बात करने के लिए कभी-कभी आपको किसी दूरस्थ मित्र की ज़रूरत पड़ती है – 8 सितंबर 2015

हाल ही में मैं अपने एक मित्र से बात कर रहा था। वह आस्ट्रिया में रहता है और उससे मेरी मुलाक़ात छह साल पहले अपने आस्ट्रिया दौरे के समय हुई थी। इस बीच हम लोग कभी-कभार बात करके एक-दूसरे के हालचाल ले लिया लिया करते थे, एक दूसरे की गतिविधियों के बारे में पूछ-ताछ कर लेते थे। पिछले हफ्ते उसका फोन आया, सिर्फ मौसम का हाल जानने के लिए नहीं बल्कि एक मित्र के रूप में, मुझसे मदद चाहता था।

हर व्यक्ति जानता है कि मित्र होते ही इसलिए हैं कि ज़रूरत पड़ने पर उनकी मदद ली जा सके। लेकिन ऐसे मौके भी आते हैं, जब आप अपनी कुछ बातें अपने करीबी मित्रों को नहीं बता सकते, आप कुछ बातें उनके साथ साझा करने में संकोच करते हैं। ऐसे वक़्त, आपका कोई ऐसा दूर रहने वाला मित्र हो, जो सारी परिस्थिति को कुछ दूर से देख-समझ सके, तो अच्छा होता है। मेरे आस्ट्रियाई मित्र के साथ कुछ ऐसा ही था।

जब पहले-पहल मेरा उससे परिचय हुआ था, तब, हाल ही में अपनी पत्नी और दो छोटे-छोटे बेटों के साथ वह अपने नए घर में रहने आया था। नई जगह में नए जीवन की शुरुआत करते हुए वे बहुत उल्लसित थे। उनका बड़ा बेटा उसी साल स्कूल जाना शुरू करने वाला था और सब कुछ बढ़िया चल रहा था।

फोन पर उसने मुझे बताया कि परिस्थितियों में बहुत सारी तब्दीलियाँ आ चुकी हैं। उसे पता चला है कि सालों से उसकी पत्नी उसके साथ छल कर रही थी और उनके साझा दोस्त के साथ उसके संबंध थे। इसलिए वह उससे अलग होकर तलाक लेना चाहता था। उसका दिल टूट चुका था और वह यह निर्णय ले भी चुका था: अर्थात, वह उसे भूल भी नहीं पा रहा था और उससे संबंध भी तोड़ना चाहता था।

यह समझने के लिए कि वह अपने स्थानीय मित्रों से इस बारे में बात क्यों नहीं कर सकता था, आपको दो और बातें जाननी आवश्यक हैं। मेरा दोस्त बहुत छोटे से गाँव में रहता था, जहाँ हर कोई अक्षरशः एक-दूसरे को जानता है। संबंध टूटने या संबंध में तनाव होने जैसी कोई भी खबर वहाँ छिपी नहीं रह सकती थी- बाज़ार-मुहल्लों में इसकी चर्चा होनी शुरू हो जाती और तुरंत हर कोई इसे जान सकता था।

दूसरा कारण यह था कि उसकी पत्नी कुछ समय से शराब की आदी हो चुकी थी। मेरे मित्र ने पत्नी की मदद की लेकिन इस बात का भी भरसक प्रयास किया कि गाँव में यह बात न फैले। वह अपनी पत्नी को, परिवार की प्रतिष्ठा को और बच्चों को इन सब परेशानियों से दूर रखना चाहता था और उन्हें बदनामी से बचाना चाहता था।

और अभी भी वह यही कर रहा था। वह अपना सिरदर्द अपने दोस्तों के साथ साझा नहीं करना चाहता था-वह अपनी वैवाहिक समस्याओं के बारे में उनसे कहना नहीं चाहता था सिर्फ इसलिए कि सारा गाँव तुरंत इस बात को जान जाएगा। दूसरी समस्या यह थी कि पत्नी की शराब की लत की वजह से वह अपने बेटों को उसके पास छोडना नहीं चाहता था! बिना पत्नी को तकलीफ पहुँचाए यह बात भी वह किसी से नहीं कह सकता था- कम से कम वह ऐसा समझता था! क्योंकि, हर कोई वह बात जान जाएगा, जिसे वह इतने समय से छिपाने की कोशिश कर रहा था!

तो इस तरह उसने मुझे यह पूछने के लिए फोन किया था कि क्या किया जाए।

सबसे पहले तो मैंने उससे कहा कि उसके और शीघ्र ही भूतपूर्व हो जाने वाली पत्नी के विषय में लोग क्या सोचेंगे, उसे इस बात की चिंता छोड़ देनी चाहिए! उससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। उसके दिल में मची हलचल, उसकी भावनाएँ और उसके बच्चे अधिक महत्वपूर्ण हैं! इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि दूसरे क्या सोचते हैं और दूसरे क्या कहेंगे- उसके बच्चों को सुरक्षित होना चाहिए! उसे चिंता न करने की सलाह देने के अलावा मैंने उससे कहा कि किसी अच्छे वकील से मिलकर उससे सारी बातों की चर्चा करे।

फिर अपने दोस्त से मिले और बात करे। आपको चाहिए कि अपने अंदर की बात किसी न किसी को अवश्य बताएँ! उसकी पत्नी को शराब की लत के संबंध में मदद की ज़रूरत है और यह बात छिपाकर कोई लाभ नहीं है, उससे यह लत छूटने वाली नहीं है। उसे दबाने की कोशिश करके वह उसकी कोई मदद नहीं कर रहा होगा-और अंत में मैंने उससे कहा कि अब तुम्हारे बेटों को तुम्हारी ज़रूरत है!

मैंने उसे उससे कहा कि कैसे गाँव छोड़कर किसी दूसरे शहर में रहना भी एक विकल्प हो सकता है, फिर से एक नया जीवन शुरू करना- लोगों की बेकार चर्चाओं से, अफवाहों, कानाफूसियों से दूर किसी शांत जगह में। इस बीच एक दिन सब ठंडा पड़ जाएगा और सिर्फ वही, जो उसके सच्चे मित्र हैं, उसके साथ खड़े रहेंगे!

वह खुश हुआ, मुख्य रूप से इसलिए कि वह किसी से अपनी बात साझा कर सका। और मैं खुश हूँ कि मेरे ऐसे मित्र भी हैं, जो आवश्यकता पड़ने पर मुझे, इतनी दूरी के बावजूद, याद कर लेते हैं!

मोनिका का शराबी और हिंसक पिता – क्या इसे नियति समझकर स्वीकार कर लेना चाहिए? 18 दिसंबर 2014

जब हमें मोनिका के साथ हुए हादसे का पता चला, हमने तुरंत निश्चय किया कि हम उसे अस्पताल ले जाएँगे। स्वाभाविक ही पहले हम उसके अभिभावकों से इस विषय में बात करना चाहते थे इसलिए उसकी माँ दूसरे दिन हमारे स्कूल आई। उससे बात करने के बाद उसकी पहचान गुप्त रखते हुए मैंने उस पर एक ब्लॉग भी लिखा था। उसने मुझसे कहा कि उसे कोई परेशानी नहीं है और इस तरह आज यहाँ मैं पूरी कहानी लिख रहा हूँ। कल मैं उसके परिवार की खराब आर्थिक स्थिति के विषय में विस्तार से लिख चुका हूँ– लेकिन सिर्फ पैसा ही समस्या नहीं है!

मोनिका की माँ की सबसे बड़ी समस्या उसका पति है। इतना ही नहीं है कि वह कोई काम नहीं करता। जी नहीं, उसमें और भी बहुत सी बुराइयाँ हैं। शराब पिए बगैर वह एक दिन भी नहीं रह सकता। जब वे लोग स्कूल आए थे तब पत्नी ने हमें यह बताया था और यही बात स्कूल में बेटी ने बताई और जब हम उनके घर गए थे, तब दोनों ने बताई। वह मानने के लिए तैयार ही नहीं हो रहा था मगर जब दोनों अड़ गईं, तब उसे मानना ही पड़ा।

अपने व्यसन के लिए वह कहीं न कहीं से पैसों का जुगाड़ कर ही लेता है। भले ही वह खुद कुछ कमाता-धमाता नहीं है मगर घर में पत्नी के रुपयों की खोज में लगा रहता है और उसके पैसे चुराकर सिगरेट और शराब का अपना शौक पूरा करता है।

जैसे अब भी कोई कसर बाकी हो, शराब के नशे में अपने भाइयों, पड़ोसियों, यहाँ तक कि सड़क चलते अजनबियों तक से लड़ता-झगड़ता रहता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि पत्नी और बच्चों से तो लड़ता ही है। ऐसी-ऐसी गालियाँ देता है कि कोई सोच भी नहीं सकता कि कोई पिता अपनी 12 साला बच्ची से कह सकता है। वह देर रात शराब पीकर घर आता है, सबको जगाता है और लड़ाई-झगड़ा शुरू कर देता है-इस बात से उसे कोई मतलब नहीं होता कि उसकी पत्नी को काम पर जाने के लिए सुबह 5 बजे तड़के उठना पड़ता है।

वाद-विवाद से जब बात नही बनती तो वह मार-पीट पर उतर आता है। पत्नी से, बच्चों से। अपनी उस बच्ची के साथ भी मार-पीट करता है, जिसके साथ अभी हाल ही में ऐसी भीषण दुर्घटना घटी है कि उसका पूरा चेहरा, सीना और हाथ जल चुके हैं।

और यहीं आकर वह प्रश्न उपस्थित होता है, जिसे हमने मोनिका की माँ से अस्पताल जाते हुए एक बार फिर पूछा: वह ऐसे ज़ालिम व्यक्ति को छोड़ क्यों नहीं देती? अपने बच्चों को लेकर ऐसे निकृष्ट माहौल से दूर कहीं चली क्यों नहीं जाती?

उसने बताया कि इसी कारण उसने अपनी छोटी बेटी को अपने माता-पिता के पास भेज दिया है: काम पर जाते वक़्त वह उसे अपने पति के पास अकेला छोड़ना नहीं चाहती! जब बच्चे छोटे थे, तब वह कई बार महीनों उन्हें लेकर अपने अभिभावकों के यहाँ रहने चली जाती थी मगर अब स्कूल की छुट्टियाँ बहुत कम होती हैं और उसे काम पर भी जाना पड़ता है, इस वजह से वह ऐसा नहीं कर पाती।

तुम सब कुछ छोड़कर क्यों नहीं कहीं और चली जाती? इस परिवार से, जिसका कोई सदस्य तुमसे बात तक नहीं करता, तम्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होता! जब तुम्हारे पास घर के बरतन-भांडे और कपड़े-लत्ते तक खरीदने के लिए पैसे नहीं थे, तब तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हें खरीदकर दिए और तुम खुद कमाकर अपने बच्चों की परवरिश कर रही हो! अगर वहाँ तुम्हारे पास कुछ है तो महज सोने के लिए एक कमरा भर है-और अपनी आमदनी का दसवाँ हिस्सा खर्च करके तुम्हें वह भी किराए पर मिल सकता है!

उसने कहा कि वास्तव में उसने इस बारे में सोचा था और अपने माता-पिता को भी इस बारे में बताया था। लेकिन उनके जवाब से उसकी हिम्मत टूट गई: "बेटी, यह तुम्हारी किस्मत है, तुम अपने भाग्य के विरुद्ध कुछ नहीं कर सकती।"

इसका अर्थ यह हुआ कि अपने नशेड़ी पति की शराब के लिए पैसे कमाओ और ऊपर से उसके हाथों खुद अपनी और बच्चों की पिटाई बर्दाश्त करो! उसके मुँह से निकले ये शब्द सुनकर हमें कैसा लगा होगा, आप कल्पना कर सकते हैं! इस परिवार की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है-लेकिन उसका अगला हिस्सा मैं आपको कल बताऊँगा!

मोनिका की मदद के काम में हम पूरी एकाग्रता के साथ लगे हुए हैं और निश्चित जानिए कि हमारा और आपकी सहायता का एक रुपया भी उसके पिता के पास नहीं पहुँच पाएगा! हम सभी बिलों का भुगतान खुद ही करेंगे और परिवार की किसी भी तरह की मदद भी सिर्फ उन्हीं के लिए होगी यानी एक-एक रुपया उसी मद में खर्च किया जाएगा, जिस काम के लिए वह नियत किया गया है!

मोनिका की मदद और उसके इलाज के हमारे काम में आप भी मदद कर सकते हैं! आप उसके अपघात के बारे में यहाँ पढ़ सकते हैं और कैसे सहायता करें, यहाँ जान सकते हैं!

पत्नी को पीटने वाले शराबी बाप ने 9 साल तक अपनी बेटी को स्कूल भी नहीं भेजा – हमारे स्कूल के बच्चे- 24 अक्टूबर 2014

आज फिर शुक्रवार है और अपने स्कूल के किसी बच्चे से आपको मिलवाने का दिन। आज फिर एक ऐसे बच्चे की बारी है जिसे, उम्र के हिसाब से, चौथी कक्षा में होना चाहिए मगर जो अभी सबसे निचली कक्षा में पढ़ रही है! वह एक लड़की है, नौ साल की शालिनी।

शालिनी अपने भाई-बहनों में सबसे बड़ी है और अपने माँ-बाप, दो भाइयों और एक बहन के साथ वृन्दावन के पुराने इलाके में रहती है। वे एक चार कमरों के मकान के एक कमरे में रहते हैं, जो निचली मंज़िल पर है और उसकी दीवारें चारों तरफ से दूसरे कमरों की दीवारों से इस तरह से घिरी हैं कि दिन में भी सूरज का उजाला उनके कमरे तक नहीं पहुँच पाता। बाकी के तीन कमरे शालिनी के चाचाओं के कब्जे में हैं, जहाँ वे सब अपने-अपने परिवारों के साथ रहते हैं।

उनके बीच इसी तरह से संपत्ति का बंटवारा हुआ है, जिसमें यह भी स्पष्ट किया गया है कि सभी भाई अपना-अपना कमाएँगे और अपने बलबूते पर अपने-अपने परिवार का भरण-पोषण करेंगे। दुर्भाग्य से शालिनी का पिता अपनी पत्नी और बच्चों को पर्याप्त साधन मुहैया नहीं करा पाता।

वह कढ़ाई करता है और देवताओं की मूर्तियों के कपड़े सीता है। जब हमने शालिनी की माँ से पूछा तो उसने बताया कि वह लगभग 50 रुपए रोज़ ही कमा पाता है, जो एक डॉलर से भी कम होता है! हम विश्वास नहीं कर सके: हम ऐसे मजदूरों तक को जानते हैं, जो इससे छह गुना कमाते हैं! पीछे से एक पड़ोसी ने हमें ऊँची आवाज़ में बताया: वह शराब भी बहुत पीता है! शालिनी की माँ इस बात की ताईद करती है: अपनी कमाई का अधिकांश हिस्सा वह शराब में खर्च कर डालता है। और फिर क्या होता है? शाम को शराब पीकर आता होगा और तुम्हें पीटता होगा? हाँ! और बच्चों को? नहीं, उन्हें वह हाथ नहीं लगाता।

बस इतनी ही इस घर की कहानी है, जिसे पड़ोसियों ने और घरेलू प्रताड़ना की शिकार उस महिला ने बड़ी गंभीरता और सादगी के साथ बिना किसी भावोद्रेक के बयान कर दिया। पति का शराबी होना ही उसके दुख का कारण है, इसी कारण बच्चों को पहनने के लिए ठीक कपड़े नहीं मिल पाते और इसी कारण, जब खाने तक के लाले पड़ जाते हैं, उसे पति के भाइयों के सामने हाथ फैलाना पड़ता है। वे या तो बच्चों को खाना खिला देते हैं या फिर आटा, दाल, चावल देकर उसकी मदद करते हैं।

लेकिन उनके पास भी इतने पैसे नहीं होते कि बच्चों के स्कूल की फीस भी जमा करा दें! अपने बच्चों के साथ भाई के बच्चों को भी स्कूल भेजें, यह उनके सामर्थ्य से बाहर की बात है। यही कारण है कि नौ साल उम्र हो जाने के बाद भी शालिनी ने स्कूल का मुँह नहीं देखा था।

जिस दिन पहली बार वह स्कूल आई तो बहुत उत्साहित थी। अब उसे स्कूल आते हुए चार माह हो गए हैं और यहाँ आना उसे बहुत भाता है! यहाँ बड़ा मज़ा है, उसने कुछ दोस्त बना लिए हैं और पढ़ना लिखना उसे बहुत अच्छा लगता। हम आशा करते हैं कि भविष्य में उसे एक प्यार करने वाला पति प्राप्त होगा, उसके साथ मार-पीट करने वाला नहीं। उसे ऐसा भविष्य मिलेगा, जिसमें उसे अपने और अपने बच्चों के लिए किसी दूसरे से खाना मांगने की ज़रूरत नहीं होगी।

उस जैसे बच्चों की मदद करने के हमारे काम में आप भी सहभागी हो सकते हैं! एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करें! शुक्रिया!

शराब ग़रीबों को और गरीब बनाती है – हमारे स्कूल के बच्चे – 6 जून 2014

आज मैं आपका परिचय अपने स्कूल की एक लड़की, अंजलि से करवाना चाहता हूँ, जो 14 साल की है और हमारे स्कूल की तीसरी कक्षा में पढ़ती है। वह एक बड़े परिवार के साथ रहती है, जो एक बड़ी समस्या से जूझ रहा है। यही समस्या उन्हें अपनी गरीबी से जान नहीं छुड़ाने देती और यह समस्या है: शराब!

चार बच्चों में अंजलि सबसे छोटी है। पिछले बरस उसकी सबसे बड़ी बहन का विवाह हुआ था और इसलिए अब उनके छोटे से कमरे में सोने के लिए पाँच लोग रह गए हैं। लेकिन उस इमारत में और भी बहुत से लोग रहते हैं: उसके पिता के सात भाई हैं और इन आठ भाइयों में से तीन अपनी पत्नियों और बच्चों सहित इसी इमारत में साथ-साथ रहते हैं।

जब परिवार के सारे सदस्य इकट्ठा हो गए तो हमने अंजलि के पिता से पूछा कि परिवार की आमदनी का ज़रिया क्या है। वह स्वयं एक राजगीर (मिस्त्री) है और अंजलि का सबसे बड़ा भाई देव-मूर्तियों के कपड़े सीता है। पिता ने बताया कि दोनों मिलकर 160 $ यानी लगभग 9000₹ कमा लेते हैं। इसी बिंदु पर उसकी पत्नी ने मुस्कुराते हुए उलाहना दिया: काफी समय से यह बीमार है और काम पर गया ही नहीं है! बीमारी क्या है, हम पूछते हैं और जवाब मिलता है: लीवर ख़राब है।

स्वाभाविक ही, हमें इशारा मिल गया कि अवश्य ही इसे शराब की लत है। हमारे पूछने पर सीधा जवाब देने से वह कतराता रहा, इतना भर कहा कि बीच-बीच में वह पीना छोड़ देता है। इसलिए हमने आगे पूछा: यानी तुम पीते तो हो; कितना पीते हो? "माह में सात या आठ दिन" अंजलि के पिता के जवाब की प्रतिक्रिया में उसकी पत्नी फिर हँस देती है और दिनों को सुधारकर "पंद्रह से बीस दिन" कर देती है!

परिवार के लिए राहत की बात यह है कि वह शराब पीकर बहकता नहीं है और न ही हिंसक होता है- बस, शराब पीकर सो जाता है। लेकिन शराब के दूसरे नतीजे परिवार के लिए बहुत तकलीफदेह सिद्ध होते हैं: वह सिर्फ शराब पर पैसे बरबाद नहीं करता बल्कि दूसरे दिन सबेरे समय पर उठता नहीं है इसलिए काम पर नहीं जा पाता और घर में बैठा रहता है और स्वाभाविक ही कुछ कमाकर नहीं ला पाता। इसके अतिरिक्त अब उसे लीवर की बीमारी हो गई है और उसकी दवाइयों के लिए भी रुपयों की ज़रुरत पड़ती है। कुल मिलाकर, इस वक़्त बड़े बेटे की कमाई से ही घर का खर्च चल पा रहा है।

परिवार के लिए इसके अलावा दूसरा सहारा उनकी भैंस है, जो रोज़ चार से पांच लीटर दूध देती है, जिसके चलते न सर्फ बच्चों के लिए दूध उपलब्ध हो पाता है बल्कि दूध बेचकर थोड़ी-बहुत अतिरिक्त आय भी हो जाती है।

उनके खेत, जो कुछ साल पहले तक उनकी मिल्कियत थे और जिससे होने वाली आमदनी से उनके बहुत से खर्चे अदा किए जाते थे, सन 2010 में यमुना नदी में आई भयंकर बाढ़ में बह गए। अब यमुना ने अपना प्रवाह थोड़ा सा बदल दिया है और जो खेत पहले उनकी संपत्ति थे, अब यमुना का पाट बन गए हैं।

इसलिए अंजलि पिछले चार साल से हमारे स्कूल में पढ़ रही है। शिक्षिकाओं से बात करने पर आपको पता चलेगा कि वह पढ़ाई के प्रति पूर्ण समर्पित है। शिक्षिकाएँ यह भी बताती हैं कि स्वभाव से भी वह बड़ी हँसमुख है और बात-बात पर हँसती रहती है और हमेशा दूसरों की सहायता के लिए तत्पर दिखाई देती है। और सबसे बड़ी बात यह कि पढ़ाई में पूरा मन लगाती है और किसी विषय को समझने में उसे देर नहीं लगती।

अगर आप हमारे स्कूल के ज़रिए अंजलि जैसे बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा और मुफ्त भोजन की हमारी इस परियोजना का हिस्सा बनना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। आप किसी एक बच्चे को प्रायोजित करके या स्कूल के बच्चों के एक दिन के भोजन का खर्च वहन करके ऐसा कर सकते हैं।

जुआ और शराब के कारण घर-खर्च के लिए कुछ भी नहीं बच पाता – हमारे स्कूल के बच्चे- 7 मार्च 2014

आज एक बार फिर शुक्रवार है और आज के दिन आप हमारे स्कूल के किसी बच्चे का परिचय प्राप्त करते हैं. आज आठ साल की एक खुशमिजाज़ लड़की, शैली, जो हमारे स्कूल की सबसे निचली कक्षा, लोअर के जी में पढ़ रही है, जहाँ बच्चों को वर्णमाला, बालगीत और कविता-पाठ सिखाया जाता है.

शैली कभी-कभी ‘सेल’ कहकर अपना परिचय कराती है और अक्सर आप उसे इधर-उधर दौड़ते-भागते, हँसते-खिलखिलाते और खेलते-कूदते देख सकते हैं. इसी तरह उससे हमारी मुलाकात भी एक लड़के के यहाँ हुई थी, जिससे मिलने हम उसके घर आए थे. वह अभी तक अपने स्कूल ड्रेस में ही थी, जब कि स्कूल से वह कई घंटे पहले आ चुकी होगी- उसे कपड़े बदलने की कोई चिंता ही नहीं थी.

हमने उससे कहा कि हमें अपने घर ले चले और वहां हम उसके माँ और उसके परिवार वालों से मिले और तब इस लड़की की पृष्ठभूमि के बारे में पता चला. उसका पिता राजगीर है और हर माह 50 डालर के करीब कमा लेता है, जो लगभग 3000 रूपए होता है लेकिन उसकी माँ बताती है कि अक्सर घर-खर्च के लिए उनके पास ज्यादा कुछ बचा नहीं रहता क्योंकि पैसा लगाकर वह जुआ और ताश खेलता है. कभी-कभी थोडा बहुत जीतता भी है मगर अक्सर पैसा गंवाकर घर लौटता है. और जब वह जीतता भी है तो उन रुपयों की शराब पी जाता है.

कुल मिलाकर न तो उसकी पत्नी के लिए कुछ बचता है और न ही उसकी दो लड़कियों और दो लड़कों के लिए. इसीलिए वे अब भी अपने पुराने मकान में ही रह रहे हैं, जिसमें ईंटों से बने दो कमरे भर हैं और नहाने का स्थान और संडास तक नहीं है. नहाने का काम बाहर खुले बरामदे में होता है और बहुत सा सामान बाहर गटर के ऊपर सड़क पर पड़ा रहता है.

शैली की दो बड़ी बहनें हैं लेकिन दोनों भाई उससे छोटे हैं. लेकिन, जैसा कि दिखाई दे रहा है, जल्द ही वह अपने घर की सबसे पढ़ी-लिखी लड़की हो जाएगी. उसकी एक बहन कुछ साल एक सरकारी स्कूल में पढ़ती रही थी लेकिन वहां वह ठीक तरह से लिखना-पढ़ना भी सीख नहीं पाई. अब वह वहां नहीं जाती. जब हमने उसकी माँ से पूछा कि वह लड़की कितने साल की है तो उसने बताया: 18 या 19 साल, जबकि वह ज्यादा से ज्यादा लगभग 13 या 14 साल की लगती है. संभव है परिवार उसकी शादी करने की फिराक में है और अभी से यह प्रचार करने में लग गया है कि वह शादी की कानूनी उम्र पार कर चुकी है. हमने उसी वक़्त उनसे कहा कि अगले साल से उसे भी हमारे स्कूल में पढ़ने के लिए भेज दें, हमें उसे शिक्षित करके बहुत प्रसन्नता होगी.

क्योंकि इस परिवार की परिस्थिति शैली के खुशमिजाज़ स्वाभाव से मेल नहीं खाती थी, हम इस मुलाक़ात के बाद एक बार के लिए सोच में पड़ गए. शिक्षिकाएं चीजों को आत्मसात करने की और काम करने की उसकी क्षमता देखकर उसकी प्रशंसा करती हैं-और स्वाभाविक ही हमेशा बताती रहती हैं कि वह कितनी जिंदादिल है. हम आशा करते हैं कि हम उसे आगे भी पढ़ाते रहने में सफल होंगे और सिर्फ शैली को ही क्यों, अगले साल से उसकी बड़ी बहन को भी!

अगर आप हमारे इस शिक्षा-प्रकल्प में कोई हिस्सेदारी करना चाहते हैं तो आप किसी एक बच्चे को प्रायोजित करके या बच्चों के एक दिन के भोजन की व्यवस्था करके ऐसा कर सकते हैं. या आप कोई भी रकम दान में देकर भी ऐसा कर सकते हैं.

शुक्रिया!

यह 16 साल की बच्ची इतनी पार्टियाँ क्यों करती रहती है! 2 फरवरी 2014

सन 2006 में जब मैं आस्ट्रेलिया में था, मेरे एक व्यक्तिगत सत्र में एक महिला अपनी सोलह साल की लड़की को लेकर आई। वह अपने लिए नहीं, अपनी बेटी के लिए सलाह चाहती थी। लेकिन चीजों को देखने का लड़की का नज़रिया कुछ अलग था। मैं आपके सामने पूरी कहानी खोलकर रखता हूँ:

जब वे कमरे में आईं तो माँ-बेटी नहीं, आपस में बहनें लग रही थीं। दोनों ने मेकअप किया हुआ था मगर एक-दूसरे से विपरीत असर डालता हुआ: जब कि सोलह वर्षीय किशोरी लगभग उन्नीस या बीस की लग रही थी, उसकी माँ, जो चालीस के ऊपर होगी, 35 की लग रही थी। दोनों के कपड़ों का भी यही हाल था: फैशनेबल और शरीर की गोलाइयों को रेखांकित करते हुए। लेकिन उनके चेहरों के हाव-भाव से दोनों के बीच के सम्बन्धों का पता चल जाता था: माँ अपनी अनिच्छुक बेटी को बात करने के लिए लगभग मजबूर कर रही थी।

वे कमरे के भीतर आईं और मैंने तुरंत तय कर लिया कि मैं पहले माँ से कहूँगा कि वह बात कर ले और फिर लड़की से पूछूंगा कि क्या वह मुझसे अकेले में बात करना चाहेगी-एक दबंग माँ का बेटी के साथ होने वाले सलाह सत्र में उपस्थित होना बेटी को खुलने नहीं दे सकता था, विशेषकर एक किशोर बेटी का उसके सामने अपने मन की बात खुलकर कहना संभव नहीं था!

माँ ने समस्या को विस्तार के साथ सामने रखा: उसकी लड़की रोज़ ही पार्टियों में जाना पसंद करती है। उन पार्टियों में अक्सर वह ज़्यादा पी लेती है और रात में देर से घर आती है और कई बार तो सुबह तक उसका पता नहीं होता! इसके अलावा हमेशा वह अकेले नहीं आती, अपने साथ लड़कों को भी साथ ले आती है और फिर वे सब रात भर उनके यहाँ रहते हैं! माँ के अनुसार एक सोलह साल की किशोरी को यह व्यवहार शोभा नहीं देता! उसने अपनी बेटी के साथ कई बार इस विषय पर गंभीरता के साथ बात की, डांटा-डपटा, मना किया लेकिन उसने माँ की एक नहीं सुनी, न अपना रवैया बदला और अपनी मर्ज़ी के अनुसार करती रही, इस तरह उसने माँ का अपमान भी किया।

मैंने किशोर बच्चों में यह समस्या अक्सर देखी है, विशेषकर पश्चिमी देशों में। उनकी जीवन पद्धति और उसके चलते उनके अभिभावकों को होने वाली परेशानियों को भी मैंने नजदीक से देखा है। जैसा कि मैंने तय किया था, माँ से बात करने के बाद मैंने उससे कहा कि अपनी लड़की को वहीं छोड़कर वह कुछ देर बाहर बैठे। जब वह बाहर चली गई, वही कहानी लड़की के नज़रिये से मेरे सामने आई।

कहानी बहुत साधारण थी: "मेरी माँ वही सब कुछ खुद भी करती है! जब वह करती है तब ठीक है और जब मैं करती हूँ तो उसे गलत लगता है, क्यों?"

तो यह बात है! उसकी बात मुझे अच्छी तरह समझ में आ गई और लगा कि सलाह की आवश्यकता इस किशोर बेटी को नहीं, उसकी माँ को है।

अगले सप्ताह मैं आपको बताऊंगा कि उसकी माँ से मैंने क्या कहा।

बाल विवाह, बाल मजदूरी और शराबखोरी की समस्या – हमारे स्कूल के बच्चे – 24 जनवरी 2014

आज मैं राजेन्द्र नाम के एक लड़के के बारे में लिखना चाहता हूँ, जिसे मैं पहले ही आपसे मिलवा चुका हूँ। पहले हम उसके परिवार के बारे में सकारात्मक विचार रखते थे मगर दुर्भाग्य से अब हम ऐसा नहीं सोच सकते और सिर्फ आशा ही कर सकते हैं कि हमें भविष्य में कुछ वर्ष राजेन्द्र को शिक्षित करने का अवसर मिल सकेगा।

जब सन 2010 में मैंने उसके परिवार के विषय में लिखा था तब उनका परिवार कुछ माह पहले ही वृन्दावन आया था और राजेन्द्र का पिता काम की तलाश में इधर-उधर भटक रहा था। न सिर्फ अपने लिए बल्कि अपने ससुर, साली, अपनी बेटी और दो बच्चों के लिए। उन्होंने बच्चों की माँ के देहांत की दिल दहला देने वाली कहानी सुनाई कि कैसे वह किडनी की बीमारी का इलाज न हो पाने के कारण चल बसी, कैसे उसके पिता के भाई ने ख़ुदकुशी कर ली थी और कैसे उन्हें अब किसी न किसी रोजगार की बेतरह आवश्यकता है।

हमने परिवार के तीन वयस्क सदस्यों को काम पर रख लिया और बच्चों को अपने स्कूल में भर्ती कर लिया और कोशिश की कि उनके परिवार की दुखद परिस्थिति में कुछ सकारात्मक परिवर्तन ला सकें। जबकि बच्चों का दादा और चाची बहुत जल्दी आश्रम छोड़ कर गाँव वापस चले गए, उसके पिता, जो रिक्शा चलाने लगा था, स्कूल के बच्चों को रोज़ घर से लेकर और वापस घर छोड़कर आता था। बहुत जल्दी पता चल गया कि जो नियमित भुगतान हम उसे करते थे वह उसके लिए पर्याप्त नहीं था। उसने ज़्यादा वेतन की मांग की और अक्सर हमसे अतिरिक्त रुपये मांगने आया करता था और बहुत जल्द हमें पता चल गया कि रुपयों की उसकी मांग पूरी करना हमारे लिए काफी महंगा पड़ेगा। फिर हमें शक भी हुआ कि वह अपनी आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा शराब में उड़ा देता है। फिर भी हम उसके बच्चों की मुफ्त शिक्षा में कोई व्यवधान आने नहीं देना चाहते थे।

फिर एक दिन अचानक उसकी लड़की, राजबाई ने स्कूल आना बंद कर दिया। हम उसके घर गए और पूछा कि वह स्कूल क्यों नहीं आ रही है और हमें पता चला कि वह अपने गाँव, अपनी चाची से मिलने गई है और एक-दो माह वापस नहीं आएगी। हमने समझाया कि एक-दो माह स्कूल में अनुपस्थित रहना उसकी पढ़ाई के लिए कितना बुरा हो सकता है। उसने कहा कि जितना जल्दी हो सकेगा वह उसे स्कूल भेज देगा। मगर ऐसा नहीं हुआ और बाद में पता चला कि वह वृन्दावन वापस तो आई है मगर किसी घर में नौकरानी का काम कर रही है। फिर एक साल बाद हमने सुना कि उसका विवाह हो गया है। वह 2010 में तेरह साल की थी यानी अपने विवाह के समय वह सिर्फ पंद्रह साल की थी।

जब इस विषय में आप उसके पिता से बात करते हैं तो वह इस बात पर अड़ जाता है कि वह अठारह साल की है और कुछ माह पहले ही उसका विवाह हुआ है। यहाँ तक कि वह हमें समझाने की कोशिश करता है कि उसके पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था क्योंकि उसके पास इतना रुपया नहीं होता था कि उसका भरण-पोषण कर सके। जब आप उसके छोटे भाई, राजेन्द्र से पूछते हैं तो वह भी वही रटा-रटाया जवाब दे देता है: ‘विवाह के समय वह अठारह साल की थी!’ उसका जन्म-प्रमाण-पत्र बनवाया ही नहीं गया कि इस झूठ का प्रतिवाद किया जा सके।

पिछले साल जब स्कूल के नए सत्र की शुरुआत हुई, उसके बड़े भाई, नरेंद्र ने भी स्कूल आना बंद कर दिया। तब वह चौदह साल का होगा और उसने एक चाय की दुकान में नौकरी कर ली और चाय बेचने लगा था। हमें बताया गया कि अब पढ़ाई में उसकी कोई रुचि नहीं रह गई है और जब लड़के से पूछते तो उसके मुंह से शब्द नहीं निकलते थे। परिवार में हम किसी को भी शिक्षा का महत्व समझाने में असमर्थ रहे और उन्हें शिक्षित करने के हमारे सारे प्रयास असफल होते चले गए।

इन सर्दियों की छुट्टियों में जब हम उनके घर पहुंचे तो उनके घर की हालत हमें बहुत शोचनीय प्रतीत हुई। राजेन्द्र भागता हुआ अपने पिता को जगाने चला गया-उस वक़्त सबेरे के ग्यारह बज रहे थे। उसका पिता अस्त-व्यस्त सा बाहर आया तो उसके चेहरे पर नशे की खुमारी थी और मुंह से शराब की गंध आ रही थी। वह घर पर सो रहा था और उसका बड़ा बेटा रुपया कमाने काम पर गया हुआ था और छोटा बाहर खेल-कूद में मगन था। राजेन्द्र ने उससे कहा कि जैकेट पहन लो, बेचारा कोशिश कर रहा था कि उसका पिता आगंतुक के सामने ठीक-ठाक लगे, उसे लेकर हमारे मन में कोई बुरी धारणा न पैदा हो।

अपने पिता को बेहतर ढंग से प्रस्तुत करने की उसकी असफल चेष्टा देखकर हमारा दिल रो उठा। हमने उसके पिता से बातचीत की और हमें पता चला कि रिक्शा चलाकर उसे बहुत कम आमदनी हो पाती है। अपनी कामचोरी के लिए वह मौसम और पता नहीं क्या-क्या बहाने बनाता रहा। घर का किराया, 20 डालर, यानी लगभग 1200 रुपए बेटे के 40 डालर यानी लगभग 2400 रुपए के वेतन से अदा किया जाता है। स्पष्ट ही वह स्वयं अपनी आमदनी बढ़ाने का कोई प्रयास करने की आवश्यकता महसूस नहीं कर रहा है-उसकी शराब का खर्च निकल आए तो उसके लिए वही पर्याप्त है क्योंकि घर के दीगर खर्चों के लिए अब उसका बड़ा लड़का काफी कमा रहा है।

हम पिता से एक बार फिर यह अनुनय-विनय करने के बाद निकल आए कि बच्चों के भविष्य की उसे चिंता करनी चाहिए। हमने उसे अच्छी शिक्षा के लाभों के बारे में समझाते हुए आग्रह किया कि अपने सबसे छोटे बच्चे की पढ़ाई छुड़ाने के बारे में वह सोचे भी नहीं।

यह दुखद है मगर इन्हीं परिस्थितियों के विरुद्ध हम लगातार अपना काम जारी रखे हुए हैं: अभिभावकों का अपने बच्चों को स्कूल से निकालकर काम पर लगा देना, बाल विवाह, बाल मजदूरी, छोटी-मोटी आमदनी को सुनहरे भविष्य पर तरजीह दिया जाना। कुछ भी हो जाए, हम अपना प्रयास जारी रखेंगे और राजबाई और नरेंद्र जैसे बच्चों की नियति से निराश न होते हुए राजेन्द्र जैसे बच्चों की तरक्की पर अपना ध्यान केन्द्रित करेंगे और यही हमारी सफलता होगी।

वह एक छोटा बच्चा है और पढ़ने में तेज़ है। वह खुशमिजाज़ और विनीत है। बच्चों का दोष कभी नहीं होता और इसलिए हम उसके बेहतर भविष्य के लिए कुछ भी करने के लिए कटिबद्ध हैं।

अगर आप हमारे इस प्रयास में सहभागी बनाना चाहते हैं तो आप किसी एक बच्चे को प्रायोजित कर सकते हैं या बच्चों के एक दिन के भोजन का प्रबंध कर सकते हैं। शुक्रिया!

स्वामी बालेन्दु का उपयोग करने के लिए यूजर गाइड, दूसरा अध्याय- 27 अक्तूबर 2013

पिछले सप्ताह मैंने बताया था कि कैसे एक मित्र ने मज़ाक में कहा कि मुझे एक यूजर गाइड लिखकर रखना चाहिए ताकि लोग जान सकें कि मेरे साथ कैसे पेश आया जाए। मेरी और सामान्य पश्चिमी व्यक्ति की जीवन-चर्या के बीच अंतर को लेकर हम बहुत देर तक हंसी-मज़ाक करते रहे लेकिन जब मैंने उन बातों पर गंभीरता पूर्वक सोचा तो मुझे लगा कि निश्चय ही मेरे अंदर ऐसी कुछ बातें मौजूद हैं, जिन्हें मुझसे मिले बगैर और उन बातों पर मेरे रवैयों, विचारों और मेरी जीवन पद्धति के बारे में जाने बगैर लोग भ्रम की स्थिति में रहते होंगे।

भले ही मैंने जीवन का बड़ा हिस्सा पश्चिम में रहकर गुज़ारा है मगर पश्चिमी रहन-सहन के प्रभाव में मेरे मन में कभी सामिष होने का खयाल नहीं आया और बहुत सोच-समझकर आज भी मैं निरामिष (शाकाहारी) ही बना हुआ हूँ। शुरू से मेरा विचार रहा है और आज भी है कि शाकाहार आपके शरीर के लिए अच्छा है और आज भी मेरी धारणा है कि मनुष्य के लिए नैसर्गिक रूप से यही सबसे उचित आहार है। अगर हम इन नकारात्मक बातों को फिलहाल नज़रअंदाज़ भी कर दें कि मीट के लिए पाले जाने वाले पशुओं को बहुत बुरी हालत में रखा जाता है, पशु-हत्या का पर्यावरण पर बहुत विपरीत प्रभाव पड़ता है और पशुओं को दिये जाने वाले अन्न का उपयोग भूखे मनुष्यों को भोजन कराने में किया जा सकता है, तो भी ज़िंदा रहने के लिए हमें पशुओं की हत्या करने की आवश्यकता नहीं है और भोजन (मीट) के लिए हर तरह के पशुओं की हत्या करना मैं एक क्रूर कर्म मानता हूँ।

मैं एक शाकाहारी कस्बे में पला-बढ़ा व्यक्ति हूँ और बाद में भी अपने काम के सिलसिले में ज़्यादातर शाकाहारी लोगों के सानिध्य में ही रहा। ऐसी परिस्थिति में युवावस्था में मांस खाने वालों को लेकर मेरी राय अच्छी नहीं थी। मैं उन्हें क्रूर समझता था और सोचता था कि कोई भी भला आदमी मांस भक्षण नहीं कर सकता। लेकिन मेरा यह विचार पश्चिम के संपर्क में आने के बाद परिवर्तित होता गया।

थोड़े समय में ही मुझे एहसास हुआ कि मतभेद सिर्फ दोनों की संस्कृति में अंतर और बचपन के माहौल के चलते है और यह कि मांस खाने वाले बहुत से लोग बहुत भले भी होते हैं! किसी की धारणाएँ पूरी तरह कभी भी नहीं बदल पातीं: मैं आज भी मांस खाने वालों के साथ एक ही टेबल पर बैठकर भोजन नहीं कर सकता। जब मेरे सामने कोई मांस खा रहा होता है तो मैं शारीरिक रूप से अस्वस्थ महसूस करता हूँ। मैं सामान्य रूप से भोजन नहीं कर पाता-मेरी भूख ही मर जाती है, जब मेरे सामने किसी मरे हुए जानवर का मांस रखा होता है! उसकी गंध भी मुझे सख्त नापसंद है, वह मुझे अस्वस्थ कर देती है! मेरे साथ ऐसा हो चुका है कि शांति पूर्वक खाना खाने की नीयत से या तो मैं किसी दूसरे टेबल पर भोजन करने चला गया या मांस खाने वाले का भोजन हो जाने के उपरांत मैंने भोजन किया। अधिकतर होता यह है कि सामने वाला मेरी इस कमजोरी का खयाल रखते हुए और साथ भोजन कर सकें इसलिए शाकाहारी खाना खाने के लिए राज़ी हो जाता है-वैसे भी मैं खुद बहुत अच्छा और पौष्टिक भारतीय शाकाहारी खाना बना लेता हूँ और वे अपना मांसाहारी खाना भूल जाते हैं!

जब कोई मुझे भोजन के लिए निमंत्रित करता है या मैं किसी नई जगह में होता हूँ, जहां लोग मुझे अच्छी तरह नहीं जानते, तो मैं उन्हें अपनी खाने की आदतों के बारे में साफ-साफ बता देता हूँ। यह सुनकर कई लोग समझते हैं कि जब वे शराब पी रहे होंगे, मैं उनके साथ बैठ नहीं पाऊँगा। लेकिन वह एकदम अलग बात होती है! स्वाभाविक ही मैं नशे में चूर किसी मदहोश शराबी को देखना पसंद नहीं करूंगा-और मैंने आज तक किसी परिचित को शराब के नशे में मतवाला होते हुए नहीं देखा है। साथ बैठे मित्रों में से कोई खाने के पहले या बाद में एकाध गिलास वाइन या बीयर पी लेता है तो मुझे कोई दिक्कत नहीं होती। मैंने जीवन में कभी मद्यपान नहीं किया है और मेरा ऐसा करने का कोई इरादा भी नहीं है मगर मुझे मालूम है कि एकाध गिलास शराब पीने से विशेष नशा नहीं होता और इतनी शराब से उसके नशेड़ी होने का भी कोई इमकान नहीं होता! इतनी सी बात से मैं आपको शराबी नहीं समझता और जब कि मैं आपके साथ शराब नहीं पी सकता और न ही अपने घर में आपको शराब पेश कर पाऊँगा, लेकिन अगर आप शेम्पेन की बोतल खोलने का इरादा रखते हैं तब भी मैं आपके घर में आपके साथ शाम की मस्ती में शामिल होना पसंद करूंगा।

इस विषय का समापन करने के लिए एक और पहलू पर बात करना ज़रूरी है: और वह है धूम्रपान! यह कि उस कमरे में मैं बैठ ही नहीं सकता, जहां सिगरेट का धुआँ भरा हुआ हो और जहां से बाहर निकलने पर उस भयंकर दुर्गंध से आपके कपड़े तक गँधाते रहें। मैं चाहूँगा कि उस व्यक्ति के बगल में खड़ा न रहूँ जो सिगरेट पी रहा है क्योंकि जब वह अपनी सिगरेट का धुआँ उड़ाएगा, तो मेरे नथुनों में खुजली शुरू हो जाएगी। लेकिन नहीं, भले ही सिगरेट पीना आपके लिए हानिकारक है और आपको नहीं पीना चाहिए, मैं नहीं समझता कि सिर्फ सिगरेट पीने के कारण आप बुरे व्यक्ति हैं। आप उसके आदी हो चुके हैं, बस इतना ही।

तो ये मुख्य बातें हैं-लेकिन इसके अलावा मैं पहले भी एक मिलनसार व्यक्ति था और अब भी हूँ!

आयरिश लोग और शराब – अपने पूर्वाग्रह की पुष्टि होते हुए देखना – 19 मई 2013

मैंने अपनी पिछली आयरलैंड की यात्राओं में, जैसे 2005 की गर्मियों में, वहाँ के निवासियों के साथ हुए अपने अनुभवों के बारे में बताते हुए कहा था कि वे बहुत खुशमिजाज, मनमौजी और खुले दिल के लोग होते हैं। लेकिन एक और बात मैंने महसूस की जिसे आप उसे मेरे पूर्वाग्रह की पुष्टि कह सकते हैं: एक आम रूढ़िबद्ध धारणा कि आयरिश लोग पियक्कड़ होते हैं। बेहद पियक्कड़!

मैंने वहाँ बहुत से व्यक्तिगत सत्र लिए और अधिकांश लोग अपनी समस्याओं के समाधान के लिए मेरे पास आते थे। ये समस्याएं जीवन के हर क्षेत्र से जुड़ी और कई तरह की होती थीं, जैसे संबंधो के बारे में, भावनात्मक, दर्द और बीमारियों, मानसिक व्याधियों, दुखों और बेचैनियों के बारे में। कुछ लोग आंतरिक शांति चाहते थे तो कुछ स्वास्थ्य और ताकत, तो कुछ अपने किसी व्यसन से छुटकारा पाना चाहते थे। लेकिन आयरलैंड के अपने सत्रों में यह बात तुरंत समझ में आ जाती थी कि शराब से किसी न किसी रूप में जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए यहाँ सबसे ज़्यादा लोग आते थे।

गहरे अवसाद में डूबा हुआ एक व्यक्ति मेरे पास आया और बताया कि उसकी गर्लफ्रेंड के उसे छोडकर जाने के बाद से ही यह अवसाद शुरू हो गया था। वह दुखी था इसलिए अपने एक मित्र के साथ एक जाम लेने का निर्णय किया। उसे अच्छा लगा, शायद शराब के कारण या मित्र के साथ के कारण। जिससे उसे लाभ हुआ था उसने दूसरे दिन भी उसे ही आजमाया। शायद शराब उसके दर्द को हल्का करती थी और उसे दूसरी बातों में मन लगाने में मदद करती थी, इसके सिवा कुछ नहीं। वह धीरे-धीरे शराब की मात्रा बढ़ाने लगा और एक वक़्त आया जब शराब से उसे किसी तरह का लाभ होना बंद गया। बल्कि वह उसे चिड़चिड़ा और उदास कर देती थी। उसने अपने इस व्यसन का उपचार भी कराया और शराब छोड़ दी मगर उसकी मनोदशा में कोई सुधार नहीं हुआ और चित्त अस्थिर ही बना रहता था।

एक महिला ने मुझे बताया कि वह इतने अर्से से शराब पी रही है कि अब उसे कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं ने आ घेरा है। उसका वज़न बहुत बढ़ गया है जिसका कारण, जैसा कि उसने बताया, शराब ही है और उसे डॉक्टरों ने तुरंत शराब छोडने की सलाह दी है, अन्यथा उसका लीवर क्षतिग्रस्त हो सकता है। लेकिन उसे शराब की लत लग गयी है और उससे छुटकारा पाने की शक्ति उसमें नहीं है।

एक और व्यक्ति ने मुझे रोते हुए बताया कि शराब ने उसके जीवन को बरबाद करके रख दिया है। उसके स्वर में इतना दर्द था कि उसकी बात सुनना भी बहुत दर्दनाक था। एक बार वह और उसका दोस्त एक पार्टी में शामिल हुए थे और सारे लोग खूब शराब पी रहे थे। वह रात भर वहाँ रहा और आखिर में एक सोफ़े पर लुढ़क गया। उसके दोस्त उसे कार में बिठाकर घर ले जा रहे थे मगर बारिश हो रही थी और फिसलन भरी सड़क पर नशे की हालत में चालक का संतुलन बिगड़ गया और कार पलट गई। उसके दो दोस्त दुर्घटना का शिकार हो गए। फिर कुछ साल बाद उसकी पत्नी ऑफिस से घर आ रही थी और एक शराबी चालक ने उसकी कार में टक्कर मार दी। उसकी पत्नी जीवित घर नहीं लौट सकी।

इसके बावजूद लोग मुझे बताते रहते थे कि युवा पीढ़ी अपने से पहले वाली पीढ़ी से ज़्यादा पियक्कड़ है। नशे में धुत्त हो जाने के इरादे से कम समय में बहुत ज़्यादा शराब पी लेना (binge drinking) आजकल फैशन हो गया है और सबेरे किसी अस्पताल में लोगों की नींद खुलना आम बात हो गई है। शराब समाज के लिए एक अभिशाप बन चुका है और अधिकतर लोगों की अस्वस्थता का और दुख का कारण भी।

मैं यह नहीं जानता था कि आयरिश लोगों की यह छवि एक यथार्थ है। निस्संदेह, ऐसे लोग भी हैं जो बिल्कुल नहीं पीते और आध्यात्मिक परिदृश्य में इतना समय गुजारने के कारण ऐसे बहुत से लोगों से मैं मिला भी हूँ, क्योंकि ऐसे लोग अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक भी होते हैं और शराब और दूसरे नशीले पदार्थों से भी दूर रहना पसंद करते हैं। इसके बावजूद मैं कहूँगा कि मेरा ऐसी दुखद कहानियों से बहुत वास्ता पड़ता रहा है और यह मुझे ग्लानि से भर देता है।

मैं आशा करता हूँ कि न सिर्फ आयरिश जनता बल्कि सारी दुनिया के लोग इस बात को समझेंगे कि शराब कितनी नुकसानदेह चीज़ है।

भारत में जुआ, शराब और सेक्स जैसी समस्याओं के लिए पश्चिमी संस्कृति जिम्मेदार नहीं – 16 जनवरी 13

कल मैंने आपको बताया था कि कई लोग भारत में होने वाले सभी यौन/लैंगिक अपराधों के लिए पश्चिमी सभ्यता के असर को जिम्मेदार मानते हैं। सिर्फ यौन/लैंगिक समस्या ही नहीं बल्कि दूसरी अन्य दिक्कतों के लिए भी पश्चिम को बलि का बकरा बना दिया गया है! लोग जब भी दूसरों को जुआ खेलते देखते हैं तब पश्चिम को कोसते हैं, जब भी किसी के परिवार का सदस्य शराब पीने लगता है तब भी उनके निशाने पर पश्चिम ही होता है। और हां, जब भी टीवी पर कामुकता से भरे दृश्य दिखाई देते हैं, या दुर्दांत किस्म के लैंगिक (सेक्सुअल) अपराधों को देखकर बच्चे सेक्स के बारे में पूछते हैं, तब भी इनमें से ज्यादातर लोग पश्चिम से क्रोधित होते हैं। लेकिन मैं आपको समझाता हूं कि इन सभी समस्याओं के लिए पश्चिम को जिम्मेदार ठहराना क्यों पूरी तरह से अनुचित है।

हमें जुए की समस्या से शुरुआत करनी चाहिए। भारत में जुआ खेलना गैर-कानूनी है। इस देश में आप सिर्फ गोवा में ही जुआघर (केसिनो) पा सकते हैं। इस सुदूरवर्ती स्थान पर आप चाहें तो भाग्य के इस खेल में कानूनी तौर पर हाथ आजमा सकते हैं। हालांकि लाखों नहीं तो हजारों लोग नियमित रूप से ताश के खेल में या शर्तों में पैसे लगाते हैं। कभी-कभी वे जीत जाते हैं लेकिन ज्यादातर बार वे हारते ही हैं। लेकिन इस उम्मीद में कि किसी न किसी दिन उनके हाथ जैकपॉट लग सकता है, वे लाखों रुपये जीत कर बहुत ज्यादा धनी बन सकते हैं वे इसके आदी हो जाते हैं। लेकिन इसके बजाए आमतौर पर वे हारे हुए खिलाड़ी की तरह ही इस खेल से बाहर जाते हैं। उनमें से कई लोग इतना ज्यादा हारते हैं कि अपनी जिंदगी तक दांव पर लगा देते हैं और अपने परिजनों को भी दुख पहुंचाते हैं। ऐसे में ज्यादातर धार्मिक लोग आरोप लगाते हैं कि भारत में इस व्यसन को पहुंचाने वाला पश्चिम ही है।

ऐसा ही शराब और इसे पीने वालों के बारे में भी है। चाहे किसी भी तरह की शराब हो, उससे होने वाली दिक्कतों के बारे में सभी जानते हैं। इसके बावजूद लोग पीते हैं, ऐसा बर्ताव करते हैं जैसे उनका खुद पर नियंत्रण नहीं रहता और यहां तक कि वे उग्र हो जाते हैं, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं, अपने परिवारवालों को पीटते हैं और अपराध करते हैं। भारत में सिर्फ उन्हीं दुकानों पर शराब बेची जा सकती है जिनके पास लाइसेंस है और यहां शराब या सिगरेट के प्रचार के लिए टीवी पर विज्ञापन भी नहीं दिखाया जाता, इसकी इजाजत नहीं है।

मैं मानता हूं कि ये सभी चीजें गलत हैं। मैं मानता हूं कि लोगों को ना तो जुआ खेलना चाहिए और ना ही शराब पीनी चाहिए। लेकिन इसके लिए पश्चिमी सभ्यता पर आरोप लगाए जाने से मैं सहमत नहीं हूं। पश्चिमी आधुनिक सभ्यता ना तो भारत में शराब लेकर आई और ना ही जुआ खेलना सिखाया। जुआ यहां के लिए नया नहीं है, और कोई ऐसी कल्पना भी नहीं है कि यह दुनिया के विभिन्न स्थानों में नहीं खेला जा सकता। जब हिन्दू धर्म ग्रंथ रचे जा रहे थे तब भी लोग जुआ खेलते थे और शराब पीते थे। महाभारत काल में भी जुआ अस्तित्व में था और उसका यहां वर्णन हुआ है। अन्य धर्म ग्रंथ 64 कलाओं की व्याख्या करते हैं जिनमें मानव आगे बढ़ सकता है और उनमें से एक है जुआ। इसी तरह, वेद बताते हैं कि भगवान को चढ़ावे के तौर पर भी शराब चढ़ाई जाती थी।

लेकिन जब बात सेक्स तक पहुंचती है, तब मेरे मूल विचार उन धार्मिक लोगों से बहुत अलग हो जाते हैं जो भारतीय मूल्यों में आ रही गिरावट के लिए पश्चिम पर आरोप मढ़ते हैं, जो पश्चिम के खुलेपन को यौन अपराधों के लिए दोषी ठहराते हैं। मेरा मानना है कि आपको अपनी प्रवृतियों को नहीं छुपाना चाहिए और सेक्स को सामान्य तौर पर प्राकृतिक रूप में ही लेना चाहिए। मैं इस विचार का विरोध करता हूं कि यह सब केवल एक पश्चिमी अवधारणा है, पूरे भारत के मंदिरों में बनाई गई उत्तेजक मूर्तियों के इंजीनियर और शिल्पकार कौन थे? खजुराहो, कोणार्क और अन्य जगहों के मंदिरों की दीवारों पर इन मूर्तियों को उकेरने की कल्पना किसने की? वे लोग पश्चिम से नहीं आए थे, वे भारतीय थे। शायद सबसे पुराने और सबसे चर्चित कामुक पुस्तक के लेखक वात्स्यायन भी अमेरिका या यूरोप से नहीं आये थे।

जुए और शराब का हमारी संस्कृति पर बहुत बुरा असर पड़ा है। सेक्स अपने आप में कोई समस्या नहीं है लेकिन इसके बावजूद यहां काफी यौन शोषण और यौन अपराध होते हैं। इन समस्याओं की जड़ें कम से कम पश्चिम में नहीं हैं। वास्तव में, भारत में आज हम जो समस्याएं देखते हैं वे पश्चिम की तुलना में अपने यहां ज्यादा खराब हैं। आप पश्चिम पर आरोप लगाते हैं कि लोग वहां खुलेआम जुआ खेलते हैं और यहां तक कि इसके लिए जुआघर भी बनाते हैं। जबकि हकीकत ये है कि वहां काफी कम संख्या में लोग अपने पूरे पैसे जुआघरों में गंवाते हैं। काफी लोग वहां जाते हैं, अपनी जेब में निर्धारित रकम रखते हैं और अगर वह रकम हार जाते हैं तो घर चले जाते हैं। शराब भी वहां एकदम दूसरे तरीके से इस्तेमाल की जाती है। आप देखेंगे कि वहां के लोग नियमित रूप से एक पैग या एक बोतल बीयर पीते हैं, लेकिन कभी खुद पर से नियंत्रण खोकर जानवरों जैसा बर्ताव नहीं करते। सेक्स भी खुलेआम होता है लेकिन वहां के लोग बसों में या भीड़ में महिलाओं को छूना शुरू नहीं कर देते।

मुझे गलत मत समझियेगा, मैं यहां ना तो शराब या जुए का प्रचार कर रहा हूं, ना ही पश्चिमी सभ्यता की नकल करने का हिमायती हूं। वहां की कमियों और लोगों की दिक्कतों को साफ तौर पर देखते हुए मैं पश्चिमी सभ्यता की प्रशंसा भी नहीं करता। मैं तो सिर्फ इस विचार का विरोध करना चाहता हूं कि भारत में शराब, जुए और लैंगिक अपराध पश्चिम से लाये गये हैं। यह सच नहीं है।

आप पश्चिमी सभ्यता को कोस रहे हैं, ये कह कर कि इससे आपकी संस्कृति और देश का पतन हो जाएगा, आप वहां से आने वाली हर चीज को कोस रहे हैं। अगर आपकी यही सोच है तो कृपया ठीक से सोचें कि आप कहते क्या हैं और करते क्या हैं। सबसे पहले अपनी पैंट और शर्ट उतार फेंकिये और धोती पहनिये। जो आप पहन रहे हैं वो पश्चिमी पहनावा है, भारतीय नहीं। फेसबुक से निजात पाईये और आई फोन बेच दीजिए-वो निश्चित रूप से भारतीय नहीं है। आप आधुनिक दुनिया में रह रहे हैं – अगर आप पश्चिम से आने वाली हर चीज का विरोध करेंगे तो आपको काफी चीजों का परित्याग करना होगा। देखिए कि आधुनिक विज्ञान ने आपको क्या दिया है, देखिए कि चिकित्सा के क्षेत्र में क्या-क्या संभव है, वो सिर्फ इसलिए कि पश्चिम में शोध हुआ है। निसंदेह, भारत में भी शोधकर्ता, वैज्ञानिक और प्रतिभाशाली लोग हैं लेकिन इनमें से ज्यादातर लोग अपने समारोह और धार्मिक क्रियाकलापों में ही कहीं ज्यादा व्यस्त होते हैं। और जिन्होंने इस दुनिया को ज्यादा आधुनिक बनाने में मदद की है वे कभी भी पश्चिम के योगदान की आलोचना नहीं करेंगे।

अपनी आंखें और दिल खोलिए और इस बात को स्वीकार कीजिए कि बुराई और खोट हर देश में होता है। सकारात्मक चीजों की ओर ध्यान केंद्रित कीजिए और बदलाव लाने की कोशिश कीजिए।