आपके विवाह के बाद जब आपकी सास आपकी माहवारी का हिसाब रखने लगती है – 11 जनवरी 2016

अपरा के जन्मदिन के सिलसिले में बहुत से मित्र आश्रम आए थे और उन समान सोच-विचार वाले मित्रों के साथ एक बार फिर खुलकर बातचीत करना अत्यंत सुखद रहा! जब हम एक साथ बैठे हुए थे तो एक महिला मित्र ने, जिसका विवाह अभी एक साल पहले ही हुआ था, बताया कि उस पर न सिर्फ उसके परिवार और उसके सास-ससुर का बल्कि सामान्य रूप से सारे समाज का ही बड़ा ज़बरदस्त दबाव है। किस बात का? जल्द से जल्द गर्भवती होने का!

जी हाँ। भारत में यह बिल्कुल सामान्य बात है कि शादी के कुछ ही माह बाद- शादी, जो अक्सर परिवार द्वारा तय की हुई शादी होती है-हर व्यक्ति यह खुशखबर सुन लेता है: बच्चा होने वाला है! यहाँ यही चलन है, यही होना चाहिए और आपकी शादी का यही एकमात्र मुख्य उद्देश्य है! आपसे अपेक्षा की जाती है कि आप बच्चे, और जहाँ तक हो सके, लड़का, पैदा करें और परिवार की वंश वृद्धि सुनिश्चित करें और उसके कारोबार के लिए वारिस तैयार हो! आपके जीवन का यही मुख्य उद्देश्य है: जितना जल्दी हो सके, बच्चा पैदा करो!

उस मित्र ने बताया कि वह और उसका पति फिलहाल बच्चा न पैदा करके पर्याप्त खुश और संतुष्ट हैं और उसके स्थान पर एक दूसरे को जानते-समझते हुए और अपने संबंध को कुछ और प्रगाढ़ बनाने की कोशिश करते हुए कुछ वक़्त गुज़ारना चाहते हैं। लेकिन भारत में यह विचार ही अत्यंत असामान्य विचार है। यहाँ लोग अक्सर कहते पाए जाते हैं कि बच्चे तो वह गोंद है या वह चुंबक है जो माता-पिता को एक-दूसरे से मज़बूती के साथ जोड़े रखता है! लेकिन जबकि वे इस तरह रहते हुए खुश हैं, उनका परिवार दुखी है! और वह महिला मित्र परिवार और दूसरे सब लोगों के इस दबाव से बहुत अप्रसन्न है!

एक और मित्र, जिसकी तीन साल की बच्ची उस वक़्त अपरा के साथ खेल रही थी, अपने साथ पेश आए इसी तरह के व्यवहार को याद करने लगी। उसकी सास हर माह उससे पूछती कि उसकी माहवारी रुकी या नहीं! यहाँ तककि बाद में उसने कैलेंडर पर उसकी माहवारी के दिनों का हिसाब-किताब रखना शुरू कर दिया और ठीक उन्हीं दिनों में उससे खबर दरियाफ्त करने लगी। जब उसे पता चलता कि माहवारी हो गई है और कम से कम इस माह वह गर्भवती नहीं होगी तो वह बहुत दुखी हो जाती!

क्या आपने कभी कल्पना की है कि किसी महिला को अपने साथ होने वाले ऐसे व्यवहार पर कैसा महसूस होता होगा? उसे लगता होगा कि उस घर में वह सिर्फ प्रजनन की मशीन भर है, और कुछ भी नहीं! किसी को इससे कोई मतलब नहीं है कि वह खुद क्या चाहती है-आपके आसपास का सारा वातावरण यह सोचता है कि आपको भी बच्चे की चाहत होनी चाहिए। और सब के सब पूरी शिद्दत के साथ वह खुशखबर सुनने का इंतज़ार करते रहते हैं।

अगर कुछ माह या साल भर तक उस खबर की घोषणा नहीं होती तो अफवाहों का बाज़ार गर्म हो जाता है: उन्हें बच्चा पैदा नहीं हो पा रहा है, कुछ न कुछ गड़बड़ है! कौन दोषी है? ज़रूर लड़की ही बाँझ होगी! अभी इलाज शुरू किया या नहीं? ऐसा तो नहीं कि लड़का सम्भोग में रुचि ही न लेता हो? कहीं वह समलैंगिक तो नहीं! इत्यादि, इत्यादि!

अफवाह फरोश पड़ोसी ऐसी बातों के इंतज़ार में ही होते हैं और रस ले-लेकर मुहल्ले भर में इस सामान्य बात को बहुत बड़े कलंक की तरह पेश करते हैं, जबकि वहाँ सिर्फ प्रकृति अपना खेल खेल रही होती है।

यह बेहद हास्यास्पद है कि हम महिलाओं से, और पुरुषों से भी, कहें कि उनका जीवन कैसा होना चाहिए और जीवन के किस बिंदु पर उन्हें क्या सोचना चाहिए, क्या इच्छा करनी चाहिए! समाज के लिए यह कतई स्वस्थ दृष्टिकोण नहीं कहा जा सकता और न ही उस महिला के लिए या उस दंपति के लिए। क्योंकि क्या होगा यदि वे वास्तव में बच्चा पैदा न कर पाएँ? इस परिस्थिति पर दृष्टिपात करेंगे, कल…!

जी नहीं, घर की सफाई करना सिर्फ स्त्रियों का काम ही नहीं है! 9 दिसंबर 2015

कल जब मैं उस स्कूली किताब के बारे में लिख रहा था जिसमें बताया गया था कि आपको परिवार के कम से कम एक सदस्य से डरना चाहिए-जो ज़ाहिर है, अधिकतर पिता ही होंगे-तब मुझे लगा कि लैंगिक भूमिकाओं पर मुझे थोड़ा और विचार करना चाहिए। बहुत सोचने पर मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि आधुनिक देशों में भी आज भी सिर्फ इसलिए कि वे पुरुष हैं या महिला, लोग इस उधेड़बुन में रहते हैं कि किन कामों को करने की उनसे अपेक्षा की जाती है।

स्वाभाविक ही, भारत में लिंग के आधार पर कामों का परंपरागत विभाजन पूरी तरह लागू होता है। पुरुष परिवार का अन्नदाता है। बहुत से परिवारों में महिलाएँ काम के लिए तभी घर से निकलती हैं जब बिल्कुल खाने-पीने के लाले पड़ जाते हैं और पैसे कमाने के लिए बाहर निकलना अवश्यंभावी हो जाता है। हमारे स्कूल के गरीब परिवारों में भी कुछ पिता शर्म से डूब मरेंगे अगर उनकी पत्नी को भी बाहर काम करके परिवार की आमदनी में योगदान देना पड़े! अर्थात वे भूखे पेट सो जाना पसंद करेंगे लेकिन अपनी पत्नियों को बाहर काम करने की इजाज़त नहीं देंगे। तब भी जब खुद पत्नी शिद्दत से चाहती है कि बाहर निकलकर खुद भी परिवार के लिए पैसे कमाए!

निश्चित ही भारत में आज भी विवाह के बाद और बच्चे हो जाने के बाद ज़्यादातर महिलाएँ घर में ही रहती हैं भले ही वे विश्वविद्यालय में पढ़कर डिग्रियाँ हासिल कर चुकी हों उनके पास स्नातकोत्तर डिग्रियाँ हैं लेकिन क्योंकि वे स्त्री हैं, उनका काम सिर्फ घर पर रहकर वहाँ की व्यवस्था बनाए रखना और बच्चों की देखभाल करना भर है।

लेकिन पश्चिम में भी मैंने देखा है कि आज भी पुरुष और महिलाओं में अपनी-अपनी परंपरागत भूमिकाओं को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है और वे उन्हें पूरी तरह छोड़ने में हिचकते हैं। आज भी यह पूरी तरह स्वीकार्य है कि पत्नी बच्चे हो जाने के बाद घर में बैठकर घर के काम-काज देखे और बच्चों की परवरिश करे। अगर यह आर्थिक रूप से संभव है और पत्नी को घर पर रहना पसंद है तो मैं भी उसकी सिफ़ारिश करूँगा उसे प्रोत्साहित करूँगा कि वही करे! लेकिन साथ ही अगर पति यही करना चाहे तो वह भी सबको स्वीकार्य होना चाहिए! पत्नी काम पर जाए और घर के खर्चे उठाए जबकि पति घर के कपड़े धोने से लेकर बच्चों की चड्ढियाँ साफ करे!

दुर्भाग्य से जो पुरुष इसकी पहल करते हैं, उनकी हँसी उड़ाई जाती है। इस दिशा में उनके प्रयासों का अनादर किया जाता है-और यह यही दर्शाता है कि आप वास्तव में उन महिलाओं को कितना कमतर आँकते हैं जो पहले ही इन कामों में लगी हुई हैं! अभी भी आप समझते हैं कि घर के काम कम महत्वपूर्ण हैं, कम मुश्किल हैं और उन्हें कोई भी ऐसा व्यक्ति कर सकता है जो अपनी अल्प योग्यता के चलते पैसे कमाने वाले ‘बड़े काम’ नहीं कर सकता! यह हास्यास्पद है! इसका सबसे अच्छा इलाज यह होगा कि ऐसा समझने वाले को खुद ये काम करके देखना चाहिए! चुनौती स्वीकार करें और मुझे दिखाएँ कि आप किस तरह सारे घर की साफ-सफाई करते हैं, बाज़ार जाकर राशन लाते हैं, सारे परिवार के लिए खाना पकाते हैं और सबके मैले कपड़े धोते हैं, जबकि आपके दो छोटे-छोटे बच्चे सारे घर में धमाचौकड़ी मचा रहे हैं!

क्या यह अविश्वसनीय नहीं है कि आज, 21 वीं सदी के 15 साल गुज़र जाने के बाद भी बहुत से लोग यही मानते हैं कि अपने कपड़े साफ करना, अपने लिए खाना पकाना पुरुषों के करने योग्य काम नहीं हैं-अपनी संतान को खाना खिलाने जैसे कामों की बात तो छोड़ ही दीजिए जबकि ये काम एक दिन आपकी संतान भी आपके लिए करेगी?

और जब लोग यह सोचते हैं कि पुरुषों को रोना नहीं चाहिए, तो इसका कारण भी यही होता है। और, क्योंकि स्नेह का प्रदर्शन महिलाओं के खाते में आता है इसलिए पश्चिम में आप महिलाओं को तो आपस में हाथों में हाथ डाले घूमता हुआ देख सकते हैं लेकिन पुरुषों को नहीं। ऐसा क्यों? क्यों स्नेह का प्रदर्शन महिलाओं के लिए आरक्षित है जबकि पुरुषों के लिए अपनी कोमल भावनाओं को दूसरों से साझा करने की जगह शराब को ही समस्या का समाधान मान लिया जाता है!

एक तरफ लोग महिलाओं की क्षमता का सम्मान नहीं करते, उनकी नज़रों में उसकी कोई कीमत नहीं और दूसरी तरफ पुरुषों के कंधों पर बहुत ज़्यादा भार डाल देते हैं! कृपया ऐसा न करें। महिलाओं के पास उनके अपने बोझ लदे हैं- लेकिन उनके संबंध में कल चर्चा करेंगे।

भारतीय क्यों सोचते हैं कि बच्चों को अपने अभिभावकों से डरना चाहिए? 8 दिसंबर 2015

हमारे स्कूल के बच्चों की छमाही परीक्षाएँ शुरू हो गई हैं। वे पढ़ाई में बहुत व्यस्त हैं, उत्साहित हैं कि परीक्षा में किसी तरह उनके सारे सवाल सही हों और इंतज़ार कर रहे हैं कि कब अगले दो सप्ताह बीतेंगे और परीक्षाएँ समाप्त होंगी। एक दिन अगली परीक्षा के लिए रमोना आश्रम में ही रहने वाले एक बच्चे, प्रांशु को पढ़ा रही थी कि एक पुस्तक पलटते हुए उसकी नज़र इस सवाल पर पड़ी: 'घर में आप सबसे ज़्यादा किससे डरते हैं?' उसे विश्वास नहीं हुआ कि ऐसा प्रश्न भी किसी पाठ्य पुस्तक में हो सकता है!

‘नैतिक शिक्षा’ विषय का यह प्रश्न था। अधिकतर हमें यह विषय बच्चों के लिए काफी उपयोगी और महत्वपूर्ण लगता है। यह विषय उन्हें समझ प्रदान करता है कि एक-दूसरे के साथ कैसा सुलूक किया जाना चाहिए और अपने पर्यावरण और खुद अपने आप के प्रति आपका रवैया कैसा होना चाहिए। पाठ हैं, जिनमें नम्रता सिखाई जाती है और दूसरों का आदर करने की शिक्षा दी जाती है। कुछ पाठों में काम की महत्ता दर्शाई जाती है और यह भी कि कैसे कक्षा में अपने विवादों को मिलजुलकर सुलझाना चाहिए। इस विषय की एक ही समस्या है कि पाठ्य पुस्तक और शिक्षक भी अनिवार्य रूप से पाठों पर बहुत सी मनगढ़ंत बातें भी सिखाने लगते हैं और उन बातों से मैं हमेशा सहमत हो जाऊँ यह मुमकिन नहीं हो पाता।

प्रस्तुत प्रकरण में उस पुस्तक का एक पाठ बच्चों को यह बताता है कि घर का हर सदस्य महत्वपूर्ण है। दादा-दादी इसलिए कि वे आपको अपने संस्मरण सुनाते हैं, माता-पिता इसलिए कि दोनों बाहर जाकर काम करते हैं और पैसे कमाते हैं और बच्चे भी, इसलिए कि वे भी घर के कामों में मदद कर सकते हैं और बड़े-बूढ़ों की सहायता कर सकते हैं। यहाँ तक ठीक है। लेकिन उसके बाद प्रश्नावली में इस तरह के प्रश्न हैं, जिनके उत्तर बच्चों को अपनी परिस्थितियों और अनुभव के आधार पर लिखने हैं: आपके परिवार में कितने सदस्य हैं?, आपके घर में होमवर्क कौन करता है? इत्यादि।

और उसके बाद यह प्रश्न: 'घर में आप सबसे ज़्यादा किससे डरते हैं?'

भारत के घरों की स्थिति के बारे में जो बात मैं हमेशा से लिखता रहा हूँ, यह पाठ और यह प्रश्न उसे पूरी तरह सही ठहराता है: अर्थात, भारतीय घरों में हिंसा होती है और डर भी व्याप्त होता है! अभिभावक सोचते हैं कि उनके बच्चे तभी उनकी बात मानते हैं जब उनके मन में डर होता है। अगर उन्हें शिष्टाचार और सदाचार सिखाना है तो उन्हें डराकर रखा जाना ज़रूरी है। अगर वे नहीं डरते तो उनकी पिटाई भी होती है। और अंत में…उपरोक्त प्रश्न का आदर्श उत्तर क्या होना चाहिए? स्वाभाविक ही: पिता!

माँएँ, चाचियाँ और दादा-दादियाँ सारा दिन घर के बच्चों को इसी तरह धमकाती रहती हैं: 'आने दो तुम्हारे पिताजी को!' या, 'तुमने कहना नहीं माना तो पिताजी से शिकायत कर दूँगी!' स्वाभाविक ही इन धमकियों में शारीरिक सज़ा का पूरा इंतज़ाम होता है!

आखिर कब भारतीय पिता अपने बच्चों के साथ एक स्वस्थ संबंध विकसित कर पाएँगे? वह दिन भर घर में नहीं रहता, उसे पैसे कमाने बाहर निकलना ही पड़ता है और जब वह घर आता है तो उससे अपेक्षा की जाती है कि वह दिन भर तजवीज की गई सज़ाओं को एक जल्लाद की तरह अंजाम देगा! आप बच्चों के मन में क्या भरना चाहते हैं?

एक पिता के रूप में मुझे यह बड़ा भयानक लगता है और मेरे परिवार में कोई ऐसी बात मेरी बेटी से पूछने की कल्पना भी नहीं कर सकता। हमारे यहाँ शिक्षा में डर के लिए कोई जगह नहीं है-लेकिन ज़्यादातर भारतीय परिवारों में यही स्थिति पाई जाती है और इसलिए स्कूलों में भी, किताबों में भी!

लेकिन हमारे स्कूल में हमने यह सुनिश्चित कर लिया है कि पाठ्य पुस्तकों से इस प्रश्न को हटा दिया जाए और यह भी कि शिक्षक भी जानें कि हमने ऐसा क्यों किया है: क्योंकि बच्चों को डरना नहीं बच्चों को उनके घर तथा स्कूल में सबसे सुरक्षित वातावरण प्राप्त होना चाहिए और उनके अभिभावक और शिक्षक उनसे प्रेम करते हैं और उन्हें खुश देखना चाहते हैं।

चिल्लाएँ नहीं – बच्चों के साथ अच्छा व्यवहार करें! 10 नवम्बर 2015

कल ही मैंने आपको बताया कि अपरा अपनी नृत्य प्रस्तुति से कितनी खुश है, और जब उसने पुरस्कार के रूप में मिला अपना कप और मैडल हमें दिखाए तो हमने भी उतना ही गौरवांवित महसूस किया। लेकिन जब वह हमें कार्यक्रम के बारे में विस्तार से बताने लगी तो हमने महसूस किया कि उसके दिमाग में दर्शक और सराहना या खुद अपने प्रदर्शन से अधिक कोई और बात घुस गयी है, जिसने उसकी उपलब्धि और उसके गौरव को दागदार कर दिया है: एक व्यक्ति उस पर और आश्रम के उसके प्रिय भाई पर बेवजह चिल्लाया।

शुरू में तो वह बड़े उत्साह से अपने प्रदर्शन के बारे में बताती रही लेकिन जल्द ही विचारमग्न हो गई और कहा: "वहाँ एक आदमी था, जिसने मुझे और गुड्डू से कहा, 'क्या कर रहे हो तुम लोग यहाँ? चलो भागो, यहाँ से!' हमने कुछ नहीं किया था, सिर्फ बैठना चाहते थे!"

रमोना उत्तर देने से पहले थोड़ा झिझकी क्योंकि उसे अच्छे से पता था कि बच्चों ने कुछ नहीं किया होगा और वह आदमी बस उन बच्चों को वहाँ से भगाना चाहता रहा होगा। शुरू करते हुए उसने कहा “अरे, शायद उस आदमी का मूड खराब होगा", किन्तु उसने तुरंत आगे कहा, "लेकिन उसे तुम्हारे साथ ऐसा दुर्व्यवहार नहीं करना चाहिए था, यह अच्छा नहीं है।‘ क्योंकि महज खराब मनोदशा होने के कारण अशिष्ट आचरण और दुर्व्यवहार करना ठीक नहीं।

अपरा का मन इस घटना को भूल नहीं पा रहा था। कुछ ही देर बाद उसने उस घटना का सारा ब्यौरा ज्यों का त्यों मेरे सामने रख दिया। रमोना की तरह मैं उतना सौम्य नहीं रह पाया और मैंने सीधे कहा: “क्योंकि वह अच्छा व्यक्ति नहीं था!”

बात यह है कि बच्चों के प्रति इस तरह के व्यवहार को भारत में हम अक्सर देखते रहते हैं। लोग बच्चों को सुधारने के लिए अधिकतर नरमी का व्यवहार नहीं करते बल्कि सीधा उन पर चिल्लाने लगते हैं, ज़ोर-ज़ोर से डांटते-डपटते हैं और उन्हें अपनी बात समझाने का अवसर नहीं देते, न ही यह बताते हैं कि जो भी वे कर रहे हैं, वह उन्हें क्यों नहीं करना चाहिए।

स्वाभाविक ही यह बच्चों के प्रति आम भारतीयों के गलत रवैये की झलक दिखाता है। इसमें एक तरह का सकारात्मक भाव भी नज़र आता है कि कोई भी संसार के बच्चों को उचित व्यवहार सिखा सकता है और बता सकता है कि क्या उनके लिए सही है और क्या गलत। यह बहुत अच्छा है, क्योंकि इससे भारतीय समाज के इस नज़रिए का पता चलता है कि बच्चों की ज़िम्मेदारी केवल अभिभावकों की ही नहीं है। लेकिन साथ ही इसका दोष यह है कि लोग अक्सर बच्चों से ऐसे बात करने लगते हैं जैसे वे मूर्ख हों। अधिकतर उन्हें इस बात का एहसास नहीं होता कि हम सबकी तरह बच्चों की भी कुछ भावनाएँ होती हैं, बल्कि हमसे कहीं अधिक तीव्र और गहन भावनाएँ होती हैं।

और इस तरह अपने आठ साल के भाई के साथ मेले में आई हमारी चार-साला नृत्य-सितारा बेटी की कोमल भावनाओं की परवाह किए बगैर यह व्यक्ति उसके साथ मनचाहा दुर्व्यवहार करता है जबकि वे दोनों सिर्फ इस व्यक्ति के साथ वाली सीट पर बैठना चाहते हैं। वह सरल भाषा में कह सकता था कि वहाँ न बैठे, वह उसकी पत्नी की सीट है और वह कभी भी आ सकती है। वह उन्हें प्यार से बता सकता था कि देखो, सारे बच्चे वहाँ कतार में इंतज़ार कर रहे हैं और वहाँ जाकर इंतज़ार करो। चाहता तो वह उन्हें वहीं बैठा रहने दे सकता था क्योंकि वे उसे परेशान नहीं करने वाले थे और जब पत्नी आ जाती तो उठ भी जाते!

पिता होने के नाते मुझे गुस्सा आया कि उसने मेरी बच्ची की बहुत सुखद शाम पर एक काला धब्बा लगा दिया। एक पिता के रूप में मैं पूछता हूँ कि आप लोग अपने आस-पास के बच्चों के साथ विनम्र व्यवहार क्यों नहीं कर सकते! और एक इंसान होने के नाते मैं सोचता हूँ कि अपने से दुर्बल व्यक्तियों के साथ चीखने-चल्लाने जैसा ऐसा बेहूदा व्यवहार अक्सर लोग सहन कैसे कर लेते हैं।

भला व्यवहार कीजिए। बच्चों के साथ और अपने आसपास के सभी लोगों के साथ!

आस्था आपको पशुओं का मल-मूत्र भी खिला पिला सकती है – 8 अक्टूबर 2015

कल मैंने भारत की एक गंभीर होती जा रही राजनीतिक समस्या का ज़िक्र किया था। आज जिस विषय पर मैं लिखने जा रहा हूँ, उसे पढ़कर आपको हँसी आए बगैर नहीं रहेगी या घृणा से नाक-भौंह सिकोड़ेंगे या स्तब्ध रह जाएँगे! और कूपमंडूक हिन्दू रूढ़िवादियों की बात तो छोड़िए, खुद वर्तमान हिन्दूवादी भारत सरकार भी ठीक इसी बात का प्रचार-प्रसार कर रही है जबकि इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि गोमूत्र और गोबर के सेवन से कोई लाभ होता है!

जी हाँ, भारत में बहुत से लोग विश्वास करते हैं कि गाय का मल-मूत्र उनके लिए लाभप्रद हो सकता है। वे गंभीरता पूर्वक मानते हैं कि वह बहुत सी बीमारियों का इलाज कर सकता है। इसके अलावा वह पवित्र तो है ही! पवित्र इसलिए कि वह पवित्र गाय द्वारा, जिसे धार्मिक हिन्दू 'मानव जाति की माँ' समझते हैं, उत्सर्जित किया गया है!

यह कोई नई बात नहीं है। दरअसल बहुत से पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि गाय से प्राप्त होने वाले पाँच पदार्थों को अर्थात दूध, दही, घी, मूत्र और मल को, एक कर्मकांड के साथ ग्रहण करने से शरीर पवित्र हो जाता है। यहाँ, वृंदावन में, जोकि 'दैवी चरवाहे' कृष्ण की नगरी है, कई वर्षों से गोमूत्र और गोबर से बनी वस्तुएँ लोकप्रिय हैं। और अब, जब कि एक ऐसी पार्टी सत्ता में है, जो हिन्दू धर्म, हिन्दू परंपरा और हिन्दू मूल्यों का प्रचार-प्रसार करने में लगी है, इन वस्तुओं का बाज़ार अचानक और अधिक फल-फूल रहा है!

स्वाभाविक ही उनके विज्ञापनों में बहुत सारी अनाप-शनाप मूर्खतापूर्ण बातें हैं: सिर्फ इतना ही नहीं कि गाय का मल-मूत्र बहुत सी बीमारियों के इलाज में असरकारक है, यहाँ तक कि कैंसर भी इस चमत्कारी इलाज से ठीक हो जाता है-और यह उनका सबसे जनप्रिय दावा है। इतना ही नहीं, वे झूठी अफवाहें फैलाने में भी नहीं हिचकिचाते-कहते हैं नासा ने भी यह स्वीकार किया है कि गाय के पिछवाड़े से विसर्जित पदार्थ ग्रहण करना आपके शरीर के लिए लाभप्रद होता है! वास्तव में मैं जानना चाहूँगा कि इससे महत्वपूर्ण और कौन सी बात नेशनल ऐरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन को गाय के मूत्र का विश्लेषण करने की प्रेरणा दे सकती है!

चलिए, मज़ाक छोड़कर कुछ गंभीर बात करें। मेरा मानना है कि लोगों को गाय के मल-मूत्र में उलझाकर देश की वास्तविक समस्याओं की ओर से उनका ध्यान बँटाने का यह एक सोचा-समझा मगर कारगर तरीका है। लेकिन गाय को पवित्र, देवता या माता मानने वालों के पाखंड पर मैं एक बार फिर स्तब्ध रह जाता हूँ! वे उसे माँ कहते हैं, खास मौकों पर उसकी पूजा करते हैं और गाय द्वारा उत्सर्जित सभी वस्तुओं को प्रसाद मानकर उनका सेवन करते हैं-लेकिन जब गाय दूध देना छोड़ देती है तो उसकी कोई चिंता नहीं करते कि उसके साथ क्या हो रहा है, इस बात से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि गलियों और कचरे के ढेरों पर वह कूड़ा-करकट और जानलेवा प्लास्टिक खा रही है। उसके चमड़े से बने जूते और बेल्ट इस्तेमाल करने में उन्हें कोई एतराज़ नहीं होता! उस वक्त गाय की दैवी पवित्रता का विचार कहाँ चला जाता है? तब उन्हें नहीं लगता कि अपनी माँ की त्वचा से बने जूते पहनकर वे कोई पाप कर रहे हैं?

किसी पशु के अपशिष्ट को धर्म द्वारा पवित्र बनाकर प्रस्तुत करना वास्तव में विचलित कर देने वाला कृत्य है! इलाज के लिए खुद अपना मूत्र पीना भी कुछ लोगों में लोकप्रिय है। और अब आप गोमूत्र पी रहे हैं-आप गधे या बंदर का मूत्र भी पी सकते हैं! गोमूत्र में पाया जाने वाला कोई उपयोगी एंज़ाइम उसमें भी मौजूद हो सकता है!

मैं पूरी गंभीरता के साथ कहना चाहता हूँ कि मैं इसकी अनुशंसा कभी नहीं करूंगा! गोबर और गोमूत्र वे पदार्थ हैं, जिन्हें शरीर ने बाहर निकाला ही इसलिए है कि वे उपयोगी नहीं हैं, वे अपशिष्ट हैं! शरीर के अंग-प्रत्यंगों से होकर गुजरने के बाद इन पदार्थों का कोई उपयोग नहीं रह गया होता! फिर उन्हें आप क्यों पीएँगे या खाएँगे? बल्कि मैंने सुना है कि इन अपशिष्टों को ग्रहण करने से गाय की आँतों में पाए जाने वाले विषाणुओं के संक्रमण का खतरा भी हो सकता है!

तो धर्म की यही वास्तविक शक्ति है! वह आपको पशुओं का मूत्र पीने और उनका मल खाने के लिए प्रेरित कर सकता है। यह वही धर्म है, जो एक मनुष्य का छुआ पानी पीने से भी मना करता है क्योंकि उस व्यक्ति को धर्मग्रंथों ने ‘अछूत’ घोषित कर रखा है!

क्या आप नहीं समझते कि धर्म के नाम पर यह बहुत गलत हो रहा है?

सेक्स, सेक्स और सेक्स – पश्चिम के विषय में भारत का विकृत नजरिया – 2 सितंबर 2015

पिछले दो दिन मैंने आपको समाचारों में देखी गई कुछ बातें बताईं: यूरोप आने वाले शरणार्थियों की समस्या और कैसे यूरोप के लोग उनका स्वागत कर रहे हैं और उनकी हरसंभव मदद भी कर रहे हैं। लेकिन इनमें से ज़्यादातर जानकारियाँ मुझे भारतीय मीडिया से प्राप्त नहीं हुई हैं बल्कि जर्मन और अंतर्राष्ट्रीय ऑनलाइन समाचारों के ज़रिए प्राप्त हुई हैं। यहाँ, भारत में हमें पश्चिम के समाचार मिलते तो हैं किन्तु उनके ऊपर वहाँ की चटपटी खबरें और कहानियाँ ज़्यादा होती हैं। मुझे लगता है पश्चिम और वहाँ के निवासियों को एक ख़ास, भ्रामक नज़रिए से देखने के भारतीय रवैए के पीछे इन्हीं चटपटी कहानियों का बहुत बड़ा हाथ होता है!

मैं इसे और स्पष्ट करता हूँ। मैंने कई बार आपसे कहा है कि पश्चिम के बारे में बहुत से भारतीयों का रवैया बड़ा हास्यास्पद होता है। उनका विश्वास होता है कि पश्चिम में ज़िन्दगी गुज़ारने का मतलब 'मुक्त यौन संस्कृति' में जीना है। यह परिभाषा अपने आप में हास्यास्पद है और जब दो अलग अलग व्यक्ति इन शब्दों का इस्तेमाल करते हैं तो दोनों के ही मन में इसके पूर्णतः अलग अलग अर्थ होते हैं!

हमारे अखबारों में अंतर्राष्ट्रीय समाचार वाले पृष्ठ पर सिर्फ राजनैतिक खबरें होती हैं: ओबामा के निर्णय, संयुक्त राष्ट्र और उसके कामकाज, ग्रीस को यूरोपियन यूनियन में बनाए रखने के लिए यूरोपीय देशों की जद्दोजहद, आदि, आदि। लेकिन सिर्फ इतना ही नहीं होता, हमें पश्चिमी जीवन शैली और फैशन के बारे में भी खूब पढ़ने को मिलता है!

अब यह मत कहने लगिएगा कि हॉलीवुड के बारे में भी बहुत कुछ होता होगा- हमारे पास बॉलीवुड है, इसलिए हमें ज़्यादा सितारों की, फिल्मों और गायकों की ज़रूरत नहीं पड़ती! फिर भी, कुछ चुनिंदा कहानियाँ तो होती ही हैं, जो निश्चित ही खासी बिकाऊ होती हैं: कुछ भी, सेक्स की चाशनी में पगा हुआ!

उदाहरण के लिए, जब एक ऑस्ट्रेलियन महिला जानवरों को प्रताड़ित करने के जुर्म में ब्रिटेन में गिरफ्तार हुई थी! सिर्फ क्रूरता के आरोप में नहीं! असल में पुलिस ने उसके घर पर छापा मारा और नशीली दवाएँ ढूँढ़ती रही और उसका मोबाइल फोन जब्त कर लिया- मगर किसी नशीले पदार्थ का कोई सुराग उन्हें नहीं मिला बल्कि एक वीडियो मिला, जिसमें वह अपने कुत्ते के साथ संभोगरत दिखाई गई थी मगर यहाँ के समाचार पत्रों में नशीले पदार्थ की नहीं बल्कि एक वीडियो मिलने की खबर की नमक-मिर्च लगाकर विस्तृत चर्चा की गई थी कि वीडियो में वह महिला अपने कुत्ते के साथ संभोगरत दिखाई गई है!

निश्चित ही, उस दिन ब्रिटेन से आने वाला सबसे मुख्य समाचार यही रहा होगा!

और किसी दूसरे दिन शायद यह देश भर की स्नातक परीक्षाओं के नतीजे आने के बाद लगभग 5500 युवा लड़के-लड़कियाँ स्कॉटलैंड के बीच पर खुशियाँ मना रहे थे। अलग-अलग कुछ समूहों में वे शराब पी रहे थे और अचानक दो समूहों के बीच मार-पीट होने लगी। जब पुलिस आई तो उन्होंने सिर्फ मार-पीट करने वाले शराबियों को ही गिरफ्तार नहीं किया बल्कि सड़क के किनारे संभोगरत दर्जनों युवा लड़के-लड़कियों को भी गिरफ्तार कर ले गए। और यहाँ के अखबारों का शीर्षक बना "बीच पर सेक्स"!

शायद आप समझ रहे होंगे कि इन बातों का रुख किधर होता है! उनमें इसके आगे कोई जानकारी नहीं होती और बाकी हमारी स्वैर कल्पनाओं पर छोड़ दिया जाता है! ऐसे समाचार हम अक्सर पढ़ते रहते हैं- इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि एक सामान्य भारतीय को पश्चिम के बारे में ऐसे मिथ्या विचार ही प्राप्त होते हैं! अगर आपको वहाँ जाकर कुछ समय बिताने का मौका नहीं मिला है या अगर आप वहाँ के अंग्रेजी टीवी नहीं देखते और अगर आपका पश्चिमी लोगों से कोई मिलना-जुलना नहीं है तो पूरी संभावना है कि आपके मन में पश्चिम के बारे में ऐसे विचार अक्स हो जाएँ: कि वहाँ सेक्स के अलावा विशेष कुछ नहीं होता और वहाँ हर जगह सेक्स ही सेक्स है!

कैसे सतत मार्गदर्शन बच्चों के विकास में बाधा पहुँचाता है – 11 अगस्त 2015

अपरा खेल रही थी और मैं और रमोना हमेशा की तरह बच्चों के लालन-पालन संबंधी विषयों पर चर्चा करने लगे कि कैसे आज जो आप बच्चों के साथ कर रहे हैं, उसका भविष्य में उन पर कितना गहरा असर पड़ता है। इस बार हमारी चर्चा इस ओर मुड़ गई कि बच्चों को यह निर्देश देने में कि वे क्या करें या न करें और उन्हें उनकी मर्ज़ी से कुछ भी करने की स्वतंत्रता देने के बीच क्या अंतर है।

मेरा विश्वास है कि दोनों के मध्य तालमेल बनाए रखने की ज़रूरत है लेकिन हम दोनों के दो भिन्न देशों और उनकी संस्कृतियों के बीच तुलना करते हुए हमने पाया कि दोनों ही परिस्थितियों में कई लोग अति कर देते हैं।

अगर आप भारतीय परिवारों में जाएँ तो कई बार आपको पता चलेगा कि घर में वयस्क सदस्य मौजूद हैं लेकिन वे बच्चों के साथ कोई चर्चा नहीं करते, उनके साथ विशेष मेलजोल नहीं रखते। माँ घर के कामकाज निपटा रही होती है, दूसरे सदस्य चर्चा कर रहे होते हैं और बच्चे अपनी मनमर्ज़ी से खेलकूद में लगे होते हैं या इधर-उधर मटरगश्ती कर रहे होते हैं। वे अपने खेल खुद चुनते हैं, उनके खिलौने उनके अपने हैं और कुल मिलाकर बिना किसी निर्देश के वे अपना पूरा समय बिताते हैं- वही तयशुदा खेल या अपवादस्वरूप कोई वयस्क उनके साथ खेलने वाला।

कभी-कभी, और खासकर अनपढ़ परिवारों में, इसके बड़े खतरनाक परिणाम निकलकर आते हैं! बच्चे अपने परिवेश की जाँच-परख करते हैं- परिवेश, जो आवश्यक नहीं कि बच्चों के लिए पूर्ण सुरक्षित हो- और गंभीर शारीरिक चोटें खा बैठते हैं। अगर कोई वयस्क उस समय उनके साथ होता या दूर से ही सही, सिर्फ उनकी ओर ध्यान दे रहा होता तो दुर्घटना टल सकती थी। संयुक्त परिवारों में भी, जहाँ काफी वयस्क और बुज़ुर्ग मौजूद होते हैं और जिनमें से कोई एक बच्चों का ध्यान रख सकता है, ऐसी दुर्घटनाएँ होती रहती हैं।

इसके विपरीत, पश्चिम में मैंने देखा है कि बच्चे हर वक़्त किसी न किसी की नज़र में होते हैं और अधिकतर किसी न किसी वयस्क के साथ मिलकर सक्रिय रूप से कुछ न कुछ कर रहे होते हैं। इससे किसी संभावित दुर्घटना की रोकथाम हो जाती है और वयस्क को भी बच्चे के अंदर छिपी प्रतिभा को जानने और उसे आगे विकसित करने का मौका मिल जाता है।

बहुत छोटी उम्र से ही वहाँ खेलने का बंधा-बंधाया समय होता है। वयस्क उनके खिलौने तैयार करके उन्हें देते हैं कि उन्हीं से खेलें और वे उनसे खेलते हैं और अभिभावक लगातार उन्हें बताते रहते हैं कि कैसे खेलना है या कैसे उनका इस्तेमाल करना है। फिर बच्चे किंडरगार्टेन और स्कूल में पढ़ने जाने लगते हैं, जहाँ सब कुछ बंधा-बंधाया ही होता है। स्कूल से लौटने के पश्चात वाद्ययंत्र सीखने की कक्षाएँ या खेल-कूद का नियत समय होता है और निश्चित ही होमवर्क तो करना ही करना होता है। हर बात के स्पष्ट निर्देश होते हैं कि कब, कैसे और किस क्रम में उन्हें किया जाना है। यहाँ तक कि दोस्तों के साथ खेलने के नियत दिनों में भी मैंने देखा है कि अभिभावक बच्चों को क्या खेलना चाहिए, यह बताना आवश्यक समझते हैं।

बहुत ज़्यादा मार्गदर्शन के साथ मैं जो समस्या देखता हूँ वह यह है कि उससे बच्चे दूसरों के कहे अनुसार काम करने के इतने आदी हो जाते हैं कि वे यह भी नहीं जान पाते कि वास्तव में वे खुद क्या करना चाहते हैं! खास कर परंपरागत शिक्षा विधियों और सख्त लालन-पालन के तरीकों के चलते उन्हें खुद कुछ करके देखने और खोज-बीन करते हुए आगे बढ़ने की कोई प्रेरणा या प्रोत्साहन नहीं मिल पाता! वे गिरते नहीं हैं या गिर नहीं सकते और इसलिए जानते ही नहीं हैं कि गिरने पर चोट लगती है। उन्हें खुद निर्णय लेने का मौका ही नहीं मिल पाता। और फिर वे यह भी समझ नहीं पाते कि वास्तव में वे क्या करना चाहते हैं!

ऐसी हालत में हम बड़ी तादात में ऐसे युवाओं को देखते हैं, जो वास्तव में यह भी नहीं जानते कि अपने समय का क्या सदुपयोग किया जाए। वे स्कूल से पढ़कर निकले हुए युवा बच्चे होते हैं, जो अब भी मार्गदर्शन के लिए अभिभावकों का मुँह जोहते हैं कि वे बताएँ कि नौकरी के लिए कहाँ आवेदन किया जाना ठीक होगा या किसी शिक्षक का, जो यह बताए कि अपने जीवन का आगे क्या किया जाना चाहिए। उन्हें बताई गई बातों का ही वे अनुसरण करते हैं क्योंकि वे उसी में आसानी महसूस करते हैं।

मुझे लगता है कि हमें बच्चों को स्वतन्त्रता पूर्वक अपनी मर्ज़ी से विकसित होने की आज़ादी देनी चाहिए। उनका मार्गदर्शन बहुत सहजता के साथ किया जाना चाहिए कि वे सीखें अवश्य लेकिन उनके लिए इतना मौका भी छोड़ना चाहिए कि वे समझ सकें कि वे क्या सीखना चाहते हैं! हमें उनकी सुरक्षा का खयाल अवश्य रखना चाहिए मगर इस तरह कि बिना किसी व्यवधान के वे खुद अपने अनुभव प्राप्त कर सकें।

लोगों के जीवन पर धर्म और ईश्वर का प्रभाव – भारत और पश्चिमी देशों के बीच तुलना – 3 अगस्त 2015

पिछले सप्ताह मैं नास्तिकता के विषय पर काफी विस्तार से लिखता रहा हूँ और निश्चित ही अभी भी इस विषय पर मेरे मन में अनेकानेक विचार, अवधारणाएँ और कल्पनाएँ हैं, जिन्हें मैं आपके साथ साझा करना चाहता हूँ। लेकिन इस समय मुझे अपने पश्चिमी पाठकों का भी विचार करना चाहिए। मैं जानता हूँ कि वहाँ बहुत से लोगों के लिए इस बात का वास्तव में कोई महत्व नहीं है कि ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं। और दरअसल यही बात मैं अपने भारतीय मित्रों के साथ साझा करना चाहता हूँ और यह करते हुए पश्चिमी मित्रों को भी सहज ही यह पता चल जाएगा कि क्यों भारत में यह विषय इतना विस्फोटक है!

वास्तव में इसका संबंध संस्कृतियों के बीच मौजूद अंतर से है: पश्चिम में मेरे बहुत से मित्र हैं, जिनके बारे में ठीक तरह से मैं भी नहीं जानता कि वे ईश्वर पर आस्था रखते हैं या नहीं। भारत में यह तुरंत पता चल जाता है। पश्चिम में मेरे बहुत से मित्र हैं, जो किसी न किसी धर्म का, ज़्यादातर ईसाईयत का, अनुसरण करने वाले हो सकते हैं- लेकिन इसके बावजूद, अधिकांश विषयों पर हमारे विचार एक समान ही हैं! यह एक ऐसी बात है, जो भारत में सहज संभव नहीं है।

यह एक तथ्य है कि पश्चिम में बहुत बड़ी संख्या में लोगों के लिए धर्म और ईश्वर का विशेष महत्व नहीं है। वे एक विशिष्ट धार्मिक घेरे के भीतर रहकर बड़े होते हैं, बप्तिस्मा करवाते हैं, यौवन के ईसाई पुष्टिकरण कर्मकांड आयोजित करते हैं और फिर चर्च में जाकर शादी भी करते हैं। संभव है, वे क्रिसमस और ईस्टर के दिन चर्च भी जाते हों। लेकिन उसके बाद उनके सामान्य जीवन में धर्म की कोई दखलंदाज़ी नही होती, अक्सर वे धर्म और ईश्वर के विषय में बात करना भी पसंद नहीं करते। दैनिक जीवन में वे ईश्वर का विचार तक मन में नहीं लाते, भले ही उनके प्रति उनका बुनियादी रवैया कुछ भी हो।

इसलिए जब दो ऐसे लोग आपस में मिलते हैं तो उनके बीच उनकी आस्थाओं का व्यवधान नहीं होता। वे इसकी कतई परवाह नहीं करते कि सामने वाला ईश्वर पर विश्वास रखता है या नहीं क्योंकि वे नहीं समझते कि इसका ज़रा सा भी महत्व है। परिवार में अगर उनका लड़का कहे कि वह भविष्य में चर्च नहीं जाना चाहता या अपना विवाह चर्च में नहीं बल्कि कोर्ट में पंजीकृत करवाना चाहता है तो माता-पिता आसानी से उसकी बात मान लेते हैं। इसी तरह कोई लड़की क्रिसमस के दिन चर्च चली जाएगी, भले ही वहाँ के पादरी की कही बातों पर उसका एक रत्ती भरोसा न हो।

भारत में मामला बहुत अलग है। यहाँ आस्थाओं के प्रश्न परिवारों को जुदा कर देते हैं! दैनिक जीवन में आस्था बहुत बड़ी भूमिका अदा करती है और जितना अधिक आपके आसपास के लोग धार्मिक और परम्परावादी होंगे उतना ही आपका बचपन धार्मिक त्योहारों, समारोहों, रस्म-रिवाजों और कर्मकांडों के बीच गुज़रेगा। कुछ नियत दिन या सप्ताह होंगे जब उपवास रखना होगा, कुछ अवसरों पर मन्दिर जाना ज़रूरी होगा तो कुछ दिन आप मन्दिर नहीं जाएँगे। दूसरों की धार्मिक भावनाएँ न दुःखें या देवता अप्रसन्न न हो जाएँ इसलिए कुछ अवसरों पर धारण किए जाने वस्त्रों के बारे में आपको कुछ नियम याद रखने होंगे और यह भी कि किन भावभंगिमाओं या मुद्राओं और शब्दों का उपयोग करना है और किनका नहीं करना है। यहाँ इस बात पर लोगों की बहुत गहरी आस्था होती है कि आपका अच्छा-बुरा इन सब बातों पर निर्भर होता है!

इसलिए जब बेटा घोषणा करता है कि वह ईश्वर पर विश्वास नहीं रखता तो अभिभावक चिंताग्रस्त हो जाते हैं, गुस्सा होते हैं, उन्हें समझ नहीं आता कि अब क्या किया जाए। यार-दोस्त समझ नहीं पाते और सामान्य दैनिक कार्यकलापों पर विराम सा लग जाता है क्योंकि कोई भी अंतहीन वाद-विवाद, तनातनी और झगड़े नहीं चाहता! उनकी पुरानी जीवन-चर्या समाप्त हो जाती है, अपने परिवेश से कटकर वे पूरी तरह अलग, कोई नई सामाजिक मंडली खोजने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

इसीलिए यहाँ यह चर्चा बहुत महत्वपूर्ण है। यह आपके दैनिक जीवन के बारे में है, सिर्फ सालाना दो छुट्टियों के बारे में ही नहीं। आपके रवैये और नज़रिए की जड़ कहाँ है, इस बारे में है। और इसलिए मुझे हमेशा लगता रहा है कि मैं इस विषय में पहल करूँ, बातचीत करूँ- क्योंकि आम तौर पर लोग इस विषय में चर्चा करते हुए घबराते हैं!

मैं खुद एक धार्मिक और आस्तिक से नास्तिक हुआ हूँ। मुझे महसूस हुआ है कि उसके बाद मेरे बहुत से भारतीय मित्र मुझसे दूर हो गए, यहाँ तक कि दोस्ती तोड़ ली। लेकिन मेरे पश्चिमी मित्रों के साथ मुझे यह अनुभव नहीं झेलना पड़ा- ज़्यादातर लोगों के साथ मुझे लगता रहा कि इससे उन्हें कोई मतलब ही नहीं है! इसे इस तरह समझिए कि आस्था से ज़्यादा उनके लिए व्यक्ति का महत्व था!

मैं पहले कह चुका हूँ कि ज़्यादा से ज़्यादा नास्तिक होंगे तो दुनिया बेहतर जगह हो जाएगी। इसका संबंध इस बात से नहीं है कि आप ईश्वर को मानते हैं या नहीं। और इसीलिए यह बात दुनिया के लिए इतनी आवश्यक है! लेकिन उस विषय में आगे चर्चा कल!

सामान्य टूरिस्ट गाइडों से हम किस तरह अलग हैं? 22 जुलाई 2015

पिछले दो ब्लॉगों में मैंने आपको बताया कि कैसे हमारे आश्रम में एक टूर गाइड आया जो चाहता था कि अपने कमीशन में से एक हिस्सा हमें नियमित रूप से दे दे। बिल्कुल शुरू ही में मैंने ज़िक्र किया था कि आम टूर गाइडों से हम बहुत अलग तरह से यह काम करते हैं और इसी अंतर को अपने व्यापार के लिए सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं। ठीक इसी बात को और स्पष्ट करने के लिए मैं आज का ब्लॉग लिखना चाहता हूँ।

पिछले दो दिनों के ब्लॉग पढ़कर आप भी इस बारे में समझ गए होंगे। मैंने बताया था कि हमारे कर्मचारी लोगों से टिप (बख्शीश) नहीं माँगते, बल्कि इसके विपरीत, हम अपने मेहमानों से हमारे किसी भी कर्मचारी को टिप न देने की गुज़ारिश करते हैं। कारण है- समानता, निष्पक्षता। हम चाहते है लोग प्रसन्न और संतुष्ट हों। यह उनके लिए भी सच है जो यहाँ काम करते हैं और उनके लिए भी जो यहाँ विश्रांति प्राप्त करने या किसी प्रशिक्षण हेतु आते हैं या पर्यटक के रूप में आते हैं! संतोष की मुख्य बात यह होती है कि जो उन्हें प्राप्त होता है, उसकी जायज़ कीमत वे अदा करते हैं और कोई उनका गलत लाभ नहीं उठाता। हम सिर्फ ग्राहक नहीं बनाना चाहते, हम दोस्त बनाना चाहते हैं!

भारत भर के टूर और पर्यटन प्रस्ताव हम तब लेकर आए जब दोस्तों ने हमसे इनके लिए खुद कहा। उन लोगों ने कहा, जो पहले से हमें जानते थे और जो इस आशा से हमारे आश्रम में मेहमान बनकर आते थे कि हम उनके पर्यटन कार्यक्रमों की व्यवस्था में सहायता करेंगे। उन्हें आशंका होती थी कि कहीं उनके साथ धोखाधड़ी न हो, कोई दुर्व्यवहार न हो। कुछ लोगों के साथ पहले ऐसा हो चुका होता था और वे आश्वस्त होना चाहते थे, इसलिए हमारे पास आते थे कि हम उन्हें सही जानकारियाँ और घूमने-फिरने की उचित राय देंगे और मदद करेंगे।

इन सब बातों का ध्यान रखते हुए हमने यह प्रस्ताव रखा कि खुद मेरे भाई यशेन्दु और पूर्णेन्दु उनके साथ गाइड के रूप में जाएँगे और आज तक यही व्यवस्था लागू है। अगर वे यहाँ नहीं हैं तो हम कोई टूर कार्यक्रम नहीं रखते क्योंकि आज तक हमें ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिल पाया है, जो इतना विश्वसनीय हो कि अपने मेहमानों के साथ उसे भेजा जा सके। अपने मेहमानों को हम उसके भरोसे छोड़कर निश्चिन्त हो सकें। वास्तव में इसे हम अपना कर्तव्य समझते हैं कि अपने मित्रों को हर तरह के कमीशन व्यापार से मुक्त रखें, जिसमें सामान्य टूर गाइड खुले आम, धड़ल्ले के साथ लिप्त रहते हैं!

आप कल्पना नहीं कर सकते कि न जाने कितनी बार मेरे भाइयों को विदेशी पर्यटकों की खरीदी पर दुकानदारों ने 80-80 प्रतिशत तक कमीशन देने का प्रस्ताव रखा! लेकिन हम यह नहीं करते! वे आपके साथ दुकान पर खड़े होंगे और अगर आप चाहेंगे तो दुकानदार के साथ मोल-भाव भी करेंगे, जिससे आपको उचित कीमत पर आपकी मनचाही वस्तु मिल सके! जब आप पूछेंगे कि दुकानदार द्वारा बताई जा रही कीमत पर सामान खरीदना ठीक होगा या नहीं, वे आपको सच्चा और प्रामाणिक जवाब देंगे! जहाँ आप सैर करना चाहेंगे, जहाँ जाना चाहेंगे, वे पूरी कोशिश करेंगे कि आप उचित खर्च पर वहाँ जाकर वहाँ का लुत्फ उठा सकें। भारत में गाइडेड टूर लेना हो तो हमारे साथ दूसरी और सुविधाओं के अलावा यह एक अतिरिक्त लाभ भी आपको हो जाता है!

इसके साथ ही, हमारा ड्राईवर भी पूरी तरह विश्वास-योग्य है अतः जो भी उसके साथ कहीं आना-जाना चाहता है, निश्चिंत होकर उसके साथ कहीं भी जा सकता है। न दुर्घटना की चिंता, न ही पर्यटन-स्थलों से बाहर निकलने पर उसे खोजने की ज़रूरत। न कहीं भटकने का डर, न इस बात का कि वह किसी मिलीभगत वाली दुकान पर आपको ले जाएगा और बाद में आकर अपना मोटा कमीशन प्राप्त लेगा!

हम आशा करते हैं कि किसी न किसी दिन हमें एक ऐसा गाइड मिल जाएगा, जिस पर हम पूरा भरोसा कर सकेंगे लेकिन तब तक हमें खुद अपने आप पर निर्भर रहना होगा। लेकिन एक बात तय है, मैं किसी को भी एक ऐसे व्यक्ति के साथ कहीं नहीं भेज सकता, जिस पर मुझे पूरा भरोसा नहीं है कि वह उसके साथ धोखेबाज़ी नहीं करेगा!

और इसी बात पर, मेरे मित्रों, हम दूसरे गाइड टूरों से अलग हैं!

क्या भारत में टिप की अपेक्षा न रखने वाला पर्यटन-गाइड मिलना असंभव है? 20 जुलाई 2015

स्वाभाविक ही, हमारे योग और आयुर्वेद शिविरों में विदेशों से आने वाले अधिकांश मेहमान पर्यटक होते हैं। हम खुद भी उन्हें गाइडेड पर्यटन के लिए उनके मनपसंद स्थानों पर ले जाते हैं या अपनी टैक्सी उनके साथ भेज देते हैं, जिससे वे भारत की सुंदरता को करीब से देख सकें। यही ‘टूर गाइड’ और ‘पर्यटक’ की परिभाषा है- लेकिन फिर भी हमारा दावा है कि हम सबसे बहुत अलग हैं। भारत के आम ‘टूर गाइडों’ से बिल्कुल अलग और इसके अलावा हमारे साथ हुए अनुभवों के चलते हमारे ‘पर्यटक’ भी सिर्फ पर्यटक नहीं बल्कि उससे बढ़कर कुछ होते हैं। आज मैं आपको बताना चाहता हूँ कि यह विचार मेरे मन में कैसे आया और क्यों मैं समझता हूँ कि ऐसा ही है।

एक दिन मेरा एक करीबी मित्र एक व्यक्ति को लेकर आया और मुझसे मिलवाया। क्योंकि मेरा मित्र जानता था कि हमारे यहाँ अक्सर ऐसे मेहमान आते रहते हैं, जो ताजमहल और आगरा के आसपास के दर्शनीय स्थलों की सैर करना चाहते हैं, स्वाभाविक ही, दोस्त को लगा कि हम उसे काम दे सकते हैं क्योंकि वह अधिकृत सरकारी गाइड था।

अधिकृत होने के कारण पहले-पहल हमें उसका व्यवहार बहुत पेशेवर लगा: एक दिन की आगरा यात्रा का फिक्स्ड रेट, एक व्यक्ति का इतना, दस के समूह के लिए एक ख़ास शुल्क और ज़्यादा लोगों के लिए कुछ और-लेकिन सब कुछ फिक्स्ड! वह इतिहास, इतिहास-पुरुषों और महिलाओं या ऐतिहासिक तारीखों का जानकार और ऐतिहासिक कहानी-किस्सों से पूरी तरह वाकिफ था और ग़रज़ यह कि, जो भी आप जानना चाहें, उसकी ज़बान पर मौजूद!

मैं उसे रखने के लिए तैयार हो गया और कहा कि फिक्स्ड रेट तो ठीक है मगर आश्रम आने वाले हर मेहमान के लिए हमारी एक शर्त होगी: आपके शुल्क का भुगतान हम करेंगे और आपके साथ जाने वाले हमारे मेहमान से आप अलग से एक रुपया भी नहीं माँगेंगे।

उत्तर मिला: ओह, मैं नहीं माँगूंगा। उसकी कोई बात नहीं, लेकिन आप तो जानते ही हैं, जब आप किसी के साथ बाहर होते हैं, उन्हें जानकारी देते हुए और जो कुछ भी बन पड़ता है, उनके लिए अच्छा से अच्छा करते हुए उनकी सेवा में हर वक़्त तत्पर होते हैं तो उन्हें भी लगता है, कुछ इनामो-इकराम दे दिया जाए! सभी देते हैं कुछ न कुछ, तब ऐसी हालत में क्या किया जाए?… जी, शायद वे आपको पकड़कर आपकी जेब में जबरदस्ती पैसे ठूँस देते होंगे? है न?

निश्चित ही ऐसा नहीं होता! हमारे बहुत से मेहमान अपने एक दिनी सफर में ऐसा करके देख चुके हैं और जबकि कुछ लोग टिप देना पसंद करते हैं, ज़्यादातर लोग टिप नहीं देते क्योंकि वे कार और गाइड-शुल्क सहित पूरे पैकेज का पूरा शुल्क अदा कर चुके होते हैं! यह सिर्फ यह दर्शाता है कि आप इसकी अपेक्षा रखते हैं कि कोई आपको टिप या बख्शीश दे, अन्यथा आप अपना काम पूरी ज़िम्मेदारी से नहीं करेंगे!

मैंने उससे कहा कि हमारे आश्रम में टिप देने की प्रथा नहीं है। बल्कि, सच्चाई यह है कि हम अपने ग्राहकों से कहते हैं कि हमारे कर्मचारियों को पैसे न दें! जो अनुभव उन्हें यहाँ प्राप्त होते हैं, जो सुविधा और सेवा वे यहाँ पाते हैं, उसमें बहुत से लोगों का योगदान होता है और अगर आप मालिशकर्ता या ड्राईवर को टिप देते हैं तो रसोइये या बगीचे के मालियों को कुछ नहीं मिल पाता, अनजाने में ही सही, उनकी उपेक्षा होती है। हम समानता के समर्थक हैं और इसलिए हम समय-समय पर सभी को उनके वेतन पर बोनस भी देते हैं। हमारे उस बोनस-फंड में कोई भी अपना योगदान दे सकता है।

लेकिन मैं जानता हूँ कि सामान्य रूप से टूरिस्ट-गाइड अपने तयशुदा शुल्क के अलावा अतिरिक्त पैसों की अपेक्षा भी करते हैं- सीधे तौर पर या घुमा-फिराकर! या तो वे सीधे तौर पर माँग लेते हैं या फिर पर्यटकों को अपने दोस्तों की दुकानों पर ले जाते हैं, जहाँ दुकानदार पर्यटकों से सस्ते स्मारक-चिह्नों की ऊँची कीमत वसूल करते हैं और लाभ में से गाइडों को उनके इस अनुग्रह का अच्छा-खासा कमीशन अदा करते हैं।

कल मैं आपको बताऊँगा कि कैसे यह व्यक्ति भी उन गाइडों से कतई अलग नहीं था- और कैसे हम उन सबसे वाकई बहुत अलग हैं!