बच्चों के प्रति अहिंसा की प्रशंसा की जाती है मगर बुरी आदतें मुश्किल से छूटती हैं- 26 फरवरी 2014

भारतीय अभिभावकों को लिखे अपने पत्र में बच्चों के विरुद्ध हिंसा के विषय में लिखने पर मुझसे पूछा जाता है कि क्या मैं सोचता हूँ कि मैं अपने लेखन द्वारा लोगों के मन-मस्तिष्क में कोई परिवर्तन ला सकता हूँ। सबसे पहले तो यह कि लिखने का मेरा मकसद यह है ही नहीं, मैं सिर्फ अपने मन की बात लिखना चाहता हूँ। आप उससे क्या प्राप्त करते हैं यह आपकी मर्ज़ी पर निर्भर करता है। अगर वह कुछ अभिभावकों और उनके बच्चों के जीवन में कोई परिवर्तन ला पाए तो मुझे खुशी होगी। मैं जानता हूँ कि यह परिवर्तन काफी मुश्किल है क्योंकि शब्दों और कर्मों द्वारा व्यक्त हिंसा ज़्यादातर लोगों की आदत बन चुकी है। मुझे लगता है कि इसके लिए कुछ व्यावहारिक सहायता की भी आवश्यकता होगी। मैं अपने आश्रम का उदाहरण देना चाहता हूँ, जहां फिलहाल यही घटित हो रहा है।

हमारा एक कर्मचारी हमारे यहाँ काफी समय से काम कर रहा था जबकि उसकी पत्नी बच्चों के साथ दूर किसी गाँव में रहती थी। सप्ताहांत में एक बार वह उनसे मिलने गाँव गया। वह देख चुका था कि हम आश्रम में रहने वाले बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं, यहाँ तक कि कर्मचारियों के एक बच्चे के साथ भी, जो उसके बच्चे की आयु का, अर्थात लगभग दो साल का है, वही व्यवहार किया जाता है। अभिभावकों से हम अक्सर कहते रहते हैं कि वे अपने बच्चों को मारा पीटा न करें और ये बातें उस कर्मचारी ने भी सुन रखी थीं। उसने हमारे मुंह से वे तर्क भी सुने थे, जिनमें हम बताते थे कि बच्चों के विरुद्ध हिंसा और उन्हें धमकियाँ देना क्यों अनुचित और हानिकारक है।

वह अच्छी तरह समझ रहा था कि यह उचित ही है। वह अपने बच्चे के लिए भी यही वातावरण चाहता था और इसलिए वह अपने गाँव जाकर उन्हें आश्रम ले आया। अब उसकी पत्नी भी आश्रम में काम करती है और अपने बच्चों और पति के साथ यहीं रहती है।

फिर भी उसके लिए बच्चों को पीटने की आदत से छुटकारा पाना बहुत मुश्किल सिद्ध हुआ। उसे और उसकी पत्नी को, जो बच्चों के साथ उससे ज़्यादा समय बिताती थी, बच्चों को शिक्षित करने के तरीके को बदलने में कड़ी मेहनत करनी पड़ी। या यह कहें कि बच्चों को वास्तविक शिक्षा प्रदान करने में, क्योंकि मैं हिंसा के जरिये ‘शिक्षित’ किए जाने को पूरी तरह खारिज करता हूँ।

उन्हें बच्चों पर हाथ उठाना बंद करने में काफी वक़्त लगा। इसके लिए हमें कड़ाई के साथ बच्चों को मारने और मारने की धमकी देने पर प्रतिबंध लगाना पड़ा। और हमारे उदाहरण द्वारा और हमारी लगातार समझाइश और इस तरह हमारी सहायता के कारण ही वे अपने हिंसक रवैये को रोक पाने में सफल हो सके। वे दूसरा कुछ जानते ही नहीं थे! वे स्वयं भी मार खाते हुए बड़े हुए, उन्होंने जीवन भर दूसरों का लालन-पालन भी हिंसक तरीके से होता हुआ देखा और अब यहाँ उन्होंने जाना कि बच्चों को पालने और उन्हें बड़ा करने का कोई दूसरा तरीका भी हो सकता है।

तो इस तरह हम उनकी सहायता कर रहे हैं और उन्हें वह दूसरा रास्ता दिखाने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि वे अपने बच्चों से प्रेम करते हैं और समझ रहे हैं कि बिना हिंसा के बच्चों का लालन-पालन करना कितना अच्छा हो सकता है। अब उन्हें इस नए तरीके की आदत डालनी होगी और उनके बच्चों को भी। बच्चे भी पहले दो वर्ष तक मार खाते हुए ही बड़े हुए हैं और मार भी ऐसी कि जिसका कारण उन्हें अधिकतर समझ में नहीं आ सका, अधिकतर उन्हें बिना किसी चेतावनी के या बिना किसी स्पष्टीकरण के पीटा गया। अब उन्हें पुनः सीखना होगा कि नए नियमों का पालन करते हुए, अपने अभिभावकों में अचानक आए परिवर्तन के साथ और आश्रम के स्नेहिल वातावरण के साथ तालमेल बिठाते हुए अब उनका व्यवहार कैसा होना चाहिए।

मुझे विश्वास है कि उन अभिभावकों के साथ और उनके बच्चों के साथ इससे अच्छा कुछ नहीं हो सकता था। और आश्रम के लिए भी क्योंकि, जैसा कि मैंने कल कहा था, हम इसे अपनी बेटी के लालन-पालन के लिए एक आदर्श स्थान बनाना चाहते हैं-हिंसा रहित और प्रेम और सद्भाव से परिपूर्ण!

बच्चों के प्रति हिंसा: क्रूर, योजनाबद्ध पिटाई या आत्मनियंत्रण रहित मार-पीट की आदत- 24 फरवरी 2014

पिछले सप्ताह भारतीय अभिभावकों को लिखे एक पत्र में मैंने बच्चों के साथ मार-पीट करने वाले अभिभावकों के बारे में लिखना शुरू किया था। इस पर कई प्रतिक्रियाएँ आई हैं और मुझे लगता है कि मेरे ब्लॉग ने लोगों के दिलों को छुआ है और वे समझते हैं कि यह वास्तव में सही तरीका नहीं है। पश्चिमी देशों से भी कुछ प्रतिक्रियाएँ मिली हैं, जिनमें बताया गया है कि यह ठीक है कि बच्चों के प्रति हिंसा उनके देशों में सामान्य रूप से मौजूद नहीं है फिर भी इसे किसी नियम की तरह नहीं देखा जा सकता और कुछ लोग वहाँ भी ऐसे हैं, जो पढ़ाई-लिखाई के मामले में अक्सर हिंसा का प्रयोग करते हैं। आज मैं दो भिन्न मगर सामान्य रूप से प्रयुक्त हिंसाओं को स्पष्ट करने का प्रयास कर रहा हूँ- सज़ा देने वाले जिन्हें अलग-अलग ढंग से देखते-समझते है:

1) योजनाबद्ध और सप्रयोजन दी जाने वाली हिंसक सज़ा

यह एक ऐसी हिंसा है, जिसे स्कूलों में भी शारीरिक सज़ा के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। सज़ा के इस तरीके में बच्चों की पिटाई करने के लिए शिक्षक या अभिभावक अक्सर एक छड़ी, बेल्ट या ऐसी ही किसी चीज़ का उपयोग करते हैं, जिन्हें आम तौर पर नितंबों पर मारा जाता है या फिर ज़्यादा क्रूर तरीके से उँगलियों पर या शरीर के किसी और हिस्से पर भी। ऐसी सज़ा देने का एक प्रयोजन होता है: अभिभावक अपने बच्चे को सुधारना चाहते हैं। बच्चे को एक विशेष जगह पर आने के लिए कहा जाता है, जहां यह सज़ा दी जानी है और बच्चे को अक्सर पहले से बता दिया जाता है, जिसके कारण बच्चे के मन में पहले से ही डर समाया होता है।

इसके पीछे यह विश्वास होता है कि बच्चा यह गुस्ताखी दोबारा नहीं करेगा क्योंकि वह डरा हुआ होगा कि ऐसा करने पर उसे फिर यही सज़ा मिल सकती है। यह सज़ा न तो कारगर सिद्ध होती है बल्कि वह बच्चे के जेहन को (भावनाओं को) हमेशा-हमेशा के लिए क्षतिग्रस्त कर देती है और विशेष रूप से उसके साथ आपके संबंध को। क्या आप वाकई चाहते हैं कि आपका बच्चा आपसे डरे? कि आपकी बेटी अपने भयावह दुःस्वप्न में आपको छड़ी लिए हुए एक राक्षस के रूप में देखे?

2) आदतन या गुस्से के क्षणिक आवेश में पिटाई करना

बहुत से भारतीय ऊपर दिये गए सज़ा के तरीके को हिंसक मान भी लेंगे मगर उनमें से ज़्यादातर लोग इस दूसरे तरीके को सज़ा ही नहीं मानेंगे। यह बच्चे के नितंब पर या सिर पर एक तमाचा होता है, जिसे तब इस्तेमाल किया जाता है, जब बच्चा, मसलन, बार-बार गिलास का पानी बिखेरने की गलती करता है। आपस में लड़ते-झगड़ते या आपस में गुत्थमगुत्था दो या अधिक बच्चों को उनके कान उमेठते हुए अलग करना भी सज़ा की इसी श्रेणी में आता है। बच्चा जब ज़िद करे, आपकी बात न माने या दीवारों पर परमानेंट मार्कर से चित्रकारी करने लगे, तब गुस्से के आवेश में उसके गाल पर जड़ा तमाचा भी इसी श्रेणी की सज़ा है।

पल भर के लिए आप इतना क्रोधित हो जाते हैं कि अपने आवेश पर नियंत्रण नहीं रख पाते या बच्चे के अड़ियलपन या ज़िद के प्रति निराशा में इतना उत्तेजित हो जाते हैं कि बच्चे पर उठे हाथ पर आपका काबू नहीं रह जाता। आपमें क्षण भर का संयम नहीं रह जाता कि अपनी भावनाओं और गुस्से के विषय में सोच भी सकें लेकिन बच्चों के लालन-पालन में बड़े संयम की आवश्यकता होती है! आपने यह भी नहीं सीखा है कि बच्चे को छूने से पहले अपने गुस्से को ठंडा हो जाने दें। ये उदाहरण हैं, जहां अभिभावक, बाद में विचार करने पर, पछताते हैं कि बच्चे की पिटाई करना ज़रूरी नहीं था।

लेकिन इससे बड़ी समस्या यह है कि अब आप अपनी इन गलतियों का नोटिस भी नहीं ले पाते! यह व्यवहार आपकी आदत बन चुका होता है। ऐसी आदत, जिसके बारे में आप कहते हैं ‘मैं अपने बच्चों को कभी नहीं मारता’, जबकि आप हरदम यह करते रहते हैं।

यह बेहिचक कहा जा सकता है कि दोनों तरह की हिंसाएँ पूरी तरह अनुचित हैं।

एक और हिंसा है: शाब्दिक हिंसा! इसे भी कम नहीं आंकना चाहिये और इसीलिए इस पर एक पूरा ब्लॉग मैं कल प्रस्तुत करूंगा।

क्रूर धर्म किस तरह अपने अनुयायियों को यातना देते हैं – 10 अप्रैल 2013

कल मैंने धर्म से उपजी शारीरिक क्रूरता के बारे में लिखा था, जोकि आज भी इस धरती पर व्यापक रूप से पायी जाती है। हालांकि यह सच है और स्पष्ट ही बहुत भयानक भी है, मगर क्रूरता का एक और रूप भी है जो हमारे और भी नजदीक मौजूद है, हमारे घर के आसपास और वह है मानसिक क्रूरता।

शारीरिक हिंसा क्रूरता का सबसे आम तरीका है। जब आप धार्मिक हिंसा के बारे में कुछ कहते हैं तो आप महिलाओं को कोड़े मारने वाले इस्लामिक कट्टरपंथियों की हिंसा के बारे में सोचते हैं क्योंकि उन्हें पथभ्रष्ट माना जाता है। हो सकता है आपको क्रूसेड्स के समय की ईसाइयों की हिंसा की याद आ जाए, जो हर एक को अपने धर्म में दीक्षित करना चाहते थे। या आप हिंदुओं की सती प्रथा के बारे में सोच सकते हैं जिसमें मृत पति के साथ उनकी विधवाओं को ज़िंदा जला दिया जाता था। आपको आतंकवाद, बम धमाके और आत्मघाती हमलों की याद आ सकती है।

यह सब शारीरिक हिंसा है मगर हिंसा का एक और रूप मौजूद है और वह है मानसिक हिंसा। अक्सर यह हिंसा और भी ज़्यादा क्रूर हो सकती है! जब आप अपने विचारों में घृणा और हिंसा से भरे हुए होते हैं तो आप किसी को शारीरिक हमले से भी ज़्यादा बुरी तरह ज़ख़्मी कर सकते हैं। अल्पसंख्यकों के विरुद्ध एक बार जब यह मानसिक हिंसा संस्कृति में समाकर वहाँ सूक्ष्म अवस्था में मगर मजबूती के साथ पैर जमाए बैठ जाती है तब वह बेहद खतरनाक हो सकती है।

अगर आप अब भी नहीं समझे कि मैं किस हिंसा की बात कर रहा हूँ तो मुझे कुछ उदाहरणों की सहायता से अपनी बात रखनी होगी। जैसे हमारा देश भारत, इतने अर्से बाद भी जाति प्रथा को समाप्त नहीं कर पाया है। इस प्रथा की जड़ें धर्म में हैं और धर्म के कारण आज भी बहुत से लोग हैं जिन्हें अछूत समझा जा रहा है। क्या किसी इंसान से यह कहना कि तुम मेरा हाथ मत छुओ क्योंकि तुमने एक अछूत परिवार में जन्म लिया है, एक भयानक बात नहीं है? उस व्यक्ति को कैसा लगेगा जब उसे पता चलेगा कि जैसे ही उसने आपको छुआ आपने अपने आपको शुद्ध करने के लिए नहाने का निर्णय ले लिया है?

मुस्लिम औरतों के बारे में सोचें जिन्हें अपने आपको बुर्के में छिपाना पड़ता है, अपना सिर, अपने बाल, अपना चेहरा और अपना पूरा शरीर! कुछ लोग कह सकते हैं कि यह उनका अपना चुनाव है, अपना निर्णय है, वे बुर्के में अपने आपको सुरक्षित महसूस करती हैं, उन्हें यही उचित लगता है; मगर उनका क्या जिन्हें यह अच्छा नहीं लगता फिर भी मजबूरन पहनना पड़ता है? क्या यह मानसिक यातना नहीं है कि आप किसी औरत से कहें कि वह एक निम्न कोटि की प्राणी है जो अपना चेहरा दिखाकर मर्दों को रिझाने की कोशिश करती है। जब कोई मुस्लिम औरत बलात्कार का शिकार होती है, इस्लाम का नियम यह कहता है कि उसे चार गवाह प्रस्तुत करने होंगे अन्यथा फैसला उसके विरुद्ध सुनाया जाएगा। कल्पना कीजिए, बलात्कार की शारीरिक प्रताड़ना के बाद उसे मानसिक रूप से ध्वस्त करने का पूरा इंतज़ाम है।

इसाइयत भी कोई कम क्रूर नहीं है! आज भी बहुत से ईसाई हैं जो यह समझते हैं कि समलैंगिकता एक बीमारी है या उससे बढ़कर एक पाप कर्म है! किसी समलैंगिक पुरुष या महिला से पूछिए; वे बताएंगे कि उनके पास कोई चारा नहीं है, विपरीत लिंगी व्यक्ति की ओर उन्हें यौन आकर्षण हो ही नहीं पाता। इसके बावजूद लोग उनके साथ अपराधी का सा व्यवहार करते हैं, उन्हें घृणास्पद मानते हैं और अपने बच्चों को भी उनके बारे में यही बताते हैं! वे यह घृणा उन समलैंगिक जोड़ों द्वारा गोद लिए बच्चों के सामने भी व्यक्त करते हैं जिससे वे भी अपने माँ-बाप के प्रति घृणा महसूस करें। इससे ज़्यादा क्रूर बात क्या होगी कि आप छोटे-छोटे बच्चों को यह बताएं कि तुम्हारा लालन-पालन करने वाले माँ-बाप पापी हैं?

यह सब आपके घर के सामने हो रहा है! अब आप इन्हें यह कहकर अनदेखा नहीं कर सकते कि ये सब सुदूर दुनिया की सचाइयाँ हैं। यह सब आपके आसपास हो रहा है, आपके चारों तरफ और मैं आपको सिर्फ उनसे आगाह करना चाहता हूँ! मैं चाहता हूँ कि आप देखें कि कैसे दुनिया मैं फैल रही आपसी घृणा, डर और हिंसा समाज पर धर्म के बुरे असर का परिणाम है।

कोई धर्म नहीं है जो हिंसक नहीं रहा है, अगर शारीरिक स्तर पर नहीं तो मानसिक स्तर पर है। औरतों के विरुद्ध पक्षपात और भेदभाव बौद्ध धर्म में भी मौजूद है और इस तरह वह भी किसी न किसी तरह की हिंसा से अछूता नहीं है।

मैं नहीं कहता कि आप अपना धर्म छोड़ दें। मैं नहीं कहता कि आप अपने विश्वास को तिलांजलि दे दें। मैं आपसे सिर्फ यह अपेक्षा करता हूँ कि आप सोचें कि आप क्या करना पसंद करेंगे-हिंसा और क्रूरता का पक्ष लेना या परंपरा के चक्र को तोड़ने की पहल करना और प्रेम का प्रसार करना? अब यह आप पर निर्भर है कि आप अपने हित में इस प्रश्न का क्या जवाब देते हैं!

अतीत में धर्म क्रूर थे और आज भी वैसे ही हैं – 9 अप्रैल 2013

कल मैंने उन पुरातन धर्मों के बारे में लिखा था, जिनसे आजकल कुछ लोगों को बड़ा मोह हो गया है। यह अजीब बात है कि वे उनके क्रूर और भयावह पहलुओं को बड़ी आसानी से भूल जाते हैं या उन्हें अनदेखा करते हैं। जब वही आदिम क्रूरताएँ और सांस्कृतिक विश्वास उन्हें आज दिखाई देते हैं तब वे ऐसा नहीं करते!

उस आदिम धर्म या आदिम विश्वास को ढूंढने आपको अतीत में बहुत दूर नहीं जाना पड़ेगा। सिर्फ अफ्रीका के आदिवासियों के बीच जाएँ, जहां आज भी लोग पत्थरों और पेड़-पौधों के प्रेतात्माओं में विश्वास रखते हैं, जहां आज भी छोटी-छोटी बच्चियाँ और युवा औरतें खतने की यातना सहन करने के लिए मजबूर की जाती हैं। ऐसा वे इसलिए करते हैं कि वैसा आदिकाल से किया जा रहा है। परंपरा से, संस्कृति के नाम पर और अंत में पुरातन काल से चले आ रहे विश्वासों के कारण। हो सकता है आप उन्हें उस अर्थ में धर्म न मानें क्योंकि उसके नियम लिखे हुए नहीं हैं, लेकिन वे मौखिक रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी प्रसारित होते रहे हैं इसलिए दोनों में कोई अंतर नहीं हैं, वे भी धर्म ही हैं।

संभव है आप उसे सुदूर अतीत का होने के कारण कंधे उचकाते हुए कहें कि वे इतने पुरातन हैं जबकि यहीं, अफ्रीका में आज भी वैसी ही भयानक वारदातें हो ही रही हैं, बच्चे भूखे मर रहे हैं, युद्ध में रोज़ हजारों की संख्या में लोग मारे जा रहे हैं। आप सोच सकते हैं कि वे अफ्रीकी आदिवासी मानो उसी आदिम अतीत के अवशेष हैं। लेकिन मैं कहना चाहता हूँ कि ऐसी क्रूरता, परंपरा और विश्वासों की वही भयावह क्रूरता आगे फैलती हुई आज के, आधुनिक और विश्व के सबसे बड़े धर्मों का भी अभिन्न हिस्सा बन गई है!

ज़रा सऊदी अरब जैसे देशों पर गौर करें! हाल ही में एक बदमाश ने एक व्यक्ति को चाकू मार दिया जिसकी चोट से वह व्यक्ति लकवाग्रस्त हो गया। वहाँ इस्लामिक शरिया कानून लागू हैं जिनके अनुसार वहाँ के न्यायाधीशों ने उस अपराधी के लिए ऐसी भयानक सज़ाओं का प्रावधान किया जिसमें उसके मेरुदंड को चोट पहुंचाना शामिल था ताकि अपराधी भी किसी तरह लकवाग्रस्त हो जाए। आँख का बदला आँख, और खून का बदला खून!

इस दुनिया में ऐसी भी जगहें हैं जहां औरतें खरीदी बेची जाती हैं क्योंकि धर्म कहता है कि मर्दों के लिए औरतें किसी जिंस की तरह एक संपत्ति ही हैं। इसी दुनिया में ऐसी जगहें हैं जहां औरतों को मारा पीटा जाता है क्योंकि धर्म उनके माता-पिता और पतियों को आदेश देता है कि अगर औरतें आज्ञाकारी नहीं हैं तो उन्हें अनुशासन में रखना उनका कर्तव्य है। मैं कह रहा हूँ 'इस दुनिया में कुछ जगहें', और इससे ऐसा लगता है जैसे ऐसी जगहें कहीं सुदूर इलाकों में हैं। अगर मैं कहूँ कि ऐसा यहीं, आपके आसपास, चारों तरफ हो रहा है तो आप अनुभव करेंगे कि वाकई दुनिया के बहुत से लोगों के लिए यह एक दर्दनाक यथार्थ है! आप इन्हें देखकर अपनी आँखें बंद नहीं कर सकते!

क्रूरता, रक्तपात और युद्ध सभी धर्मों के अभिन्न हिस्से हैं। ईसाइयों की बाइबल में भी बहुत से क्रूर वाक्य हैं और हिंदुओं के विभिन्न धर्मग्रंथों में भी। आप उन धर्मग्रंथों की अच्छी बातों का हवाला देकर यह नहीं कह सकते कि आप सिर्फ उन अच्छी बातों का ही अनुकरण करते हैं। अगर आप किसी धर्म को मानते हैं तो फिर क्रूरता भी उस धर्म का हिस्सा है जिसका आप अनुकरण करते हैं क्योंकि आपका धर्म उन्हीं धर्मग्रंथों पर आधारित है।

अपने आपको धर्म की उस क्रूरता से अलग करने का सिर्फ और सिर्फ एक उपाय है और वह यह कि आप अपने आपको उस धर्म से ही अलग कर लें।

मेरा यह अटूट विश्वास है कि अधिकांश लोग किसी न किसी दिन यह अवश्य करेंगे और यह भी कि आज जिस रूप में हम धर्म को जानते हैं, वह अपना महत्व खो देंगे और अंततः समाप्त होकर इतिहास के गर्त में समा जाएंगे, जैसा कि उनके पहले के धर्मों के साथ भी हुआ है।

केल्टिक और अमरीका के मूल निवासियों की आध्यात्मिकता पर मुग्ध हैं? उनकी रक्तपिपासु क्रूरता पर भी गौर करें! – 8 अप्रैल 2013

शुक्रवार को हिमालय यात्रा पर गए सहभागी वापस आए। कुछ ऋषिकेश में रुक गए थे, जहां से उन्हें आगे की यात्रा करनी थी और बाकी आश्रम वापस आ गए। कल हमारे अंतिम मेहमान, हमारे मित्र सिल्विया, मेलोनी, थॉमस और आइरिस ने हमसे विदा ली। उन्मुक्त, बैठे ठाले और बतकही में उनके साथ एक और दिन बिताना सुखद रहा। इस दौरान मुझे थॉमस के साथ कुछ दिन पहले हुई एक चर्चा की याद आती रही: हमारे पूर्वजों की आध्यात्मिकता और कुछ लोगों का उसके प्रति आदर युक्त सम्मोहन।

मैंने थॉमस को बताया कि मैं समझता हूँ कि वर्तमान रूप में धर्म लोगों के साथ सदा के लिए नहीं रहने वाला है। वे सहमत हुए और हम लोग उन धर्मों के बारे में बातें करते रहे जो पहले अस्तित्व में थे और आज जिनकी हम सिर्फ कहानियाँ ही सुनते हैं।

हम जानते हैं कि यूनानी पौराणिक कथाओं में विभिन्न गुणों वाले सैकड़ों देवी-देवताओं का जिक्र आता है, अर्ध-देवता, दैत्य, आदि और जब भी लोग उनके बारे में सुनते हैं, उन्हें परी-कथाओं की, डिज्ने फिल्मों की और बच्चों के कॉमिक्स की याद आती है। रोमन देवता भी लगभग वैसे ही थे और हालांकि बच्चे स्कूलों में उनके बारे में पढ़ते हैं, मगर वे भी जानते हैं कि ये सब कोरी कल्पनाएँ हैं और यथार्थ से उनका दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं है। लेकिन इन सभ्यताओं से भी पहले कुछ संस्कृतियाँ थीं जिनके बारे में आम तौर पर बच्चों को पढ़ाया नहीं जाता। क्योंकि उन्हें पढ़ाया नहीं जाता और लोग उनके बारे में ज्यादा कुछ जानते नहीं हैं इसलिए जब भी वे उनके बारे में सुनते हैं तो वह सब उन्हें बड़ा दिलचस्प लगता है। उन लोगों के विश्वास, हालांकि बहुत व्यवस्थित नहीं थे और उन्हें 'धर्म' कहना ठीक नहीं होगा, मगर आखिर वे भी थे तो विश्वास ही, देवी-देवताओं पर, अलौकिक शक्तियों पर और यहाँ तक कि जादू-टोनों पर और काल्पनिक ऊर्जाओं पर। बहुत से लोग उनको लेकर अति उत्साहित और मंत्रमुग्ध हो उठते हैं और अगर पहले से उनका मानसिक विकास कुछ ऐसा हुआ है कि आसानी से प्रभावित हो जाता है तो वे उन विश्वासों को सच मान लेते हैं और उन्हें लगता है कि उस जमाने के विश्वास मौजूदा विश्वासों से भी बेहतर थे। पश्चिम में जैसा माहौल है उसमें उन्हें अमरीका के मूल निवासियों के विश्वासों को लेकर ज़्यादा मोह होता है जबकि कुछ लोगों को केल्ट लोगों के विश्वास अधिक आकर्षित करते हैं। यह अभी तक जारी है। जो लोग इन बातों पर भरोसा करते हैं और उनसे प्रभावित भी हैं वे बताएंगे कि कैसे उन लोगों के पास ज्ञान का खज़ाना था और कितनी बातें, जिन्हें हम भूल गए हैं, उनके यहाँ मौजूद थीं और यह भी कि उनकी सभ्यता इस ज्ञान और विचारों की बदौलत किस तरह आज की हमारी सभ्यता से अधिक शक्तिशाली और उन्नत थी।

सदियों पहले के उन मूल निवासियों के बारे में हमारी बहुत सी दूसरी जानकारियों को वे सिरे से नज़रअंदाज़ कर देते हैं! या फिर वे शायद उनके बारे में जानते ही नहीं हैं! थॉमस और आइरिस, जिन्हें जर्मनी में केल्ट्स लोगों द्वारा छोड़े गए अवशेषों की छानबीन करने में अच्छी ख़ासी रुचि रही है, बताते हैं कि एक बार वे एक संग्रहालय में गए थे जहां उनके पुरातन काल के कर्मकांडों को दर्शाया और उनका विवरण दिया गया था। वह सब उसके बिल्कुल विपरीत था जो आम तौर पर लोग उनके बारे में समझते हैं! उनमें मनुष्यों की बलि देने का रिवाज था मृतकों के कुछ हिस्सों का वे भक्षण भी करते थे क्योंकि वे मानते थे कि ऐसा करने से वे उन मृतकों की शक्तियों को प्राप्त कर सकते हैं। वे लोग बर्बर थे और आज के मूल्यों के अनुसार उन कृत्यों को अमानवीय कहा जाता। ठीक यही बात मैंने पिछले समय के अमरीका के मूल निवासियों के बारे में भी सुनी थी।

तो आप देखें, क्या हो रहा है-जो वे नहीं जानते उसके सम्मोह में वे खुद को और दूसरों को भी विश्वास दिलाना चाहते हैं कि पुरातन समय कितना महान था, कि उस समय लोग आज के मुकाबले अधिक आध्यात्मिक थे और जीवन और दुनिया के बारे में उनकी समझ हमसे बेहतर थी। वास्तविकता यह है कि वे लोग सिर्फ प्रेतात्माओं पर भरोसा किया करते थे क्योंकि उनके पास कई चमत्कारिक प्राकृतिक घटनाओं का कोई स्पष्टीकरण मौजूद नहीं था। वे बर्बर थे क्योंकि उनकी दुनिया कबीलों और कुटुम्बों के बीच हिंसक युद्धों तक सीमित थी। वे जंगली जानवरों का शिकार किया करते थे जिससे उन्हें खाने के लिए मांस, पहनने के लिए उनका चमड़ा और औज़ार बनाने के लिए उनकी हड्डियाँ उपलब्ध होते थे।

हाँ, अगर वे कहें कि पुरातन काल में जब चीज़ें सहज और सरल थीं तब समय आसान भी था, इस लिहाज से कि लोगों को बहुत सी चीज़ें उपलब्ध नहीं थीं या जब विज्ञान ने दुनिया की बहुत सी बातों को स्पष्ट नहीं किया था और लोगों के पास आज की तरह रोज़मर्रा के काम में सहायता के लिए उपकरण मौजूद नहीं थे और जब जीवन की रफ्तार धीमी थी और इस कारण आज की तरह भागमभाग नहीं थी; तो उनकी बात मानी जा सकती है। लेकिन वह समय आज से बेहतर नहीं था- वह तो रक्तरंजित, खूंखार, ठंडा और खतरनाक समय था।