आप उसके सामने अपनी भावनाएँ रख सकते हैं या यह तय कर सकते हैं कि आप इस विषय में आगे क्या करेंगे। ऐसी स्थिति में आपके पास क्रोध के आवेश में व्यक्त क्षणिक व्यवहार के अलावा अपने मन की वास्तविक भावनाओं के अनुरूप व्यवहार करने का मौका होता है।

अंत में यही कि कुछ भी हो, संदेश एक ही है: कोई भी समस्या सामने हो, आपका संसार टूटकर बिखरने वाला नहीं है। शांत बने रहें और इस बारे में विचार करें कि आप इस विषय में क्या कर सकते हैं!

समस्याओं के प्रति आपका रवैया-आप उनसे घबराते हैं या उनका डटकर मुकाबला करते हैं? 26 अक्टूबर 2015

आपका देश, आपकी संस्कृति और आपके आसपास का का समाज आपको प्रभावित करते हैं। मुझे लगता है, हम सभी इस बात पर सहमत होंगे। पिछले हफ्ते मैंने बताया था कि कैसे हमारी परवरिश और परिवेश के अनुसार हम सभी का ग्रहणबोध अलग-अलग होता है। क्योंकि यहाँ, आश्रम में विभिन्न देशों के बहुत से लोग आते रहते हैं, हम चीजों और परिस्थितियों को ग्रहण करने के उनके विभिन्न नज़रियों को अक्सर नोटिस करते हैं। और समस्याओं का सामना होने पर उनके व्यवहार में दिखाई देने वाले मूलभूत अंतर को भी। विशेष रूप से यह पहलू मुझे बड़ा रोचक लगता है और मुझे इसका सबसे प्रमुख और निर्णयात्मक असर डालने वाला कारण यह नज़र आता है: आप किसी धनी मुल्क में, संपन्न परिवेश में रहकर बड़े हुए हैं या आर्थिक कठिनाइयों से जूझते हुए देश में!

जब आपके सामने कोई बड़ी समस्या पेश आती है तब आप क्या करते हैं? इसकी कई संभावनाएँ हो सकती हैं-आप घबराकर थर-थर काँपने लगें कि अब क्या होगा और हो सकता है, आप बुरी तरह अवसादग्रस्त हो जाएँ। यह भी हो सकता है कि आप हिम्मत बांधकर, शांत मन से समस्या के बीच से गुज़रते हुए कोई न कोई रास्ता निकाल लें और कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करें। कुछ लोग समस्याओं को छिपाने की और उनसे बचकर निकलने की कोशिश और उनकी उपेक्षा करते हैं, उनकी ओर से आँखें मूँद लेते हैं, जैसे समस्या मौजूद ही न हो- लेकिन इससे परिस्थितियाँ कतई ठीक नहीं होतीं।

तो आपकी प्रतिक्रिया के पीछे मुख्य रूप से दो ही भावनाएँ होती हैं: या तो आप डर जाते हैं या नहीं डरते।

और जबकि मैंने बहुत से विभिन्न लोगों में दोनो तरह की प्रवृत्तियाँ देखी हैं, मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि उन देशों में जहाँ आर्थिक सुरक्षा की स्थिति बेहतर है, जो अधिक विकसित हो चुके हैं और प्रथम विश्व का हिस्सा हैं, वहाँ के लोगों में भयभीत होने की प्रवृत्ति उतनी ही अधिक पाई जाती है।

इसका कारण, हालाँकि बड़ा विचित्र लगता है, परन्तु पर्याप्त समझ में आने वाला है! इन देशों में ज़्यादातर लोग सुख-संपन्नता में जीवन बिताते हैं। उनके लिए कभी भी, जब इच्छा हो या ज़रूरत हो, बाज़ार जाकर सामान खरीद लाना बहुत सहज होता है। संभव है, वे रोज़ माल जाकर नई-नई महंगी चीज़ें न खरीद पाते हों लेकिन सामान्य रूप से किसी के सामने यह परिस्थिति नहीं आती कि वाकई कोई सख्त जरूरत हो और न खरीद सकें और उनके आसपास भी ऐसे लोग बिल्कुल नज़र नहीं आते। यह एक वास्तविकता है कि वहाँ बहुत से लोगों ने कभी कोई नुकसान भी नहीं झेला होता।

और इसीलिए उन लोगों के मन में हर बात में यह प्रश्न उपस्थित हो जाता है कि ऐसा होने पर न जाने कौन सी मुसीबत आए या ऐसा करूँगा तो पता नहीं उसका क्या नतीजा हो! उनके दिमाग में एक के बाद एक डरावने दृश्य आते रहते हैं और हर वक़्त वे यही सोचते रहते हैं कि भविष्य में क्या होगा और इसलिए उन्हें हमेशा ज़रा सी हलचल पर भी भूचाल का अंदेशा होने लगता है।

उन मुल्कों में जहाँ गरीबी व्याप्त है, लोग हर पल अपने आसपास संघर्ष देखते हैं और इसलिए उन्हें सामान्य परेशानियों और कठिनाइयों का डर नहीं सताता। इसका अर्थ यह नहीं कि वे उन्हें पसंद करते हैं लेकिन वे उन्हें अधिक तर्कसंगत तरीके से देखते-समझते हैं और ज़्यादातर मामलों में उन्हें जीवन-मृत्यु का प्रश्न नहीं बना लेते- अर्थात वे सोचते हैं कि, ऐसा हो भी जाए तो भूखों मरने की नौबत तो नहीं आने वाली है! संघर्ष उन्हें सहज रूप से स्वीकार्य होता है और यह संघर्ष उन्हें समस्याओं से पार लगाता है। यह एक ऐसा वैचारिक (भावनात्मक) सुरक्षा-कवच है जो उन्हें सुकून प्रदान करता है।

वास्तविकता समझें: ज़्यादातर समस्याएँ ऐसी नहीं होतीं कि उनसे आपके जीवन में विराम की स्थिति पैदा हो या आपकी दुनिया टूटकर बिखर जाए या आप मौत के मुँह में पहुँच जाएँ। तो भले ही आपकी पृष्ठभूमि आपसे कहती रहे कि इन समस्याओं के सामने आप लाचार हैं, आप इस प्रवृत्ति पर काबू पाएँ और तब आप देखेंगे कि समस्या थी ही नहीं या तब आपको पता चलेगा कि आप उनके बीच से गुजरकर सुरक्षित निकल आए हैं!

खुद अपने आप पर भरोसा करें: आप परिवर्तन ला सकते हैं और उनसे लाभ भी उठा सकते हैं – 25 मार्च 2015

कल मैंने बताया था कि अगर आप प्रसन्न रहना चाहते हैं तो आपको परिवर्तनों को स्वीकार करते हुए जो भी नई परिस्थितियाँ निर्मित हों, उनके अनुसार ही चलना होगा। स्वाभाविक ही कल की चर्चा उन बाहरी परिवर्तनों के बारे में थी, जिनके प्रति आपको लचीला रवैया अपनाना होगा। आज मैं एक और प्रकार के परिवर्तन के बारे में लिखना चाहता हूँ: वह, जिसका कारण आप स्वयं होते हैं; वह, जो आपके भीतर से आता है!

यह और बात है कि आपको बाहर से आने वाले परिवर्तनों के प्रति लचीला रवैया अपनाना चाहिए। इसमें बड़ी सक्रियता की ज़रूरत होती है लेकिन मुझे गलत मत समझिए, एक और परिस्थिति होती है जो इससे भी ज़्यादा कठिन लगती है: अपने भीतर हो रहे परिवर्तनों को स्वीकार करना और अपनी तरफ से ऐसे कदम उठाना, जो आपके जीवन में इन परिवर्तनों को क्रियान्वित कर सकें। आपके भावनात्मक और मानसिक परिवर्तनों को अमली जामा पहना सके। उन रास्तों पर चलने की हिम्मत पैदा कर सके, जिन पर दूसरे नहीं चलते। उन जगहों की यात्रा करने की इच्छा पैदा कर सके, जहाँ जाने के बारे में आपके आसपास के लोग सोच भी नहीं सकते और आपने भी तब तक नहीं सोचा था।

आप ऐसा क्यों नहीं करते? आप डरते हैं। किस बात से डरते हैं? इस बात से कि उस रास्ते को छोड़कर, जिस पर इतने सारे लोग चल रहे हैं, कहीं आप गलत काम तो नहीं कर रहे हैं? आपको शक है, आपमें विश्वास की कमी है।

जी हाँ, इसीलिए मेरा मानना है कि भारत में लोग आसानी के साथ परिवर्तनों को स्वीकार कर पाते हैं और ज़्यादा लचीले हैं: वे विश्वास करते हैं।

औसत पश्चिमी समाज यह सिखाने पर कोई ज़ोर नहीं देता कि विश्वास कैसे किया जाए! वह आपको दूसरी बहुत सी बातें सिखाता है लेकिन उसका सबसे मुख्य फोकस होता है, सुरक्षा। हर समय आपको मालूम होना चाहिए कि आप कहाँ जा रहे हैं, बाकायदा कोई योजना बनाकर ही कहीं निकालना चाहिए और एक बॅकअप प्लान भी होना चाहिए। और सबसे बड़ी बात, कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहिए।

जीवन एक सुनिश्चित कार्यक्रम की तरह है और स्पष्ट दिशा-निर्देशों (नियमों) द्वारा तय कर दिया गया है कि कौन सा कदम पहले और कौन सा बाद में रखा जाना है। यह स्पष्ट है कि इन पूर्वनिर्धारित राहों पर चलना सुरक्षित होता है। आपको इन नियमों पर विश्वास करना सिखाया जाता है और आगाह किया जाता है कि आपका एक भी कदम दाएँ या बाएँ न बहके। वास्तव में आपको भय होता है कि अगर आप नाक की सीध में नहीं चलेंगे तो यह सारा कार्यक्रम टूटकर बिखर जाएगा! थोड़ा सा भी पैर इधर-उधर हुआ नहीं कि आप बेचैन हो जाते हैं कि कहीं डूब न जाएँ, कि बियाबान में कहीं खो न जाएँ। नए रास्ते पर ज़रा सा चलते ही आपको थकान महसूस होती है, आपमें उत्साह नहीं रह जाता और आप तनावग्रस्त हो जाते हैं, चिंतित रहने लगते हैं!

मेरी बात मानें, आप कहीं नहीं गिरने वाले। मेरा विश्वास करें, यह विश्व टूटकर बिखरने वाला नहीं है कि उसका मलबा आपके आसपास बिखरा पड़ा हो और न ही आप दुनिया को तोड़ने वाले हैं। मेरी बात मानें, आपको कुछ नहीं होने वाला है। मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि आपके अलग राह पर चल देने से इस दुनिया का कुछ भी नहीं बिगड़ने वाला। न तो आप दुनिया को कोई नुकसान पहुँचा सकते हैं और न ही आपके किसी काम से आसमान टूटकर गिरने वाला है।

आपको विश्वास करना सीखना पड़ेगा: मुझ पर नहीं बल्कि अपने आप पर। अपने निर्णयों पर पूरा विश्वास कीजिए, अपने जीवन पर भरोसा कीजिए! तभी आप सुखी और प्रसन्न रह सकेंगे!

अगर आप किसी भी क्षण मरने के लिए तैयार हैं तो फिर डरने की ज़रुरत नहीं! 31 अगस्त 2014

मैंने स्वीडन में 2006 में हुए आध्यात्मिक उत्सव के बारे में, जहाँ मेरी कई कार्यशालायें आयोजित की गईं थी, पहले आपको बताया था। उस दौरान एक प्राइवेट हवाई जहाज़ पर दिए गए साक्षात्कार के बारे में आज मैं आपको बताना चाहता हूँ!

वहाँ इंग्लैण्ड का एक फिल्म-क्रू भी आया हुआ था, जो उस उत्सव के बारे में एक लघु-चित्र फिल्माने की तैयारी कर रहा था। आयोजन स्थल की विभिन्न जगहों पर जाकर वह विभिन्न कार्यक्रमों की शूटिंग करता और वहाँ मौजूद सहभागियों, कार्यक्रम संचालकों के साक्षात्कार लेता, कुछ कार्यशालाओं को फिल्माता और कुल मिलाकर सारे उत्सव के माहौल को कैमरे में कैद करने की कोशिश कर रहा था।

सारा उत्सव स्वीडन के शानदार प्राकृतिक वातावरण में, जंगल के बीचोंबीच और साल के सबसे सुखद मौसम में आयोजित किया गया था, जब रात का अँधेरा भी वहाँ सिर्फ मध्य-रात्रि में कुछ देर के लिए होता है। इस अंग्रेज़ फिल्म क्रू ने फिल्म को और अधिक रोमांचक और दिलचस्प बनाने के उद्देश्य से उत्सव को ऊपर से अर्थात परिंदों की नज़र से एक छोटे से हवाई जहाज़ में बैठकर शूट करने का निर्णय किया- और चार लोगों के बैठने लायक एक हवाई जहाज़ किराए पर लेकर वहाँ, ऊपर मेरा साक्षात्कार लेने की पेशकश की!

जब मैं हवाई जहाज़ के छोटे से रनवे पर, जहाँ से उसे उड़ान भरना था, पहुँचा, कैमेरामैन और संवाददाता जहाज़ के करीब खड़े दिखाई दिए। मेरे पीछे पायलट आया और जब हम सब एक दूसरे का अभिवादन कर चुके, रिपोर्टर जहाज़ की तरफ देखते हुए बोला: 'पता नहीं, मुझे थोड़ा डर लग रहा है-जहाज़ कुछ ज़्यादा ही छोटा है!' पायलट ने उसे आश्वस्त करने के उद्देश्य से कि कुछ नहीं होगा, हमसे थोड़ा अलग हटने के लिए कहा और जहाज़ में अकेले ही एक छोटी सी उड़ान भरी। जब वह वापस नीचे आया तो रिपोर्टर की तरफ सवालिया निगाहों से देखा-जी हाँ, अब रिपोर्टर कुछ आश्वस्त लग रहा था।

माइक्रोफोन लगे हुए बड़े बड़े इयरफोन लेकर हम सब जहाज़ पर चढ़ गए और जहाज़ उड़ चला! वास्तव में ऊँचाई से उत्सव स्थल का दृश्य बहुत भव्य लग रहा था! आगंतुकों के रहने-सोने के छोटे-छोटे टेंटों के साथ कार्यशालाओं के बड़े टेंट और चारों ओर फैली अद्भुत प्राकृतिक दृश्यावलियाँ!

जहाज़ में बड़ा शोर था मगर इयरफोन लगाकर हम आसानी के साथ बातचीत कर सके। थोड़ी सी बातें हुईं: उसने मेरे पूर्व-जीवन के बारे में पूछा, उत्सव के बारे में कुछ बातें हुईं और उस पर मेरी प्रतिक्रिया ली गई, फिर थोड़ी सी बात मेरी कार्यशाला के बारे में, बस इतना ही। अंत में उसने पूछा 'मुझे तो अब भी थोड़ी घबराहट हो रही है, थोड़ा डर लग रहा है- आपको नहीं लग रहा? इस छोटे से जहाज़ में, लगता है जैसे कभी भी कुछ भी हो सकता है!'

मैंने जवाब दिया कि मुझे वैसा कोई डर नहीं है। स्वभाव से ही मैं डरपोक नहीं हूँ। पहली बात तो यह कि मैं इस तरह, इस दिशा में सोचता ही नहीं हूँ। दूसरे, अगर जहाज़ गिर ही जाता है तो हम सब मारे जाएँगे- लेकिन उसके लिए डरने की क्या ज़रुरत है?

मैं तो यह मानता हूँ कि किसी भी क्षण जीवन का अंत हो सकता है। हर पल हमें उसके लिए तैयार रहना चाहिए, सिर्फ उस समय नहीं जब हम कोई खतरनाक काम कर रहे होते हैं। तो अगर आप हर वक़्त मरने के लिए तैयार हैं तो आपको इस तरह का डर बिल्कुल नहीं लग सकता!

लगभग आधे घंटे बाद हम सुरक्षित नीचे उतर आए- और मैंने बिना किसी भय के उस शानदार नज़ारे को देखने और उसका आनंद उठाने के मौके का पूरा लाभ उठाया!

भविष्य में होने वाली दुर्घटनाओं के काल्पनिक डर से कैसे निपटें! 17 फरवरी 2014

पिछले सप्ताह कार्पोरेट दुनिया से जुड़े लोगों में पाए जाने वाले तनावों और परेशानियों का ज़िक्र करते हुए मुझे हाल ही में आश्रम आए एक मेहमान से हुई चर्चा का स्मरण हो आया। उसने मुझे बताया कि वह न सिर्फ अपने काम को लेकर बहुत तनाव और परेशानी महसूस करने लगा था बल्कि यह सोचकर भी कि उसका यह काम कभी भी छूट सकता है। दरअसल उसकी सबसे बड़ी परेशानी तो यह आशंका ही थी कि कल को अगर उसे नौकरी से निकाल दिया जाए तो क्या होगा? अगर मेरा काम छूट जाए तो मैं क्या करूंगा?

इस व्यक्ति के पास एक बहुत अच्छी नौकरी है, अच्छा वेतन है, उस नौकरी के साथ उपलब्ध हर तरह की सुविधाएं भी हैं और सब कुछ बढ़िया चल रहा है। कोई स्पष्ट कारण नहीं है कि उसे किसी तरह की आशंका हो, उसके बॉस की तरफ से कोई इशारा नहीं है, सहकर्मियों की ओर से कोई खबर या अफवाह नहीं है। हर चीज़ सुचारु रूप से चलती दिखाई दे रही है लेकिन फिर भी एक विचार है, एक आशंका और डर है कि कुछ भी हो सकता है, कि अचानक वह अपने रोजगार से हाथ धो सकता है!

उन्हें मेरा जवाब यह था कि यह बात ठीक है कि कभी भी, कुछ भी हो सकता है। आप भविष्य के बारे में कुछ भी नहीं जान सकते और इस तरह जिन घटनाओं के होने का आप अनुमान लगाते हैं वह आपके मन का फितूर होता है, महज एक काल्पनिक कहानी! वह हो नहीं रहा है, होने नहीं जा रहा है लेकिन आप कुछ भी बुरा होने की छोटी से छोटी संभावना के विषय में सोचते भर रहते हैं।

यह एक पुरानी सलाह है, जो मैं आपको देना चाहता हूँ लेकिन यह बहुत कारगर है: भविष्य के बारे में सोच-सोचकर परेशान होने के स्थान पर वर्तमान में रहिए। भविष्य अभी आपके सामने उपस्थित नहीं हुआ है!

भविष्य के बारे में परेशान होते रहने के कारण वर्तमान जीवन आपसे छूटा जा रहा है। नौकरी में अपना सर्वोत्तम देने की जगह आप उसमें गलतियाँ भी कर सकते हैं क्योंकि भविष्य को लेकर आप इतने बेचैन और चिंतित हैं! आप अपने काम में सम्पूर्ण एकाग्र नहीं हो पाते और इस तरह जितना काम आप कर सकते हैं, जितना काम आपको करना चाहिए उतना आप कर ही नहीं पा रहे हैं।

मान लीजिए ऐसा कुछ हो ही जाता है और आप अपनी नौकरी खो बैठते हैं तो भी आप यह क्यों नहीं सोचते कि शायद इसमें भी कुछ अच्छा ही छिपा हो? आप यह क्यों नहीं सोचते कि ऐसा होने पर हो सकता है, आपको कुछ बड़ा और इससे बेहतर करने का मौका मिल जाए? आप भविष्य के विषय में ही क्यों सोचते हैं और जब सोचते हैं तो सिर्फ नकारात्मक ही क्यों सोचते हैं? इस बात को समझिए कि वह परिदृश्य सिर्फ आपकी कल्पना मात्र है, एक कहानी, जो आपने अपने लिए गढ़ ली है!

मैं इससे मिलता-जुलता और ‘भावी काल्पनिक डर’ से सम्बद्ध एक और प्रकरण आपके सामने रखता हूँ: एक आदमी कहता है कि उसके पास कई साल से एक मोटर साइकल है और उसे चलाने में उसे हमेशा बड़ा आनंद आता रहा है मगर पिछले कुछ सप्ताह से अचानक उसके मन में यह डर बैठ गया है कि इस मोटर साइकल की सवारी करने पर उसके साथ कोई दुर्घटना हो सकती है! अतीत में मोटर साइकल से कोई दुर्घटना नहीं हुई है, आज तक वह उस पर से फिसला तक नहीं है लेकिन अब वह उस पर सवारी करते हुए यह सोच-सोचकर बेचैनी से भर उठता है कि कुछ न कुछ बुरा हो सकता है।

यह सब काल्पनिक बातें हैं लेकिन फिर भी मैं आपको यह सलाह नहीं दूंगा कि मोटर साइकल की सवारी के डर के बावजूद आप उसकी सवारी करें ही लेकिन इतना अवश्य कहूँगा कि अपने भीतरी के संतुलन पर तवज्जो दें, उसे बेहतर बनाएँ और आत्मविश्वास प्राप्त करें और उसके बाद पुनः सामान्य हो जाएँ।

वर्तमान में जियें, इस क्षण का पूरा आनंद उठाएँ और प्रसन्न रहें। शारीरिक व्यायाम करें, स्वास्थ्यवर्धक भोजन करें और अपने मस्तिष्क को शांति और खुशी प्राप्त करने का मौका दें। एक बार आप मानसिक शांति की उस अवस्था को पा लेंगे तो फिर ये काल्पनिक डर अपनी दहशत खो देंगे। आप ऐसी कल्पनाओं को हंसी में उड़ा सकेंगे क्योंकि आप जान चुके होंगे कि इस वक़्त आप पूरी तरह सुरक्षित हैं।

आशंकाओं को अपने ऊपर हावी न होने दें बल्कि जितना इस क्षण आप स्थिर, शांत और प्रसन्न हैं उससे अधिक मानसिक स्थिरता, शांति और प्रसन्नता प्राप्त करने में उन आशंकाओं का उपयोग करें!

एक कटु अनुभव अच्छे लोगों से मिलने के मौके मुझसे नहीं छीन सकता – 8 सितंबर 2013

भूतपूर्व पोल डांसर के यहाँ से जो महिला मुझे लेने आई थी वह मुझे अपने घर ले गई। मैंने वहाँ बड़ा अच्छा समय बिताया और स्वाभाविक ही तांत्रिक केंद्र में मेरे द्वारा गुज़ारे कुछ दिनों के बारे में, मेरे रहन-सहन, काम, जीवनानुभव और इस पूरे प्रकरण के बारे में हमारे बीच बड़ी रोचक बातें हुईं।

जैसा कि उसने मुझे बताया, उसके दो बच्चे हैं, पाँच साल का एक लड़का और 12 साल की एक लड़की। वह एक सुखी परिवार था और मैं उस एकाकी माँ (सिंगल मदर) के साथ बच्चों को लेने उनके स्कूल भी गया। फिर उसने अपना काम दिखाया-वह एक संगीतकार थी-और हमने भारतीय खाना पकाया और उसके किचन में साथ बैठकर खाया। एक दिन हमने सिडनी के आसपास के नज़ारे देखने में बिताया और शाम को हमने सामान्य गपशप की।

जब मैं उस अजीब घटना के बारे में बता चुका, जहां से मैं पीछा छुड़ाकर भागा था, तब उसने मुझसे पूछा कि अब आगे मेरा कहाँ जाने का इरादा है। मेरा अगला पड़ाव गोल्ड कोस्ट था। वहाँ मेरा संपर्क कैसे बना? वह भी इंटरनेट के जरिये ही बना था! आप सोच सकते हैं कि इतने बुरे अनुभव के बाद वहाँ जाने में मुझे कोई हिचक महसूस नहीं हुई कि वहाँ भी ऐसा ही कटु अनुभव हो सकता है?

सच बात तो यही है कि नहीं, मुझे कोई भय नहीं था और मानसिक रूप से ज़रा संयत हो जाने के बाद मैंने उसे अपनी भावनाओं से अवगत कराने की कोशिश की। मैं हमेशा ही इसी तरह सफर करता रहा हूँ, लगभग अनजान लोगों के साथ संपर्क कर लेना, जिन्हें किसी ने ईमेल द्वारा मुझसे मिलवा दिया, या किसी ने मेरी वेबसाईट पर मुझसे संपर्क कर लिया या किसी ने यूं ही किसी से नंबर लेकर मुझसे एक-दो बार फोन पर बात कर ली। सिवा इसके कि वे मेरा कोई कार्यक्रम आयोजित करवाना चाहते हैं या उनकी योग या आध्यात्म में स्वाभाविक रुचि है या वैसे ही वे मेरे बारे में जानना चाहते हैं, उनके बारे में ज़्यादा कुछ जाने बिना मैं उनके साथ उनके घरों में रहा।

इस तरह सारा जीवन मैं अनजान और नई जगहों में जाता रहा हूँ और ऐसी जगहों की संख्या ज़्यादा है जहां मुझे बहुत ही शानदार लोग मिले जो आगे चलकर मेरे नजदीकी मित्र भी बन गए! मैंने सुंदर स्थानों की यात्राएं कीं और सुंदर, ज़िंदादिल लोगों से मिला। अपवाद स्वरूप ही कभी ऐसा हुआ है कि मेरी किसी के साथ न पटी हो।

बावजूद इसके कि कोई बहुत ही अनुचित बात हो जाए, जैसी कि इस बार हो गई, मैंने कभी भी किसी के यहाँ अधिक समय रुकने के बारे में नहीं सोचा। और अब मुझे अपने आप पर इतना विश्वास है कि मैं कहीं भी अपना समय बिताने का कोई न कोई जरिया ढूंढ़ लूँगा, चाहे मुझे किसी होटल में ही क्यों न रुकना पड़े!

सिर्फ इस डर से कि हो सकता है सामने वाला मेरा मित्र न बन पाए, मैं नए मित्रों के साथ मुलाक़ात की संभावनाओं को खोना नहीं चाहता! मेरा विश्वास है कि दुनिया में पर्याप्त भले लोग मौजूद हैं जिनके साथ समय बिताना, उन्हें मित्र बनाना या सिर्फ उन्हें जानना और उनके संपर्क में रहना मेरे लिए बड़ा सार्थक और महत्वपूर्ण है।

और इस तरह, कुछ बेहतरीन दिन उस महिला और उसके परिवार के साथ गुजारकर अगले हफ्ते, अपने कार्यक्रम के प्रति पूरे उत्साह के साथ, मैं अपने अगले पड़ाव की तरफ चल दिया! महिला मुझे विमानतल तक छोडने आई!

ईश्वर से डरकर आपको क्या मिलता है? अच्छे नैतिक विचार या दिमागी बीमारियाँ? – 18 जून 2013

मैंने एक बार कहा था कि जो लोग ईश्वर से डरते हैं वे हर बात से डरते हैं। इस बात के पीछे तर्क है। क्योंकि वे मानते हैं कि ईश्वर हर जगह है और धरती पर होने वाली हर बात, हर घटना उसकी मर्ज़ी से हो रही है इसलिए जब वे ईश्वर से डरते हैं तो वे हर चीज़ से, हर उस बात से डरने लगते हैं जो हर जगह ईश्वर की मर्ज़ी से हो रही है! क्योंकि मैंने ऐसे विचार कई बार सामने रखे हैं इसलिए मुझे एक खास तरह के विचार भी कई बार प्राप्त हुए हैं: डर एक ऐसी चीज़ है जो आवश्यक है! डर ज़रूरी है, यह लोगों के लिए अच्छा है! यह देखकर कि यह अपवाद स्वरूप, किसी एक व्यक्ति का विचार नहीं है, मैंने महसूस किया कि इस बारे में मुझे कुछ विस्तार से लिखना चाहिए कि क्या डरना इतना महत्वपूर्ण है, विशेषकर ईश्वर से।

दरअसल एक व्यक्ति ने तो अपना बहुत सा समय और ऊर्जा खर्च करते हुए मुझे समझाने की कोशिश की कि ईश्वर से डरने के क्या-क्या लाभ हैं। पता चला कि बहुत से धार्मिक लोग यह समझते हैं कि दुनिया भर की संस्कृतियों में व्याप्त सारे नैतिक विचारों की जड़ धर्मभीरुता में निहित है। सिर्फ ईश्वर के डर के कारण ही लोग अपनी पत्नियों के साथ धोखा नहीं करते, गैरतमंद लोग चोरी नहीं करते, डाकेजनी और हत्याएँ नहीं करते और लोग एक-दूसरे के साथ अच्छा व्यवहार करते हैं और पड़ोसियों, दोस्तों और यहाँ तक कि अनजान लोगों की मदद करते हैं।

एक तुलना न्याय और व्यवस्था से भी की गई। अगर कानून, पुलिस और कोर्ट-कचहरी का डर न रहे तो सब कुछ उलट-पुलट जाएगा, अराजकता फैल जाएगी, लोग अपराधी हो जाएंगे और कोई भी शांति से नहीं रह पाएगा। स्पष्ट है कि ईश्वर का डर उनके विचार में इसी तरह की कोई चीज़ है।

जैसा कि मैंने कहा, अगर किसी एक व्यक्ति ने यह बात कही होती तो उसे उसका व्यक्तिगत विचार मानकर मैं इतना सब लिखने की ज़हमत नहीं उठाता क्योंकि यह मेरे लिए एक बेहूदा तर्क होता। क्योंकि मैंने बहुत से लोगों से ऐसी बातें सुनी हैं, इसी तर्क को आधार बनाकर लिखे गए बड़े-बड़े तर्कपूर्ण (?) लेखों और पुस्तकों को पढ़ा है, इसलिए मुझे लगता है मुझे भी इस बारे में अपनी बात अवश्य रखनी चाहिए। मैंने कभी एक छोटा सा पैराग्राफ पढ़ा था जो इस मामले में बहुत मौजूं प्रतीत होता है:

आप बिना ईश्वर पर विश्वास किए नैतिक कैसे हो सकते हैं? बिना ईश्वर के तो शायद मैं लोगों की हत्या करने लग जाऊंगा, बलात्कार कर सकता हूँ, बच्चों का यौन शोषण कर सकता हूँ, खुद अपने बच्चों को प्रताड़ित कर सकता हूँ, बैंकों में डाका डाल सकता हूँ, चोरी कर सकता हूँ, हर किसी पर जादू-टोना कर सकता हूँ, पत्नी को धोखा दे सकता हूँ, मार-पीट सकता हूँ, जानवरों की बेवजह हत्या कर सकता हूँ और खुद अपने आपको तकलीफ पहुंचा सकता हूँ। लेकिन क्योंकि मैं ईश्वर पर भरोसा करता हूँ और जानता हूँ कि ऐसे काम करने पर मैं अनंत काल तक नर्क में सड़ता रहूँगा, मैं ऐसे काम नहीं करता! बिना डर के आप अच्छे व्यक्ति बन ही नहीं सकते!

क्या यह तर्क कोई मानी रखता है? क्या आप वाकई हत्या नहीं कर रहे हैं क्योंकि आप डरते हैं कि कहीं ईश्वर आपको इसकी कोई सज़ा न दे दें? मैं यह नहीं मान सकता कि ईश्वर से डरने वाला हर व्यक्ति ऐसा दुष्ट और क्रूर होता अगर उसे ईश्वर के बारे में कोई जानकारी नहीं होती! और इतना मैं अच्छी तरह से जानता हूँ कि ईश्वर पर विश्वास न करने वाले अधिकतर व्यक्ति उतने ही अच्छे, सामान्य और व्यवहार कुशल होते हैं जैसे ईश्वर पर विश्वास करने वाले। फर्क सिर्फ इतना ही होता है कि वे ईश्वर से नहीं डरते!

नहीं, मैं नहीं समझता कि ईश्वर से डरना इतना महत्वपूर्ण है। बल्कि मैं मानता हूँ कि यह एकदम गलत बात है। यह डर धार्मिक माता-पिता अपने बच्चों के कोमल मन में बिठाते है। वे अपने बच्चों को बताते हैं कि वे उस सर्वशक्तिमान से डरकर रहें, जो कि एक तरह का खतरा या कोई गुस्सैल सुपरवाइसर जैसा कोई शख्स है जो हर वक्त, हर जगह आपको सज़ा देने के लिए विद्यमान रहता है! और यही असुरक्षा का भाव वयस्कों में भी पाया जाता है। वह उन्हें दब्बू, डरपोक और बच्चों जैसा बना देता है जिनमें कोई आत्मविश्वास नहीं होता और जो हमेशा अपने निर्णयों पर दूसरों की मुहर प्राप्त करने की कोशिश करते हैं, जो उन्हें बता सकें कि वे ठीक कर रहे हैं और ईश्वर उन्हें इसके लिए दंडित नहीं करेगा।

मैं निश्चय पूर्वक कह सकता हूँ कि यह डर बिल्कुल गलत है। जब नैतिकता की बात आती है तो मुझे लगता है कि हमें तथ्यों पर नज़र डाल लेनी चाहिए। दुनिया की जेलें सिर्फ नास्तिकों से ही भरी हुई नहीं हैं! नैतिक रूप से ठीक व्यवहार सिर्फ धार्मिक लोगों की बपौती नहीं है। सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी अभिभावकों की है कि वे अपने बच्चों को क्या सिखाते हैं। मेरे विचार में उन्हें चाहिए कि जो भी सिखाएँ, उनके भीतर किसी भी बात का डर पैदा किए बगैर सिखाएँ!

अंधविश्वासियों की किस्में – 5: वैज्ञानिक, डॉक्टर या ऐसे ही अतिउच्चशिक्षित लोग – 15 मार्च 13

पिछले कुछ दिनों से मैं अंधविश्वासी लोगों की किस्मों के बारे में लिख रहा हूं। उसी क्रम में आज अंधविश्वासी वैज्ञानिकों, डॉक्टरों और ऐसे ही अतिउच्चशिक्षित लोगों की बारी है।

मेरा आरोप है कि ये वो लोग हैं जो लोगों के बीच बेहूदे अंधविश्वास फैलाने के लिए उत्तरदायी हैं। ये वे लोग हैं जिनके पास अंधविश्वासों को झूठा सिद्ध करने के पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं उसके बावजूद ये उनमें न केवल विश्वास करते हैं अपितु खुलेआम उसका प्रदर्शन भी करते हैं। इन लोगों ने अपने जीवन के कई वर्ष इस बात की खोज करने में बिताए हैं कि यह दुनिया कैसे चलती है, तथाकथित चमत्कारों के पीछे की वास्तविकता क्या है और अपने इस ज्ञान को लोगों के साथ साझा किया है। इन डॉक्टरों और वैज्ञानिकों ने कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों में शिक्षा पाई है। आम आदमी की तुलना में इन्हें जीवन के रहस्यों का अधिक ज्ञान है। लेकिन फिर भी ये अंधविश्वासों से चिपके हुए हैं।

ऐसे उच्चशिक्षित लोगों के अनगिनत उदाहरण हैं जो अंधविश्वासी हैं। चलिए, डॉक्टरों से ही शुरु करते हैं। उनके क्लीनिक के प्रवेशद्वार पर ही अकसर आपको बुरी नज़र से बचाने वाले टोटके लटके हुए मिल जाएंगें। अस्पतालों में जगह जगह लिखा रहता है "हम सेवा करते हैं, इलाज तो 'वह' करता है"। बहुत से डॉक्टर गुरुवार को अपना क्लीनिक नहीं खोलते क्योंकि उनका मानना है कि लोग इस दिन डॉक्टर के पास नहीं जाते और अगर गए भी तो दोबारा अवश्य वापिस आना पड़ेगा यानी गुरुवार का दिन डॉक्टर से मिलने के लिए अशुभ होता है।

यह देखकर मुझे तो ऐसा लगता है कि खुद डॉक्टरों को ही चिकित्सा विज्ञान में विश्वास नहीं है। अगर लोग उनके इलाज से ठीक न हों तो संभव है कि वे इसके लिए बुरी ताक़तों को जिम्मेदार ठहराने लगें और उनके निवारण के लिए टोने – टोटके भी बताने लगें! हो सकता है कि यह बात अंधविश्वासियों का आत्मविश्वास बढ़ाती हो लेकिन ऐसे डॉक्टरों की काबिलियत पर मेरा भरोसा तो कम हो जाता है। यदि वह रोग के इलाज के लिए किसी अंधविश्वास का सहारा लेता है और बीमारियों के लिए अस्वच्छता के बजाए ईश्वरीय प्रकोप को जिम्मेदार ठहराता है तो मैं उससे अपना इलाज नहीं करवाऊंगा। मैं ऐसे सभी भारतीय डॉक्टरों से कहना चाहता हूं कि वे बीमारी की वजह किसी अंधविश्वास में न ढूंढकर चिकित्साशास्त्र में ढूंढें। गंदगी में बीमारियां आसानी से फैलती हैं अतः डॉक्टरों को चाहिए कि वे अपने क्लीनिक में सफाई का विशेष ध्यान रखें।

ऐसा नहीं है कि उच्चशिक्षितों की जमात में केवल डॉक्टर ही अंधविश्वासी पाए जाते हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ईसरो) के वैज्ञानिक हर बार अंतरिक्ष में रॉकेट छोड़ने से पहले उसकी सफलता के लिए मंदिरों में हाजरी लगाते हैं। इतना ही नहीं वे अपने साथ उस रॉकेट का एक अति लघु प्रतिरूप भी ले जाते हैं ताकि भगवान को ज्ञात हो जाए कि वे किसकी सफलता की कामना लेकर मंदिर में आए हैं।

और तो और रॉकेटों के नामकरण में यही अंधविश्वास पैर फैलाए रहता है। एक PSLV-C12 और एक PSLV-C14 है मगर बीच का PSLV-C13 गायब है। क्यों? क्योंकि 13 एक अशुभ अंक है। क्या आपने नासा (NASA ) में इस तरह की ढकोसलेबाजी देखी है?

हमारे देश के श्रेष्ठतम वैज्ञानिक जो चंद्रमा पर पहुंचने की तकनीक जानते हैं और मंगल पर जाने की तैयारी कर रहे हैं, क्या उन्हें अपने काम पर भरोसा नहीं है जो भगवान से मदद की गुहार लगा रहे हैं! जानबूझकर अशुभ अंकों की अनदेखी की जाती है। डॉक्टर बुरी ताकतों से डरते हैं। मैं तो कहता हूं कि यह हमारा दुर्भाग्य है कि ये सभी केवल साक्षर हैं शिक्षित नहीं। ये शिक्षित होने के बावजूद ढकोसलों की चपेट में आ जाते हैं। सारा देश उनकी तरफ आशा भरी निगाहों से देखता है और अपनी संतति से कहता है "देखो, तुम्हें भी उन जैसा बनना है।" मैं अपने बच्चों को ऐसे बेहूदा अंधविश्वासों में कदापि नहीं पड़ने दूंगा।

अंधविश्वासियों की किस्में – 4: भारत के लोकप्रिय क्रिकेटर और अन्य खिलाड़ी – 14 मार्च 13

अपने भारतीय पाठकों के लिए मैं अंधविश्वासियों की एक और किस्म की चर्चा कर रहा हूं। ये हमारे खिलाड़ी हैं जो लाखों भारतीय युवाओं के आदर्श हैं और मेरा मानना है कि इसी वजह से इन्हें किसी प्रकार के अंधविश्वास में यकीन नहीं करना चाहिए।

अंधविश्वासी क्रिकेट खिलाड़ी

अंधविश्वासी व्यवसायी के बारे में लिखते हुए मैंने कहा था कि उसे अपने कौशल और मेहनत पर पूरा भरोसा नहीं होता, इसलिए वह अपनी सफलता का पूरा श्रेय किसी अदृश्य शक्ति को देता है। यही बात भारत के क्रिकेट व अन्य खेलों के खिलाड़ियों पर भी लागू होती है। बहुत से खिलाड़ी बड़े अंधविश्वासी होते हैं। उनके पास धन – दौलत है, बहुत सारे रिकॉर्ड्स इनके नाम हैं लेकिन इसके बावजूद वे मानते हैं कि यह उनकी प्रतिभा, मेहनत और अभ्यास का फल नहीं है कि उन्हें कामयाबी मिली है।

भारत की राष्ट्रीय क्रिकेट टीम के कुछ खिलाड़ी अपनी जन्मतिथि के नंबर वाली जर्सी पहनकर खेलते हैं और यह विश्वास करते हैं की यह उनके लिए भाग्यशाली होगा। मिसाल के तौर पर कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की का नम्बर 7 छपा होता है क्योंकि उनकी जन्मतिथि है 7 जुलाई। इसी तरह युवराज सिंह जिनकी जन्मतिथि 12 दिसम्बर है, उनकी जर्सी का नम्बर 12 होता है।

बहुत से खिलाड़ी अपनी पतलून की बाईं जेब में रूमाल रखते हैं, कईयों के रुमाल का रंग लाल होता है जबकि कई पीले रुमाल में विश्वास रखते हैं। उनका विश्वास है कि यदि वे ग़लत रंग का रुमाल रखेंगें या रुमाल को ग़लत जेब में रखेंगें तो जीत हासिल नहीं होगी। युवराज सिंह और विराट कोहली रुमालों में तो यकीन नहीं रखते लेकिन कलाई पर काले रंग का बैंड बुरी नज़र से उनकी रक्षा करता है।

भारत के सफलतम क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर हमेशा पहले बाएं पैर पर पैड बांधते हैं और उसके बाद दाएं पर। वह इस बात का खास ध्यान रखते हैं ताकि उनके खेल पर बुरा प्रभाव न पड़े। इस बात में कोई अचरज नहीं है कि जादूगर स्वर्गीय सत्य सांईबाबा उनके गुरु थे। ये वही पाखंडी सांई बाबा थे जो हवा में सोना पैदा करके अपने भक्तों का बेवकूफ बनाते थे। अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि बड़े बड़े रिकॉर्ड बनाने वाले सचिन ऐसे ढोंगी बाबा के भक्त थे।

मैंने पढ़ा है कि ये महान खिलाड़ी टीम की बस में भी अपनी सौभाग्यप्रदाता सीटों पर ही बैठते हैं क्योंकि उनका विश्वास है कि अग़र 'अपनी' सीट पर नहीं बैठेंगें तो उस दिन उनका प्रदर्शन अच्छा नहीं रहेगा और इसीलिए बस मे बैठने की व्यवस्था में कभी कोई बदलाव नहीं होता। एक और क्रिकेटर है श्रीसंत। चाहे कुछ भी हो जाए वह सबसे आखिर में बस से उतरते हैं। शायद उनका विश्वास है कि ऐसा करने से वह सबसे आखिर में आउट होंगें।

एक बहुत ही प्रचलित अंधविश्वास है 'सौभाग्यसूचक आइटम' का। यदि आप कोई खास कैप, रुमाल, दस्ताना, जूता या अन्य कोई आइटम पहनकर बहुत अच्छा खेलें हैं या जीत हासिल की है तो अगली बार खेलने जाते वक़्त आप उस आइटम को साथ ले जाना नहीं भूलते हैं। हद तो तब हो गई जब भारत के अधिकारिक क्रिकेट संगठन BCCI ने सितम्बर 2012 में राष्ट्रीय टीम के खिलाड़ियों को नई डिजाइन की हुई जर्सियां न पहनने की सलाह दी क्योंकि आम जनता के सामने वे जर्सियां पहले ही प्रदर्शित हो चुकी थीं। उनसे कहा गया कि वे सब अपनी वही जर्सियां पहनें जिन्हें पहनकर उन्होंने पिछले साल विश्व कप जीता था।

खेलों में, विशेषकर क्रिकेट में अंधविश्वास का बोलबाला है। यह सब कोरी बक़वास है और एक मनोवैज्ञानिक भ्रमजाल है जो खिलाड़ियों ने अपने लिए रच रखा है। वे अपनी क्षमताओं में विश्वास रखने की अपेक्षा स्वयं को रुमाल जैसी चीजों का दास बनाना ज्यादा पसंद करते हैं। वे अपनी प्रतिभा के बल पर नहीं बल्कि बस में मिली मनचाही सीट के बल पर जीत हासिल करते हैं। उन्होंने सही मौके पर गेंद को लपक लिया इसकए लिए वे अपनी पैनी नज़र और ट्रेनिंग को इसका श्रेय देने के बजाए भाग्यशाली दस्ताने का शुक्रिया अदा करते हैं।

क्या खिलाड़ी हमें यह संदेश देना चाहते हैं कि गुरु, धर्मशास्त्र और अन्य अंधविश्वासी लोग सही है और वैज्ञानिक तथा नास्तिक ग़लत। ये खिलाड़ी हमारे युवाओं के प्रेरणास्रोत हैं। उन्हें चाहिए कि वे आचरण के ऊंचे मानदंड स्थापित करें और ऐसी बेहूदा बातों में यकीन करना बंद करें।