जब आश्रम आना ऐसा लगता है जैसे किसी विशाल चिड़ियाघर देखने आए हों – 20 अक्टूबर 2015

अगर आप भारत में हमारे आश्रम आते हैं तो यहाँ बहुत से जानवरों से आपकी मुलाक़ात होगी। जी नहीं, पालतू नहीं-जंगली, आवारा, देसी जानवरों से। यहाँ आपको लगेगा कि आप किसी चिड़ियाघर में आ गए हैं!

हँसी-मज़ाक में हम अक्सर इसकी चर्चा करते रहते हैं! जब आप हमारे बगीचे में सैर करते हैं या बेंच पर आराम से बैठे हैं तब स्वाभाविक ही तरह-तरह की चिड़ियाँ और तितलियाँ आपका मनोरंजन करेंगी लेकिन आपको कई बंदर और गिलहरियाँ भी नज़र आएँगी। जब आप शहर में घूमने निकलेंगे तो उधम मचाते आवारा कुत्तों, बेसहारा गायों, अनियंत्रित सूअरों और आज़ादी के साथ इधर-उधर मुँह मारती बकरियों के दर्शन होंगे। आपको घोड़े, गदहे और कभी-कभी ऊँट भी मिल जाएँगे-लेकिन ऊँट अक्सर कोई गाड़ी खींचते या अपनी पीठ पर कोई बोझा ढोते हुए ही दिखेंगे। यह संभव ही नहीं है कि आप हमारे शहर में पैदल घूम-फिर रहे हैं और आपको किसी गाय से बचने की या उसे रास्ता देने के लिए अलग हटने की ज़रूरत न पड़ी हो क्योंकि गाएँ आपको हर जगह खुले आम सड़क पर घूमती हुई मिल जाएँगी या बीच सड़क पर जुगाली करते हुए! ऐसा नज़ारा आप अपने यहाँ रोज़-ब-रोज़ नहीं देखते होंगे! ठीक?

आप अपने कमरे में ही क्यों न बैठे हुए हों, आपको कोई न कोई ऐसा जानवर दिखाई दे जाएगा जिसे आप अक्सर घरों में देखने के आदी नहीं होते! एक बार आश्रम की एक मेहमान पहले ही दिन बड़ी उत्तेजित, हमारे पास आई। सीढ़ियों से तेज़ी से उतरते हुए उसकी साँस रुक रही थी और कुछ कहने से पहले उसे एक गहरी साँस भरनी पड़ी और बात करते हुए भी वह गहरी साँसे लेती रही: "मेरे कमरे में एक मगर का बच्चा है!" पल भर के लिए हम भी स्तब्ध रह गए! दौड़ते हुए उसके साथ ऊपर पहुँचे और सावधानी पूर्वक दरवाजा खोलकर उधर देखा जिधर वह इशारा कर रही थी। वह छत की ओर इशारा कर रही थी कि वहाँ! और एक छिपकली वहाँ मज़े में शांतिपूर्वक बैठी हुई थी! खैर, अगर आपने जीवन में कभी छिपकली न देखी हो तो उसे देखकर आप यही सोचेंगे कि रेंगने वाले किसी बड़े जीव का बच्चा होगा!

निश्चय ही गिरगिट से आपको डरने की ज़रूरत नहीं है लेकिन शायद बंदर के साथ आप अधिक सतर्क रहना चाहेंगे! यहाँ के बंदर बड़े शैतान और शातिर चोर हैं और शहर के बीचोंबीच उनके झुंड आदतन लोगों की आँखों पर से चश्में चुरा लेते हैं। चश्मा लेकर वे कूदकर किसी दीवार पर चढ़कर बैठ जाते हैं। फिर आपकी सहायता के लिए कोई आगे आता है और उनकी ओर बिस्किट या फ्रूट जूस का पाउच फेंकता है और उसे लपकने के लिए वे चश्मा फेंक देते हैं और चश्मा वापस दिलाने की एवज में स्वाभाविक ही आप उस व्यक्ति को कुछ न कुछ इनाम देने के लिए मजबूर हो जाते हैं। उस व्यक्ति को कुछ पैसे मिल जाते हैं, बंदर को बिस्किट मिल जाते हैं और आपको आपका कीमती चश्मा: सबका लाभ, सब खुश!

हालाँकि आश्रम में भी बहुत से बंदर मौजूद हैं, हमें अपने चश्मों की उतनी फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। लेकिन बगीचे की निगरानी ज़रूर करनी पड़ती है क्योंकि वे उसे अपना खेल का मैदान समझ लेते हैं और पेड़ों की डालियों पर कूदते-फांदते रहते हैं, झूलते-लटकते हैं, फूल-पत्तियों से खेल-खिलवाड़ करते हैं; कुल मिलाकर बड़ा नुक्सान पहुँचाते हैं। कई बार पेड़ों की डगालें तक टूट जाती हैं। लेकिन देखने में वे बड़े प्यारे लगते हैं-और सामान्यतया अगर आप उन्हें अकेला छोड़ दें तो कोई समस्या पेश नहीं आती और वे भी आपकी तरफ ध्यान नहीं देते।

हाल ही में जानवरों से अत्यधिक प्रेम करने वाली एक महिला मित्र आश्रम आई थी और बाहर आवारा कुत्तों को देखकर उसके मन में दया जाग उठी और उसने उनकी मदद करने की ठानी। यह उतना आसान नहीं है लेकिन अंततः उसने एक दूकान खोज ही निकाली, जहाँ कुत्तों का तैयार भोजन मिलता है। बड़े गर्व के साथ वह एक बड़े से थैले में खाना भरकर दूकान से बाहर निकली। कुत्तों का पहला झुंड देखते ही वह रुकी और थैला खोलकर थोड़े से खाने के टुकड़े उनके लिए ज़मीन पर रख दिए। उस दिन हमें पता चला कि वृंदावन के आवारा कुत्ते कुत्तों का तैयार पैकेज्ड फ़ूड पसंद नहीं करते! आखिर उसे बंदरों और सूअरों ने खाया!

मुझे एक और मेहमान की याद आ रही है जो अपने आप में एक अजूबा ही थी-वैसा व्यक्ति आज तक मुझे नहीं मिला: वह गिलहरियों से डरती थी! वास्तव में वे दुनिया के सबसे शर्मीले और डरपोक प्राणी होते हैं और बड़े प्यारे भी! वे बचा हुआ खाना, नीचे पड़े खाने के टुकड़े उठाकर ले जाते हैं। अक्सर आप उन्हें किसी सुरक्षित स्थान पर अपने सामने वाले पैरों में खाना लिए कुतरते हुए देख सकते हैं। ये महिला आश्रम में पेड़ के नीचे खाने की प्लेट लिए बैठी थी और एक चंचल सी गिलहरी खाने के टुकड़े गिरने की अपेक्षा में उसकी तरफ लपकी। महिला उसे हाथ के इशारों से हकालने लगी तो स्वाभाविक ही, डर के मारे गिलहरी उसके चारों ओर चक्कर काटने लगी। महिला ने अपने पीछे उसकी आवाज़ सुनी तो उसे लगा गिलहरी पीछे से हमला करने वाली है और वह पहले तो चीखती-चिल्लाती, वहीं कूद-फांद मचाने लगी और फिर अंदर भागी। हमारे कर्मचारियों ने आवाज़ सुनी तो भागते हुए आए कि कोई बंदर परेशान कर रहा होगा। लेकिन एक पेड़ के पीछे से ताकती, स्वाभाविक ही, बहुत घबराई सी गिलहरी को देखकर वे सब हँसे बिना न रह सके और फिर महिला सहित हम सब भी हँस-हँस कर लोट-पोट हो गए!

तो, अगर आप कोई दर्शनीय चिड़ियाघर देखने का इरादा कर रहे हैं और खुद जानवरों के साथ रहने का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करना चाहते हैं तो हमारा आश्रम आपको बढ़िया लगेगा!

कुत्ते चॉकलेट के साथ ही योनि पसंद करते हैं! 11 अगस्त 2014

जर्मनी में मेरा एक दोस्त है, जिसने मुझे एक जबरदस्त कहानी सुनाई, जिसे सुनकर मैं हँसते-हँसते लोट-पोट हो गया। सालों बीत गए, जब भी वह कहानी हम लोग आपस में और दूसरों के साथ साझा करते हैं तो हँसी रोकना असंभव होता है-कभी उस कहानी की याद आती है तो पागलों की तरह अकेले भी हँस लेते हैं। कहानी की सबसे अच्छी बात यह है कि वह पूरी तरह सत्य और यथार्थ घटना है!

उस दिन मेरे दोस्त के एक दोस्त का जन्मदिन था। वह खुद शहर में उपस्थित नहीं था लेकिन उनके साझा दोस्तों ने 'बर्थडे गर्ल' से पूछा कि उसके जन्मदिन पर क्या आयोजन किया जाए। वह किसी को घर नहीं बुलाना चाहती थी और न कहीं पार्टी में बाहर जाना चाहती थी इसलिए उसने कहा कि वह घर में रहकर एक सामान्य, सुकून से भरी शाम बिताना चाहती है। लेकिन उसके दोस्त उत्सव मनाना चाहते थे! लिहाजा उन्होंने गुप्त रूप से एक पार्टी रखी, जिससे उसे चौंकाकर खुश कर सकें। दोस्तों में से एक के पास उसके फ़्लैट की चाभी थी-योजना की सफलता के लिए यह अनुकूल ही था!

वह एक सामान्य कामकाजी दिन था और सभी दोस्त जानते थे कि वह अपने काम से कब घर लौटती है। इसलिए उसके वे आठ दोस्त-पुरुष और महिलाएँ-कुछ मिठाइयाँ आदि और पीने-पिलाने की कुछ चीज़े लेकर उसके घर में घुसकर बैठ गए। उसके छोटे से कुत्ते के लिए भी, जो लगभग हर जगह उसके साथ हुआ करता था, कुछ खाने की चीज़ें लाना वे नहीं भूले!

वह एक बेडरूम वाले फ्लैट में रहती थी, जिसमें एक बैठक और रसोईघर भी था। सभी आठ लोग छिपने की जगह ढूँढ़कर छिपकर बैठ गए और पार्टी के लिए साथ लाई खाने-पीने की चीजों को भी छिपाकर रख दिया! वे पर्दों के पीछे, आलमारी के भीतर, खाने की मेज़ के नीचे और सजावटी पेड़ों में छिपे बैठे थे। वह घर आती तो उसे उनकी उपस्थिति का आभास होना संभव नहीं था!

और यही हुआ! जब दरवाज़ा खोलने की आवाज़ आई, सब लोग बेआवाज़ और स्थिर हो गए। उस कुत्ते की हाँफने की आवाज़ को छोड़कर, सारे घर में निस्तब्धता छाई थी। कुत्ता दौड़कर आया और उसके क़दमों में लिपट गया जबकि वह अपना पर्स एक तरफ रखकर जैकेट के बटन खोल रही थी। दोस्त इस बात के इंतज़ार में थे कि वह एक जगह आकर सुकून के साथ बैठ जाए तो वे बाहर निकलें। लेकिन उसने जो किया उससे सारे दोस्त हतप्रभ रह गए: जैकेट उतारने के बाद भी वह नहीं रुकी! जैकेट के बाद उसने बेल्ट खोला और एक-एक कर उसके कपड़े फर्श पर गिरते चले गए, यहाँ तक कि उसके बदन पर एक भी कपड़ा न रहा।

जैसे बिजली का झटका लगा हो, उसके मित्र जड़ होकर यह नज़ारा देख रहे थे: वह उठी और रसोई में आकर न्यूटेला का डिब्बा उठा लाई, जिसमें यहाँ का लोकप्रिय चोकलेट का गाढ़ा मिश्रित-खाद्य (chocolate-hazelnut spread) था। आराम से सोफे पर बैठकर उसने उँगलियों से काफी सारा चोकलेट निकाला। मगर यह क्या? उसे उसने अपने मुँह में नहीं डाला बल्कि पैरों को चौड़ा करके अपनी योनि पर चुपड़ दिया! और कुत्ता, जो अब तक उसके पैरों के आसपास लगातार कुलबुला रहा था, अब अपने दोनों पैर सोफे पर रखकर योनि में लगा चोकलेट चाटने लगा!

गज़ब! अपनी छिपने की जगहों पर बर्फ की शिला बने वे दोस्त कुत्ते की ज़बान से उसे सेक्स का आनंद लेता देखकर पता नहीं क्या महसूस कर रहे होंगे! और इसकी कल्पना करना भी आसान नहीं है कि पता नहीं कब वे बिचारे अटपटे ढंग से, गिरते-पड़ते, आँख बचाते, अपने गुप्त स्थानों से बाहर निकले होंगे, पर्दों के पीछे से, टेबल के नीचे से घिसटते हुए!

हाँ, इस घटना के बाद बर्थडे गर्ल ने न सिर्फ वह फ्लैट और वह शहर छोड़ दिया बल्कि वह देश और वह महाद्वीप भी छोड़कर चली गई। मैंने सुना कि वह आस्ट्रेलिया में जाकर बस गई है-मगर मैं नहीं जानता कि वह अपने कुत्ते को साथ ले गई या नहीं! 🙂

नोट: इस पोस्ट का उद्देश्य किसी का मजाक उड़ाना नहीं केवल परिस्थितिजन्य हास्य का मजा लेना है. मैं उस प्रकार की सेक्स फैंटेसी को गलत नहीं समझता जिसमें कि किसी के ऊपर कोई अत्याचार न हो!

दो ज़ू और एक समुद्र-किनारा – जर्मनी भ्रमण की कुछ झलकियाँ – 17 जून 2013

आज फिर वह दिन आ गया है जब मुझे अपने जर्मनी प्रवास के बारे में आपको विस्तार से बताना है।

इसमें कोई शक नहीं कि इतने सारे जानवरों से रोज़-ब-रोज़ मिलना अपरा का अपनी माँ के देश में मुख्य शगल था। अपने जर्मनी प्रवास के बारे में लिखते हुए पिछले ब्लॉग में मैंने आपको बताया था कि हम सब आंद्रिया के साथ एक ज़ू देखने जाने वाले हैं। हमने ल्युनेबर्ग में भी ज़ू का भ्रमण किया था और कल म्यूनिख का ज़ू देखने भी गए। दोनों बार हमारा समय शानदार गुज़रा और अपरा तो जैसे अभिभूत ही थी!

दोनों पार्कों का निर्माण बहुत सुंदर ढंग से किया गया है। जानवरों के लिए काफी जगह है, जहां वे भाग-दौड़ और कूद-फांद कर सकते हैं और कई बार तो लगता है जैसे हम किसी छोटे-मोटे जंगल में ही घूमने आ गए हों क्योंकि पार्क के डिजाइनर ने प्राकृतिक रास्तों के दोनों ओर बहुत नैसर्गिक वातावरण निर्मित करने में बहुत मेहनत की है और बड़ी संख्या में जानवरों और पर्यटकों को लुभाने वाले तरह-तरह के पेड़ लगाए गए हैं। यह वयस्कों के लिए भी बहुत आकर्षक है। अपरा जैसे बच्चे आनंद में इधर-उधर भाग-दौड़ करते रहते हैं, कभी इस जानवर के पीछे तो कभी उस! उसके लिए अपने पसंदीदा जानवर जैसे बंदर, शेर, भालू, सूअर, हाथी, गधे और तरह-तरह के पक्षी, खरगोश आदि के अलावा कुछ दूसरे जानवर जिन्हें उसने यहाँ पहले-पहल देखा था जैसे सफ़ेद भालू, को देखना अद्भुत था। उसने बहुत मौज-मस्ती की, पूरा आनंद उठाया। वह नज़रें गड़ाकर उन्हें देखती और उनकी वास्तविक विशालता, ऊंचाई देखकर विस्मित रह जाती क्योंकि अब तक उन्हें उसने सिर्फ इंटरनेट पर ही देखा था। वह नए नए अनुभव और प्रभाव ग्रहण करती हुई हँसती, उल्लास में चीखती-चिल्लाती, खाना-पीना और सोना तक भूल गई जबकि इतनी दौड़-भाग करने के बाद वह थक जाती है और वैसे भी दोपहर में आम तौर पर वह सोती है।

मगर दोनों ही जगहों में जो चीज़ सबसे ज्यादा अच्छी लगती थीं वे थीं बकरियाँ! यह अद्भुत बात है कि इतने सारे जानवरों में यही जानवर सबसे ज्यादा आकर्षित करता था। स्वाभाविक भी था, क्योंकि हम उसे छू सकते थे, थपकियाँ दे सकते थे, उन्हें खिला सकते थे। उनके लिए अलग जगह बनाई गई थी जहां लोग उनके लिए खाने की चीज़ें खरीदकर उन्हें खिला सकें और खिलाते हुए उन्हें पुचकार सकें, थपथपा सकें। ल्युनेबर्ग में तो हमने उन्हें बहुत खिलाया-पिलाया मगर यहाँ अपरा उन सबको छूने के लिए उनके पीछे दौड़ती-भागती रही, कभी इसके पीछे तो कभी उसके। जब सभी बकरियों को वह थपथपा चुकी तो उसके मन में एक दूसरा विचार आया-वह हर एक के पास जाती और एक-एक का मुंह ताकती जिसके लिए उसे घुटनों के बल झुकना पड़ता था और ऐसा सुंदर दृश्य बनता था की देखते ही बनता था। वह उन्हें पुकारती, “ए बकरी, ए बकरी!’ बड़ा मज़ेदार था यह सब!

हम बड़े खुश हैं कि मौसम आजकल बहुत साफ है, सूरज निकला हुआ है और ठंड कम हुई है। ऐसे खुशनुमा मौसम में हम अपरा को घूमने-फिरने और नए-नए अनुभव प्राप्त करने का एक और मौका दिये बगैर नहीं रह सकते थे। तो आंद्रिया, माइकल और हम उसे लेकर बाल्टिक सागर पर एक बीच घूमने निकले। जैसे ही अपरा के पैर रेत पर पड़े, वह बहुत उत्तेजित हो उठी और बैठकर रेत से खेलने लगी। तत्काल ही वह अपने खेल में मगन हो गई और उसे हमसे कोई मतलब नहीं रहा! इतनी सी बात से बच्चे कितना खुश हो जाते हैं! फिर यशेंदु उसे पानी तक ले गया और उसे उठाकर उसके पावों को पानी में रख दिया। वह ‘छप-छप’ पैर फटकारती हुई खुशी के आवेश में चीखने-चिल्लाने लगी। बीच पर एक खास तरह का माहौल होता है जो बच्चों और युवाओं को चमत्कृत कर देता है!

आंद्रिया और माइकल के साथ हमने शानदार वक़्त गुज़ारा और फिर हम रमोना के पिता और परिवार से मिलने दक्षिणी जर्मनी में स्थित उनके शहर आ गए। यहाँ भी हमने बहुत सुखद समय बिताया और उन लोगों की तो गिनती करना ही असंभव है जिनसे हम पिछले सप्ताह मिले होंगे। ल्युनेबर्ग बीच पर रेगीना और सेलीना हमसे मिलने आईं, बहुत से मित्र खाना खाने आए और हम आंद्रिया और माइकल के माता-पिता से मिलने उनके घर गए। रमोना अपने स्कूल के मित्रों से मिलकर आई और कल हम लोग उसकी चाची और चचेरे भाई-बहनों के साथ थे। और एक कज़िन का एक नन्हा बच्चा भी था और हम सब उनके साथ ज़ू भी गए।

आप देख सकते हैं कि इन छुट्टियों में हम अपरा और उसके आसपास की दुनिया को देखते हुए आनंदमग्न और लगातार बहुत व्यस्त हैं। अब हम ट्रेन में बैठकर वीसबाडन के लिए रवाना हो चुके हैं। हमारे पास अब सिर्फ एक सप्ताह ही बचा है और उसके बाद हम वापस भारत के लिए रवाना हो जाएंगे। थॉमस और आइरिस के साथ, जो वहाँ हमसे मिलने आएंगे, एक और उल्लास और उत्तेजना से भरा सप्ताह!

जर्मनी में अपरा की फोटो यहाँ देखें

जर्मनी में अपरा का पशुओं के साथ आमोद-प्रमोद – 7 जुलाई 2013

पिछले सप्ताह हम मज़े में एर्केलेंज पहुँच गए थे जहां हम अपने पुराने मित्रों सोन्या और पीटर और उनकी बेटी कारोलीन के साथ उनके यहाँ ठहरे हैं। यहाँ हमें बहुत से जानवरों का साथ प्राप्त हुआ -और यह हमारी बेटी अपरा को, जो किसी भी ऐसी चीज़ से प्यार करने लगती है जिसके पंजे हों, फर हो या बड़े बड़े नाखून हों, बड़ा रास आता है।

कारोलीन तो इंतज़ार ही कर रही थी अपरा का और वह उसकी तुरंत दोस्त बन गई। उनके यहाँ तीन बिल्लियाँ हैं। वह हमारी बेटी को अपनी बिल्लियाँ दिखाने ले गई और फिर जब भी अपरा ज़रा सा बोर होती सोन्या या कारोलीन के साथ उनके पास चली जाती। अपरा ने पहली बार इतने पास से बिल्लियों को देखा था, जिन्हें वह हाथ में ले सकती थी, थपकियाँ देकर उनके साथ खेल सकती थी। वह उनके साथ खेलते हुए उत्तेजना में खुशी से चीखने -चिल्लाने लगती थी और उसका शोर सुनकर बिल्लियाँ भाग जातीं। उम्र में सबसे बड़ी बिल्ली अवश्य संयम से उसके पास बनी रहती और अपरा की थपकियाँ, चांटे सब कुछ सहन करती रहती। खेल-खेल में बिल्ली अपरा के हाथ में सूँघती हुई गुर्राती जिससे अपरा को बड़ा मज़ा आता और बदले में वह उसके दोनों कान पकड़कर उसके मुंह में ही गुर्राना शुरू कर देती!

मगर उनके यहाँ सिर्फ बिल्लियाँ ही नहीं थीं, और भी बहुत कुछ था! मौसम कुछ अच्छा हो गया था और हम आँगन में और आगे बगीचे में भी जा सकते थे जहां उसके साथ खेलने के लिए पत्थर के शेर, पत्थर का साही, एक पत्थर का बत्तख, पत्थर का मेंढक और पत्थर की बिल्लियाँ भी थे! वह एक के बाद दूसरे की तरफ दौड़ लगाती रहती और उन्हें खाना खिलाने की कोशिश करती, कभी घास तो कभी फूल-पत्ते तो कभी मिट्टी। यहाँ तक कि वह उनसे बातें भी करती। एक बार हमने देखा कि वह एक बिल्ली के बुत के सामने खड़ी है और दोनों हाथ छाती पर जोड़कर उससे बिल्कुल भारतीय तरीके से 'नमस्ते' कह रही है!

लेकिन इतना ही नहीं था वहाँ! सोन्या के घर के पिछवाड़े में छोटी सी खुली जगह थी जहां की घास वे लोग कटाई मशीन से काटते नहीं थे बल्कि बीच-बीच में वहाँ कुछ भेंड़े छोड़ देते थे जो उन्हें चरती रहती थीं और घास बराबर हो जाती थी! कुल सात भेड़ें थीं और अपरा उन्हें ब्रेड और गाजर खिलाकर खुशी से किलकारियाँ मारने लगती थी। वहाँ भी हमारी बातूनी बिटिया चुपचाप यह काम नहीं करती थी बल्कि जब भेंड़े 'माँह, माँह' कहतीं तो वह भी लंबा सी 'माँहहहह' की आवाज़ निकालकर उनका जवाब देती! एक दिन उसे लगा कि भेंडों को जो ब्रेड वह खिलाती है, शायद बहुत स्वादिष्ट है इसलिए उसने वही ब्रेड खुद खाना शुरू कर दिया। उसके सामने भेंड़े खड़ी हैं और ताक रही हैं कि कब अपरा उनके मुंह में ब्रेड देती है और एक के बाद ब्रेड के टुकड़े अपरा खुद अपने मुंह में डाल रही है! उसने पीछे मुड़कर देखा और अचानक बच्चों की एक भारतीय कविता की पहली पंक्ति गाना शुरू कर दिया। उसकी कविता का भेंडों पर कोई असर नहीं हुआ मगर हमारी लाड़ली खुशी से नाच उठी!

मौसम सुहावना होने से हम लोगों को एक मेले में जाने का अवसर भी मिल गया। चमत्कृत होने के लिए अपरा को वहाँ एक से एक चीज़ें उपलब्ध थीं। इतने सारे लोग, रोलर कोस्टर, बैलून्स, रुई भरकर बनाए गए सुंदर-सुंदर जानवर, लोगों के साथ आए हुए कुत्ते, और बच्चे। बच्चों के लायक एक वृत्ताकार झूले को हमने चुना और अपरा एक हाथी पर बैठी, बड़ा मज़ा आया! हमने आइसक्रीम भी लिया और ज़ेब्रा के आकार वाला बैलून भी खरीदा। हमारी बिटिया खुश हो गई और हमें भी बड़ा आनंद आया।

हाँ, एक छोटा सी दुर्घटना भी हो गई: उसका गॉगल गुम गया। उसके पास छोटा सा एक गॉगल था जिसे हम लेकर आए थे मगर कहीं भीड़ में वह खो गया। ल्युनेबर्ग आते ही सबसे पहले हमने उसके लिए गॉगल खरीदा क्योंकि हम सबको वह गॉगल पहने देखती थी और परेशान करती थी!

आन्द्रेया और माइकल हमारा इंतज़ार कर रहे थे कि हमारे साथ कुछ समय बिताएँगे। इतना शानदार मौसम था और हमारे करने के लिए इतनी सारी चीज़ें थी। हम ताज़ी सब्जियाँ खरीदने बाज़ार गए फिर स्टेडियम घूमकर आए। आइसक्रीम खाई। बत्तखों, मोरों और मुर्गियों को ब्रेड खिलाई और अभी जानवर देखने ज़ू (एनिमल पार्क) जाने वाले हैं। अगले कुछ दिनों का प्लान भी हम बना रहे हैं और जानते हैं कि जैसे ही हम घर पहुंचेंगे अपरा 'जजजजॉय', 'जजजजॉय' पुकारते हुए इधर-उधर दौड़ती-भागती रहेगी; अभी वह शांत नहीं बैठने वाली। जॉय आन्द्रेया की एक बिल्ली का नाम है जो अपरा को देखते ही उससे दूर भाग जाती है!