क्या सोशल नेटवर्किंग साइट्स जीवन में अकेलापन पैदा कर रहीं हैं? 14 दिसंबर 2015

क्या सोशल नेटवर्किंग साइट्स जीवन में अकेलापन पैदा कर रहीं हैं

मैं कभी-कभी सोच में पड़ जाता हूँ कि अंततोगत्वा, लंबे अंतराल के बाद सोशल मीडिया का हमारे समाज पर क्या असर होगा। हालांकि सोशल नेटवर्किंग की शुरुआत ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को आपस में जोड़ने के उद्देश्य से की गई थी, मुझे लगता है कि वास्तव में वह लोगों में अकेलापन पैदा कर रही हैं।

मैं इस नतीजे पर कैसे पहुँचा? बहुत आसान है: मैंने इस बात पर गौर किया है कि अधिकतर लोग सोशल नेटवर्किंग साइटों पर क्या देखते हैं और उस पर उनकी प्रतिक्रिया क्या होती है! उन साइटों के साथ उनका संबंध अत्यंत विरोधाभासी होता है: ऐसा प्रतीत होता है जैसे वहाँ उन्हें अपनी पसंद का पर्याप्त मसाला नहीं मिल पा रहा है और वे बार-बार उन्हीं साइटों को खोलते हैं लेकिन फिर खिन्न होकर उन्हें बार-बार बंद भी कर देते हैं। जो कुछ वे देखते हैं, उसी से यह उदासी पैदा होती है: वे क्या देखते हैं? पार्टियाँ करते हुए, प्रसन्नचित्त होकर समय बिताते हुए और कुल मिलाकर जीवन का आनंद लेते हुए मित्रों के चित्र-परिवार के साथ, अन्य मित्रों के साथ, बहुत सारे लोगों के बीच!

और आप? आप यहाँ बैठे हैं अकेले, अपने मोबाइल फोन, टेबलेट या कंप्यूटर स्क्रीन पर टकटकी लगाए। आप उस मौज-मस्ती का हिस्सा नहीं हैं। पार्टी आपके बगैर जारी है। आपका कोई अपना, साथी या जीवन साथी, नहीं है जो आपको कैंडल लाइट डिनर पर बुलाकर अचरज में डाल दे, जैसा कि एक मित्र ने पोस्ट किया है। आप किसी हिप पार्टी में नहीं जाते, जहाँ हर व्यक्ति झूम-झूमकर नाचता-गाता है और उल्लास में सुध-बुध भूल जाता है। और लगता है, आप उन सब मित्रों से भी दूर हैं, जो इनका विवरण नेट पर पोस्ट करते हैं।

आपका सोशल नेटवर्क, जिसे आपको दूसरे लोगों से जोड़ने के लिए बनाया गया है, वही आपको पूरी तरह अपने हाल पर छोड़ देता है, अकेला और तनहा। वह अगर न होता तो आपको पता ही नहीं चल पाता कि दूसरे किस प्रकार आपकी अनुपस्थिति में आपस में मिल-जुलकर मौज कर रहे हैं। संभव है, तब आप घर में कोई किताब पढ़ते हुए या नहाते हुए या कोई भी अपनी मर्ज़ी का काम करते हुए अपने आप में मस्त रहे आते।

या, कम्प्यूटर के पर्दे को ताकते हुए, नेट पर लिखने के लिए कोई समझदारी से भरी बात पर अपना दिमाग खपाते हुए या ख़ुशी मनाते हुए अपनी कोई पुरानी फोटो तलाशते हुए आप भी वास्तव में बाहर निकल सकते हैं। दोस्त क्या-क्या मौज-मस्ती कर रहे हैं, इसकी ऑनलाइन ताक-झाँक करने की जगह आप किसी दोस्त को फोन कर सकते हैं, उससे रूबरू बात कर सकते हैं!

इस तरह सोशल मीडिया आपको अकेलेपन की ओर ले जा सकता है, जैसा कि इंटरनेट के आने से पहले संभव नहीं था। तब आप हर वक़्त उपलब्ध होते थे, तब आप अपने सभी स्कूली और कॉलेज के दोस्तों से, अपने कार्यालयीन सहकर्मियों से और अपने रिश्तेदारों से एक साथ और हर समय जुड़े होते थे।

इस बात को तब आप अधिक शिद्दत के साथ नोटिस करते हैं जब आप किसी परेशानी में होते हैं और किसी दोस्त की मदद चाहते हैं, जब आप संदेशों के ज़रिए तो लोगों के सम्पर्क में होते हैं लेकिन उनसे रूबरू सम्पर्क नहीं होता। क्योंकि जब आप पर आसमान टूट पड़ा है, आपको किसी गले लगाने वाले की ज़रूरत होती है, न कि किसी आभासी आलिंगन की। कोई वास्तविक कंधा, जिस पर सिर रखकर आप आँसू बहा सकें। कोई आपके पास आए और आपकी बात सुने, आपके वास्तविक जीवन में आपके साथ खड़ा होने वाला ऐसा कोई शख्स।

न भूलें कि सोशल नेटवर्क महज साधन है, ऐसी सुविधा, जिससे आप वास्तविक जीवन के अनुभवों को अधिक गतिशील और पुख्ता बना सकें, न कि वह यथार्थ का विकल्प है कि उसमें लिप्त होकर आप अपनी वास्तविक दुनिया से ही कट जाएँ। अपने सामाजिक जीवन में उसे आनंद-वृद्धि का साधन बनाएँ। उसके गुलाम बनकर उसे यह इजाज़त न दें कि वह आपको अकेलेपन और अवसादग्रस्तता की ओर खींच ले जाए!

कम्प्यूटर के सामने एक अस्वास्थ्यकर जीवन-पद्धति- 29 सितंबर 2013

सन 2005 में, जब मैं आस्ट्रेलिया में था, वहाँ कई जगह मेरे कार्यक्रम हुए और सच बात तो यह है कि अब मैं भूल ही चुका हूँ कि मैं कहाँ-कहाँ घूमता-फिरता रहा। भले ही उन जगहों के नाम मुझे याद न हों, वे संबन्धित व्यक्ति, उनके घर, और निश्चय ही, उनका रहन सहन और जीवन-पद्धति आज भी मुझे अच्छी तरह याद हैं। एक जगह थी जहां मैं एक ऐसी जीवन-पद्धति से रूबरू हुआ जो मेरे लिए नई थी और जिसे मैं निश्चय ही बहुत अस्वास्थ्यकर मानता हूँ।

मैं एक महिला के यहाँ रहता था, जिसने, मेरी इन्टरनेट साईट देखने के बाद, मुझे आमंत्रित किया था। उसने मेरे कुछ व्याख्यान और ध्यान-सत्र आयोजित किए थे। कार्यक्रम के विषय में, स्वाभाविक ही, मेरा उसके साथ पहले से ही संपर्क हो चुका था और मैं चकित था कि उसने मेरी योग-कार्यशाला क्यों नहीं आयोजित की, जो लोगों के बीच साधारणतः काफी लोकप्रिय हुआ करती थी। यह एक विचार ही था और मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था-मैं अपने व्याख्यानों और ध्यान-सत्रों के कार्यक्रमों से ही संतुष्ट था।

लेकिन जब मैं उसके घर गया तो इस बारे में मेरा आश्चर्य काफ़ूर हो गया। वह बहुत मोटी थी और अपने वज़न के चलते उसे चलने-फिरने के लिए व्हील-चेयर की ज़रूरत पड़ती थी। हालांकि वह चल सकती थी लेकिन ज़्यादा दूर तक नहीं और स्वाभाविक ही अपना कई किलो का बोझ ढोते हुए चलना उसे बहुत जल्दी थका देता था। वह चल तो नहीं पाती थी मगर कार चला लेती थी।

वह अपनी बूढ़ी माँ और अपने बॉयफ्रेंड के साथ, जिसके साथ उसकी भेंट इंटरनेट के जरिये ही हुई थी, रहती थी। कुल मिलाकर उसका सारा समय कंप्यूटर के सामने ही बीतता था। मैंने आज तक ऐसा व्यक्ति नहीं देखा था, जो इतना समय कंप्यूटर के साथ बिताता हो और अपना, लगभग सारा काम ऑनलाइन करता हो!

इस कद-काठी और वज़न वाला व्यक्ति भी मैंने इसके पहले नहीं देखा था-वैसे, भारत में भी आवश्यकता से अधिक वज़न वाले लोग होते ही हैं। नहीं, लेकिन सारा समय कंप्यूटर के सामने बैठने के चलते शारीरिक रूप से निष्क्रिय जीवन-पद्धति और इसके कारण पैदा हुई उसकी असंख्य समस्याओं ने मेरे मन में सवाल खड़े कर दिए कि आखिर अपने शरीर के साथ उसने ऐसा व्यवहार क्यों किया? आप कम्यूटर के सामने लगातार बैठे रहते है, यह बात समझ में आती है मगर क्या आपको यह भी पता नहीं चल पाया कि दिनोंदिन आप मोटे, और मोटे, होते जा रहे हैं, इतने मोटे कि खड़े होने में भी आपकी सांस फूल जाती है?

वैसे, वह बहुत सहृदय महिला थी और मैंने उसके साथ बहुत सुखद समय बिताया। कंप्यूटर के सामने बैठे-बैठे ही उसने हमारा कार्यक्रम आयोजित भी किया था और उसका प्रचार-प्रसार भी। इसके बावजूद कार्यक्रम में लोगों की उपस्थिति काफी थी और न केवल कार्यक्रम सफल रहा, मैं भी पूरे समय बुरी तरह व्यस्त रहा।

जब मैंने उस महिला से कहा कि खाना मैं बनाऊँगा और वह क्या खाना पसंद करेंगी तो उसने अपना फ्रिज मुझे खोलकर दिखाया, जिसमें बहुत सारी खाने की चीज़ें रखी हुई थीं। उसने कहा "मैं ये सारी चीज़ें एक भारतीय रेस्तराँ से लेकर आई हूँ-बिलकुल ताज़ा बना हुआ है। जब इच्छा हो, निकालिए, गरम कीजिए और खा लीजिए!" भारतीय खानों की ऐसी दुर्गति देखकर हँसूँ या रोऊँ समझ में नहीं आ रहा था खैर हँसता नहीं तो और क्या करता! लेकिन मैंने उससे कुछ नहीं कहा। उस घर में पकाने, खाने का यही तरीका था।

एक बिल्कुल अलग जीवन-पद्धति। इतना अवश्य कहूँगा कि यह जीवन-पद्धति बहुत ही अस्वास्थ्यकर है। 🙂