हमारे स्कूल में गुरुओं की लोकप्रिय जादुई हाथ की सफाई का नरेंद्र नायक के प्रदर्शन द्वारा पर्दाफाश – 13 अगस्त 2015

आज हमने अपने स्कूल में एक कार्यक्रम आयोजित किया। हालांकि वह तुलनात्मक रूप से कम समय में अचानक तय कर लिया गया था, उससे हमें बड़ी प्रत्याशाएँ थीं। नरेंद्र नायक, जो शायद भारत के सबसे जाने-माने तर्कवादी हैं, हमारे यहाँ आए और बच्चों के सामने अपनी प्रस्तुति दी!

सन 2009 में, जब हम न्यूयॉर्क में थे, अचानक एक दिन हमें नेट पर उनका एक शुरुआती वीडियो देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वीडियो में वे अपने विद्यार्थियों के साथ मिलकर झूठे गुरुओं द्वारा दिखाए जाने वाले करतब करके दिखा रहे थे और उनका भांडा फोड़ रहे थे कि कैसे वे तथाकथित चमत्कार गुरुओं की दैवी शक्तियों के कारण नहीं होते बल्कि वे महज जादू के खेल हैं। मैंने उनसे संपर्क किया और पिछले कुछ सालों से हम दोनों एक-दूसरे के कामों पर नज़र रखते आ रहे थे। कुछ हफ्ते पहले संपन्न नास्तिकों की मीटिंग के पश्चात हम पुनः उनके संपर्क में आए। उनका दिल्ली आने का कार्यक्रम था और उन्होंने हमारे स्कूल आने का प्रस्ताव रखा। मुझे लगा, यहाँ उनका स्वागत करना हमारे लिए बड़ी ख़ुशी की बात होगी!

तो, इस तरह वे आज सबेरे हमारे स्कूल के बच्चों के सामने लगातार तीन घंटे खड़े होकर विस्तार से बताते रहे कि क्यों उन्हें किसी बात पर विश्वास करने से पहले कई बार सोचना चाहिए, कोई बात समझ नहीं आ रही हो तो प्रश्न पूछना चाहिए और क्यों किसी सामान्य मनुष्य की कथित दैवी शक्ति पर विश्वास करके उसकी पूजा नहीं करनी चाहिए, न ही उसके चरणों में लोटना चाहिए क्योंकि ऐसी दैवी शक्तियों का कोई अस्तित्व नहीं है और सारे मनुष्य बराबर और एक जैसे हैं।

उन्हें बच्चों के साथ देखना अद्भुत अनुभव था! बच्चे देखकर अचंभित रह गए जब नरेंद्र नायक ने एक मृत जादूगर और तथाकथित गुरु, सत्य सांई बाबा की तरह दिखावटी सोने का हार निकालकर सबके सामने रख दिया। सबके मुँह आश्चर्य से खुले के खुले रह गए जब पानी से भरे दिए को एक बच्चे ने जलाकर दिखाया। दर्शकों के रोंगटे खड़े हो गए जब उन्होंने एक नुकीले त्रिशूल को अपनी जीभ से पीछे धकेला। उनके प्रदर्शनों के वीडियो देखकर वे रोमांच से भर उठे जब नंगे हाथों से एक व्यक्ति पर शल्यक्रिया करने वाला वीडियो उन्होंने दिखाया और तब भी जब खौलते तेल में नंगे हाथ डालकर वे पूड़ियाँ तल रहे थे!

कई बच्चों को और कुछ शिक्षिकाओं को भी उन्होंने सामने बुलाया और वे भी इस प्रदर्शन का हिस्सा बने: उन्होंने बीच से कटी एक रस्सी पकड़ी और उसे इस तरह जोड़कर दिखा दिया जैसे वह कटी हुई न रही हो। उन्होंने ताश के पत्तों में से एक पत्ता चुना, जिसे नरेंद्र भाई ने सही-सही बता दिया, जैसे वे मस्तिष्क में चल रही बातों को पढ़ना जानते हों। बच्चों की बाँह पर उन्होंने जलती हुई सलाई रख दी और उनकी जीभ पर जलता हुआ कपूर रख दिया और उन्हें कुछ नहीं हुआ!

कहने की आवश्यकता नहीं कि सभी ने इस प्रदर्शन का आनंद लिया। लेकिन वह महज जादू का खेल नहीं था! हर हाथ की सफाई के बाद नरेंद्र नायक हमारे बच्चों को बताते थे कि यह कोई चमत्कार नहीं है, बताते थे कि यह कैसे होता है। इससे बहुतेरे ‘दैवी चमत्कार’ अचानक सामान्य हाथ की सफाई बनकर रह गए, जिन्हें तेज़ गति, सही सामग्रियों के चुनाव या भौतिकी के मूल सिद्धांतों के सहारे प्रदर्शित किया गया!

इस प्रदर्शन को देखकर हमारे बच्चों को न सिर्फ इन हाथ की सफाईयों से चमत्कृत होने का मौका मिला बल्कि वे यह सोचने के लिए मजबूर भी हुए कि धार्मिकों द्वारा बताई जाने वाली बहुत सी चमत्कारपूर्ण बातें क्या वास्तव में सच हैं। इससे उन्हें सच और झूठ का फर्क करने का तर्कपूर्ण रास्ता भी समझ में आया।

मेरा विश्वास है कि यह बच्चों को अपने दिमाग से सोचने की शिक्षा देने का हमारा एक और तरीका है, इस प्रदर्शन के बाद इस दिशा में हम एक कदम अवश्य आगे बढ़े हैं। कि वे आँख मूँद कर किसी पर न तो विश्वास करें और न ही उसका अनुसरण करें। कि उन्हें प्रश्न पूछने से नहीं झिझकना चाहिए और संतोषजनक उत्तर मिलने तक पूछते रहना चाहिए।

नरेंद्र नायक के प्रदर्शन के चित्र यहाँ देखें।

माफ कीजिए, मैं नास्तिक गुरु नहीं हो सकता – 6 अगस्त 2015

आप पहले ही पढ़ चुके हैं कि नास्तिकों के लिए कोई संगठन स्थापित करने की मेरी कतई कोई इच्छा नहीं है और न ही कोई इरादा है। कल मैंने बताया कि उसके एक धर्म में तब्दील हो जाने का बहुत बड़ा खतरा है और यह भी कि नास्तिकता को परिभाषित करने के परंपरावादी तरीके से हमें दूर रहना चाहिए। आज मैं आपको इसका एक और कारण बताता हूँ: ऐसे किसी संगठन के लिए आवश्यक ढाँचा मुझे नापसंद है!

आप जानते ही हैं कि आश्रम में इतने सारे नास्तिकों से मिलकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई थी और मैंने उनके सान्निध्य का बहुत आनंद उठाया। भविष्य में भी मैं नास्तिकों को अपने आश्रम में आमंत्रित करना चाहूँगा, जिससे वे एक-दूसरे के साथ मिल-बैठकर चर्चा कर सकें, नज़दीक आ सकें और ऐसी सभाओं के लिए कोई नियत स्थान भी उपलब्ध हो सके। चाहे ऑनलाइन हो चाहे रूबरू, मुझे उनके साथ बातचीत करना पसंद है, उन्हें अपने विचार बताना, उनके विचारों से अवगत होना और अपनी ओर से उनकी समस्याओं के हल की दिशा में हरसंभव मदद करना! लेकिन यह सब करने के लिए मैं कोई संगठन खड़ा करना नहीं चाहता!

बहुत से लोगों ने इसके लिए मुझसे व्यक्तिगत रूप से निवेदन किया है और इसलिए, मुझे लगता है, विशेष रूप से उन लोगों को मुझे कोई न कोई उत्तर देना चाहिए: आप एक ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जिसमें आप अपनी नास्तिकता को फिट कर सकें। लेकिन नास्तिकता का तकाज़ा है कि वह मौजूदा व्यवस्था के विरुद्ध हो!

बहुत से लोगों के लिए नास्तिक होने का कारण यह होता है कि वे पुरोहितों को धर्म द्वारा प्रदत्त अनुक्रमणीय आधिपत्य को पसंद नहीं करते! मैं ऐसे किसी संगठन का मुखिया होना पसंद नहीं करूँगा क्योंकि युवावस्था में और वयस्कता की शुरुआत से ही मैं लगभग ऐसे ही पद का, धार्मिक और आध्यात्मिक गुरु के पद का, अनुभव प्राप्त कर चुका हूँ! मैं लोगों को उपदेश दिया करता था कि उन्हें क्या करना चाहिए, कैसे जीवन बिताना चाहिए। मैं उसे पीछे छोड़ चुका हूँ- दूसरे कारणों के अलावा इसलिए भी कि मैं सबके समान होना चाहता था! सामने वाले के साथ मैं सामान्य बातचीत कर सकूँ, यह चाहता था, न कि यह कि बातचीत के दौरान वह मेरे पैर पकड़ ले!

तो, अगर अब मैं कोई संगठन शुरू करता हूँ तो मैं उसका मुखिया होऊँगा। कुछ दूसरे निर्देशक भी होंगे। उसकी व्यवस्था देखने वाले लोग होंगे, जो एक सीढ़ी नीचे होंगे- संगठन में दूसरे नंबर पर। और इसी तरह चलता रहेगा, जिसके चलते होगा यह कि कुछ ऊपर होंगे और कुछ निचली पायदानों पर! मैं मानता हूँ कि हम सब मनुष्य हैं और हम सबको एक-दूसरे के बराबर होना चाहिए। व्यापारिक कंपनियों में यह ढाँचा आवश्यक है, जिससे व्यापार सुचारु रूप से चलाया जा सके लेकिन नास्तिक मित्रों के बीच ऐसी गैर बराबरी देखना मैं पसंद नहीं करूँगा! क्योंकि यही बात दुनिया भर के धर्मों में अत्यंत घृणित रूप से मौजूद है!

क्या करे, किधर जाएँ, कौन सा रास्ता चुनें, यह बताने के लिए आपको किसी और की ज़रूरत क्यों पड़नी चाहिए? आप ऐसे किसी व्यक्ति या समूह की खोज में क्यों लगे हुए हैं? अगर आप खुद पर और अपने अनुभवों पर भरोसा करते हैं तो आप स्वयं ज़्यादा बेहतर तरीके से इस संदेश का प्रसार कर सकते हैं! बिना किसी संगठन के नास्तिकता के बारे में आप लोगों को क्यों नहीं बता सकते?

मैं यह नहीं चाहता। मेरे खयाल से, अगर हमने यह किया तो हम भी किसी संगठित धर्म से और उसके अनुयायियों से बेहतर नहीं होंगे।

तो, जब मैं कहता हूँ कि मैं कभी भी ऐसा कोई संगठन नहीं बनाऊँगा तो मुझ पर विश्वास कीजिए। मज़ाक में भी जब कोई व्यक्ति मुझे 'नास्तिक गुरु' कहता है तो मुझे हँसी आती है लेकिन मैं ऐसा कुछ नहीं होना चाहता!

मैं नास्तिकों का कोई संगठन या धर्म क्यों नहीं बनाउंगा! 5 अगस्त 2015

मैंने आपको हमारे आश्रम में हुए नास्तिक सम्मेलन के बारे में बताया था और अपने ब्लॉग में नास्तिकता के विषय में अपने विचार भी रखे थे। उस सम्मेलन में और उसके बाद सोशल मीडिया में भी, मुझसे कई बार पूछा गया कि क्या मैं नास्तिकों का कोई संगठन बनाने जा रहा हूँ। इस दौरान हुए अनुभवों ने मेरे ऐसा कुछ न करने के पूर्व-निर्णय को सही साबित किया है!

मेरा मानना है कि ऐसा करने पर एक न एक दिन उस संगठन का अपने आप में एक धर्म बन जाने का खतरा होगा! आप सभी को पता है कि धर्म के बारे में मैं क्या सोचता हूँ– और मैं ऐसा कभी भी नहीं चाहूँगा! लोग कहते हैं कि वह धर्म नहीं बनेगा क्योंकि मैं ईश्वर को नहीं मानता! लेकिन यदि आप बौद्ध धर्म के आरंभ पर नज़र दौड़ाएँ तो पाएँगे कि वहाँ भी बिलकुल ऐसा ही हुआ था! बुद्ध कहते थे, आप स्वयं अपना प्रकाश बनिए और आज बौद्ध धर्म पाँचवा वैश्विक धर्म है!

ईश्वर पर आस्था सभी धर्मों का आधार नहीं है। ऐसे बहुत से लोग, संप्रदाय और धर्म हैं, जिनके पास ईश्वर की कोई धारणा नहीं है। लेकिन वे भी बहुत सी मूर्खताओं पर विश्वास करते हैं! मेरे लिए, नास्तिकता केवल ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास न करना ही नहीं है। मैं हर तरह के अंधविश्वासों को नकारता हूँ और उसके साथ पुनर्जन्म, स्वर्ग-नर्क, पाप-पुण्य और वैसी ही बहुत सी दूसरी मिथ्या अवधारणाओं और विचारों को भी!

कुछ लोगों ने मुझसे कहा कि हिंदुओं के सबसे प्राचीन धर्मग्रंथों में, अर्थात वेदों में, पहले से कुछ ऋचाएँ मौजूद हैं, जो कम से कम अज्ञेयवादी नज़र आती हैं अर्थात उनमें ईश्वर के अस्तित्व पर संदेह व्यक्त किया गया है। विशेष रूप से ऋग्वेद बताते हैं कि हम नहीं जानते कि सृष्टि की रचना किसने की। मैंने जवाब दिया कि हो सकता है कि आप नहीं जानते लेकिन फिर भी इससे लगता है जैसे 'कोई न कोई' है, जिसने इस संसार की रचना की है। ठीक? दूसरे धर्मग्रंथों का हवाला देते हुए भी कुछ लोग कहते हैं कि ईश्वर रहित संसार की अवधारणा बहुत समय पहले से ही मौजूद रही है।

मुझे समझ में नहीं आता कि हमें इन उदाहरणों की ज़रूरत क्यों है! जिन लोगों ने इन धर्मग्रंथों की रचना की थी, कितने भी समय पहले की हो, वे भी हमारे जैसे इंसान ही थे। उनके मन में कुछ विचार आए और उन्होंने उन्हें लिखकर रख लिया। अगर आप उनके लिखे शब्दों को ध्यान से पढ़ें, उनका अध्ययन करें, उनसे कुछ सिद्ध करना चाहें या उनसे कोई रहस्य खोज निकालना चाहें तो आप उसी रास्ते पर होंगे, जिन पर चलकर सभी धर्म आज इस हालत में पहुँचे हैं। आप इन धर्मग्रंथों को एक सहारे की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं, उससे मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहते हैं कि किस पर भरोसा किया जाए।

मेरी नज़र में नास्तिकता यह कभी नहीं हो सकती। शून्य से लोगों के विचारों का नेतृत्व करने का काम इसका नहीं है और इसका कारण सिर्फ एक है: यह एक प्रतिक्रिया स्वरुप रखा गया कदम है! यह रास्ता आपने अपने पहले कदम के साथ नहीं चुना है बल्कि यह रास्ता आपने तब चुना, जब आपने धर्म के रास्ते को निरस्त किया! यह रास्ता ईश्वर के भ्रमजाल के विरुद्ध है, धार्मिक व्यवस्था के विरुद्ध एक बागी विचार। आप धर्म पर, अन्धविश्वास पर और ईश्वर की मिथकीय छवि पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं। अगर आस्तिकता न होती तो नास्तिकता की भी ज़रूरत नहीं होती। धर्म की अनुपस्थिति में या बिना ईश्वर की कल्पना से अवगत हुए विकसित हो रहा बच्चा नास्तिक भी नहीं होगा। वह महज सहज स्वाभाविक होगा।

नास्तिकता एक प्रतिक्रिया है। और इसलिए मुझे पढ़ने वाले सभी नास्तिकों से मैं कहना चाहता हूँ कि कृपया किसी नास्तिक धर्म की स्थापना के इरादे से किसी धर्मग्रंथ की खोज करने की कोशिश न करें। नास्तिकता किसी रूढ़ि का अनुसरण नहीं करती, वह पूर्णतः व्यक्तिगत विचार है। अपने स्वयं के अनुभवों के बारे में बात करें, अपने विचार, अपनी भावनाएँ व्यक्त करें। आज के बारे में बात करें, अतीत की किसी पुस्तक के बारे में नहीं! यह आपके बारे में है!

कोई भी संगठन इन भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को, उनकी अलग-अलग भावनाओं को, अलग-अलग शख़्सियतों को एक सूत्र में नहीं बांध सकता और न ही उन सबके लिए एक निश्चित नियमावली या ढाँचा तैयार कर सकता है। ऐसा करने पर लोगों को एक बार फिर किसी के आदेशों का अनुपालन करना होगा और वे अपना व्यक्तित्व खो देंगे। यही धर्म का काम है। इसलिए, नहीं! मैं किसी नास्तिक धर्म की स्थापना करने नहीं जा रहा हूँ!

नास्तिकता का प्रसार करके क्या हम दुनिया को बेहतर जगह बना सकते हैं? 4 अगस्त 2015

कल मैंने बताया था कि नास्तिकता और आस्था का प्रश्न भारत में क्यों पश्चिम के मुकाबले अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। इसलिए कि यहाँ लोग ईश्वर और धर्म की परवाह ज़्यादा करते हैं! मैंने ज़िक्र किया था कि मेरे मुताबिक़, जब अधिक से अधिक लोग धर्म का त्याग कर देंगे और नास्तिक बन जाएँगे तब यह संसार अधिक बेहतर जगह हो जाएगी। आज मैं इस कथन की कुछ विस्तार से व्याख्या करते हुए स्पष्ट करना चाहता हूँ कि क्यों ईश्वर पर आपकी आस्था या अविश्वास से कोई फर्क नहीं पड़ता!

मैं इस बात को एक बार और स्पष्ट करना चाहता हूँ: वास्तव में मैं इस बात की ज़्यादा परवाह नहीं करता कि आप ईश्वर पर आस्था रखते हैं या नहीं। दोनों ही स्थितियों में मैं आपका दोस्त बन सकता हूँ-और दोनों ही स्थितियों में मैं आपका मित्र नहीं भी हो सकता। अगर बीस, सौ या एक हज़ार लोग कह दें कि वे ईश्वर पर आस्था नहीं रखते तो यह तथ्य भी इस संसार को बेहतर स्थान नहीं बना सकता। वास्तव में आस्था के खिलाफ मैं नहीं हूँ बल्कि लोगों की आस्था का लाभ उठाकर उनका शोषण करने, उनके साथ धोखेबाज़ी करने, उनके मस्तिष्क को बरगलाने की घिनौनी हरकतों के खिलाफ हूँ!

इसलिए मैं अपने विचारों और शब्दों को सिर्फ हिन्दू धर्म या भारत के संदर्भ में सीमाबद्ध नहीं करता! मुझे लगता है कि वे दूसरे धर्मों और आस्थाओं के लिए भी उतने ही प्रासंगिक हैं क्योंकि आस्था का सवाल आने पर लोगों का शोषण और भी कई तरीकों से किया जा रहा है! मैं यहाँ रहस्यवादी रीति-रिवाजों और ‘आध्यात्मिकता’ को भी साफ तौर पर इसमें शामिल करना चाहता हूँ!

ये सब एक ही हैं: कुछ लोगों का समूह एक किताब लिखता है और वह धर्मग्रंथ बन जाता है और फिर दूसरों के लिए उसका अनुसरण करना आवश्यक बना दिया जाता है। किसी धर्म का मुखिया कोई किताब छपवाता है और फिर दूसरों को उन नियमों में बंधकर रहना लाज़िमी है। ऐसे गुरु, जो अपने अनुयायियों को बताते हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं। संप्रदायों के नेता, जो अपने भक्तों को भेड़ों की तरह हाँकते हैं। अतीन्द्रियदर्शी, जो यह देखने का दावा करते हैं कि भविष्य में क्या होने वाला है। अलौकिक ज्ञान का दावा करने वाले छद्म मनोविज्ञानी, जो उनका अनुसरण करने वालों को बताते हैं कि उनके मृत पूर्वज उनसे किन कार्यों की अपेक्षा कर रहे हैं।

जब मैं कहता हूँ कि मैं नास्तिक हूँ तो मैं इस संसार का निर्देशन करने वाले किसी "ब्रह्माण्ड" या किसी काल्पनिक आसमानी शक्ति पर भी विश्वास नहीं करता। संभव है, दूसरे लोग कुछ दूसरा सोचते हों। सिर्फ इस तथ्य से कि एक व्यक्ति ईश्वर या ऐसी ही किसी सत्ता पर विश्वास नहीं करता, दुनिया बेहतर नहीं हो जाने वाली है।

लेकिन, जब मैं कहता हूँ कि मैं अपनी मर्ज़ी से चलूँगा, जो काम मुझे अच्छा लगता है और जिससे दूसरों का भला होता है, वही करूँगा; दूसरों को नुकसान पहुँचाने वाले, दुःख देने वाले काम नहीं करूँगा, उन्हें धोखा नहीं दूँगा, उनके साथ छल नहीं करूँगा- और कोई दूसरा भी मेरे पास आकर यही कहता है कि वह भी इसी नतीजे पर पहुँचा है- तब, मुझे लगता है कि दुनिया वाकई बेहतर जगह हो जाएगी!

लेकिन, क्योंकि धर्म में और आध्यात्मिकता में भी इतना अधिक छल-कपट है, ऐसा होने की अधिक संभावना तभी है जब कि आप धर्म और ईश्वर का त्याग कर देंगे । और मैं अपने इस विचार को अधिक से अधिक लोगों को बताता हूँ, और उसके बारे में लिखता रहता हूँ तो इसलिए कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग इस नतीजे पर पहुँचें और आगे किसी के झाँसे में न आएँ, दूसरों को अपना शोषण करने की इजाज़त न दें!

लोगों के जीवन पर धर्म और ईश्वर का प्रभाव – भारत और पश्चिमी देशों के बीच तुलना – 3 अगस्त 2015

पिछले सप्ताह मैं नास्तिकता के विषय पर काफी विस्तार से लिखता रहा हूँ और निश्चित ही अभी भी इस विषय पर मेरे मन में अनेकानेक विचार, अवधारणाएँ और कल्पनाएँ हैं, जिन्हें मैं आपके साथ साझा करना चाहता हूँ। लेकिन इस समय मुझे अपने पश्चिमी पाठकों का भी विचार करना चाहिए। मैं जानता हूँ कि वहाँ बहुत से लोगों के लिए इस बात का वास्तव में कोई महत्व नहीं है कि ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं। और दरअसल यही बात मैं अपने भारतीय मित्रों के साथ साझा करना चाहता हूँ और यह करते हुए पश्चिमी मित्रों को भी सहज ही यह पता चल जाएगा कि क्यों भारत में यह विषय इतना विस्फोटक है!

वास्तव में इसका संबंध संस्कृतियों के बीच मौजूद अंतर से है: पश्चिम में मेरे बहुत से मित्र हैं, जिनके बारे में ठीक तरह से मैं भी नहीं जानता कि वे ईश्वर पर आस्था रखते हैं या नहीं। भारत में यह तुरंत पता चल जाता है। पश्चिम में मेरे बहुत से मित्र हैं, जो किसी न किसी धर्म का, ज़्यादातर ईसाईयत का, अनुसरण करने वाले हो सकते हैं- लेकिन इसके बावजूद, अधिकांश विषयों पर हमारे विचार एक समान ही हैं! यह एक ऐसी बात है, जो भारत में सहज संभव नहीं है।

यह एक तथ्य है कि पश्चिम में बहुत बड़ी संख्या में लोगों के लिए धर्म और ईश्वर का विशेष महत्व नहीं है। वे एक विशिष्ट धार्मिक घेरे के भीतर रहकर बड़े होते हैं, बप्तिस्मा करवाते हैं, यौवन के ईसाई पुष्टिकरण कर्मकांड आयोजित करते हैं और फिर चर्च में जाकर शादी भी करते हैं। संभव है, वे क्रिसमस और ईस्टर के दिन चर्च भी जाते हों। लेकिन उसके बाद उनके सामान्य जीवन में धर्म की कोई दखलंदाज़ी नही होती, अक्सर वे धर्म और ईश्वर के विषय में बात करना भी पसंद नहीं करते। दैनिक जीवन में वे ईश्वर का विचार तक मन में नहीं लाते, भले ही उनके प्रति उनका बुनियादी रवैया कुछ भी हो।

इसलिए जब दो ऐसे लोग आपस में मिलते हैं तो उनके बीच उनकी आस्थाओं का व्यवधान नहीं होता। वे इसकी कतई परवाह नहीं करते कि सामने वाला ईश्वर पर विश्वास रखता है या नहीं क्योंकि वे नहीं समझते कि इसका ज़रा सा भी महत्व है। परिवार में अगर उनका लड़का कहे कि वह भविष्य में चर्च नहीं जाना चाहता या अपना विवाह चर्च में नहीं बल्कि कोर्ट में पंजीकृत करवाना चाहता है तो माता-पिता आसानी से उसकी बात मान लेते हैं। इसी तरह कोई लड़की क्रिसमस के दिन चर्च चली जाएगी, भले ही वहाँ के पादरी की कही बातों पर उसका एक रत्ती भरोसा न हो।

भारत में मामला बहुत अलग है। यहाँ आस्थाओं के प्रश्न परिवारों को जुदा कर देते हैं! दैनिक जीवन में आस्था बहुत बड़ी भूमिका अदा करती है और जितना अधिक आपके आसपास के लोग धार्मिक और परम्परावादी होंगे उतना ही आपका बचपन धार्मिक त्योहारों, समारोहों, रस्म-रिवाजों और कर्मकांडों के बीच गुज़रेगा। कुछ नियत दिन या सप्ताह होंगे जब उपवास रखना होगा, कुछ अवसरों पर मन्दिर जाना ज़रूरी होगा तो कुछ दिन आप मन्दिर नहीं जाएँगे। दूसरों की धार्मिक भावनाएँ न दुःखें या देवता अप्रसन्न न हो जाएँ इसलिए कुछ अवसरों पर धारण किए जाने वस्त्रों के बारे में आपको कुछ नियम याद रखने होंगे और यह भी कि किन भावभंगिमाओं या मुद्राओं और शब्दों का उपयोग करना है और किनका नहीं करना है। यहाँ इस बात पर लोगों की बहुत गहरी आस्था होती है कि आपका अच्छा-बुरा इन सब बातों पर निर्भर होता है!

इसलिए जब बेटा घोषणा करता है कि वह ईश्वर पर विश्वास नहीं रखता तो अभिभावक चिंताग्रस्त हो जाते हैं, गुस्सा होते हैं, उन्हें समझ नहीं आता कि अब क्या किया जाए। यार-दोस्त समझ नहीं पाते और सामान्य दैनिक कार्यकलापों पर विराम सा लग जाता है क्योंकि कोई भी अंतहीन वाद-विवाद, तनातनी और झगड़े नहीं चाहता! उनकी पुरानी जीवन-चर्या समाप्त हो जाती है, अपने परिवेश से कटकर वे पूरी तरह अलग, कोई नई सामाजिक मंडली खोजने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

इसीलिए यहाँ यह चर्चा बहुत महत्वपूर्ण है। यह आपके दैनिक जीवन के बारे में है, सिर्फ सालाना दो छुट्टियों के बारे में ही नहीं। आपके रवैये और नज़रिए की जड़ कहाँ है, इस बारे में है। और इसलिए मुझे हमेशा लगता रहा है कि मैं इस विषय में पहल करूँ, बातचीत करूँ- क्योंकि आम तौर पर लोग इस विषय में चर्चा करते हुए घबराते हैं!

मैं खुद एक धार्मिक और आस्तिक से नास्तिक हुआ हूँ। मुझे महसूस हुआ है कि उसके बाद मेरे बहुत से भारतीय मित्र मुझसे दूर हो गए, यहाँ तक कि दोस्ती तोड़ ली। लेकिन मेरे पश्चिमी मित्रों के साथ मुझे यह अनुभव नहीं झेलना पड़ा- ज़्यादातर लोगों के साथ मुझे लगता रहा कि इससे उन्हें कोई मतलब ही नहीं है! इसे इस तरह समझिए कि आस्था से ज़्यादा उनके लिए व्यक्ति का महत्व था!

मैं पहले कह चुका हूँ कि ज़्यादा से ज़्यादा नास्तिक होंगे तो दुनिया बेहतर जगह हो जाएगी। इसका संबंध इस बात से नहीं है कि आप ईश्वर को मानते हैं या नहीं। और इसीलिए यह बात दुनिया के लिए इतनी आवश्यक है! लेकिन उस विषय में आगे चर्चा कल!

मेरे लिखित विचारों के साथ काम कर सकने वाले और मेरे जैसा सोचने वाले व्यक्ति की खोज मैंने कैसे की – 2 अगस्त 2015

बहुत समय से मैं एक ऐसे व्यक्ति की खोज मे था, जो कंप्यूटर के कार्यों में मेरी या हमारी सहायता कर सके। आम दिनों में आलेखों को इकट्ठा करना, व्यवस्थित करना, छांटना, और फिर उनको अंतिम रूप देना आदि कामों के लिए दुर्भाग्यवश हमें बिल्कुल समय नहीं मिल पता। आज अंततः मैंने एक ऐसा व्यक्ति खोज ही लिया, जो इन कामों में हमारी सहायता कर सके!

दिन भर में मैं न जाने कितने विचार लिखता रहता हूँ। निस्संदेह मेरा अपना ब्लॉग तो है ही, जिसे मैं प्रतिदिन नियमानुसार लिखता हूँ। जब कि इन प्रविष्टियों के ज़रिए मैं अपने विचार अलग से रखता ही हूँ फिर भी अक्सर बहुत से दूसरे विचार भी सहसा उत्पन्न होते रहते हैं, जो बिखरे-बिखरे से और बेतरतीब होते हैं और जिन्हें मैं दूसरी सोशल वेबसाइटों पर लिख दिया करता हूँ। उन्हें भी मैं फ़ाइल बनाकर अलग-अलग रखता जाता हूँ और यदि हम मेरे कंप्यूटर को एक लकड़ी की वास्तविक मेज़ मानें और इन फ़ाइल्स को कागज पर लिखी टिप्पणियाँ या आलेख तो आप समझ सकते हैं कि मेरे पास लिखित कागजों के न जाने कितने बंडल्स इकट्ठा हो जाते होंगे और न जाने उनमें से कितने बिखरे हुए कागज़ात मेज़ पर जगह के लिए आपस में लड़ते-झगड़ते होंगे, ऊधम मचाते होंगे! कहने का अर्थ यह कि इसी कारण मैं बहुत दिनों से किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश में था जो विचारों से आपूर्ण इन अदृश्य और आभासी कागजों को व्यवस्थित कर सके।

पिछले सप्ताह, जब हमारे बहुत सारे नास्तिक मित्र आश्रम आए थे तो चर्चा के दौरान कई मित्रों का कहना था कि कितना अच्छा हो अगर मैं अपने विचारों को एक किताब की शक्ल दे सकूँ, जिससे उसे उन लोगों तक पहुँचाया जा सके, जो इंटरनेट का उपयोग नहीं करते या जो मेरे संपर्क में नहीं हैं। यह मैंने पहले भी सोचा था परंतु हमारे समक्ष उपस्थित इतने सारे कामों के बीच, अनगिनत परियोजनाओं पर एक साथ काम करते हुए और अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न प्राथमिकताओं के चलते हम उस तरफ पर्याप्त ध्यान नहीं दे सके थे! एक और महत्वपूर्ण कार्य और उसे अंजाम तक पहुँचाने के लिए मदद की सख्त ज़रूरत!

कुछ सप्ताह पहले मैंने फ़ेसबुक पर घोषणा की थी कि हमारे पास इस कार्य के लिए स्थान रिक्त है! यह बात तेज़ी के साथ फैली और हमारे पास बहुत सारे आवेदन आए। उनका जायज़ा लेने के बाद रमोना और मुझे एक खास व्यक्ति बहुत काम का लगा। उसने अपनी जो विशेषताएँ बताई थीं, वे हमें अच्छी लगीं और उसके कार्यानुभव से हमें लगा, यह व्यक्ति हमारे काम भलीभाँति निपटा सकता है।

आजकल इंटरनेट और खास तौर पर फ़ेसबुक की सहायता से आपसे संपर्क करने वालों के बारे में आप बहुत कुछ जान सकते हैं। इसी प्रकार मैंने इस आवेदक के बारे में पता किया कि यह है कौन और पता चला कि वह आस्तिक है। आस्तिक! क्या वास्तव में मैं इसके साथ काम कर सकता हूँ?

गलत न समझें- हमारे यहाँ आश्रम में आस्तिक भी काम करते हैं- भोजन बनाने वाला, बागवानी करने वाला और साफ-सफाई करने वाला। लेकिन एक बार कोई मेरे विचारों पर काम करते हुए उनकी छंटाई और संजोने का काम कर दे, तो हम अगले चरण में पहुँच जाएँगे! ऐसे में, मुझे लगता है, मुझे एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता होगी, जो उसी दिशा में सोचे, जिस दिशा में मैं सोच रह हूँ! यदि मेरे शब्दों पर काम करने वाला व्यक्ति मेरी सोच के विपरीत अपने विचार रखता है, तो वह मेरे शब्दों के प्रति न्याय नहीं कर पाएगा! नहीं, हमने इस व्यक्ति को अपना काम सौंपने का विचार छोड़ दिया।

पिछले सप्ताहांत के नास्तिक सम्मलेन में ऐसे दो या तीन व्यक्ति ही मिले, जिनके बारे में मैं नहीं जानता था कि वे फेसबुक पर भी हैं। इस मुलाक़त के बाद हम लोग दोस्त बन गए और बाद में फ़ेसबुक के माध्यम से भी जुड़ गए। इनमें से एक का नाम अमित है।

उस समय हमने थोड़ी-बहुत हल्की-फुलकी चर्चा की और उसने बताया कि वह पास ही रहता और नौकरी करता है और यह भी कि जब मेरे पास रूबरू बात करने का समय होगा तब वह यहाँ आकर मुझसे मिलना चाहेगा। मैंने उसे आमंत्रित किया और वह कल आ भी गया। बहुत सारे अलग-अलग विषयों पर बातचीत के बाद मुझे लगा कि हमारे विचार आपस में काफी मिलते-जुलते हैं और तब मैंने उनसे कहा कि मेरी सहायता के लिए भी कोई योग्य व्यक्ति मिल सके तो बताओ। मैंने उन्हें अपने काम के बारे में बताया और उस व्यक्ति के बारे में भी, जो योग्य तो लग रहा था मगर जिसे हमने नियुक्त नहीं किया था।

एक मिनट सोचे बिना उसने कहा कि वह खुद यह काम करना चाहेगा। इस समय वह किसी कार्पोरेशन में काम करता है मगर अपने काम से ऊब चुका है क्योंकि रोज़ी-रोटी कमाने के लिए वहाँ अपने आदर्शों के साथ अनेक समझौते करने पड़ते हैं। उसे अपने काम से संतुष्टि नहीं मिल पाती थी, वह कुछ बौद्धिक या वैचारिक काम करना चाहता था-लिखना-पढ़ना, नई, ज्ञानवर्धक बातें सीखना और कुछ ऐसा करना, जिसका कुछ वैचारिक मूल्य हो।

इस प्रकार, ठीक इस समय अमित मेरे आश्रम में कम्प्यूटर के सामने बैठा हुआ मेरे लेखों को पढ़ रहा है और उन्हें छाँटकर व्यवस्थित करने के काम में लगा हुआ है। मिलते ही काम का प्रस्ताव; तुरत-फुरत, हाँ और काम चालू! समरूचि और समान विचार रखने वाले इस व्यक्ति के साथ लंबे समय तक काम करने और अपने विचारों के व्यवस्थित संग्रह के संपादन को लेकर मैं बहुत आशान्वित हूँ!

31 अगस्त 2015 का अपडेट 

प्रिय दोस्तों,

पिछले सात वर्षों से फेसबुक पर सक्रिय समय गुजारने के दौरान मैंने कभी भी किसी भी मित्र का नाम लेकर उसके विषय में बुरा नहीं लिखा सिवाय नेताओं और जालसाज बाबाओं के! कभी किसी नकारात्मक परिस्थिति या किसी की गलत बात को उजागर भी किया तो भी कभी किसी व्यक्ति की पहचान को प्रगट नहीं किया और उसके नाम को छुपा लिया. पहली बार मैं पछताते हुए ऐसा कर रहा हूँ क्योंकि यह आवश्यक हो गया है!

मैं आपको अमित रंजन नाम के व्यक्ति से सावधान करना चाहता हूँ, यदि आप मेरे शब्दों पर विश्वास करते हैं तो इस व्यक्ति से दूर रहें. मेरे और मेरे परिवार के विषय में यह व्यक्ति जो भी लिख रहा है उस पर विश्वास करने का कोई कारण नहीं है. असल में यह व्यक्ति इरादतन हमें नुकसान पहुंचाना चाहता है और इसी उद्देश्य से यह हमारे विषय में झूठ फैला रहा है. यह करीब एक महीने यहाँ आश्रम में रहा क्योंकि मैंने इस पर विश्वास किया परन्तु इसने मेरी मित्रता और प्रेम का दुरूपयोग किया.

असल में यह एक ऐसा करार था कि रहने और भोजन के एवज में यह मेरे कथनों को पुस्तक के लिए संकलित करने का काम कंप्यूटर पर करेगा. बात को संक्षेप में रखते हुए, इसके द्वारा फैलाये जा रहे झूठ से आपको सावधान करने के लिए यह लिख रहा हूँ कि इस एक महीने में इसने केवल कुछ घंटे ही दिए गए काम में कॉपी पेस्ट करने के काम में लगाए और बाकी समय यह यहाँ मिली सुविधाओं का अनुचित लाभ उठाता रहा! जिसमें एयरकंडीशन, लैपटॉप और इंटरनेट कनेक्शन शामिल है.

मैं कह नहीं सकता कि यह हमें क्यों नुकसान पहुंचाना चाहता है और इसके क्या इरादे हैं! परन्तु निश्चित ही हम इसके अतिवादी विचारों से सहमत नहीं हैं और मैंने इसे चेताया भी कि आप हमें हानि पहुंचा रहे हैं परन्तु ये महाशय हमारा नुकसान करने में रुके नहीं.

हम असल में किसी के भी विचारों का सम्मान करते हैं जब तक कि वो उन्हें अपने लिए रखें, किसी का नुकसान न करें, साथ ही हमारे तथा हमारे आसपास रहने वाले लोगों के साथ शांतिपूर्ण ढंग से रहें. इसको असल में इसी से समस्या थी और हमने इससे कहा कि आप यहाँ से चले जाएँ. बस इसीलिये ये अपसेट हो गया और क्रोध में असम्मानजनक अनाप शनाप झूठ लिख कर दुनिया के अलग अलग हिस्सों में बैठे हमारे मित्रों को टैग कर रहा है. ये तो अब यह दावा भी कर रहा है कि मैं इससे किताब लिखवाना चाहता था. जबकि ऊपर आप पढ़ सकते हैं कि ऐसा कुछ भी मेरे दिमाग में नहीं था. मुझे किसी घोस्ट राइटर की जरुरत नहीं है – केवल अलग अलग फाइलों में मेरे पहले से लिखे हुए विचारों को एक फ़ाइल में कॉपी पेस्ट करके किताब के लिए एकत्रित करना था.

वैसे तो इस तरह के बहुत से लोग हैं जो मेरे और मेरे परिवार के विषय में दुनिया भर की ऐसी बातें कहते हैं जोकि सच नहीं है. और समस्या वही है कि हमारे विचार अलग हैं. परन्तु वो जोकि मेरे मित्र हैं, वो हमें जानते हैं, उनके लिए मुझे कोई सफाई देने की जरुरत नहीं है, वो सत्य जानते ही हैं और यहाँ आकर देख भी सकते हैं.

मेरे भाइयों के पास बहुत सारे फोन आये इसलिए मैं यहाँ आप सभी को यह बताना चाहता था कि आप जिसे मेरा मित्र समझते थे उसके द्वारा मेरे विषय में इस प्रकार के झूठ पढ़कर विचलित न हों. सावधान रहें यह व्यक्ति अपने फ्रस्ट्रेशन में आपको नीचा दिखाने की कोशिश करेगा और उसके लिए कुछ भी झूठ तथा बुरा बोलगा और उसी समय आपकी दयालुता का अनुचित लाभ लेने में भी नहीं हिचकेगा. यह हमने तब भी देख लिया जबकि हमने इसके लिए दिल्ली तक की टैक्सी का बिल भी दिया जबकि ये आराम से बस में भी जा सकता था. परन्तु जबकि हम एक महीने से इसके खर्चे उठा रहे थे तो हमने इसके कहने पर वो भी दे दिया.

अंत में, मैं अपनी गलती के लिए क्षमा मांगता हूँ कि किसी पर ऐसे ही इतनी आसानी से विश्वास नहीं कर लेना चाहिए. यह एक सबक है मेरे लिए और मैं भविष्य में सावधान भी रहुंगा! मैं भावुक व्यक्ति हूँ और इसने मेरी भावुकता का नाजायज फायदा उठाया. परन्तु मैं भी अपना स्वभाव नहीं छोड़ सकता! किसी भी उस व्यक्ति का जो दिल में प्रेम और मित्रता की भावना रखता हो, हमेशा यहाँ स्वागत है! मेरे घर में ही नहीं दिल में भी.

नास्तिकों के लिए निर्णय लेना और ज़िम्मेदारी स्वीकार करना क्यों आसान होता है? 30 जुलाई 2015

स्वाभाविक ही, पिछले सप्ताह इतने सारे नास्तिकों के साथ एक साथ समय गुज़ारने के बाद, उनके साथ हुए कुछ अनुभव विशेष रूप से याद रह जाते हैं। एक बात यह कि सामान्य रूप से वे ज़िम्मेदारियाँ निभाने और निर्णय लेने के मामले में, मेरे मुलाकाती आस्तिकों की तुलना में, अधिक प्रस्तुत नज़र आते हैं। और यह बात मुझे बहुत सहज, स्वाभाविक और तर्कपूर्ण लगती है!

कल का ही उदाहरण लेना हो तो, किसी दुर्घटना के बाद एक नास्तिक तुरंत सहायता के लिए तत्पर दिखाई देता है, जबकि एक आस्तिक डर के मारे इसमें व्यवधान उपस्थित करता है। ऐसे नास्तिक अक्सर मिलते हैं, जो त्वरित निर्णय लेकर अपने कार्यों की ज़िम्मेदारी लेने के किए तैयार हो जाते हैं, जिससे किसी ज़रूरतमंद की मदद की जा सके।

मेरा मानना है कि नास्तिक आसानी से ऐसा कर पाते हैं क्योंकि वे पहले ही कंटीली राहों से गुज़रकर यहाँ तक पहुँचे होते हैं। काफी विचार मंथन के बाद वे इस निर्णय पर पहुँचे होते हैं कि उसी बात पर भरोसा करें, जिसका वे शिद्दत के साथ खुद महसूस करते हैं, उस पर नहीं, जो उन्हें उनका परिवार बताता है या परंपरा से उन्होंने सीखा है। आपके करीबी मित्र और रिश्तेदार या दूसरे लोग जो सोच रहे हैं या कर रहे हैं, उससे अलग कुछ करना आसान नहीं है। आपके पास दृढ़निश्चय, इतनी संकल्प शक्ति और प्रवाह के विपरीत चलने पर आने वाली मुश्किलों का सामना करने की हिम्मत होनी चाहिए। इसलिए एक भारतीय नास्तिक निश्चित ही ऐसा व्यक्ति ही होगा, जिसमें ये सारे गुण मौजूद हों। ऐसा व्यक्ति ही नास्तिक हो सकता है!

इस तरह, भारत के नास्तिक इन सब दिक्कतों का सामना पहले ही कर चुके होते हैं और जानते हैं कि उनके चारों ओर मौजूद कठिनाइयों के बावजूद वे मज़बूती के साथ पैर जमाए खड़े हैं। वे अपनी बुद्धि का प्रयोग करते हुए हर समस्या से निपटने के लिए तैयार होते हैं।

इसके विपरीत धार्मिक लोगों का रवैया अक्सर बिलकुल दूसरा होता है: सब कुछ वे ईश्वर पर छोड़ देते हैं। अपने इस विश्वास के चलते कि सब कुछ ईश्वर की मर्ज़ी से होता है, जब त्वरित निर्णय लेना आवश्यक होता है, वे अक्सर अनिच्छुक, बल्कि निष्क्रिय बने रहते हैं। ज़्यादातर आस्थावान लोग किसी समस्या का हल निकालने की ओर स्वतः प्रवृत्त नहीं होते क्योंकि उनका विश्वास होता है कि आखिर समस्या भी ईश्वर प्रदत्त है। समस्या तो होगी ही, समस्या बहुत मुश्किल भी होगी- क्योंकि वह ईश्वर की देन है! ईश्वर परीक्षा लेता है! वे अपनी सामान्य दिनचर्या से बाहर नहीं निकलते क्योंकि वे एक काल्पनिक शक्ति पर निर्भर होते हैं।

इसके अलावा वे भयभीत भी होते हैं। धर्म का सारा कारोबार ही लोगों के भय पर आधारित है। डर न हो तो वह भरभराकर गिर जाएगा। अगर नर्क का डर न हो तो कोई स्वर्ग पर भी विश्वास नहीं करेगा! आपके पाप, पापों के लिए नियत दंड, पश्चाताप और उसके चारों ओर निर्मित बाकी सब कुछ भी! ये सब डर पैदा करने के औज़ार हैं। और एक बार आप डर के आदी हुए तो फिर हमेशा हमेशा के लिए वह आपके जीवन का हिस्सा बन जाता है। जब आप कोई दुर्घटना होते हुए देखते हैं तो आप डर जाते हैं। आप घायल व्यक्ति कि मदद करने के बारे में नहीं सोचते बल्कि आपके मन में दुर्घटना के चलते हो सकने वाली दिक्कतों से अपने आपको बचाने का खयाल आता है!

धार्मिक लोग मुश्किल वक़्त में अपने ईश्वर का आह्वान करते हैं कि वह उन्हें सही निर्णय लेने की शक्ति दे, उचित राह दिखाए। उनका विश्वास होता है कि ईश्वर अवश्य ही कोई न कोई राह निकालेगा-लेकिन मैंने देखा है कि ईश्वर के भरोसे बैठे हुए वे लोग अक्सर कोई निर्णय ही नहीं ले पाते, आगे बढ़कर खुद कुछ करने की जगह वे किसी दैवी शक्ति के निर्देश का इंतज़ार करते रहते हैं, जो कभी सामने नहीं आता!

निश्चित ही, हर चीज़ के अपवाद होते हैं लेकिन सामान्य रूप से लोगों के इस रवैये को मैंने अक्सर नोटिस किया है। भविष्य में इस नजरिए से आस्तिकों और नास्तिकों के रवैयों पर नज़र रखें, आपको भी अंतर स्पष्ट नज़र आएगा!

यहाँ आप नास्तिकों के सम्मेलन के चित्र देख सकते हैं

नास्तिक दूसरों की सहायता करने के लिए अच्छे काम करते हैं, पुण्य कमाने के लिए नहीं – 29 जुलाई 2015

कल मैंने बताया था कि बहुत से लोग यह मानते हैं कि नास्तिक न सिर्फ नीरस होते हैं और आनंदरहित जीवन बिताते हैं बल्कि वे संवेदनशील और परोपकारी भी नहीं होते। उनके विचार से नास्तिकों में करुणा का अभाव होता है और वे मतलबी होते हैं। आज मैं अपने ब्लॉग के ज़रिए इस पूर्वाग्रह का खंडन करना चाहता हूँ।

सबसे पहले यह देखते हैं कि ये विचार कहाँ से आते हैं। नास्तिक और आस्तिक में क्या भिन्नता है? एक समूह ईश्वर को मानता है और दूसरा नहीं। तो, जो ईश्वर को मानते हैं, वे सोचते हैं कि वे ही दूसरों की सहायता करते हैं, जबकि नास्तिक नहीं करते। अर्थात, वे मानते हैं कि ईश्वर ही उन्हें लोगों की मदद करने के लिए प्रेरित करता है। यह रोचक है, क्योंकि इसका आशय यह है कि आप इसलिए परोपकार करते हैं क्योंकि ईश्वर ने धर्मग्रथों में ऐसा करने को कहा है- ठीक? अगर आप स्वयं अपना निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होते, बीच में ईश्वर नहीं होता तो आपके अनुसार, आप कोई भी भला काम नहीं करते, जो आप अभी कर रहे हैं?

यदि यह सत्य है, तो यह नास्तिक बेहतर इंसान हैं, क्योंकि वे अच्छे कार्य केवल इसलिए करते हैं कि उन्हें वह उचित लगता है। इसलिए नहीं कि पिता जैसी छवि रखने वाला कोई काल्पनिक चरित्र उन्हें ऐसा करने का आदेश देता है। इसलिए नहीं कि वे किसी काल्पनिक बहीखाते में पुण्य जमा कर रहे हैं!

मैं आपको नास्तिकों में मौजूद दयाभाव और परोपकार का एक उदाहरण देता हूँ, जो हमारे इस आयोजन के तुरंत बाद हाल ही में सामने आया है। युवा नास्तिकों का एक समूह हमारे कार्यक्रम के बाद टेम्पो ट्रेवलर से आगरा के लिए निकला। हमने एक स्थानीय टॅक्सी ऑपरेटर से कह कर टेम्पो ट्रेवलर की व्यवस्था कराई थी। आगरा के रास्ते में उनके सामने एक दुर्घटना घटित हुई और उन्होंने अपनी गाड़ी रुकवा दी। मुझे नहीं पता, वास्तव में वहाँ क्या हुआ परन्तु दुर्घटना में कई लोग घायल हुए थे और उन्हें तत्काल चिकित्सकीय सहायता की आवश्यकता थी। उस छोटे से समूह ने जोकि ताजमहल देखने जा रहे थे, तुरंत निश्चय किया कि वे पहले उन घायलों को अस्पताल पहुँचाएँगे!

दुर्भाग्य से गाड़ी के वाहन चालक ने, जो एक स्थानीय व्यक्ति ही था, मना कर दिया। वह पुलिस से साथ कोई मुसीबत न हो, इस डर से या किसी और कारण से या अकारण घबरा गया। वह जीप से दूर, अलग जाकर खड़ा हो गया, यह दिखाने के लिए कि यदि वे लोग किसी घायल को साथ लेकर जाना चाहते हैं तो वह गाड़ी नहीं चलाएगा।

असमंजस की स्थिति में कि क्या करें, वे सड़क के किनारे खड़े होकर दूसरी गाड़ियों को इशारों से और हाथ हिला-हिलाकर रोकने की कोशिश करने लगे। अंततः एक कार रुकी और चालक उन घायलों को साथ लेकर अस्पताल चलने के लिए तैयार हो गया।

तो, एक ऐसा ईश्वरभक्त व्यक्ति, जिसने अपनी गाड़ी के दोनों तरफ बड़े-बड़े अक्षरों में राधे-राधे लिखवा रखा है, और तो और स्वयं भी एक धार्मिक पहनावे में है और जिसने बाकायदा धार्मिक शृंगार किया हुआ है, एक खून से लथपथ घायल व्यक्ति को अपने साथ ले जाने के लिए मना कर देता है जबकि बाहर से आया एक नास्तिकों का दल, अपने कार्यक्रम की परवाह किए बगैर उस घायल व्यक्ति की जान बचाने के लिए एक अनजान जगह में वह सब कुछ करने के लिए राज़ी है, जो वह कर सकता है।

हालांकि मेरे लिए यह कोई बड़ा आश्चर्य नहीं है–क्योंकि एक अधार्मिक व्यक्ति अपनी सहज प्रवृत्ति पर, अपने तर्कपूर्ण विचारों पर भरोसा करते हुए स्वयं अपनी मर्ज़ी से निर्णय लेता है जबकि धर्म अपने अनुयायियों को भय का अनुसरण करना सिखाता है। इसलिए जबकि यह धार्मिक व्यक्ति सोच ही रहा था कि क्या-क्या बुरा हो सकता है, ये नास्तिक अपना काम कर चुके थे, अपने सामने घायल पड़े हुए व्यक्ति की सहायता करने की एकमात्र इच्छा के वशीभूत!

अपने स्कूल के बच्चों के लिए किए जा रहे हमारे कार्य आपको सहमत नहीं करते तो शायद यह घटना आपके लिए एक प्रमाण है कि नास्तिक लोग वास्तव में अच्छे कार्य करते हैं, दूसरों की सहायता हेतु सदा तत्पर रहते हैं- जबकि धार्मिक लोग भयभीत होकर पीछे हटने के बहाने ढूँढ़ते रहते हैं!

यहाँ आप नास्तिकों के सम्मेलन के चित्र देख सकते हैं

यह स्पष्ट करने के लिए कि आप नीरस या असंवेदनशील नहीं हैं, अपनी नास्तिकता को सबके सामने स्वीकार कीजिए – 28 जुलाई 2015

मैंने कल उल्लेख किया था कि मैं खुशी-खुशी लोगों को बताता हूँ कि मैं नास्तिक हूँ। मैं इसका प्रसार करना चाहूँगा और अधिक से अधिक लोगों के मन में धर्म के प्रति शंका पैदा कर उन्हें उससे विलग करने की कोशिश करूँगा। लेकिन हर नास्तिक इस तरह नहीं सोचता! नहीं, ऐसे बहुत से लोग हैं, जो धर्म के प्रति अपने अविश्वास को खुले आम स्वीकार करने में संकोच करते हैं। यहाँ तक कि वे समझते हैं जैसे धर्म पर विश्वास न करके वे कोई अपराध कर रहे हैं। यदि आप भी उनमें से एक हैं तो आपको इसे बदलना चाहिए!

आप यदि इस समस्या की गहराई में जाकर उसकी गंभीरता को समझना चाहते हैं तो सबसे पहले यह जान लीजिए कि भारत में नास्तिक शब्द को, जिसे अंग्रेज़ी में एथीस्ट कहते हैं, बहुत ही नकारात्मक अर्थ में लिया जाता है। अधिकांश लोग धार्मिक हैं और उनका विश्वास होता है कि ईश्वर में आस्था रखने पर ही आप दयालु, परोपकारी, प्रेममय और प्रफुल्ल होते हैं और तभी आप जीवन का आनंद ले सकते हैं! वे सच में यह सोचते हैं कि जो ईश्वर को नहीं मानता वह एक अच्छा और नैतिक व्यक्ति नहीं हो सकता। वह दूसरों का भला नहीं कर सकता और न तो हँस-बोल सकता है और न ही अपने जीवन में किसी प्रकार से भी खुश रह सकता है! उसकी छवि एक बुरे व्यक्ति जैसी बना दी गई है।

वास्तव में इसीलिए लोग अपने आपको अधार्मिक या नास्तिक घोषित करने से कतराते हैं। वे अपने आपको प्रगतिवादी, तर्कशील, संदेहवादी, विवेकपूर्ण और इसी तरह के समानार्थी शब्दों से संबोधित करते हैं, जिनसे सिर्फ इतना पता चलता है कि वे दक़ियानूसी प्रथाओं और परंपराओं को नहीं मानते। पर इनमें से कोई भी शब्द, मेरी नज़र में, पर्याप्त स्पष्ट नहीं है और आपकी वास्तविक मंशा ज़ाहिर नहीं करता कि आप किसी भी धर्म का अनुपालन नहीं करते, कि आप ईश्वर पर विश्वास नहीं रखते, कि आप नास्तिक हैं।

समाज में “नास्तिक” शब्द को नकारात्मक अर्थ में लिया जाता है और आप नहीं चाहते कि लोगों के बीच आप एक नकारात्मक व्यक्ति के रूप में जाने जाएँ। लेकिन वास्तव में बदलाव लाने के लिए आपको शब्द नहीं बदलना है। यदि आप ऐसा करते हैं तो वास्तव में आप इस नकारात्मक सोच का समर्थन ही कर रहे हैं, आप यह साबित कर रहे हैं कि वास्तव में नास्तिक खुश नहीं रह सकते, आनंदित नहीं हो सकते। आप एक सकारात्मक व्यक्ति दिखाई देना चाहते हैं इसलिए मान रहे हैं कि आप नास्तिक नहीं हैं-क्योंकि नास्तिक तो सकारात्मक हो ही नहीं सकते! यह सही तरीका नहीं है।

इसमें खतरा यह है कि बहुत से दूसरे लोग अपने आपको आधुनिक अथवा अलग साबित करने के प्रयास में पाखण्ड पूर्वक ठीक इन्हीं शब्दों का उपयोग करते हैं, जबकि वास्तव में वे पूर्ण रूप से आस्तिक और धार्मिक होते हैं! आप कह सकते हैं कि वे तार्किक नहीं हैं किन्तु उनके अपने विचार से वे हैं! इस तरह गलती से आपको भी एक ऐसा आस्थावान और धार्मिक व्यक्ति समझ लिया जाएगा, जो थोड़ा खुले विचारों वाला है, इतना ही। अगर आप कहते हैं कि आप 'प्रगतिशील' हैं तो उसका अर्थ, अपनी पूजा-अर्चना दिए की जगह बिजली का बल्ब जलाकर करने वाले व्यक्ति से लेकर ईश्वर पर विश्वास न करने वाले किसी नास्तिक व्यक्ति तक, कुछ भी लगाया जा सकता है!

जो बात कहनी है, बिना लाग लपेट के, साफ-साफ कहिए। सिर्फ यही स्पष्टता गलतफहमियाँ और भ्रांतियाँ दूर कर सकती है।

हमें ‘नास्तिक’ शब्द के इस नकारात्मक अर्थ के चलन को तोड़ना है किन्तु यह तभी संभव है जब हम स्वयं को नास्तिक कहें और यह दिखा सकें कि नास्तिक होने के बाद भी हम जीवन का उतना ही, बल्कि सामान्य से ज्यादा ही, आनंद लेते हैं। आप क्या हैं और क्या सोचते हैं, स्पष्ट रखें। अगर वह आपके लिए सहज, स्वाभाविक और उचित है तभी आप दूसरों को भी उसके बारे में बता सकते हैं। समय के साथ यह छवि भी बदलेगी। ईमानदार और सत्यनिष्ठा रहें- बदलाव अवश्य आएगा!

यहाँ आप नास्तिकों के सम्मेलन के चित्र देख सकते हैं

नास्तिकों की बढ़ती संख्या में बहुत बड़ा हिस्सा ईश्वर में विश्वास न रखने वाले युवाओं का है – 27 जुलाई 2015

मैंने आपको पिछले सप्ताह सम्पन्न नास्तिकों के सम्मेलन के बारे में बताया था। आपस में मिलकर हमने सचमुच बहुत शानदार वक़्त गुज़ारा और मैंने समान विचारधारा वाले लोगों के बीच दृष्टिकोण और विचारों के आदान-प्रदान का भरपूर आनंद लिया। और संख्या की दृष्टि से यह समुदाय भारत में और सारे विश्व में लगातार बढ़ता जा रहा है।

शनिवार को जो समूह आया, उनमें मिश्रित आयु वर्ग के लोग थे लेकिन ज़्यादातर बीस से तीस साल तक के युवक और युवतियाँ थे और कुछ तो बीस से कम उम्र वाले युवा भी थे। अधिक आयुवर्ग के हमारे बुजुर्ग मित्रों ने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की और कहा कि इतना विवेकपूर्ण सोच रखने वाले युवाओं की इतनी बड़ी संख्या बड़े संतोष की बात है! प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए मैंने कहा कि ईश्वर एवं धर्म पर अपनी शंकाओं को साझा करके और उन पर चर्चा करके हम अपने देश में और आस-पास के दूसरे देशों में नास्तिकों की संख्या में और तेज़ी के साथ वृद्धि कर सकते हैं।

जी हाँ, मेरा पक्का मानना है कि अगर ज़्यादा से ज़्यादा लोग ईश्वर को न मानें और किसी संगठित धर्म के अनुयायी न हों तो विश्व एक बेहतर स्थान बन सकता है। मैं एक नास्तिक हूँ और मुझे लगता है कि आगे बढ़ने का यह उचित रास्ता है। यदि मैं यह नहीं देख पाता कि धर्म में कुछ गड़बड़ है, तो मैं अब भी धार्मिक ही रहा होता! यदि मैं वास्तव में सोचता कि ईश्वर है तो मैं यह नहीं कहता कि मैं नास्तिक हूँ! मैंने धर्म का मार्ग छोड़ दिया है और यही कारण है कि मैं दूसरों से स्पष्ट शब्दों में कह सकता हूँ कि उन्हें भी इस बकवास को त्याग देना चाहिए!

मुझे विश्वास है कि एक न एक दिन अधिकतर लोग यह जान जाएँगे कि धर्म एक भ्रांति है। आप जितना विकास करेंगे, आप जितना आगे बढ़ेंगे, जितना आप दूसरे विचारों को जानेंगे और समझेंगे। और लोग जितना अधिक सम्पन्न होंगे, उतना ही वे धर्म की भ्रांतियों को समझेंगे और उसे छोड़ देंगे!

चर्चा के दौरान शनिवार को मैंने स्पष्ट किया कि मुख्यतः धर्म और ईश्वर उस अविकसित परिवेश के विषय है, जहाँ समृद्धि नहीं है। जहाँ आप निर्धनता देखते हैं, वहाँ आप बहुत अधिक धर्म भी देखेंगे। जहाँ आप विकास और जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं की प्रचुरता देखते हैं, वहाँ आपको धर्म न के बराबर दिखाई देगा।

सर्वेक्षण और अध्ययन तो पहले ही दिखा चुके हैं कि भारत के सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी, भारतीय प्राद्योगिकी संस्थान के, दूसरी तकनीकी संस्थाओं के श्रेष्ठ भूतपूर्व छात्र नास्तिक बनते जा रहे हैं! एक युवा, आधुनिक और विकसित भारत आगे बढ़ते हुए एक नई पीढ़ी का निर्माण कर रहा है। एक ऐसी पीढ़ी, जो परंपराओं और रूढ़ियों पर शंकाएँ उपस्थित करेगी। एक ऐसी पीढ़ी, जो प्रश्न पूछने में संकोच नहीं करेगी। एक ऐसे युग का सूत्रपात हो रहा है, जिसे आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता।

धर्मभीरुओं के लिए शंका और प्रश्नों का निषेध है। और इसीलिए आने वाली पीढ़ियाँ धर्म और ईश्वर का त्याग कर देंगी। उनको पता है कि आप प्रश्न पूछ कर, शोध करके और विषय की गहराई में उतरकर ही सत्य की खोज कर सकते हैं। इस तरह निश्चय ही नास्तिक समुदाय अधिक से अधिक वृद्धि करेगा-और मुझे खुशी है कि मुझे भी उसका एक हिस्सा होने का सौभाग्य प्राप्त होगा।

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