भरोसा करना अच्छी बात है – मगर अपने शक पर भी भरोसा करें – 16 नवंबर 2015

अक्सर मैं लोगों से कहता हूँ कि उन्हें दूसरों पर भरोसा करने की क्षमता बढ़ानी चाहिए। लोगों से मिलते समय शुरू से उनके प्रति नकारात्मक रवैया रखना ठीक नहीं। लेकिन कुछ परिस्थितियों में समुचित जाँच किए बगैर कि सामने वाला झूठा इंसान या फ्रॉड तो नहीं, भरोसा नहीं करना चाहिए। अधिकतर मामलों में ऐसी स्थिति पैसों के संबंध में पेश आती है। अगर आपके सामने ऐसी परिस्थितियाँ आती रहती हैं, जहाँ आपको सामने वाले पर शक होता है कि वह भला व्यक्ति है या चालबाज़ (फ्रॉड) तो आज का ब्लॉग पढ़ना आपके लिए उपयोगी होगा।

सर्वप्रथम, इस बात का ध्यान रखें कि सामने वाले के पहनावे, चाल-ढाल और रहन-सहन से कतई प्रभावित न हों। हो सकता है कि वह बड़ी सी कार में घूमता-फिरता हो, डिज़ाइनर कपड़े पहनता हो और नवीनतम आईफोन लेकर चलता हो-लेकिन ये बातें उसे ईमानदार या भला व्यक्ति सिद्ध नहीं करतीं! कोई व्यक्ति जितना बड़ा चालबाज़ (फ्रॉड) होगा उतना ही उसका पहनावा, एक्सेसरीज़ और रहन-सहन भड़कीला होगा। पहुँचे हुए चालबाज़, छलछद्मी और धोखेबाज़ लोग प्रभावित करने वाले हर तरह के औज़ारों से लैस होते हैं और अक्सर यह सिद्ध करने में कामयाब हो जाते हैं कि वे वास्तव में बड़े भले और सत्यनिष्ठ व्यक्ति हैं।

दूसरा बिंदु है: झूठे और बेईमान लोग लगभग हमेशा ज़्यादा बोलते हैं। और इसी एक बात से आप अक्सर समझ सकते हैं कि वे और कुछ भी हो सकते हैं मगर ईमानदार नहीं! सिर्फ उस व्यक्ति की बातें ध्यान से सुनें: अगर झूठा इंसान होगा तो वह दो मिनट पहले कही अपनी ही बात भूल चुका होगा। बस वह लगातार बात करता रहेगा और अपनी ही पिछली बात का खंडन करती हुई बात कहेगा-ज़ाहिर है, बार-बार आपसे कोई न कोई झूठी बात कह रहा होगा। आदतन झूठ बोलने वालों को इस बात का एहसास ही नहीं होता कि अभी-अभी वे क्या कह चुके हैं क्योंकि वे इतना अधिक झूठ बोलते हैं कि वे अपने सारे झूठे वचनों को याद ही नहीं रख सकते। इसलिए अगर आप कुछ देर शान्त बैठे रहें तो उसी वक़्त आपको पता चल जाएगा कि वह झूठ बोल रहा है।

अंत में, इन बातों का यह अर्थ नहीं है कि आप जिस मामले में चर्चा कर रहे हैं, अनिवार्य रूप से उस मामले में भी वह चालबाज़ी कर रहा हो। लेकिन अब हम उस बिंदु पर बात करते हैं, जहाँ मामला पैसे से संबंधित होता है: उस व्यक्ति पर कतई भरोसा न करें, जो कहे- 'तुम मुझ पर भरोसा कर सकते हो, मुझे पैसे दे दो'। उसके बाद अगर आप साफ़ शब्दों में यह कह दें कि आप उसे नहीं जानते और इसलिए उस पर भरोसा नहीं कर सकते तो जवाब में वह कह सकता है, 'अगर आप मुझ पर भरोसा नहीं कर सकते तो हम साथ में काम नहीं कर सकते!' बस, इसी बिंदु पर वह धोखेबाज़ रफूचक्कर हो जाएगा।

इससे हमें यह शिक्षा मिलती है: कभी-कभी शक सही निकलते हैं। अगर आपके मन में किसी व्यक्ति के प्रति किसी प्रकार का शकोशुबहा है तो उसे व्यक्त करने में कतई संकोच न करें! अगर वह गंभीर है, ईमानदार है तो हर तरह के प्रयास करके अपनी नेकनीयती सिद्ध करेगा और अंततः आपका विश्वास हासिल कर लेगा। सिर्फ चालबाज़ और मक्कार ही भाग जाएँगे!

भविष्य की योजनाओं को लेकर मैं परेशान क्यों नहीं होता: मुझे भरोसा है, मगर ईश्वर पर नहीं – 14 जून 2015

मेरे जीवन में बातचीत के सर्वश्रेष्ठ साथी मेरी पत्नी और दोनों भाई हैं। इन तीन लोगों के साथ मैं दुनिया भर के हर विषय पर चर्चा करता हूँ, चाहे व्यक्तिगत बातें हों, चाहे सामाजिक या व्यावसायिक। हाल ही में जब मैं अपनी पत्नी के साथ बात कर रहा था तो हमने दोनों के बारे में और भविष्य की अपनी योजनाओं और निर्णयों पर अपने रवैयों के बारे में बात की- और मैंने उसे बताया कि क्यों मैं भविष्य को लेकर न तो उद्विग्न होता हूँ, न परेशान होता हूँ, न चिंता करता हूँ।

अधिकांश निर्णय हम लोग आपस में चर्चा करके लेते हैं, साथ मिलकर प्लान करते हैं और नए, रोमांचक उपक्रम शुरू करते हैं- व्यापार और व्यक्तिगत जीवन संबंधी, दोनों! इन सबके बीच रमोना मुझसे कभी-कभी पूछती है, 'तुम्हें डर नहीं लगता कि यह काम सुचारू रूप से हो भी पाएगा या नहीं?' या कहती है कि वह हमारे द्वारा शुरू की गई किसी ख़ास परियोजना के नतीजों को लेकर कुछ परेशान है। सचाई यह है कि मैं बिल्कुल परेशान नहीं होता। मैं उस पर एकाग्र हो जाऊँगा, अपना पूरा ध्यान उसी काम पर केन्द्रित कर दूंगा लेकिन मुझे किसी तरह की कोई घबराहट या चिंता या परेशानी नहीं घेरती!

ऐसा क्यों होता है? हमने आज इसी विषय पर बात की।

मैंने कहा, "मुझे विश्वास होता है कि इस बारे में सब ठीक होगा।" और रमोना ने पूछा, "लेकिन तुम किस पर विश्वास करते हो?" निश्चित ही किसी दैवी शक्ति पर नहीं! मैं ईश्वर पर विश्वास नहीं रखता इसलिए मुझे सब कुछ उस पर छोड़ देने की इच्छा नहीं होती- मुझे लगता है कि लोग सिर्फ मानसिक रूप से आश्वस्त होने के लिए या मानसिक शक्ति प्राप्त करने के लिए ऐसा करते हैं, क्योंकि ऐसा कोई सर्वशक्तिमान मौजूद नहीं है जो "सब कुछ ठीक" कर दे। इसी तरह, मेरा इस पर भी विश्वास नहीं है कि ईश्वर जैसी कोई आसमानी ताकत है, जो हर चीज़ को सुचारू रूप से चलाती है या चला सकती है।

क्या मैं खुद पर भरोसा करता हूँ? बिल्कुल। जी हाँ, क्योंकि मैं जानता हूँ कि मैं क्या कर रहा हूँ। जब मैं कोई निर्णय लेता हूँ तो मैं कोशिश करता हूँ कि उसके सभी महत्वपूर्ण पहलुओं पर अच्छी तरह विचार कर लूँ और किसी खास परिस्थिति में अपनी सहज प्रवृति या सहज बुद्धि पर भरोसा करूँ। लेकिन मैं जानता हूँ कि मैं सब कुछ नहीं जानता। उन क्षेत्रों में, जिनके बारे में मुझे अधिक जानकारी नहीं है, मैं किसी जानकार या विशेषज्ञ की सलाह ले सकता हूँ! मैं जीवन भर सीखता रहूँगा और ज़्यादा से ज़्यादा ज्ञान हासिल करना कितना अच्छा है!

सामान्यतया मैं हर बात के प्रति सकारात्मक रवैया रखता हूँ, चीजों को देखने का मेरा नज़रिया सकारात्मक होता है और मैं हमेशा आशा से भरा रहता हूँ कि भविष्य में अच्छी बातें ही होंगी। उन बातों को लेकर व्यर्थ परेशान रहने की मेरी आदत नहीं है, जिन्हें मैं बदल नहीं सकता या जिन पर मेरा कोई ज़ोर नहीं है। कोई भी काम मैं पूरी शक्ति लगाकर करूँगा और जो बातें मेरे हाथ में नहीं हैं, उन पर गहरी नज़र भी रखूँगा लेकिन उन्हें लेकर व्यर्थ परेशान नहीं होऊँगा!

अंत में, यह प्रश्न हमेशा बना रहता है कि ज़्यादा से ज़्यादा बुरा क्या हो सकता है। कामों और उनके नतीजों पर यथार्थवादी रवैया रखें तो पता चलेगा कि ज़्यादातर नतीजे उतने बुरे नहीं होते, जितना आप उनके बारे में सोच-सोचकर डरे हुए होते हैं। आप मर नहीं जाएँगे। और अगर मरना सबसे बुरी बात है, जो आपके साथ हो सकती है-तो क्या? उस पर तो आपका कोई बस ही नहीं है!

और बाकी सब तो ऐसी बातें हैं, जो हो भी जाएँ तो उनसे हम निपट सकते हैं। तब तक मैं और हम किसी भी काम को हर संभव अच्छे से अच्छा करने की कोशिश करते हैं। डर और चिंताएँ तो काम में व्यवधान ही उपस्थित करते हैं!

जब मैं अपनी भावनाओं की कदर नहीं करता तो अपनी ऊर्जा गँवा रहा होता हूँ – 7 जून 2015

काफी समय पहले से मेरा एक सिद्धान्त रहा है, जिसे मैं बार-बार आजमा भी चुका हूँ और वह हर बार सही भी प्रमाणित हुआ है: दूसरे लोगों के बारे में अपनी भावनाओं पर विश्वास कीजिए। अगर आप महसूस करते हैं कि आप दोनों के बीच पट नहीं पाएगी-किसी भी संबंध में यह लागू होता है-तो संबंध तोड़ दीजिए। अगर आप इंतज़ार करते हैं, कोशिश करते रहते हैं कि किसी तरह निभ जाए तो आप सिर्फ अपना समय और अपनी ऊर्जा नष्ट कर रहे होते हैं और आपको अंततः उसे समाप्त करना ही पड़ता है!

मेरे कहने का अर्थ क्या है, बताता हूँ। अपने जीवन में मैं कई बार ऐसे लोगों से मिला हूँ, जिनके साथ कुछ ही समय बाद मैंने महसूस किया कि हमारी पटरी आपस में नहीं बैठ पा रही है। उनकी बातों से, उनके कामों से, उनके चेहरे के हाव-भाव से या महज उनके व्यक्तित्व से प्रस्फुटित होती ऊर्जा से इस तरह की भावना या एहसास आपको होने लगता है। इन बातों का कुछ ऐसा असर आप पर पड़ता है कि आपको एहसास हो जाता है कि आप इस व्यक्ति के मित्र नहीं बन सकेंगे।

कभी-कभी यह भावना इतनी तीव्र होती है कि कि आप सतर्क रहते हैं कि उनसे किसी तरह का वाद-विवाद न हो। आपकी राय उनसे बहुत अलग होती हैं।

लेकिन इतनी सी बात पर उनसे विचारों का आदान-प्रदान समाप्त करने का आपको कोई कारण नज़र नहीं आता और वास्तव में आप उनके मित्र बने रहना चाहते हैं, उनके साथ सामान्य मधुर संबंध बनाए रखना चाहते हैं, उनके साथ समय गुज़ारना चाहते हैं। इस प्रकार उनके साथ आप किसी न किसी तरह निभाना चाहते हैं। आप उनकी उन टिप्पणियों को नज़रअंदाज़ करते हैं, जिन पर सामान्य रूप से आपको एतराज़ होता।

लेकिन कुछ समय पश्चात्-और यह समय कुछ हफ़्तों से लेकर महीनों का हो सकता है-आप ऐसे बिंदु तक पहुँच जाते हैं, जिसके आगे आप उस संबंध को निभा नहीं सकते। एक ऐसा बिंदु, जिसके बाद, अगर आप अपने प्रति सच्चे, ईमानदार बने रहना चाहते हैं, अपनी अस्मिता बनाए रखना चाहते हैं तो उनके साथ दूरी बनाना लाज़िमी हो जाता है।

इसी बिन्दु पर आकर संबंधों में दरार पड़ जाती है और फिर वे टूट जाते हैं। और उसके बाद आप बहुत हल्का, बहुत अच्छा महसूस करते हैं। बहुत दिनों तक आपने उस संबंध को बनाए रखा लेकिन उसके लिए आपको बहुत प्रयास करना पड़ा, बहुत सारी ऊर्जा और समय खर्च करना पड़ा! आखिर जब वह समाप्त हो गया, जब आपको अंतिम रूप से पता चल गया कि यह संबंध इसी तरह आगे नहीं चल पाएगा तो आप बहुत मुक्त महसूस करने लगे। मुक्त इसलिए कि आगे अब यह प्रयास आपको नहीं करना पड़ेगा!

हो सकता है कि आपको इस बात का अफसोस हो कि क्यों इस संबंध को बनाए रखने के लिए आपने इतने लम्बे समय तक इतना गम्भीर प्रयास किया। परेशान न हों-जो कुछ हुआ, अच्छा हुआ! आप सामने वाले को ठीक तरह से जानना चाहते थे और अब आप पूरी तरह आश्वस्त हैं कि आप दोनों एक-दूसरे के अनुरूप नहीं थे। अगली बार आप अपनी भावनाओं को कुछ जल्दी सुन पाएँगे और तदनुसार त्वरित कार्यवाही करेंगे!

खुद अपने आप पर भरोसा करें: आप परिवर्तन ला सकते हैं और उनसे लाभ भी उठा सकते हैं – 25 मार्च 2015

कल मैंने बताया था कि अगर आप प्रसन्न रहना चाहते हैं तो आपको परिवर्तनों को स्वीकार करते हुए जो भी नई परिस्थितियाँ निर्मित हों, उनके अनुसार ही चलना होगा। स्वाभाविक ही कल की चर्चा उन बाहरी परिवर्तनों के बारे में थी, जिनके प्रति आपको लचीला रवैया अपनाना होगा। आज मैं एक और प्रकार के परिवर्तन के बारे में लिखना चाहता हूँ: वह, जिसका कारण आप स्वयं होते हैं; वह, जो आपके भीतर से आता है!

यह और बात है कि आपको बाहर से आने वाले परिवर्तनों के प्रति लचीला रवैया अपनाना चाहिए। इसमें बड़ी सक्रियता की ज़रूरत होती है लेकिन मुझे गलत मत समझिए, एक और परिस्थिति होती है जो इससे भी ज़्यादा कठिन लगती है: अपने भीतर हो रहे परिवर्तनों को स्वीकार करना और अपनी तरफ से ऐसे कदम उठाना, जो आपके जीवन में इन परिवर्तनों को क्रियान्वित कर सकें। आपके भावनात्मक और मानसिक परिवर्तनों को अमली जामा पहना सके। उन रास्तों पर चलने की हिम्मत पैदा कर सके, जिन पर दूसरे नहीं चलते। उन जगहों की यात्रा करने की इच्छा पैदा कर सके, जहाँ जाने के बारे में आपके आसपास के लोग सोच भी नहीं सकते और आपने भी तब तक नहीं सोचा था।

आप ऐसा क्यों नहीं करते? आप डरते हैं। किस बात से डरते हैं? इस बात से कि उस रास्ते को छोड़कर, जिस पर इतने सारे लोग चल रहे हैं, कहीं आप गलत काम तो नहीं कर रहे हैं? आपको शक है, आपमें विश्वास की कमी है।

जी हाँ, इसीलिए मेरा मानना है कि भारत में लोग आसानी के साथ परिवर्तनों को स्वीकार कर पाते हैं और ज़्यादा लचीले हैं: वे विश्वास करते हैं।

औसत पश्चिमी समाज यह सिखाने पर कोई ज़ोर नहीं देता कि विश्वास कैसे किया जाए! वह आपको दूसरी बहुत सी बातें सिखाता है लेकिन उसका सबसे मुख्य फोकस होता है, सुरक्षा। हर समय आपको मालूम होना चाहिए कि आप कहाँ जा रहे हैं, बाकायदा कोई योजना बनाकर ही कहीं निकालना चाहिए और एक बॅकअप प्लान भी होना चाहिए। और सबसे बड़ी बात, कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहिए।

जीवन एक सुनिश्चित कार्यक्रम की तरह है और स्पष्ट दिशा-निर्देशों (नियमों) द्वारा तय कर दिया गया है कि कौन सा कदम पहले और कौन सा बाद में रखा जाना है। यह स्पष्ट है कि इन पूर्वनिर्धारित राहों पर चलना सुरक्षित होता है। आपको इन नियमों पर विश्वास करना सिखाया जाता है और आगाह किया जाता है कि आपका एक भी कदम दाएँ या बाएँ न बहके। वास्तव में आपको भय होता है कि अगर आप नाक की सीध में नहीं चलेंगे तो यह सारा कार्यक्रम टूटकर बिखर जाएगा! थोड़ा सा भी पैर इधर-उधर हुआ नहीं कि आप बेचैन हो जाते हैं कि कहीं डूब न जाएँ, कि बियाबान में कहीं खो न जाएँ। नए रास्ते पर ज़रा सा चलते ही आपको थकान महसूस होती है, आपमें उत्साह नहीं रह जाता और आप तनावग्रस्त हो जाते हैं, चिंतित रहने लगते हैं!

मेरी बात मानें, आप कहीं नहीं गिरने वाले। मेरा विश्वास करें, यह विश्व टूटकर बिखरने वाला नहीं है कि उसका मलबा आपके आसपास बिखरा पड़ा हो और न ही आप दुनिया को तोड़ने वाले हैं। मेरी बात मानें, आपको कुछ नहीं होने वाला है। मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि आपके अलग राह पर चल देने से इस दुनिया का कुछ भी नहीं बिगड़ने वाला। न तो आप दुनिया को कोई नुकसान पहुँचा सकते हैं और न ही आपके किसी काम से आसमान टूटकर गिरने वाला है।

आपको विश्वास करना सीखना पड़ेगा: मुझ पर नहीं बल्कि अपने आप पर। अपने निर्णयों पर पूरा विश्वास कीजिए, अपने जीवन पर भरोसा कीजिए! तभी आप सुखी और प्रसन्न रह सकेंगे!

विश्वास और प्रेम की अनुभूति – 15 फरवरी 2015

जिसे आप जीवन में सबसे अधिक प्यार करते हैं, उसके साथ साझेदारी और सहजीवन के विषय में आपके सामने मैं अपने कुछ विचार रखना चाहता हूँ।

शाम को भोजन पश्चात अपने मेहमानों के साथ कुछ समय गुजारने के बाद हम अक्सर अपने पिताजी के कमरे में उनके साथ भी कुछ समय गुज़ारते हैं। अपरा के सोने के थोड़े समय पहले का यह वक़्त होता है-या यह कहना ठीक होगा कि जब वह उनींदी होने लगती है। हम खेलते हैं, बातें करते हैं और उनके बिस्तर पर बैठे हुए कुछ समय हम सब एक साथ गुज़ारते हैं। कल जब हम साथ बैठे हुए थे, मैंने अपना सिर रमोना के कंधों पर रख दिया और वह भी मेरी तरफ थोड़ा सा खिसक आई और इस तरह मैं अधलेटा सा उसकी बाहों में पड़ा हुआ था। उस समय मुझे जो एहसास हुआ, वही इन विचारों का उद्गम है।

स्वाभाविक ही मुझे एहसास हुआ कि मुझसे प्रेम किया जा रहा है लेकिन बारीकी से देखा जाए तो उसमें एक सूक्ष्म भेद था। प्रेम के साथ मुझे दुलार का, संरक्षण पाने का एहसास भी हुआ था। यह मज़ाक लग सकता है क्योंकि ऐसी कोई बात नहीं है कि मुझे सुरक्षा देने की रमोना को आवश्यकता पड़े या जो इसे मर्दाना गुण नहीं मानते, उनसे मैं कहना चाहता हूँ कि मैं खुद अपनी सुरक्षा करने में पूरी तरह सक्षम हूँ। 🙂 लेकिन वह एहसास मौजूद था और वह एहसास बड़ा ही सुंदर था: विश्वास और प्रेम का एहसास।

लेकिन साथ ही मुझे लगा यह कितना सुंदर है कि मैंने भी उसे अपनी बाहों में भर लिया! ऐसे किसी व्यक्ति को पाने का एहसास, जिसकी आप कदर करते हैं, जिसका आप भरण-पोषण कर सकते हैं- हालांकि स्त्रीवादियों से मैं कहना चाहता हूँ कि मेरी पत्नी इतनी सक्षम है कि वह स्वयं अपना भरण-पोषण कर सकती है! 🙂 यह एहसास भी बड़ा सुंदर है और हालांकि स्वाभाविक ही मैं अपरा के साथ इसे अधिक शिद्दत के साथ महसूस करता हूँ क्योंकि वह बच्ची है और मुझ पर और उसके आसपास के दूसरे वयस्कों पर बहुत हद तक निर्भर है, रमोना के मामले में यह स्वाभाविक ही अलग एहसास है। मुझे गर्व होता है कि इस महिला ने एक व्यक्ति के रूप में मुझे चुना है, जिसकी बाहों में वह सिमटना चाहती है और जब मर्ज़ी या आवश्यकता हो, उसके कंधों पर सिर टिकाना चाहती है।

मैं जानता हूँ कि यह एक प्रकार का आदिम एहसास है, कि इस एहसास के साथ स्वभावगत मूल प्रवृत्तियाँ जुड़ी हुई हैं, जो हमारे दिलों, हमारे शरीरों और मस्तिष्क के ज़रिये अपने आपको व्यक्त करती हैं। लेकिन मुझे लगता है कि यह उन्हें कम महत्वपूर्ण नहीं बनाता। उन्हें महसूस करना मेरे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है और हर बार जब भी मैं उन्हें पूरे होशोहवास के साथ अनुभव करता हूँ, मुझे बड़ा अच्छा लगता है और मैं उन्हें सँजोकर रखना चाहता हूँ।

कल मुझे इस अनुभूति से बहुत आश्चर्य हुआ कि हमने इन दोनों भावनाओं को महसूस किया। आदिम सहज-वृत्तियों के बारे में बात करते हुए आप सोचते हैं कि प्रतिपालक या संरक्षक के रूप में पुरुष हमेशा गर्व महसूस करता है, जब कि स्त्रियाँ हमेशा किसी की सुरक्षा में रहना और अपने बारे में चिंता किया जाना पसंद करती हैं। लेकिन मैं जानता हूँ कि पुरुष और महिलाओं, दोनों में, दोनों बातें मौजूद होती हैं और हमें दोनों बातों का एक साथ एहसास करते हुए जीना पड़ता है!

मैंने पत्नी से बात की और पाया कि उसने भी इन दोनों भावनाओं को महसूस किया था। मुझे लगता है कि यह संज्ञान आजकल के सम्बन्धों में ही परिलक्षित हो सकता है, आधुनिक दुनिया में, क्योंकि आज के जमाने में ही एक पुरुष के लिए यह स्वीकार करना संभव है कि वह भी संरक्षण चाहता है और स्त्री के लिए यह स्वीकार करना कि वह भी अपने प्रियकरों का भरण-पोषण करने में अपनी भूमिका का निर्वाह करना चाहती है।

हमें दोनों पक्षों को स्वीकार करना होगा-और मुझे आशा है कि तब आप उन दोनों का लुत्फ उठा पाएँगे!

क्या किया जाए जब आप शादीशुदा हों और अपने जीवन साथी को धोखा देने का विचार कर रहे हों? 13 अक्टूबर 2014

एक महिला ने एक बहुत निजी और व्यक्तिगत प्रश्न पर चर्चा हेतु मुझसे संपर्क किया: वह विवाहित थी और उसके अनुसार अपने विवाह से खुश भी थी। फिर भी, जब वह कुछ दिन पहले एक पुरुष से मिली और उसे कुछ बेहतर तरीके से जाना तो उस पर इतना मोहित हो गई कि उसने अपने पति के साथ धोखा तक करने का मन बना लिया। तब तक उसने धोखा किया नहीं था मगर मुझसे पूछ रही थी कि इस मामले में क्या करे। आज के ब्लॉग में मैं इस परिस्थिति पर चर्चा करना चाहूँगा।

पहली बात तो यह कि मैं किसी भी स्थिति में धोखा देने के खिलाफ हूँ। यह कभी मत कीजिए। जब आपको इस बात का एहसास हो गया है तो अब खुद को काबू में रखिए और यह कदम किसी भी हालत में मत उठाइए क्योंकि न सिर्फ वह आपके साथी को चोट पहुँचाएगा बल्कि आपके संबंधों पर भी कुठाराघात करेगा और साथ ही आपकी विश्वसनीयता भी हमेशा हमेशा के लिए खतरे में पड़ जाएगी!

इसके अलावा, मैंने बहुत से लोगों को कहते सुना है कि 'मैं अपने साथी से प्रेम करता हूँ' और 'हमारे संबंध अच्छे हैं, हमारे बीच कोई समस्या नहीं है' लेकिन अगले ही वाक्य में वे कहते हैं कि वे अपने साथी के साथ धोखा करते रहे हैं या यह कि वे दूसरों के प्रति आकर्षण महसूस करते हैं और यहाँ तक कि यह भी कि वे किसी दूसरे पुरुष या महिला से प्रेम करते हैं। इसके जो स्पष्टीकरण वे देते हैं वे कुछ इस प्रकार होते हैं: 'प्रेम रहस्यमय तरीके से काम करता है' और 'प्रेम कब और कैसे हो जाता है कहा नहीं जा सकता, क्यों हो जाता है, समझना मुश्किल है; बस, वह हो जाता है!' आदि। इनमें से किसी भी स्पष्टीकरण से मैं सहमत नहीं हूँ।

मैं इस बात पर कतई विश्वास नहीं करता कि अपने साथी के साथ, आपके एकमात्र आत्मीय जीवन-साथी, आपकी पत्नी या पति के साथ आपके प्रेमपूर्ण, सौहार्दपूर्ण और सुखद सम्बन्ध हैं- और उसके पश्चात आप किसी दूसरे व्यक्ति के प्रति वैसा ही आकर्षण महसूस करते हैं, उस सीमा तक भी कि आप उसके साथ यौन सम्बन्ध भी स्थापित कर सकते हैं! जी नहीं, मैं जानता हूँ कि मामला कुछ दूसरा होता है: आपके संबंधों में या आपके विवाह में कुछ कमी रह गई है, वह अपूर्ण है! कोई ऐसी चीज़ है, जिसकी आप कमी महसूस करते हैं और उसे बाहर तलाश करने की कोशिश करते हैं!

इन अनचाही भावनाओं से निपटने की दिशा में पहला कदम यह होगा कि एक तथ्य के रूप में उसे स्वीकार करें: आपके और आपके साथी के बीच कोई न कोई समस्या है। आपको उस कारण की तह तक जाना होगा, जिसके चलते आपके मन में वे विचार और भावनाएँ पैदा हुईं।

इसकी दो संभावनाएँ हो सकती हैं: या तो अभी-अभी कोई बात हुई है या फिर समस्या आपके संबंधों की शुरुआत से ही मौजूद थी।

हो सकता है कि आपके साथी का व्यवहार पिछले कुछ माह में बदला हो और आप उस व्यक्ति को मिस कर रहे हों, जिसके साथ आपने विवाह किया है या जिसके साथ आप रहते हैं। या फिर आपमें कोई परिवर्तन हुआ हो या आपके बीच कोई ऐसी बात हुई हो, जिसने आपको या अपने साथी के बारे में आपके नज़रिए को बदल दिया हो। कोई ऐसी नई ज़रुरत अवश्य पेश हुई है, जो अब पूरी नहीं हो पा रही है।

या फिर/और यह अधिक जटिल कारण है- आपका साथी तो हमेशा से ऐसा ही रहा हो और उसके कुछ रवैयों और आदतों को आपने कभी स्वीकार ही न किया हो। आपके दिलोदिमाग में शुरू से यह संदेह रहा हो, यह विचार कि आप अपने प्रेम की शक्ति से उसे बदल देंगे और यह सोचकर आधे मन से आप इस सम्बन्ध को जारी रखे हुए हों।

आपके मन में पैदा हो रहीं इन भावनाओं के पैदा होने का कारण एक बार पता चल जाने के बाद आपके लिए यह जानना ज़रूरी है कि उनका कोई इलाज संभव है या नहीं। यदि आप समझते हैं कि इलाज संभव है तो अपने साथी के साथ उस विषय पर खुलकर बात कीजिए। सारी बातों को विस्तार के साथ सामने रखिए, बताइए कि इस समस्या के चलते आप कैसा महसूस कर रहे हैं, यह भी कि उसके कारण आप किसी और के प्रति आकर्षण का अनुभव करने लगे हैं। धमकियाँ मत दीजिए या सामने वाले पर किसी प्रकार का दबाव मत डालिए- सिर्फ शान्ति के साथ अपनी बात रखिए!

लेकिन अगर आपको लगता है कि समस्या का कोई इलाज नहीं है और आप उसमें सुधार के लिए कई असफल प्रयास कर चुके हैं तो आसान रास्ता जानकर धोखा भर मत देते रहिए। जी नहीं! कुछ भी हो, हर हाल में नतीजों की परवाह किए बगैर बात कीजिए। अपने सम्बन्ध को तिलांजलि दे दीजिए और नया सम्बन्ध शुरू करने से पहले पिछले सम्बन्ध से आज़ाद और पाक-साफ़ हो लीजिए!

आपके लिए जो भी रास्ता उचित हो, मेरी नज़र में खुद को और दूसरों को धोखा देना उचित नहीं है और यह आपको किसी भी परिस्थिति में नहीं करना चाहिए। मुझे आशा है कि आप इस समस्या का समाधान कर लेंगे और अपने वास्तविक प्रेम-सम्बन्ध को प्राप्त करने में अवश्य सफल होंगे!

परस्पर विश्वास की कमी जीवन को मुश्किल बना देती है – 5 जून 2014

कल मैंने बताया था कि आजकल परिवारों को किस तरह बहुत कम पारिवारिक जीवन प्राप्त हो पाता है और इसलिए वे एक-दूसरे के जीवनों में भी कम से कमतर शामिल हो पाते हैं। इसका परिणाम एक और समस्या के रूप में सामने आता है, जिसके बारे में आज मैं चर्चा करने जा रहा हूँ: परिवार के सदस्यों के बीच विश्वास कम नहीं बल्कि लगभग पूरी तरह समाप्त हो चुका है!

यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि विश्वास पैदा करने के लिए एक-दूसरे को जानना ज़रूरी है। एक-दूसरे को जानने के लिए एक-दूसरे के साथ रहना, एक-दूसरे के साथ समय व्यतीत करना ज़रूरी है। दूसरे के साथ जितना ज़्यादा समय आप गुज़ारेंगे उतना ही बेहतर तरीके से आप उसे जान पाएँगे और उतना ही अधिक आप उस पर विश्वास भी कर सकेंगे। लेकिन आजकल लोग अपने परिवार के सदस्यों के साथ समय नहीं बिताते। उन्हें जानने-समझने का उनके पास वक़्त ही नहीं होता। इसका नतीजा यह होता है कि उनके बीच आपसी विश्वास, जिसकी बात मैं कर रहा हूँ, विकसित नहीं हो पाता!

यह स्थिति वाकई बड़ी दुखद है क्योंकि इस दुनिया में पहले ही ऐसी हालत है कि किसी पर विश्वास करना बड़ा मुश्किल होता जा रहा है! आपके परिवार के सदस्य ही सबसे भरोसेमंद हो सकते हैं, जिन पर विश्वास करना सबसे आसान हो सकता है। लेकिन भारत में, और उससे ज़्यादा पश्चिम में, लोगों ने आजकल वास्तव में एक परिवार की तरह रहना ही छोड़ दिया है। कारण कुछ भी हो, अब लोग आपस में एक-दूसरे के करीब नहीं हैं। वर्तमान में दुनिया भर में पाई जाने वाली बहुत सी मनोवैज्ञानिक समस्याओं का कारण भी, मेरे विचार से, यही है।

जब आप किसी पर विश्वास करते हैं तो आप सुकून के साथ रह सकते हैं। वह आपको दैनिक जीवन में शांति प्रदान करता है और मुश्किल परिस्थितियों में आपको मानसिक सहारा भी देता है। भले ही आर्थिक स्थिति इतनी बुरी न हो कि भाई से पैसे मांगने की ज़रुरत पड़े, फिर भी आपको पता होता है कि वह आपके पीछे खड़ा है और ज़रुरत होगी तो उससे उधार लिया जा सकता है। आपको पता होता है कि अपने पुरुष-मित्र के साथ बिगाड़ होने पर अपना साझा फ़्लैट छोड़कर आप कुछ दिनों के लिए अपने माता-पिता के पास जाकर रह सकती हैं। आप जानती हैं कि आप, मौका पड़ने पर, अपनी बहन के पास उसकी व्यावसायिक सलाह लेने जा सकती हैं, जो वकील, डॉक्टर, खाना बनाने वाली या माँ, कुछ भी हो सकती है। लेकिन आप नहीं जा सकतीं- क्योंकि दोनों के बीच परस्पर विश्वास नहीं है!

विषय के विस्तार में न जाकर मैं विश्वास में कमी से उद्भूत एक नतीजे की तरफ इंगित करना चाहता हूँ: बैंक इसके चलते अतिरिक्त लाभ कमा लेते हैं! पहले की तरह एक-दूसरे से पैसा उधार लेने में आजकल सहोदर भी हिचकिचाने लगे हैं, चाहे दो-चार सौ की बात ही क्यों न हो। उसकी जगह वे बैंक से ओवरड्राफ्ट लेना और उस पर अनाप-शनाप ब्याज देना ज़्यादा पसंद करते हैं। लोग अपने ही अभिभावकों का मकान खरीदने के लिए बैंक से क़र्ज़ लेते हैं- यह नहीं कि हर माह किश्तों में चुका दें, जैसा कि अब उन्हें बैंक में करना ही पड़ेगा। जो इससे पैसा कमाता है वह कोई और नहीं, बैंक होता है। परस्पर विश्वास की कमी का नतीजा है, बैंक का लाभ!

हमारे समाज में यह समस्या गहराई तक जड़ जमाए बैठी है। यह इतनी गहरी है कि ज़्यादातर लोग इसके नतीजों को वास्तविक समस्या मानने के लिए ही तैयार नहीं होंगे। वे समझते हैं कि जो स्थिति पैदा हुई है वह क्यों पैदा हुई है। क्योंकि वे खुद भी विश्वास नहीं करते।

मैं जानता हूँ कि वे नहीं कर सकते लेकिन अगर कर पाते हैं तो यह बहुत अच्छी बात होगी। मैं समझ रहा हूँ कि क्यों यह संभव नहीं है मगर काश, ऐसा संभव हो पाता!

वह व्यक्ति, जिसके सामने आप कल्पनाओं की सभी सीमाओं तक नग्न हो सकते हैं! 3 दिसंबर 2013

आज मैं उस एक व्यक्ति के साथ संबंध की खूबसूरती के विषय में लिखना चाहता हूँ, जो आपके दिल के सबसे करीब है या आपके दिल की गहराइयों में समाया हुआ है-वह आपका जीवन साथी हो सकता है, पति या पत्नी हो सकता है, प्रेमी या गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रेंड हो सकता है। सिर्फ यही संबंध है, जिसमें आप दूसरे के सामने पूरी तरह से नंगे हो सकते हैं। कम से कम मुझे ऐसे किसी दूसरे संबंध के विषय में जानकारी नहीं है।

स्वाभाविक ही मैं शारीरिक नग्नता के विषय में बात नहीं कर रहा हूँ। निश्चित ही, मुझे लगता है कि एक दूसरे के सामने आप दोनों नंगे हो सकते हैं लेकिन कुछ दूसरे लोग भी होते हैं, जिनके सामने भी ऐसा करने में आपको कोई दिक्कत नहीं होगी। दरअसल मैं आपके दिल की गहराइयों में स्थित विचारों और भावनाओं के विषय में बात कर रहा हूँ, जिन्हें आप अपने अभिभावकों, भाई-बहनों और अच्छे से अच्छे मित्रों के सामने भी कहने में झिझकेंगे। लेकिन इस दूसरे के सामने आप अपने आपको बिलकुल बेसहारा छोड़ देंगे।

जी हाँ, मेरे खयाल से, जिसके साथ आप इस प्रेम-बंधन में बंधे हुए हैं, उसे अपनी आत्मा की हर सूक्ष्म से सूक्ष्म बात भी ज़ाहिर कर सकते हैं, आप वास्तव में क्या हैं, यह पूरी सत्यता और ईमानदारी के साथ बता सकते हैं। ऐसा करने के लिए आपको अपने अहं को समाप्त करना होगा। एक बार नहीं, बार बार। आपका कोई हिस्सा इस व्यक्ति की नज़र से ओझल नहीं रह सकता। अहं को चोट पहुँचने के डर से आप उससे कुछ भी छिपाकर नहीं सकते और ऐसा करने की आपको आवश्यकता भी महसूस नहीं होगी क्योंकि वह दूसरा आपको पूरी तरह जानता है, आपकी शक्ति और कमजोरी और आपके अहं को भी! तो, जब आप उसे (उस अहं को) भी छोड़ देते हैं, आपका अहं तहस-नहस हो चुका होता है तो फिर आप एक नन्हें शिशु की तरह उस दूसरे के हाथों में खेल रहे होते हैं, नंगे, सुकुमार मगर पूरी तरह सुरक्षित। आप अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व के साथ उसके हाथों में सुरक्षा का अनुभव करते हैं।

यह दुनिया का सबसे बेहतरीन अनुभव है!

आप जानते हैं कि आप कोई मूर्खतापूर्ण बात भी कह देंगे तो भी आपका प्रेम बना रहेगा।

आप जानते हैं कि आप कोई ऐसी बात, जिसे किसी और के साथ साझा करने में आपको शर्मिंदगी हो सकती है, उसके साथ साझा करेंगे तो भी प्रेम बना रहेगा।

आप जानते हैं कि आप अपने मन के कोने में छिपे गुस्से का इजहार करेंगे तो वह दूसरा उसे स्वीकार कर लेगा, सहन करेगा और उसके बावजूद आपके साथ प्रेम करता रहेगा।

आप जानते हैं कि आप अपने भय उसके सामने जाहिर करेंगे और वह दूसरा आपको गले लगा लेगा, आपको सुरक्षा प्रदान करेगा और आपके भयंकर से भयंकर डर में भी आपको अपनी बाहों में पनाह देगा।

आप जानते हैं कि आप अपनी गलतियाँ, जिन पर आपको पछतावा है, उसके सामने रखेंगे और वह सिर्फ आपकी बात सुनेगा, समझेगा और आपकी गलतियों और पछतावों का बोझ उठाने में आपकी सहायता करेगा।

आप जानते हैं कि प्रेम हमेशा बना रहेगा, चाहे कुछ भी हो जाए।

सम्पूर्ण विश्वास बहुत खतरनाक होता है, सिर्फ दिखावा कीजिए कि आप ईश्वर पर भरोसा करते हैं 4 जुलाई 2013

कल जो दर्दनाक कहानी मैंने आपको बताई थी उस पर मीडिया और इंटरनेट की सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर काफी चर्चा हो रही है। बहुत से लोग यह कहकर कि वह व्यक्ति और वह परिवार अनपढ़ और मूर्ख था, सीधे-सीधे सारे मामले पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहे थे। एक व्यक्ति ने कहा कि, ‘बहुत ज़्यादा अंधविश्वासी होना ठीक नहीं है’ और कुछ धार्मिक लोगों ने कहा कि उसे ईश्वर की परीक्षा नहीं लेनी चाहिए थी। मैं इन बातों का और इससे संबन्धित कुछ दूसरी बातों का जवाब देना चाहता हूँ और, आप विश्वास करें या न करें, मैं उस व्यक्ति के इस आत्मघाती कदम के पीछे मौजूद कुछ स्वाभाविक तर्क प्रस्तुत करना चाहता हूँ।

मैं, एक नास्तिक और अधर्मी, एक ऐसे व्यक्ति के समर्थन में क्यों सामने आना चाहता हूँ, जिसने ईश्वर के दर्शन की लालसा में अपनी और अपने परिवारवालों की हत्या कर दी हो? क्योंकि मुझे लगता है कि ईश्वर के अवतरित होने और उन्हें बचा लेने के विश्वास के बारे में धर्म ने उसे धोखा दिया है! उसकी यह मंशा कतई नहीं थी कि वह मर जाए या अपने परिवार की जान ले ले; वह तो पूरे विश्वास के साथ समझ रहा था कि उन्हें कुछ नहीं होगा, ईश्वर उन्हें बचा लेंगे।

जिन्होंने यह कहा कि वह व्यक्ति मूर्ख था, शायद यह नहीं जानते कि वह व्यक्ति अनपढ़ बिल्कुल नहीं था। वह एक स्वतंत्र (freelance) फोटोग्राफर था, अपने बच्चों को पढ़ने के लिए स्कूल भेजने वाला समझदार व्यक्ति था। कम से कम इतना तो था ही कि वह कोई ग्रामीण अनपढ़ नहीं था जिसे आप कुछ भी कह दें और वह मान ले। नहीं, वह मूर्ख और अपढ़ नहीं था। आप उसे अंधविश्वासी कह सकते हैं, मगर बहुत से पढे-लिखे लोग अपने आपको धार्मिक और ईश्वर पर भरोसा करने वाला कहते हैं और अंधविश्वासी भी होते हैं, क्योंकि वे धर्मग्रंथों में वर्णित कथाओं पर विश्वास करते हैं।

और जब कोई कहे कि ‘ज़्यादा अंधविश्वासी होना ठीक नहीं है’ तो इस बात पर तो हंसी आए बगैर नहीं रहती, क्योंकि इसका तात्पर्य यह होता है कि थोड़ा-बहुत अंधविश्वासी होना ठीक है! आप इस व्यक्ति को ‘ज़्यादा अंधविश्वासी’ कहेंगे क्योंकि उसने जहर मिला हुआ प्रसाद अपने परिवार को खिला दिया था और विश्वास किया था कि ईश्वर उन्हें मरने नहीं देंगे। मगर सच्चाई यह है कि ईश्वर का प्रसाद ‘पवित्र’ होता है और उसे खाने से कुछ अच्छा हो सकता है, इतना समझना आपके विचार में उचित है! लेकिन क्या यह भी अंधविश्वास नहीं है? आप भी, जब भी मंदिर जाते हैं तो प्रसाद लेना नहीं भूलते कि उससे आपका कुछ भला हो सकता है-उसने यह सोचा कि प्रसाद जहरीला होने के बावजूद प्रसाद है और उसे ग्रहण करने से उसका भला ही होगा। क्या दोनों बातों में कोई अंतर है?

अंधविश्वास के मूल में धर्म और उसकी कथाएँ हैं जिन्हें आप इस प्रकरण में साफ-साफ देख सकते हैं। धर्मग्रंथ यह कहते हैं कि उनमें लिखी कोई बात मिथ्या नहीं है और यह व्यक्ति दरअसल बहुत ज़्यादा धार्मिक था और धर्मग्रंथों में कही गई बातों पर अक्षरशः विश्वास करता था! ईश्वर पर और उसकी शक्ति पर उसका अटूट विश्वास था; इतना अधिक कि वह समझता था कि विषाक्त प्रसाद ग्रहण करने के बाद भी ईश्वर उसे बचा सकेंगे। यहाँ तक कि दूसरों के सामने अपने विश्वास को प्रमाणित करने के लिए वह सारी घटना की वीडियो शूटिंग भी कर रहा था। उसने वह सभी ग्रंथ पढ़ रखे थे जिनमें बताया गया था कैसे अपने भक्तों को ईश्वर बचा लेते हैं और वह उनके पदचिन्हों पर चल रहा था। आखिर उसकी हत्या किसने की? अंधविश्वास ने या सिर्फ अटूट श्रद्धा ने?

तो क्या आप सभी धार्मिक लोगों को उसे सच्चा आस्तिक मानकर, उसका सम्मान नहीं करना चाहिए? एक ऐसा व्यक्ति, जिसका विश्वास इतना गहरा था कि उसने जहर तक खा लिया? आप तो डर जाते, क्योंकि आपका ईश्वर पर पर्याप्त विश्वास नहीं है, इतना भरोसा नहीं है कि वह आपको जहर खाने के बाद भी बचा लेगा! जैसा इस व्यक्ति ने किया, अगर आप वैसा नहीं कर सकते तो यही कहा जा सकता है कि दरअसल आपमें ईश्वर और धर्मग्रंथों के प्रति सम्पूर्ण विश्वास और सम्मान है ही नहीं!

हम इस सच्ची कहानी से क्या सीख ले सकते हैं? शायद यह कि ईश्वर पर पूरी तरह विश्वास करना ठीक नहीं है क्योंकि अगर आप ऐसा करते हैं तो आप सोचते रह जाएंगे कि वह आकर आपको बचा लेगा और इधर आपकी जान चली जाएगी। हाँ, ईश्वर को आप मूर्ख बना सकते हैं, उसे धोखा दे सकते हैं, यह कहकर कि मैं तुम पर पूरा विश्वास करता हूँ, जबकि आप खुद जानते हैं कि आप उस पर उतना विश्वास नहीं करते!

अगर धर्म को मानने का आपका यही तरीका है तो फिर मेरे लिए यह आश्चर्य का विषय है कि आप अपने आप से और अपने ईश्वर से कितना झूठ बोलते हैं! अगर आप यही करना चाहते हैं तो कीजिए, लेकिन मुझे लगता है कि यह बेईमानी के अलावा कुछ नहीं है। अगर आप अपने आपको धर्म-परायण कहते हैं तो आपको उस पर और धर्मग्रंथों में लिखी सभी बातों पर 100% विश्वास करना चाहिए, जैसा कि इस व्यक्ति ने किया।

मैं कहता हूँ कि ऐसे धर्मग्रंथों को नष्ट कर दिया जाना चाहिए, विस्मृत कर दिया जाना चाहिए। ये धर्मग्रंथ ऐसे-ऐसे अंधविश्वास फैलाते हैं जिनके कारण परिवार उजड़ जाते हैं और जो लोगों की मौत का कारण बनते हैं। और जब मैं ऐसा कहूँ तो आपको मेरा विरोध भी नहीं करना चाहिए, बल्कि आगे इनकी पुनरावृत्ति न हो, इसके प्रयास में हाथ बटाना चाहिए, जिससे समाज को इनके दुष्प्रभावों से मुक्त किया जा सके!

आप ईश्वर और धर्मग्रंथों पर किस हद तक विश्वास कर सकते हैं, इसका एक उदाहरण – 3 जुलाई 2013

कुछ दिन पहले मैंने धार्मिक अंधविश्वास के चलते होने वाले भयंकरतम परिणाम के बारे में एक खबर पढ़ी: एक परिवार के पाँच सदस्यों की मृत्यु के बारे में। अगर उनकी मृत्यु इतनी दुखद नहीं होती तो उन्हें मूर्खतापूर्ण कहा जा सकता था। लेकिन मैं पूरी गंभीरता के साथ कह सकता हूँ कि ये लोग धर्म द्वारा कत्ल किए गए हैं। इसके अलावा धर्म के कारण ही उस परिवार के तीन और लोग मरणासन्न पड़े हुए हैं।

राजस्थान का एक धार्मिक व्यक्ति, कंचन सिंह राजपूत, ईश्वर के प्रेम में बहुत आगे बढ़ गया। वह ईश्वर को देखना और उसका अनुभव करना चाहता था और उसे विश्वास था कि वह जहर भी खा ले तो ईश्वर उसे बचा लेगा। उसका यहाँ तक विचार था कि जहर खाने पर ईश्वर उसके पास आने पर मजबूर हो जाएगा और उसने अपनी माँ, भाई और पत्नी तक को इस बात पर विश्वास करने पर राज़ी कर लिया। और इस तरह वे चारों और उसके और उसके भाई के चार बच्चे उस घरेलू समारोह में शरीक हुए। समारोह के पश्चात उन सबने प्रसाद खाया। इस प्रसाद में ही घर के मुखिया ने जहर मिलाकर रखा था।

यह व्यक्ति खुद कैमेरामैन था और प्रसाद खाने तक के उत्सव-समारोह की और बाद में अपनी और परिवार के सभी सदस्यों की मृत्यु की भी वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहा था। वे सभी, कुछ देर बाद बेहोश हो गए और उनमें से पाँच तो मृत्यु को प्राप्त हुए। उस व्यक्ति की भतीजी को सबेरे होश आया तो उसने इमरजेंसी कॉल करके डॉक्टरों आदि को बुलाया। उसे और परिवार के दो और सदस्यों को नाज़ुक हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया।

दुर्भाग्यवश मैं यह पता नहीं कर पाया कि आखिर वे तीनों बच पाए या नहीं। जब मैंने इस छोटे से समाचार को फेसबुक पर पोस्ट किया था, मेरे विदेशी मित्र भौंचक्के रह गए थे: कोई भी जहर क्यों खाएगा? कोई यह कैसे समझ सकता है कि जहर खाने से आप ईश्वर को देख सकते हैं? क्या यह किसी मतिभ्रम के चलते होता है? नहीं, तो फिर क्या कारण है? और फिर जहर खाना ही है तो खुद खा लो, पूरे परिवार को क्यों खिलाते हो?

इस व्यक्ति के इस जघन्य कर्म का कारण धर्म और धर्म के परिणामस्वरूप मन में बैठे अंधविश्वास में निहित है। हिन्दू धर्मग्रंथों में शिव के विषपान और उस पर विष का कोई असर न होने का ज़िक्र आता है। इसके अलावा कई कथाएँ हैं जिनमें लोगों को, उनकी पवित्रता और उनकी ईशभक्ति के कारण किसी न किसी भगवान द्वारा मृत्यु के मुख से छुड़ा लिया गया।

इसलिए इस समाचार को पढ़कर मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। गाहे बगाहे ऐसी घटनाएँ भारत में, जहां धार्मिक विश्वास और अंधविश्वास की जड़ें बहुत गहरी हैं, होती ही रहती हैं। यहाँ लोगों का धर्मग्रन्थों में और ईश्वर में अगाध विश्वास है। उन्हें भरोसा होता है कि जब वे संकट में होंगे तब शिव आएंगे और उन्हें बचा लेंगे, जैसा कि धर्मग्रंथों में उन्हें बहुत से लोगों की सहायता करते हुए दर्शाया गया है।

उनका ईश्वर पर अटूट विश्वास होता है और धर्म उन्हें यही सिखाता है: अगर आपका ईश्वर पर अटूट, पागलपन की हद तक भरोसा है तो वह आपकी रक्षा करता है। अगर आप चाहें तो इसे इस बात का प्रमाण भी मान सकते हैं कि ईश्वर का कोई अस्तित्व ही नहीं है। धार्मिक लोग तर्क करेंगे कि उन अभागों का ईश्वर पर पर्याप्त अटूट भरोसा नहीं था अन्यथा शिव, कृपा करके, उन्हें बचा लेते। उन्होंने इतना भरोसा किया था कि ईश्वर से मिलने की आशा में अपनी और अपने परिवार की जान तक दांव पर लगा ली थी। इससे ज़्यादा आखिर कितना विश्वास कोई कर सकता है? कहीं ऐसा तो नहीं कि उन्हें सारे घटनाक्रम की वीडियो फिल्म नहीं बनानी चाहिए थी क्योंकि ईश्वर नहीं चाहता कि उसकी कोई फिल्म बने?

मैं तो सिर्फ एक सच्चाई जानता हूँ: धर्म ने उस परिवार की जान ली थी। यह बहुत दर्दनाक है और मेरे लिए तो यह एक और इशारा या प्रमाण है कि लोगों को कम से कम धार्मिक और अंधविश्वासी होना चाहिए!